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खानाबदोश

अनुमानित समय : 15 मिनट-

सुकिया के  हाथ की पथी कच्ची ईंटें पकने के  लिए भट्टे में लगाई जा रही थीं। भट्टे के गलियारे में झरोखेदार कच्ची ईंटों की दीवार देखकर सुकिया आत्मिक सुख से भर गया था। देखते-ही-देखते हजारों ईंटें भट्टे के गलियारे में समा गई थीं। ईंटों के बीच खाली जगह में पत्थर का कोयला, लकड़ी, बुरादा, गन्ने की बाली भर दिए गए थे। असगर ठेकेदार ने अपनी निगरानी में हर चीज तरतीब से लगवाई थी। आग लगाने से पहले भट्टा-मालिक मुखतार सिंह ने एक-एक चीज का मुआयना किया था। चौबीसों घंटे की ड्यूटी पर मजदूरों को लगाया गया था, जो मोरियों से भट्टे में कोयला, बुरादा आदि डाल रहे थे। भट्टे का सबसे खतरेवाला काम था मोरी पर काम करना। थोड़ी-सी असावधानी भी मौत का कारण बन सकती थी। भट्टे की चिमनी धुआँ उगलने लगी थी। यह धुआँ मीलों दूर से दिखाई पड़ जाता था। हरे-भरे खेतों के  बीच गहरे मटमैले रंग का यह भट्टा एक धब्बे जैसा दिखाई पड़ता था। मानो और सुकिया महीना भर पहले ही इस भट्टे पर आए थे, दिहाड़ी मजदूर बनकर। हफ्ते भर का काम देखकर असगर ठेकेदार ने सुकिया से कहा था कि साँचा ले लो और ईंट पाथने का काम शुरू करो। हजार ईंट के रेट से अपनी मजदूरी लो। भट्टे पर लगभग तीस मजदूर थे जो वहीं काम करते थे। भट्टा-मालिक मुखतार सिंह और असगर ठेकेदार साँझ होते ही शहर लौट जाते थे। शहर से दूर, दिनभर की गहमा-गहमी के बाद यह भट्टा अँधेरे की गोद में समा जाता था।

एक कतार में बनी छोटी-छोटी झोंपड़ियों में टिमटिमाती ढिबरियाँ भी इस अँधेरे से लड़ नहीं पाती थीं। दड़बेनुमा झोंपड़ियों में झुककर घुसना पड़ता था। झुके -झुके ही बाहर आना होता था। भट्टे का काम खत्म होते ही औरतें चूल्हा-चौका सँभाल लेती थीं। कहने भर के लिए चूल्हा-चौका था। ईंटों को जोड़कर बनाए चूल्हे में जलती लकड़ियों की चिट-पिट जैसे मन में पसरी दुश्चिंताओं और तकलीफों की प्रतिध्वनियाँ थीं जहाँ सब कुछ अनिश्चित था। मानो अभी तक इस भट्टे की ज़िंदगी से तालमेल नहीं बैठा पाई थी। बस, सुकिया की जिद के सामने वह कमजोर पड़ गई थी। साँझ होते ही सारा माहौल भाँय-भाँय करने लगता था। दिनभर के थके-हारे मजदूर अपने-अपने दड़बों में घुस जाते थे। साँप-बिच्छू का डर लगा रहता था। जैसे समूचा जंगल झोंपड़ी के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया हो। ऐसे माहौल में मानो का जी घबराने लगता था। लेकिन करे भी तो क्या, न जाने कितनी बार सुकिया से कहा था मानो ने, अपने देस की सूखी रोटी भी परदेस के पकवानों से अच्छी होती है। ̧सुकिया के मन में एक बात बैठ गई थी। नर्क की ज़िंदगी से निकलना है तो कुछ छोड़ना भी पड़ेगा। मानो की हर बात का एक ही जवाब था उसके पास- बडे़-बूढे़ कहा करे हैं कि आदमी की औकात घर से बाहर कदम रखणे पे ही पता चले है। घर में तो चूहा भी सूरमा बणा रह। काँधे पर यो लंबा लट्ठ धरके चलणें वाले चौधरी सहर; शहर में सरकारी अफसरों के आग्गे सीध्धे खडे़ न हो सके हैं। बुड्ढी बकरियों की तरह मिमियाएँ हैं…और गाँव में किसी गरीब को आदमी भी न समझे हैं…’

    सुकिया की इन बातों से मानो कमजोर पड़ जाती थी। इसीलिए गाँव-देहात छोड़कर वे दोनों एक दिन असगर ठेकेदार के साथ इस भट्टे पर आ गए थे। पहले ही महीने में सुकिया ने कुछ रुपये बचा लिए थे। कई-कई बार गिनकर तसल्ली कर ली थी। धोती की गाँठ में बाँधकर अंटी में खोंस लिए थे। रुपये देखकर मानो भी खुश हो गई थी। उसे लगने लगा था कि वह अपनी ज़िंदगी के ढर्रे को बदल लेगा।

सुकिया और मानो की ज़िंदगी एक निश्चित ढर्रे पर चलने लगी थी। दोनों मिलकर पहले तगारी बनाते, फिर मानो तैयार मिट्टी लाकर देती। इस काम में उनके साथ एक तीसरा मजदूर भी आ गया था। नाम था जसदेव। छोटी उम्र का लड़का था। असगर ठेकेदार ने उसे भी उनके साथ काम पर लगा दिया था। इससे काम में गति आ गई थी। मानो भी अब फुर्ती से साँचे में ईंटें डालने लगी थी, जिससे उनकी दिहाड़ी बढ़ गई थी।

उस रोज मालिक मुखतार सिंह की जगह उनका बेटा सूबे सिंह भट्टे पर आया था। मालिक कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर चले गए थे। उनकी गैरहाजिरी में सूबेसिंह का रौब-दाब भट्टे का माहौल ही बदल देता था। इन दिनों में असगर ठेकेदार भीगी बिल्ली बन जाता था। दफ्तर के बाहर एक अर्दली की ड्यूटी लग जाती थी, जो कुर्सी पर उकड़ू  बैठकर दिनभर बीड़ी पीता था, आने-जानेवालों पर निगरानी रखता था। उसकी इजाज़त के बगैर कोई अंदर नहीं जा सकता था।

        एक रोज सूबेसिंह की नजर किसनी पर पड़ गई। तीन महीने पहले ही किसनी और महेश भट्टे पर आए थे। पाँच-छः महीने पहले ही दोनों की शादी हुई थी। सूबेसिंह ने उसे दफ्तर की सेवा-टहल का काम दे दिया था। शुरू-शुरू में किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया था। लेकिन जब रोज ही गारे-मिट्टी का काम छोड़कर वह दफ्तर में ही रहने लगी तो मजदूरों में फुसफुसाहटें शुरू हो गई थीं। तीसरे दिन सुबह जब मजदूर काम शुरू करने के  लिए झोंपड़ियों से बाहर निकल रहे थे, किसनी हैंडपंप के नीचे खुले में बैठकर साबुन से रगड़-रगड़कर नहा रही थी। भट्टे पर साबुन किसी के पास नहीं था। साबुन और उससे उठते झाग पर सबकी नजर पड़ गई थी। लेकिन बोला कोई कुछ भी नहीं था। सभी की आँखों में शंकाओं के गहरे काले बादल घिर आए थे। कानाफूसी हलके -हलके शुरू हो गई थी।

        महेश गुमसुम-सा अलग-अलग रहने लगा था। साँवले रंग की भरे-पूरे जिस्म की किसनी का व्यवहार महेश के लिए दुःखदाई हो रहा था। वह दिन-भर दफ्तर में घुसी रहती थी। उसकी खिलखिलाहटें दफ्तर से बाहर तक सुनाई पड़ने लगी थीं। महेश ने उसे समझाने की कोशिश की थी। लेकिन वह जिस राह पर चल पड़ी थी वहाँ से लौटना मुश्किल था।

        भट्टे की ज़िंदगी भी अजीब थी। गाँव-बस्ती का माहौल बन रहा था। झोंपड़ी के बाहर जलते चूल्हे और पकते खाने की महक से भट्टे की नीरस ज़िंदगी में कुछ देर के लिए ही सही, ताजगी का अहसास होता था। ज्यादातर लोग रोटी के साथ गुड़ या फिर लाल मिर्च की चटनी ही खाते थे। दाल-सब्जी तो कभी-कभार ही बनती थी। शाम होते ही हैंडपंप पर भीड़ लग जाती थी। जिस्म पर चिपकी मिट्टी को जितना उतारने की कोशिश करते, वह और उतना ही भीतर उतर जाती थी। नस-नस में कच्ची मिट्टी की महक बस गई थी। इस महक से अलग भट्टे का कोई अस्तित्व नहीं था।

        किसनी और सूबेसिंह की कहानी अब काफी आगे बढ़ गई थी। सूबेसिंह के अर्दली ने महेश को शराब की लत डाल दी थी। शराब पीकर महेश झोंपड़ी में पड़ा रहता था। किसनी के पास एक ट्रांजिस्टर भी आ गया था। सुबह-शाम भट्टे की खामोशी में ट्रांजिस्टर की आवाज गूँजने लगी थी। ट्रांजिस्टर वह इतने जोर से बजाती थी कि भट्टे का वातावरण फिल्मी गानों की आवाज से गमक उठता था। शांत माहौल में संगीत-लहरियों ने खनक पैदा कर दी थी।

         कड़ी मेहनत और दिन-रात भट्टे में जलती आग के बाद जब भट्टा खुलता था तो मजदूर से लेकर मालिक तक की बेचैन साँसों को राहत मिलती थी। भट्टे से पकी ईंटों को बाहर निकालने का काम शुरू हो गया था। लाल-लाल पक्की ईंटों को देखकर सुकिया और मानो की खुशी की इंतहा नहीं थी। खासकर मानो तो ईंटों को उलट-पुलटकर देख रही थी। खुद के हाथ की पथी ईंटों का रंग ही बदल गया था। उस दिन ईंटों को देखते-देखते ही मानो के मन में बिजली की तरह एक खयाल कौंधा था। इस खयाल के आते ही उसके भीतर जैसे एक साथ कई-कई भट्टे जल रहे थे। उसने सुकिया से पूछा था, एक घर में कितनी ईंटें लग जाती हैं?

बहुत…कई हजार…लोहा, सीमेंट, लकड़ी, रेत अलग से। ̧उसके मन में खयाल उभरा था। उसे तत्काल कोई आधार नहीं मिल पा रहा था। वह बेचैन हो उठी थी।

        उसे खामोश देखकर सुकिया ने कहा, चलो, काम शुरू करना है। जसदेव बाट देख रहा होगा। ̧ सुकिया के  पीछे-पीछे अनमनी ही चल दी थी मानो, लेकिन उसके दिलो-दिमाग पर ईंटों का लाल रंग कुछ ऐसे छा गया था कि वह उसी में उलझकर रह गई थी।

        झींगुरों की झिन-झिन और बीच-बीच में सियारों की आवाजें रात के सन्नाटे में स्याहपन घोल रही थीं। थके-हारे मजदूर नींद की गहरी खाइयों में लुढ़क गए थे। मानो के खयालों में अभी भी लाल-लाल ईंटें घूम रही थीं। इन ईंटों से बना हुआ एक छोटा-सा घर उसके जेहन में बस गया था। यह खयाल जिस शिद्दत से पुख्ता हुआ था, नींद उतनी ही दूर चली गई थी।

        दूर किसी बस्ती से हलके-हलके छनकर आती मुर्गे की बाँग, रात के आखिरी पहर के अहसास के साथ ही मानो की पलकें नींद से भारी होने लगी थीं। सुबह के जरूरी कामों से निबटकर जब सुकिया ने झोंपड़ी में झाँका तो वह हैरान रह गया था। इतनी देर तक मानो कभी नहीं सोती। वह परेशान हो गया था। गहरी नींद में सोई मानो का माथा उसने छूकर देखा, माथा ठंडा था। उसने राहत की साँस ली। मानो को जगाया, कितना दिन चढ़ गया है….उठने का मन नहीं है?  मानो अनमनी-सी उठी। कुछ देर यूँ ही चुपचाप बैठी रही। मानो का इस तरह बैठना सुकिया को अखरने लगा था, आज क्या बात है?…जी तो ठीक है?  मानो अपने खयालों में गुम थी। मन की बात बाहर आने के  लिए छटपटा रही थी। उसने सुकिया की ओर देखते हुए पूछा, क्यों जी…क्या हम इन पक्की ईंटों पर घर नहीं बणा सके हैं?  मानो की बात सुनकर सुकिया आश्चर्य से उसे ताकने लगा। कल की बात वह भूल चुका था। सुकिया ने गहरे अवसाद से भरकर कहा, पक्की ईंटों का घर दो-चार रुपये में ना बणता है।…इत्ते ढेर-से नोट लगे हैं घर बणाने में। गाँठ में नहीं है पैसा, चले हाथी खरीदने। महीनेभर में जो हमने इत्ती ईंटें बणा दी हैं…क्या अपणे लिए हम ईंटें ना बणा सके हैं? मानो ने मासूमियत से कहा। यह भट्टा मालिक का है। हम ईंटें उनके लिए बणाते हैं। हम तो मजदूर हैं। इन ईंटों पर अपणा कोई हक ना है। सुकिया ने अपने मन में उठते दबाव को महसूस किया।

         इन ईंटों पर म्हारा कोई भी हक ना है…क्यूँ… ̧, मानो ने ताज्जुब भरी कड़वाहट से कहा। उसके अंदर बवंडर मचल रहा था। कुछ देर की खामोशी के बाद मानो बोली, हर महीने कुछ और बचत करें…ज्यादा ईंटें बनाएँ…तब?… तब भी अपणा घर नहीं बणा सकते?  अपने भीतर कुलबुलाते सवालों को बाहर लाना चाहती थी मानो। इतनी मजदूरी मिलती कहाँ है? पूरे महीने हाड़-गोड़ तोड़ के भी कितने रुपये बचे! कुल अस्सी। एक साल में एक हजार ईंटों के दाम अगर हमने बचा भी लिए तो घर बणाने लायक रुपया जोड़ते-जोड़ते उम्र निकल जागी। फेर भी घर ना बण पावेगा। सुकिया ने दुखी मन से कहा। अगर हम रात-दिन काम करें तो भी नहीं?  मानो ने उत्साह में भरकर कहा। बावली हो गई है क्या?…चल उठ…चल, काम पे जाणा है। टेम ज्यादा हो रहा है। ठेकेदार आता ही होगा। आज पूरब की टाँग काटनी है लगार के लिए। सुकिया मानो के सवालों से घबरा गया था। उठकर बाहर जाने लगा। कुछ भी करो…तुम चाहो तो मैं रात-दिन काम करूँगी…मुझे एक पक्की ईंटों का घर चाहिए। अपने गाँव में…लाल-सुर्ख ईंटों का घर। ̧ मानो के भीतर मन में हजार-हजार वसंत खिल उठे थे।

         सुकिया और मानो को एक लक्ष्य मिल गया था। पक्की ईंटों का घर बनाना है…अपने ही हाथ की पकी ईंटों से। सुबह होते ही काम पर लग जाते हैं और शाम को भी अँधेरा होने तक जुटे रहते हैं। ठेकेदार असगर से लेकर मालिक तक उनके  काम से खुश थे।

         सूबेसिंह किसनी को शहर भी लेकर जाने लगा था। किसनी के रंग-ढंग में बदलाव आ गया था। अब वह भट्टे पर गारे-मिट्टी का काम नहीं करती थी। महेश रोज रात में शराब पीकर मन की भड़ास निकालता था। दिन में भी अपनी झोंपड़ी में पड़ा रहता था या इधर-उधर बैठा रहता था। किसनी कई-कई दिनों तक शहर से लौटती नहीं थी। जब लौटती थकी, निढाल और मुरझाई हुई। कपड़ों-लत्तों की अब कमी नहीं थी।

         उस रोज सूबेसिंह ने भट्टे पर आते ही असगर ठेकेदार से कहा था, मानो को दफ्तर में बुलाओ, आज किसनी की तबीयत ठीक नहीं है। असगर ठेकेदार ने रोकना चाहा था, छोटे बाबू मानो को… बात पूरी होने से पहले ही सूबेसिंह ने उसे फटकार दिया था, तुमसे जो कहा गया है, वही करो। राय देने की कोशिश मत करो। तुम इस भट्टे पर मुंशी हो। मुंशी ही रहो, मालिक बनने की कोशिश करोगे तो अंजाम बुरा होगा। असगर ठेकेदार की घिघ्घी बँध गई थी। वह चुपचाप मानो को बुलाने चल दिया था।

         असगर ठेकेदार ने आवाज देकर कहा था, मानो, छोटे बाबू बुला रहे हैं दफ्तर में। मानो ने सुकिया की ओर देखा। उसकी आँखों में भय से उत्पन्न कातरता थी। सुकिया भी इस बुलावे पर हड़बड़ा गया था। वह जानता था। मछली को फँसाने के लिए जाल फेंका जा रहा है। गुस्से और आक्रोश से नसें खिंचने लगी थीं। जसदेव ने भी सुकिया की मनःस्थिति को भाँप लिया था। वह फुर्ती से उठा। हाथ-पाँव पर लगी गीली मिट्टी छुड़ाते हुए बोला, तुम यहीं ठहरो…मैं देखता हूँ। चलो चाचा। असगर के पीछे-पीछे चल दिया। असगर ठेकेदार जानता था कि सूबेसिंह शैतान है। लेकिन चुप रहना उसकी मजबूरी बन गई थी। ज़िंदगी का खास हिस्सा उसने भट्टे पर गुजारा था। भट्टे से अलग उसका कोई वजूद ही नहीं था।

         असगर ठेकेदार के साथ जसदेव को आता देखकर सूबेसिंह बिफर पड़ा था। तुझे किसने बुलाया है? जी…जो भी काम हो बताइए…मैं कर दूँगा।…  जसदेव ने विनम्रता से कहा।

क्यों? तू उसका खसम है…या उसकी …पर चर्बी चढ़ गई है? सूबेसिंह ने अपशब्दों का इस्तेमाल किया।

बाबू जी…आप किस तरह बोल रहे हैं… , जसदेव के बात पूरी करने से पहले ही एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके गाल पर पड़ा। साले…भट्टे की आग में झोंक दूँगा…किसी को पता भी नहीं चलेगा। हड्डियाँ तक नहीं मिलेंगी राख से… समझा। सूबेसिंह ने उसे धकिया दिया। जसदेव गिर पड़ा था। जब तक वह सँभल पाता। लात-घूंसों से सूबेसिंह ने उसे अधमरा कर दिया था। चीख-पुकार सुनकर मजदूर उनकी ओर दौड़ पड़े थे। मजदूरों को एक साथ आता देखकर सूबेसिंह जीप में बैठ गया था। देखते-ही-देखते जीप शहर की ओर दौड़ गई थी। असगर ठेकेदार दफ्तर में जा घुसा था।

      सुकिया और मानो जसदेव को उठाकर झोंपड़ी में ले गए थे। वह दर्द से कराह रहा था। मानो ने उसकी चोटों पर हल्दी लगा दी थी। सुकिया गुस्से में काँप रहा था। मानो के अवचेतन में असंख्य अँधेरे नाच रहे थे। वह किसनी नहीं बनना चाहती थी। इज्जत की ज़िंदगी जीने की अदम्य लालसा उसमें भरी हुई थी। उसे एक घर चाहिए था।  पक्की ईंटों का, जहाँ वह अपनी गृहस्थी और परिवार के  सपने देखती थी।

      समूचा दिन अदृश्य भय और दहशत में बीता था। जसदेव को हलका बुखार हो गया था। वह अपनी झोंपड़ी में पड़ा था। सुकिया उसके पास बैठा था। आज की घटना से मजदूर डर गए थे। उन्हें लग रहा था कि सूबेसिंह किसी भी वक्त लौटकर आ सकता है। शाम होते ही भट्टे पर सन्नाटा छा गया था। सब अपने-अपने खोल में सिमट गए थे। बूढ़ा बिलसिया जो अकसर बाहर पेड़ के नीचे देर रात तक बैठा रहता था, आज शाम होते ही अपनी झोंपड़ी में जाकर लेट गया था। उसके खाँसने की आवाज भी आज कुछ धीमी हो गई थी। किसनी की झोंपड़ी से ट्रांजिस्टर की आवाज भी नहीं आ रही थी। बीच-बीच में हैंडपंप की खंच-खंच ध्वनि इस खामोशी में विघ्न डाल रही थी। पंप जसदेव की झोंपड़ी के ठीक सामने था। सभी को पानी के लिए इस पंप पर आना पड़ता था। भट्टे पर दवा-दारू का कोई इंतजाम नहीं था। कटने-फटने पर घाव पर मिट्टी लगा देना था। कपड़ा जलाकर राख भर देना ही दवाई की जगह काम आते थे।

     मानो ने अधूरे मन से चूल्हा जलाया था। रोटियाँ सेंककर सुकिया के सामने रख दी थी। सुकिया ने भी अनिच्छा से एक रोटी हलक के  नीचे उतारी थी। उसकी भूख जैसे अचानक मर गई थी। मानो को लेकर उसकी चिंता बढ़ गई थी। उसने निश्चय कर लिया था वह मानो को किसनी नहीं बनने देगा। मानो भी गुमसुम अपने आपसे ही लड़ रही थी। बार-बार उसे लग रहा था कि वह सुरक्षित नहीं है। एक सवाल उसे खाए जा रहा थाμ क्या औरत होने की यही सजा है। वह जानती थी कि सुकिया ऐसा-वैसा कुछ नहीं होने देगा। वह महेश की तरह नहीं है। भले ही यह भट्टा छोड़ना पड़े। भट्टा छोड़ने के  खयाल से ही वह सिहर उठी। नहीं…भट्टा नहीं छोड़ना है। उसने अपने आपको आश्वस्त किया, अभी तो पक्की ईंटों का घर बनाना है।

     मानो रोटियाँ लेकर बाहर जाने लगी तो सुकिया ने टोका, ‘कहाँ जा रही है?’  ‘जसदेव भूखा-प्यासा पड़ा है। उसे रोट्टी देणे जा रही हूँ।‘ मानो ने सहज भाव से कहा।

‘बामन तेरे हाथ की रोट्टी खावेगा।…अक्ल मारी गई तेरी’ ̧ सुकिया ने उसे रोकना चाहा।

‘क्यों मेरे हाथ की रोट्टी  में जहर लगा है?’ ̧ मानो ने सवाल किया। पल-भर रुककर बोली, बामन नहीं भट्टा मजदूर है वह…म्हारे जैसा। ̧

चारों तरफ सन्नाटा था। जसदेव की झोंपड़ी में ढिबरी जल रही थी। मानो ने झोंपड़ी का दरवाजा ठेला ‘जी कैसा है?’ ̧ भीतर जाते हुए मानो ने पूछा। जसदेव ने उठने की कोशिश की। उसके  मुँह से दर्द की आह निकली।

‘कमबख्त कीड़े पड़ के मरेगा। हाथ-पाँव टूट-टूटकर गिरेंगे…आदमी नहीं जंगली जिनावर है।‘ मानो ने सूबेसिंह को कोसते हुए कहा।

जसदेव चुपचाप उसे देख रहा था।

‘यह ले…रोट्टी  खा ले। सुबे से भूखा है। दो कौर पेट में जाएँगे तो ताकत तो आवेगी बदन में’, मानो ने रोटी और गुड़ उसके  आगे रख दिया था। जसदेव कुछ अनमना-सा हो गया था। भूख तो उसे लगी थी। लेकिन मन के  भीतर कहीं हिचक थी। घर-परिवार से बाहर निकले ज्यादा समय नहीं हुआ था। खुद वह कुछ भी बना नहीं पाया था। शरीर का पोर-पोर टूट रहा था।

‘भूख नहीं है।‘ जसदेव ने बहाना किया।

‘भूख नहीं है या कोई और बात है’… ̧ मानो ने जैसे उसे रंगे हाथों पकड़ लिया था।

‘और क्या बात हो सकती है?’ जसदेव ने सवाल किया।

‘तुम्हारे भइया कह रहे थे कि तुम बामन हो…इसीलिए मेरे हाथ की रोटी नहीं खाओगे। अगर यो बात है तो मैं जोर ना डालूँगी…थारी मर्जी…औरत हूँ…पास में कोई भूखा हो…तो रोटी का कौर गले से नीचे नहीं उतरता है।…फिर तुम तो दिन-रात साथ काम करते हो…, मेरी खातिर पिटे…फिर यह बामन म्हारे बीच कहाँ से आ गया…?’ मानो रुआँसी हो गई थी। उसका गला रुँध गया था। रोटी लेकर वापस लौटने के लिए मुड़ी। जसदेव में साहस नहीं था उसे रोक लेने के  लिए। उनके  बीच जुड़े तमाम सूत्र जैसे अचानक बिखर गए थे।

       अपनी झोंपड़ी में आकर चुपचाप लेट गई थी मानो। बिना कुछ खाए। दिन-भर की घटनाएँ उसके दिमाग में खलबली मचा रही थीं। जसदेव भूखा है, यह अहसास उसे परेशान कर रहा था। जसदेव को लेकर उसके मन में हलचल थी। उसे लग रहा था जैसे जसदेव का साथ उन्हें ताकत दे रहा है। ऐसी ताकत जो सूबेसिंह से लड़ने में हौसला दे सकती है। दो से तीन होने का सुख मानो महसूस करने लगी थी। सुकिया भी चुपचाप लेटा हुआ था। उसकी भी नींद उड़ चुकी थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था, क्या करे, इन्हीं हालात में गाँव छोड़ा था। वे ही फिर सामने खड़े थे। आखिर जाएँ तो कहाँ? सूबेसिंह से पार पाना आसान नहीं था। सुनसान जगह है कभी भी हमला कर सकता है। या फिर मानो को…विचार आते ही वह काँप गया था। उसने करवट बदली। मानो जाग रही थी। उसे अपनी ओर खींचकर सीने से चिपटा लिया था।

       जसदेव ने भी पूरी रात जागकर काटी थी। सूबेसिंह का गुस्सैल चेहरा बार-बार सामने आकर दहशत पैदा कर रहा था। उसे लगने लगा था कि जैसे वह अचानक किसी षड्यंत्र में फँस गया है। उसे यह अंदाजा नहीं था कि सूबेसिंह मारपीट करेगा। ऐसी कल्पना भी उसे नहीं थी। वह डर गया था। उसने तय कर लिया था, कि चाहे जो हो, वह इस पचड़े में नहीं पड़ेगा। सुबह होते ही वह असगर ठेकेदार से मिला था। असगर ही उसे शहर से अपने साथ लाया था। जसदेव ने असगर ठेकेदार से अपने मन की बात कही। ठेकेदार ने उसे समझाते हुए कहा था, ‘अपने काम से काम रखो। क्यों इन चमारों* के चक्कर में पड़ते हो।‘

       जसदेव के बदले हुए व्यवहार को मानो ने ताड़ लिया था। लेकिन उसने कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की थी। वह सहजता से अपने काम में लगी थी। वह जानती थी कि उनके बीच एक फासला आ गया है। लेकिन वह चुप थी। सूबेसिंह को भी लगने लगा था कि मानो को फुसलाना आसान नहीं है। उसकी तमाम कोशिश निरर्थक साबित हुई थी। इसीलिए वह मानो और सुकिया को परेशान करने पर उतर आया था। उसने असगर ठेकेदार से भी कह दिया था कि उससे पूछे बगैर उन्हें मजदूरी का भुगतान न करे, न कोई रियायत ही बरते उनके साथ।

       मानो से कुछ छुपा नहीं था। सूबेसिंह की हरकतों पर उसकी नजर थी। उसने अपने आप में निश्चय कर लिया था कि वह उसका मुकाबला करेगी। उठते-बैठते उसके मन में एक ही खयाल था। पक्की ईंटों का घर बनवाना है। लेकिन सूबेसिंह इस खयाल में बाधक बन रहा था। सुकिया और मानो दिन-रात काम में जुटे थे। फिर भी हर महीने वे ज्यादा कुछ बचा नहीं पा रहे थे। पिछले दिनों उन्होंने दुगुनी ईंटें पाथी थीं। उनके उत्साह में कोई कमी नहीं थी। एक ही उद्देश्य था- पक्की ईंटों का घर बनाना है। इसीलिए सूबेसिंह की ज्यादतियों को वे सहन कर रहे थे। लेकिन एक तड़प थी दोनों में, जो उन्हें सँभाले हुए थी।

        सूबेसिंह नित नए बहाने ढूँढ़ लेता था, उन्हें तंग करने के, एक शीत युद्ध जारी था उनके बीच, सुकिया से ईंट पाथने का साँचा वापस ले लिया गया था। उसे भट्टे की मोरी का काम दे दिया था। मोरी का काम खतरनाक था। मानो डर गई थी। लेकिन सुकिया ने उसे हिम्मत बँधाई थी, ‘काम से क्यूँ डरना…।‘ सुकिया का साँचा जसदेव को दे दिया गया था। साँचा मिलते ही जसदेव के रंग बदल गए थे। वह मानो पर हुक्म चलाने लगा था। मानो चुपचाप काम में लगी रहती थी।

‘कल तड़के ईंट पाथनी है। ईंटें हटाकर जगह बना दे।‘ जसदेव आदेश देकर अपनी झोंपड़ी की ओर चला गया था। मानो ने पाथी ईंटों को दीवार की शक्ल में लगा दिया था। कच्ची ईंटों को सुखाने के लिए दो, खड़ी दो आड़ी ईंटें रखकर जालीदार दीवार बना दी थी। ईंट पाथने की जगह खाली करके ही मानो लौटकर झोंपड़ी में गई थी। हैंडपंप पर भीड़ थी। सभी मजदूर काम खत्म करके हाथ-मुँह धोने के लिए आ गए थे।

     सुबह होने से पहले ही मानो उठ गई थी। उसे काम पर जाने की जल्दी थी। चारों तरफ अँधेरा था। सुबह होने का वह इंतजार करना नहीं चाहती थी। उसने जल्दी-जल्दी सुबह के काम निबटाए और ईंट पाथने के लिए निकल पड़ी थी। सूरज निकलने में अभी देर थी। जसदेव से पहले ही वह काम पर पहुँच जाती थी। इक्का-दुक्का मजदूर ही इधर-उधर दिखाई पड़ रहे थे। वह तेज कदमों से ईंट पाथने की जगह पर पहुँच गई थी। वहाँ का दृश्य देखकर अवाक रह गई थी। सारी ईंटें टूटी-फूटी पड़ी थीं। जैसे किसी ने उन्हें बेदर्दी से रौंद डाला था। ईंटों की दयनीय अवस्था देखकर उसकी चीख निकल गई थी। वह दहाड़ें मार-मारकर रोने लगी थी। आवाज सुनकर मजदूर इकट्ठा हो गए थे। जितने मुँह उतनी बातें, सब अपनी-अपनी अटकलें लगा रहे थे। रात में आँधी-तूफान भी नहीं आया था। न ही किसी जंगली जानवर का ही यह काम हो सकता है। कई लोगों का कहना था, किसी ने जान-बूझकर ईंटें तोड़ी हैं।

     मानो का हृदय फटा जा रहा था। टूटी-फूटी ईंटों को देखकर वह बौरा गई थी। जैसे किसी ने उसके पक्की ईंटों के मकान को ही धराशाई कर दिया था। जसदेव काफी देर बाद आया था। वह निरपेक्ष भाव से चुपचाप खड़ा था। जैसे इन टूटी-फूटी ईंटों से उसका कुछ लेना-देना ही न हो। सुकिया भी हो-हल्ला सुनकर मोरी का काम छोड़कर आया था। ईंटों की हालत देखकर उसका भी दिल बैठने लगा था। उसकी जैसे हिम्मत टूट गई थी। वह फटी-फटी आँखों से ईंटों को देख रहा था। सुकिया को देखते ही मानो और जोर-जोर से रोने लगी थी। सुकिया ने मानो की आँखों से बहते तेज  अँधड़ों को देखा और उनकी किरकिराहट अपने अंतर्मन में महसूस की। सपनों के टूट जाने की आवाज उसके कानों को फाड़ रही थी।

     असगर ठेकेदार ने साफ कह दिया था। टूटी-फूटी ईंटें हमारे किस काम की? इनकी मजदूरी हम नहीं देंगे। असगर ठेकेदार ने उनकी रही-सही उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया था। मानो ने सुकिया की ओर डबडबाई आँखों से देखा। सुकिया के चेहरे पर तूफान में घर टूट जाने की पीड़ा छलछला आई थी। उसे लगने लगा था, जैसे तमाम लोग उसके  खिलाफ हैं। तरह-तरह की बाधाएँ उसके सामने खड़ी की जा रही हैं। वहाँ रुकना उसके लिए कठिन हो गया था। उसने मानो का हाथ पकड़ा, ‘चल! ये लोग म्हारा घर ना बणने देंगे।‘ पक्की ईंटों के मकान का सपना उनकी पकड़ से फिसलकर और दूर चला गया था।

    भट्टे से उठते काले धुएँ ने आकाश तले एक काली चादर फैला दी थी। सब कुछ छोड़कर मानो और सुकिया चल पड़े थे। एक खानाबदोश की तरह, जिन्हें एक घर चाहिए था, रहने के लिए। पीछे छूट गए थे कुछ बेतरतीब पल, पसीने के  अक्स जो कभी इतिहास नहीं बन सकेंगे। खानाबदोश ज़िंदगी का एक पड़ाव था यह भट्टा।

    सुकिया के पीछे-पीछे चल पड़ने से पहले मानो ने जसदेव की ओर देखा था। मानो को यकीन था, जसदेव उनका साथ देगा। लेकिन जसदेव को चुप देखकर उसका विश्वास टुकड़े-टुकड़े हो गया था। मानो के सीने में एक टीस उभरी थी। सर्द साँस में बदलकर मानो को छलनी कर गई थी। उसके होंठ फड़फड़ाए थे कुछ कहने के लिए लेकिन शब्द घुटकर रह गए थे। सपनों के काँच उसकी आँख में किरकिरा रहे थे। वह भारी मन से सुकिया के पीछे-पीछे चल पड़ी थी, अगले पड़ाव की तलाश में, एक दिशाहीन यात्रा पर।

* ‘ऐसे शब्दों का प्रयोग असंवैधानिक है। समाज के  यथार्थ प्रतिबिंबन के लिए लेखक कई बार ऐसे शब्दों का प्रयोग साहित्य में करते रहे हैं,  किन्तु इसे व्यवहार में नहीं लाया जाना चाहिए।‘

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दादी अम्माँ-कृष्णा सोबती की कहानी

अनुमानित समय : 17 मिनट-

बहार फिर आ गई। वसन्त की हल्की हवाएँ पतझर के फीके ओठों को चुपके से चूम गईं। जाड़े ने सिकुड़े-सिकुड़े पंख फड़फड़ाए और सर्दी दूर हो गई। आँगन में पीपल के पेड़ पर नए पात खिल-खिल आए। परिवार के हँसी-खुशी में तैरते दिन-रात मुस्कुरा उठे। भरा-भराया घर। सँभली-सँवरी-सी सुन्दर सलोनी बहुएँ। चंचलता से खिलखिलाती बेटियाँ। मजबूत बाँहोंवाले युवा बेटे। घर की मालकिन मेहराँ अपने हरे-भरे परिवार को देखती है और सुख में भीग जाती हैं यह पाँचों बच्चे उसकी उमर-भर की कमाई हैं। उसे वे दिन नहीं भूलते जब ब्याह के बाद छह वर्षों तक उसकी गोद नहीं भरी थी। उठते-बैठते सास की गंभीर कठोर दृष्टि उसकी समूची देह को टटोल जाती। रात को तकिए पर सिर डाले-डाले वह सोचती कि पति के प्यार की छाया में लिपटे-लिपटे भी उसमें कुछ व्यर्थ हो गया है, असमर्थ हो गया है। कभी सकुचाती-सी ससुर के पास से निकलती तो लगता कि इस घर की देहरी पर पहली बार पाँव रखने पर जो आशीष उसे मिली थी, वह उसे सार्थक नहीं कर पाई। वह ससुर के चरणों में झुकी थी और उन्होंने सिर पर हाथ रखकर कहा था, “बहूरानी, फूलो-फलो।” कभी दर्पण के सामने खड़ी-खड़ी वह बाँहें फैलाकर देखती-क्या इन बाँहों में अपने उपजे किसी नन्हे-मुन्ने को भर लेने की क्षमता नहीं!

छह वर्षों की लम्बी प्रतीक्षा के बाद सर्दियों की एक लम्बी रात में करवट बदलते-बदलते मेहराँ को पहली बार लगा था कि जैसे नर्म-नर्म लिहाफ़ में वह सिकुड़ी पड़ी है, वैसे ही उसमें, उसके तन-मन-प्राण के नीचे गहरे कोई धड़कन उससे लिपटी आ रही है। उसने अँधियारे में एक बार सोए हुए पति की ओर देखा था और अपने से लजाकर अपने हाथों से आँखें ढाँप ली थीं। बन्द पलकों के अन्दर से दो चमकती आँखें थीं, दो नन्हें-नन्हे हाथ थे, दो पाँव थे। सुबह उठकर किसी मीठी शिथिलता में घिरे-घिरे अँगड़ाई ली थी। आज उसका मन भरा है। मन भरा है। सास ने भाँपकर प्यार बरसाया थाः

“बहू, अपने को थकाओ मत, जो सहज-सहज कर सको, करो। बाकी मैं सँभाल लूँगी।”

वह कृतज्ञता से मुस्कुरा दी थी। काम पर जाते पति को देखकर मन में आया था कि कहे- ‘अब तुम मुझसे अलग बाहर ही नहीं, मेरे अंदर भी हो।’

दिन में सास आ बैठी; माथा सहलाते-सहलाते बोली, “बहूरानी, भगवान मेरे बच्चे को तुम-सा रूप दे और मेरे बेटे-सा जिगरा।”

बहू की पलकें झुक आईं।

“बेटी, उस मालिक का नाम लो, जिसने बीज डाला है। वह फल भी देगा।”

मेहराँ को माँ का घर याद हो आया। पास-पड़ोस की स्त्रियों के बीच माँ भाभी का हाथ आगे कर कह रही है, “बाबा, यह बताओ, मेरी बहू के भाग्य में कितने फल हैं?”

पास खड़ी मेहराँ समझ नहीं पाई थी। हाथ में फल?

“माँ, हाथ में फल कब होते हैं? फल किसे कहती हो माँ?”

माँ लड़की की बात सुनकर पहले हँसी, फिर गुस्सा होकर बोली, “दूर हो मेहराँ, जा, बच्चों के संग खेल!”

उस दिन मेहराँ का छोटा सा मन यह समझ नहीं पाया था, पर आज तो सास की बात वह समझ ही नहीं, बूझ भी रही थी। बहू के हाथ में फल होते हैं, बहू के भाग्य में फल होते हैं और परिवार की बेल बढ़ती है। मेहराँ की गोद से इस परिवार की बेल बढ़ी है। आज घर में तीन बेटे हैं, उनकी बहुएँ हैं। ब्याह देने योग्य दो बेटियाँ हैं। हल्के-हल्के कपड़ों में लिपटी उसकी बहुएँ जब उसके सामने झुकती हैं तो क्षण-भर के लिए मेहराँ के मस्तक पर घर की स्वामिनी होने का अभिमान उभर आता है। वह बैठे-बैठे उन्हें आशीष देती है और मुस्कुराती है। ऐसे ही, बिल्कुल ऐसे ही वह भी कभी सास के सामने झुकती थी। आज तो वह तीखी , निगाहवाली मालकिन, बच्चों की दादी अम्माँ बनकर रह गई है। पिछवाड़े के कमरे में से जब दादा के साथ बोलती हुई अम्मा की आवाज़ आती है तो पोते क्षण-भर ठिठककर अनसुनी कर देते हैं। बहुएँ एक-दूसरे को देखकर मन-ही-मन हँसती हैं। लाड़ली बेटियाँ सिर हिला-हिलाकर खिलखिलाती हुई कहती हैं, “दादी अम्माँ बूढ़ी हो आई, पर दादा से झगड़ना नहीं छोड़ा।”

मेहराँ भी कभी-कभी पति के निकट खड़ी हो कह देती है, “अम्मा नाहक बापू के पीछे पड़ी रहती हैं। बहू-बेटियोंवाला घर है, क्या यह अच्छा लगता है?”

पति एक बार पढ़ते-पढ़ते आँखें ऊपर उठाते हैं। पल-भर पत्नी की ओर देख दोबारा पन्ने पर दृष्टि गड़ा देते हैं। माँ की बात पर पति की मौन-गंभीर मुद्रा मेहराँ को नहीं भाती। लेकिन प्रयत्न करने पर भी वह कभी पति को कुछ कह देने तक खींच नहीं पाई। पत्नी पर एक उड़ती निगाह, और बस। किसी को आज्ञा देती मेहराँ की आवाज़ सुनकर कभी उन्हें भ्रम हो आता है। वह मेहराँ का नहीं अम्मा का ही रोबीला स्वर है। उनके होश में अम्मा ने कभी ढीलापन जाना ही नहीं। याद नहीं आता कि कभी माँ के कहने को वह जाने-अनजाने टाल सके हों। और अब जब माँ की बात पर बेटियों को हँसते सुनते हैं तो विश्वास नहीं आता। क्या सचमुच माँ आज ऐसी बातें किया करती हैं कि जिन पर बच्चे हँस सकें।

और अम्मा तो सचमुच उठते-बैठते बोलती है, झगड़ती है, झुकी कमर पर हाथ रखकर वह चारपाई से उठकर बाहर आती है तो जो सामने हो उस पर बरसने लगती है।

बड़ा पोता काम पर जा रहा है। दादी अम्माँ पास आ खड़ी हुई। एक बार ऊपर-तले देखा और बोली, “काम पर जा रहे हो बेटे, कभी दादा की ओर भी देख लिया करो, कब से उनका जी अच्छा नहीं। जिसके घर में भगवान के दिए बेटे-पोते हों, वह इस तरह बिना दवा-दारू पड़े रहते हैं।”

बेटा दादी अम्माँ की नज़र बचाता है। दादा की ख़बर क्या घर-भर में उसे ही रखनी है! छोड़ो, कुछ-न-कुछ कहती ही जाएँगी अम्मा, मुझे देर हो रही है। लेकिन दादी अम्माँ जैसे राह रोक लेती है, “अरे बेटा, कुछ तो लिहाज करो,बहू-बेटे वाले हुए, मेरी बात तुम्हें अच्छी नहीं लगती!”

मेहराँ मँझली बहू से कुछ कहने जा रही थी, लौटती हुई बोली, “अम्मा कुछ तो सोचो, लड़का बहू-बेटोंवाला है। तो क्या उस पर तुम इस तरह बरसती रहोगी?”

दादी अम्माँ ने अपनी पुरानी निगाह से मेहराँ को देखा और जलकर कहा, “क्यों नहीं बहू, अब तो बेटों को कुछ कहने के लिए तुमसे पूछना होगा! यह बेटे तुम्हारे हैं, घर-बार तुम्हारा है, हुक्म हासिल तुम्हारा है।”

मेहराँ पर इस सबका कोई असर नहीं हुआ। सास को वहीं खड़ा छोड़ वह बहू के पास चली गई। दादी अम्माँ ने अपनी पुरानी आँखों से बहू की वह रोबीली चाल देखी और ऊँचे स्वर में बोली, “बहूरानी, इस घर में अब मेरा इतना-सा मान रह गया है! तुम्हें इतना घमंड…!”

मेहराँ को सास के पास लौटने की इच्छा नहीं थी, पर घमंड की बात सुनकर लौट आई।

“मान की बात करती हो अम्मा? तो आए दिन छोटी-छोटी बात लेकर जलने-कलपने से किसी का मान नहीं रहता।”

इस उलटी आवाज़ ने दादी अम्माँ को और जला दिया। हाथ हिला-हिलाकर क्रोध में रुक-रुककर बोली, “बहू, यह सब तुम्हारे अपने सामने आएगा! तुमने जो मेरा जीना दूभर कर दिया है, तुम्हारी तीनों बहुएँ भी तुम्हें इसी तरह समझेंगी। क्यों नहीं, जरूर समझेंगी।”

कहती-कहती दादी अम्माँ झुकी कमर से पग उठाती अपने कमरे की ओर चल दी। राह में बेटे के कमरे का द्वार खुला देखा तो बोली, “जिस बेटे को मैंने अपना दूध पिलाकर पाला, आज उसे देखे मुझे महीनों बीत जाते हैं, उससे इतना नहीं हो पाता कि बूढ़ी अम्मा की सुधि ले।”

मेहराँ मँझली बहू को घर के काम-धन्धे के लिए आदेश दे रही थी। पर कान इधर ही थे। ‘बहुएँ उसे भी समझेंगी’ इस अभिशाप को वह कड़वा घूँट समझकर पी गई थी, पर पति के लिए सास का यह उलाहना सुनकर न रहा गया। दूर से ही बोली, “अम्मा, मेरी बात छोड़ो, पराए घर की हूँ, पर जिस बेटे को घर-भर में सबसे अधिक तुम्हारा ध्यान है, उसके लिए यह कहते तुम्हें झिझक नहीं आती? फिर कौन माँ है, जो बच्चों को पालती-पोसती नहीं!”

अम्मा ने अपनी झुर्रियों-पड़ी गर्दन पीछे की। माथे पर पड़े तेवरों में इस बार क्रोध नहीं भर्त्सना थी। चेहरे पर वही पुरानी उपेक्षा लौट आई, “बहू, किससे क्या कहा जाता है, यह तुम बड़े समधियों से माथा लगा सब कुछ भूल गई हो। माँ अपने बेटे से क्या कहे, यह भी क्या अब मुझे बेटे की बहू से ही सीखना पड़ेगा? सच कहती हो बहू, सभी माएँ बच्चों को पालती हैं। मैंने कोई अनोखा बेटा नहीं पाला था, बहू! फिर तुम्हें तो मैं पराई बेटी करके ही मानती रही हूँ। तुमने बच्चे आप जने, आप ही वे दिन काटे, आप ही बीमारियाँ झेलीं!”

मेहराँ ने खड़े-खड़े चाहा कि सास यह कुछ कहकर और कहतीं। वह इतनी दूर नहीं उतरी कि इन बातों का जवाब दे। चुपचाप पति के कमरे में जाकर इधर-उधर बिखरे कपड़े सहेजने लगी। दादी अम्माँ कड़वे मन से अपनी चारपाई पर जा पड़ी। बुढ़ापे की उम्र भी कैसी होती है! जीते-जी मन से संग टूट जाता है। कोई पूछता नहीं, जानता नहीं।

घर के पिछवाड़े जिसे वह अपनी चलती उम्र में कोठरी कहा करती थी, उसी में आज वह अपने पति के साथ रहती है। एक कोने में उसकी चारपाई और दूसरे कोने में पति की, जिसके साथ उसने अनगिनत बहारें और पतझर गुज़ार दिए हैं। कभी घंटों वे चुपचाप अपनी-अपनी जगह पर पड़े रहते हैं। दादी अम्माँ बीच-बीच में करवट बदलते हुए लम्बी साँस लेती है। कभी पतली नींद में पड़ी-पड़ी वर्षों पहले की कोई भूली-बिसरी बात करती है, पर बच्चों के दादा उसे सुनते नहीं। दूर कमरों में बहुओं की मीठी दबी-दबी हँसी वैसे ही चलती रहती है। बेटियाँ खुले-खुले खिलखिलाती हैं। बेटों के कदमों की भारी आवाज़ कमरे तक आकर रह जाती है और दादी अम्माँ और पास पड़े दादा में जैसे बीत गए वर्षों की दूरी झूलती रहती है।

आज दादा जब घंटों धूप में बैठकर अंदर आए तो अम्मा लेटी नहीं, चारपाई की बाँह पर बैठी थी। गाढ़े की धोती से पूरा तन नहीं ढका था। पल्ला कंधे से गिरकर एक ओर पड़ा था। वक्ष खुला था। आज वक्ष में ढकने को रह भी क्या गया था? गले और गर्दन की झुर्रियाँ एक जगह आकर इकट्ठी हो गई थीं। पुरानी छाती पर कई तिल चमक रहे थे। सिर के बाल उदासीनता से माथे के ऊपर सटे थे।

दादा ने देखकर भी नहीं देखा। अपने-सा पुराना कोट उतारकर खूँटी पर लटकाया और चारपाई पर लेट गए। दादी अम्माँ देर तक बिना हिले-डुले वैसी-की-वैसी बैठी रही। सीढ़ियों पर छोटे बेटे के पाँवों के उतावली-सी आहट हुई। उमंग की छोटी सी गुनगुनाहट द्वार तक आकर लौट गई। ब्याह के बाद के वे दिन, मीठे मधुर दिन। पाँव बार-बार घर की ओर लौटते हैं। प्यार-सी बहू आँखों में प्यार भर-भरकर देखती है, लजाती है, सकुचाती है और पति की बाँहों में लिपट जाती है। अभी कुछ महीने हुए, यही छोटा बेटा माथे पर फूलों का सेहरा लगाकर ब्याहने गया था। बाजे-गाजे के साथ जब लौटा तो संग में दुलहिन थी।

सबके साथ दादी अम्माँ ने भी पतोहू का माथा चूमकर उसे हाथ का कंगन दिया था। पतोहू ने झुककर दादी अम्माँ के पाँव छुए थे और अम्मा लेन-देन पर मेहराँ से लड़ाई -झगड़े की बात भूलकर कई क्षण दुलहिन के मुखड़े की ओर देखती रही थी। छोटी बेटी ने चंचलता से परिहास कर कहा था, “दादी अम्माँ, सच कहो भैया की दुलहिन तुम्हें पसंद आई? क्या तुम्हारे दिनों में भी शादी-ब्याह में ऐसे ही कपड़े पहने जाते थे?”

