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नमामि मातु भारती-गोपाल प्रसाद व्यास

हिमाद्रि तुंग श्रृंगिनी त्रिरंग-रंग रंगिनी नमामि मातु भारती सहस्त्र दीप आरती !   समुद्र पाद पल्लवे विराट-विश्व वल्लभे प्रबुद्ध बुद्ध की धरा प्रणम्य है वसुंधरा !   स्वराज्य स्वावलम्बिनी सदैव सत्य-संगिनी अजेय, श्रेय-मंडिता समाज-शास्त्र पंडिता !   अशोक चक्र-संयुते समुज्जवले, समुन्नते मनोज्ञ मुक्ति-मंत्रिणी विशाल लोक-तंत्रिणी !   अपार शस्य-सम्पदे अजस्त्र श्री पदे-पदे शुभंकरे प्रियम्वदे दया-क्षमा वंशवदे !   मनस्विनी तपस्विनी रणस्थली यशस्विनी कराल काल-कालिका प्रचंड मुंड-मालिका !   अमोघ शक्ति-धारिणी कराल कष्ट-वारिणी अदैन्य मंत्र दायिका नमामि राष्ट्र नायिका !

वीरों का कैसा हो वसंत- सुभद्रा कुमारी चौहान

वीरों का कैसा हो वसंत? आ रही हिमालय से पुकार है उदधि गरजता बार-बार प्राची-पश्चिम, भू नभ अपार. सब पूछ रहे हैं दिग-दिगंत वीरों का कैसा हो वसंत? फूली सरसों ने दिया रंग मधु लेकर आ पहुंचा अनंग वसु-वसुधा पुलकित अंग-अंग हैं वीर वेश में किंतु कंत वीरों का कैसा हो वसंत? गलबांही हो, या हो कृपाण चल-चितवन हो, या धनुष-बाण हो रस-विलास, या दलित त्राण अब यही समस्या है दुरंत वीरों का कैसा हो वसंत? भर रही कोकिला इधर तान मारू बाजे पर उधर गान है रंग और रण का विधान मिलने आए हैं आदि अंत वीरों का कैसा हो वसंत? कह दे अतीत अब मौन त्याग लंके! तुझमें क्यों लगी आग ऐ कुरुक्षेत्र ! अब जाग, जाग बतला अपने अनुभव अनंत वीरों का कैसा हो वसंत ? हल्दीघाटी के शिलाखंड ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचंड राणा-ताना का कर घमंड दो जगा आज स्मृतियाँ ज्वलंत वीरों का कैसा हो वसंत?

झंडा ऊंचा रहे हमारा- श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’

झंडा ऊंचा रहे हमारा. विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा .   सदा शक्ति बरसाने वाला, प्रेम सुधा सरसाने वाला, वीरों को हरषाने वाला, मातृभूमि का तन-मन सारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा.   स्वतंत्रता के भीषण रण में, लखकर जोश बढ़े क्षण-क्षण में, कांपे शत्रु देखकर मन में, मिट जावे भय संकट सारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा.   इस झंडे के नीचे निर्भय, हो स्वराज्य जनता का निश्चय, बोलो भारत माता की जय, स्वतंत्रता ही ध्येय हमारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा.   आओ प्यारे वीरों आओ, देश-जाति पर बलि-बलि जाओ, एक साथ सब मिलकर गाओ, प्यारा भारत देश हमारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा.   इसकी शान न जाने पावे, चाहे जान भले ही जावे, विश्व-विजय करके दिखलावे, तब होवे प्रण-पूर्ण हमारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा.  

शहीदों की चिताओं पर- जगदम्बा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’

उरूजे कामयाबी पर कभी हिन्दोस्तां होगा | रिहा सैय्याद के हाथों से अपना आशियां होगा || चखाएंगे मजा बर्बादिये गुलशन का गुलचीं को | बहार आ जाएगी उस दम जब अपना बागबां होगा || ये आए दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ खंजरे क़ातिल | पता कब फैसला उनके हमारे दरम्यां होगा || जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दे वतन हर्गिज़ | न जाने बाद मुर्दन मैं कहाँ और तू कहाँ होगा || वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है | सुना है आज मकतल में हमारा इम्तहां होगा || शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले | वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा || कभी वह भी दिन आएगा जब अपना राज देखेंगे| जब अपनी ही जमीं होगी और अपना आसमां होगा ||    

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