प्रेमचंद कालीन कहानियाँ

उर्दू लेखन से हिंदी में आये प्रेमचंद ने हिंदी कहानी को सामाजिक यथार्थ से जोड़ा. उन्होंने तत्कालीन भारतीय समाज की लगभग हर महत्वपूर्ण समस्या को अपनी कहानियों का विषय बनाया. कृषक समस्या (पूस की रात), दलित शोषण (सद्गति, कफ़न, सवा सेर गेहूँ), स्त्री शोषण (घास वाली), राष्ट्रीय आंदोलन (बौड़म) से लेकर सामाजिक कुरीतियों के हर रूप पर प्रेमचंद की कलम चली है.

सुदर्शन (हार की जीत, आशीर्वाद, साइकिल की सवारी) , विश्वंभर नाथ शर्मा ‘कौशिक’ (ताई), पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ (उसकी माँ, चॉकलेट) आदि प्रेमचंद के समकालीन लेखक भी यथार्थवादी परंपरा के कहानीकार हैं. जयशंकर प्रसाद भी प्रेमचंद के समकालीन कहानीकार हैं, लेकिन उनकी कहानियाँ (छाया, इंद्रजाल, आकाशदीप, पुरस्कार, गुंडा आदि) एक छायावादी रोमान का आवरण लेकर आती हैं.

वस्तुतः प्रेमचंद और प्रसाद इस काल के कहानी लेखन के दो ध्रुव हैं, जिनके केंद्र में क्रमशः समाज और व्यक्ति हैं. परवर्ती कहानियों में इन दोनों प्रवृत्तियों का क्रमिक विकास देखा जा सकता है.

Load More

Do NOT follow this link or you will be banned from the site!
कॉपी नहीं शेयर करें !