कहकर छोटी बेटी ने दादी के उत्तर की प्रतीक्षा नहीं की। हँसी-हँसी में किसी और से उलझ पड़ी।

मेहराँ बहू-बेटे को घेरकर अंदर ले चली। दादी अम्माँ भटकी-भटकी दृष्टि से वे अनगिनत चेहरे देखती रही। कोई पास-पड़ोसिन उसे बधाई दे रही थी, “बधाई हो अम्मा, सोने-सी बहू आई है शुक्र है उस मालिक का, तुमने अपने हाथों छोटे पोते का भी काज सँवारा।”

अम्मा ने सिर हिलाया। सचमुच आज उस-जैसा कौन है! पोतों की उसे हौंस थी, आज पूरी हुई। पर काज सँवारने में उसने क्या किया, किसी ने कुछ पूछा नहीं तो करती क्या? समधियों से बातचीत, लेन-देन, दुलहिन के कपड़े-गहने, यह सब मेहराँ के अभ्यस्त हाथों से होता रहा है। घर में पहले दो ब्याह हो जाने पर अम्मा से सलाह-सम्मति करना भी आवश्यक नहीं रह गया। केवल कभी-कभी कोई नया गहना गढ़वाने पर या नया जोड़ा बनवाने पर मेहराँ उसे सास को दिखा देती रही है।

बड़ी बेटी देखकर कहती है, “माँ! अम्मा को दिखाने जाती हो, वह तो कहेंगी, ‘यह गले का गहना हाथ लगाते उड़ता है। कोई भारी ठोस कंठा बनवाओ, सिर की सिंगार-पट्टी बनवाओ। मेरे अपने ब्याह में मायके से पचास तोले का रानीहार चढ़ा था। तुम्हें याद नहीं, तुम्हारे ससुर को कहकर उसी के भारी जड़ाऊ कंगन बनवाए थे तुम्हारे ब्याह में!'”

मेहराँ बेटी की ओर लाड़ से देखती है। लड़की झूठ नहीं कहती। बड़े बेटों की सगाई में, ब्याह में, अम्मा बीसियों बार यह दोहरा चुकी हैं। अम्मा को कौन समझाए कि ये पुरानी बातें पुराने दिनों के साथ गईं!

अम्मा नाते-रिश्तों की भीड़ में बैठी-बैठी ऊँघती रही। एकाएक आँख खुली तो नीचे लटकते पल्ले से सिर ढक लिया। एक बेख़बरी कि उघाड़े सिर बैठी रही। पर दादी अम्माँ को इस तरह अपने को सँभालते किसी ने देखा तक नहीं। अम्मा की ओर देखने की सुधि भी किसे है?

बहू को नया जोड़ा पहनाया जा रहा है। रोशनी में दुलहिन शरमा रही है। ननदें हास-परिहास कर रही हैं। मेहराँ घर में तीसरी बहू को देखकर मन-ही-मन सोच रही है कि बस, अब दोनों बेटियों को ठिकाने लगा दे तो सुर्खरू हो।

बहू का शृंगार देख दादी अम्माँ बीच-बीच में कुछ कहती है, “लड़कियों में यह कैसा चलन है आजकल? बहू के हाथों और पैरों में मेहँदी नहीं रचाई। यही तो पहला सगुन है।”

दादी अम्माँ की इस बात को जैसे किसी ने सुना नहीं। साज-शृंगार में चमकती बहू को घेरकर मेहराँ दूल्हे के कमरे की ओर ले चली। नाते-रिश्ते की युवतियाँ मुस्कुरा-मुस्कुराकर शरमाने लगीं, दूल्हे के मित्र-भाई आँखों में नहीं, बाँहों में नए-नए चित्र भरने लगे और मेहराँ बहू पर आशीर्वाद बरसाकर लौटी तो देहरी के संग लगी दादी अम्माँ को देखकर स्नेह जताकर बोली, “आओ अम्मा, शुक्र है भगवान का, आज ऐसी मीठी घड़ी आई।”

अम्मा सिर हिलाती-हिलाती मेहराँ के साथ हो ली, पर आँखें जैसे वर्षों पीछे घूम गईं। ऐसे ही एक दिन वह मेहराँ को अपने बेटे के पास छोड़ आई थी। वह अंदर जाती थी, बाहर आती थी। वह इस घर की मालकिन थी। पीछे, और पीछे – बाजे-गाजे के साथ उसका अपना डोला इस घर के सामने आ खड़ा हुआ। गहनों की छनकार करती वह नीचे उतरी। घूँघट की ओट से मुस्कुराती, नीचे झुकती और पति की बूढ़ी फूफी से आशीर्वाद पाती।

दादी अम्माँ को ऊँघते देख बड़ी बेटी हिलाकर कहने लगी, “उठो अम्मा,जाकर सो रहो, यहाँ तो अभी देर तक हँसी-ठट्ठा होता रहेगा।”

दादी अम्माँ झँपी-झँपी आँखों से पोती की ओर देखती है और झुकी कमर पर हाथ रखकर अपने कमरे की ओर लौट जाती है।

उस दिन अपनी चारपाई पर लेटकर दादी अम्माँ सोई नहीं। आँखों में न ऊँघ थी, न नींद। एक दिन वह भी दुलहिन बनी थी। बूढ़ी फूफी ने सजाकर उसे भी पति के पास भेजा था। तब क्या उसने यह कोठरी देखी थी? ब्याह के बाद वर्षों तक उसने जैसे यह जाना ही नहीं कि फूफी दिन-भर काम करने के बाद रात को यहाँ सोती है। आँखें मुँद जाने से पहले जब फूफी बीमार हुई तो दादी अम्माँ ने कुलीन बहू की तरह उसकी सेवा करते-करते पहली बार यह जाना था कि घर में इतने कमरे होते हुए भी फूफी इस पिछवाड़े में अपने अन्तिम दिन-बरस काट गई है। पर यह देखकर, जानकर उसे आश्चर्य नहीं हुआ था।

घर के पिछवाड़े में पड़ी फूफी की देह छाँहदार पेड़ के पुराने तने की तरह लगती थी, जिसके पत्तों की छाँह उससे अलग, उससे परे, घर-भर पर फैली हुई थी।

आज तो दादी अम्माँ स्वयं फूफी बनकर इस कोठरी में पड़ी है। ब्याह के कोलाहल से निकलकर जब दादा थककर अपनी चारपाई पर लेटे तो एक लम्बा चैन का-सा साँस लेकर बोले, “क्या सो गई हो? इस बार की रौनक, लेन-देन तो मँझले और बड़े बेटे के ब्याह को भी पार कर गई। समधियों का बड़ा घर ठहरा!”

दादी अम्माँ लेन-देन की बात पर कुछ कहना चाहते हुए भी नहीं बोली। चुपचाप पड़ी रही। दादा सो गए, आवाज़ें धीमी हो गईं। बरामदे में मेहराँ का रोबीला स्वर नौकर-चाकरों को सुबह के लिए आज्ञाएँ देकर मौन हो गया। दादी अम्माँ पड़ी रही और पतली नींद से घिरी आँखों से नए-पुराने चित्र देखती रही। एकाएक करवट लेते-लेते दो-चार क़दम उठाए और दादा की चारपाई के पास आ खड़ी हुई। झुककर कई क्षण तक दादा की ओर देखती रही। दादा नींद में बेख़बर थे और दादी जैसे कोई पुरानी पहचान कर रही हो। खड़े-खड़े कितने पल बीत गए! क्या दादी ने दादा को पहचाना नहीं? चेहरा उसके पति का है पर दादी तो इस चेहरे को नहीं, चेहरे के नीचे पति को देखना चाहती है। उसे बिछुड़ गए वर्षों में से वापस लौटा लेना चाहती है।

सिरहाने पर पड़ा दादा का सिर बिल्कुल सफे़द था। बन्द आँखों से लगी झुर्रियाँ-ही-झुर्रियाँ थीं। एक सूखी बाँह कम्बल पर सिकुड़ी-सी पड़ी थी। यह नहीं….यह तो नहीं…. दादी अम्माँ जैसे सोते-सोते जाग पड़ी थी, वैसे ही इस भूले-भटके भँवर में ऊपर-नीचे होती चारपाई पर जा पड़ी।

उस दिन सुबह उठकर जब दादी अम्माँ ने दादा को बाहर जाते देखा तो लगा कि रात-भर की भटकी-भटकी तस्वीरों में से कोई भी तस्वीर उसकी नहीं थी। वह इस सूखी देह और झुके कन्धे में से किसे ढूँढ़ रही थी? दादी अम्माँ चारपाई की बाँहों से उठी और लेट गई। अब तो इतनी-सी दिनचर्या शेष रह गई है। बीच-बीच में कभी उठकर बहुओं के कमरों की ओर जाती है तो लड़-झगड़कर लौट आती हैं कैसे हैं उसके पोते जो उम्र के रंग में किसी की बात नहीं सोचते? किसी की ओर नहीं देखते? बहू और बेटा, उन्हें भी कहाँ फुरसत है?

मेहराँ तो कुछ-न-कुछ कहकर चोट करने से भी नहीं चूकती। लड़ने को तो दादी भी कम नहीं, पर अब तीखा-तेज़ बोल लेने पर जैसे वह थककर चूर-चूर हो जाती है। बोलती है, बोले बिना रह नहीं पाती, पर बाद में घंटों बैठी सोचती रहती है कि वह क्यों उनसे माथा लगाती है, जिन्हें उसकी परवा नहीं। मेहराँ की तो अब चाल-ढाल ही बदल गई है। अब वह उसकी बहू नहीं, तीन बहुओं की सास है। ठहरी हुई गंभीरता से घर का शासन चलाती है। दादी अम्माँ का बेटा अब अधिक दौड़-धूप नहीं करता। देखरेख से अधिक अब बहुओं द्वारा ससुर का आदर-मान ही अधिक होता है। कभी अंदर-बाहर जाते अम्मा मिल जाती है तो झुककर बेटा माँ को प्रणाम अवश्य करता है। दादी अम्माँ गर्दन हिलाती-हिलाती आशीर्वाद देती है, “जीयो बेटा, जीयो।”

कभी मेहराँ की जली-कटी बातें सोच बेटे पर क्रोध और अभिमान करने को मन होता है, पर बेटे को पास देखकर दादी अम्माँ सब भूल जाती है। ममता-भरी पुरानी आँखों से निहारकर बार-बार आशीर्वाद बरसाती चली जाती है, “सुख पाओ, भगवान बड़ी उम्र दे….” कितना गंभीर और शीलवान है उसका बेटा! है तो उसका न? पोतों को ही देखो, कभी झुककर दादा के पाँव तक नहीं छूते। आखिर माँ का असर कैसे जाएगा? इन दिनों बहू की बात सोचते ही दादी अम्माँ को लगता है कि अब मेहराँ उसके बेटे में नहीं अपने बेटों में लगी रहती है। दादी अम्माँ को वे दिन भूल जाते हैं जब बेटे के ब्याह के बाद बहू-बेटे के लाड़-चाव में उसे पति के खाने-पीने की सुधि तक न रहती थी और जब लाख-लाख शुक्र करने पर पहली बार मेहराँ की गोद भरनेवाली थी तो दादी अम्माँ ने आकर दादा से कहा था, “बहू के लिए अब यह कमरा खाली करना होगा। हम लोग फूफी के कमरे में जा रहेंगे।”

दादा ने एक भरपूर नज़रों से दादी अम्माँ की ओर देखा था, जैसे वह बीत गए वर्षों को अपनी दृष्टि से टटोलना चाहते हों। फिर सिर पर हाथ फेरते-फेरते कहा था, “क्या बेटे वाला कमरा बहू के लिए ठीक नहीं? नाहक क्यों यह सबकुछ उलटा-सीधा करवाती हो?”

दादी अम्माँ ने हाथ हिलाकर कहा, “ओह हो, तुम समझोगे भी! बेटे के कमरे में बहू को रखूँगी तो बेटा कहाँ जाएगा? उलटे-सीधे की फिक्र तुम क्यों करते हो, मैं सब ठीक कर लूँगी।”

और पत्नी के चले जाने पर दादा बहुत देर बैठे-बैठे भारी मन से सोचते रहे कि जिन वर्षों का बीतना उन्होंने आज तक नहीं जाना, उन्हीं पर पत्नी की आशा विराम बनकर आज खड़ी हो गई है। आज सचमुच ही उसे इस उलटफेर की परवा नहीं।

इस कमरे में बड़ी फूफी उनकी दुलहिन को छोड़ गई थी। उस कमरे को छोड़कर आज वह फूफी के कमरे में जा रहे हैं। क्षण-भर के लिए, केवल क्षण-भर के लिए उन्हें बेटे से ईष्र्या हुई और उदासीनता में बदल गई और पहली रात जब वह फूफी के कमरे में सोए तो देर गए तक भी पत्नी बहू के पास से नहीं लौटी थी। कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद उनकी पलकें झँपी तो उन्हें लगा कि उनके पास पत्नी का नहीं…फूफी का हाथ है। दूसरे दिन मेहराँ की गोद भरी थी, बेटा हुआ था। घर की मालकिन पति की बात जानने के लिए बहुत अधिक व्यस्त थी।

कुछ दिन से दादी अम्माँ का जी अच्छा नहीं। दादा देखते हैं, पर बुढ़ापे की बीमारी से कोई दूसरी बीमारी बड़ी नहीं होती। दादी अम्माँ बार-बार करवट बदलती है और फिर कुछ-कुछ देर के लिए हाँफकर पड़ी रह जाती है। दो-एक दिन से वह रसोईघर की ओर भी नहीं आई, जहाँ मेहराँ का आधिपत्य रहते हुए भी वह कुछ-न-कुछ नौकरों को सुनाने में चूकती नहीं है। आज दादी को न देखकर छोटी बेटी हँसकर मँझली भाभी से बोली, “भाभी, दादी अम्माँ के पास अब शायद कोई लड़ने-झगड़ने की बात नहीं रह गई, नहीं तो अब तक कई बार चक्कर लगातीं।”

दोपहर को नौकर जब अम्मा के यहाँ से अनछुई थाली उठा लाया तो मेहराँ का माथा ठनका। अम्मा के पास जाकर बोली, “अम्मा, कुछ खा लिया होता, क्या जी अच्छा नहीं?”

एकाएक अम्मा कुछ बोली नहीं। क्षण-भर रुककर आँखें खोली और मेहराँ को देखती रह गई।

“खाने को मन न हो तो अम्मा दूध ही पी लो।”

अम्मा ने ‘हाँ’ – ‘ना’ कुछ नहीं की। न पलकें ही झपकीं। इस दृष्टि से मेहराँ बहुत वर्षों के बाद आज फिर डरी। इनमें न क्रोध था, न सास की तरेर थी, न मनमुटाव था। एक लम्बा गहरा उलाहना-पहचानते मेहराँ को देर नहीं लगी।

डरते-डरते सास के माथे को छुआ। ठंडे पसीने से भीगा था। पास बैठकर धीरे से स्नेह-भरे स्वर में बोली, “अम्मा, जो कहो, बना लाती हूँ।”

अम्मा ने सिरहाने पर पड़े-पड़े सिर हिलाया – नहीं, कुछ नहीं- और बहू के हाथ से अपना हाथ खींच लिया।

मेहराँ पल-भर कुछ सोचती रही और बिना आहट किए बाहर हो गई। बड़ी बहू के पास जाकर चिंतित स्वर में बोली, “बहू, अम्मा कुछ अधिक बीमार लगती हैं, तुम जाकर पास बैठो तो मैं कुछ बना लाऊँ।”

बहू ने सास की आवाज़ में आज पहली बार दादी अम्माँ के लिए घबराहट देखी। दबे पाँव जाकर अम्मा के पास बैठ हाथ-पाँव दबाने लगी। अम्मा ने इस बार हाथ नहीं खींचे। ढीली सी लेटी रही।

मेहराँ ने रसोईघर में जाकर दूध गर्म किया। औटाने लगी तो एकाएक हाथ अटक गया-क्या अम्मा के लिए यह अन्तिम बार दूध लिये जा रही है?

दादी अम्माँ ने बेखबरी में दो-चार घूँट दूध पीकर छोड़ दिया। चारपाई पर पड़ी अम्मा चारपाई के साथ लगी दीखती थीं। कमरे में कुछ अधिक सामान नहीं था। सामने के कोने में दादा का बिछौना बिछा था। शाम को दादा आए तो अम्मा के पास बहू और पतोहू को बैठे देख पूछा,”अम्मा तुम्हारी रूठकर लेटी है या….?”

मेहराँ ने अम्मा की बाँह आगे कर दी। दादा ने छूकर हौले से कहा, “जाओ बहू, बेटा आता ही होगा। उसे डॉक्टर को लिवाने भेज देना।”

मेहराँ सुसर के शब्दों को गंभीरता जानते हुए चुपचाप बाहर हो गई। बेटे के साथ जब डॉक्टर आया तो दादी अम्माँ के तीनों पोते भी वापस आ खड़े हुए। डॉक्टर ने सधे-सधाए हाथों से दादी की परीक्षा की। जाते-जाते दादी के बेटे से कहा, “कुछ ही घंटे और…।”

मेहराँ ने बहुओं को धीमे स्वर में आज्ञाएँ दीं और बेटों से बोली, “बारी-बारी से खा-पी लो, फिर पिता और दादा को भेज देना।”

अम्मा के पास से हटने की पिता और दादा की बारी नहीं आई उस रात। दादी ने बहुत जल्दी की। डूबते-डूबते हाथ-पाँवों से छटपटाकर एक बार आँखें खोलीं और बेटे और पति के आगे बाँहे फैला दीं। जैसे कहती हो-‘मुझे तुम पकड़ रखो।’

दादी का श्वास उखड़ा, दादा का कंठ जकड़ा और बेटे ने माँ पर झुककर पुकारा, “अम्मा,…अम्मा।”

“सुन रही हूँ बेटा, तुम्हारी आवाज़ पहचानती हूँ।”

मेहराँ सास की ओर बढ़ी और ठंडे हो रहे पैरों को छूकर याचना-भरी दृष्टि से दादी अम्माँ को बिछुरती आँखों से देखने लगी। बहू को रोते देख अम्मा की आँखों में क्षण-भर को संतोष झलका, फिर वर्षों की लड़ाई-झगड़े का आभास उभरा। द्वार से लगी तीनों पोतों की बहुएँ खड़ी थीं। मेहराँ ने हाथ से संकेत किया। बारी-बारी दादी अम्माँ के निकट तीनों झुकीं। अम्मा की पुतलियों में जीवन-भर का मोह उतर गया। मेहराँ से उलझा कड़वापन ढीला हो गया। चाहा कि कुछ कहे….कुछ…. पर छूटते तन से दादी अम्माँ ओंठों पर कोई शब्द नहीं खींच पाई।

“अम्मा, बहुओं को आशीष देती जाओ….,” मेहराँ के गीले कंठ में आग्रह था, विनय थी।

अम्मा ने आँखों के झिलमिलाते पर्दे में से अपने पूरे परिवार की ओर देखा-बेटा….बहू….पति….पोते-पतोहू…पोतियाँ। छोटी पतोहू की गुलाबी ओढ़नी जैसे दादी के तन-मन पर बिखर गई। उस ओढ़नी से लगे गोर-गोरे लाल-लाल बच्चे, हँसते-खेलते, भोली किलकारियाँ…।

दादी अम्माँ की धुँधली आँखों में से और सब मिट गया, सब पुँछ गया, केवल ढेर-से अगणित बच्चे खेलते रह गए…! उसके पोते, उसके बच्चे….।

पिता और पुत्र ने एक साथ देखा, अम्मा जैसे हल्के से हँसी, हल्के से….।

मेहराँ को लगा, अम्मा बिल्कुल वैसे हँस रही है जैसे पहली बार बड़े बेटे के जन्म पर वह उसे देखकर हँसी थी। समझ गई-बहुओं को आशीर्वाद मिल गया।

दादा ने अपने सिकुड़े हाथ में दादी का हाथ लेकर आँखों से लगाया और बच्चों की तरह बिलख-बिलखकर रो पड़े।

रात बीत जाने से पहले दादी अम्माँ बीत गई। अपने भरेपूरे परिवार के बीच वह अपने पति, बेटे और पोतों के हाथों में अंतिम बार घर से उठ गई।

दाह-संस्कार हुआ और दादी अम्माँ की पुरानी देह फूल हो गई। देखने-सुननेवाले बोले, “भाग्य हो तो ऐसा, फलता-फूलता परिवार।”

मेहराँ ने उदास-उदास मन से सबके लिए नहाने का सामान जुटाया। घर-बाहर धुलाया। नाते-रिश्तेदार पास-पड़ोसी अब तक लौट गए थे। मौत के बाद रूखी सहमी-सी दुपहर। अनचाहे मन से कुछ खा-पीकर घरवाले चुपचाप खाली हो बैठे। अम्मा चली गई, पर परिवार भरापूरा है। पोते थककर अपने-अपने कमरों मे जा लेटे। बहुएँ उठने से पहले सास की आज्ञा पाने को बैठी रहीं। दादी अम्माँ का बेटा निढाल होकर कमरे में जा लेटा। अम्मा की खाली कोठरी का ध्यान आते ही मन बह आया। कल तक अम्मा थी तो सही उस कोठी में। रुआँसी आँखें बरसकर झुक आईं तो सपने में देखा, नदी-किनारे घाट पर अम्मा खड़ी हैं अपनी चिता को जलते देख कहती है, ‘जाओ बेटा, दिन ढलने को आया, अब घर लौट चलो, बहू राह देख रही होगी। जरा सँभलकर जाना। बहू से कहना, बेटियों को अच्छे ठिकाने लगाए।’

दृश्य बदला। अम्मा द्वार पर खड़ी है। झाँककर उसकी ओर देखती है, ‘बेटा, अच्छी तरह कपड़ा ओढ़कर सोओ। हाँ बेटा, उठो तो! कोठरी में बापू को मिल आओ, यह विछोह उनसे न झेला जाएगा। बेटा, बापू को देखते रहना। तुम्हारे बापू ने मेरा हाथ पकड़ा था, उसे अंत तक निभाया, पर मैं ही छोड़ चली।’

बेटे ने हड़बड़ाकर आँखें खोलीं। कई क्षण द्वार की ओर देखते रह गए। अब कहाँ आएगी अम्मा इस देहरी पर…।

बिना आहट किए मेहराँ आई। रोशनी की। चेहरे पर अम्मा की याद नहीं, अम्मा का दुख था। पति को देखकर ज़रा सी रोई और बोली, “जाकर ससुरजी को तो देखो। पानी तक मुँह नहीं लगाया।”

पति खिड़की में से कहीं दूर देखते रहे। जैसे देखने के साथ कुछ सुन रहे हों- ‘बेटा, बापू को देखते रहना, तुम्हारे बापू ने तो अंत तक संग निभाया, पर मैं ही छोड़ चली।’

“उठो।” मेहराँ कपड़ा खींचकर पति के पीछे हो ली। अम्मा की कोठरी में अँधेरा था। बापू उसी कोठरी के कोने में अपनी चारपाई पर बैठे थे। नज़र दादी अम्माँ की चारपाईवाली खाली जगह पर गड़ी थी। बेटे को आया जान हिले नहीं।

“बापू, उठो, चलकर बच्चों में बैठो, जी सँभलेगा।”

बापू ने सिर हिला दिया।

मेहराँ और बेटे की बात बापू को मानो सुनाई नहीं दी। पत्थर की तरह बिना हिले-डुले बैठे रहे। बहू-बेटा, बेटे की माँ…..खाली दीवारों पर अम्मा की तस्वीरें ऊपर-नीचे होती रहीं। द्वार पर अम्मा घूँघट निकाले खड़ी है। बापू को अंदर आते देख शरमाती है और बुआ की ओट हो जाती है। बुआ स्नेह से हँसती है। पीठ पर हाथ फेरकर कहती है, ‘बहू, मेरे बेटे से कब तक शरमाओगी।?’

अम्मा बेटे को गोद में लिये दूध पिला रही हैं बापू घूम-फिरकर पास आ खड़े होते हैं। तेवर चढ़े। तीखे बालों को फीका बनाकर कहते हैं, ‘मेरी देखरेख अब सब भूल गई हो। मेरे कपड़े कहाँ डाल दिए?’ अम्मा बेटे के सिर को सहलाते-सहलाते मुस्कुराती है। फिर बापू की आँखों में भरपूर देखकर कहती है, ‘अपने ही बेटे से प्यार का बँटवारा कर झुँझलाने लगे!’

बापू इस बार झुँझलाते नहीं, झिझकते हैं, फिर एकाएक दूध पीते बेटे को अम्मा से लेकर चूम लेते हैं। मुन्ने के पतले नर्म ओठों पर दूध की बूँद अब भी चमक रही है। बापू अँधेरे में अपनी आँखों पर हाथ फेरते हैं। हाथ गीले हो जाते हैं। उनके बेटे की माँ आज नहीं रही।

तीनों बेटे दबे-पाँवों जाकर दादा को झाँक आए। बहुएँ सास की आज्ञा पा अपने-अपने कमरों में जा लेटीं। बेटियों को सोता जान मेहराँ पति के पास आई तो सिर दबाते-दबाते प्यार से बोली, “अब हौसला करो”… लेकिन एकाएक किसी की गहरी सिसकी सुन चौंक पड़ी। पति पर झुककर बोली, “बापू की आवाज़ लगती है, देखो तो।”

बेटे ने जाकर बाहरवाला द्वार खोला, पीपल से लगी झुकी-सी छाया। बेटे ने कहना चाहा, ‘बापू’! पर बैठे गले से आवाज़ निकली नहीं। हवा में पत्ते खड़खड़ाए, टहनियाँ हिलीं और बापू खड़े-खड़े सिसकते रहे।

“बापू!”

इस बार बापू के कानों में बड़े पोते की आवाज़ आई। सिर ऊँचा किया, तो तीनों बेटों के साथ देहरी पर झुकी मेहराँ दीख पड़ी। आँसुओं के गीले पूर में से धुंध बह गई। मेहराँ अब घर की बहू नहीं, घर की अम्मा लगती है। बड़े बेटे का हाथ पकड़कर बापू के निकट आई। झुककर गहरे स्नेह से बोली, “बापू, अपने इन बेटों की ओर देखो, यह सब अम्मा का ही तो प्रताप है। महीने-भर के बाद बड़ी बहू की झोली भरेगी, अम्मा का परिवार और फूले-फलेगा।”

बापू ने इस बार सिसकी नहीं भरी। आँसुओं को खुले बह जाने दिया। पेड़ के कड़े तने से हाथ उठाते-उठाते सोचा-दूर तक धरती में बैठी अगणित जड़ें अंदर-ही-अंदर इस बड़े पुराने पीपल को थामे हुए हैं। दादी अम्माँ इसे नित्य पानी दिया करती थी। आज वह भी धरती में समा गई है। उसके तन से ही तो बेटे-पोते का यह परिवार फैला है। पीपल की घनी छाँह की तरह यह और फैलेगा। बहू सच कहती है। यह सब अम्मा का ही प्रताप है। वह मरी नहीं।

वह तो अपनी देह पर के कपड़े बदल गई है, अब वह बहू में जीएगी, फिर बहू की बहू में…।

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गुलकी बन्नो- धर्मवीर भारती

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‘‘ऐ मर कलमुँहे !’ अकस्मात् घेघा बुआ ने कूड़ा फेंकने के लिए दरवाजा खोला और चौतरे पर बैठे मिरवा को गाते हुए देखकर कहा, ‘‘तोरे पेट में फोनोगिराफ उलियान बा का, जौन भिनसार भवा कि तान तोड़ै लाग ? राम जानै, रात के कैसन एकरा दीदा लागत है !’’ मारे डर के कि कहीं घेघा बुआ सारा कूड़ा उसी के सर पर न फेक दें, मिरवा थोड़ा खिसक गया और ज्यों ही घेघा बुआ अन्दर गयीं कि फिर चौतरे की सीढ़ी पर बैठ, पैर झुलाते हुए उसने उल्टा-सुल्टा गाना शुरू कर किया, ‘‘तुमें बछ याद कलते अम छनम तेरी कछम !’’ मिरवा की आवाज़ सुनकर जाने कहाँ से झबरी कुतिया भी कान-पूँछ झटकारते आ गयी और नीचे सड़क पर बैठकर मिरवा का गाना बिलकुल उसी अन्दाज़ में सुनने लगी जैसे हिज़ मास्टर्स वॉयस के रिकार्ड पर तसवीर बनी होती है।

अभी सारी गली में सन्नाटा था। सबसे पहले मिरवा (असली नाम मिहिरलाल) जागता था और आँख मलते-मलते घेघा बुआ के चौतरे पर आ बैठता था। उसके बाद झबरी कुतिया, फिर मिरवा की छोटी बहन मटकी और उसके बाद एक-एक कर गली के तमाम बच्चे-खोंचेवाली का लड़का मेवा, ड्राइवर साहब की लड़की निरमल, मनीजर साहब के मुन्ना बाबू-सभी आ जुटते थे। जबसे गुलकी ने घेघा बुआ के चौतरे पर तरकारियों की दुकान रखी थी तब से यह जमावड़ा वहाँ होने लगा था। उसके पहले बच्चे हकीमजी के चौतरे पर खेलते थे। धूप निकलते गुलकी सट्टी से तरकारियाँ ख़रीदकर अपनी कुबड़ी पीठ पर लादे, डण्डा टेकती आती और अपनी दुकान फैला देती। मूली, नीबू, कद्दू, लौकी, घिया-बण्डा, कभी-कभी सस्ते फल ! मिरवा और मटकी जानकी उस्ताद के बच्चे थे जो एक भंयकर रोग में गल-गलकर मरे थे और दोनों बच्चे भी विकलांग, विक्षिप्त और रोगग्रस्त पैदा हुए थे। सिवा झबरी कुतिया के और कोई उनके पास नहीं बैठता था और सिवा गुलकी के कोई उन्हें अपनी देहरी या दुकान पर चढ़ने नहीं देता था।

आज भी गुलकी को आते देखकर पहले मिरवा गाना छोड़कर, ‘‘छलाम गुलकी !’’ और मटकी अपने बढ़ी हुई तिल्लीवाले पेट पर से खिसकता हुआ जाँघिया सँभालते हुए बोली, ‘‘एक ठो मूली दै देव ! ए गुलकी !’’ गुलकी पता नहीं किस बात से खीजी हुई थी कि उसने मटकी को झिड़क दिया और अपनी दुकान लगाने लगी। झबरी भी पास गयी कि गुलकी ने डण्ड उठाया। दुकान लगाकर वह अपनी कुबड़ी पीठ दुहराकर बैठ गयी और जाने किसे बुड़बुड़ाकर गालियाँ देने लगी। मटकी एक क्षण चुपचाप रही फिर उसने रट लगाना शुरू किया, ‘‘एक मूली ! एक गुलकी !…एक’’ गुलकी ने फिर झिड़का तो चुप हो गयी और अलग हटकर लोलुप नेत्रों से सफेद धुली हुई मूलियों को देखने लगी। इस बार वह बोली नहीं। चुपचाप उन मूलियों की ओर हाथ बढ़ाया ही था कि गुलकी चीख़ी, ‘‘हाथ हटाओ। छूना मत। कोढ़िन कहीं की ! कहीं खाने-पीने की चीज देखी तो जोंक की तरह चिपक गयी, चल इधर !’’ मटकी पहले तो पीछे हटी पर फिर उसकी तृष्णा ऐसी अदम्य हो गयी कि उसने हाथ बढ़ाकर एक मूली खींच ली। गुलकी का मुँह तमतमा उठा और उसने बाँस की खपच्ची उठाकर उसके हाथ पर चट से दे मारी ! मूली नीचे गिरी और हाय ! हाय ! हाय !’’ कर दोनों हाथ झटकती हुई मटकी पाँव पटकपटक कर रोने लगी। ‘‘जावो अपने घर रोवो। हमारी दुकान पर मरने को गली-भर के बच्चे हैं-’’ गुलकी चीख़ी ! ‘‘दुकान दैके हम बिपता मोल लै लिया। छन-भर पूजा-भजन में भी कचरघाँव मची रहती है !’’ अन्दर से घेघा बुआ ने स्वर मिलाया। ख़ासा हंगामा मच गया कि इतने में झबरी भी खड़ी हो गयी और लगी उदात्त स्वर में भूँकने। ‘लेफ्ट राइट ! लेफ्ट राइट !’ चौराहे पर तीन-चार बच्चों का जूलूस चला आ रहा था। आगे-आगे दर्जा ‘ब’ में पढ़नेवाले मुन्ना बाबू नीम की सण्टी को झण्डे की तरह थामे जलूस का नेतृत्व कर रहे थे, पीछे थे मेवा और निरमल। जलूस आकर दूकान के सामने रूक गया। गुलकी सतर्क हो गयी। दुश्मन की ताक़त बढ़ गयी थी।

मटकी खिसकते-खिसकते बोली, ‘‘हमके गुलकी मारिस है। हाय ! हाय ! हमके नरिया में ढकेल दिहिस। अरे बाप रे !’’ निरमल, मेवा, मुन्ना, सब पास आकर उसकी चोट देखने लगे। फिर मुन्ना ने ढकेलकर सबको पीछे हटा दिया और सण्टी लेकर तनकर खड़े हो गये। ‘‘किसने मारा है इसे !’’

‘‘हम मारा है !’’ कुबड़ी गुलकी ने बड़े कष्ट से खड़े होकर कहा, ‘‘का करोगे ? हमें मारोगे !’’ मारोगे !’’ मारेंगे क्यों नहीं ?’’ मुन्ना बाबू ने अकड़कर कहा। गुलकी इसका कुछ जवाब देती कि बच्चे पास घिर आये। मटकी ने जीभ निकालकर मुँह बिराया, मेवा ने पीछे जाकर कहा, ‘‘ए कुबड़ी, ए कुबड़ी, अपना कूबड़ दिखाओ !’’ और एक मुट्ठी धूल उसकी पीठ पर छोड़कर भागा। गुलकी का मुँह तमतमा आया और रूँधे गले से कराहते हुए उसने पता नहीं क्या कहा। किन्तु उसके चेहरे पर भय की छाया बहुत गहरी हो रही थी। बच्चे सब एक-एक मुट्ठी धूल लेकर शोर मचाते हुए दौड़े कि अकस्मात् घेघा बुआ का स्वर सुनाई पड़ा, ‘‘ए मुन्ना बाबू, जात हौ कि अबहिन बहिनजी का बुलवाय के दुई-चार कनेठी दिलवायी !’’ ‘‘जाते तो हैं !’’ मुन्ना ने अकड़ते हुए कहा, ‘‘ए मिरवा, बिगुल बजाओ।’’ मिरवा ने दोनों हाथ मुँह पर रखकर कहा, ‘‘धुतु-धुतु-धू।’’ जलूस आगे चल पड़ा और कप्तान ने नारा लगाया:

अपने देस में अपना राज !

गुलकी की दुकान बाईकाट !

नारा लगाते हुए जलूस गली में मुड़ गया। कुबड़ी ने आँसू पोंछे, तरकारी पर से धूल झाड़ी और साग पर पानी के छींटे देने लगी।

गुलकी की उम्र ज़्यादा नहीं थी। यही हद-से-हद पच्चीस-छब्बीस। पर चेहरे पर झुर्रियाँ आने लगी थीं और कमर के पास से वह इस तरह दोहरी हो गयी थी जैसे अस्सी वर्ष की बुढ़िया हो। बच्चों ने जब पहली बार उसे मुहल्ले में देखा तो उन्हें ताजुज्ब भी हुआ और थोड़ा भय भी। कहाँ से आयी ? कैसे आ गयी ? पहले कहाँ थी ? इसका उन्हें कुछ अनुमान नहीं था ? निरमल ने ज़रूर अपनी माँ को उसके पिता ड्राइवर से रात को कहते हुए सुना, ‘‘यह मुसीबत और खड़ी हो गयी। मरद ने निकाल दिया तो हम थोड़े ही यह ढोल गले बाँधेंगे। बाप अलग हम लोगों का रुपया खा गया। सुना चल बसा तो डरी कि कहीं मकान हम लोग न दखल कर लें और मरद को छोड़कर चली आयी। खबरदार जो चाभी दी तुमने !’’ ‘‘क्या छोटेपन की बात करती हो ! रूपया उसके बाप ने ले लिया तो क्या हम उसका मकान मार लेंगे ? चाभी हमने दे दी है। दस-पाँच दिन का नाज-पानी भेज दो उसके यहाँ।’’

‘‘हाँ-हाँ, सारा घर उठा के भेज देव। सुन रही हो घेघा बुआ !’’

‘‘तो का भवा बहू, अरे निरमल के बाबू से तो एकरे बाप की दाँत काटी रही।’’ घेघा बुआ की आवाज़ आयी-‘‘बेचारी बाप की अकेली सन्तान रही। एही के बियाह में मटियामेट हुई गवा। पर ऐसे कसाई के हाथ में दिहिस की पाँचै बरस में कूबड़ निकल आवा।’’

‘‘साला यहाँ आवे तो हण्टर से ख़बर लूँ मैं।’’ ड्राइवर साहब बोले, ‘‘पाँच बरस बाद बाल-बच्चा हुआ। अब मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ तो उसमें इसका क्या कसूर ! साले ने सीढ़ी से ढकेल दिया। जिन्दगी-भर के लिए हड्डी खराब हो गयी न ! अब कैसे गुजारा हो उसका ?’’

‘‘बेटवा एको दुकान खुलवाय देव। हमरा चौतरा खाली पड़ा है। यही रूपया दुइ रूपया किराया दै देवा करै, दिन-भर अपना सौदा लगाय ले। हम का मना करित है ? एत्ता बड़ा चौतरा मुहल्लेवालन के काम न आयी तो का हम छाती पर धै लै जाब ! पर हाँ, मुला रुपया दै देव करै।’’

दूसरे दिन यह सनसनीख़ेज ख़बर बच्चों में फैल गयी। वैसे तो हकीमजी का चबूतरा पड़ा था, पर वह कच्चा था, उस पर छाजन नहीं थी। बुआ का चौतरा लम्बा था, उस पर पत्थर जुड़े थे। लकड़ी के खम्भे थे। उस पर टीन छायी थी। कई खेलों की सुविधा थी। खम्भों के पीछे किल-किल काँटे की लकीरें खींची जा सकती थीं। एक टाँग से उचक-उचककर बच्चे चिबिड्डी खेल सकते थे। पत्थर पर लकड़ी का पीढ़ा रखकर नीचे से मुड़ा हुआ तार घुमाकर रेलगाड़ी चला सकते थे। जब गुलकी ने अपनी दुकान के लिए चबूतरों के खम्भों में बाँस-बाँधे तो बच्चों को लगा कि उनके साम्राज्य में किसी अज्ञात शत्रु ने आकर क़िलेबन्दी कर ली है। वे सहमे हुए दूर से कुबड़ी गुलकी को देखा करते थे। निरमल ही उसकी एकमात्र संवाददाता थी और निरमल का एकमात्र विश्वस्त सूत्र था उसकी माँ। उससे जो सुना था उसके आधार पर निरमल ने सबको बताया था कि यह चोर है। इसका बाप सौ रूपया चुराकर भाग गया। यह भी उसके घर का सारा रूपया चुराने आयी है। ‘‘रूपया चुरायेगी तो यह भी मर जाएगी।’’ मुन्ना ने कहा, ‘‘भगवान सबको दण्ड देता है।’’ निरमल बोली ‘‘ससुराल में भी रूपया चुराये होगी।’’ मेवा बोला ‘‘अरे कूबड़ थोड़े है ! ओही रूपया बाँधे है पीठ पर। मनसेधू का रूपया है।’’ ‘‘सचमुच ?’’ निरमल ने अविश्वास से कहा। ‘‘और नहीं क्या कूबड़ थोड़ी है। है तो दिखावै।’’ मुन्ना द्वारा उत्साहित होकर मेवा पूछने ही जा रहा था कि देखा साबुनवाली सत्ती खड़ी बात कर रही है गुलकी से-कह रही थी, ‘‘अच्छा किया तुमने ! मेहनत से दुकान करो। अब कभी थूकने भी न जाना उसके यहाँ। हरामजादा, दूसरी औरत कर ले, चाहे दस और कर ले। सबका खून उसी के मत्थे चढ़ेगा। यहाँ कभी आवे तो कहलाना मुझसे। इसी चाकू से दोनों आँखें निकाल लूँगी !’’

बच्चे डरकर पीछे हट गये। चलते-चलते सत्ती बोली, ‘‘कभी रूपये-पैसे की जरूरत हो तो बताना बहिना !’’

कुछ दिन बच्चे डरे रहे। पर अकस्मात् उन्हें यह सूझा कि सत्ती को यह कुबड़ी डराने के लिए बुलाती है। इसने उसके गु़स्से में आग में घी का काम किया। पर कर क्या सकते थे। अन्त में उन्होंने एक तरीक़ा ईजाद किया। वे एक बुढ़िया का खेल खेलते थे। उसको उन्होंने संशोधित किया। मटकी को लैमन जूस देने का लालच देकर कुबड़ी बनाया गया। वह उसी तरह पीठ दोहरी करके चलने लगी। बच्चों ने सवाल जवाब शुरू कियेः

‘‘कुबड़ी-कुबड़ी का हेराना ?’’

‘‘सुई हिरानी।’’

‘‘सुई लैके का करबे’’

‘‘कन्था सीबै! ’’

‘‘कन्था सी के का करबे ?’’

‘‘लकड़ी लाबै !’’

‘‘लकड़ी लाय के का करबे ?’’

‘‘भात पकइबे! ’’

‘‘भात पकाये के का करबै ?’’

‘‘भात खाबै !’’

‘‘भात के बदले लात खाबै।’’

और इसके पहले कि कुबड़ी बनी हुई मटकी कुछ कह सके, वे उसे जोर से लात मारते और मटकी मुँह के बल गिर पड़ती, उसकी कोहनिया और घुटने छिल जाते, आँख में आँसू आ जाते और ओठ दबाकर वह रूलाई रोकती। बच्चे खुशी से चिल्लाते, ‘‘मार डाला कुबड़ी को । मार डाला कुबड़ी को।’’ गुलकी यह सब देखती और मुँह फेर लेती।

एक दिन जब इसी प्रकार मटकी को कुबड़ी बनाकर गुलकी की दुकान के सामने ले गये तो इसके पहले कि मटकी जबाव दे, उन्होंने ने अनचिते में इतनी ज़ोर से ढकेल दिया कि वह कुहनी भी न टेक सकी और सीधे मुँह के बल गिरी। नाक, होंठ और भौंह ख़ून से लथपथ हो गये। वह ‘‘हाय ! हाय !’’ कर इस बुरी तरह चीख़ी कि लड़के कुबड़ी मर गयी चिल्लाते हुए सहम गये और हतप्रभ हो गये। अकस्मात् उन्होंने देखा की गुलकी उठी । वे जान छोड़ भागे। पर गुलकी उठकर आयी, मटकी को गोद में लेकर पानी से उसका मुँह धोने लगी और धोती से खून पोंछने लगी। बच्चों ने पता नहीं क्या समझा कि वह मटकी को मार रही है, या क्या कर रही है कि वे अकस्मात् उस पर टूट पड़े। गुलकी की चीख़े सुनकर मुहल्ले के लोग आये तो उन्होंने देखा कि गुलकी के बाल बिखरे हैं और दाँत से ख़ून बह रहा है, अधउघारी चबूतरे से नीचे पड़ी है, और सारी तरकारी सड़क पर बिखरी है। घेघा बुआ ने उसे उठाया, धोती ठीक की और बिगड़कर बोलीं, ‘‘औकात रत्ती-भर नै, और तेहा पौवा-भर। आपन बखत देख कर चुप नै रहा जात। कहे लड़कन के मुँह लगत हो ?’’ लोगों ने पूछ तो कुछ नहीं बोली। जैसे उसे पाला मार गया हो। उसने चुपचाप अपनी दुकान ठीक की और दाँत से खू़न पोंछा, कुल्ला किया और बैठ गयी।

उसके बाद अपने उस कृत्य से बच्चे जैसे खु़द सहम गये थे। बहुत दिन तक वे शान्त रहे। आज जब मेवा ने उसकी पीठ पर धूल फेंकी तो जैसे उसे खू़न चढ़ गया पर फिर न जाने वह क्या सोचकर चुप रह गयी और जब नारा लगाते जूलूस गली में मुड़ गया तो उसने आँसू पोंछे, पीठ पर से धूल झाड़ी और साग पर पानी छिड़कने लगी। लड़के का हैं गल्ली के राक्षस हैं !’’ घेघा बुआ बोलीं। ‘‘अरे उन्हें काहै कहो बुआ ! हमारा भाग भी खोटा है !’’ गुलकी ने गहरी साँस लेकर कहा….।

इस बार जो झड़ी लगी तो पाँच दिन तक लगातार सूरज के दर्शन नहीं हुए। बच्चे सब घर में क़ैद थे और गुलकी कभी दुकान लगाती थी, कभी नहीं, राम-राम करके तीसरे पहर झड़ी बन्द हुई। बच्चे हकीमजी के चौतरे पर जमा हो गये। मेवा बिलबोटी बीन लाया था और निरमल ने टपकी हुई निमकौड़ियाँ बीनकर दुकान लगा ली थी और गुलकी की तरह आवाज़ लगा रही थी, ‘‘ले खीरा, आलू, मूली, घिया, बण्डा !’’ थोड़ी देर में क़ाफी शिशु-ग्राहक दुकान पर जुट गये। अकस्मात् शोरगुल से चीरता हुआ बुआ के चौतरे से गीत का स्वर उठा बच्चों ने घूम कर देखा मिरवा और मटकी गुलकी की दुकान पर बैठे हैं। मटकी खीरा खा रही है और मिरवा झबरी का सर अपनी गोद में रखे बिलकुल उसकी आँखों में आँखें डालकर गा रहा है।

तुरन्त मेवा गया और पता लगाकर लाया कि गुलकी ने दोनों को एक –एक अधन्ना दिया है दोनों मिलकर झबरी कुतिया के कीड़े निकाल रहे हैं। चौतरे पर हलचल मच गयी और मुन्ना ने कहा, ‘‘निरमल ! मिरवा-मटकी को एक भी निमकौड़ी मत देना। रहें उसी कुबड़ी के पास !’’ ‘‘हाँ जी !’’ निरमल ने आँख चमकाकर गोल मुंह करके कहा, ‘‘हमार अम्माँ कहत रहीं उन्हें छुयो न ! न साथ खायो, न खेलो। उन्हें बड़ी बुरी बीमारी है। आक थू !’’ मुन्ना ने उनकी ओर देखकर उबकायी जैसा मुँह बनाकर थूक दिया।

गुलकी बैठी-बैठी सब समझ रही थी और जैसे इस निरर्थक घृणा में उसे कुछ रस-सा आने लगा था। उसने मिरवा से कहा, ‘‘तुम दोनों मिल के गाओ तो एक अधन्ना दें। खूब जोर से !’’ भाई-बहन दोनों ने गाना शुरू किया-माल कताली मल जाना, पल अकियाँ किछी से…’’ अकस्मात् पटाक से दरवाजा खुला और एक लोटा पानी दोनों के ऊपर फेंकती हुई घेघा बुआ गरजीं, दूर कलमुँहे। अबहिन बितौ-भर के नाहीं ना और पतुरियन के गाना गाबै लगे। न बहन का ख्याल, न बिटिया का। और ए कुबड़ी, हम तुहूँ से कहे देइत है कि हम चकलाखाना खोलै के बरे अपना चौतरा नहीं दिया रहा। हुँह ! चली हुँआ से मुजरा करावै।’’

गुलकी ने पानी उधर छिटकाते हुए कहा, ‘‘बुआ बच्चे हैं। गा रहे हैं। कौन कसूर हो गया।’’

‘‘ऐ हाँ ! बच्चे हैं। तुहूँ तो दूध पियत बच्ची हौ। कह दिया कि जबान न लड़ायों हमसे, हाँ ! हम बहुतै बुरी हैं। एक तो पाँच महीने से किराया नाहीं दियो और हियाँ दुनियाँ-भर के अन्धे-कोढ़ी बटुरे रहत हैं। चलौ उठायो अपनी दुकान हियाँ से। कल से न देखी हियाँ तुम्हें राम ! राम ! सब अघर्म की सन्तान राच्छस पैदा भये हैं मुहल्ले में ! धरतियौ नहीं फाटत कि मर बिलाय जाँय।’’

गुलकी सन्न रह गयी। उसने किराया सचमुच पाँच महीने से नहीं दिया था। ब्रिक्री नहीं थी। मुहल्ले में उनसे कोई कुछ लेता ही नहीं था, पर इसके लिए बुआ निकाल देगी यह उसे कभी आशा नहीं थी। वैसे भी महीने में बीस दिन वह भूखी सोती थी। धोती में दस-दस पैबन्द थे। मकान गिर चुका था एक दालान में वह थेड़ी-सी जगह में सो जाती थी। पर दुकान तो वहाँ रखी नहीं जा सकती। उसने चाहा कि वह बुआ के पैर पकड़ ले, मिन्नत कर ले। पर बुआ ने जितनी जोर से दरवाजा खोला था उतनी ही जोर से बन्द कर दिया। जब से चौमास आया था, पुरवाई बही थी, उसकी पीठ में भयानक पीड़ा उठती थी। उसके पाँव काँपते थे। सट्टी में उस पर उधार बुरी तरह चढ़ गया था। पर अब होगा क्या ? वह मारे खीज के रोने लगी।

इतने में कुछ खटपट हुई और उसने घुटनों से मुँह उठाकर देखा कि मौका पाकर मटकी ने एक फूट निकाल लिया है और मरभुखी की तरह उसे हबर-हबर खाती जा रही थी है, एक क्षण वह उसके फूलते-पचकते पेट को देखती रही, फिर ख्याल आते ही कि फूट पूरे दस पैसे का है, वह उबल पड़ी और सड़ासड़ तीन-चार खपच्ची मारते हुए बोली, ‘‘चोट्टी ! कुतिया ! तोरे बदन में कीड़ा पड़ें !’’ मटकी के हाथ से फूट गिर पड़ा पर वह नाली में से फूट के टुकड़े उठाते हुए भागी। न रोयी, न चीख़ी, क्योंकि मुँह में भी फूट भरा था। मिरवा हक्का-बक्का इस घटना को देख रहा था कि गुलकी उसी पर बरस पड़ी। सड़-सड़ उसने मिरवा को मारना शुरू किया, ‘‘भाग, यहाँ से हरामजादे !’’ मिरवा दर्द से तिलमिला उठा, ‘‘हमला पइछा देव तो जाई।’’ ‘‘देत हैं पैसा, ठहर तो।’’ सड़ ! सड़।… रोता हुआ। मिरवा चौतरे की ओर भागा।

निरमल की दुकान पर सन्नाटा छाया हुआ था। सब चुप उसी ओर देख रहे थे। मिरवा ने आकर कुबड़ी की शिकायत मुन्ना से की। और घूमकर बोला, ‘‘मेवा बता तो इसे !’ मेवा पहले हिचकिचाया, फिर बड़ी मुलायमियत से बोला, ‘‘मिरवा तुम्हें बीमारी हुई है न ! तो हम लोग तुम्हें नहीं छुएँगे । साथ नहीं खिलाएँगें तुम उधर बैठ जाओ।’’

‘‘हम बीमाल हैं मुन्ना ?’’

