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धर्म संकट -अमृतलाल नागर 

रायबहादुर - धर्म संकट -अमृतलाल नागर

शाम का समय था, हम लोग प्रदेश, देश और विश्‍व की राजनीति पर लंबी चर्चा करने के बाद उस विषय से ऊब चुके थे. चाय बड़े मौके से आई, लेकिन उस ताजगी का सुख हम ठीक तरह से उठा भी न पाए थे कि नौकर ने आकर एक सादा बंद लिफाफा मेरे हाथ में रख दिया. मैंने खोलकर देखा, सामनेवाले पड़ोसी रायबहादुर गिर्राज किशन (गिरिराज कृष्‍ण) का पत्र था, काँपते हाथों अनमिल अक्षरों और टेढ़ी पंक्तियों में लिखा था : माई डियर प्रताप, "मैंने फुल्‍ली को आदेश दे रक्‍खा है कि मेरी मृत्‍यु के बाद यह पत्र तुम्‍हें फौरन पहुँचाया जाए. तुम मेरे अभिन्‍न मित्र के पुत्र हो. रमेश से अधिक सदा आज्ञाकारी रहे हो. मेरी निम्‍नलिखित तीन अंतिम इच्‍छाओं को पूरा करना - " 1. रमेश को तुरंत सूचना देना. मेरी आत्‍मा को तभी शांति मिलेगी, जब उसके हाथों मेरे अंतिम संस्‍कार होंगे. मैंने उसके साथ अन्याय किया है. 2. फुल्‍ली को मैंने

सिकंदर हार गया-अमृतलाल नागर

अपने जमाने से जीवनलाल का अनोखा संबंध था। जमाना उनका दोस्‍त और दुश्‍मन एक साथ था। उनका बड़े से बड़ा निंदक एक जगह पर उनकी प्रशंसा करने के लिए बाध्‍य था और दूसरी ओर उन पर अपनी जान निसार करनेवाला उनका बड़े से बड़ा प्रशंसक किसी ने किसी बात के लिए उनकी निंदा करने से बाज नहीं आता था, भले ही ऐसा करने में उसे दुख ही क्‍यों न हो। परिचित हो या अपरिचित, चाहे जीवनलाल का शत्रु ही क्‍यों न हो, अगर मुसीबत में है तो वह बेकहे-बुलाए आधी रात को भी तन-मन-धन से उसकी सहायता करने के लिए तैयार हो जाते थे। उस समय वे अपने नफे-नुकसान की तनि‍क भी परवाह न करते थे। लेकिन व्‍यवहार में बड़ी ओछी तबीयत के थे, अपने टके के लाभ के लिए किसी की हजारों की हानि करा देने में उन्‍हें तनिक भी हानि न होती थी। वह स्‍त्री के संबंध में

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