मुन्ना कुछ पिघला, ‘‘हाँ, हमें छूओ मत। निमकौड़ी खरीदना हो तो उधर बैठ जाओ हम दूर से फेंक देंगे। समझे !’’ मिरवा समझ गया सर हिलाया और अलग जाकर बैठ गया। मेवा ने निमकौड़ी उसके पास रख दी और चोट भूलकर पकी निमकौड़ी का बीजा निकाल कर छीलने लगा। इतने में उधर से घेघा बुआ की आवाज आयी, ‘‘ऐ मुन्ना !’’ तई तू लोग परे हो जाओ ! अबहिन पानी गिरी ऊपर से !’’ बच्चो ने ऊपर देखा। तिछत्ते पर घेघा बुआ मारे पानी के छप-छप करती घूम रही थीं। कूड़े से तिछत्ते की नाली बन्द थी और पानी भरा था। जिधर बुआ खड़ी थीं उसके ठीक नीचे गुलकी का सौदा था। बच्चे वहाँ से दूर थे पर गुलकी को सुनने के लिए बात बच्चों से कही गयी थी। गुलकी कराहती हुई उठी। कूबड़ की वजह से वह तनकर चिछत्ते की ओर देख भी नहीं सकती थी। उसने धरती की ओर देखा ऊपर बुआ से कहा, ‘‘इधर की नाली काहे खोल रही हो ? उधर की खोलो न !’’

‘‘काहे उधर की खोली ! उधर हमारा चौका है कि नै !’’

‘‘इधर हमारा सौदा लगा है।’’

‘‘ऐ है !’’ बुआ हाथ चमका कर बोलीं, सौदा लगा है रानी साहब का ! किराया देय की दायीं हियाव फाटत है और टर्राय के दायीं नटई में गामा पहिलवान का जोर तो देखो ! सौदा लगा है तो हम का करी। नारी तो इहै खुली है !’’

‘‘खोलो तो देखैं !’’ अकस्मात् गुलकी ने तड़प कर कहा। आज तक किसी ने उसका वह स्वर नहीं सुना था-‘‘पाँच महीने का दस रूपया नहीं दिया बेशक, पर हमारे घर की धन्नी निकाल के बसन्तू के हाथ किसने बेचा ? तुमने। पच्छिम ओर का दरवाजा चिरवा के किसने जलवाया ? तुमने। हम गरीब हैं। हमारा बाप नहीं है सारा मुहल्ला हमें मिल के मार डालो।’’

‘‘हमें चोरी लगाती है। अरे कल की पैदा हुई।’’ बुआ मारे ग़ुस्से के खड़ी बोली बोलने लगी थीं।

बच्चे चुप खड़े थे। वे कुछ-कुछ सहमे हुए थे। कुबड़ी का यह रूप उन्होंने कभी न देखा न सोचा था

‘‘हाँ ! हाँ ! हाँ। तुमने, ड्राइवर चाचा से, चाची ने सबने मिलके हमारा मकान उजाड़ा है। अब हमारी दुकान बहाय देव। देखेंगे हम भी। निरबल के भी भगवान हैं !’’

‘‘ले ! ले ! ले ! भगवान हैं तो ले !’’ और बुआ ने पागलों की तरह दौड़कर नाली में जमा कूड़ा लकड़ी से ठेल दिया। छह इंच मोटी गन्दे पानी की धार धड़-धड़ करती हुई उसकी दुकान पर गिरने लगी। तरोइयाँ पहले नाली में गिरीं, फिर मूली, खीरे, साग, अदरक उछल-उछलकर दूर जा गिरे। गुलकी आँख फाड़े पागल-सी देखती रही और फिर दीवार पर सर पटककर हृदय-विदारक स्वर में डकराकर रो पड़ी, ‘‘अरे मोर बाबू, हमें कहाँ छोड़ गये ! अरे मोरी माई, पैदा होते ही हमें क्यों नहीं मार डाला ! अरे धरती मैया, हमें काहे नहीं लील लेती !’’

सर खोले बाल बिखेरे छाती कूट-कूटकर वह रो रही थी और तिछत्ते का पिछले पहले नौ दिन का जमा पानी धड़-धड़ गिर रहा था।

बच्चे चुप खड़े थे। अब तक जो हो रहा था, उनकी समझ में आ रहा था। पर आज यह क्या हो गया, यह उनकी समझ में नहीं आ सका । पर वे कुछ बोले नहीं। सिर्फ मटकी उधर गयी और नाली में बहता हुआ हरा खीरा निकालने लगी कि मुन्ना ने डाँटा, ‘‘खबरदार ! जो कुछ चुराया।’’ मटकी पीछे हट गयी। वे सब किसी अप्रत्याशित भय संवेदना या आशंका से जुड़-बटुरकर खड़े हो गये। सिर्फ़ मिरवा अलग सर झुकाये खड़ा था। झींसी फिर पड़ने लगी थी और वे एक-एक कर अपने घर चले गये।

दूसरे दिन चौतरा ख़ाली थी। दुकान का बाँस उखड़वाकर बुआ ने नाँद में गाड़कर उस पर तुरई की लतर चढ़ा दी थी। उस दिन बच्चे आये पर उनकी हिम्मत चौतरे पर जाने की नहीं हुई। जैसे वहाँ कोई मर गया हो। बिलकुल सुनसान चौतरा था और फिर तो ऐसी झड़ी लगी कि बच्चों का निकलना बन्द। चौथे या पाँचवें दिन रात को भयानक वर्षा तो हो ही रही थी, पर बादल भी ऐसे गरज रहे थे कि मुन्ना अपनी खाट से उठकर अपनी माँ के पास घुस गया। बिजली चमकते ही जैसे कमरा रोशनी से नाच-नाच उठता था छत पर बूदों की पटर-पटर कुछ धीमी हुई, थोड़ी हवा भी चली और पेड़ों का हरहर सुनाई पड़ा कि इतने में धड़-धड़-धड़-धड़ाम ! भयानक आवाज़ हुई। माँ भी चौंक पड़ी। पर उठी नहीं। मुन्ना आँखें खोले अँधेरें में ताकने लगा। सहसा लगा मुहल्ले में कुछ लोग बातचीत कर रहे हैं घेघा बुआ की आवाज़ सुनाई पड़ी-‘‘किसका मकान गिर गया है रे’’ ‘‘गुलकी का !’’-किसी का दूरागत उत्तर आया। ‘‘अरे बाप रे ! दब गयी क्या ?’’ ‘‘नहीं, आज तो मेवा की माँ के यहाँ सोई है ! मुन्ना लेटा था और उसके ऊपर अँधेरे में यह सवाल-जवाब इधर-से-उधर और उधर-से-इधर आ रहे थे। वह फिर काँप उठा, माँ के पास घुस गया और सोते-सोते उसने साफ़ सुना-कुबड़ी फिर उसी तरह रो रही है, गला फाड़कर रो रही है ! कौन जाने मुन्ना के ही आँगन में बैठकर रो रही हो ! नींद में वह स्वर कभी दूर कभी पास आता हुआ लग रहा है जैसे कुबड़ी मुहल्ले के हर आँगन में जाकर रो रही है पर कोई सुन नहीं रहा है, सिवा मुन्ना के।

बच्चों के मन में कोई बात इतनी गहरी लकीर बनाती कि उधर से उनका ध्यान हटे ही नहीं। सामने गुलकी थी तो वह एक समस्या थी, पर उसकी दुकान हट गयी, फिर वह जाकर साबुन वाली सत्ती के गलियारे में सोने लगी और दो-चार घरों से माँग-मूँगकर खाने लगी, उस गली में दिखती ही नहीं थी। बच्चे भी दूसरे कामों में व्यस्त हो गये। अब जाड़े आ रहे थे। उनका जमावड़ा सुबह न होकर तीसरे पहर होता था। जमा होने के बाद जूलूस निकलता था। और जिस जोशीले नारे से गली गूँज उठती थी वह था-‘घेघा बुआ को वोट दो।’’ पिछले दिनों म्युनिसिपैलिटी का चुनाव हुआ था और उसी में बच्चों ने यह नारा सीखा था। वैसे कभी-कभी बच्चों में दो पार्टियाँ भी होती थीं, पर दोनों को घेघा बुआ से अच्छा उम्मीदवार कोई नहीं मिलता था अतः दोनों गला फाड़-फाड़कर उनके ही लिए बोट माँगती थीं।

उस दिन जब घेघा बुआ के धैर्य का बाँध टूट गया और नयी-नयी गालियों से विभूषित अपनी पहली इलेक्शन स्पीच देने ज्यों ही चौतरे पर अवतरित हुईं कि उन्हें डाकिया आता हुआ दिखाई पड़ा। वह अचकचाकर रूक गयीं। डाकिये के हाथ में एक पोस कार्ड था और वह गुलकी को ढूँढ़ रहा था। बुआ ने लपक कर पोस्टकार्ड लिया, एक साँस में पढ़ गयीं। उनकी आँखें मारे अचरज के फैल गयीं, और डाकिये को यह बताकर कि गुलकी सत्ती साबुनवाली के ओसारे में रहती है, वे झट से दौड़ी-दौड़ी निरमल की माँ ड्राइवर की पत्नी के यहाँ गयीं। बड़ी देर तक दोनों में सलाह-मशविरा होता रहा और अन्त में बुआ आयीं और उन्होंने मेवा को भेजा, ‘‘जा गुलकी को बुलाय ला !’’

पर जब मेवा लौटा तो उसके साथ गुलकी नहीं वरन् सत्ती साबुनवाली थी और सदा की भाँति इस समय भी उसकी कमर से वह काले बेंट का चाकू लटक रहा था, जिससे वह साबुन की टिक्की काटकर दुकानदारों को देती थी। उसने आते ही भौं सिकोड़कर बुआ को देखा और कड़े स्वर में बोली, ‘‘क्यों बुलाया है गुलकी को ? तुम्हारा दस रूपये किराया बाकी था, तुमने पन्द्रह रूपये का सौदा उजाड़ दिया ! अब क्या काम है !’’ ‘‘अरे राम ! राम ! कैसा किराया बेटी ! अन्दर जाओ-अन्दर जाओ !’ बुआ के स्वर में असाधारण मुलायमियत थी। सत्ती के अन्दर जाते ही बुआ ने फटाक् से किवाड़ा बन्द कर लिये। बच्चों का कौतूहल बहुत बढ़ गया था। बुआ के चौके में एक झँझरी थी। सब बच्चे वहाँ पहुँचे और आँख लगाकर कनपटियों पर दोनों हथेलियाँ रखकर घण्टीवाला बाइसकोप देखने की मुद्रा में खड़े हो गये।

अन्दर सत्ती गरज रही थी, ‘‘बुलाया है तो बुलाने दो। क्यों जाए गुलकी ? अब बड़ा खयाल आया है। इसलिए की उसकी रखैल को बच्चा हुआ है जो जाके गुलकी झाड़ू-बुहारू करे, खाना बनावे, बच्चा खिलावे, और वह मरद का बच्चा गुलकी की आँख के आगे रखैल के साथ गुलछर्रे उड़ावे !’’

निरमल की माँ बोलीं, ‘‘अपनी बिटिया, पर गुजर तो अपने आदमी के साथ करैगी न ! जब उसकी पत्नी आयी है तो गुलकी को जाना चाहिए। और मरद तो मरद। एक रखैल छोड़ दुई-दुई रखैल रख ले तो औरत उसे छोड़ देगी ? राम ! राम !’’

‘‘नहीं, छोड़ नहीं देगी तो जाय कै लात खाएगी ?’’ सत्ती बोली।

‘‘अरे बेटा !’’ बुआ बोलीं, ‘‘भगवान रहें न ? तौन मथुरापुरी में कुब्जा दासी के लात मारिन तो ओकर कूबर सीधा हुइ गवा। पती तो भगवान हैं बिटिया। ओका जाय देव !’’

‘‘हाँ-हाँ, बड़ी हितू न बनिये ! उसके आदमी से आप लोग मुफ्त में गुलकी का मकान झटकना चाहती हैं। मैं सब समझती हूँ।’’

निरमल की माँ का चेहरा ज़र्द पड़ गया। पर बुआ ने ऐसी कच्ची गोली नहीं खेली थी। वे डपटकर बोलीं, ‘‘खबरदार जो कच्ची जबान निकाल्यो ! तुम्हारा चरित्तर कौन नै जानता ! ओही छोकरा मानिक…’’

जबान खींच लूँगी, ‘‘सत्ती गला फाड़कर चीख़ी जो आगे एक हरूफ़ कहा।’’ और उसका हाथ अपने चाकू पर गया-

‘‘अरे ! अरे ! अरे !’’ बुआ सहमकर दस क़दम पीछे हट गयीं-‘‘तो का खून करबो का, कतल करबो का ?’’ सत्ती जैसे आयी थी वैसे ही चली गयी।

तीसरे दिन बच्चों ने तय किया कि होरी बाबू के कुएँ पर चलकर बर्रें पकड़ी जायें। उन दिनों उनका जहर शान्त रहता है, बच्चे उन्हें पकड़कर उनका छोटा-सा काला डंक निकाल लेते और फिर डोरी में बाँधकर उन्हें उड़ाते हुए घूमते। मेवा, निरमल और मुन्ना एक-एक बर्रे उड़ाते हुए जब गली में पहुँचे तो देखा बुआ के चौतरे पर टीन की कुरसी डाले कोई आदमी बैठा है। उसकी अजब शक्ल थी। कान पर बड़े-बड़े बाल, मिचमिची आँखें, मोछा और तेल से चुचुआते हुए बाल। कमीज और धोती पर पुराना बदरंग बूट। मटकी हाथ फैलाये कह रही है, “एक डबल दै देव! एक दै देव ना?” मुन्ना को देखकर मटकी ताली बजा-बजाकर कहने लगी, “गुलकी का मनसेधू आवा है। ए मुन्ना बाबू! ई कुबड़ी का मनसेधू है।” फिर उधर मुड़कर- “एक डबल दै देव।” तीनों बच्चे कौतूहल में रुक गये। इतने में निरमल की माँ एक गिलास में चाय भरकर लायी और उसे देते-देते निरमल के हाथ में बर्रे देखकर उसे डाँटने लगी। फिर बर्रे छुड़ाकर निरमल को पास बुलाया और बोली, “बेटा, ई हमारी निरमला है। ए निरमल, जीजाजी हैं, हाथ जोड़ो! बेटा, गुलकी हमारी जात-बिरादरी की नहीं है तो का हुआ, हमारे लिए जैसे निरमल वैसे गुलकी। अरे, निरमल के बाबू और गुलकी के बाप की दाँत काटी रही। एक मकान बचा है उनकी चिहारी, और का?”; एक गहरी साँस लेकर निरमल की माँ ने कहा।

“अरे तो का उन्हें कोई इनकार है?”; बुआ आ गयी थीं, “अरे सौ रुपये तुम दैवे किये रहय्यू, चलो तीन सौ और दै देव। अपने नाम कराय लेव?”

“पाँच सौ से कम नहीं होगा?” उस आदमी का मुँह खुला, एक वाक्य निकला और मुँह फिर बन्द हो गया।

“भवा! भवा! ऐ बेटा दामाद हौ, पाँच सौ कहबो तो का निरमल की माँ को इनकार है?”

अकस्मात् वह आदमी उठकर खड़ा हो गया। आगे-आगे सत्ती चली आ रही थी | पीछे-पीछे गुलकी। सत्ती चौतरे के नीचे खड़ी हो गयी। बच्चे दूर हट गये। गुलकी ने सिर उठाकर देखा और अचकचाकर सर पर पल्ला डालकर माथे तक खींच लिया। सत्ती दो-एक क्षण उसकी ओर एकटक देखती रही और फिर गरजकर बोली, “यही कसाई है! गुलकी, आगे बढ़कर मार दो चपोटा इसके मुँह पर! खबरदार जो कोई बोला?”; बुआ चट से देहरी के अन्दर हो गयीं, निरमल की माँ की जैसे घिग्घी बँध गयी और वह आदमी हड़बड़ाकर पीछे हटने लगा।

“बढ़ती क्यों नहीं गुलकी! बड़ा आया वहाँ से बिदा कराने?”

गुलकी आगे बढ़ी ; सब सन्न थे ; सीढ़ी चढ़ी, उस आदमी के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। गुलकी चढ़ते-चढ़ते रुकी, सत्ती की ओर देखा, ठिठकी, अकस्मात् लपकी और फिर उस आदमी के पाँव पर गिर के फफक-फफककर रोने लगी, “हाय! हमें काहे को छोड़ दियौ! तुम्हारे सिवा हमारा लोक-परलोक और कौन है! अरे, हमरे मरै पर कौन चुल्लू भर पानी चढ़ायी।

सत्ती का चेहरा स्याह पड़ गया। उसने बड़ी हिकारत से गुलकी की ओर देखा और गुस्से में थूक निगलते हुए कहा, “कुतिया!”; और तेजी से चली गयी। निरमल की मां और बुआ गुलकी के सर पर हाथ फेर-फेरकर कह रही थीं, “मत रो बिटिया! मत रो! सीता मैया भी तो बनवास भोगिन रहा। उठो गुलकी बेटा! धोती बदल लेव कंघी चोटी करो। पति के सामने ऐसे आना असगुन होता है। चलो!”;

गुलकी आँसू पोंछती-पोंछती निरमल की माँ के घर चली। बच्चे पीछे-पीछे चले तो बुआ ने डाँटा, “ऐ चलो एहर, हुँआ लड्डू बँट रहा है का?”;

दूसरे दिन निरमल के बाबू (ड्राइवर साहब), गुलकी और जीजाजी दिन-भर कचहरी में रहे। शाम को लौटे तो निरमल की माँ ने पूछा, “पक्का कागज लिख गया?” “हाँ-हाँ रे, हाकिम, के सामने लिख गया।” फिर जरा निकट आकर फुसफुसाकर बोले, “मट्टी के मोल मकान मिला है। अब कल दोनों को बिदा करो।” “अरे, पहले सौ रुपये लाओ! बुआ का हिस्सा भी तो देना है?” निरमल की माँ उदास स्वर में बोली, “बड़ी चंट है बुढ़िया। गाड़-गाड़ के रख रही है, मर के साँप होयगी।”;

सुबह निरमल की माँ के यहाँ मकान खरीदने की कथा थी। शंख, घण्टा-घड़ियाली, केले का पत्ता, पंजीरी, पंचामृत का आयोजन देखकर मुन्ना के अलावा सब बच्चे इकट्ठा थे। निरमल की माँ और निरमल के बाबू पीढ़े पर बैठे थे; गुलकी एक पीली धोती पहने माथे तक घूँघट काढ़े सुपारी काट रही थी और बच्चे झाँक-झाँककर देख रहे थे। मेवा ने पहुँचकर कहा, “ए गुलकी, ए गुलकी, जीजाजी के साथ जाओगी क्या?”; कुबड़ी ने झेंपकर कहा, “धत्त रे! ठिठोली करता है”; और लज्जा-भरी जो मुसकान किसी भी तरुणी के चेहरे पर मनमोहक लाली बनकर फैल जाती, उसके झुर्रियोंदार, बेडौल, नीरस चेहरे पर विचित्र रूप से बीभत्स लगने लगी। उसके काले पपड़ीदार होठ सिकुड़ गये, आँखों के कोने मिचमिचा उठे और अत्यन्त कुरुचिपूर्ण ढंग से उसने अपने पल्ले से सर ढाँक लिया और पीठ सीधी कर जैसे कूबड़ छिपाने का प्रयास करने लगी। मेवा पास ही बैठ गया। कुबड़ी ने पहले इधर-उधर देखा, फिर फुसफुसाकर मेवा से कहा, “क्यों रे! जीजाजी कैसे लगे तुझे?” मेवा ने असमंजस में या संकोच में पड़कर कोई जवाब नहीं दिया तो जैसे अपने को समझाते हुए गुलकी बोली, “कुछ भी होय। है तो अपना आदमी! हारे-गाढ़े कोई और काम आयेगा? औरत को दबाय के रखना ही चाहिए।” फिर थोड़ी देर चुप रहकर बोली, “मेवा भैया, सत्ती हमसे नाराज है। अपनी सगी बहन क्या करेगी जो सत्ती ने किया हमारे लिए। ये चाची और बुआ तो सब मतलब के साथी हैं हम क्या जानते नहीं? पर भैया अब जो कहो कि हम सत्ती के कहने से अपने मरद को छोड़ दें, सो नहीं हो सकता।” इतने में किसी का छोटा-सा बच्चा घुटनों के बल चलते-चलते मेवा के पास आकर बैठ गया। गुलकी क्षण-भर उसे देखती रही फिर बोली, “पति से हमने अपराध किया तो भगवान् ने बच्चा छीन लिया, अब भगवान् हमें छमा कर देंगे।” फिर कुछ क्षण के लिए चुप हो गयी। “क्षमा करेंगे तो दूसरी सन्तान देंगे?” “क्यों नहीं देंगे? तुम्हारे जीजाजी को भगवान् बनाये रखे। खोट तो हमी में है। फिर सन्तान होगी तब तो सौत का राज नहीं चलेगा।”;

इतने में गुलकी ने देखा कि दरवाजे पर उसका आदमी खड़ा बुआ से कुछ बातें कर रहा है। गुलकी ने तुरत पल्ले से सर ढंका और लजाकर उधर पीठ कर ली। बोली, “राम! राम! कितने दुबरा गये हैं। हमारे बिना खाने-पीने का कौन ध्यान रखता! अरे, सौत तो अपने मतलब की होगी। ले भैया मेवा, जा दो बीड़ा पान दे आ जीजा को?” फिर उसके मुँह पर वही लाज की बीभत्स मुद्रा आयी- “तुझे कसम है, बताना मत किसने दिया है।”

मेवा पान लेकर गया पर वहाँ किसी ने उसपर ध्यान ही नहीं दिया। वह आदमी बुआ से कह रहा था, “इसे ले तो जा रहे हैं, पर इतना कहे देते हैं, आप भी समझा दें उसे- कि रहना हो तो दासी बनकर रहे। न दूध की न पूत की, हमारे कौन काम की; पर हाँ औरतिया की सेवा करे, उसका बच्चा खिलावे, झाड़ू-बुहारू करे तो दो रोटी खाय पड़ी रहे। पर कभी उससे जबान लड़ाई तो खैर नहीं । हमारा हाथ बड़ा जालिम है। एक बार कूबड़ निकला, अगली बार परान निकलेगा।”

“क्यों नहीं बेटा! क्यों नहीं?” बुआ बोलीं और उन्होंने मेवा के हाथ से पान लेकर अपने मुँह में दबा लिये।

करीब तीन बजे इक्का लाने के लिए निरमल की माँ ने मेवा को भेजा। कथा की भीड़-भाड़ से उनका मूड़ पिराने लगा था, अतः अकेली गुलकी सारी तैयारी कर रही थी। मटकी कोने में खड़ी थी। मिरवा और झबरी बाहर गुमसुम बैठे थे। निरमल की माँ ने बुआ को बुलवाकर पूछा कि बिदा-बिदाई में क्या करना होगा, तो बुआ मुँह बिगाड़कर बोलीं, “अरे कोई जात-बिरादरी की है का? एक लोटा में पानी भर के इकन्नी-दुअन्नी उतार के परजा-पजारू को दे दियो बस?” और फिर बुआ शाम को बियारी में लग गयीं।

इक्का आते ही जैसे झबरी पागल-सी इधर-उधर दौड़ने लगी। उसे जाने कैसे आभास हो गया कि गुलकी जा रही है, सदा के लिए। मेवा ने अपने छोटे-छोटे हाथों से बड़ी-बड़ी गठरियाँ रखीं, मटकी और मिरवा चुपचाप आकर इक्के के पास खड़े हो गये। सर झुकाये पत्थर-सी चुप गुलकी निकली। आगे-आगे हाथ में पानी का भरा लोटा लिये निरमल थी। वह आदमी जाकर इक्के पर बैठ गया। “अब जल्दी करो!”; उसने भारी गले से कहा। गुलकी आगे बढ़ी, फिर रुकी और टेंट से दो अधन्नी निकाले- “ले मिरवा, ले मटकी?” मटकी जो हमेशा हाथ फैलाये रहती थी, इस समय जाने कैसा संकोच उसे आ गया कि वह हाथ नीचे कर दीवार से सट कर खड़ी हो गयी और सर हिलाकर बोली, “नहीं ?”–“नहीं बेटा! ले लो!” गुलकी ने पुचकारकर कहा। मिरवा-मटकी ने पैसे ले लिये और मिरवा बोला, “छलाम गुलकी! ए आदमी छलाम?”;

“अब क्या गाड़ी छोड़नी है?” वह फिर भारी गले से बोला।

“ठहरो बेटा, कहीं ऐसे दामाद की बिदाई होती है?” सहसा एक बिलकुल अजनबी किन्तु अत्यन्त मोटा स्वर सुनायी पड़ा। बच्चों ने अचरज से देखा, मुन्ना की माँ चली आ रही हैं। “हम तो मुन्ना का आसरा देख रहे थे कि स्कूल से आ जाये, उसे नाश्ता करा लें तो आयें, पर इक्का आ गया तो हमने समझा अब तू चली। अरे! निरमल की माँ, कहीं ऐसे बेटी की बिदाई होती है! लाओ जरा रोली घोलो जल्दी से, चावल लाओ, और सेन्दुर भी ले आना निरमल बेटा! तुम बेटा उतर आओ इक्के से!”;

निरमल की माँ का चेहरा स्याह पड़ गया था। बोलीं, “जितना हमसे बन पड़ा किया। किसी को दौलत का घमण्ड थोड़े ही दिखाना था?” “नहीं बहन! तुमने तो किया पर मुहल्ले की बिटिया तो सारे मुहल्ले की बिटिया होती है। हमारा भी तो फर्ज था। अरे माँ-बाप नहीं हैं तो मुहल्ला तो है। आओ बेटा?” और उन्होंने टीका करके आँचल के नीचे छिपाये हुए कुछ कपड़े और एक नारियल उसकी गोद में डालकर उसे चिपका लिया। गुलकी जो अभी तक पत्थर-सी चुप थी सहसा फूट पड़ी। उसे पहली बार लगा जैसे वह मायके से जा रही है। मायके से अपनी माँ को छोड़कर छोटे-छोटे भाई-बहनों को छोड़कर और वह अपने कर्कश फटे हुए गले से विचित्र स्वर से रो पड़ी।

“ले अब चुप हो जा! तेरा भाई भी आ गया?” वे बोलीं। मुन्ना बस्ता लटकाये स्कूल से चला आ रहा था। कुबड़ी को अपनी माँ के कन्धे पर सर रखकर रोते देखकर वह बिल्कुल हतप्रभ-सा खड़ा हो गया- “आ बेटा, गुलकी जा रही है न आज! दीदी है न! बड़ी बहन है। चल पाँव छू ले! आ इधर?” माँ ने फिर कहा। मुन्ना और कुबड़ी के पाँव छुए? क्यों? क्यों? पर माँ की बात! एक क्षण में उसके मन में जैसे एक पूरा पहिया घूम गया और वह गुलकी की ओर बढ़ा। गुलकी ने दौड़कर उसे चिपका लिया और फूट पड़ी- “हाय मेरे भैया! अब हम जा रहे हैं! अब किससे लड़ोगे मुन्ना भैया? अरे मेरे वीरन, अब किससे लड़ोगे?” मुन्ना को लगा जैसे उसकी छोटी-छोटी पसलियों में एक बहुत बड़ा-सा आँसू जमा हो गया जो अब छलकने ही वाला है। इतने में उस आदमी ने फिर आवाज दी और गुलकी कराहकर मुन्ना की माँ का सहारा लेकर इक्के पर बैठ गयी। इक्का खड़-खड़ कर चल पड़ा। मुन्ना की माँ मुड़ी कि बुआ ने व्यंग्य किया, “एक आध गाना भी बिदाई का गाये जाओ बहन! गुलकी बन्नो ससुराल जा रही है!” मुन्ना की माँ ने कुछ जवाब नहीं दिया, मुन्ना से बोली, “जल्दी घर आना बेटा, नाश्ता रखा है?”

पर पागल मिरवा ने, जो बम्बे पर पाँव लटकाये बैठा था, जाने क्या सोचा कि वह सचमुच गला फाड़कर गाने लगा, “बन्नो डाले दुपट्टे का पल्ला, मुहल्ले से चली गयी राम?” यह उस मुहल्ले में हर लड़की की बिदा पर गाया जाता था। बुआ ने घुड़का तब भी वह चुप नहीं हुआ, उलटे मटकी बोली, “काहे न गावें, गुलकी नै पैसा दिया है?” और उसने भी सुर मिलाया, “बन्नो तली गयी लाम! बन्नो तली गयी लाम! बन्नो तली गयी लाम!”

मुन्ना चुपचाप खड़ा रहा। मटकी डरते-डरते आयी- “मुन्ना बाबू! कुबड़ी ने अधन्ना दिया है, ले लें?”

“ले ले” बड़ी मुश्किल से मुन्ना ने कहा और उसकी आँख में दो बड़े-बड़े आँसू डबडबा आये। उन्हीं आँसुओं की झिलमिल में कोशिश करके मुन्ना ने जाते हुए इक्के की ओर देखा। गुलकी आँसू पोंछते हुए परदा उठाकर मुड़-मुड़कर देख रही थी। मोड़ पर एक धचके से इक्का मुड़ा और फिर अदृश्य हो गया।

सिर्फ झबरी सड़क तक इक्के के साथ गयी और फिर लौट गयी।

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मिस पाल -मोहन राकेश

अनुमानित समय : 35 मिनट-

वह दूर से दिखाई देती आकृति मिस पाल ही हो सकती थी।

फिर भी विश्वास करने के लिए मैंने अपना चश्मा ठीक किया। निःसन्देह, वह मिस पाल ही थी। यह तो खैर मुझे पता था कि वह उन दिनों कुल्लू में रहती हैं, पर इस तरह अचानक उनसे भेंट हो जाएगी, यह नहीं सोचा था। और उसे सामने देखकर भी मुझे विश्वास नहीं हुआ कि वह स्थायी रूप से कुल्लू और मनाली के बीच उस छोटे से गांव में रही होगी। वह दिल्ली से नौकरी छोड़कर आई थी, तो लोगों ने उसके बारे में क्या-क्या नहीं सोचा था !

बस रायसन के डाकखाने के पास पहुंच कर रुक गई। मिस पाल डाकखाने के बाहर खड़ी पोस्टमास्टर से कुछ बात कर रही थीं। हाथ में वह एक थैला लिए थी। बस के रुकने पर न जाने किस बात के लिए पोस्टमास्टर को धन्यवाद देती हुई वह बस की तरफ मुड़ी। तभी मैं उतरकर सामने पहुंच गया। एक आदमी के अचानक सामने आ जाने से मिस पाल थोड़ा अचकचा गई, मगर मुझे पहचानते ही उसका चेहरा खुशी और उत्साह से खिल गया !

”रणजीत तुम?” उसने कहा, ”तुम यहाँ कहां से टपक पड़े ?”

”मैं इस बस से मनाली आ रहा हूँ।” मैंने कहा।”

”अच्छा! मनाली तुम कब से आए हुए थे ?”

”आठ दस दिन हुए, आया था। आज वापस जा रहा हूँ।”

”आज ही जा रहे हो?” मिस पाल के चेहरे से आधा उत्साह गायब हो गया, ‘देखो कितनी बुरी बात है कि आठ-दस दिन से तुम यहाँ हो और मुझसे मिलने की तुमने कोशिश भी नहीं की। तुम्हें यह तो पता ही था कि मैं कुल्लू में हूँ।”

”हां, यह तो पता था, पर यह पता नहीं था कि कुल्लू के किस हिस्से में हो। अब भी तुम अचानक ही दिखायी दे गईं, नहीं मुझे कहां से पता चलता कि तुम इस जंगल को आबाद कर रही हो?”

”सचमुच बहुत बुरी बात है,” मिस पाल उलाहने के स्वर में बोली, ”तुम इतने दिनों से यहाँ हो और मुझसे तुम्हारी भेंट आज हुई आज जाने के वक्त…।”

ड्राइवर जोर-जोर से हार्न बजाने लगा। मिस पाल ने कुछ चिढ़कर ड्राइवर की तरफ देखा और एक साथ झिड़कने और क्षमा माँगने के स्वर में कहा, ”बस जी एक मिनट। मैं भी इसी बस से कुल्लू चल रही हूँ। मुझे कुल्लू की एक सीट दीजिए। थैंक यू वेरी मच !” और फिर मेरी तरफ मुड़कर बोली, ”तुम इस बस से कहां तक जा रहे हो ?”

”आज तो इस बस से जोगिन्दरनगर जाऊंगा। वहाँ एक दिन रहकर कल सुबह आगे की बस पकड़ूंगा।”

ड्राइवर अब और जोर से हार्न बजाने लगा। मिस पाल ने एक बार क्रोध और बेबसी के साथ उसकी तरफ देखा और बस के दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए बोली, ”अच्छा कुल्लू तक तो हम लोगों का साथ है ही, और बात कुल्लू पहुंचकर करेंगे। मैं तो कहती हूँ कि तुम दो-चार दिन यहीं रुको, फिर चले जाना।”

बस में पहले ही बहुत भीड़ थी। दो-तीन आदमी वहाँ से और चढ़ गए थे, जिससे अन्दर खड़े होने की जगह भी नहीं रही थी। मिस पाल दरवाजे के अन्दर जाने लगीं तो कण्डक्टर ने हाथ बढ़ाकर उसे रोक दिया। मैंने कण्डक्टर से बहुतेरा कहा कि अन्दर मेरी वाली जगह खाली है, मिस साहब वहाँ बैठ जाएंगी और मैं भीड़ में किसी तरह खड़ा होकर चला जाऊंगा, मगर कण्डक्टर एक बार जिद पर अड़ा तो अड़ा ही रहा कि और सवारी वह नहीं ले सकता। मैं अभी उससे बात ही कर रहा था कि ड्राइवर ने बस स्टार्ट कर दी। मेरा सामान बस में था, इसलिए मैं दौड़कर चलती बस पर सवार हो गया। दरवाजे से अन्दर जाते हुए मैंने एक बार मुड़कर मिस पाल की तरफ देख लिया। वह इस तरह अचकचाई-सी खड़ी थी जैसे कोई उसके हाथ से उसका सामान छीन कर भाग गया हो और उसे समझ न आ रहा हो कि उसे अब क्या करना चाहिए।

बस हल्के-हल्के मोड़ काटती कुल्लू की तरफ बढ़ने लगी। मुझे अफसोस होने लगा कि मिस पाल को बस में जगह नहीं मिली तो मैंने क्यों न अपना सामान वहाँ उतरवा लिया। मेरा टिकट जोगिन्दरनगर का था, पर यह जरूरी नहीं था कि उस टिकट से जोगिन्दरनगर तक जाऊं ही। मगर मिस पाल से भेंट कुछ ऐसे आकस्मिक ढंग से हुई थी और निश्चय करने के लिए समय इतना कम था कि मैं यह बात उस समय सोच भी नहीं सका था। थोड़ा-सा समय और मिलता, तो मैं जरूर कुछ देर के लिए वहाँ उतर जाता। उतने समय में तो मिस पाल से कुशल-समाचार भी नहीं पूछ सका था, हालांकि मन में उसके सम्बन्ध में जानने की उत्सुकता थी। उसके दिल्ली छोड़ने के बाद लोग उसके बारे में जाने क्या-क्या बातें करते रहे थे। किसी का ख्याल था कि उसने कुल्लू में एक रिटायर्ड अंग्रेज़ मेजर से शादी कर ली है और मेजर ने अपने सेब के बगीचे उसके नाम कर दिए हैं। किसी की सूचना थी कि उसे वहाँ की सरकार की तरफ से वजीफा मिल रहा है और वह करती वरती कुछ नहीं है, बस घूमती और हवा खाती है। कुछ ऐसे लोग भी थे जिनका कहना था कि मिस पाल का दिमाग खराब हो गया है और सरकार उसे इलाज के लिए अमृतसर के पागलखाने में भेज रही है। मिस पाल एक दिन अचानक अपनी लगी हुई पांच सौ की नौकरी छोड़कर चली आई थी, उससे लोगों में उसके बारे में तरह-तरह की कहानियाँ प्रचलित थीं।

जिन दिनों मिस पाल ने त्यागपत्र दिया, मैं दिल्ली में नहीं था। लम्बी छुट्टी लेकर बाहर गया था। मिस पाल के नौकरी छोड़ने का कारण मैं काफी हद तक जानता था। वह सूचना विभाग में हम लोगों के साथ काम करती थी और राजेन्द्रनगर में हमारे घर से दस-बारह घर छोड़कर रहती थी। दिल्ली में भी उसका जीवन काफी अकेला था, क्योंकि दफ्तर के ज्यादातर लोगों से उसका मनमुटाव था और बाहर के लोगों से वह मिलती बहुत कम थी। दफ्तर का वातावरण उसके अपने अनुकूल नहीं लगता था। वह वहाँ एक-एक दिन जैसे गिनकर काटती थी। उसे हर एक से शिकायत थी कि वह घटिया किस्म का आदमी है, जिसके साथ उसका बैठना नहीं हो सकता।

”ये लोग इतने ओछे और बेईमान हैं,” वह कहा करती, ”इतनी छोटी और कमीनी बातें करते हैं कि मेरा इनके बीच काम करो हर वक्त दम घुटता रहता है। जाने क्यों ये लोग इतनी छोटी-छोटी बातों पर एक-दूसरे से लड़ते हैं और अपने छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए एक-दूसरे को कुचलने की कोशिश करते रहते हैं।”

मगर उस वातावरण में उसके दुखी रहने का मुख्य कारण दूसरा था, जिसे वह मुंह से स्वीकार नहीं करती थी। लोग इस बात को जानते थे, इसलिए जान-बूझकर उसे छोड़ने के लिए कुछ-न-कुछ कहते रहते थे। बुखारिया तो रोज़ ही उसके रंग-रूप पर कोई न कोई टिप्पण़ी कर देता था।

‘क्या बात है मिस पाल, आज रंग बहुत निखर रहा है!”

दूसरी तरफ वह जोरावरसिंह बात जोड़ देता, ”आजकल मिस पाल पहले से स्लिम भी तो हो रही है।”

मिस पाल इन संकेतों से बुरी तरह से परेशान हो उठती और कई बार ऐसे मौके पर कमरे से उठकर चली जाती। उसकी पोशाक पर भी लोग तरह-तरह की टिप्पणियां करते रहते थे। वह शायद अपने मुटापे की क्षतिपूर्ति के लिए बाल छोटे कटवाती थी और बनाव सिंगार से चिढ़ होने पर भी रोज काफी समय मेकअप पर खर्च करती थी। मगर दफ्तर में दाखिल होते ही उसे किसी न किसी मुंह से ऐसी बात सुनने को मिल जाती थी, ”मिस पाल, नई कमीज की डिजाइन बहुत अच्छा है। आज तो गजब ढा रही हो तुम !”

मिस पाल को इस तरह की बातें दिल में चुभ जाती थीं। जितनी देर दफ्तर में रहती, उसका चेहरा गंभीर बना रहता। जब पांच बजते, तो वह इस तरह अपनी मेज से उठती जैसे कोई सजा भोगने के बाद उसे छुट्टी मिली हो। दफ्तर से उठकर वह सीधी अपने घर चली जाती और अगले दिन सुबह दफ्तर के लिए निकलने तक वहीं रहती। दफ्तर के लोगों से तंग आ जाने की वजह से ही वह और लोगों से भी मेल-जोल नहीं रखना चाहती थी। मेरा घर पास होने की वजह से, या शायद इसलिए कि दफ्तर के लोगों में मैं ही ऐसा था जिसने उसे कभी शिकायत का मौका नहीं दिया था, वह कभी शाम को हमारे यहाँ चली आती थी। मैं अपनी बूआ के पास रहता था और मिस पाल मेरी बुआ और उनकी लड़कियों से काफी घुल-मिल गई थी। कई बार घर के कामों में वह उनका हाथ बंटा देती थी। किसी दिन हम उसके यहाँ चले जाते थे। वह घर में समय बिताने के लिए संगीत और चित्रकला का अभ्यास करती थी। हम लोग पहुंचे तो उसके कमरे में सितार की आवाज आ रही होती या वह रंग और कूचियां लिए किसी तस्वीर में उलझी होती।

मगर जब वह उन दोनों में कोई भी काम न कर रही होती तो अपने तख्त पर बिछे मुलायम गद्दे पर दो तकियों के बीच लेटी छत को ताक रही होती। उसके गद्दे पर जो झीना रेशमी कपड़ा बिछा रहता था, उसे देखकर मुझे बहुत चिढ़ होती थी। मन करता था कि उसे खींचकर बाहर फेंक दूं। उसके कमरे में सितार, तबला रंग, कैनवस, तस्वीरें कपड़े तथा नहाने और चाय बनाने का सामान इस तरह उलझे-बिखरे रहते थे कि बैठने के लिए कुर्सियों का उद्धार करना एक समस्या हो जाती थी। कभी मुझे उसके झीने रेशमी कपड़े वाले तख्त पर बैठना पड़ जाता तो मुझे मन में बहुत परेशानी होती। मन करता कि जितनी जल्दी हो सके उठ जाऊं। मिस पाल अपने कमरे के चारों तरफ खोज कर कहां से एक चायदानी और तीन-चार टूटी प्यालियां निकाल लेतीं और हम लोगों को ‘फर्स्ट क्लास बोहिमयन कॉफी’ पिलाने की तैयारी करने लगती। कभी वह हम लोगों को अपनी बनाई तस्वीरें दिखाती और हम तीनों-मैं और मेरी दो बहने-अपना अज्ञान छिपाने के लिए उसकी प्रशंसा कर देते मगर कई बार वह हमसे उदास मिलती और ठीक ढंग से बात भी न करती। मेरी बहनें ऐसे मौके पर उससे चिढ़ जातीं और कहतीं कि वे उसके यहाँ फिर न आएंगी। मगर मुझे ऐसे अवसर पर मिस पाल से ज़्यादा सहानुभूति होती।

आखिरी बार जब मैं मिस पाल के यहाँ गया, मैंने उसे बहुत ही उदास देखा था। मेरा उन दिनों एपेंडसाइटिस का आपरेशन हुआ था और मैं कई दिन अस्पताल में रहकर आया था। मिस पाल उन दिनों रोज अस्पताल में खबर पूछने आती रही थी। बुआ अस्पताल में मेरे पास रहती थी पर खाने-पीने का सामान इकट्ठा करना उनके लिए मुश्किल था मिस पाल सुबह-सुबह आकर सब्जियां और दूध दे जाती थी। जिस दिन मैं उसके यहाँ गया, उससे एक ही दिन पहले मुझे अस्पताल से छुट्टी मिली थी और मैं अभी काफी कमजोर था। फिर भी उसने मेरे लिए जो तकलीफ उठाई थी, उसके लिए मैं उसे धन्यवाद देना चाहता था।

मिस पाल ने दफ्तर से छुट्टी ले रखी थी और कमरा बन्द किए अपने गद्दे पर लेटी थी मुझे पता लगा कि शायद वह सुबह से नहाई भी नहीं है।

”क्या बात है, मिस पाल? तबीयत तो ठीक है?” मैंने पूछा।

”तबीयत ठीक है”, उसने कहा, ”मगर मैं नौकरी छोड़ने की सोच रही हूँ।”

”क्यों? कोई खास बात हुई है क्या?”

”नहीं, खास बात क्या होगी? बात बस इतनी ही है मैं ऐसे लोगों के बीच काम कर ही नहीं सकती। मैं सोच रही हूँ कि दूर के किसी खूबसूरत-से पहाड़ी इलाके में चली जाऊं और वहाँ रहकर संगीत और चित्रकला का ठीक से अभ्यास करूँ। मुझे लगता है, मैं खामखाह यहाँ अपनी जिन्दगी बरबाद कर रही हूँ। मेरी समझ में नहीं आता कि इस तरह की जिन्दगी जीने का आखिर मतलब क्या है? सुबह उठती हूँ, दफ्तर चली जाती हूँ। वहाँ सात-आठ घंटे खराब करती हूँ, खाना खाती हूँ, सो जाती हूँ। यह सारा का सारा सिलसिला मुझे बिलकुल बेमानी लगता है। मैं सोचती हूँ कि मेरी जरूरतें ही कितनी हैं? मैं कहीं और जाकर एक छोटा-सा कमरा या शैक लूँ तो थोड़ा-सा जरूरत का सामान अपने पास रखकर पचास-साठ या सौ रुपये में गुजारा कर सकती हूँ। यहाँ मैं जो पांच सौ लेती हूँ, वे पांच के पांच सौ हर महीने खर्च हो जाते हैं। किस तरह खर्च हो जाते हैं, यह खुद मेरी समझ में नहीं आता। पर अगर ज़िन्दगी इसी तरह चलनी  है, तो क्यों खामखाह दफ्तर आने-जाने का भार ढोती रहूँ ? बाहर रहने में कम से कम अपनी स्वतन्त्रता होगी। मेरे पास कुछ रुपये पहले के हैं, मुझे प्राविडेंट फंड के मिल जाएंगे। इतने में एक छोटी सी जगह पर मेरा काफी दिन गुजारा हो सकता है। मैं ऐसी जगह रहना चाहती हूँ, जहाँ यहाँ की-सी गन्दगी न हो और लोग इस तरह की छोटी हरकतें न करते हों। ठीक से जीने के लिए इन्सान को कम से कम इतना तो महसूस होना चाहिए कि उसके आसपास का वातावरण उजला और साफ है, और वह एक मेंढक की तरह गंदले पानी में नहीं जी रहा।”

”मगर तुम यह कैसे कह सकती हो कि जहाँ तुम जाकर रहोगी, वहाँ हर चीज़ वैसी ही होगी जैसी तुम चाहती हो? मैं तो समझता हूँ कि इन्सान जहाँ भी चला जाए, अच्छी और बुरी तरह की चीज़ें उसे अपने आसपास मिलेंगी ही। तुम यहाँ के वातावरण से घबराकर कहीं और जाती हो, तो यह कैसे कहा जा सका है कि वहाँ का वातावरण भी तुम्हें ऐसा ही नहीं लगेगा ? इसलिए मेरे ख्याल से नौकरी छोड़ने की बात तुम गलत सोचती हो। तुम यहीं रहो और अपना संगीत और चित्रकला का अभ्यास करती रहो। लोग जैसी बातें करते है करने दो।”

पर मिस पाल की वितृष्णा इससे कम नहीं हुई। “तुम नहीं समझते, रणजीत।” वह बोली, “यहाँ ऐसे लोगों के बीच और रहूँगी, तो मेरा दिमाग बिलकुल खोखला हो जाएगा। तुम नहीं जानते कि मैं जो तुम्हारे लिए सुबह दूध और सब्जियाँ लेकर जाती रही हूँ, उसे लेकर भी ये लोग क्या-क्या बातें करते रहे हैं। जो लोग अच्छे-से-अच्छे काम का ऐसा कमीना मतलब लेते हों, उनके बीच आदमी रह ही कैसे सकता है? मैंने यह सब बहुत दिन सह लिया है, अब और मुझसे नहीं सहा जाता। मैं सोच रही हूँ, जितनी जल्दी हो सके यहाँ से चली जाऊँ। बस यही एक बात तय नहीं कर पा रही कि जाऊँ कहाँ। अकेली होने से किसी अनजान जगह जाकर रहते डर लगता है। तुम जानते ही हो कि मैं…।” और बात बीच में छोड़कर वह उठ खड़ी हुई, “अच्छा, तुम्हारे लिए कुछ चाय-वाय तो बनाऊँ। तुम अभी अस्पताल से निकल कर आए हो और मैं हूँ कि अपनी ही बात किए जा रही हूँ। तुम्हें अभी कुछ दिन घर पर आराम करना चाहिए। अभी से इस तरह चलना-फिरना ठीक नहीं।”

“मैं चाय नहीं पीऊँगा,” मैंने कहा, “मैं तुम्हें कुछ समझा तो नहीं सकता, सिर्फ इतना कह सकता हूँ कि तुम लोगों की बातों को जरूरत से ज्यादा महत्व दे रही हो। मेरा यह भी ख्याल है कि लोग वास्तव में उतने बुरे नहीं हैं, जितना कि तुम उन्हें समझती हो। अगर तुम इस नजर से सोचो कि…।”

“इस बात को रहने दो,” मिस पाल ने मेरी बात बीच में काट दी, “मैं इन लोगों से दिल से नफरत करती हूँ। तुम इन्हें इन्सान समझते हो? मुझे तो ऐसे लोगों से अपना पिंकी ज्यादा अच्छा लगता है। यह उन सबसे कहीं ज्यादा सभ्य है।”

पिंकी मिस पाल का छोटा-सा कुत्ता था। वह कुछ देर उसे गोदी में लिए उसके बालों पर हाथ फेरती रही। मैंने पहले भी कई बार देखा था कि वह उस कुत्ते को एक बच्चे की तरह प्यार करती है और उसे खाना खिलाकर बच्चों की तरह ही तौलिए से उसका मुँह पोंछती है। मैं कुछ देर बाद वहाँ से उठकर चला, तो मिस पाल पिंकी को गोदी में लिए मुझे बाहर दरवाजे तक छोड़ने आई।

“अंकल को टा टा करो,” वह पिंकी की एक अगली टाँग हाथ से हिलाती हुई बोली, “टा टा, टा टा !”

मैं लंबी छुट्टी से वापस आया, तो मिस पाल त्यागपत्र देकर जा चुकी थी। वह अपने बारे में लोगों को इतना ही बताकर गई थी कि वह कुल्लू के किसी गाँव में बसने जा रही है। बाकी बातें लोगों की कल्पना ने अपने-आप जोड़ दी थीं।

बस ब्यास के साथ-साथ मोड़ काट रही थी और मेरा मन हो रहा था कि लौटकर रायसन चला जाऊँ। मैं मनाली में दस दिन अकेला रहकर ऊब गया था, और मिस पाल थी कि कई महीने से वहाँ रहती थी। मैं जानना चाहता था कि वह अकेली वहाँ कैसा महसूस करती है और नौकरी छोड़ने के बाद से उसने क्या-क्या कुछ कर डाला है। यूँ एक अपरिचित स्थान पर किसी पुराने परिचित से मिलने और बात करने का भी अपना आकर्षण होता है। बस जब कुल्लू पहुँच कर रुकी, तो मैंने अपना सामान वहाँ उतरवाकर हिमाचल राज्य परिवहन के दफ्तर में रखवा दिया और रायसन के लिए वापसी की पहली बस पकड़ ली। बस ने पंद्रह-बीस मिनट में मुझे रायसन के बाजार में उतार दिया। मैंने वहाँ एक दुकानदार से पूछा कि मिस पाल कहाँ रहती हैं।

“मिस पाल कौन है, भाई?” दुकानदार ने अपने पास बैठे युवक से पूछा।

“वह तो नहीं, वह कटे बालों वाली मिस?”

“हाँ-हाँ, वही होगी।”

दुकान में और भी चार-पाँच व्यक्ति थे। उन सबकी आँखें मेरी तरफ घूम गईं। मुझे लगा जैसे वे मन में यह तय करना चाह रहे हों कि कटे बालों वाली मिस के साथ मेरा क्या रिश्ता होगा।

“चलिए, मैं आपको उसके यहाँ छोड़ आता हूँ।” कहकर युवक दुकान से उतर आया। सड़क पर मेरे साथ चलते हुए उसने पूछा, “क्यों भाई साहब यह मिस क्या अकेली ही हैं या…?”

“हाँ, अकेली ही हैं।”

कुछ देर हम लोग चुप रहकर चलते रहे। फिर उसने पूछा, “आप उसके क्या लगते हैं?”

मुझे समझ नहीं आया कि मैं उसको क्या उत्तर दूँ। पल भर सोचकर मैंने कहा, “मैं उसका रिश्तेदार नहीं हूँ। उसे वैसे ही जानता हूँ।”

सड़क से बाईं तरफ थोड़ा ऊपर को जाकर हम लोग एक खुले मैदान में पहुँच गए। मैदान चारों तरफ से पेड़ों से घिरा था और बीच में पाँच-छह जालीदार कॉटेज बने थे, जो बड़े-बड़े मुर्गीखानों जैसे लगते थे। लड़का मुझे बताकर कि उनमें पहला कॉटेज मिस पाल का है, वहाँ से लौट गया। मैंने जाकर कॉटेज का दरवाजा खटखटाया।

“कौन है?” अंदर से मिस पाल की आवाज सुनाई दी।

“एक मेहमान है मिस, दरवाजा खोलो।”

“दरवाजा खुला है, आ जाइए।”

मैंने दरवाजा धकेलकर खोल लिया और अंदर चला गया। मिस पाल ने एक चारपाई पर अपना गद्दा लगा रखा था और उसी तरह दो तकियों के बीच लेटी थी जैसे दिल्ली में अपने तख्त पर लेटी रहती थी। सिरहाने के पास एक खुली हुई पुस्तक रखी थी- बट्रेंड रसेल की ‘कांक्वेस्ट ऑफ हेपीनेस’। मैं देखकर तय नहीं कर सका कि वह पुस्तक पढ़ रही थी या लेटी हुई सिर्फ छत की तरफ देख रही थी। मुझे देखते ही वह चौंककर बैठ गई।

“अरे तुम…?”

“हाँ, मैं। तुमने सोचा भी नहीं होगा कि गया आदमी फिर वापस भी आ सकता है।”

“बहुत अजीब आदमी हो तुम ! वापस आना था, तो उसी समय क्यों नहीं उतर गए !”

“बजाय इसके कि शुक्रिया अदा करो जो सात मील जाकर वापस चला आया हूँ…।”

“शुक्रिया अदा करती अगर तुम उसी समय उतर जाते और मुझे बस में अपनी सीट ले लेने देते।”

मैंने ठहाका लगाया और बैठने के लिए जगह ढूँढ़ने लगा। वहाँ भी चारों तरफ वही बिखराव और अव्यवस्था थी जो दिल्ली में उसके घर दिखाई दिया करती थी। हर चीज हर दूसरी चीज की जगह काम में लाई जा रही थी। एक कुर्सी ऊपर से नीचे तक मैले कपड़ों से लदी थी। दूसरी पर कुछ रंग बिखरे थे और एक प्लेट रखी थी जिसमें बहुत-सी कीलें पड़ी थीं।

“बैठो, मैं झट से तुम्हारे लिए चाय बनाती हूँ,” मिस पाल व्यस्त होकर उठने लगी।

“अभी मुझसे बैठने को तो कहा नहीं, और चाय की फिक्र पहले से करने लगीं?” मैंने कहा, “मुझे बैठने की जगह बता दो और चाय-वाय रहने दो। इस वक्त तुम्हारी ‘बोहीमियन चाय’ पीने का जरा मन नहीं है।”

“तो मत पियो। मुझे कौन झंझट करना अच्छा लगता है ! बैठने की जगह मैं अभी बनाए देती हूँ।” और कपड़े-अपड़े हटाकर उसने एक कुर्सी खाली कर दी। बाईं तरफ एक बड़ी-सी मेज थी, पर उस पर भी इतनी चीजें पड़ी थीं कि कहीं कुहनी रखने तक की जगह नहीं थी। मैंने बैठकर टाँगें फैलाने की कोशिश की तो पता चला कपड़ों के ढेर के नीचे मिस पाल ने अपने बनाए खाके रख रखे हैं। मिस पाल फिर से अपने बिस्तर में तकियों के सहारे बैठ गई थी। गद्दे पर उसने वही झीना रेशमी कपड़ा बिछा रखा था, जिसे देखकर मुझे चिढ़ हुआ करती थी। मेरा उस समय भी मन हुआ कि उस कपड़े को निकालकर फाड़ दूँ या कहीं आग में झोंक दूँ। मैंने सिगरेट सुलगाने के लिए मेज से दियासलाई की डिबिया उठाई मगर खोलते ही वापस रख दी। डिबिया में दियासलाइयाँ नहीं थीं, गुलाबी-सा रंग भरा था। मैंने चारों तरफ नजर दौड़ाई, मगर और डिबिया कहीं दिखाई नहीं दी।

“दियासलाई किचन में होगी, मैं अभी लाती हूँ,” कहती हुई मिस पाल फिर उठी और कमरे से चली गई। मैं उतनी देर आसपास देखता रहा। मुझे फिर उस दिन की याद हो आई जिस दिन मैं मिस पाल के घर देर तक बैठा उससे बातें करता रहा था। पिंकी से मिस पाल के ‘टा टा’ कराने की बात याद आने से मैं हँस दिया।

तभी मिस पाल दियासलाई की डिबिया लिए आ गई। मेरा अकेले में हँसना शायद उसे बहुत अस्वाभाविक लगा। वह सहसा गंभीर हो गई।

“किसी ने कुछ पिला-विला दिया है क्या? उसने मजाक और शिकायत के स्वर में कहा।

“मैं अपने इस तरह लौटकर आने की बात पर हँस रहा हूँ।” और जैसे अपने को ही अपने झूठ का विश्वास दिलाने के लिए मैंने अपनी हँसी की नकल की और कहा, “मैं सोच भी नहीं सकता था कि इस अनजान जगह पर अचानक तुमसे भेंट हो जाएगी? और तुम्हीं ने कहाँ सोचा होगा कि जो आदमी बस में आगे चला गया था, वह घंटा-भर बाद तुम्हारे कमरे में बैठा तुमसे बात कर रहा होगा !”

और विश्वास करके कि मैंने अपने हँसने के कारण की व्याख्या कर दी है, मैंने पूछा, “तुम्हारा पिंकी कहाँ है? यहाँ दिखाई नहीं दे रहा।”

मिस पाल पहले से भी गंभीर हो गई। मुझे लगा कि उसका चेहरा अब काफी रूखा लगने लगा है। आँखों में लाली भर रही थी, जैसे कई रातों से वह ठीक से सोई न हो।

“पिंकी को यहाँ आने के बाद एक रात सरदी लग गई थी,” उसने अपनी उसाँस दबाकर कहा, “मैंने उसे कितनी ही गरम चीजें खिलाईं, पर वह दो दिन में चलता बना।”

मैंने विषय बदल दिया। उससे शिकायत करने लगा कि वह जो अपने बारे में बिना किसी को ठीक बताए दिल्ली से चली आई, यह उसने ठीक नहीं किया।

“दफ्तर में अब भी लोग मिस पाल की बात करके हँसते होंगे !” उसने ऐसे पूछा जैसे वह स्वयं उस मिस पाल से भिन्न हो, जिसके बारे में वह सवाल पूछ रही थी। पर उसकी आँखों में यह जानने की बहुत उत्सुकता भर रही थी कि मैं उसके सवाल का क्या जवाब देता हूँ।

“लोगों की बातों को तुम इतना महत्व क्यों देती हो?” मैंने कहा, “लोग वैसी बातें इसलिए करते हैं कि उनके जीवन में मनोरंजन के दूसरे साधन बहुत कम होते हैं। जब वह व्यक्ति चला जाता है, तो चार दिन में यह भूल जाते हैं कि संसार में उसका अस्तित्व था भी या नहीं।”

कहते-कहते मुझे एहसास हो आया कि मैंने यह कहकर गलती की है। मिस पाल मुझसे यही सुनना चाहती थी कि लोग अब भी उसके बारे में उसी तरह बात करते हैं और उसी तरह उसका मजाक उड़ाते हैं- यह विश्वास उसके लिए अपने वर्तमान को सार्थक समझने के लिए जरूरी था।

“हो सकता है तुम्हारे सामने बात न करते हों,” मिस पाल बोली, “क्योंकि उन्हें पता है कि हम लोग…अम्ï…अ…मित्र रहे हैं। नहीं तो वे कमीने लोग बात करने से बाज आ सकते हैं?”

अच्छा था कि मिस पाल ने मेरी बात पर विश्वास नहीं किया। उसने समझा कि मैं झूठमूठ उसे दिलासा देने की कोशिश कर रहा हूँ।

“हो सकता है बात करते भी हों,” मैंने कहा, “पर तुम अब उन लोगों की बात क्यों सोचती हो? कम-से-कम तुम्हारे लिए तो उन लोगों का अब अस्तित्व ही नहीं है।”

“मेरे लिए उन लोगों का अस्तित्व कभी था ही नहीं,” मिस पाल ने मुँह बिचका दिया, “मैं उनमें से किसी को अपने पैर के अँगूठे के बराबर भी नहीं समझती थी।”

आँखों से लग रहा था जैसे अब भी उन लोगों को अपने पास देख रही हो और उसे खेद हो कि वह ठीक से उनसे प्रतिशोध क्यों नहीं ले पा रही।

“तुम्हें पता है कि रमेश का फिर लखनऊ ट्रांसफर हो गया है?” मैंने बात बदल दी।

“अच्छा, मुझे पता नहीं था !”

पर उसने उस संबंध में और जानने की उत्सुकता प्रकट नहीं की। मैं फिर भी उसे रमेश के ट्रांसफर का किस्सा विस्तार से सुनाने लगा। मिस पाल ‘हूँ-हाँ’ करती रही। पर यह साफ था कि वह अपने अंदर ही कहीं खो गई है।

मैं रमेश की बात कह चुका, तो कुछ क्षण हम दोनों चुप रहे। फिर मिस पाल बोली, “देखो, मैं तुमसे सच कहती हूँ रणजीत, मुझे वहाँ उन लोगों के बीच एक-एक पल काटना असंभव लगता था। मुझे लगता था, मैं नरक में रहती हूँ। तुम्हें पता ही है, मैं दफ्तर में किसी से बात करना भी पसंद नहीं करती थी।”

मैं सुबह मनाली से बिना नाश्ता किए चला था, इसलिए मुझे भूख लग आई थी। मैंने बात को रोटी के प्रकरण पर ले आना उचित समझा। मैंने उससे पूछा कि उसने खाने की क्या व्यवस्था कर रखी है- खुद बनाती है, या कोई नौकर रख रखा है।

“तुम्हें भूख तो नहीं लगी?” मिस पाल अब दफ्तर के माहौल से बाहर निकल आई, “लगी हो, तो उधर मेरे साथ किचन में चलो। जो कुछ बना है, इस वक्त तो तुम्हें उसी में से थोड़ा-बहुत खा लेना होगा। शाम को मैं तुम्हें ठीक से बनाकर खिलाऊँगी। मुझे तुम्हारे आने का पता होता, तो मैं इस वक्त भी कुछ और चीज बना रखती। यहाँ बाजार में तो कुछ मिलता ही नहीं। किसी दिन अच्छी सब्जी मिल जाए, तो समझो बड़े भाग्य का दिन है। कोई दिन होता है जिस दिन एकाध अंडा मिल जाता है।…शाम को मैं तुम्हारे लिए मछली बनाऊँगी। यहाँ की ट्राउट बहुत अच्छी होती है। मगर मिलती बहुत मुश्किल से है।”

मुझे खुशी हुई कि मैंने सफलतापूर्वक बात का विषय बदल दिया है। मिस पाल बिस्तर से उठकर खड़ी हो गई थी। मैंने भी कुर्सी से उठते हुए कहा, “आओ, चलकर तुम्हारा रसोईघर तो देख लूँ। इस समय मुझे कसकर भूख लगी है,इसलिए जो कुछ भी बना है वह मुझे ट्राउट से अच्छा लगेगा। शाम को मैं जोगिन्दरनगर पहुँच जाऊँगा।”

मिस पाल दरवाजे से बाहर निकलती हुई सहसा रुक गई।

“तुम्हें शाम को जोगिन्दरनगर ही पहुँचना है तो लौटकर क्यों आए थे? यह बात तुम गाँठ में बाँध लो कि आज मैं तुम्हें यहाँ से नहीं जाने दूँगी। तुम्हें पता है इन तीन महीनों में तुम मेरे यहाँ पहले ही मेहमान आए हो? मैं तुम्हें आज कैसे जाने दे सकती हूँ?…तुम्हारे साथ कुछ सामान-आमान भी है या ऐसे ही चले आए थे?”

मैंने उसे बताया कि मैं अपना सामान हिमाचल राज्य परिवहन के दफ्तर में छोड़ आया हूँ और उससे कह आया हूँ कि दो घंटे में मैं लौट आऊँगा।

“मैं अभी पोस्टमास्टर से वहाँ टेलीफोन करा दूँगी। कल तक तुम्हारा सामान यहाँ ले आएँगे। तुम कम-से-कम एक सप्ताह यहाँ रहोगे। समझे? मुझे पता होता कि तुम मनाली में आए हुए हो तो मैं भी कुछ दिन के लिए वहाँ चली आती। आजकल तो मैं यहाँ…खैर…तुम पहले उधर तो आओ, नहीं भूख के मारे ही यहाँ से भाग जाओगे।”

मैं इस नई स्थिति के लिए तैयार नहीं था। उस संबंध में बाद में बात करने की सोचकर मैं उसके साथ रसोईघर में चला गया। रसोईघर में कमरे जितनी अराजकता नहीं थी, शायद इसलिए कि वहाँ सामान ही बहुत कम था। एक कपड़े की आराम कुर्सी थी, जो लगभग खाली ही थी- उस पर सिर्फ नमक का एक डिब्बा रखा हुआ था। शायद मिस पाल उस पर बैठकर खाना बनाती थी। खाना बनाने का और सारा सामान एक टूटी हुई मेज पर रखा था। कुर्सी पर रखा हुआ डिब्बा उसने जल्दी से उठाकर मेज पर रख दिया और इस तरह मेरे बैठने के लिए जगह कर दी।

फिर मिस पाल ने जल्दी-जल्दी स्टोव जलाया और सब्जी की पतीली उस पर रख दी। कलछी साफ नहीं थी, वह उसे साफ करने के लिए बाहर चली गई। लौटकर उसे कलछी को पोंछने के लिए कोई कपड़ा नहीं मिला। उसने अपनी कमीज से ही उसे पोंछ लिया और सब्जी को हिलाने लगी।

“दो आदमियों का खाना है भी या दोनों को ही भूखे रहना पड़ेगा?” मैंने पूछा।

“खाना बहुत है,” मिस पाल झुककर पतीली में देखती हुई बोली।

“क्या-क्या है?”

मिस पाल कलछी से पतीली में टटोलकर देखने लगी।

“बहुत कुछ है। आलू भी हैं, बैंगन भी हैं और शायद…शायद बीच में एकाध टिंडा भी है। यह सब्जी मैंने परसों बनाई थी।”

“परसों?” मैं ऐसे चौंक गया जैसे मेरा माथा सहसा किसी चीज से टकरा गया हो। मिस पाल कलछी चलाती रही।

“हर रोज तो नहीं बना पाती हूँ,” वह बोली। रोज बनाने लगूँ तो बस खाना बनाने की ही हो रहूँ। और अ…अपने अकेली के लिए रोज बनाने का उत्साह भी तो नहीं होता। कई बार तो मैं सप्ताह-भर का खाना एक साथ बना लेती हूँ और फिर निश्चिंत होकर खाती रहती हूँ। कहो तो तुम्हारे लिए मैं अभी ताजा बना दूँ।”

“तो चपातियाँ भी क्या परसों की ही बना रखी हैं?” मैं अनायास कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।

“आओ, इधर आकर देख लो, खा सकोगे या नहीं।” वह कोने में रखे हुए बेंत के संदूक के पास चली गई। मैं भी उसके पास पहुँच गया। मिस पाल ने संदूक का ढकना उठा दिया। संदूक में पच्चीस-तीस खुश्क चपातियाँ पड़ी थीं। सूखकर उन सबने कई तरह की आकृतियाँ धारण कर ली थीं। मैं संदूक के पास से आकर फिर कुर्सी पर बैठ गया।

“तुम्हारे लिए ताजा चपातियाँ बना देती हूँ,” मिस पाल एक अपराधी की तरह देखती हुई बोली।

“नहीं-नहीं, जो कुछ बना रखा है वही खाएँगे,” मैंने कहा। मगर अपनी इस भलमनसाहत के लिए मेरा मन अंदर-ही-अंदर कुढ़ गया।

मिस पाल संदूक का ढक्कन बंद करके स्टोव के पास लौट गई।

“सब्जी तीन दिन से ज्यादा नहीं चलती,” वह बोली, “बाद में मैं जैम, प्याज और नमक से काम चलाती हूँ। यहाँ अलूचे बहुत मिल जाते हैं, इसलिए मैंने बहुत-सा अलूचे का जैम बना रखा है। खाकर देखो, अच्छा जैम है।…ठहरो,तुम्हें प्लेट देती हूँ।”

वह फिर जल्दी से बाहर चली गई और कमरे से कीलों वाली प्लेट खाली करके ले आई।

“गिलास में अम्…अ,” वह आकर बोली, “सरसों का तेल रखा है। पानी तुम प्याली में ही ले लोगे या…?”

ट्राउट मछली…खाना खाते समय और खाना खा चुकने के बाद भी मिस पाल के दिमाग पर ट्राउट मछली की बात ही सवार रही। जैसे भी हो, शाम को वह ट्राउट मछली बनाएगी। उसके हठ की वजह से मैंने उससे कह दिया था कि मैं अगले दिन सुबह तक वहाँ रह जाऊँगा। मिस पाल ने आगे का फैसला अगले दिन पर छोड़ दिया था। उसे शाम के लिए कई और चीजों का इंतजाम करना था, क्योंकि ट्राउट मछली आसानी से तो नहीं बन जाती। पहली चीज घी चाहिए था। डिब्बे में घी नाममात्र को ही था। प्याज और मसाला भी घर में नहीं था। मिट्टी का तेल भी चाहिए था। खाने के बाद हम लोग घूमने के लिए निकले तो पहले वह मुझे साथ बाजार में ले गई। हटवार के पास भी घी नहीं था। उसके लिए मिस पाल ने पोस्टमास्टर से अनुरोध किया कि वह अपने घर से उसे शाम के लिए आधा सेर घी भिजवा दे, अगले दिन कुल्लू से लाकर लौटा देगी। उससे उसने यह भी कहा कि वह अपने घर के थोड़े-से फ्रेंच बीन भी उतरवाकर उसे भेज दे, और कोई मछली वाला उधर से गुजरे तो उसके लिए सेर-भर ट्राउट ले रखे।

“सब्बरवाल साहब, मैं आपको बहुत तकलीफ देती हूँ,” वह चलने से पहले सात-आठ बार उसे धन्यवाद देकर बोली, “मगर देखिए, मेरे मेहमान आए हुए हैं, और यहाँ ट्राउट के अलावा कोई अच्छी चीज मिलती नहीं। देखती हूँ, अगर बाली मुझे मिल जाए तो मैं उससे कहूँगी कि वह मुझे दरिया से एक मछली पकड़ दे। मगर बाली का कोई भरोसा नहीं। आप जरूर मेरे लिए ले रखिएगा। मैंने मिसेज एटकिन्सन को भी कहला दिया है। उन्होंने भी ले ली तो मैं आज और कल दोनों दिन बना लूँगी। ध्यान रखिएगा। कई बार मछली वाला आवाज नहीं लगाता और ऐसे ही निकल जाता है। थैंक यू। थैंक यू वेरी मच !”

मेरे सामान के लिए उसने कुल्लू फोन भी करा दिया। अब सड़क पर चलती हुई वह सुबह के नाश्ते की बात करने लगी।

“रात को तो ट्राउट हो जाएगी, मगर सुबह नाश्ता क्या बनाया जाए? डबलरोटी यहाँ नहीं मिलेगी, नहीं तो मैं तुम्हें शहद के टोस्ट ही बनाकर खिलाती। अच्छा खैर, देखो…।”

सड़क पर खुली धूप फैली थी और भेड़ों और पश्म के बकरों का रेवड़ हमारे आगे-आगे चल रहा था। साथ दो कुत्ते जीभ लपलपाते हुए पहरेदारी करते जा रहे थे। सामने से एक जीप के आ जाने से रेवड़ में खलबली मच गई। बकरीवाले भेड़ों को पहाड़ की तरफ धकेलने लगे। एक भेड़ का बच्चा ढलान से फिसल गया और नीचे से सिर उठाकर मिमियाने लगा। किसी बकरीवाले का ध्यान उसकी तरफ नहीं गया तो मिस पाल सहसा परेशान हो उठी, “ए भाई, देखो वह बच्चा नीचे जा गिरा है। बकरीवाले, एक बच्चा नीचे खाई में गिर गया है, उसे उठा लाओ। ए भाई !”

एक दिन पहले वर्षा हुई थी, इसलिए ब्यास खूब चढ़ा हुआ था। नुकीली चट्‌टानों से छिलता और कटता हुआ पानी शोर करता हुआ बह रहा था। सामने दरिया पार करने का झूला था। झूले की चर्खियाँ घूम रही थीं, रस्सियाँ इकट्ठी हो रही थीं और झूला दो व्यक्तियों को लिए हुए इस पार से उस पार जा रहा था। सहसा झूले में बैठे हुए दोनों व्यक्ति’ही-ही-ही-ही’ करके हँसने लगे, जैसे किसी को चिढ़ा रहे हों। फिर उनमें से एक ने जोर से छींक दिया। झूला उस पार पहुँच गया और वे व्यक्ति उसी तरह हँसते और छींकते हुए उससे उतर गए। झूला छोड़ दिया गया, और उसकी रस्सियाँ इस सिरे से उस सिरे तक आधी गोलाइयों में फैल गईं। जो व्यक्ति उधर उतरे थे, वे उस किनारे से फिर एक बार जोर से हँसे। तभी झूला खींचने वालों में एक लड़का मचान से उतरकर हमारे पास आ गया। वह ऐसे बात करने लगा जैसे अभी-अभी कोई दुर्घटना होकर हटी हो।

“मिस साहब,” उसने कहा, यह वही सुदर्शन है, जिसने आपके कुत्ते को कुछ खिलाया था। यह अब भी शरारत करने से बाज नहीं आता।”

उन व्यक्तियों के हँसने और छींकने का मिस पाल पर उतना असर नहीं हुआ था जितना उस लड़के की बात का हुआ था। उसका चेहरा एकदम से उतर गया और आवाज खुश्क हो गई।

“यह उधर के गाँव का आदमी है न?” उसने पूछा।

“हाँ, मिस साहब !”

“तुम पोस्टमास्टर को बताना। वे अपने-आप इसे ठीक कर लेंगे।”

“मिस साहब, यह हमसे कहता है कि यह मिस साहब… !”

“तुम इस वक्त जाओ अपना काम करो,” मिस पाल उसे झिड़ककर बोली, “पोस्टमास्टर से कहना वे इसे एक दिन में ठीक कर देंगे।”

“मगर मिस साहब… !”

“जाओ, फिर कभी उधर आकर बात करना।”

लड़के की समझ में नहीं आया कि मिस साहब से बात करने में उस समय उससे क्या अपराध हुआ है। वह सिर लटकाए हुए चुपचाप वहाँ से लौट गया।

कुछ देर हम लोग वहीं रुके रहे। मिस पाल जैसे थकी हुई-सी सड़क के किनारे एक बड़े-से पत्थर पर बैठ गई। मैं दरिया के उस पार पहाड़ की चोटी पर उगे हुए वृक्षों की लंबी पंक्ति को देखने लगा, जो नीले आकाश और गुब्बारे जैसे सफेद बादलों के बीच खिंची हुई लकीर-सी लगती थी। दरिया के दोनों तरफ पुल के सलेटी खंभे खड़े थे, जिन पर अभी पुल नहीं बना था। खम्भों के आसपास से झड़कर थोड़ी-थोड़ी मिट्टी दरिया में गिर रही थी। मैंने उधर से आँखें हटाकर मिस पाल की तरफ देखा। मिस पाल मेरी तरफ देख रही थी। शायद वह जानना चाहती थी कि झूले वाले लड़के की बात का मेरे मन पर क्या प्रभाव पड़ा है।

“तो आगे चलें?” मुझसे आँखें मिलते ही उसने पूछा।

“हाँ, चलो।”

मिस पाल उठ खड़ी हुई। उसकी साँस कुछ-कुछ फूल रही थी। वह चलती हुई मुझे बताने लगी कि वहाँ के लोगों में कितनी तरह के अंधविश्वास हैं। जब पिंकी बीमार हुआ तो वहाँ के लोगों ने सोचा था कि किसी ने उसे कुछ खिला-विला दिया है।

“ये अनपढ़ लोग हैं। मैंने इनकी बातों का विरोध भी नहीं किया। ये लोग अपने अंधविश्वास एक दिन में थोड़े ही छोड़ सकते हैं ! इस चीज में जाने अभी कितने बरस लगेंगे !”

और रास्ते में चलते हुए वह बार-बार मेरी तरफ देखती रही कि मुझे उसकी बात पर विश्वास हुआ है या नहीं। मैंने सड़क से एक छोटा-सा पत्थर उठा लिया था और चुपचाप उसे उछालने लगा था। काफी देर तक हम लोग खामोश चलते रहे। वह खामोशी मुझे अस्वाभाविक लगने लगी तो मैंने मिस पाल से वापस घर चलने का प्रस्ताव किया।

“चलो, चलकर तुम्हारी बनाई हुई नई तस्वीरें ही देखी जाएँ,” मैंने कहा, “इन तीन-चार महीनों में तो तुमने काफी काम कर लिया होगा।”

“पहले घर चलकर एक-एक प्याली चाय पीते हैं,” मिस पाल बोली, “सचमुच इस समय मैं चाय की गरम प्याली के लिए जिंदगी की कोई भी चीज कुर्बान कर सकती हूँ। मेरा तो मन था कि घर से चलने से पहले ही एक-एक प्याली पी लेते, मगर फिर मैंने कहा कि पोस्टमास्टर से कहने में देर हो जाएगी तो मछलीवाला निकल जाएगा।”

इस बात ने मेरे मन को थोड़ा गुदगुदा दिया कि तीन महीने में आया हुआ पहला मेहमान उस समय मिस पाल के लिए अपनी तस्वीरों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।

लौटकर कॉटेज में पहुँचते ही मिस पाल चाय बनाने में व्यस्त हो गई। वह आते हुए काफी थक गई थी, क्योंकि जरा-सी चढ़ाई चढ़ने में ही उसकी साँस फूलने लगती थी, मगर वह जरा देर भी सुस्ताने के लिए नहीं रुकी। चाय के लिए उसकी यह व्यस्तता मुझे बहुत अस्वाभाविक लगी, शायद इसलिए कि मुझे खुद चाय की जरूरत महसूस नहीं हो रही थी। मिस पाल इस तरह चम्मचों और प्यालियों को ढूँढ़ने के लिए परेशान हो रही थी, जैसे उसके दस मेहमान चाय का इंतजार कर रहे हों और उसे समझ न आ रहा हो कि कैसे जल्दी से सारा इंतजाम करे।

मैं घूमकर कमरे में और बरामदे में लगी हुई तस्वीरों को देखने लगा। जिस-जिस तस्वीर पर भी मेरी नजर पड़ी,मुझे लगा वह मेरी पहले की देखी हुई है। कुछ बड़ी तस्वीरें थीं जो मिस पाल पंजाब के एक मेले से बनाकर लाई थी। वह अजीब-अजीब-से चेहरे थे, जिन पर हम लोग एक बार फब्तियाँ कसते रहे थे। जाने क्यों, मिस पाल अपने चित्रों के लिए सदा ऐसे ही चेहरे चुनती थी जो किसी-न-किसी रूप में विकृत हों ! मैंने सारा कमरा और बरामदा घूम लिया। दो-एक अधूरी तस्वीरों को छोड़कर मुझे एक भी नई चीज दिखाई नहीं दी मैंने रसोईघर में जाकर मिस पाल से पूछा कि उसकी नई तस्वीरें कहाँ हैं।

“अजी छोड़ो भी,” मिस पाल प्यालियाँ धोती हुई बोली, “चाय की प्याली पीकर हम लोग ऊपर की तरफ घूमने चलते हैं। ऊपर एक बहुत पुराना मंदिर है। वहाँ का पुजारी तुम्हें ऐसे-ऐसे किस्से सुनाएगा कि तुम सुनकर हैरान रह जाओगे। एक दिन वह बता रहा था कि यहाँ कुछ मंदिर ऐसे हैं, जहाँ लोग पहले तो देवता से वर्षा के लिए प्रार्थना करते हैं, मगर बाद में अगर देवता वर्षा नहीं देता तो उसे हिडिंबा के मंदिर में ले जाकर रस्सी से लटका देते हैं। है नहीं मजेदार बात? जो देवता तुम्हारा काम न करे, उसे फाँसी लगा दो। मैं कहती हूँ रणजीत, यहाँ लोगों में इतने अंधविश्वास हैं, इतने अंधविश्वास हैं कि क्या कहा जाए ! ये लोग अभी तक जैसे कौरवों-पांडवों के जमाने में ही जीते हैं, आज के जमाने से इनका कोई संबंध ही नहीं है।”

और एक बार उड़ती नजर से मुझे देखकर वह चीनी ढूँढ़ने में व्यस्त हो गई। “अरे चीनी कहाँ चली गई? अभी हाथ में थी, और अभी न जाने कहाँ रख दी? देखो, कैसी भुलक्कड़ हो गई हूँ ! मेरा तो बस एक ही इलाज है कि कोई हाथ में छड़ी लेकर मुझे ठीक करे। यह भी कोई रहने का ढंग है जैसे मैं रहती हूँ?”

“तुमने यहाँ के कुछ लैंडस्केप नहीं बनाए?” मैंने पूछा।

“तस्वीरें तो बहुत-सी शुरू कर रखी हैं, पर अभी तक पूरी नहीं कर सकी,” मिस पाल जैसे उस मुश्किल स्थिति से बचने का प्रयत्न करती हुई बोली, “अब किसी दिन लगकर सबकी-सब तस्वीरें पूरी करूँगी। तारपीन का तेल भी खत्म हो चुका है, किसी दिन जाकर लाना है। कई दिनों से सोच रही थी कि मंडी जाकर कैनवस और रंग भी ले आऊँ, पर यूँ ही आलस कर जाती हूँ। कुछ ड्राइंग पेपर भी जिल्द कराने हैं। अब जाऊँगी किसी दिन और सारे काम एक साथ ही कर आऊँगी।”

बात करते हुए मिस पाल की आँखें झुकी जा रही थीं, जैसे वह अपने ही सामने किसी चीज के लिए अपराधी हो, और लगातार बात करके अपने अपराध के अनुभव को छिपाना चाहती हो। मैं चुप रहकर उसे चाय में चीनी मिलाते देखता रहा। उसे देखते हुए उस समय मेरे मन में कुछ वैसी उदासी भरने लगी जैसी एक निर्जन समुद्र-तट पर या ऊँची पहाड़ियों से घिरी हुई किसी एकांत पथरीली घाटी में जाकर अनायास मन में भर जाती है।

“कल से एक तो मैं अपने घर को ठीक करूँगी,” मिस पाल क्षण-भर बाद फिर उसी तरह बिना रुके बात करने लगी, “एक तो घर का सारा सामान ठीक ढंग से लगाना है। तुम्हें पता है, मैंने कितने चाव से दिल्ली में अपने कमरे के लिए जाली के पर्दे बनवाए थे? वे पर्दे यहाँ ज्यों-के-त्यों बक्स में बंद पड़े हैं; मेरा लगाने को मन ही नहीं हुआ। मैं कल ही तरखान से कहकर पर्दों के लिए चौखटे बनवाऊँगी। खाने-पीने का थोड़ा-बहुत सामान भी घर में रखना ही चाहिए; बिस्कुट, मक्खन, डबलरोटी और अचार का होना तो बहुत ही जरूरी है। जो चीजें कुल्लू से मिल जाती हैं वे तो मैं लाकर रख ही सकती हूँ।…तारपीन का तेल भी मुझे कुल्लू से ही मिल जाएगा।”

उसने चाय की प्याली मेरे हाथ में दे दी तो भी मेरे मुँह से कोई बात नहीं निकली, और मैं चुपचाप छोटे-छोटे घूँट भरने लगा। मेरे मन को उस समय एक तरह की जड़ता ने घेर लिया था। कहाँ मिस पाल के बारे में दिल्ली के लोगों से सुनी हुई वे सब बातें और कहाँ उसके जीवन की यह एकांत विडंबना!

ट्राउट मछली ! मिस पाल की सारी परेशानी के बावजूद उस दिन उसे ट्राउट नहीं मिल सकी। पोस्टमास्टर ने बताया कि मछलीवाला उस दिन आया ही नहीं। मिस पाल के बहुत-बहुत खुशामद करने पर भी मकान-मालकिन का चौकीदार बाली दरिया से मछली पकड़ने के लिए राजी नहीं हुआ। उसने कहा कि वह अपनी छड़ी पॉलिश कर रहा है, उसे फुरसत नहीं है। मिसेज एटकिन्सन के बच्चों ने एक मछली पकड़ी थी। मगर उसके पति ने उस दिन खासतौर पर मछली की कतलियों के लिए कहा था, इसलिए वह अपनी मछली मिस पाल को नहीं दे सकती थी। हाँ,पोस्टमास्टर ने फ्रेंच बीन जरूर भेज दिए। चावल और सूखे फ्रेंच बीन ! रात की रोटी के लिए मिस पाल का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया। खाना बनाने में उसका मन भी नहीं लगा, जिससे चावल थोड़ा नीचे लग गए। खाना खाते समय मिस पाल बस अफसोस ही प्रकट करती रही।

“मैं बहुत बदकिस्मत हूँ रणजीत, हर लिहाज से मैं बहुत ही बदकिस्मत हूँ” खाना खाने के बाद हम लोग बाहर मैदान में कुर्सियाँ निकालकर बैठ गए तो उसने कहा। वह सिर के पीछे हाथ रखे आकाश की ओर देख रही थी। बारहीं या तेरहीं की रात होने से आकाश में तीन तरफ खुली चाँदनी फैली थी। ब्यास की आवाज वातावरण में एक गूँज पैदा कर रही थी। वृक्षों की सरसराहट के अतिरिक्त मैदान की घास से भी एक धीमी-सी सरसराहट निकलती प्रतीत होती थी। हवा तेज थी और सामने पहाड़ के पीछे से उठता हुआ बादल धीरे-धीरे चाँद की तरफ सरक रहा था।

“क्या बात है मिस पाल, तुम इस तरह गुमसुम क्यों हो रही हो?” मैंने कहा, “चावल थोड़े खराब हो गए, तो इसमें इस तरह उदास होने की क्या बात है !”

मिस पाल सामने पहाड़ की धुँधली रेखा को देखती रही, जैसे उसमें कोई चीज खोज रही हो।

“मैं सोचती हूँ रणजीत कि मेरे जीने का कोई भी अर्थ नहीं है,” उसने कहा।

और वह मुझे अपने आरंभिक जीवन की कहानी सुनाने लगी। उसे बहुत बड़ी शिकायत थी कि आरंभ में अपने घर में भी उसे जरा सुख नहीं मिला, यहाँ तक कि अपने माता-पिता का स्नेह भी उसे नहीं मिला। उसकी माँ ने- उसकी अपनी माँ ने- भी उसे प्यार नहीं किया। इसी वजह से पंद्रह साल पहले वह अपना घर छोड़कर नौकरी करने के लिए निकल आई थी।

“सोचो, माँ को मेरा घर में होना ही बुरा लगता था। पिताजी को मेरे संगीत सीखने से चिढ़ थी। वे कहा करते थे कि मेरा घर-घर है रंडीखाना नहीं। भाइयों का जो थोड़ा-बहुत प्यार था, वह भी भाभियों के आने के बाद छिन गया। मैंने आज तक कितनी-कितनी मुश्किल से अपनी अ…पवित्रता को बचाया है, यह मैं ही जानती हूँ। तुम सोच सकते हो कि एक अकेली लड़की के लिए यह कितना मुश्किल होता है। मेरा लाहौर की तरफ घूमने जाने को मन था; वहाँ की कुछ तस्वीरें बनाना चाहती थी, मगर मैं वहाँ नहीं गई, क्योंकि मैं सोचती थी कि मर्द की पशु-शक्ति के सामने .. अ…मैं अकेली क्या कर सकूँगी। फिर, तुम्हें पता है कि डिपार्टमेंट के लोग वहाँ मेरे बारे में कैसी बुरी-बुरी बातें किया करते थे। इसीलिए मैं कहती हूँ कि मुझे वहाँ के एक-एक आदमी से नफरत है। वे तुम्हारे बुखारिया और मिर्जा और जोरावर सिंह। मैं तो कभी ऐसे लोगों के साथ बैठकर एक प्याली चाय भी पीना पसंद नहीं करती थी। तुम्हें याद है, एक बार जब जोरावर सिंह ने मुझसे कहा था…”

और फिर वह दफ्तर के जीवन की कई छोटी-छोटी घटनाएँ दोहराने लगी। जब मैंने देखा कि वह फिर से उसी वातावरण में जाकर खामखाह अपना गुस्सा भड़का रही है तो मैंने उससे फिर कहा कि वह अब दफ्तर के लोगों के बारे में न सोचे, अपने संगीत और अपने चित्रों की बात ही सोचे।

“तुम यहाँ रहकर कुछ अच्छी-अच्छी चीजें बना लो, फिर दिल्ली आकर अपनी प्रदर्शनी करना।” मैंने कहा, “जब लोग तुम्हारी चीजें देखेंगे और तुम्हारा नाम सुनेंगे तो अपने-आप तुम्हारी कद्र करेंगे।”

“न, मैं प्रदर्शनी-अदर्शनी के किसी चक्कर में नहीं पड़ूँगी।” मिस पाल उसी तरह सामने की तरफ देखती हुई बोली, “तुम जानते ही हो इन सब चीजों में कितनी पॉलिटिक्स चलती है। मैं उस पॉलिटिक्स में नहीं पड़ना चाहती। मेरे पास अभी तीन-चार हजार रुपए हैं, जिनसे मेरा काफी दिन गुजारा चल जाएगा। जब ये रुपए चुक जाएँगे, तो…” और वह जैसे कुछ सोचती हुई चुप कर गई।

मैं आगे की बात सुनने के लिए बहुत उत्सुक था। मगर मिस पाल कुछ देर बाद कंधे हिलाकर बोली, “…तो भी कुछ-न-कुछ हो ही जाएगा। अभी वह वक्त आए तो सही।”

बादल ऊँचा उठ रहा था और वातावरण में ठंडक बढ़ती जा रही थी। जंगल की तरफ से आती हुई हवा की गूँज शरीर में बार-बार सिहरन भर देती थी। साथ के कॉटेज में रेडियो पर पश्चिमी संगीत चल रहा था। उससे आगे के कॉटेज में लोग खिलखिलाकर हँस रहे थे। मिस पाल अपनी आँखें मूँदें हुए मुझे बताने लगी कि “होशियारपुर में उसने भृगुसंहिता से अपनी कुंडली निकलवाई थी। उस कुंडली के फल के अनुसार इस जन्म में उस पर यह शाप है कि उसे कोई सुख नहीं मिल सकता- न धन का, न ख्याति का, न प्यार का। इसका कारण भी भृगुसंहिता में दिया था। अपने पिछले जन्म में वह सुंदर लड़की थी और नृत्य-संगीत आदि कलाओं में बहुत पटु थी। उसके पिता बहुत धनी थे और वह उनकी अकेली संतान थी। जिस व्यक्ति से उसका ब्याह हुआ वह बहुत सुंदर और धनी था। “मगर मुझे अपनी सुंदरता और अपनी कला का बहुत मान था, इसलिए मैंने अपने पति का आदर नहीं किया। कुछ ही दिनों में वह बेचारा दुखी होकर इस संसार से चल बसा। इसीलिए मुझ पर अब यह शाप है कि इस जन्म में मुझे सुख नहीं मिल सकता।”

मैं चुपचाप उसे देखता रहा। अभी दिन में ही वह वहाँ के लोगों के अंधविश्वासों की चर्चा करती हुई उनका मजाक उड़ा रही थी। सहसा मिस पाल भी बोलते-बोलते चुप कर गई और उसकी आँखें मेरे चेहरे पर स्थिर हो गईं। उसके लिपस्टिक से रँगे हुए ओठों की तह में जैसे उस समय कोई चीज काँप रही थी। काफी देर हम लोग चुप बैठे रहे। बादल ने चाँद को छा लिया था और चारों तरफ गहरा अँधेरा हो रहा था। सहसा साथ के कॉटेज की बत्ती भी बुझ गई, जिससे अँधेरा और भी गहरा लगने लगा।

मिस पाल उसी तरह मेरी तरफ देख रही थी। मुझे महसूस होने लगा कि मेरे आसपास की हवा कुछ भारी हो रही है। मैं सहसा कुर्सी पीछे सरकाकर उठ खड़ा हुआ।

“मेरा ख्याल है, अब रात काफी हो गई है,” मैंने कहा, “इसलिए अब चलकर सो रहा जाए। और बातें अब सुबह होंगी।”

“हाँ-हाँ,” मिस पाल भी अपनी कुर्सी से उठती हुई बोली, “मैं अभी चलकर बिस्तर बिछा देती हूँ। तुम बताओ, तुम्हारा बिस्तर बरामदे में बिछा दूँ या…”

“हाँ, बरामदे में ही बिछा दो। अंदर काफी गरमी होगी।”

“देख लो, रात को ठंड हो जाएगी।”

“कोई बात नहीं, बरामदे में हवा आती रहेगी तो अच्छा लगेगा।”

और बरामदे में लेटे हुए मैं देर तक जाली के बाहर देखता रहा। बादल पूरे आकाश में छा गया था और दरिया का शब्द बहुत पास आया-सा लगता था। जाली से लगा हुआ मकड़ी का जाला हवा से हिल रहा था। पास ही कोई चूहा कोई चीज कुतर रहा था। अंदर कमरे से बार-बार करवट बदलने की आवाज सुनाई दे जाती थी।

“रणजीत!” अंदर से आवाज आई तो मेरे सारे शरीर में एक सिहरन भर गई।

“मिस पाल !”

“सर्दी तो नहीं लग रही?”

“नहीं, बल्कि हवा है, इसलिए अच्छा लग रहा है।”

और तभी टप्‌-टप्‌-टप्‌-टप्‌ मोटी-मोटी बूँदें पड़ने लगीं। पानी की बौछार मेरे बिस्तर पर आने लगी तो मैंने करवट बदली। बरामदे की बत्ती मैंने जलती रहने दी थी, इसलिए कई चीजें इधर-उधर बिखरी नजर आ रही थीं। बिस्तर बिछाते समय मिस पाल को घर की काफी उथल-पुथल करनी पड़ी थी। मेरी चारपाई के पास ही एक तिपाई औंधी पड़ी थी और उससे जरा आगे तस्वीरों के कुछ एक फ्रेम रास्ते में गिरे थे। सामने के कोने में मिस पाल के ब्रश और कपड़े एक ढेर में उलझे हुए पड़े थे।

अंदर की चारपाई चिरमिराई और लकड़ी के फर्श पर पैरों की धप्-धप्‌ आवाज सुनाई देने लगी। फिर सुराही से चुल्लू में पानी पीने की आवाज आने लगी।

“रणजीत !”

“मिस पाल !”

“प्यास तो नहीं लगी?”

“नहीं।”

“अच्छा, सो जाओ।”

कुछ देर मुझे लगता रहा जैसे मेरे आसपास एक बहुत तेज साँस चल रही है जो धीरे-धीरे दबे पैरों, सारे वातावरण पर अधिकार करती जा रही है, और आसपास की हर चीज अपने पर उसका दबाव महसूस कर रही है। पानी की बौछार कुछ धीमी पड़ने लगी तो मैंने फिर से जाली की तरफ करवट बदल ली और पहले की तरह ही बाहर देखने लगा। तभी पास ही झन्न से किसी चीज के गिरने की आवाज सुनाई दी।

“क्या गिरा है रणजीत?” अंदर से आवाज आई।

“पता नहीं, शायद किसी चूहे ने कुछ गिरा दिया है।”

“सचमुच मैं यहाँ चूहों से बहुत तंग आ गई हूँ।”

मैं चुप रहा। अंदर की चारपाई फिर चिरमिराई।

“अच्छा, सो जाओ!”

सारी रात पानी पड़ता रहा। सुबह-सुबह, वर्षा थम गई, मगर आकाश साफ नहीं हुआ। सुबह उठकर चाय के समय तक मेरी मिस पाल से खास बात नहीं हुई। चाय पीते समय भी मिस पाल अधूरे-अधूरे टुकड़ों में ही बात करती रही। मैंने उससे कहा कि मैं अब पहली बस से चला जाऊँगा तो उसने एक बार भी मुझसे रुकने के लिए आग्रह नहीं किया। यूँ साधारण बातचीत में भी मिस पाल काफी तकल्लुफ बरत रही थी, जैसे किसी बिलकुल अपरिचित व्यक्ति से बात कर रही हो। मुझे उसका सारा व्यवहार बहुत अस्वाभाविक लग रहा था। वह जैसे बात न करने के लिए ही अपने को छोटे-छोटे कामों में व्यस्त रख रही थी। मैंने दो-एक बार उससे हल्के-से मजाक करने का भी प्रयत्न किया जिससे तनाव हट जाए और मैं उससे ठीक से विदा लेकर जा सकूँ, मगर मिस पाल के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कराहट भी नहीं आई।

“अच्छा तो मिस पाल, अब चलने की बात की जाए,” आखिर मैंने कहा, “तुम कल कह रही थीं कि तुम भी कुल्लू तक साथ ही चलोगी। तो अच्छा होगा कि तुम आज ही वहाँ से अपना सारा सामान भी ले आओ। बाद में तुम फिर आलस कर जाओगी।”

“नहीं, मैं आलस नहीं करूँगी,” मिस पाल बोली, “किसी दिन जाकर जो-जो कुछ लाना है सब ले आऊँगी।”

और फिर बरामदे में बिखरे हुए कपड़ों को बिना मतलब ही उठाकर इधर से उधर रखते हुए उसने कहा, “आज बरसात का दिन है, इसलिए आज नहीं जाऊँगी। कल या परसों किसी समय देखूँगी। लाने के लिए कितनी ही चीजें हैं, इसलिए अच्छी तरह सब सोचकर जाना चाहिए। आज घिरा हुआ दिन है, इसलिए आज नहीं…।”

“घिरा हुआ दिन है तो क्या घर का सामान नहीं आएगा?” मैंने अपने आग्रह से उसे सुलझाने की चेष्टा करते हुए कहा, “तुम मुझे बताओ कि घी और तारपीन के डिब्बे कहाँ रखे हैं। कोई बड़ा थैला हो तो वह भी साथ में ले लो। फुटकर चीजें उसमें आ जाएँगी। यहाँ से जो भी बस मिलेगी, उसमें हम लोग साथ-साथ चले चलेंगे। मैं कुल्लू से बारह बजे की बस पकड़कर आगे चला जाऊँगा। तुम्हें तो उधर से लौटने के लिए सारा दिन बसें मिलती रहेंगी।”

मैं जान-बूझकर इस तरह बात कर रहा था जैसे मिस पाल का साथ चलना निश्चित ही हो, हालाँकि मैं जानता था कि वह टालने का पूरा प्रयत्न करेगी। मिस पाल इधर से उधर जाती हुई ढूँढ़-ढूँढकर अपने करने के लिए काम निकाल रही थी। उसके चेहरे से लग रहा था जैसे मेरी बातें उसे बिलकुल व्यर्थ लग रही हों और वह जल्द-अज-जल्द अपने एकांत में लौट जाना चाहती हो।

“देखो, कभी-कभी यहाँ बस में एक भी सीट नहीं मिलती,” उसने कहा, “दो-दो सीटें मिलना तो बहुत ही मुश्किल है। तुम मेरी वजह से अपनी बारह बजे की बस क्यों मिस करते हो? तुम चले जाओ, मैं कल या परसों जाकर जो कुछ भी मुझे लाना है ले आऊँगी।” और जैसे सहसा कोई काम याद आ जाने से वह जल्दी से अपना चेहरा दूसरी तरफ हटाए हुए कमरे में चली गई। कुछ देर में वह पेटीकोट लिए हुए कमरे से बाहर आई। पेटीकोट को टिड्डियाँ काट गई थीं। उसने जैसे नुकसान की परेशानी की वजह से ही चेहरा सख्त किए हुए उसे एक तरफ कोने में फेंक दिया और किसी तरह कठिनाई से बोली, “मैंने तुमसे कह दिया है कि तुम चले जाओ। तुम्हें पता है कि मुझे तो अकेली को ही दो सीटें चाहिए।”

“ये सब बहाने तुम रहने दो,” मैंने कहा, “एक बस में जगह नहीं मिलेगी तो दूसरी में मिल जाएगी। तुम इधर आकर मुझे बताओ कि वे डिब्बे कहाँ रखे हैं।”

मिस पाल शायद ज्यादा बात नहीं करना चाहती थी, इसलिए उसने मेरी बात का विरोध नहीं किया।

“अच्छा तुम बैठो, मैं अभी ढूँढ़ती हूँ।” उसने कहा और आँखें बचाती हुई रसोईघर में चली गई।

पहली बस में सचमुच हम लोगों को जगह नहीं मिली। ड्राइवर ने बस वहाँ रोकी ही नहीं, और हाथ के इशारे से कह दिया कि बस में जगह नहीं है। दूसरी बस में भी जगह नहीं थी, मगर किसी तरह कह-कहाकर हमने उसमें अपने लिए जगह बना ली। मगर हम कुल्लू काफी देर से पहुँचे, क्योंकि रात की बरसात से एक जगह सड़क टूट गई थी और उसकी मरम्मत की जा रही थी। हमारे कुल्लू पहुँचने के लगभग साथ ही बारह बजे की बस भी मनाली से आ पहुँची। पौने बारह हो चुके थे। मैंने अंदर जाकर अपने सामान का पता किया, फिर बाहर मिस पाल के पास आ गया। मिस पाल ने खाली डिब्बे अपने दोनों हाथों में सँभाल रखे थे। मैं डिब्बे उसके हाथों से लेने लगा तो उसने अपने हाथ पीछे हटा लिए।

“चलो, पहले बाजार में चलकर तुम्हारा सामान खरीद लें,” मैंने कहा।

“अब सामान की बात रहने दो।” उसने कहा, “तुम्हारी बस आ गई है, तुम इसमें चले जाओ। सामान तो मैं किसी भी समय खरीद लूँगी। तुम्हें इसके बाद फिर किसी बस में जगह नहीं मिलेगी। दो बजे की बस मनाली से ही भरी हुई आती है। तुम्हारा एक दिन और यहाँ खराब होगा।”

“दिन खराब होने की क्या बात है।” मैंने कहा, “पहले चलकर बाजार से सामान खरीद लेते हैं। अगर आज सचमुच किसी बस में जगह नहीं मिली तो मैं तुम्हारे साथ लौट चलूँगा और कल किसी बस से चला जाऊँगा। मुझे वापस पहुँचने की ऐसी कोई जल्दी नहीं है।”

“नहीं तुम चले जाओ,” मिस पाल हठ के साथ बोली, “अपने लिए खामखाह मैं तुम्हें क्यों परेशान करूँ? अपना सामान तो मैं जब कभी भी ले लूँगी।”

“मगर मुझे लगता है कि आज तुम ये डिब्बे इसी तरह लिए हुए ही लौट जाओगी।”

“अरे नहीं,” मिस पाल की आँखें उमड़ आयीं और वह अपने आँसुओं को रोकने के लिए दूसरी तरफ देखने लगी, “तुम समझते हो मैं अपने शरीर की देखभाल ही नहीं करती। अगर न करती तो यह इतना शरीर ऐसे ही होता?…लाओ पैसे दो मैं तुम्हारा टिकट ले आती हूँ। देर करोगे तो इस बस में भी जगह नहीं मिलेगी।”

“तुम इस तरह जिद क्यों करती हो मिस पाल ? मुझे जाने की सचमुच ऐसी कोई जल्दी नहीं है।” मैंने कहा।

“मैंने तुमसे कहा है, तुम पैसे निकालो, मैं तुम्हारा टिकट ले आ…। मगर नहीं, तुम रहने दो। कल का तुम्हारा टिकट मेरी वजह से खराब हुआ था। मैं फिर तुमसे पैसे किसलिए माँग रही हूँ?”

और वह डिब्बे वहीं रखकर झटपट टिकट घर की तरफ बढ़ गई।

“ठहरो, मिस पाल,” मैंने असमंजस में अपना बटुआ जेब से निकाल लिया।

“तुम रुको, मैं अभी आ रही हूँ। तुम उतनी देर में अपना सामान निकलवाकर ऊपर रखवाओ।

मेरा मन उस समय न जाने कैसा हो रहा था, फिर भी मैंने अंदर से अपना सामान निकलवाया और बस की छत पर रखवा दिया। मिस पाल तब तक टिकटघर के बाहर ही खड़ी थी। शनिवार होने के कारण उस दिन स्कूल में जल्दी छुट्टी हो गई थी और बहुत-से बच्चे बस्ते लटकाए सुलतानपुर की पहाड़ी से नीचे आ रहे थे। कई बच्चे बस की सवारियों को देखने के लिए वहाँ आसपास जमा हो रहे थे। मिस पाल उस समय प्याजी रंग की सलवार-कमीज पहने थी और ऊपर काला दुपट्‌टा लिए थी। उन कपड़ों की वजह से उसका शरीर पीछे से और भी फैला हुआ लगता था। बच्चे एक-दूसरे से आगे होते हुए टिकट घर के नजदीक जाने लगे। मिस पाल टिकट घर की खिड़की पर झुकी हुई थी। एक लड़के ने धीरे-से आवाज लगाई, “कमाल है भई कमाल है !”

इस पर आसपास खड़े बहुत-से बच्चे हँस दिए। मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे भारी मन पर एक और बड़ा पत्थर डाल दिया हो। बच्चे सबके सब टिकट घर के आसपास जमा हो गए थे और आपस में खुसर-पुसर कर रहे थे। मैं उनसे कुछ कह भी नहीं सकता था, क्योंकि उससे मिस पाल का ध्यान खामखाह उनकी तरफ चला जाता। मैं उधर से अपना ध्यान हटाकर दरिया की तरफ से आते हुए लोगों को देखने लगा। फिर भी बच्चों की खुसर-पुसर मेरे कानों में पड़ती रही। दो लड़कियाँ बहुत धीरे-धीरे आपस में बात कर रही थीं, “मर्द है।”

“नहीं, औरत है।”

“तू सिर के बाल देख, बाकी शरीर देख। मर्द है।”

“तू कपड़े देख, और सब कुछ देख। औरत है।”

“आओ, बच्चो आओ, पास आकर देखो,” मिस पाल की आवाज से मैं जैसे चौंक गया। मिस पाल टिकट लेकर खिड़की से हट आई थी। बच्चे उसे आते देखकर ‘आ गई, आ गई’ कहते भाग खड़े हुए। एक बच्चे ने सड़क के उस तरफ जाकर फिर जोर से आवाज लगाई, “कमाल है भई कमाल है !”

मिस पाल सड़क पर आकर कई कदम बच्चों के पीछे चली गई।

“आओ बच्चों, यहाँ हमारे पास आओ,” वह कहती रही, “हम तुम्हें मारेंगे नहीं, टॉफियाँ देंगे। आओ…”

मगर बच्चे पास आने के बजाय और भी दूर भाग गए। मिस पाल कुछ देर सड़क के बीच रुकी रही, फिर लौटकर मेरे पास आ गई। उस समय उसके चेहरे का भाव बहुत विचित्र लग रहा था। उसकी आँखों में आए हुए आँसू नीचे गिरने को हो रहे थे और उन्हें झुठलाने के लिए एक फीकी हँसी का प्रयत्न कर रही थी। उसने अपने ओठों को जाने किस तरह काटा था कि एकाध जगह से उसकी लिपस्टिक नीचे फैल गई थी। उसकी घिसी हुई कमीज की सीवनें कंधे के पास से खुल रही थीं।

“खूबसूरत बच्चे थे; नहीं?” उसने आँखें झपकाते हुए कहा।

मैंने उसकी बात का समर्थन करने के लिए सिर हिलाया तो मुझे लगा कि मेरा सिर पत्थर की तरह भारी हो गया है। उसके बाद मेरी समझ में कुछ नहीं आया कि मिस पाल मुझसे क्या कह रही है और मैं उससे क्या बात कर रहा हूँ; जैसे आँखों और शब्दों के साथ विचारों का कोई संबंध ही नहीं रहा था। मुझे इतना याद है कि मैंने मिस पाल को टिकट के पैसे देने का प्रयत्न किया, मगर वह पीछे हट गई और मेरे बहुत अनुरोध करने पर भी उसने पैसे नहीं लिए। मगर किस अवचेतन प्रक्रिया से हम लोगों के बीच अब तक बातचीत का सूत्र बना रहा, यह मैं नहीं जान सका। मेरे कान उसे बोलते सुन रहे थे और अपने को भी। परन्तु वे जैसे दूर की ध्वनियाँ थीं- अस्फुट, अस्पष्ट और अर्थहीन। जो बात मैं ठीक से सुन सका वह यही थी, “और वहाँ जाकर रणजीत, दफ्तर में मेरे बारे में किसी से बात मत करना। समझे? तुम्हें पता ही है कि वे लोग कितने ओछे हैं। बल्कि अच्छा होगा कि तुम किसी को यह भी न बताओ कि तुम मुझे यहाँ मिले थे। मैं नहीं चाहती कि वहाँ कोई भी मेरे बारे में कुछ जाने या बात करे। समझे।”

बस तब स्टार्ट हो रही थी और मैं खिड़की से झाँककर मिस पाल को देख रहा था। बस चली तो मिस पाल हाथ हिलाने लगी। दोनों खाली डिब्बे वह अपने हाथों में लिए हुए थी। मैंने भी एक बार उसकी तरफ हाथ हिलाया और बस के मुड़ने तक हिलते हुए खाली डिब्बों को ही देखता रहा।

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खैरा पीपल कभी न डोले -शिवप्रसाद सिंह

अनुमानित समय : 16 मिनट-

चाहे धूल-भरा अन्धड़ हो, चाहे ताज़ा-ताज़ा, साफ़ आसमान, गांव की तरफ़ नज़र उठती, तो वह ज़रूर उस बूढ़े पीपल से टकराती, जो दक्खिन को जानेवाले छोर पर खड़ा जाने कब से आसमान को निहार रहा है। हां, जब आसमान घिरा होता, ऊदे-ऊदे बादल झुककर गांव की बंसवारियों को दुलराने लगते, तो वह पहले से कहीं ज़्यादा हरा-भरा लगता। एक साथ कई साल जैसे उसकी उम्र से अलग हो जाते और उसकी बूढ़ी नसों में जवानी का ज्वार मचलने लगता।

        पुरुषोत्तम काका को मरे अभी कै दिन हुए, पर शायद ही किसी को उनकी याद आती हो। जब वह ज़िन्दा थे, तो लगता था कि उनके बिना गांव ज़िन्दा नहीं रह सकता। गलियों के मोड़, चौमुंहानियों के चौबारे, कुएं की जगतें उनकी बेलाग हंसी के हिचकोलों से घण्टों गूंजती रहतीं। पर जब पुरुषोत्तम काका उठ गये, तो लोग-बाग उन्हें यों भूल गये, गोया वे लोगों को हंसते देख कभी हंसे ही न हों। यही हाल तुलसी बुढ़िया का हुआ, जाऊ खट्टिक का और जगरोपन साहू का भी। ये सभी ढोल की थाप पर जुड़ते हुए तमाशे की तरह आये और धरम की चादर पर यादगारों के दो-चार दाने फैलाकर चले गये। मैं तो गांव के इन छोकरों पर हैरान हूं कि जो सुबह से शाम तक इन भलेमानसों के चारों ओर हाथ में हाथ फंसाये चक्कर लगाया करते थे और जिनके दिलों की ख़ुशियां कबूतरों की तरह फड़फड़ाती हुई पुरुषोत्तम काका या तुलसी बुढ़िया के क़हक़हों के अड्डों पर हमेशा मंडराया करती थीं, वे भी इन्हें इस तरह बिल्कुल कैसे भूल गये? जब भी मैं इनके भूलने की बात सोचता हूं, तो मन बहुत उदास हो जाता है।

        फागुन बीतते-बीतते हवा में गरमी की लहर बढ़ जाती और वह पेड़ों के पुराने पत्तों को अपने तेज़ नाखूनों से बुरी तरह कुटकने लगती। हलका-सा झोंका लचककर घुमड़ता और पेड़ों के पत्ते टूटे हुए परों की तरह चारों ओर बिखर जाते। बगूलों की लपेट में सरसराते पत्ते आकाश की गहराई में चीख़ते और धूल की धुंधली चादर नंगी डालों को अपने आगोश में छिपा लेती।

        और अब धीरे-धीरे हवा थोड़ी संभल जाती। उसमें शोख़ियों की जगह मादकता आ जाती, थोड़ा कसैला-सा ठहराव आ जाता, छुवन में झनझनाहट नहीं, उत्तेजना का ज़ोर होता और इस बेसब्र बनाने वाली हवा के स्पर्श से पेड़ों की नसें खिंच जातीं, रंगों का लाल-लाल, ताज़ा खून नयी कोपलों में फूट पड़ता — गुलाबी सुख़ब के कोमल परों की तरह मुलायम पत्ते, तोते की लाल, मुंहऐंठी चोंच की तरह खुलने को उत्सुक नये-नये कल्ले! यों तो गांव के सभी पेड़ों में फगुनाहट की बहार अपनी अनोखी रंगत लेकर आती, पर बूढ़े पीपल का तो नज़ारा ही कुछ और होता। ऐसे दिनों में कभी गांव के दक्खिनी छवरे में नज़र उठ गयी, तो पूरा पीपल ठण्डी-सी आग की लपट में सुलगता दिखाई पड़ता। लाल-लाल छोटे-छोटे पत्ते धीरे-धीरे लहराते, तो पेड़ के नीचे अजीब तरह की ललछौंही कालिमा नेवले के बालों की तरह मचलने लगती।

        इसी वक्त लड़के एक-दूसरे का हाथ थामे, इस छाया में एक बड़ा-सा घेरा बनाकर गोलाई में नाचने लगते, एक अजीब उछल-कूद का लयात्मक नृत्यः

        चाक डोले, चकबम्बा डोले

        खैरा पीपल कभी न डोले

        खैरा पीपल कभी न डोले…

       पर इस जंगली ख़ुशी के नाच को देखकर जाने क्यों, मैं पहले-जैसा ही ख़ुश नहीं होता। एक बड़ी डरावनी शंका मेरे मन में घर कर गयी है। मैं सोचता हूं, तो जी मुंह को आ जाता है। कहीं छोकरे पुरुषोत्तम काका या तुलसी बुढ़िया की तरह इस खैरा पीपल को भी तो नहीं भूल जायेंगे? कहीं उनकी नाज़ुक हथेलियों के घेरे से कभी न डोलने वाला खैरा पीपल भी तो नहीं डोल जायेगा?

       दिन गुज़रते गये और अवश्यम्भावी की आशंका मेरे मन में बलवती होती गयी। सच ही छोकरे एक दिन खैरा पीपल को बिल्कुल भूल गये। आज दक्खिन छवरे की मोड़ पर पीपल नहीं है।… पहले सुबह होती थी और बैलों की घण्टियों के साथ गांव के बड़े लोगों का भय, उनकी नाराज़गी का डर, सभी कुछ गांव से बहुत दूर सिवानों में जा बसता था। तब छोकरे एक साथ इस गली, उस गली से फुदककर निकलते और पीपल की विशाल छाया के नीचे अपने खेलों और चुहलबाज़ियों की एक नयी सृष्टि रच देते। ‘होलापाती,’ ‘सतघरवा’, ‘कबड्डी’ और जाने क्या-क्या?

       लड़कों की भीड़ बढ़ती जाती और उनकी ख़ुशी के चीत्कार गांव के निठल्ले बूढ़ों, काहिलों और मेहनतचोर आवारों को भी अपने इर्द-गिर्द बटोरने लगते। तब इस पीपल के नीचे सिर्फ मासूम छोकरों का सीधा-सादा खेल ही नहीं होता, मुंहफट, बूढ़े या निठल्ले प्रौढ़ों की गन्दी गालियां भी मंडराने लगतीं। अपनी-अपनी मांओं के साथ अजीब रिश्ते क़ायम करने वाले बूढ़े खूसटों की फूहड़-फूहड़ नंगी बातों की लच्छेदारी से लड़के गुस्से से लाल हो जाते, पर गांव की मर्यादा निभाने के लिए उनकी ज़बान ईंट का जवाब पत्थर से देने में हिचक जाती।

       ‘दिनवां की माई…’ सुर्ती से काले दांत पड़े बदरंग मसूढ़े और रेड़ी के बीये-जैसे काले दांतों को दरेरती हुई जीभ ‘खिस्स्-खिस्स्’ की आवाज़ निकालती और बूढ़े बाबा बड़े प्रेम से बग़ल में बैठे नौजवान-से खीस काढ़-काढ़कर कहते, ‘देखा है कि नहीं तूने, नांद-जैसा पेट निकाले गली दचकाती फिर घूमने लगी है! राम-राम छेर-बकरी को भी मात कर दिया है इस दिनवां की माई ने! पूरा एक कोड़ी बियाय के रहेगी, देखना!’

        ‘पर काका, अजब की काठी है जग्गन बो भौजी की भी!’ नौजवान की नसें लिलार पर खिंचकर तन जातीं, ‘पांच-पांच बच्चे हुए, पर देह तनिक भी टस-से-मस न हई, वैसे ही चढ़ी-की-चढ़ी!’ बुढे काका कुछ और कहते होते, पर उनका नौजवान साथी किसी दूसरी दुनिया में अपने को डूबोकर बिल्कुल खामोश हो जाता। उसका सारा बदन बेकार-सी बना देनेवाली गरमी में झुलसने लगता। बाप-भाई से झगड़कर, बिना काम किये, दोनों जून बेर्रे की रोटियों से पाले हुए बदन को पीपल की छाया में पसारकर वह जाने कहां-कहां घूमने लगता।

        मुझे ऐसी बातों से भी बड़ी हैरानी होती है। जाने कैसे लोग इतनी आसानी से बच्चे पैदा करने वाली मांओं के बारे में सोच लेते हैं। मैं तो कई साल से बराबर किसी-न-किसी औरत के मरने की ख़बर सुनकर परेशान हो जाता हूं। अभी दो साल पहले की बात है। सुबह-सुबह हाथ-मुंह धोकर बखरी में आया, तो रोज़ की तरह दाना-पानी लिये मां को अपनी राह अंगोरते नहीं देखा। पूरे आध घण्टे बाद दौड़ी-दौड़ी आयी थी। मुझे गुस्से में तिनककर बैठा देख वह एक सांस में सब सुना गयी।

        ‘लल्लू बो को देखने चली गयी थी। लगता है, बेचारी बचेगी नहीं। पूरा दिन और पूरी रात चिल्लाते बीत गयी — जाने लड़के ने अंतरी पकड़ ली है या क्या, दो-दो चमाइने पेट मांड़ रही हैं, मगर कोई फायदा नहीं। लड़का तो मर ही गया होगा, अब वह भी नहीं बचेगी।’ अम्मा यह सब सुनाकर बिल्कुल ख़ामोश हो गयी थीं। उन्होंने एक अजीब बेबसी और नियति के प्रति मजबूर समर्पण के साथ कांपते हुए हाथों से पानी का गिलास थामते हुए आसमान की ओर देखा था।

        लल्लू हमारी ही उम्र का था, साथ-साथ बैठना-उठना। मैंने दाने की डाली वैसे ही रख दी। उठकर सीधे लल्लू के दालान में जा रहा। मचिये पर दोनों बांहों में सर गड़ाये वह उदास बैठा था। लल्लू के बाबाजी सामने की चारपाई पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे, मुझे देखते ही तपाक से बोले, ‘अब तुम्हीं समझाओ, भाई, इसे। भीतर औरत चिल्ला रही है, बाहर दालान में बैठा यह मउगड़ा टुस्के बहा रहा है। छिः छिः! मेरे ख़ानदान में ऐसा मउगड़ा कोई नहीं जन्मा था। अरे साले! एक मरेगी, तो दूसरी आयेगी, इस तरह रांड़ औरत की तरह फेंकर-फेंकर दिल काहे दुखा रहा है?’

        मैं अवाक् उस बूढ़े की ओर ताकता रह गया। मुझे तो विश्वास ही नहीं होता था कि एक बाप अपनी बहू की मौत पर लड़के को ऐसा उपदेश दे सकता है!

         ‘काकाजी, आप लल्लू के साथ बहू को शहर क्यों नहीं भेज देते, वहां अच्छे-अच्छे डॉक्टर हैं, दवा-दारू का सारा इन्तज़ाम रहता है, इतनी तकलीफ़ भी न होगी और जच्चा-बच्चा किसी को जान से हाथ न धोना पड़ेगा।’

         बूढ़ा मेरी ओर आंखें तरेरकर यों देखने लगा, जैसे मैंने कोई बहुत भद्दी गाली दे दी हो। ‘तुमसे मुझे यह उम्मीद न थी, हरी बेटा। छिः छिः! दक्खिन पट्टी के ठकुराने की बहु बच्चा जनने अस्पताल जाये, इससे तो यही अच्छा होगा कि वह चिल्ला-चिल्लाकर जान दे दे!’

         मैं कुछ न बोला। लल्लू धीरे से उठा और आंगन की ओर जाने लगा। ‘कहां चला, बे मउगड़े? कभी औरत को बच्चा होता था, तो उसका मर्द लाज के मारे तीन दिन तक आंगन में पैर नहीं डालता था, और आज एक तू है ससुरे कि उतावला होकर ड्योढ़ी पर चक्कर मारे जा रहा है।’

         तभी भीतर से दो-चार औरतों के साथ ही ज़ोर-ज़ोर से धाड़ मारकर रोने की आवाज़ से दालान की शहतीरें तक थरथरा उठीं। तेज़ कांपते हुए झोंके ने आकर ख़बर दी कि दीया बुझ गया। लल्लू की मुट्ठियां दर्द के मारे भिंची जा रही थीं, जैसे उसकी हथेली में कोई उबलता हुआ फफोला फूट पड़ने को आतुर हो और वह उसे आंखों से आंसू टपका-टपकाकर शान्त कर रहा हो। बूढ़े काका वैसे ही हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे, फ़र्क सिर्फ इतना था कि वह बुझी हुई चिलम को बड़ी जल्दी-जल्दी सुड़क-सुड़ककर खींचे चले जा रहे थे।

        औरतों से आंगन भर गया था। लाश को नहलाकर लाया गया, तो मैंने कनखी से लल्लू की बहू के मुंह को देखा था, जो जामुन की तरह स्याह हो गया था, पेट बुरी तरह फूला हुआ था और दर्द के मारे आंखें सूजकर बाहर निकल आयी थीं। लाश बहुत देर तक बूढ़े पीपल के नीचे सुलायी गयी और मैं उस नीले चेहरे को देख बार-बार सोचता रहा, जो सकुशल बच्चा जनकर गुलाब को मात करने वाली शरमीली मुसकराहट में कभी खिल न सका।

         शाम हो गयी थी। क़स्बेवाली बस के आने का समय हो गया था। जहां पहले खैरा पीपल की कोमल छाया नेवले के बालों की तरह कांपा करती थी, वहां आज सिवचन्न साहू ने अपनी चाय की दुकान खोल ली है। आज पीपल की छांव की जगह काई लगे करकट की छांव है, जिसमें बैठने वालों की भीड़ लगी रहती है। वे ही प्रौढ़ आवारे, कामचोर छोकरे, वे ही गन्दी गालियों से मन को सन्तोष देने वाले बूढ़े इस दुकान में भी जमे रहते हैं। फ़र्क सिर्फ यह है कि अब छोकरों की नाज़ुक हथेलियां जिस्मों के घेरे बनाकर ‘चाक डोले चकबम्बा डोले’ का खेल नहीं खेलतीं; क्योंकि खैरा पीपल डोल चुका है, उसकी छाया की निर्द्वन्द्व आज़ादी चाय की इस दुकान में कभी नहीं मिल सकती। जब से सिवचन्न साहु की चाय की दुकान खुली है, दक्खिन पट्टी बड़ी मनसायन लगने लगी है। शाम, सुबह और दोपहर तीन बार बसें आती-जाती हैं। कभी-कभार सैर-सपाटे या इधर-उधर किसी काम से जानेवाले मुसाफ़िरों की अपनी निजी गाड़ियां भी रुकती हैं। सिवचन्न साहु मुसाफ़िरों को पहचानने में काफ़ी तेज़ है। उनके आने पर साफ़ प्याले उस कोनेवाली काठ की टूटी अलमारी से बाहर निकालते हैं। बाक़ी लोग शीशे के गिलासों में चाय पीते हैं, जिन्हें धोने-धाने का कोई सवाल नहीं। एक तरफ़ उनकी छोटी लड़की, दुलरिया, नाक का पोंटा सुड़कती हुई लाई-लकठे और गुड़ पर मंडराने वाली मक्खियों और हड्डों से कचपटी का खेल खेलती है और दूसरी तरफ़ उनका लड़का लम्बा-सा पेट निकाले उनकी मिठाइयों के गुणकारी होने का ऐलान करता, लोटा हाथ में थामे राह चलतों को पानी पिलाने में भी कोताही का नया रेकार्ड क़ायम करता है।

         शाम को बस आकर रुकी, तो चाय-घर में बैठे लोगों की आंखें उतरने वाले मुसाफ़िरों पर जा अटकीं।

       ‘लाओ, दे दो मुझे। तुम ख़याल से उतरना।’ सुरेश ने अपनी बीवी के हाथ से नन्हे-से बच्चे को लेकर अपने कन्धे से चिपका लिया। उसकी पत्नी बस से उतरकर नीचे आ चुकी थी और आस-पास बैठे गांववालों से नज़र बचाती, माथे के गिरे पल्लू को सर पर डाल रही थी। उसके पीले मुरझाये चेहरे पर कितनी शान्ति और ख़ुशी थी! होंठ सूखे-सूखे थे ज़रूर, फिर भी उनके भीतर एक अजीब आनन्द-भरी मुसकराहट खेल रही थी।

         ‘क्यों भौजी, मिठाई कब खिलाओगी?’ मेरी बात से सुरेश बो भौजी दुहरी होते-होते बचीं। शायद ही सुरेश के घर जाने पर वह मेरे सामने पड़ी हों। पर आज तो बस के मुसाफ़िर से कोई भी बात कर सकता था।

         ‘मिठाई तुम्हें खिलानी चाहिए, देवर! लड़के का बाप न मिठाई खिलाता है!’ वह धीरे से मुसकराकर गांव की गली में चल पड़ीं।

          ‘कोई दिक्कत तो नहीं हुई?’ मैंने सुरेश की गोद में चिपके नन्हे की आंखों में झांकते हुए पूछा।

          ‘नहीं, सब ठीक से हो गया।’

          बच्चा बड़ी उत्सुकता से चाय की दुकान के करकट को देख रहा था। उसे क्या मालूम था कि इसी जगह कभी हरी-हरी पत्तियों में विहंसता एक विशाल पीपल था, जिसकी छाया में लड़के हथेलियां फंसाकर ‘चाक चकई’ का खेल खेला करते थे। बहरहाल, खैरा पीपल नहीं है, तो क्या हुआ, सिवचन्न साहु की चाय की दुकान तो है, जिसमें इस वक्त गांव के तमाम छंटे हुए नामी-गरामी लोग इकट्ठे बैठे हैं।

        ‘शहर ले गया था,’ अपनी ढंढरवाली आंख को बुरी तरह मिचकाकर जगिया ने बग़ल में बैठे कैरा से कहा, ‘सुना, वहां मेम पेट में हाथ डालकर बच्चा निकाल लेती है।’

        ‘देखा नहीं, हरी से कैसे मुसकाकर बोली थी! बड़ी सतवन्ती बनती है। पिछले फगुवा को ज़रा गाल पर अबीर छुला दी थी, तो आंख तरेरकर झनझना उठी थी। झटक-कर बोली — ‘ख़बरदार, जो कभी इस घर का चौखट हेलकर आये! हुंह!’

        ‘अबे, चुप रह, हरिया इधर ही आ रहा है।’ दोनों चाय के गिलास में मुंह सटाकर ऐसे सन्न हो गये, जैसे सांप सूंघ गया हो।

        मुश्किल से अभी पन्द्रह मिनट हुए होंगे। बस के मुसाफ़िर डराइबरजी को जल्दी करने को उकील रहे थे, पर डराइबरजी हाथ में गिलास थामे दुकान की बग़ल के पाये पर पैर अड़ाये कुछ खोल रहे थे। बग़ल की डगरसे गांव की कई लड़कियां पानी की कलसी भरे घरों को लौट रही थीं।

        ‘अरे डराइबरजी, जल्दी करो, भैया! रात यहीं हुई जा रही है।’ कहने वाला डराइबरजी को अपनी ओर गुस्से में उबलते देख, आगे की बात को झटके से निगलता हुआ बग़ल के किसी से कुछ अनावश्यक बातें करने लगा था।

        ‘अभी फुलिया की बाट देख रहे हैं डराइबरजी!’ जगिया बीड़ी जलाकर कांटी से कैरा की हथेली पर टुन्ना देते हुए बुदबुदाया, ‘अबे, कल शाम को था न यहां? साला कैसे लसड़-फसड़कर बात कर रहा था।’

        ‘तो वो साली कौन दूध की धोयी है! आन गांव के आदमी से बात करते उसकी आंख का पानी नहीं ढरता, तो वो क्या करे?’

        ‘ठीक कहता है, दो आने भी उसके लिए काफ़ी हैं। कल यहीं दांत चिपोरकर ड्राइवर से कह रही थी, क्यों डराइबरजी एक दिन हमें बनारस नहीं दिखाओगे? उसके कानों के बुन्दे इसी ड्राइवर के बच्चे ने दिये हैं। और उसके साथ की दूसरी छोरियों को नहीं देखा? इस तरह ललचायी-ललचायी देख रही थीं कि ड्राइवर जेब से निकालकर उन्हें भी बुन्दे थमा देगा। हुंह!’

        बस खुल गयी। गर्द का एक पूरा पहाड़ दुकान के करकट पर उलट पड़ा। ड्राइवर ने हाथ लटकाकर कपड़े में बंधी एक पोटली उछाल दी। गली की आड़ से फुलिया झपककर आयी और पोटली उठाकर चलने लगी। जगिया और कैरा दुकान से निकलकर उधर ही देख रहे थे। लड़की मुड़कर चलने लगी, तो कैरा ने ज़ोर से अलाप लीः

काशीजी में लगलीं बिजुरी के रोशनियां

पिया देखाई देता ना

हो पिया देखाई देता ना…।

       अलाप ज़ोर पर पहुंचकर आसमान छूने को उठा ही था कि कैरा ने आवाज़ को बड़े ज़ोर से सुड़ककर पी लिया। उसके गले की घण्टी को जैसे किसी ने हथेली में दबोच लिया। घुनघुनाकर वह एकदम चुप हो गया। ‘सलाम, काका!’ जगिया ने बड़ा शरीफ़ाना चेहरा बनाते हुए गुदई काका को नमस्ते किया।

      ‘पालागीं काका!’ कैरा ने घिघियाकर दुहराया। ‘बड़ा ज़ोर से गवनई कर रहा था, रे कैरा!’ काका ने कहा और आगे बढ़े। दोनों फुर्र से एक-दूसरे का हाथ थामे, मुंह से बेलाग फूटती हंसी को दबाने की कोशिश करते गली में ग़ायब हो गये।

      शाम घनी हो रही थी। चाय की दुकान से सटकर लेटी हुई नयी कच्ची सड़क धुन्ध में विशाल अजदहे की तरह निश्चेष्ट फैली हुई थी। गर्द-गुबार की केंचुल में सारा सिवान सिमटता जा रहा था। हवा तेज़ और सर्द थी। गांवों के घरों से उठा हुआ रसोई का धुआं पूरे गांव पर मटमैला चंदोवा टांग रहा था।

      गुदई काका दुकान से सटकर निकले, तो भीखम चौधरी ने हांक लगायी, ‘अरे, ज़रा गरमाय लो, मालिक! आज तो बड़ा कटकटाता जाड़ा पड़ रहा है।’

      गुदई काका मुड़कर करकट की छाजन के भीतर आ रहे।

      ‘चाय का सबख नहीं है, चौधरी!’

      गुदई काका को सामने खड़े देखकर भीखम चौधरी स्टूल पर से उतरकर खड़े हो गये। ‘बैठ जाओ, सरकार। सबख तो हमें भी कोई ज़ियादा नहीं है, बाक़ी जाड़ा से कुछ बचाव ज़रूर हो जाता है।’

      ‘अरे बैठे रहो न, चौधरी!’

      ‘नहीं-नहीं सरकार, बैठ जाइये! हम लोग कहीं बैठ लेंगे।’ भीखम चौधरी ने अपना गिलास उठाया और कच्चे फ़र्श पर बड़े इत्मीनान से पसरकर बैठ गये।

      मैं बूढ़े चौधरी की धुंधुआई, पुरानी आंखों में झांकता रह गया। गुदई काका से कुछ अधिक ही उम्र होगी। काम और मेहनत ने उनके काले शरीर को लोहे की तरह सख़्त कर दिया है। लटकी हुई झुर्रियां कितनी मोटी और चीमड़ हैं, इन पर भला गरमी-सर्दी का क्या असर होता होगा! भीखम चौधरी के चेहरे पर हमेशा एक हलकी-सी मुसकराहट छायी रहती। इस मुसकराहट को पैदा करने में चौधरी ने जाने कितना ग़म सहा होगा! सदाबहार का ऐसा फूल मामूली ज़मीन में कभी नहीं खिल पाता।

      गुदई और भीखम, भीखम और गुदई, मेरी आंखों के सामने खैरा पीपल घूमकर फिर खड़ा हो गया। तब वह इतना पुराना न था। उसकी पश्चिमवाली लम्बी-चौड़ी डाल तब कटी न थी। हाथ-कटे लूले की तरह तो वह बाद में लगने लगा था, जब दस साल पहले उसकी पत्तियों से लदी-फदी, चिड़ियों के घोंसलों से आबाद दायीं बांह पर आसमान से बिजली फट पड़ी थी। बाद में तो यह डाल ऐसी लगती, गोया किसी ने पतले-से पुराने ठूठ पेड़ के तने को खैरा के कन्धे से साट दिया है।

       तब मेरी आंखों में भी नीच-ऊंच का ख़याल इस आग की लपट की तरह कभी सुलग न पाता था। गुदई काका हमारे परिवार के हैं, अलग हो गये, तो क्या हुआ? हैं तो ख़ानदान के आदमी। लोचन बाबा का शरीर भी तो गुदई काका की तरह ही काफ़ी भारी-भरकम था। बड़ी-बड़ी मूंछे थीं, ऊपर को खिंची-खिंची। उनका गलगोच्छा अरियात-करियात में मशहूर था। बन्दोंवाली मिरजई पहनते थे और साफ़-चटक धोती को खूब चुन्नट देकर आगे लटकाये रहते थे। बड़ी-बड़ी लाल-लाल आंखें। बुड्ढा मुझे परेशान करता। गली से कभी जाते देख लिया कि बस!

       ‘कौन है हो? हरी बेटा?’

       ‘हां, बाबा!’

       ‘ज़रा चिलम चढ़ाते आओ, बचवा!’

       मैं मन-ही-मन बुरी तरह बिफर पड़ता। बुड्ढे के मरने के लिए दो-चार बार मनौतियां भी मानी होंगी। पर जब हरू चौधरी ने बाबा का अपमान किया, तो मुझे भी गुस्सा कम न आया। जब हमारे ख़ानदान की दो दर्जन लाठियां चमारों को ठीक करने के लिए निकल पड़ीं, तो मैंने भी ‘होलापाती’ का डण्डा कांख में दबा लिया था।

       मगर सच पूछो, तो मेरी समझ में न तब कुछ आया था, न अब। हमारे पिताजी कहते थे कि सारा दोष गांधीजी का है। उन्होंने नीच जातवालों का दिमाग़ आसमान पर चढ़ा दिया है। मुझे तो हरू चौधरी का दिमाग़ आसमान पर नहीं दिखाई पड़ता। हां, एक बात थी, वह चमार क़तई नहीं लगता था। बड़ा साफ़ कपड़ा पहनता। वह आस-पास के चमारों का ‘गुरुजी’ था। सिवनरायन का चेला था। सिवनरायन को हमने नहीं देखा, मगर लोग कहते हैं, वह पुराना महात्मा है। सब चमार उसी के चेले होते हैं।

       हमारे गांव की चमटोली में भी सिवनरायन गुरु की गद्दी लगती थी। दूर-दूर के चमार दर्शन करने आते। उस दिन हरू के दरवाज़े पर दरी बिछती और बड़ी भीड़ होती। सामने की चादर चावल से भर जाती। कुछ रुपया-पैसा भी गिरता। हमको गादी की चौकी बहुत पसन्द आती। हरी-लाल पन्नी से सजाकर चौकी पर सिवनरायन गुरु की तस्वीर लगायी जाती। नाच-गाना भी होता। पहले तो किर्तनिया लोग धीरे-धीरे कुछ मधुर स्वर में गुनगुनाते, फिर अचानक जाने क्या होता कि कोई ज़ोर से ‘होए’ कहता और ढोलक बड़ी तेज़ी से बजने लगती, सभी ताली पीटकर झूमने लगते।

       एही पार गंगा, ओही पार जमुना

       होए-ए ए

       बिचवा में साहब क डेरा….

       बिचवा में साहब क डेरा…

    उस बार भी गादी लगी थी। लोचन बाबा किसी काम से चमटोली के रास्ते जा रहे थे। हरू अपने दरवाज़े पर चारपाई बिछाये बैठा था। उसके बहुत से चेले तो चले गये थे, कुछेक रह गये थे। वे सब ज़मीन पर बैठे थे। हरू उनसे सत्संग कर रहा था। बाबा गली से निकले, तो हरू ने उन्हें देखा-अनदेखा कर दिया। बाबा कुछ बोले नहीं। आकर उन्होंने ख़ानदान-भर के सवांगों को बटोरकर सब बात सुनायी। बस, लाठियां निकल पड़ीं। गुदई काका सबसे आगे थे। चेले जाने कब सटक गये। हरू और भीखम पर बड़ी मार पड़ी। इसी पीपल के नीचे हरू को रस्सी में बांधकर बाबा ने उकड़ू लटकवा दिया था।

       हम लोग तमाम लड़के ‘चाक चकबम्बा’ का खेल छोड़कर खैरा की जड़ में धंस गये थे और उसके भारी तने की आड़ से झांक-झांककर हरू चौधरी के सर पर चप-चपाये हुए खून के क़तरों को देख रहे थे।

       ‘क्यों हरू,’ गुदई काका ने चाय पीते-पीते अचानक मुझे टोक दिया, ‘क्या सोच रहे हो? सुरेश मिला था?’

       ‘हां, अभी-अभी बस से उतरे, तो मुलाकात हुई थी।’ मैंने एक लम्बी सांस लेकर उस दु:स्वप्न को भुलाने की कोशिश की, जो मेरी आंखों के सामने अचानक खड़ा हो गया था।

       ‘हां, बात तो मैं भूल ही गया, गुदई सरकार,’ भीखम चौधरी को जैसे कोई बहुत ज़रूरी बात याद आ गयी थी, ‘छोटे भैया अभी उतरे बस से, ई बात आपने बड़ी अच्छी की कि बहू को बनारस भेज दिया। लेकिन नाती होने की ख़ुशी में मिठाई कब खिला रहे हैं?’

       ‘अरे भाई, खिला देंगे, चौधरी। जैसा हमारा नाती, वैसा तुम्हारा।’

       ‘सो भी ठीक। सिवचन्न साहु…’ चौधरी तैश में आ गये थे, ‘आज हमारे पैसे से यहां बैठे सब छोटे-बड़े भाई को एक-एक मिठका बिसकुट बांट दो!’ ऐसा कहकर भीखम चौधरी ज़ोर से ठहाका लगाकर हंस पड़े।

       ‘अभी बांटा, चौधरी!’ सिवचन्न साहु ने दुलरिया को सनकारा और वह नाक सुड़कती आलमारी से बिसकुट का टीन लाने चल पड़ी।

       चौधरी का बिसकुट हाथ में थामे, मैं चाय की दुकान के करकट को देखता रहा, जो लोगों की हंसी से बुरी तरह थरथरा रहा था।

       रात काफ़ी ढल गयी थी। लोग एक-एक करके दुकान से उठने लगे थे। गुदई काका पता नहीं क्या सोच रहे थे। उनकी इस तरह की चुप्पी मुझे खल रही थी। मैंने उनकी मनहूसी से बचने के लिए गरदन हिलायी, तो भीखम चौधरी को भी उसी तरह ख़ामोश देखा। अभी दो मिनट पहले अचानक खुशियों का एक ज्वार आया था, जो इनकी आंखों के किनारे टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों का निशान बनाकर वापस लौट गया है। मुझे दोनों का इस तरह चुप हो जाना अखर गया। भीखम चौधरी की हंसी भला गूलर का फूल कब से बनने लगी?

      ‘कैरा फिर लौटकर आ गया है,’ मैंने धीरे से कहा।

      ‘हां-हां,’ दोनों नींद से चौंक उठे, ‘बाक़ी रुकेगा नहीं। पहले तो इधर-उधर गांव का चक्कर काटकर ही लौट आता था, अब ममिआउर करने लगा है। एक नम्बर का काहिल आवारा हो गया है यह लड़का, अभी-अभी भड़ैती गाते हुए गली में जा रहा था।’ गुदई काका ने धीरे से कहा।

       ‘इसमें सारी बदमाशी उस जगिया की है, वही बिगाड़ रहा है कैरा को भी।’ चौधरी ने गरदन हिलाकर अपनी बात की अहमियत समझा दी।

       सुबह मैं अभी मुंह-हाथ धो ही रहा था कि गली के मोड़ पर हंगामा मच गया। कैरा भीड़ के बीचों-बीच खड़ा था और उसके बाबू, काका, चाचा, सभी उसको पीटने के लिए मचल रहे थे। लोग-बाग उन्हें किसी तरह संभाल रहे थे। कैरा को भी कई लोग पकड़े हुए थे और वह सबको धक्का देकर छुड़ाने की कोशिश करते हुए चिल्ला रहा था।

       ‘एक-एक को समझ लूंगा, हां! काम पड़ने पर कोई भवद्दी करने नहीं आता। और हमको पीटने के लिए सब भाई एक होकर सहायता करने आ जाते हैं। हम एक बार नहीं सौ बार कह देते हैं, हम कुछ नहीं करेंगे, कुछ नहीं करेंगे! करेंगे, तो अपने मन से। जैसे हम कहते हैं, वैसे चलना पड़ेगा। नहीं तो फूंक देंगे, सब जल जायेगा!’

        ‘तू फूंकेगा? फूंक तो देखें! मारे जूता सरवा खोपड़ी का बाल सफा कर देंगे!’ दीना चाचा कैरा को पीटने के लिए बार-बार पैर से चमरौधा सरका रहे थे, पर उनका हाथ दूसरों के हाथों से बंधा हुआ था, ‘ऐसे कुलच्छन पूत से निपूता भला! ई साला कहीं मर-खप भी नहीं जाता! जांगर-चोर, हरामी कहीं का! दो दिन जहां काम करना पड़ा कि साले की नस टूटने लगती है। दोगला, सूरतहराम…’

        ‘हमको दोगला-फोगला तो मत कहो, कह देते हैं!’ कैरा अपने बाबू की ओर लाल-लाल आंखें निकालकर बोला, ‘नहीं गटवा तोड़ के रख दूंगा, हां!’

        तभी लोगों से हाथ छुड़ाकर दीना चाचा भूखे बाघ की तरह कैरा पर झपट पड़े और गुस्से से पागल होकर उन्होंने दनादन घूंसे-थप्पड़ की बौछार लगा दी। धर-पकड़ करने वालों को एकाध हाथ अनजाने लगा, तो वे सरककर किनारे हो गये। कैरा काफ़ी पिट गया।

        ‘काट डाल, कसाई!’ कैरा रो-रोकर कह रहा था, ‘कोई तुझको दगध (आग) देनेवाला भी न मिलेगा!’

        आख़िरी बात ने दीना चाचा को और भी आगबबूला कर दिया।  वह पैर की ठोकर से कैरा को धकेलते हुए गुस्से में कांपते हुए बोले, ‘निकल जा, हरामी साला! फिर कभी काला मुंह मत दिखाइयो, हां!’

        धीरे-धीरे भीड़ छंट गयी। कैरा वैसे ही घुटनों में सर डाले सिसकता रहा। गांव का कोई आदमी उसे चुप कराने क्यों आये? कैरा के साथ यह पहली बार थोड़े हुआ है, नहीं यह आख़िरी बार ही है, यह सभी जानते हैं। पांच साल से दीना काका और उनके दूसरे भाई अलग-अलग हो गये। कैरा की पढ़ाई छूट गयी। काम करने में उसका जी लगता नहीं। दीना काका से अकेले सब होता नहीं। रोज़ झगड़ा, रोज़ मारा-पीटी।

        कैरा भी एक ही है। मार खायेगा, पर गाली देने से बाज़ न आयेगा। गुस्सा होकर चलेगा कि इस बार कभी लौटकर नहीं आयेगा। सारे महल्ले के लोगों को चलते वक्त प्रणाम करेगा, हाथ जोड़ेगा कि भूल-चूक माफ़ कर दो, हम सदा के लिए गांव छोड़कर जा रहे हैं। पहले तो लोग बहुत पिघले। दया के मारे औरतों की आंखें भर आयीं। कई लोगों ने दीना चाचा को समझा-बुझा के शान्त कर दिया। पर बाद में यह उसका नियम हो गया। सब से कहकर चलता, तो खैरा पीपल के नीचे आकर बैठ जाता। घण्टों बैठा रहता, शाम हो जाती, तो दीना बो चाची किसी छोकरे को भेजकर बुलवा लेतीं। दीना चाचा कटकटाते, गाली देते, पर मन-ही-मन ख़ुश होते कि अब कुछ दिन यह डरकर ठीक से काम करेगा। फिर भी, जब कैरा की आदत न छूटी, तो उन्होंने चाची को भी घुड़ककर मना कर दिया। रात हो जाने पर बहुत देर तक कैरा प्रतीक्षा करता रहता कि अब कोई आ रहा होगा, मगर जब कोई न आता और पेट में चूहे उछल-कूद मचाने लगते, तो लाचार होकर धीरे से आकर बखरी में घुस जाता। दीना चाचा को ख़ूब मालूम था कि इसे कुछ अकल नहीं, आखिर जायेगा भी कहां, बस, कैरा की दौड़ खैरा तक! पीपल के नीचे बैठकर मक्खी मारेगा और हमेशा गांव से किसी के आने की राह देखेगा कि कोई मनानेवाला एक बार भी कह दे, तो वह घर लौट आये।

        लेकिन आज कैरा के दिल पर चोट गहरी थी। वह बहुत देर तक सिसकता रहा। फिर बड़े ताव से उठा और बखरी में जाकर अपना कुरता डाल बाहर आ गया। उसके चेहरे को देखकर दीना बो चाची का मातृ हृदय आशंका से कांप उठा। दीना चाचा को ख़बर लगी, तो वह हंस पड़े। उनके दूसरे भाई भी मुसकराहट रोक न सके। सभी बाहर आकर कैरा के गांव छोड़ने का तामाशा देखते रहे। कैरा चला, तो उसके सामने आज कहीं बूढ़ा पीपल न था। चाय की दुकान थी, जहां कुछ देर खड़े होकर वह गांववालों को देखता रहा। फिर बस आयी, तो कैरा ने पहली बार सब को हाथ जोड़कर नमस्ते किया और बस में बैठ गया। सभी को उम्मीद थी कि बस चलने लगेगी, तो कैरा मुंह लटकाये बाहर उतर आयेगा और हमेशा की तरह मुंह पर काला परदा डालकर गांव में घुस पड़ेगा। लेकिन बस चल दी और कैरा नहीं उतरा। उसने खिड़की से एक बार दीना चाचा और चाची को देखा और आंखें फेर लीं। बस गर्द-गुबार का घना परदा पीछे छोड़कर सिवान में खो गयी। दीना बो चाची की आंखों से आंसू टपक पड़े।

        उन्होंने हमेशा की तरह कैरा को ढूंढ़ने वाली आंखें ऊपर उठायीं, मातृ हृदय की व्याकुलता से थरथराती आंखें, पर उन आंखों को शून्यता में डुबोने से बचानेवाला बूढ़ा पीपल न था, वहां तो सिर्फ़ नीचे की तरफ़ औंधा हुआ रोता-सा आसमान था, नीला-नीला, डरावना।

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बादलों के घेरे -कृष्णा सोबती

अनुमानित समय : 26 मिनट-

भुवाली की एक छोटी सी कॉटेज में लेटा-लेटा मैं सामने के पहाड़ देखता हूँ। पानी भरे, सूखे-सूखे बादलों के घेरे देखता हूँ। बिना आँखों के भटक-भटक जाती धुन्ध के निष्फल प्रयास देखता हूँ। और फिर लेटे-लेटे अपने तन का पतझार देखता हूँ। सामने पहाड़ के रूखे हरियाले में रामगढ़ जाती हुई पगडंडी मेरी बाँह पर उभरी लम्बी नस की तरह चमकती है। पहाड़ी हवाएँ मेरी उखड़ी-उखड़ी साँस की तरह कभी तेज, कभी हौले इस खिड़की से टकराती हैं; पलंग पर बिछी चद्दर और ऊपर पड़े कम्बल से लिपटी मेरी देह चूने की सी कच्ची तह की तरह घुल-घुल जाती है और बरसों के ताने-बाने से बुनी मेरे प्राणों की धड़कने हर क्षण बन्द हो जाने के डर में चूक जाती हैं।
मैं लेटा रहता हूँ और सुबह हो जाती है। मैं लेटा रहता हूँ। शाम हो जाती है। मैं लेटा रहता हूँ, रात झुक जाती है। दरवाजे और खिड़कियों पर पड़े परदे मेरी ही तरह दिन-रात, सुबह-शाम अकेले मौन भाव से लटकते रहते हैं। कोई इन्हें भरे-भूरे हाथों से उठाकर कमरे की ओर बढ़ा नहीं जाता। रात, सुबह, शाम बारी-बारी से मेरी शैया के पास घिर घिर आते हैं और मैं अपनी इन फीकी आँखों से अँधेरे और उजाले को नहीं, लोहे के पलंग पर पड़े अपने आपको देखता हूँ। अपने इस छूटते-छूटते तन को देखता हूँ। और देखकर रह जाता हूँ। आज इस रह जाने के सिवाय कुछ भी मेरे वश में नहीं रह गया। सब अलग जा पड़ा है। अपने कन्धों से जुड़ी अपनी बाँहों को देखता हूँ, मेरी बाँहों में लगी वे भरी-भरी बाँहें-कहाँ हैं…कहां हैं वह सुगन्ध भरे केश जो मेरे वक्ष पर बिछ-बिछ जाते थे ? कहाँ हैं वे रस भरे अधर जो मेरे रस में भीग भीग जाते थे? सब था। मेरे पास सब था, बस, मैं आज सा नहीं था। जीने का संग था, सोने का संग था और उठने का संग था। मैं धुले-धुले सिरहाने पर सिर डालकर सोता रहता और कोई हौले से चूमकर कहता, ‘‘उठोगे नहीं..भोर हो गई!’’
आँखें बन्द किए-किए ही हाथ उस मोह-भरी देह को घेर लेते और रात के बीते क्षणों को सूँघ लेने के लिए अपनी ओर झुकाकर कहते, ‘‘इतनी जल्दी क्यों उठती हो’…

हल्की सी हँसी…और बाँहें खुल जातीं। आँखें खुल जातीं और गृहस्थी पर सुबह हो आती। फूलों की महक में नाश्ता लगता। धुले-ताजे कपड़ों में लिपटकर गृहस्थी की मालकिन अधिकार भरे संयम से सामने बैठ रात के सपने साकार कर देती। प्याले में दूध उँड़ेलती उन उँगलियों को देखता। क्या मेरे बालों को सहला-सहलाकर सिहरा देनेवाला स्पर्श इन्हीं की पकड़ में है ? आँचल को थामे आगे की ओर उठा हुआ कपड़ा जैसे दोनों ओर की मिठास को सम्हालने को सतर्क रहता। क्षण-भर को लगता, क्या गहरे में जो मेरा अपना है, यह उसके ऊपर का आवरण है या जो केवल मेरा है, वह इससे परे, इससे नीचे कहीं और है। एक शिथिल मगर बहती-बहती चाह विभोर कर जाती। मैं होता, मुझसे लगी एक और देह होती। उसमें मिठास होती, जो रात में लहरा-लहरा जाती। और एक रात भुवाली के इस क्षय-ग्रस्त अँधियारे में आती है। कम्बल के नीचे पड़ा-पड़ा मैं दवा की शीशियाँ देखता हूँ और उन पर लिखे विज्ञापन देखता हूँ। घूँट भरकर जब इन्हें पीता हूँ, तो सोचता हूँ, तन के रस रीत जाने पर हाड़-मांस सब काठ हो जाते हैं। मिट्टी नहीं कहता हूँ। मिट्टी हो जाने से तो मिट्टी से फिर रस उभरता है, अभी तो मुझे मिट्टी होना है।

कैसे सरसते दिन थे ! तन-मन को सहलाते-बहलाते उस एक रात को मैं आज के इस शून्य में टटोलता हूँ। सर्दियों के एकान्त मौन में एकाएक किसी का आदेश पाकर मैं कमरे की ओर बढ़ता हूँ। बल्ब के नीले प्रकाश में दो अधखुली थकी-थकी पलकें जरा-सी उठती हैं और बाँह के घेरे तले सोये शिशु को देखकर मेरे चेहरे पर ठहर जाती हैं। जैसी कहती हों-तुम्हारे आलिंगन को तुम्हारा ही तन देकर सजीव कर दिया है। मैं उठता हूँ, ठंडे मस्तक को अधरों से छूकर यह सोचते-सोचते उठता हूँ कि जो प्यार तन में जगता है, तन से उपजता है, वही देह पाकर दुनिया में जी भी जाता है।
पर कहीं, एक दूसरा प्यार भी होता है, जो पहाड़ के सूखे बादलों की तरह उठ-उठ आता है, और बिना बरसे ही भटक-भटककर रह जाता है।
वर्षों बीते। एक बार गर्मी में पहाड़ गया था। बुआ के यहाँ पहली बार उन आँखों-सी आँखों को देखा था। धुपाती सुबह थी। नाश्ते की मेज से उठा, तो परिचय करवाते-करवाते न जाने क्यों बुआ का स्वर जरा सा अटका था…साँस लेकर कहा, ‘‘मन्नो से मिलो रवि, दो ही दिन यहाँ रुकेगी।’’ बुआ के मुख से यह फीका परिचय अच्छा नहीं लगा। साँस भरकर बुआ का वह दो दिन कहना किसी कड़ेपन को झेल लेने सा लगा। वह कुछ बोली नहीं। सिर हिलाकर अभिवादन का उत्तर दिया और जरा सा हँस दी। उस दूर-दूर लगनेवाले चेहरे से मैं अपने को लौटा नहीं सका। उस पतले, किन्तु भरे-भरे मुख पर कसकर बाँधे घुँघराले बालों को देखकर मन में कुछ ऐसा सा हो आया कि किसी ने गहरे उलाहने की सजा अपने को दे डाली है।

सब उठकर बाहर आए, तो बुआ के बच्चे उस दुबली देह पर खड़े आँचल को खींच स्नेहवश उन बाँहों से लिपट-लिपट गए-मन्नो जीजी….मन्नो जीजी। बुआ किसी काम से अन्दर जा रही थीं, खिलखिलाहट सुनकर लौट पड़ीं। बुआ का वह कठिन, बँधा और खिंचावट को छिपानेवाले चेहरा मैं आज भी भूला नहीं हूँ। कड़े हाथों से बच्चों को छुड़ाती ठंडी निगाह से मन्नो को देखती हुई ढीले स्वर में बोली, ‘‘जाओ मन्नो कहीं घूम आओ। तुम्हें उलझा-उलझाकर तो ये बच्चे तंग कर डालेंगे।’’..माँ की घुड़की आँखों-ही-आँखों में समझकर बच्चे एक ओर हो गए। बुआ के खाली हाथ जैसे झेंपकर नीचे लटक गए और मन्नो की बड़ी-बड़ी आँखों की घनी पलकें न उठीं, न गिरी, बस एकटक बुआ की ओर देखती रह गईं…
बुआ इस संकोच से उबरी, तो मन्नो धीमी गति से फाटक से बाहर हो गई थी। कुछ समझ लेने के लिए आग्रह से बुआ से पूछा, ‘कहो तो बुआ, बात क्या है?’’
बुआ अटकी, फिर झिझककर बोली, ‘‘बीमार है रवि, दो बरस सैनेटोरियम में रहने के बाद अब जेठजी ने वहीं कॉटेज ले दी है। साथ घर का पुराना नौकर रहता है। कभी अकेले जी ऊब जाता है, तो दो चार दिन को शहर चली जाती है।’’
‘‘नहीं नहीं बुआ !’’ मैं धक्का खाकर जैसे विश्वास नहीं करना चाहता।
‘‘रवि, जब कभी चार-छह महीने बाद लड़की को देखती हूँ, तो भूख-प्यास सब सूख जाती है।’’
मैं बुआ की इस सच्चाई को कुरेद लेने को कहता हूँ, ‘‘बुआ, बच्चों को एकदम अलग करना ठीक नहीं हुआ, पल-भर तो रुक जाती।’’
बुआ ने बहुत कड़ी निगाह से देखा, जैसा कहना चाहती हो, ‘तुम यह सब नहीं समझोगे’ और अन्दर चली गई। बच्चे अपने खेल में जुट गए थे। मैं खड़ा-खड़ा बार-बार सिगरेट के धुएँ से अपने तन का भय और मन की जिज्ञासा उड़ाता रहा। कितनी घुटन होगी उन प्राणों में ! पर हुआ भी तो कुछ गलत नहीं था। उलझा-उलझा सा मैं बाहर निकला और उतराई उतरकर झील के किनारे-किनारे हो गया। सड़क के साथ-साथ इस ओर छाँह थी। उछल-उछल आती पानी की लहरें कभी धूप से रुपहली हो जाती थीं। देवी के मन्दिर के आगे पहुँचा, तो रुका, जँगले पर हाथ टिकाए झील में नौकाओं की दौड़ देखता रहा। बलिष्ठ हाथों में चप्पू थामे कुछ युवक तेज रफ्तार तल्लीताल की ओर जा रहे हैं, पीछे की किश्ती में अपने तन-मन से बेखबर एक प्रौढ़ बैठा ऊँघ रहा है। उसके पीछे बोट-क्लब की किश्ती में विदेशी युवतियाँ…फिर और दो-चार पालवाली नौकाएँ…
एकाएक किश्ती में नहीं, जैसे पानी की नीची सतह पर वही पीला चेहरा देखता हूँ, वही बड़ी-बड़ी आँखें, वही दुबली-पतली बाँहें, वही बुआ की घरवाली मन्नो। दो-चार बार मन-ही-मन नाम दोहराता हूँ, मन्नो, मन्नो, मन्नो…. लगता है मैं ऊँचे किनारे पर खड़ा हूँ और पानी के साथ साथ मन्नो बही चली जा रही है। खिंचे घुँघराले बाल, अनझपी, पलकें…पर बुआ कहती थी बीमार है, मन्नो बीमार है।
जँगले पर से हाथ उठाकर बुआ के घर की दिशा में देखता हूँ। चीना की चोटी अपने पहाड़ी संयम से सिर उठाए सदा की तरह सीधी खड़ी है। एक ढलती-सी पथरीली ढलान को उसने जैसे हाथ से थाम रखा है। और मैं नीचे इस सड़क पर खड़े सोचता हूँ कि सब कुछ रोज जैसा है, केवल मन से उभर-उभर आती वे दो आँखें नई हैं और उन दो आँखों के पीछे की बीमारी….जिसे कोई छू नहीं सकता, कोई उबार नहीं सकता।
घर पहुचा, तो बुआ बच्चों को लेकर कहीं बाहर चली गई थी। कुछ देर ड्राइंग-रूम में बैठा-बैठा बुआ के सुघड़ हाथों द्वारा की गई सजावट को देखता रहा। कीमती फूलदानों में लगाई गई पहाड़ी झाड़ियाँ सुन्दर लगती थीं। कैबिनेट पर बड़ी कीमती फ्रेम में लगे सपरिवार चित्र के आगे खड़ा हुआ, तो बुआ के साथ खड़े फूफा की ओर देखकर सोचता रहा कि बुआ के लिए इस चेहरे पर कौन सा आकर्षण है, जिससे बँधी-बँधी वह दिन रात, वर्ष मास अपने को निभाती चली आती है, पर नहीं बुआ के ही घर में होकर यह सोचना मन के शील से परे है…

झिझककर ड्राइंग रूम से निकलता हूँ और अपने कमरे की सीढ़ियाँ चढ़ जाता हूँ। सिगरेट जलाकर झील के दक्खिनी किनारे पर खुलती खिड़की के बाहर देखने लगता हूँ। हरे पहाड़ों के छोटे-बड़े आकारों में टीन की लाल-लाल छतें और बीच-बीच में मटियाली पगडंडियाँ। बुआ खाने तक लौट आएँगी और मन्नो भी तो…देर तक बैठा-बैठा किसी पुराने अखबार के पन्ने पलटता रहा। बुआ लौटी नहीं। घड़ी की टन-टन के साथ नौकर ने खाने के लिए अनुरोध किया।
‘‘खाना लगेगा, साहिब ?’’
‘‘बुआ कब तक लौटेंगी ?’’
‘‘खाने को तो मना कर गई हैं।’’
कथन के रहस्य को मैं इन अर्थहीन सी आँखों में पढ़ जाने के प्रयत्न में रहता हूँ।
‘‘और जो मेहमान हैं ?’’
नौकर तत्परता से झुककर बोला, ‘‘आपके साथ नहीं, साहिब! वह अलग से ऊपर खाएँगी।’’
मैं एक लम्बी साँस भरकर जले सिगरेट के टुकड़े को पैर के नीचे कुचल देता हूँ। शायद साथ खाने के डर से छुटकारा पाने पर या शायद साथ न खा सकने की विवशता पर। उस खाने की मेज पर अकेले खाना खाते-खाते क्या सोचता रहा था, आज तो याद नहीं, बस इतना-सा याद है, काँटे-छुरी से उलझता बार-बार मैं बाहर की ओर देखता था।
मीठा कौर मुँह में लेते ही घोड़े की टाप सुनाई दी, ठिठककर सुना, ‘‘सलाम, साहिब।’’
धीमी मगर सधी आवाज, ‘‘दो घंटे तक पहुँच सकोगे न ?’’
‘‘जी, हुजूर। ’’

सीढ़ियों पर आहट हुई और शायद अपने कमरे तक पहुँचकर खत्म हो गई। खाने के बरतन उठ गए। मैं उठा नहीं। दोबारा कॉफी पी लेने के बाद भी वहीं बैठा रहा। एकाएक मन में आया कि किसी के छोटे से परिचय से मन में इतनी दुविधा उपजा लेना कम छोटी दुर्बलता नहीं है। आखिर किसी से मिल ही लिया हूँ, तो उसके लिए ऐसा-सा क्यों हुआ जा रहा हूँ।
घंटे-भर बाद मैं किसी की पैरों चली सीढ़ियों पर ऊपर चढ़ा जा रहा था। खुले द्वार पर परदा पड़ा था। हौले से थाप दी।
‘‘चले आइए।’’

परदा उठाकर देहरी पर पाँव रखा। हाथ में कश्मीरी शॉल लिये मन्नो सूटकेस के पास खड़ी थी। देखकर चौंकी नहीं। सहज स्वर में कहा, ‘‘आइए।’’ फिर सोफे पर फैले कपड़े उठाकर कहा, ‘‘बैठिए।’’
बैठते-बैठता सोचा, बुआ के घर भर में सबसे अधिक सजा और साफ कमरा यही है। नया-नया फर्नीचर, कीमती परदे और इन सबमें हल्के पीले कपड़ों में लिपटी मन्नो। अच्छा लगा।
बात करने को कुछ भी न पाकर बोला, ‘‘आप लंच तो…’’

‘‘जी, मैं कर चुकी हूँ।’’ और भरपूर मेरी ओर देखती रही।
मैं जैसे कुछ कहलवा लेने को कहता हूँ, ‘‘बुआ तो कहीं बाहर गई हैं।’’
सिर हिलाकर मन्नो शॉल की तह लगाती है और सूटकेस में रखते-रखते कहती है, ‘‘शाम से पहले ही नीचे उतर जाऊँगी। बुआ से कहिएगा एक ही दिन को आई थी।’’
‘‘बुआ तो आती ही होंगी।’’
इसका उत्तर न शब्दों में आया, न चेहरे पर से। कहते-कहते एक बार रुका, फिर न जाने कैसे आग्रह से कहा, ‘‘एक दिन और नहीं रुक सकेंगी !’’

वह कुछ बोली नहीं। बन्द करते सूटकेस पर झुकी रही।
फिर पल-भर बाद जैसे स्नेह भरे हाथ से अपने बालों को छुआ और हँसकर कहा, ‘‘क्या करूँगी यहाँ रहकर ? भुवाली के इतने बड़े गाँव के बाद यह छोटा सा शहर मन को भाता नहीं।’’
वह छोटी सी खिलखिलाहट, वह कड़वाहट से परे का व्यंग्य, आज इतने वर्षों के बाद भी, मैं वैसे ही, बिल्कुल वैसे ही सुन रहा हूँ। वही शब्द हैं, वही हँसी और वही पीली-सी सूरत…
हम संग-संग नीचे उतरे थे। मेरी बाँह पर मन्नो का कोट था। नौकर और माली ने झुककर सलाम किया और अतिथि से इनाम पाया। साईस ने घोड़े को थपथपाया।
‘‘हुजूर चढ़ेगी।’’
उड़ती-उड़ती नजर उन आँखों की, बाँह पर लटके कोट पर अटकी।
‘‘पैदल जाऊँगी। घोड़ा आगे-आगे लिए चलो।’’

चाहा कि घोड़े पर चढ़ जाने के लिए अनुरोध करूँ, पर कह नहीं पाया। फाटक से बाहर होते-होते वह पल-भर को पीछे मुड़ी, जैसे छोड़ने के पहले घर को देखती हो। फिर एकाएक अपने को सँभालकर नीचे उतर गई।
टैक्सी खड़ी थी। सामान लदा। ड्राइवर ने उन कठिन क्षणों को मानो भाँपकर कहा, ‘‘कुछ और देर है, साहिब।’’
मन्नो ने इस बार कहीं देखा नहीं। कोट लेने के लिए मेरी ओर हाथ बढ़ा दिया। कार में बैठी तो कुली ने तत्परता से पीछे से कम्बल निकाला और घुटनों पर डालते हुए कहा, ‘‘कुछ, और मेम साहिब ?’’
घुँघराली छाँह ढीली-सी होकर सीट के साथ जा टिकी। घुटनों पर पतली-पतली सी विवश बाँहें फैलाते हुए धीरे से कहा, ‘‘नहीं-नहीं, कुछ और नहीं। धन्यवाद।’’
अधखुले काँच में से अन्दर झाँका। मुख पर थकान के चिह्न थे। बाँहों में मछलीमुखी कंगन थे। आँखों में, क्या था, यह मैं पढ़ नहीं पाया। वही पीली, पतझड़ी दृष्टि उन हाथों पर जमी थी, जो कम्बल पर एक-दूसरे से लगे मौन पड़े थे।
कार स्टार्ट हुई। मैं पीछे हटा और कार चल दी। विदाई के लिए न हाथ उठे, न अधर हिले। मोड़ तक पहुँचने तक पीछे के शीशे से सादगी से बँधा बालों का रिबन देखता रहा और देर तक वह दर्दीले धन्यवाद की गूँज सुनता रहा-नहीं-नहीं, कुछ और नहीं।

वे पल अपनी कल्पना से आज भी लौटता हूँ तो जी को कुछ होने लगता है। उस कार को भगा ले जानेवाली सूखी सड़क से घूमकर मैं ताल के किनारे-किनारे चला जा रहा हूँ। अपने को समझाने-बुझाने पर भी वह चेहरा, वह बीमारी मन पर से नहीं उतरती। रुक-रुककर, थक-थककर जैसे मैं उस दिन घर की चढ़ाई चढ़ा था, उसे याद कर आज भी निढाल हो जाता हूँ। घर पहुँचा। बरामदे में से कुली फर्नीचर निकाल रहे थे। मन धक्का खाकर रह गया। तो उस मन्नो के कमरे की सजावट, सुख-सुविधा सब किराए पर बुआ ने जुटाए थे। दुपहर में बुआ के प्रति जो कुछ जितना भी अच्छा लगा था, वह सब उल्टा हो गया।

आगे बढ़ा, तो द्वार पर बुआ खड़ी थीं। सन्देह से मुझे देख और पास होकर फीके गले से कहा, ‘रवि, मुँह हाथ धो डालो, सामान सब तैयार मिलेगा वहाँ, जल्दी लौटोगे न, चाय लगने को ही है !’’
चुपचाप बाथरूम में पहुँच गया। सामान सब था। मुँह-हाथ धोने से पहले गिलास में ढँककर रखे गर्म पानी से गला साफ किया। ऐसा लगा, किसी की घुटी-घुटी जकड़ में से बाहर निकल आया हूँ। कपड़े बदलकर चाय पर जा बैठा। बच्चे नहीं, केवल बुआ थीं। बुआ ने चाय उँड़ेली और प्याला आगे कर दिया।
‘‘बुआ !’’

बुआ ने जैसे सुना नहीं।
‘‘बुआ, बुआ !’’-पल-भर के लिए अपने को ही कुछ ऐसा सा लगा कि किसी और को पुकारने के लिए बुला को पुकार रहा हूँ। बुआ ने विवश हो आँखें ऊपर उठाईं। समझ गया कि बुआ चाहती हैं, कुछ कहूँ नहीं, पर मैं रुका नहीं।
‘‘बुआ दो दिन की मेहमान तो एक ही दिन में चली गई।’’
सुनकर बुआ चम्मच से अपनी चाय हिलाने लगीं। कुछ बोली नहीं। इस मौन से मैं और भी निर्दयी हो गया।
‘‘कहती थी, बुआ से कहना मैं एक ही दिन को आई थी।’’
इसके आगे बुआ जैसे कुछ और सुन नहीं सकीं। गहरा लम्बा श्वास लेकर आहत आँखों से मुझे देखा, ‘‘तुम कुछ और नहीं कहोगे, रवि….’’ और चाय का प्याला वहीं छोड़ कमरे से बाहर हो गईं।

उस रात दौरे से फूफा के लौटने की बात थी। नौकर से पूछा तो पता लगा, दो दिन के बाद आने का तार आ चुका है। चाहा, एक बार बुआ के कमरे तक हो आऊँ, पर संकोचवश पाँव उठे नहीं। देर बाद सीढ़ियों में अपने को पाया, तो सामने मन्नो का खाली कमरा था। आगे बढ़कर बिजली जलाई, सब खाली था, न परदे, न फर्नीचर…न मन्नो…एकाएक अँगीठी में लगी लकड़ियों को देख मन में आया, आज वह यहाँ रहती, तो रात देर गए इसके पास यहीं बैठी रहती और मैं शायद इसी तरह जैसे अब यहाँ आया हूँ, उसके पास आता, उसके…
यह सब मैं क्या सोच रहा हूँ, क्यों सोच रहा हूँ…

किसी अनदेखे भय से घबराकर नीचे उतर आया। खिड़की से बाहर देखा, अँधेरा था। सिरहाना खींचा, बिजली बुझाई और बिस्तर पर पड़े-पड़े भुवाली की वह छोटी सी कॉटेज देखता रहा, जहाँ अब तक मन्नो पहुँच गई होगी।
‘‘रवि !’’
मैं चौंका नहीं, यह बुआ का स्वर था। बुआ अँधेरे में ही पास आ बैठीं और हौले-हौले सिर सहलाती रहीं।
‘‘बुआ।’’
बुआ का हाथ पल-भर को थमा फिर कुछ झुककर मेरे माथे तक आ गया। रुँधे स्वर से कहा, ‘‘रवि, तुम्हें नहीं, उस लड़की को दुलराती हूँ। अब यह हाथ उस तक नहीं पहुँचता…’’
मैं बुआ का नहीं, मन्नो का हाथ पकड़ लेता हूँ।

बुआ देर तक कुछ नहीं बोलीं। फिर जैसे कुछ समझते हुए अपने को कड़ा कर कहा, ‘‘रवि, उसके लिए कुछ मत सोचो, उसे अब रहना नहीं है।’’
मैं बुआ के स्पर्श तले सिहरकर कहता हूँ, ‘‘बुआ, मुझे ही कौन रहना है ?’’
आज वर्षों बाद भुवाली में पड़े-पड़े मैं असंख्य बार सोचता हूँ कि उस रात मैं अपने लिए यह क्यों कह गया था ! क्यों कह गया था वे अभिशाप के बोल, जो दिन-रात मेरे इस तन-मन पर से सच्चे उतरे जा रहे हैं ? सुनकर बुआ को कैसा लगा, नहीं जानता। वे हाथ खींचकर उठीं। रोशनी की, और पूरी आँखों से मुझे देखकर अविश्वास और भर्त्सना से कहा, ‘‘पागल हो गए हो, रवि ! उसके साथ अपनी बात जोड़ते हो, जिसके लिए कोई राह नहीं रह गई, कोई और राह नहीं रह गई।’’

फिर कुर्सी पर बैठते-बैठते कहा, ‘‘रवि, तुम तो उसे सुबह-शाम तक ही देख पाए हो। मैं वर्षों से उसे देखती आई हूँ और आज पत्थर-सी निष्ठुर हो गई हूँ। उसे अपना बच्चा ही करके मानती रही हूँ, यह नहीं कहूँगी। अपने बच्चों की तरह तो अपने बच्चों के सिवाय और किस रखा जा सकता है ! पर जो कुछ जितना भी था, वह प्यार वह देखभाल सब व्यर्थ हो गए हैं। कभी छुट्टी के दिन उसका बोर्डिग से आने की राह तकती थी, अब उसके आने से पहले उसके जाने का क्षण मनाती हूँ और डरकर बच्चों को लिये घर से बाहर निकल जाती हूँ।’’
बुआ के बोल कठिन हो आए।

‘‘रवि, जिसे बचपन में मोहवश कभी डराना नहीं चाहती थी, आज उसी से डरने लगी हूँ। उसकी बीमारी से डरने लगी हूँ।’’ फिर स्वर बदलकर कहा, ‘‘तुम्हारा ऐसा जीवट मुझमें नहीं कि कहूँ, डरती हूँ।’’ बुआ ने यह कहकर जैसे मुझे टटोला-और मैं बिना हिलेडुले चुपचाप लेटा रहा।
बुआ असमंजस में देर तक मुझे देखती रहीं। फिर जाने को उठीं और और रुक गईं। इस बार स्वर में आग्रह नहीं, चेतावनी थी, ‘‘रवि, कुछ हाथ नहीं लगेगा। जिसके लिए सब राह रुकी हों, उसके लिए भटको नहीं।’’
पर उस दिन बुआ की बात मैं समझा नहीं, चाहने पर भी नहीं।

अगली सुबह चाहा कि घूम-घूमकर दिन बिता दूँ। घोड़ा दौड़ाता लड़ियाकाँटा पहुँचा और उन्हीं पैरों लौट आया। घर की ओर मुँह करते करते, न जाने क्यों, मन को कुछ ऐसा लगा कि मुझे घर नहीं, कहीं और पहुँचना है। चढ़ाई के मोड़ पर कुछ देर खड़ा-खड़ा सोचता रहा और जब ढलती दुपहरी में तल्लीताल की उतराई उतरा तो मन के आगे सब साफ था।
मुझे भुवाली जाना था।

बस से उतरा। अड्डे पर रामगढ़ के लाल-लाल सेबों के ढेर देखकर यह नहीं लगा कि यही भुवाली है। बस में सोचता आया था कि वहाँ घुटन होगी; पर चीड़ के ऊँचे-ऊँचे पेड़ों से लहराती हवाएँ बह-बह आती थीं। छाँह ऊपर उठती है, धूप नीचे उतरती है और भुवाली मन को अच्छी लगती है। तन को अच्छी लगती है। चौराहे से होकर पोस्ट-ऑफिस पहुँचा। कॉटेज का पता लगा लिया और छोटे से पहाड़ी बाजार में होता हुआ ‘पाइंस’ की ओर हो लिया। खुली-चौड़ी सड़क के मोड़ से अच्छी सी पतली राह ऊपर जा रही थी। जँगले से नीचे देखा, अलग-अलग खड़े पहाड़ों के बीच की जगह पर एक खुली-चौड़ी घाटी बिछी थी। तिरछे-सीछे, खेत किसी के घुटने पर रखे कसीदे के कपड़े की तरह धरती पर फैले थे। दूर सामने दक्खिन की ओर पानी का ताल धूप में चाँदी के थाल की तरह चमकता था।

इस पहली बार भुवाली आने के बाद मैं एक बार नहीं, कई बार यहाँ आया लौट-लौटकर यहाँ आया, पर उस आने-जैसा आना तो फिर कभी नहीं आया। मैं चलता हूँ, चलता हूँ और कुछ सोचता नहीं हूँ। न यह सोचता हूँ कि मन्‍नो के पास जा रहा हूँ। न यह सोचता हूँ, कि मैं जा रहा हूँ। बस, चला जा रहा हूँ। पेड़ के तने पर लिखा है, ‘पाइंस’। लकड़ी का फाटक खोलता हूँ और गमलों की कतारों के साथ-साथ बरामदे तक पहुँच जाता हूँ। कार्पेट पर हौले-हौले पाँव रखता हूँ कि कम आवाज हो। द्वार खटखटाता हूँ और झुकी कमर पर अनुभवी चेहरा इधर बढ़ा आता है। जान लेता हूँ कि यही पुराना नौकर है।

“घर में हैं ?”
“बिटिया को पूछते हो, बेटा ?”
मैं सिर हिलाता हूँ। “बिटिया नीचे ताल को उतरी थीं; लौटती ही होंगी।’
मैं बाहर खुले में बैठा-बैठा प्रतीक्षा करता हूँ। मन्‍नो अब आ रही है; आनेवाली है, आती ही होगी।
थककर फाटक की ओर पीठ कर लेता हूँ। जब यह सोचूँगा कि वह देर से आएगी, तो वह जल्दी आएंगी।
घोड़े की टाप सुन पड़ती है। अपने को रोक लेता हूँ और मुड़कर देखता नहीं।

“बाबा !” पुकार का-सा स्वर। लगा कि दो आँखें मेरी पीठ पर हैं ! उठा। बढ़कर मन्‍नो की ओर देखा, आँखों में न आश्चर्य था, न उत्कंठा थी, न उदासीनता ही । बस, मन्‍नो की ही आँखों की तरह वह दो आँखें मेरी ओर देखती चली गई थीं।
“बाबा !”
बूढ़ा नौकर लपककर घोड़े के पास आया और लाड़ के से स्वर में बोला,
“उतरो बिटिया, बहुत देर कर दी?” और हाथ आगे बढ़ा दिया।
मन्‍नो सहारा लेकर नीचे उतरी, “तनिक अम्मा को तो बुलाओ, बाबा, मेरा जी अच्छा नहीं।”
“सुख तो है, बिटिया !”

चिन्ता का यह स्वर सुनकर बिटिया जरा सा हँस दी, फिर रुककर लम्बी साँस भरकर बोली, “अच्छी-भली हूँ, बाबा, बड़ी अम्मा से कहो, बिछौना लगा दे।”
बाबा ने बिटिया के लिए कुर्सी खींच दी। फिर सहमकर पूछा, “बिटिया लेटोगी ?”
“हाँ, बाबा।”
इस बार मन्‍नो ने झिझक से बाबा की ओर देखा नहीं, जैसे कोई अपराध बन आया हो, फिर मेरी ओर झुककर कहा, “क्या बहुत देर हुई ?”
“नहीं”-मैं सिर हिलाता हूँ, पर आँखें नहीं।
ठहरकर अधिकार से पूछता हूँ, “क्या जी अच्छा नहीं ?”
मन्‍नो ने पल-भर को थकी-थकी पलकें मूँद लीं और कुछ बोली नहीं।

बूढ़ी दासी दौड़ी-दौड़ी शॉल लिये आई और कन्धों पर ओढ़ाकर जैसे अपने को ही दिलासा देने के लिए कहा, “बिटिया, ख्याली क्‍यों घबराने लगी ! अभी सब ठीक हुआ जाता है। इनके लिए चाय भेजूँ ?”
मन्‍नो एकदम कुछ कह नहीं पाई। फिर कुछ सोचकर बोली, “अम्मा, पूछ देखो। पिएँगे तो नहीं।”
मैं कुछ ठीक-ठीक समझा नहीं । व्यस्त होकर कहा, “नहीं, नहीं, मुझे अभी कुछ भी पीना नहीं है।”
मन्‍नो ने जैसे न सुना, न मुझे देखा ही।
फिर जैसे अम्मा को मेरे परिचय की गम्भीरता जताने के लिए पूछा,
“चाची तो अच्छी हैं, अभी चाचा लौटे तो न होंगे ?”
बड़ी माँ झट समझ गईं, मन्‍नो की चाची के यहाँ से आया हूँ। बोली,
“बेटा, आने की ख़बर देते, तो मन्‍नो के लिए कुछ मँगवा लेती।”
“अम्मा, अन्दर जाके देखो न, मैं थकी हूँ अब बैठूँगी नहीं।”
मैं लज्जित-सा बैठा रहा। कुछ फल ही लिये आता।

मन्‍नो कुछ देर मेरे चेहरे पर मेरा मन पढ़ती रही, फिर धीमे से ऐसी बोली मानो मुझे नहीं, अपने को कहती है, “यहाँ न कुछ लाना ही ठीक है, न यहाँ से कुछ ले ही जाना…”
मैं अपनी नामसझी पर पछताकर रह गया।

मन्‍नो अन्दर चली, तो आप ही आप मैं भी साथ हो लिया। कम्बल उठाकर बड़ी माँ ने बिटिया को लिटाया, बाल ढीले करते-करते माथे को छुआ और मेरे लिए कुर्सी पास खींचकर बाहर हो गई।
“मन्नो !…”
मन्‍नो बोली नहीं। दुबली सी बाँह तनिक सी आगे की, और…फिर एकाएक कुछ सोचकर पीछे खींच ली।…

आज जब स्वयं भी मन्‍नो-सा बन गया हूँ, सौ बार अपने को न्यौछावर कर उसी क्षण को लौटा लेना चाहता हूँ। मैं कुर्सी पर बैठा-बैठा क्यों उस बाँह को छू नहीं सका था ? क्‍यों उस हाथ को सहला नहीं सका था ? उमड़ते मन को किसी ने जैसे जकड़कर वहीं, उस कुर्सी पर ठहरा लिया था।

क्या था उस झिझक में ? क्या था उस झिझकनेवाले मन में ? रहा होगा, यही भय रहा होगा, जो अब मुझसे मेरे प्रियजनों को दूर रखता है। उस रात जब जाने को उठा था, तो आँखों का मोह पीछे बाँधता था, मन का भय आगे खींचता था और जब जल्दी-जल्दी चलकर डाक-बँगले में पहुँच गया, तो लगा कि मुक्त हो गया हूँ, क्षण-क्षण जकड़ते बन्धन से मुक्त हो गया हूँ। उस अभागी रात में जो मुक्ति पाई थी, वह मुझे कितनी फली, चाहता हूँ, आज एक बार मन्‍नो देखती तो।

रात-भर ठीक से सो नहीं पाया। बार-बार नींद में लगता कि भुवाली में हूँ। भुवाली में सोया हूँ। वही ‘पाइंस’ का बड़ी-बड़ी खिड़कियों वाला कमरा है। मन्‍नो के पलंग पर लेटा हूँ और पास पड़ी कुर्सी पर बैठी-बैठी मन्‍नो अपनी उन्हीं दो आँखों से मुझे निहारती है। मैं हाथ आगे करता हूँ और वह थोड़ा सा हँसकर सिर हिलाती हुई कहती है, “नहीं, इसे कम्बल के नीचे कर लो। अब इसे कौन छुएगा ?”
मन्‍नो !
मन्‍नो कुछ कहती नहीं हँस-भर देती है। रात-भर इन दुःस्वप्नों में भटकने के बाद जगा, तो बुआ दीख पड़ीं, “कुछ हाथ नहीं लगेगा, रवि !”

उस सुबह फिर मैं रुका नहीं, न डाक-बँगले में, न भुवाली में। बस के अड्डे पर पहुँचा, तो धूप में बुझी-बुझी भुवाली मुझे भयावनी लगी। एक बार जी को टटोला-‘पाइंस’ नहीं…नहीं…कुछ नहीं…लौट जाओ।
घर पहुँचकर बुआ मिलीं। कड़ी चेतावनीवाला खिंचा-खिंचा चेहरा था।
भरपूर मुझे देखकर जैसे साँस रोके पूछा, “कहाँ थे कल ?”
“रानीखेत तक गया था, बुआ !”
“कह तो जाते।”
मैं न जाने किस उलझन में खोया कह गया, “कहने को, बुआ, था क्या?”

दोपहर में फूफा मिले। कल लौटे थे और सदा की तरह गम्भीर थे। खाना खाते उन्हें देखता रहा । एकाएक उन्हें प्लेट पर से आँखें उठाकर बुआ की ओर देखते हुए देखा, तो सचमुच मैं जान गया कि फूफा के भाई अवश्य ही मन्‍नो के पिता होंगे। दृष्टि में वही ठहराव था, वही अचंचलता थी।
फूफा ने खाने पर से उठते उठते उलझे से स्वर में मुझसे पूछा, “रवि, बुआ तुम्हारी लखनऊ तक जाना चाहती हैं, पहुँचा आ सकोगे ?”
“जी, सकूँगा।”

मैं, बुआ और बच्चे नैनी से उतर रहे हैं। मैं पीछे की सीट पर बैठा-बैठा विदा हो जाने की आकस्मिकता को सिगरेट के धुएँ में भूल जाने का प्रयत्न करता हूँ। चौड़े मोड़ से बस नीचे की ओर मुड़ी। खिड़की से बाहर देखा, तो पहाड़ की हरियाली में वही कलवाली भुवाली की सफेदी दीख रही थी।
काठगोदाम से लखनऊ। एक रात बुआ की ससुराल रुककर बुआ से विदा लेने गया, तो बुआ ने पूछा, “कहाँ जाने की सोच रहे हो, रवि, कुछ दिन यहीं न रुको !”
“नहीं, बुआ।”
बुआ इस ‘नहीं’ को एकाएक स्वीकार नहीं कर सकीं। पास बिठाकर कुछ देर देखती रहीं। फिर स्नेह से कहा, “फिर जाओगे कहाँ ?”
“बुआ, कुछ पता नहीं।”
बुआ कुछ कहना चाहती थीं, पर कह नहीं पा रही थीं। कुछ रुकते-रुकते कहा, “रवि, तुम्हारे फूफा तो तुम्हें वापस नैनी लौटने को कहते थे !”
“नहीं, बुआ ! अब तो दक्खिन जाऊँगा, पिताजी के पास।”
बुआ को जैसे विश्वास नहीं हुआ। कुछ याद-सी करती बोलीं, “रवि, इस बार तुम्हें वहाँ अच्छा नहीं लगा।”
“ऐसा नहीं, नहीं बुआ।”
बुआ चाहती थीं, मुझसे कुछ पूछें। मैं चाहता था, बुआ से कुछ कहूँ। पर किसी से भी शब्द जुड़े नहीं।

स्टेशन पर जाने लगा, तो बुआ के पाँव छुए ! बुआ बहुत बड़ी नहीं हैं मुझसे। पिताजी की सबसे छोटी मौसेरी बहन होती हैं, पर दिल में कुछ ऐसा-सा लगा कि बुआ का आशीर्वाद चाहता हूँ।
बुआ हैरान हुईं, फिर हँसकर बोलीं, “रवि, तुमने पाँव छुए हैं, तो आशीर्वाद जरूर दूँगी…बहुत सुन्दर बहू पाओ।”
मैं न हँसा, न लजाया। बुआ चुप सी रह गईं। जिस नटखट भाव से वह कुछ कह गई थीं, उसे मानो अनदेखे संकोच ने घेर लिया।

टिकट लिया, कुली के पास सामान छोड़ प्लेटफार्म पर घूमने लगा। आमने-सामने कोई गाड़ी नहीं थी। लाइनों पर बिछे खालीपन ने उलझे मन को एकाएक खोल दिया। जो कुछ भी सोच रहा था, सोचता चला गया। मन न भुवाली पर अटका, न “पाइंस” पर, न मन्‍नो पर। पिछला सब बीत गया लगा। बुआ का आशीर्वाद कल्पना में मुखर हो आया। घर होगा, घर की रानी होगी, मैं हूँगा…

बुआ का आशीर्वाद झूठ नहीं निकला। सच में ही मेरा घर बना। सुन्दर घरनी आई और उसे मैं ही ब्याह कर लाया। पर उस दिन जहाँ का टिकट ले लिया था, वहाँ की गाड़ी मुझे खींचकर प्लेटफार्म पर से ले जा नहीं सकी।
गाड़ी आ लगी है। कुली सामान लगाता है और मैं बाहर खड़े-खड़े देखता हूँ-मुसाफिर, कुली, सामान, बच्चे, बूढ़े…
“साहिब, गाड़ी छूटने पें दस मिनट हैं !”
मैं अपनी घड़ी देखता हैं, और सिर हिला देता हूँ कि मैं जानता हूँ।
कुली एक बार फिर अन्दर जाकर असबाब ऊपर नीचे करता है और साफा ठीक करते हुए बाहर निकलकर कहता है, “हरी बत्ती हो गई है, साहिब !”
बत्ती की ओर देखता हूँ। और देखता चला जाता हूँ, वही कद है, वही दुबली-पतली देह, वही धुला-धुला-सा चेहरा। वही…वही…
आवेश से कहता हूँ, “कुली, सामान उतार लो।”
“साहिब !”
“जल्दी करो, जल्दी ।”

कुली फिर मेरे सामान के पास है। टिकट वापिस कर नया ले लिया। स्टेशन से फल के टोकरे बँधवाए, चाय पी और बरेली के लिए गाड़ी में जा बैठा । जहाँ मुझे जाना है, वहीं जाकर रहूँगा। जब मैं ही नहीं रुकता हूँ तो मुझे कौन रोकेगा ? क्यों रोकेगा ? घर में आगे लॉन में बैठा सर्दियों की ढलती धूप में अलसा रहा हूँ। अन्दर से माँ निकली और पास बैठते हुए कहा, “बेटा, इस बार छुट्टी में आ ही गए हो तो ठहर जाओ। बार-बार इनकार करना अच्छा नहीं लगता।”

माँ की बात सुनकर मैं सयाने बेटे की तरह हँसता हूँ और मन-ही-मन सोचता हूँ कि माँ कितना ठीक कहती है। अपनी नौकरी पर रहता हूँ और अकेले आदमी के खर्च से कहीं अधिक कमाता हूँ, फिर क्‍यों इनकार करूँगा ! माँ की आशा के विपरीत बड़ी आवाज़ में कहता हूँ, “माँ, जो तुम्हें रुचे, वही मुझे भायेगा।”
“बेटा, लड़की देखना चाहोगे ?”
“हाँ, माँ !!”
लगा, माँ मन-ही-मन हँसी।

खाने के बाद रात को घृमकर आया, तो कमरे में शान्ति थी, मन में शान्ति थी। किसी को देखने के लिए कॉलेज के दिनोंवाली उतावली-जिज्ञासा मन में नहीं रह गई थी। लगा कि अकेले रहते-रहते किसी के संग की आशा नहीं कर रहा, उसे तो अपना अधिकार करके मान रहा हूँ।

हाथ में किताब लेकर रात को लेटा, तो पढ़ते-पढ़ते ऊब गया। आँखों के अँधेरे में देखा, किसी पहाड़ पर चढ़ा जा रहा हूँ। दूर चीड़ के पेड़ों के झुंड-के-झुंड दिखते हैं, आसमान सब सुनसान है, अपनी पद-चाप के सिवाय कोई आवाज नहीं। एकाएक किसी का स्वर गूँजता है, इधर…उधर और अँधेरे में हिलता एक हाथ आगे बढ़ा-बढ़ा आता है, मेरे गले की ओर, निकट और निकट…
दुबली कलाई…पतली अँगुलियाँ….मैं डरता हूँ…पीछे हटता हूँ और घबराकर आँखें खोल देता हूँ।

उठा, खिड़की का परदा उठाकर बाहर झाँका। लॉन के दाहिने हरी घास पर पिताजी के कमरे की लाइट फैली थी। सँभला ! लम्बी साँस लेकर बालों को छुआ, तो माथा ठंडा लगा। भयावना सूनापन और अँधेरे में वह हाथ… वह हाथ…

मन से जिसे भूल चुका हूँ, उसे आज ही याद क्यों आना था…क्यों याद आना था…क्यों दीख जाना था उस हाथ को, जो वर्षों गए ‘पाइंस’ की उतराई से उतरते-उतरते मैंने अन्तिम बार देखा था ? छुआ था नहीं कहूँगा, क्योंकि असंख्य बार सोच-सोचकर छू-भर लेने के लिए बाँह आगे करना, छू लेना नहीं होता।

महीना-भर नैनी में रहते हुए बार-बार भुवाली से लौटने के बाद जब अन्तिम बार मैं मन्‍नो के पास से लौटा था, तो लौट-लौटकर उस लौटने को न लौटना करना चाहता था। तीन बार नीचे उतरा था और तीन बार मुड़कर ऊपर गया था।

मन्‍नो शॉल में लिपटी आरामकुर्सी पर अधलेटी थी ! पास खड़े होकर उसकी चुप्पी को जैसे उस पर से उतार देने को उदास स्वर में कहा, “कल तो नैनी से नीचे उतर जाऊँगा।”
मन्‍नो ने नीचे फैले शाल को सहज-सहज सहेजा। एक महीने पहलेवाली दृष्टि मुख पर लौट आई। वही पराया-सा देखना, वही दूर-दूर-सा लगता चेहरा…
मन्‍नो…चाहता हूँ, मन्‍नो से कुछ तो कहूँ, पर क्या कहूँ ? यह कि जल्दी लौटूँगा…

क्षण-क्षण अपने से कहता हूँ, ‘आऊँगा, फिर आऊँगा’, पर जिस निगाह से मन्‍नो मुझे देखती है, वह जैसे बिना बोल के यह कहे जा रही है कि ‘अब तुम यहाँ नहीं आओगे।’
“मन्‍नो ।”
“रवि ।”-और…और बस कठिन-सी होकर थोड़ा सा हँसी और हाथ जोड़ दिए-नमस्कार !

इन जुड़े-जुड़े हाथों को देखता रहा। जरा-सा आगे बढ़ा कि विदा लूँ, विदा दूँ, पर न जाने क्‍यों खड़ा-का-खड़ा रह गया।
समझाने के-से स्वर में मन्‍नो बोली, “देर होती है, रवि।”
जी भरकर देखनेवाली अपनी आँखों को झुकाकर मैं जल्दी-जल्दी नीचे उतर गया।
मैं फिर लौटूँगा…फिर…पर क्या सदा के लिए चला जा रहा हूँ…
मुड़कर पीछे देखा और खिंचकर ठिठक गया। मन्‍नो वहीं उसी मुद्रा में बैठी थी।

मानो वह जानती थी कि लौटूँगा। साथ पड़ी कुर्सी की ओर संकेत कर कहा, “बैठो, रवि ।”-स्वर में न व्यया थी, न संग छूटने की उदासी थी, न मेरे आने का आश्चर्य था। आँखों-ही-आँखों ने कुछ ऐसा देखा, जैसे पूछती हो-कुछ कहना है क्या ?
मैं अपने को बच्चे की तरह छोटा करके कहता हूँ, “मन्‍नो, मन नहीं होता जाने को।”
मन्‍नो कुछ देर तक देखती रहती है। मैं चाहता हूँ, मन्‍नो कुछ भी कहे, कहे तो…

एक छोटी सी साँस जैसे छोटी-से-छोटी घड़ी के लिए उसके गले में अटकी, फिर, फिर घने स्वर में कहा, “एक-न-एक बार तो तुम्हें चले ही जाना है, रवि…”

मैं हाथों से घेरकर उस देह को नहीं तो उस स्वर को छू लेना चाहता हूँ, चूम लेना चाहता हूँ।-“मन्‍नो !”-आगे बढ़ता हूँ, कुछ रोक लेने की, थाम लेने की मुद्रा में मन्‍नो दोनों हाथ आगे डाल देती है, बस।
“मन्नो !…” अपना अनुरोध उस तक पहुँचाना चाहता हूँ।
“नहीं !”…इस ‘नहीं’ के आगे नहीं है और कुछ, नहीं।
मन्‍नो दुबला सा हाथ हिलाकर आँखों से मुझे विदा देती है और मैं विवश सा व्यर्थ सा नीचे उतरता हूँ।
आँखों पर धुन्ध-सी उमड़ आती है, सँभलता हूँ, सँभलता हूँ और एक बार फिर पीछे देखता हूँ।

बिल्कुल ऐसे लगता है कि किनारे पर खड़ा हूँ और किश्ती में बैठी मन्‍नो बही चली जा रही है…वह मुझे नहीं देखती, नहीं देखती, उसकी आँखों के आगे उसके अपने हाथों की रोक है, अपने हाथों की ओट है।

हाथों पर टिका मन्‍नो का सिर नीचे झुका है, आँखें शायद बन्द हैं, शायद गीली हैं। उस कड़े आहत अभिमान की बात सोचकर छटपटाता हूँ।
कदम उठाकर फाटक के पास पहुँचा, तो सिसकियाँ सुनकर रुक गया।
मन-ही-मन दुहराकर कहा-‘मन्नो !…मन्‍नो !…’
इसी पुकार को पलटकर जैसे उत्तर आया-‘ठहरो नहीं ! रुको नहीं !’

सच ही मैं ठहरा नहीं। उतरता चला गया और हर पग के साथ दूर होता चला गया, उस कॉटेज से, कॉटेज में रहनेवाली मन्‍नो से, मन्‍नो की उन दो आँखों से, पर मन्‍नो की स्मृति से नहीं। मन्‍नो की याद मुझे आज भी आती है। आज भी वह याद आती है, वह दुपहरी, जब मन्‍नो और मैं उस बड़ी झील के किनारे से लगी पगडंडी पर घूमते रहे थे। मीठा-मीठा-सा दिन था। पहली बार उस पीले चेहरे की मिठास के सम्मुख मैं पानी-सा बह गया था। एकटक उन घुँघराले बालों को देखता रह गया था। और देखता गया था शॉल में लिपटे उन कन्धों को, जो पैरों की धीमी चाल से थककर भी झुकते नहीं थे।

परिक्रमा का अन्तिम मोड़ आया, तो बहुत बड़े घने वृक्ष के नीचे देवी के दो छोटे-छोटे मन्दिर दिखे। टीन के कपाट बन्द थे। कुछ अधिक न सोचकर आगे बढ़ने को हुआ कि मन्‍नो को देखकर रुक गया। खड़ी-खड़ी कुछ देर सोचती रही। फिर जूते उतार नंगे पाँव किनारे के पत्थरों से नीचे उतर गई। बड़े से पत्थर पर पाँव जमाया और झुककर डंठल से कमल तोड़ वापस लौट आई। मैं तो कुछ सोच नहीं रहा था। बस, देखता चला जा रहा था। शॉल सिर पर कर लिया था और उन बन्द कपाटों के आगेवाली दहलीज पर फूल रखकर सिर नवा दिया।

मन्दिर के बन्द कपाटों के आगे माथा टेक मन्‍नो उठी, तो मानो मन्‍नो-सी नहीं लग रही थी। ऐसे दिखा कि यह झुकी छाया मन्‍नो नहीं, मन्‍नो की व्यर्थ हो गई विवशता थी, जिसने भाग्य के इन बन्द कपाटों के आगे माथा टेक दिया था। इस निर्मम अकेलेपन के लिए मन में ढेर सा दर्द उठ आया। बहते से स्वर में कहा, “दर्शन करने का मन हो, मन्‍नो, तो किसी से पुजारी का स्थान पूछूँ ?”

मन्‍नो ने कुछ कहने से पहले स्वर को सँभाला, फिर सिर हिलाकर कहा, “नहीं, रवि, ऐसा कुछ नहीं। मुझे कौन वरदान माँगने हैं ! अपने लिए तो कपाट बन्द हो गए हैं। बस, इतना ही चाहती हूँ, यह कपाट उनके लिए खुले रहें, जिनसे बिछुड़कर मैं अलग आ पड़ी हूँ।”

मन्‍नो को छूने का भय, उसके रोग का भय, जो अब तक मुझे रोकता था, बींधता था, अलग जा पड़ा । झील की ठंडी हवा में फहराते-से घुँघराले बालों पर झुककर बाँह से घेरते हुए कहा, “मन्नो !”

मन्‍नो चौंकी नहीं। कन्धे पर पड़ा हाथ धीरे से अलग कर दिया और समूची आँखों से देखते हुए बोली, “रवि, जिसे तुम झेल नहीं सकते, उसके लिए हाथ न बढ़ाओ।”

आवाज में न उलाहना था, न व्यंग्य था, न कटुता। बस, जो कहने को था, वही कहा गया था। इस कहने का उत्तर मैं उस दिन नहीं दे पाया। बार-बार मन्‍नो के पास जाने पर भी नहीं दे पाया और नहीं दे पाया विदा के उन क्षणों में, जब मन्‍नो को रोता छोड़ मैं अन्तिम बार ‘पाइंस’ की उतराई उतरता चला गया था। जिस दुर्बलता से कायर बनकर डरा था, वह आज अपने पर ही बीत गई है। आज अपने लिए, मन्‍नो के लिए उस कायरता को कोसता हूँ।

घर में चहल-पहल थी। माँ को सुन्दर बहू मिली, मुझे भली संगिनी। भोलेपन से मुस्कुराती मीरा को देखता हूँ, तो कहीं खो जाने को मन चाहता है। लेकिन अब खोऊँगा क्‍यों ? अब तो बँध गया हूँ, बँधा रहूँगा। आसपास नाते-रिश्ते हैं, मित्र-बन्धु हैं। व्याहवाले घर के ऊँचे कहकहे सुनकर खुशी से मन उमड़-उमड़ आता है। कैसा आयोजन होता है वह भी । एक दिन जो बात शुरू हो जाती है, उसे सम्पूर्णतया पूर्ण कर दिया जाता है। इतने समूचे मन से व्याह के सिवाय और क्‍या होता है, जो सम्पन्न होकर, एक टेक पर, एक विराम पर पहुँच जाता है ! तन-मन, घर-द्वार, अन्दर-बाहर सब एक ही प्यार में भीग जाते हैं। कल मीरा को लेकर समुद्र किनारे चला जाऊँगा। महीना-भर रुककर वहाँ के लिए प्रस्थान करेंगे, जहाँ अब तक मैं बेघर-सा होकर रहता रहा हूँ।

उस अपार, असीम सागर के किनारे एक-दूसरे पर छा-छा जाते हम घंटों घूमते रहे। बीच-बीच में ठहरते और मोहवश एक-दूसरे में छिपे अपने-अपने प्यार को चूमते। सुबह-शाम, दिन-रात कहाँ छिपते, कहाँ डूबते, यह हम देख-देखकर भी नहीं देखते थे।

इसके बाद, प्रहरों की तरह बीत गए वे दस वर्ष। संग-संग लगे बिछोह से दूर मग्न दिन-रात। मीरा और बच्चों से दूर इस कॉटेज में पड़ा-पड़ा आज भी पीछे लौटता हूँ, तो बहुत निकट से किसी साँस का स्वर सुनता हूँ।

हम कितने सुखी हैं, कितने ! चाहता हूँ किसी की आँखों में देखकर इसका उत्तर दूँ। किसी को छूकर कुछ कहूँ, पर सुननेवाला कोई पास नहीं। बच्चों के लिए मीरा ने मेरा मोह छोटा कर लिया।

गए महीने रानीखेत जाते मीरा बच्चों के संग घंटे-भर को यहाँ रुकी थी। बरामदे में लेटे-लेटे उन तीनों को ऊपर आते देखता रहा। फाटक पर पहुँचकर मीरा पल-भर को ठिठकी थी। फिर दोनों हाथों से बच्चों को घेरे अन्दर ले आई।
“मुन्ना, रानी, प्रणाम करो, बेटा !”
बच्चों के झिझक से बँधे हाथ मेरी ओर उठे।

देखकर कंठ भर आया। मेरा भाग्य मुझसे दूर, मुझसे अलग जा पड़ा है। मेरे ही बच्चे आश्चर्य की दृष्टि से मुझे देख माँ की आज्ञा का पालन कर रहे हैं।

मीरा जब तक रही, आँखें पोंछती रही। कुछ कहने को, कुछ पूछने को उसका स्वर बँधा नहीं । अपने सुन्दर सुकुमार बच्चों को अपने ही डर के कारण पूरी तरह निरख नहीं पाया। केवल मीरा की ओर देखता रहा कि जो आज मुझे मिलने आई है, उसमें मेरी पत्नी कहाँ है, कहाँ है वह, जो सचमुच में मेरी थी!

भरी आँखों से मीरा की कलाई की घड़ी देखने की निठुराई से आहत हो मैं फटी-फटी, रूखी दृष्टि से फाटक की ओर देखने लगा कि मेरा ही परिवार कुछ क्षण में मुझे यहाँ अकेला छोड़, मुझसे दूर चला जाएगा। एक बार मन हुआ कि बच्चों को पकड़नेवाली उन दो बाँहों को अपनी ओर खींचकर कहूँ, मैं तुम्हें नहीं जाने दूँगा, नहीं जाने दूँगा। पर बच्चों की छोटी-छोटी आँखों का अपरिचय उस आवेश को दूर तक काटता चला गया।

चौंककर देखा, मीरा पास आकर झुकी और अधरों से मस्तक छूकर हौले से पीछे हट गई। उठ बैठा कि एक वार प्यार दूँ, एक बार प्यार लूँ…कि हाथों में मुँह छिपा रोते-रोते मीरा इन बाहों से आ लगी।

मीरा की आँखों से भीगी अपनी रोती आँखों को पोंछकर आसपास देखा, तो टूटा बाँध सबकुछ बहा ले गया था। न पास मीरा थी, न बच्चे…

तकियों के सहारे सिर ऊँचा करके देखा, उतराई के तीसरे मोड़ पर तीनों चले जा रहे थे। मीरा मेरी ओर से पीठ मोड़े आगे की ओर झुकी थी, बच्चे एक-दूसरे की उँगली पकड़े कभी माँ को देखते होंगे, कभी राह को।

साँस रोके प्रतीक्षा करता रहा, पर किसी ने पीछे नहीं देखा, न मीरा ने, न मेरे बेटे ने…कंवल छोटी रानी के बालों में गुँथा गुलाबी रिबन देर तक हिल-हिलकर मेरी आँखों से कहता रहा-‘पापा, हम चले गए, पापा, हम चले गए !’

सच ही सब चले गए हैं। इसलिए नहीं कि उन्हें जाना था, इसलिए कि मैं चला जा रहा हूँ। ऐसे ही एक दिन मन्‍नो के जाने को भापकर मैं उतराई से उतरता चला गया था। मेरी ही तरह अकेले में मन्‍नो रोई थी। अब जान पाया हूँ कि हाथों में मुँह छिपाकर वह रोना, कितना अकेला रोना था। पर उस बार जाकर बरसों मैंने मन्‍नो की सुधि नहीं ली। जब कभी नींद में देखता वह दुबली देह, बड़ी-बड़ी आँखें और कम्बल पर फैली पतली-पतली बाँहें, तो जागकर उद्वेग से मीरा की ओर बढ़ जाता।
एक बार दौरे पर लखनऊ आया, तो बुआ मिलीं। देर तक इधर-उधर की बातें करने के बाद एकाएक स्वर बदल बोलीं, “रवि, मन्‍नो तो अब नहीं रही ।”
“नहीं, बुआ !”-मैं पिता हो जाने के गाम्भीर्य को सँभालते कहता हूँ,
“नहीं बुआ, नहीं…”
बुआ जैसे मुझे, कहीं वर्षों पहले के उस रवि को, कहती हैं, “रात को सोई तो जगी नहीं। अम्मा छुट्टी पर थी। सुबह-सुबह ख्याली अन्दर आया, तो साँस चुक गई थी।”
मैं रुँधे गले से जैसे कुछ पूछने को कहता हूँ, “बुआ !”
बुआ आँख पोंछती कुछ सोचती रहीं, फिर दर्द से बोलीं, “रवि, एक बार उसे पत्र तो लिखते !”
मैं रूमाल से रुलाई सोखने लगा।
“तुम्हारे नाम का एक पार्सल छोड़ गई थी आलमारी में । खोला तो जर्सी थी।”
दूसरे दिन बुआ के पास फिर आया, तो जल्दी-जल्दी पाँव छूकर कहा, “अच्छा, बुआ…”
“रवि !”-बुआ की वही कलवाली आवाज़ थी।
मैंने सिर हिलाकर घोर विवशता के-से स्वर में कहा, “नहीं बुआ, नहीं ।”

बुआ समझ गईं, मैं कुछ भी जानना नहीं चाहता हूँ। पर जैसे मन-ही-मन मन्‍नो के लिए टूटकर बोलीं, “यही बार-बार सोचती हूँ कि जिसके प्यार को भी कोई न छू सके, ऐसा दुर्भाग्य उसे क्‍यों मिला, क्यों मिला ?”

लखनऊ से लौटकर मैं कई दिन मन से मन्‍नो को उतार नहीं पाया। यही देखता कि “पाइंस’ में कुर्सी पर बैठी वह मेरे लिए जर्सी तैयार कर रही है, वही हाथ हैं, वही दृष्टि है…

और एक दिन साल-भर घर में बीमार रहने के बाद मैं भुवाली पहुँच गया। वही चीड़ की ठंडी हवाएँ थीं, वही सुहानी धूप थी। वही भुवाली थी और वही मैं था। पर इस बार किसी का पता करने मुझे पोस्ट-ऑफिस की ओर नहीं जाना था। ‘पाइंस’ के सामनेवाले पहाड़ पर किसी के अभिशाप से बनी कॉटेज में पहली बार सोया, तो भर-भर आते कंठ से रात-भर एक ही नाम पुकारता रहा-“मन्‍नो !…मन्‍नो !”…आज वह होती, तो मुझे झेल लेती…

हर रोज सुबह उठते बरामदे से “पाइंस” देखता हूँ और मन-ही-मन कहता हूँ–‘मन्नो !…मन्‍नो !’

जिस मीरा को मैंने वर्षों जाना है, वह अब पास-सी नहीं लगती, अपनी-सी नहीं लगती। उसे मैंने छू-छूकर छुआ था, चूम-चूमकर घूमा था, पर मन पर जब मोह और प्यार की उछलन आती है, तो मीरा नहीं, मन्‍नो की आँखें ही सगी दिखती हैं।

खिड़की के सामने लेटे-लेटे, अकेलेपन से घबराकर जब मैं बाहर देखता हूँ तो धुन्ध-भरे बादलों के घेरों में घुँघराले बालोंवाला वही चेहरा दीखता है, वही…

आए दिन दवा के नए बदलते हुए रंग देखकर अब इतना तो जान गया हूँ कि इस छूटते-छूटते तन में मन को बहुत देर भटकना नहीं होगा। एक दिन खिड़की से बाहर देखते-देखते इन्हीं बादलों के घेरे में समा जाऊँगा।… इन्हीं में समा जाऊँगा।

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दिल्ली में एक मौत-कमलेश्वर

अनुमानित समय : 10 मिनट-

मैं चुपचाप खडा सब देख रहा हूँ और अब न जाने क्यों मुझे मन में लग रहा है कि दीवानचंद की शवयात्रा में कम से कम मुझे तो शामिल हो ही जाना चाहिए था। उनके लडके से मेरी खासी जान-पहचान है और ऐसे मौके पर तो दुश्मन का साथ भी दिया जाता है। सर्दी की वजह से मेरी हिम्मत छूट रही है… पर मन में कहीं शवयात्रा में शामिल होने की बात भीतर ही भीतर कोंच रही है।
चारों तरफ कुहरा छाया हुआ है। सुबह के नौ बजे हैं, लेकिन पूरी दिल्ली धुँध में लिपटी हुई है। सडकें नम हैं। पेड भीगे हुए हैं। कुछ भी साफ दिखाई नहीं देता। जिंदगी की हलचल का पता आवाजों से लग रहा है। ये आवाजें कानों में बस गई हैं। घर के हर हिस्से से आवाजें आ रही हैं। वासवानी के नौकर ने रोज की तरह स्टोव जला दिया है, उसकी सनसनाहट दीवार के पार से आ रही है। बगल वाले कमरे में अतुल मवानी जूते पर पालिश कर रहा है… ऊपर सरदारजी मूँछों पर फिक्सो लगा रहे हैं… उनकी खिडकी के परदे के पार जलता हुआ बल्ब बडे मोती की तरह चमक रहा है। सब दरवाजे बंद हैं, सब खिडकियों पर परदे हैं, लेकिन हर हिस्से में जिंदगी की खनक है। तिमंजिले पर वासवानी ने बाथरूम का दरवाजा बंद किया है और पाइप खोल दिया है…
कुहरे में बसें दौड रही हैं। जूँ-जूँ करते भारी टायरों की आवाजें दूर से नजदीक आती हैं और फिर दूर होती जाती हैं। मोटर-रिक्शे बेतहाशा भागे चले जा रहे हैं। टैक्सी का मीटर अभी किसी ने डाउन किया है। पडोस के डॉक्टर के यहाँ फोन की घंटी बज रही है। और पिछवाडे गली से गुजरती हुई कुछ लडकियाँ सुबह की शिफ्ट पर जा रही हैं।
सख्त सर्दी है। सडकें ठिठुरी हुई हैं और कोहरे के बादलों को चीरती हुई कारें और बसें हॉर्न बजाती हुई भाग रही हैं। सडकों और पटरियों पर भीड है,पर कुहरे में लिपटा हुआ हर आदमी भटकती हुई रूह की तरह लग रहा है।
वे रूहें चुपचाप धुँध के समुद्र में बढती जा रही हैं… बसों में भीड है। लोग ठंडी सीटों पर सिकुडे हुए बैठे हैं और कुछ लोग बीच में ही ईसा की तरह सलीब पर लटके हुए हैं बाँहें पसारे, उनकी हथेलियों में कीलें नहीं, बस की बर्फीली, चमकदार छडें हैं।
और ऐसे में दूर से एक अर्थी सडक पर चली आ रही है। इस अर्थी की खबर अखबार में है। मैंने अभी-अभी पढी है। इसी मौत की खबर होगी। अखबार में छपा है आज रात करोलबाग के मशहूर और लोकप्रिय बिजनेस मैगनेट सेठ दीवानचंद की मौत इरविन अस्पताल में हो गई। उनका शव कोठी पर ले आया गया है। कल सुबह नौ बजे उनकी अर्थी आर्य समाज रोड से होती हुई पंचकुइयाँ श्मशान-भूमि में दाह-संस्कार के लिए जाएगी।
और इस वक्त सडक पर आती हुई यह अर्थी उन्हीं की होगी। कुछ लोग टोपियाँ लगाए और मफलर बाँधे हुए खामोशी से पीछे-पीछे आ रहे हैं। उनकी चाल बहुत धीमी है। कुछ दिखाई पड रहा है, कुछ नहीं दिखाई पड रहा है, पर मुझे ऐसा लगता है अर्थी के पीछे कुछ आदमी हैं।
मेरे दरवाजे पर दस्तक होती है। मैं अखबार एक तरफ रखकर दरवाजा खोलता हूँ। अतुल मवानी सामने खडा है। ‘यार, क्या मुसीबत है, आज कोई आयरन करने वाला भी नहीं आया, जरा अपना आयरन देना। अतुल कहता है तो मुझे तसल्ली होती है। नहीं तो उसका चेहरा देखते ही मुझे खटका हुआ था कि कहीं शवयात्रा में जाने का बवाल न खडा कर दे। मैं उसे फौरन आयरन दे देता हूँ और निश्चिंत हो जाता हूँ कि अतुल अब अपनी पेंट पर लोहा करेगा और दूतावासों के चक्कर काटने के लिए निकल जाएगा।
जब से मैंने अखबार में सेठ दीवानचंद की मौत की खबर पढी थी, मुझे हर क्षण यही खटका लगा था कि कहीं कोई आकर इस सर्दी में शव के साथ जाने की बात न कह दे। बिल्डिंग के सभी लोग उनसे परिचित थे और सभी शरीफ, दुनियादार आदमी थे।
तभी सरदारजी का नौकर जीने से भडभडाता हुआ आया और दरवाजा खोलकर बाहर जाने लगा। अपने मन को और सहारा देने के लिए मैंने उसे पुकारा, ‘धर्मा! कहाँ जा रहा है? ‘सरदारजी के लिए मक्खन लेने, उसने वहीं से जवाब दिया तो लगे हाथों लपककर मैंने भी अपनी सिगरेट मँगवाने के लिए उसे पैसे थमा दिए।
सरदारजी नाश्ते के लिए मक्खन मँगवा रहे हैं, इसका मतलब है वे भी शवयात्रा में शामिल नहीं हो रहे हैं। मुझे कुछ और राहत मिली। जब अतुल मवानी और सरदारजी का इरादा शवयात्रा में जाने का नहीं है तो मेरा कोई सवाल ही नहीं उठता। इन दोनों का या वासवानी परिवार का ही सेठ दीवानचंद के यहाँ ज्यादा आना-जाना था। मेरी तो चार-पाँच बार की मुलाकात भर थी। अगर ये लोग ही शामिल नहीं हो रहे हैं तो मेरा सवाल ही नहीं उठता।
सामने बारजे पर मुझे मिसेस वासवानी दिखाई पडती हैं। उनके खूबसूरत चेहरे पर अजीब-सी सफेदी और होंठों पर पिछली शाम की लिपस्टिक की हल्की लाली अभी भी मौजूद थी। गाउन पहने हुए ही वे निकली हैं और अपना जूडा बाँध रही हैं। उनकी आवाज सुनाई पडती है, ‘डार्लिंग, जरा मुझे पेस्ट देना, प्लीज…
मुझे और राहत मिलती है। इसका मतलब है कि मिस्टर वासवानी भी मैयत में शामिल नहीं हो रहे हैं।
दूर आर्य समाज रोड पर वह अर्थी बहुत आहिस्ता-आहिस्ता बढती आ रही है…
अतुल मवानी मुझे आयरन लौटाने आता है। मैं आयरन लेकर दरवाजा बंद कर लेना चाहता हूँ, पर वह भीतर आकर खडा हो जाता है और कहता है, ‘तुमने सुना, दीवानचंदजी की कल मौत हो गई है।
‘मैंने अभी अखबार में पढा है, मैं सीधा-सा जवाब देता हूँ, ताकि मौत की बात आगे न बढे। अतुल मवानी के चेहरे पर सफेदी झलक रही है, वह शेव कर चुका है। वह आगे कहता है, ‘बडे भले आदमी थे दीवानचंद।
यह सुनकर मुझे लगता है कि अगर बात आगे बढ गई तो अभी शवयात्रा में शामिल होने की नैतिक जिम्मेदारी हो जाएगी, इसलिए मैं कहता हूँ, ‘तुम्हारे उस काम का क्या हुआ?
‘बस, मशीन आने भर की देर है। आते ही अपना कमीशन तो खडा हो जाएगा। यह कमीशन का काम भी बडा बेहूदा है। पर किया क्या जाए? आठ-दस मशीनें मेरे थ्रू निकल गईं तो अपना बिजनेस शुरू कर दूँगा। अतुल मवानी कह रहा है, ‘भई, शुरू-शुरू में जब मैं यहाँ आया था तो दीवानचंदजी ने बडी मदद की थी मेरी। उन्हीं की वजह से कुछ काम-धाम मिल गया था। लोग बहुत मानते थे उन्हें।
फिर दीवानचंद का नाम सुनते ही मेरे कान खडे हो जाते हैं। तभी खिडकी से सरदारजी सिर निकालकर पूछने लगते हैं, ‘मिस्टर मवानी! कितने बजे चलना है?
‘वक्त तो नौ बजे का था, शायद सर्दी और कुहरे की वजह से कुछ देर हो जाए। वह कह रहा है और मुझे लगता है कि यह बात शवयात्रा के बारे में ही है।
सरदारजी का नौकर धर्मा मुझे सिगरेट देकर जा चुका है और ऊपर मेज पर चाय लगा रहा है। तभी मिसेज वासवानी की आवाज सुनाई पडती है, ‘मेरे खयाल से प्रमिला वहाँ जरूर पहुँचेगी, क्यों डार्लिंग?
‘पहुँचना तो चाहिए। …तुम जरा जल्दी तैयार हो जाओ। कहते हुए मिस्टर वासवानी बारजे से गुजर गए हैं।
अतुल मुझसे पूछ रहा है, ‘शाम को कॉफी-हाउस की तरफ आना होगा?
‘शायद चला आऊँ, कहते हुए मैं कम्बल लपेट लेता हूँ और वह वापस अपने कमरे में चला जाता है। आधे मिनट बाद ही उसकी आवाज फिर आती है, ‘भई, बिजली आ रही है? मैं जवाब दे देता हूँ, ‘हाँ, आ रही है। मैं जानता हूँ कि वह इलेक्ट्रिक रॉड से पानी गर्म कर रहा है, इसीलिए उसने यह पूछा है।
‘पॉलिश! बूट पॉलिश वाला लडका हर रोज की तरह अदब से आवाज लगाता है और सरदारजी उसे ऊपर पुकार लेते हैं। लडका बाहर बैठकर पॉलिश करने लगता है और वह अपने नौकर को हिदायतें दे रहे हैं, ‘खाना ठीक एक बजे लेकर आना।… पापड भूनकर लाना और सलाद भी बना लेना…। मैं जानता हूँ सरदारजी का नौकर कभी वक्त से खाना नहीं पहुँचाता और न उनके मन की चीजें ही पकाता है।
बाहर सडक पर कुहरा अभी भी घना है। सूरज की किरणों का पता नहीं है। कुलचे-छोलेवाले वैष्णव ने अपनी रेढी लाकर खडी कर ली है। रोज की तरह वह प्लेटें सजा रहा है, उनकी खनखनाहट की आवाज आ रही है।
सात नंबर की बस छूट रही है। सूलियों पर लटके ईसा उसमें चले जा रहे हैं और क्यू में खडे और लोगों को कंडक्टर पेशगी टिकट बाँट रहा है। हर बार जब भी वह पैसे वापस करता है तो रेजगारी की खनक यहाँ तक आती है। धँध में लिपटी रूहों के बीच काली वर्दी वाला कंडक्टर शैतान की तरह लग रहा है।
और अर्थी अब कुछ और पास आ गई है।
‘नीली साडी पहन लूँ? मिसेज वासवानी पूछ रही हैं।
वासवानी के जवाब देने की घुटी-घुटी आवाज से लग रहा है कि वह टाई की नॉट ठीक कर रहा है।
सरदारजी के नौकर ने उनका सूट ब्रुश से साफ करके हैंगर पर लटका दिया है। और सरदारजी शीशे के सामने खडे पगडी बाँध रहे हैं।
अतुल मवानी फिर मेरे सामने से निकला है। पोर्टफोलियो उसके हाथ में है। पिछले महीने बनवाया हुआ सूट उसने पहन रखा है। उसके चेहरे पर ताजगी है और जूतों पर चमक। आते ही वह मुझे पूछता है, ‘तुम नहीं चल रहे हो? और मैं जब तक पूछूँ कि कहाँ चलने को वह पूछ रहा है, वह सरदारजी को आवाज लगाता है, ‘आइए, सरदारजी! अब देर हो रही है। दस बज चुका है।
दो मिनट बाद ही सरदारजी तैयार होकर नीचे आते हैं कि वासवानी ऊपर से ही मवानी का सूट देखकर पूछता है, ‘ये सूट किधर सिलवाया?
‘उधर खान मार्केट में।
‘बहुत अच्छा सिला है। टेलर का पता हमें भी देना। फिर वह अपनी मिसेज को पुकारता है, ‘अब आ जाओ, डियर!… अच्छा मैं नीचे खडा हूँ तुम आओ। कहता हुआ वह भी मवानी और सरदारजी के पास आ जाता है और सूट को हाथ लगाते हुए पूछता है, ‘लाइनिंग इंडियन है।
‘इंग्लिश!
‘बहुत अच्छा फिटिंग है! कहते हुए वह टेलर का पता डायरी में नोट करता है। मिसेज वासवानी बारजे पर दिखाई पडती हैं।
अर्थी अब सडक पर ठीक मेरे कमरे के नीचे है। उसके साथ कुछेक आदमी हैं, एक-दो कारें भी हैं, जो धीरे-धीरे रेंग रही हैं। लोग बातों में मशगूल हैं।
मिसेज वासवानी जूडे में फूल लगाते हुए नीचे उतरती हैं तो सरदारजी अपनी जेब का रुमाल ठीक करने लगते हैं। और इससे पहले कि वे लोग बाहर जाएँ वासवानी मुझसे पूछता है, ‘आप नहीं चल रहे?
‘आप चलिए मैं आ रहा हूँ मैं कहता हूँ पर दूसरे ही क्षण मुझे लगता है कि उसने मुझसे कहाँ चलने को कहा है? मैं अभी खडा सोच ही रहा रहा हूँ कि वे चारों घर के बाहर हो जाते हैं। अर्थी कुछ और आगे निकल गई है। एक कार पीछे से आती है और अर्थी के पास धीमी होती है। चलाने वाले साहब शवयात्रा में पैदल चलने वाले एक आदमी से कुछ बात करते हैं और कार सर्र से आगे बढ जाती है। अर्थी के साथ पीछे जाने वाली दोनों कारें भी उसी कार के पीछे सरसराती हुई चली जाती हैं।
मिसेज वासवानी और वे तीनों लोग टैक्सी स्टैंड की ओर जा रहे हैं। मैं उन्हें देखता रहता हूँ। मिसेज वासवानी ने फर-कालर डाल रखा है। और शायद सरदारजी अपने चमडे के दास्ताने पहने हैं और वे चारों टैक्सी में बैठ जाते हैं। अब टैक्सी इधर ही आ रही है और उसमें से खिलखिलाने की आवाज मुझे सुनाई पड रही है। वासवानी आगे सडक पर जाती अर्थी की ओर इशारा करते हुए ड्राइवर को कुछ बता रहा है।…
मैं चुपचाप खडा सब देख रहा हूँ और अब न जाने क्यों मुझे मन में लग रहा है कि दीवानचंद की शवयात्रा में कम से कम मुझे तो शामिल हो ही जाना चाहिए था। उनके लडके से मेरी खासी जान-पहचान है और ऐसे मौके पर तो दुश्मन का साथ भी दिया जाता है। सर्दी की वजह से मेरी हिम्मत छूट रही है… पर मन में कहीं शवयात्रा में शामिल होने की बात भीतर ही भीतर कोंच रही है।
उन चारों की टैक्सी अर्थी के पास धीमी होती है। मवानी गर्दन निकालकर कुछ कहता है और दाहिने से रास्ता काटते हुए टैक्सी आगे बढ जाती है।
मुझे धक्का-सा लगता है और मैं ओवरकोट पहनकर, चप्पलें डालकर नीचे उतर आता हूँ। मुझे मेरे कदम अपने आप अर्थी के पास पहुँचा देते हैं, और मैं चुपचाप उसके पीछे-पीछे चलने लगता हूँ। चार आदमी कंधा दिए हुए हैं और सात आदमी साथ चल रहे हैं सातवाँ मैं ही हूँ।और मैं सोच रहा हूँ कि आदमी के मरते ही कितना फर्क पड जाता है। पिछले साल ही दीवानचंद ने अपनी लडकी की शादी की थी तो हजारों की भीड थी। कोठी के बाहर कारों की लाइन लगी हुई थी… मैं अर्थी के साथ-साथ लिंक रोड पर पहुँच चुका हूँ। अगले मोड पर ही पंचकुइयाँ श्मशान भूमि है।
और जैसे ही अर्थी मोड पर घूमती है, लोगों की भीड और कारों की कतार मुझे दिखाई देने लगती है। कुछ स्कूटर भी खडे हैं। औरतों की भीड एक तरफ खडी है। उनकी बातों की ऊँची ध्वनियाँ सुनाई पड रही हैं। उनके खडे होने में वही लचक है जो कनॉट प्लेस में दिखाई पडती है। सभी के जूडों के स्टाइल अलग-अलग हैं। मर्दों की भीड से सिगरेट का धुआँ उठ-उठकर कुहरे में घुला जा रहा है और बात करती हुई औरतों के लाल-लाल होंठ और सफेद दाँत चमक रहे हैं और उनकी आँखों में एक गरूर है…
अर्थी को बाहर बने चबूतरे पर रख दिया गया है। अब खामोशी छा गई है। इधर-उधर बिखरी हुई भीड शव के इर्द-गिर्द जमा हो गई है और कारों के शोफर हाथों में फूलों के गुलदस्ते और मालाएँ लिए अपनी मालकिनों की नजरों का इंतजार कर रहे हैं।
मेरी नजर वासवानी पर पडती है। वह अपनी मिसेज को आँख के इशारे से शव के पास जाने को कह रहा है और वह है कि एक औरत के साथ खडी बात कर रही है। सरदारजी और अतुल मवानी भी वहीं खडे हुए हैं।
शव का मुँह खोल दिया गया है और अब औरतें फूल और मालाएँ उसके इर्द-गिर्द रखती जा रही हैं। शोफर खाली होकर अब कारों के पास खडे सिगरेट पी रहे हैं।
एक महिला माला रखकर कोट की जेब से रुमाल निकालती है और आँखों पर रखकर नाक सुरसुराने लगती है और पीछे हट जाती है।
और अब सभी औरतों ने रुमाल निकाल लिए हैं और उनकी नाकों से आवाजें आ रही हैं।
कुछ आदमियों ने अगरबत्तियाँ जलाकर शव के सिरहाने रख दी हैं। वे निश्चल खडे हैं।
आवाजों से लग रहा है औरतों के दिल को ज्यादा सदमा पहुँचा है।
अतुल मवानी अपने पोर्टफोलियो से कोई कागज निकालकर वासवानी को दिखा रहा है। मेरे खयाल से वह पासपोर्ट का फॉर्म है।
अब शव को भीतर श्मशान भूमि में ले जाया जा रहा है। भीड फाटक के बाहर खडी देख रही है। शोफरों ने सिगरेटें या तो पी ली हैं या बुझा दी हैं और वे अपनी-अपनी कारों के पास तैनात हैं।
शव अब भीतर पहुँच चुका है।
मातमपुरसी के लिए आए हुए आदमी और औरतें अब बाहर की तरफ लौट रहे हैं। कारों के दरवाजे खुलने और बंद होने की आवाजें आ रही हैं। स्कूटर स्टार्ट हो रहे हैं। और कुछ लोग रीडिंग रोड, बस-स्टॉप की ओर बढ रहे हैं।
कुहरा अभी भी घना है। सडक से बसें गुजर रही हैं और मिसेज वासवानी कह रही हैं, ‘प्रमिला ने शाम को बुलाया है, चलोगे न डियर? कार आ जाएगी। ठीक है न?
वासवानी स्वीकृति में सिर हिला रहा है।
कारों में जाती हुई औरतें मुस्कराते हुए एक-दूसरे से बिदा ले रही हैं और बाय-बाय की कुछेक आवाजें आ रही हैं। कारें स्टार्ट होकर जा रही हैं।
अतुल मवानी और सरदारजी भी रीडिंग रोड, बस स्टॉप की ओर बढ गए हैं और मैं खडा सोच रहा हूँ कि अगर मैं भी तैयार होकर आया होता तो यहीं से सीधा काम पर निकल जाता। लेकिन अब तो साढे ग्यारह बज चुके हैं।
चिता में आग लगा दी गई है और चार-पाँच आदमी पेड के नीचे पडी बैंच पर बैठे हुए हैं। मेरी तरह वे भी यूँ ही चले आए हैं। उन्होंने जरूर छुट्टी ले रखी होगी, नहीं तो वे भी तैयार होकर आते।
मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि घर जाकर तैयार होकर दफ्तर जाऊँ या अब एक मौत का बहाना बनाकर आज की छुट्टी ले लूँ आखिर मौत तो हुई ही है और मैं शवयात्रा में शामिल भी हुआ हूँ।

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कहानियाँ स्वातंत्र्योत्तर कहानियाँ

अँधेरे में- निर्मल वर्मा

अनुमानित समय : 31 मिनट-

बीच की तीन पगडंडियों को पार कर बानो आती थी। आते ही पूछती थी, “कुछ पता चला?” मेरा मन झूठ बोलने के लिए मचल उठता। सोचता, कह दूँ-“हाँ, पता चल गया..हम दिल्ली जा रहे हैं।“ लेकिन बानो झूठ ताड़ जाएगी, इसलिए आँखें मूँदे रहता।

      बानो मेरे माथे पर हाथ रखती। जब उसका हाथ ठंडा लगता, मैं जान जाता कि अभी बुखार है, जब गरम लगता तो मन उल्लसित हो उठता। आँखें खोलकर पूछता-“कैसा लगता है बानो? और बानो निराश भरे स्वर में कहती, “अभी तो कम है, लेकिन शाम तक जरूर चढ़ जाएगा।” बानो समझती थी कि जब तक बुखार रहेगा, हम उसके संग शिमले में ही रहेंगे- बुखार उतरने लगता, तो उसे निराशा होती। जब कभी बानो की आहट मिल जाती, मैं जान बूझकर पास रखे ठंडे पानी से अपना माथा रगड़ लेता। जब वह आती तो उसका हाथ अपने माथे पर रखकर पूछता, “देखो तो बानो, कितना ठंडा है।“ बानो गुमसुम-सी खिड़की के बाहर देखती रहती।

      खिड़की के बाहर नीले जंगल हैं, ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ है, पेड़ों के घने झुरमुट हैं। जब हवा का झोंका परदे को डुलाता हुआ भीतर आता है, दूर दिगंत की एक स्वप्निल-सी खूशबू कमरे में बिखर जाती है।

      “इन पहाड़ों के पीछे दिल्ली है, है न बानो?”  मैं पूछता।

       बानो ने चुपचाप सिर हिला दिया- उसे दिल्ली की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। कभी-कभी मुझे उस पर काफी तरस आता- उस बेचारी ने अब तक दिल्ली नहीं देखी थी। उसके अब्बा का दफ्तर बारहों महीने शिमले रहता  था।

      “मैं आज गयी थी-अपने घर,” बानो ने कहा। जिस ‘अपने घर’ का नाम सुनकर मैं सबकुछ भूल जाता था, आज उसके प्रति मेरे मन में कोई उत्सुकता नहीं जगी।

      “मेरे अलूचे तुम ले लेना… बानो,” मैं आँखें मूँदे लेटा रहा।

      “तुम्हारे गले-सड़े अलूचे कौन खाएगा, जब दिल्ली जाओगे, अपनी पोटली में बाँधकर ले जाना।“ बानो खीजकर बाहर बरामदे में भाग गयी।

      मुझे गुस्सा लगा। लेकिन बीमारी में गुस्सा भी टूटा-फूटा आता है, कोई भी भाव अंत तक नहीं पहुँच पाता, बीच रास्ते में ही सूख जाता है। जब रोने को जी करता है, तो रोना नहीं आता, आँखें ही बिफरी-सी रह जाती हैं। जब खुशी होती है, तो दिल तेजी से नहीं धड़कता, केवल होंठ काँपकर रह जाते हैं।

      इन दिनों मेरे कमरे में आने से पहले बानो की तलाशी ली जाती थी कि कहीं वह खट्टे अलूचे और कच्ची खूबानियाँ लुक-छिपकर भीतर न ले आए। उसके दुपट्टे के सिरे में नमक-मिर्च की पुड़िया बंधी रहती-बीमारी से पहले अलूचों को उनमें भिगोकर हम चटनी बनाया करते थे।

      बानो ने जिसे अभी ‘अपने घर’ कहा था, वह पड़ोस में एक भुतहा मकान था, जो बारहों महीने खाली-उजाड़ पड़ा रहता रहता था। कहते थे, वहाँ एक मेम ने अपने हाथों से अपने को जान से मार लिया था। उस मकान का एक कमरा गुसलखाने में खुलता था- वहीं मैं और बानो अपनी कच्ची-पक्की खूबानियों और अलूचों का खजाना छिपाकर रखते थे। यह एक गुप्त व्यापार था, जिसकी खबर अभी तक किसी तीसरे व्यक्ति के कान में नहीं पड़ी थी।

      बानो बाहर बरामदे में देर तक झूला झूलती रही। जब वह झोटा लेकर झूला ऊपर लाती है, उसकी सलवार गुब्बारे-सी फूल जाती है। झूले को ऊपर-नीचे घूमता देखते हुए मेरी आँखें झपकने लगीं। कब आँख लग गयी, याद नहीं आता। सपना आया था। दुपहर को सोते हुए जो सपना आता है, वह मुझे हमेशा याद रहता है। दफ्तर से बाबू के टिफिन लेने के लिए चपरासी आया है। उसने हँसते हुए बताया है कि हम दिल्ली जा रहे हैं। भुतहा मकान के कमरे की खिड़की से बानो मेरे अलूचों को बाहर फेंक रही है, और दूर पहाड़ियों में कालका-शिमला की रेल में वही मेम बैठी है, जिसने आत्महत्या की थी। बानो जो अलूचे बाहर फेंटी है, रेल के डिब्बे से वही मेम खिड़की से हाथ बाहर निकालकर उन्हें पकड़ती जा रही है।

     जब मेरी आँख खुली तो बानो कब की जा चुकी थी।

     शाम को माँ चाय लेकर आयी, तो मैंने पूछा-“चपरासी आया था?” माँ ने हैरान होकर कहा, “हाँ, आया था, क्यों?” “कुछ कहता था?” मैंने पूछा। माँ ने कहा, “नहीं-क्यों, क्या बात है?” मैं कुछ नहीं बोला और तकिये के सहारे अधलेटा-सा चाय पीने लगा।

     माँ ने थर्मामीटर लगाकर देखा, फिर झटक दिया। पहले मैं अपना बुखार पूछ लिया करता था, किन्तु जब देखा कि माँ झूठ बताती हैं, तो पूछना छोड़कर केवल उनके चेहरे को पढ़ने की कोशिश किया करता था। कभी-कभी माँ मेरे गंभीर चेहरे को देखकर कहतीं-“जल्दी ठीक हो जाओ, फिर दिल्ली चलेंगे।“ वह इस निश्छल, हल्के ढंग से कहतीं, मानो ठीक होना मेरे वश की बात है, जैसे मैं जान बूझकर जिद किए हुए बीमार पड़ा हूँ और वह मुझे ठीक होने के लिए फुसला-मना रही हैं। इससे मुझे गुस्सा आता और मैं करवट बदलकर खिड़की की ओर मुँह मोड लेता। किन्तु उन्हें काफी देर तक पता नहीं चला कि मैं गुस्सा किये हूँ। मैं अपने पाँव ऐंठ लेता, दोनों हाथों की मुट्ठियाँ बंद कर लेता और दांतों को भींचता हुआ जोर-जोर से साँस लेने लगता। माँ जो खिड़की से बाहर देख रही होतीं, एकदम घबरा उठतीं। मेरे चेहरे को देखतीं, फिर एक ठंडी साँस लेकर सिरहाने बैठ जातीं। न जाने मैं कैसे जान लेता कि वह मेरे अभिनय को भांप गयी हैं। किन्तु ऊपर से वह कुछ नहीं बतलातीं… धीरे से आलमारी से कैडबरी चाकलेट निकालकर मेरे तकिये के नीचे रख देतीं। “बाबू को मत बताना,” उन्होंने मेरे बालों को उँगलियों से सहलाते हुए कहा। दूसरे क्षण वह मुझे भूल गयीं। उनकी उँगलियों के अनिश्चित, अर्ध-सोये स्पर्श से मुझे पता चल जाता है कि वह स्वयं मुझसे कोसों दूर खो गयी हैं। चाकलेट जो मुझे दी है, वह मुझे रिझाने को नहीं, बल्कि मुझसे छुटकारा पाने के लिए, जिससे वह बिना किसी विघ्न-बाधा के अपने में सिमटी रह सकें। ऐसे क्षणों में मैं चुपचाप उनकी ओर देखता रहता। वह नहीं जानतीं कि मैं उनकी ओर देख रहा हूँ। उनके चेहरे के बल ढीले पड़ जाते, सब उतार-चढ़ाव मिट जाते और एक शून्य-सी समतलता बिछ जाती। मुझे लगता जैसे उनकी आँखों में सूखी तपिश की  गरमाई-सी फ़ाइल गयी है, किन्तु दूसरे ही क्षण भ्रम होता कि उनमें धुंधला-सा गीलापन है, जो चमक रहा है। मुझे अक्सर यह खुशफहमी होती कि वह मेरी बीमारी के संबंध में सोच रही हैं-हालांकि भीतर-ही-भीतर मुझे मालूम था कि ऐसे क्षणों में उनके ख्यालों से मेरा दूर का भी वास्ता नहीं है।

       तब मैंने धीरे-से उनके हाथ पर अपना हाथ रख दिया। वह एकदम हड़बड़ाकर चौंक गयीं। मुझे लगा जैसे मैं उन्हें जबर्दस्ती कहीं बहुत दूर से खींच लाया हूँ। वह मुझे कुछ देर तक घूरती रहीं। फिर अचानक मेरे होंठों को चूम लिया। मैंने कमीज की बांह से अपने होंठों को पोंछा, वह मुस्कराने लगीं।

      “बच्ची, एक बात पूछूँ?

      “क्या?”

      “अगर मैं कहीं चली जाऊँ, तो क्या तुम मुझे समझोगे?”

      माँ अपलक एकटक मुझे देख रही हैं।

      “क्या मैं भी तुम्हारे संग चलूँगा?”

      “न”-उन्होंने सिर हिलाया।

      “बाबू के संग जाओगी?”

      “न”

      “फिर?” मैं विस्मित-सा उनकी ओर देखता रहा।

      वह हँसने लगीं और मेरे संग पलंग पर लेट गयीं।

      मैंने अपने गाल उनके गालों से सटा लिए। माँ बहुत खूबसूरत हैं। घर में सब उनसे डरते हैं; मुझे कभी-कभी काफी आश्चर्य होता है कि उनमें कौन-सी ऐसी बात है जो सबको इतना आतंकित किए रहती है। वैसे डर मुझे भी लगता है-उनकी आँखों से, जब वह मेरे पास बैठकर मुझे देखती हैं।

      मैं बहुत दिन पहले बाबू के संग उनके एक मित्र के घर गया था। वापिस आते हुए हमें पहाड़ी नाले के संग-संग ऊपर चढ़ना पड़ा था। ऊपर आकर हम पेड़ों के घने अँधेरे झुरमुट के बीच कुछ देर के लिए सुस्ताने खड़े हो गए थे। मैं उस जगह की वीरान चुप्पी से डर गया था।

      आज जब कभी मैं माँ की आँखों को देखता हूँ, तो न जाने क्यों मुझे उस रात जंगल के झुरमुट का घना-घना-सा अँधेरा याद आ जाता है।

      संगमरमर-सी चिकनी सफेद उनकी बाँहें हैं, जिन्हें मैं शरमाते-शरमाते छूता हूँ। वह अपने बालों को बहुत कसकर बाँधती हैं, इसलिए उनका माथा इतना चौड़ा दिखायी देता है। बालों के बीचोंबीच सीधी मांग है-जिसे देखकर मैं उदास हो जाता हूँ। उनके कान बहुत छोटे-छोटे हैं, गुड़िया के कानों-से-जिन्हें वे अपने बालों के भीतर छिपाये रखती हैं। जब कभी वे मुझसे सटकर लेटती हैं, मैं उनके कानों को बालों के भीतर से निकाल लेता हूँ। मुझे बानो की बात याद आती है, और मेरे सारे शरीर में एक हल्की-सी झुरझुरी फैलने लगती है। “जिनके कान छोटे होते हैं,” बानो ने एक दिन कहा था, “वे लोग बहुत जल्दी मार जाते हैं।“ मैंने यह बात माँ को नहीं बतायी है, सोचता हूँ, जब वह मरने लगेंगी तो कह दूंगा कि वह अपने छोटे-छोटे कानों की वजह से ही मर रही हैं।

     कभी-कभी मुझे लगता है कि उन्हें मेरी बीमारी की विशेष चिंता नहीं है। मुझे लगता है कि वह यह भी भूल जातीं हैं कि मैं बीमार हूँ। एक दिन जब मैंने केक खाने की इच्छा प्रकट की, तो उन्होंने बुआ अथवा बाबा की तरह मेरी नाजायज मांग का कोई विरोध नहीं किया। चुपचाप आलमारी से केक का एक टुकड़ा तश्तरी पर रखकर मेरे सामने धर दिया और खुद आँखें मूंदकर कुर्सी पर लेटी रहीं। मुझे कुछ बुरा लगा और केक खाने की मेरी इच्छा उसी क्षण मर गई। मुझे भी था कि कुछ भी कहा लेने से मेरी बीमारी लंबी हो जाएगी, और तब दिल्ली जाने का दिन और भी पीछे टल जाएगा।

      मुझे मालूम है-माँ दिल्ली नहीं जाना चाहतीं। इसका कारण मुझे आज भी समझ में नहीं आता, किन्तु एक बार उन्होंने यह बात बीरेन चाचा से कही थी।

      कभी-कभी चोरी-चुपके से मैं माँ के कमरे में जाता हूँ। पिछले कुछ महीनों से माँ और बाबू अलग-अलग, अपने-अपने कमरों में सोते हैं। पहले मुझे यह बात कुछ अजीब-सी लगी थी-किन्तु कुछ चीजें हैं, जिन्हें मैं किसी से नहीं पूछता, मन का एक कोना है, जिसमें सबकी आँखों से छिपाकर उन्हें दबा देता हूँ।

      माँ का कमरा छज्जे के अंतिम सिरे पर है। मुझे अपने कमरे से उनके कमरे की दो खिड़कियां दिखाई देती हैं-खिड़कियों के बीच दीवार का छोटा-सा टुकड़ा है, जिस पर, पत्तों की जालीदार छाया हर शाम सिमट आती है। कभी-कभी खिड़की का नीला पर्दा उड़कर दीवार से चिपक जाता है, तब पत्तों की जाली दीवार से उठकर परदे पर मँडराने लगती है। खुली खिड़की से माँ का सिर दिखायी देता है। जब वह सिर जरा ऊपर उठाती हैं, तो धूप में उनका जूड़ा सुनहरा-सा होकर चमक उठता है। मैं समझ जाता हूँ, माँ खिड़की के पास कुर्सी पर बैठी पढ़ रही हैं।

      मैं कई बार माँ के कमरे में गया हूँ-सोफ़े पर, उनके पलंग पर तकिये के पास, पलंग के नीचे किताबें बिखरी रहती हैं। माँ को शायद बहुत कम नींद आती है-रात को अनेक बार मैंने उनके कमरे में बत्ती का प्रकाश देखा है। सोचता हूँ, वह इन्हीं किताबों को पढ़ती रहती होंगी।

     एक बार मैंने कोई किताब खोली थी, उस पर छोटे-छोटे, टेढ़े-नीले अक्षरों में बीरेन चाचा का नाम लिखा था-मैं मंत्रमुग्ध-सा उन अक्षरों में खो गया था। बाद में वह नाम मैंने माँ के कमरे में रखी अनेक किताबों पर देखा था।

     मुझे बीरेन चाचा की छोटी-सी कॉटेज याद आती है, जहाँ एक दिन मैं माँ के संग गया था। एक बड़े कमरे में छत तक किताबें चुनी रखी थीं। हर शेल्फ के नीचे छोटी-छोटी सीढ़ियाँ खड़ी थीं, जिन पर चढ़कर किताबों को उतारना पड़ता था। दूसरे कमरे में टेढ़ी-मेढ़ी बेडौल शक्लों के अजीब चित्र टंगे थे, जिन्हें देखकर मैं स्तंभित-स खड़ा रह गया था। बाबू बताते हैं कि लड़ाई से पहले बीरेन चाचा ने इन चित्रों को यूरोप में खरीदा था। मुझे बीरेन चाचा पर कभी अचंभा होता, कभी दया आती- वह बारहों महीने सर्दी, गर्मी में इस निर्जन, अकेले मकान में कैसे रह पाते होंगे।

    बाबू के मित्रों में शायद बीरेन चाचा का स्थान सबसे अलग है। बाबू केवल उनके संग मेरे कमरे में चाय पीते हैं-उनके अन्य मित्र बाहर बैठक में बैठते हैं। जब वह आते हैं, उस शाम मुझे जल्दी सोने के लिए मजबूर नहीं किया जाता- देर तक मेरे कमरे में ही बातचीत होती है। मेरे लिए ये रातें बहुत सुखद होती हैं।

    एक शाम बीरेन चाचा जब हमारे घर आए, तो उनकी वेशभूषा देखकर उन्हें एकदम नहीं पहचान सका। घुटनों तक लंबे बूट, कंधे पर खाकी थैला, दूसरे पर कैमरा और सिर पर सोला हैट—इस पोशाक में उनकी छोटी-सी दाढ़ी बड़ी बेमेल और कृत्रिम लग रही है। पैंट की दोनों जेबों में किताबें ठूंस रखी थीं।

    वह मेरे पलंग के पास आए और मुझसे हाथ मिलाया। वह मुझसे ऐसे पेश आते हैं, जैसे मैं बीमार हूँ ही नहीं, और न कभी मेरी तबीयत ही पूछते हैं।

    माँ पास की कुर्सी पर बैठी बुन रही थीं—एक बार उन्होंने बीरेन चाचा को देखा और फिर सिर झुका लिया।

    उन्होंने बताया कि वह एक रात के लिए कुफ़री जा रहे हैं, रेस्ट हाउस में ही ठहरेंगे और अगले दिन शाम तक वापिस लौट आएंगे।

    “कहते हैं, रेस्ट हाउस का चौकीदार बड़ा काबिल आदमी है। वह पिछले तीस साल से कुफ़री में रह रहा है-उसे शायद कुफ़री के बारे में बहुत-सी बातें मालूम होंगी,” बीरेन चाचा ने कहा।

    माँ के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान सिमट आयी, मानो उनकी आँखों में बीरेन चाचा की बात रत्ती भर मूल्य नहीं रखती।

    “इस तरह के इंटरव्यू तुम कितने बरसों से ले रहे हो।“ माँ ने आँखें झुकाए बुनते हुए कहा।

    “ओह, तुम्हें विश्वास नहीं होता-लेकिन तुम्हें मेरे नोट्स देखने चाहिए।“ बीरेन चाचा की नीली आँखें चमक उठीं। वह जब कभी अपनी किताब ‘शिमला का इतिहास’ का जिक्र छेड़ते हैं, माँ ऐसे ही हँसती हैं।

    “कभी-कभी इस किताब के सिलसिले में खोज करते हुए अजीब चीजें मिल जाती हैं।“

    “कैसी चीजें, बीरेन चाचा,” मैं बीरेन चाचा की किताब के बारे में काफी उत्सुकता दिखलाता हूँ। मुझे मालूम है, इससे उन्हें काफी प्रसन्नता होती है।

    “एक बहुत पुरानी फोटो मिली थी-किसी अंग्रेज ने ली होगी।“

    “क्या था फोटो में?” इस बार माँ की आँखें सलाइयों से ऊपर उठ जाती हैं।

    “रेसकोर्स की भीड़ दिखाई गई है….  बहुत-से लोग भीड़ में खो गए हैं, लेकिन एक अंग्रेज लड़की का चेहरा बिल्कुल साफ दिखता है-वह पवेलियन के पास छाता लिए खड़ी है-जबकि और सब लोगों की आँखें भागते हुए घोड़ों पर जमी हैं… वह गहरी उत्सुक आँखों से पीछे की ओर देख रही है—उसका इस तरह पीछे मुड़कर देखना मुझे काफी अजीब-सा लगा।“

    बीरेन चाचा अचानक चुप हो गए-माँ के हाथों में सलाइयाँ चलती-चलती ठहर गयीं।

    “फोटो के नीचे लिखा था—“एननडेल, शिमला, 1903… पचास साल गुजर गए और वह वैसे ही छाता लिए पीछे मुड़कर देख रही है..।“

    बीरेन चाचा धीरे-से हँसने लगे, मानो उन्हें अपनी बात काफी बेतुकी-सी जान पड़ी हो। माँ गुमसुम-सी उनकी ओर देख रही हैं और मुझे आश्चर्य होता है कि बीरेन चाचा कभी-कभी इस प्रकार की अर्थहीन-सी बातें क्यों करते हैं।

      “कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि लोगों की अपेक्षा शहरों की कहानी लिखना बहुत कठिन है—मेरे पास शिमला के बारे में इतने पुराने फोटो नोट्स, किताबें, टूरिस्टों के यात्रा-लेख जमा हैं, किन्तु मुझे लगता है कि मैं किताब शायद कभी नहीं लिख पाऊँगा।“

      “क्यों?” माँ ने पूछा।

      “शहर… हर शहर—अपने में हमेशा इतना चुप जो रहता है।“ बीरेन चाचा उठ खड़े हुए—धीरे से उन्होंने मेरा माथा छुआ।

      “रास्ते में डॉक्टर मिले थे-कहते थे, दो-चार दिनों में तुम घूमने-फिरने लगोगे।“ उन्होंने तनिक झुककर मुझसे कहा।

      “जरा बैठ जाओ-देखूँ, तुम्हारा फोटो कैसा आता है!“ उन्होंने अपने कंधे से कैमरा उतार लिया। मेरा फोटो लेने के बाद वह अपनी छड़ी उठाकर जाने लगे।

      “कब वापिस लौटोगे?” माँ ने पहली बार सीधे उनकी ओर देखा।

      “शायद कल शाम तक-कुछ देर के लिए आऊँगा,” बीरेन चाचा जब माँ की ओर देखते हैं, तो उनकी आँखें चौंधिया-सी जाती हैं-और वह अपना मुँह दूसरी ओर मोड़ लेते हैं।

      “बीरेन चाचा…” मैं बुरी तरह शरमा रहा हूँ।

      “क्या बच्ची?” उन्होंने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।

      “एक फोटो मैं खींचूँगा।“

      बीरेन चाचा ने मुस्कराकर कैमरा मेरे हाथों में थमा दिया।

      मैं माँ की ओर देखता हूँ।

      “नहीं बच्ची, मेरी नहीं…” माँ एकदम झुँझला-सी उठती हैं।

      “सिर्फ तुम नहीं… बीरेन चाचा भी रहेंगे।“ मैंने कहा। बीरेन चाचा का चेहरा क्षण-भर के लिए म्लान-सा हो उठा-वह माँ की ओर देखते हैं। माँ ने इस बार विरोध नहीं किया, वह कुर्सी से उठ खड़ी हुईं, “बच्ची, तुम बहुत जिद्दी हो,” उन्होंने कहा।

      “बीरेन चाचा, तुम जंगले के पास खड़े हो जाओ, वहाँ धूप आ रही है, और माँ, तुम उधर दायीं तरफ।“ मैं पलंग से उतरकर दीवार के सहारे खड़ा हो गया हूँ। मेरा सिर चकरा रहा है, लेकिन फोटो ठीक आता है। आज भी वह फोटो मेरे पास है..।

      कमरे में शाम का धुंधलका कब चुपके-से घिर आया, पता नहीं चला। बीरेन चाचा बहुत पहले जा चुके थे। माँ मेरे पलंग के पास कुर्सी पर बैठी हैं-जब से बीरेन चाचा गए हैं, तब से वह वैसे ही चुपचाप बिना हिले-डुले उस कुर्सी पर अधलेटी-सी पड़ी हैं। मैं बत्ती नहीं जलाता, मुझे कमरे में अँधेरे का धीरे-धीरे आना अच्छा लगता है।

       मेरी आँखों के सामने बहुत दिन पहले की एक शाम घूम जाती है-तब मैं बीमार नहीं पड़ा था। माँ उस शाम मुझे बीरेन चाचा के घर ले गयीं थीं।

       हमें देखकर बीरेन चाचा हैरान-से हो गए थे। फाटक खोलकर वह माँ के सामने ठिठक गए।

       “पोनों, तुम… “ एक क्षण के लिए वह खोए-से खड़े रहे। पहली बार उन्होंने मेरे सामने माँ को उनके नाम से पुकारा था। उनके मुँह से माँ का नाम सुनकर मुझे बहुत अजीब-सा लगा था। माँ हँसने लगीं और न जाने क्यों मुझे माँ की वह हँसी अच्छी नहीं लगी-एक घुटा-घुटा-सा डर मेरे मन में समा गया।

       “यूँ ही सैर को निकले थे, सोचा तुमसे मिलते चलें,” माँ ने कहा। पहली बार मैंने माँ को झूठ बोलते देखा था।

       बीरेन चाचा की नीली आँखों में हल्का-सा विस्मय घिर आया। उन्होंने मेरी उँगली पकड़ी और चुपचाप कॉटेज के भीतर चले आए।

       वहीं मैंने पहली बार उनकी लाइब्रेरी देखी थी। उन्होंने मुझे अपनी अलबमों में शिमले की पहाड़ियों, घाटियों और झरनों के फोटो दिखलाये, जो उन्होंने अपनी किताब के लिए जमा किए थे। मेज पर ढेर-सी किताबों के पास हल्के रंग की शेड से ढँका टेबिल-लैम्प जल रहा था। उन्होंने जब दो चाकलेटें मुझे दीं, तो मैं कुछ हैरान-सा हो गया। उन्होंने हँसते हुए कहा-“मेरे पास बहुत-सी रखी हैं, बर्फ के दिनों में बाहर जाना नहीं होता, इसलिए जमा कर रखता हूँ।“ मैं क्षण-भर उन्हें देखता रह जाता हूँ। बीरेन चाचा बाबू से कितने लग हैं—उनमें वह तनाव, बोझिल गंभीरता अथवा भारीपन नहीं है, जो मैं बाबू में देखता हूँ। हर चीज पर उनका स्पर्श एक स्निग्ध कोमलता लिए रहता है। उनकी छोटी-सी दाढ़ी के ऊपर जो आँखें हैं, उन्हें देखकर मुझे हमेशा लगता है, जैसे वह धीमे-धीमे कुछ कह रहीं हों, मानो जिस वस्तु पर वे टिक जायेंगी, वह अपने आप सँवर-निखर जायेगी।

     “तुमने कभी बहुत पास से किसी पहाड़ी की चोटी पर बर्फ देखी है?” उन्होंने मुझसे पूछा। मैंने सिर हिल दिया।

     “वहाँ से बर्फ का रंग बिल्कुल नीला दिखता है। मैंने एक कलर्ड फोटो लिया है…” वह उस फोटो को लाने के लिए दूसरे कमरे में चले गए। मैं मेज पर रखी अलबमों को उलटने-पलटने लगा। हर फोटो में शिमले का कोई-न-कोई दृश्य था: ग्लैन, जाखू ,चैटविक फॉल। मैंने इन सब स्थानों को आसानी से पहचान लिया। कुछ देर बाद जब बीरेन चाचा नहीं आये, तो मैं ऊब गया। पास किताबों के शेल्फ पर एक छोटा-सा अलबम कोने में रखा था, मैंने उसे खोला और खोलते ही एक क्षण के लिए मुझे लगा-यह चेहरा मैंने कहीं देखा है, किन्तु दूसरे ही क्षण मेरी आँखें स्तब्ध-सी स्थिर हो गयीं। फोटो माँ का था।

     क्या माँ कभी ऐसी थीं? मेरे भीतर कहीं एक गहरा-सा साँस उखड़ आया। वही चौड़ा-सा माथा, किन्तु उस पर छोटी-सी बिंदी लगी थी, जो माँ अब नहीं लगातीं, दोनों चोटियाँ कंधे के नीचे लटक रही थीं, पूरे स्लीव का स्वेटर पहन रखा था और बालों के भीतर वही छोटे-छोटे कान छिपे थे। सहसा मुझे आभास हुआ कि इस चेहरे में कुछ ऐसा है, जिसका मुझसे कोई संबंध नहीं, बाबू से कोई संबंध नहीं।

     फोटो माँ का था, लेकिन उसमें माँ कहाँ थीं?

     अचानक मुझे बीरेन चाचा के पैरों की आहट सुनाई दी। न जाने मेरे भीतर क्या चोर छिपा था कि मैंने डरकर झटपट वह अलबम किताबों में छिपा दी।

     जब हम वापिस लॉन में आए तो हल्का, फीका-फीका-सा अँधेरा छाने लगा था। माँ शॉल में दुबकी हुई पत्थर की बेंच पर बैठी थीं।

     “इतनी देर कहाँ लगा दी?” उन्होंने मुझे खींचकर अपने से सटा लिया। बीरेन चाचा माँ के पैरों के निकट घास पर बैठ गए। मेरी आँखें माँ के चेहरे पर टिकी रहीं, मानो मैं कुछ खोज रहा हूँ, माँ की आँखें, मुँह, माथा हर चीज अलग-अलग देखो तो वैसी ही थीं, किन्तु आपस में मिलकर जो भाव बनता था, वह उस चेहरे से बिल्कुल अलग था, जो मैंने अभी कुछ देर पहले बीरेन चाचा की अलबम में देखा था।

     जो अंतर है-उसे समझा नहीं सकता, उस पर उँगली नहीं रख पाता… वह कैसा भाव था जो किसी लंबी दूरी को हमारे पास ले आता है, लेकिन अपने को दूर ही रहने देता है।

     “बच्ची क्या बात है-?” माँ मेरे बालों को धीरे-धीरे अपनी उँगलियों में उलझाने लगीं।

      मैंने सिटपिटाकर मुँह फेर लिया।

      माँ ने आगे कुछ नहीं पूछा। हम तीनों इसी तरह अपने-अपने में सिमटे चुप बैठे रहे। जब से हम आए थे, बीरेन चाचा ने माँ से कोई बात नहीं की थी। मुझे शुरू-शुरू में कुछ आश्चर्य-सा हुआ था, किन्तु मैंने उस पर अधिक ध्यान नहीं दिया।

     लॉन पर नीला-नीला-सा अँधेरा घिर आया। दूर पहाड़ियों के बीच छोटे-छोटे जुगनुओं-सी बत्तियाँ बिखरी थीं-और अँधेरे में पहाड़ियों के छिप जाने से लगता था कि आकाश बहुत नीचे सरक आया है, कभी-कभी तो पता भी नहीं चलता कि तारों और बत्तियों में कौन-सी बत्तियाँ और कौन-से तारे हैं।

     बीमारी के दिनों में मुझे अक्सर वह शाम याद आ जाती है-हालाँकि उस शाम कोई भी ऐसी बात नहीं हुई थी, जिसे याद रखा जाता। जब हम वापिस लौटने लगे, तो बीरेन चाचा कुछ दूर हमारे संग आए थे। फिर माँ के कहने पर कि हम खुद चले जाएँगे, वापिस मुड़ गए थे। मैं और माँ कुछ देर ऊपर की सड़क पर चुपचाप चढ़ते रहे। मैं तेज कदमों से माँ के आगे-आगे चल रहा था। कुछ दूर चलने के बाद सहसा मेरे पाँव ठिठक गये। मुझे लगा, माँ मेरे पीछे नहीं आ रही हैं। मैं वापिस मुड़कर पीछे की ओर चलने लगा। अँधेरे में मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

     कुछ दूर नीचे उतरकर अचानक मेरे पाँव रुक गए-मैं अँधेरे में आँखें फाड़ता हुआ हतबुद्धि-सा खड़ा रहा। माँ सड़क के मोड़ पर खड़ी थीं, किनारे पर लगी तार पर झुकी हुई-उनकी साड़ी का आँचल हवा से उड़कर कंधे पर आ गिरा था-अपने में बिल्कुल खोयी-सी वह अपलक नीचे देख रही थीं…

     उतराई के नीचे थी—बीरेन चाचा की कॉटेज, जो शाम के धुंधलके में बिल्कुल सूनी और निर्जन दिखाई दे रही थी। लाइब्रेरी की खिड़की से आती हुई मद्धिम-सी प्रकाश-रेखा में लॉन की घास झिलमिला रही थी।

     कुछ देर तक शाम के झुटपुटे में हम बिल्कुल खामोश खड़े रहे, फिर माँ अचानक आगे मुड़कर चलने लगीं-उनकी चाल इतनी धीमी थी कि एक क्षण मुझे लगा, मानो वह सोते हुए चल रही हों।

     वह मेरे पास आ गयीं-आँखें ऊपर उठाकर एक लंबे क्षण तक अपनी आकुल, विवश निगाहों से मुझे निहारती रहीं, फिर झपटकर उन्होंने मुझे अपने पास घसीट लिया और बार-बार अपने ठंडे, सूखे होंठों से मुझे चूमने लगीं।

     कुछ दिनों बाद एक सुबह मुझे अपने मुँह का स्वाद कुछ अच्छा-सा लगा। अंगों में एक हल्की-सी स्फूर्ति का आभास हुआ। पहले मैं धूप से बचने के लिए खिड़की बंद किए रहता था, अँधेरे कमरे में आँखें मूंदकर लेटना भला लगता था। अब मैंने खिड़की खोलकर परदों को उठा दिया। बाहर की गर्म, ऊनी धूप मेरे पलंग को चारों ओर से घेर लेती है। मैं बिस्तर से उतरकर मेज के सहारे खड़ा हो जाता हूँ। सिर पहले की तरह नहीं चकराता, मैं पायदान की ओर कुछ कदम बढ़ाता हूँ और मुझे लगता है, मानो मैंने ज़िंदगी में पहली बार अपने आप चलना सीखा हो।

     मैं चुपके से बाहर बरामदे में आ जाता हूँ। कुछ दूर पर बुआ गीली धोती काठ के जंगले पर सुखा रही हैं-मैं उनकी आँख बचाकर बाबू के कमरे के पीछेवाले छज्जे पर चला जाता हूँ। कमरे के दरवाजे और खिड़कियाँ बंद हैं, भीतर के लाल परदे नीचे गिरे हुए हैं। जब माँ मौसी के घर चली जाती हैं, तो बाबू उस कमरे को बंद कर देते हैं। अपनी सारी चीजें ऊपर छत पर ‘स्टडी’ में ले जाते हैं और रात को वहीं सोते हैं।

     छज्जा निपट सूना है। नीचे ‘आउट हाउस’ के क्वॉर्टरों की छतों के चौड़े नीले टिन के पटरों पर बड़ियाँ चमक रही हैं, जो पहाड़ी खानसामा की औरत हीरा ने सुखाने रख छोड़ी है। सामने मदरसे के छोटे-से मैदान में लड़के बस्ता घुमाते हुए चार-चार की पाँत में खड़े नकियाते अलसाये स्वर में प्रार्थना कर रहे हैं-“लब पे आयी है दुआ बनके तमन्ना तेरी।“

      उनकी तीखी-रूखी आवाज को सुनकर जब मैं ऊब जाता हूँ, तो मेरी आँखें खड्ड के ऊपर मेम के उस रहस्यमय बंगले पर टिक जाती है, जहाँ हम कच्चे अलूचे छिपाकर रखते थे। उससे जरा दूर पेड़ों और झाड़ियों से घिरी हुई एक पगडंडी साँप की तरह बलखाती हुई बानो के मकान के ऊबड़-खाबड़ अहाते में जाकर गुम हो गयी है। मैं अपने कमरे से बाबू की पुरानी छड़ी ले आता हूँ, जिसके सिरे पर मैंने माँ की लाल साड़ी का चिथड़ा बाँध रखा है। मैं जंगले से बाहर गर्दन निकालकर छड़ी को हवा में दायें-बायें घुमाता हूँ-लाल रेशम की झंडी हवा में फरफराती है। बानो ने मेरी लाल झंडी को देख लिया है-उसने हाथ उठाकर कुछ कहा है, जिसे मैं कुछ भी सुन-समझ नहीं पाता। यह मेरा और बानो का पुराना और प्रिय खेल है। हमारे और उसके मकान के बीच ढलान पर कई कोठियाँ और दुकानें हैं, किन्तु ऊँचाई पर होने के कारण हम एक-दूसरे को छज्जे से देख पाते हैं-हालाँकि हम चाहे कितना भी चिल्लाकर क्यों न बोलें, एक दूसरे की बात नहीं सुन पाते। इसलिए इशारों से बात करने के लिए मैं बाबू की छड़ी से सिगनल का उपयोग करता हूँ।

     बानो अपनी अम्मी को भीतर से बरामदे में खींच लायी है-अम्मी ने हाथ उठाकर मुझे बुलाया है। अम्मी मुझे इतनी दूर से नहीं देख पातीं, फिर भी मैं शरमा जाता हूँ और छड़ी को बरामदे में फेंककर अपने कमरे में भाग आता हूँ।

    कमरे की देहरी पर सहसा मेरे पाँव ठिठक गये-बाबू का स्वर सुनाई दिया। नौकर ने आकर बताया कि बाबू अपने कमरे में मुझे बुलाते हैं।

    मेरे दिल में खुशी की लहर-सी दौड़ गयी। ऐसा बहुत कम होता है कि बाबू मुझे अपने कमरे में बुलाकर मुझसे बातें करें-अक्सर वह हाल-चाल पूछने मेरे कमरे में ही आ जाते हैं। मैं झटपट अपने नाखून दांतों से काट लेता हूँ, क्योंकि बाबू हमेशा सबसे पहले मेरे दोनों हाथों को देखते हैं। आँखों को गीले तौलिए से पोंछ लेता हूँ और हाथों को मुँह पर रखकर फूँक मारता हूँ, और फिर उन्हें सूँघता हूँ-यह देखने के लिए कि मुँह साफ है या नहीं। फिर शीशे में मुँह देखकर कंघी करता हूँ (माँ के न होने से पिछले कुछ दिनों से मुझे ये सब काम खुद करने पड़ते हैं) और जब कंघे से अपने बालों को झरता हुआ देखता हूँ, तो न जाने क्यों मुझे अपने ऊपर गहरी-सी दया आने लगती है, और मेरी आँखों में आँसू भर आते हैं।

      ड्राइंग रूम (जिसे उन दिनों हम हॉल कहते हैं-क्योंकि वह हमारे घर का सबसे बड़ा कमरा था) के कालीन पर पैरों की आहट नहीं होती, फिर भी मैं बहुत हौले-हौले दबे पाँवों से बाबू के कमरे की ओर जाता हूँ। सुबह मैं ठीक था, किन्तु अब सिर चकराता है, मानो कनपटियों से धुएं की दो लकीरें ऊपर उठती हुई सिर के बीचोंबीच मिलने की चेष्टा कर रही हों और बीच में रुई का एक घुटा-घुटा-सा बादल इन दोनों के बीच आकर अड़ गया हो।

      मैं उनके कमरे की देहरी पर खड़ा हूँ-परदों के रिंग हाथ लगाने से धीरे-धीरे बजते हैं। वह बिना मेरी ओर देखे मुझे भीतर बुलाते हैं। मैं और आगे खिसक आता हूँ। बाबू के कमरे को पहचानना कितना आसान है-सिगार के धुएं की गर्म-गर्म-सी गंध, चारों ओर फैली गहरी बोझिल-सी चुप्पी, एक अजीब धुंधली-सी रोशनी, जो दिन और रात दोनों समय एक-सी रहती है। और एक खट्टी और भीनी-सी बू, जो मेरी दवा की बू से मिलती हुई भी कहीं दूर जाकर उससे अलग हो जाती है। उसके बारे में मैं कभी तय नहीं कर पाता कि वह मुझे अच्छी लगती है या बुरी-लगता है, वह बू नहीं है, महज एक हल्का-सा रंग है, जो बाबू के कमरे की हवा में तिरता रहता है।

     “बाहर क्या कर रहे थे!” मैं उनकी आवाज पहचानता हूँ-उसमें गुस्सा नहीं है।

     “बानो को देख रहा था—“ और मैं सकुचाकर चुप हो जाता हूँ।

     “बाबू.. “

     उनकी आँखें ऊपर उठ आयीं।

     “आज मैं ठीक हूँ… बुखार नहीं है।“

     बाबू ने मेरे दोनों हाथों को अपनी गोद में रख लिया। “अभी कुछ दिन तुम्हें बिस्तर पर लेटना होगा…” उन्होंने मेरे हाथों को एक दूसरे के ऊपर रख दिया, और उन्हें अपने खुरदरे बालों से भरे हाथों में समेट लिया।

     “बाबू-हम दिल्ली कब जा रहे हैं?” जब कभी मुझे उनसे बात करने का मौका मिलता है, मैं हर बार उनसे यह प्रश्न करता हूँ।

     उन्होंने सिगार को मुँह से निकालकर अंगुलियों में थाम लिया। वह कुछ देर तक चुपचाप दीवार के बेल-बूटोंवाले कागज को देखते रहे, मानो उस पर कुछ लिखा है, जिसे वह बड़े गौर से पढ़ रहे हों।

     “बच्ची, तुम्हें डर तो नहीं लगता?”

     “डर?” मैं विस्मित-सा होकर उनकी ओर देखने लगा। उनकी आँखें दीवार से उतरकर मुझ पर टिक गयीं।

     “माँ घर में नहीं हैं… शायद इसलिए…”

     “लेकिन वह तो कुछ दिनों में आ जायेंगी?” मैं चाहता था कि बाबू मेरी बात का समर्थन करें, किन्तु वह चुपचाप मेरी ओर देखते रहे।

     “हाँ-वह आयेंगी,” बाबू का स्वर इतना धीमा, इतना सोया-सा था मानो वह यह बात मुझसे न कहकर अपने से कह रहे हों।

     “बच्ची.?”

   “क्या बाबू?”

   “तुम क्या उन्हें देखना चाहोगे?”

   बाबू का स्वर एकदम भारी-सा हो आया। उनका यह प्रश्न मुझे काफी  विचित्र और निरर्थक-सा लगा था-सोचा, कह दूँ, हाँ… उनके पास जाऊँगा; और दूसरे ही क्षण मुझे लगा कि बाबू मुझसे इस उत्तर की आशा नहीं कर रहे हैं, जैसे वह सच जानते हुए भी जान-बूझकर मुझसे झूठ कहलवाना चाह रहे हों।

   मैंने ‘नहीं’ में सिर हिला दिया। हैरत-भरी दृष्टि से वह मुझे देखते रहे-फिर धीरे-से उन्होंने मेरे हाथों को अपनी गोद से हटा दिया।

   “अच्छा, अब अपने कमरे में जाओ-अभी दो-तीन दिन तक बाहर खेलने मत जाना।“

   वह कुर्सी से उठ खड़े हुए और मेरी ओर से मुँह मोड़कर खिड़की से बाहर देखने लगे।

   कुछ देर तक मैं वहाँ चुपचाप खड़ा रहा। मेरे मन में अचानक बाबू के प्रति भीगी-भीगी-सी सहानुभूति उमड़ने लगी। माँ के संग मेरा संबंध अधिक सहज और सीधा था। बाबू के संग जो संकोच और तनाव रहता है, वह माँ के संग बिल्कुल नहीं है। वह कोई भी प्रतिवाद किए बिना मेरी हर फरमायश को चुपचाप मान लेती हैं-किन्तु इतना सब करने पर भी वह मुझसे हमेशा दूर रहती हैं, कभी न मिटनेवाला एक अलगाव बनाये रखती हैं। उनके सामने मुझे लगता है कि मैं एक बहुत ही छोटा, बेडौल और निरर्थक-सा प्राणी बन गया हूँ। किन्तु बाबू की बात दूसरी है। मैं उनसे डरता हूँ, कोई भी फरमायश करते समय मेरा दिल धड़कने लगता है, कभी खुलकर उनसे मैंने अपने मन की बात नहीं की-इसके बावजूद वह मुझे अपने अधिक निकट और जाने-पहचाने लगते हैं। कुछ ऐसा है, जो हम दोनों को माँ से अलग कर देता है, इसलिए माँ को चाहते हुए भी उनपर कभी सहानुभूति नहीं होती और बाबू से डरते हुए भी उन्हें देखकर कभी-कभी मेरे भीतर कुछ रूआँसा हो जाता है।

     बाबू ने पीछे मुड़कर मुझे देखा और एकटक देखते रहे। मुझे लगा जैसे वह कुछ देर के लिए मेरी उपस्थिति बिल्कुल भूल गए थे और अब सहसा मुझे अपने सम्मुख देखकर समझ न पा रहे हों कि मैं कौन हूँ, उनके कमरे में कैसे खड़ा हूँ।

    मैं कमरे से बाहर चला आया। कुछ देर तक बड़े कमरे की दीवार से सटकर बाबू के कमरे की देहरी पर खड़ा रहा। सोचा था, बाबू बाहर आकर मुझसे कुछ कहेंगे, किन्तु यह मेरा भ्रम था। उनके कमरे में सिर्फ सन्नाटा था-एक घना गहरा-सा सन्नाटा जो हमारे सारे घर पर घिर आया था।

    और तब उस क्षण मुझे लगा कि मैं बहुत अकेला हूँ, बाबू भी अपने में बहुत अकेले हैं। माँ के बिना हर कमरा साँय-साँय-सा करता प्रतीत होता है।

    मैं दीवार से सटकर आँखें मूँद लेता हूँ।

   जिस दिन माँ मौसी के घर मुझसे मिले बिना चली गयीं, उससे एक दिन पहले आधी रात को मेरी आँख खुल गयी थी।

      कमरे में अँधेरा था। हवा से खिड़की का परदा मेरे तकिये के ऊपर जोर-जोर से फड़फड़ा उठता था। कुछ देर तक मेरे मन में अजीब-सा भ्रम मंडराता रहा। मुझे लगा कि इस कमरे में-जहाँ मैं लेटा हूँ-हर चीज अपने पुराने स्थान को छोड़कर नए कोनों में उठ आयी है। मुझे लगा कि जो खिड़की मेरे बायीं ओर होती थी, वह अँधेरे में चुपचाप खिसककर बिल्कुल मेरे सामने आ गयी है। मेरे पलंग से दो गज की दूरी पर जहाँ पहले दीवार थी, वहाँ दरवाजा सिमट आया है। दरवाजा आधा खुला हुआ था। उसके भीतर से बाबू के कमरे की रोशनी थर्मामीटर की तरह चमकती हुई पारे की रेखा-सी फर्श पर खिंच आयी थी-इतनी महीन, इतनी म्लान मानो हाथ से छूते ही टूट जायेगी, चारों ओर पानी-सी बिखर जायेगी।

      अचानक वह दरवाजा दोनों बड़े-बड़े काले पंखों-सा फड़फड़ाता हुआ खुल गया, प्रकाश की पतली-सी रेखा फर्श पर तेजी से लपकती हुई सामने की दीवार पर चढ़ गयी। दरवाजे के पीछे छोटे-से गलियारे में कोई जोर-जोर से हाँफ रहा था। पहले क्षण मुझे लगा कि दरवाजा हवा के झोंके से खुल गया है-किन्तु माँ उसे बंद करने आयी हैं। किन्तु कुछ देर तक कोई भीतर नहीं आया। दरवाजे के पीछे गलियारे में उखड़ी हुई साँसों का एक हल्का-सा बवंडर उठता था और फिर दब जाता था। कुछ सहमे हुए शब्द सुनाई देते थे-कभी दूर से-इतने दूर से कि शब्दों के बजाय आहट ही मुझ तक पहुँच पाती थी, कभी पास से, इतने पास से मानो कोई मेरे कानों में फुसफुसा रहा हो।

      “नहीं, तुम भीतर नहीं जाओगी,” मैंने बाबूजी का स्वर पहचान लिया।

      एक पतली-सी चीख चमकीले कांच के टुकड़ों-सी अँधेरे को छील गयी। माँ को क्या हो गया है? वह इस अजीब ढंग से चीख क्यों रही हैं?

     “छोड़ो… मेरा हाथ छोड़ दो।“

     “पोनो…. तुम भीतर नहीं जाओगी।“

     “कौन हो तुम मुझे रोकनेवाले-छि:, शर्म नहीं आती?”

     “पोनो … वह सो रहा है… इस तरह मत चिल्लाओ।“

     “मैं चिल्लाऊँगी नहीं, मुझे भीतर जाने दो।“

     “नहीं… इस वक्त नहीं।“

     “तुम समझते हो, मैं पागल हूँ… उसे सबकुछ बता दूँगी?”

     “पोनो… अपने कमरे में चलो… यहाँ मैं कुछ नहीं सुनूँगा। इस वक्त तुम होश में नहीं हो।“

     किन्तु बाबू अपनी बात पूरी नहीं कह पाए-बीच में ही किसी ने झपटकर परदा हटा दिया-गलियारे की रोशनी में मेरा बिस्तर चमक उठा, पलंग और खिड़की के बीच की दीवार अँधेरे से बाहर निकल आयी।

     मैंने देखा-संगमरमर-सी सफेद दो बाँहें परदे के बाहर हवा में फैली है। पीछे एक छाया है, भूखी, फटी-फटी-सी दो आँखें हैं… परदे को नोचती हुई लंबी-पतली काँपती अँगुलियाँ हैं और बिजली में चमचमाती नाक की लौंग, जो बार-बार फड़फड़ाते होंठों के ऊपर तारे-सी टिकी है… यह सबकुछ मैंने एक छोटे-से क्षण में देखा था-दूसरे क्षण मुझे लगा मानो परदा अपनी जगह वापिस खींच लिया गया है, सिर्फ एक भर्रायी-सी आवाज सुनायी दे जाती है, जो ऊपर उठने से पहले ही दबा दी जाती है, मानो किसी ने अपने हाथ से उसे भींच रखा हो।

     तब जो मैंने सुना, उस पर एकाएक विश्वास नहीं हो पाया। मुझे लगा परदे के पीछे कोई धीरे-धीरे हँस रहा है। नहीं, यह माँ नहीं हो सकती। माँ को जब कभी फिट आता है, तब केवल उनके दाँत कटकटाते हैं। मैंने उन्हें इतने विचित्र ढंग से हँसते हुए कभी नहीं सुना। फिर भी मैं जानता था कि यह माँ की ही आवाज है-मैं आगे कुछ भी नहीं सुन पाता-लगता है मानो कमरे का अँधेरा कमरे से अलग होकर एक मैले चीथड़े की तरह मेरी आँखों के चारों ओर घूम रहा है। संगमरमर-सी सफेद दो बाँहें काली झील से ऊपर उठी हैं-कातर-सी होकर मुझे बुलाती हैं-बार-बार अपनी ओर खींचती हैं।

     उस रात देर तक मैं बिस्तर पर बैठा-बैठा काँपता रहा। एक अजीब-सी आवाज हवा के संग खिड़की से भीतर आती थी और मेरे चेहरे को छूती-सहलाती धीरे-धीरे हँसने लगती थी।

     बानो टैरेस के नीचे गिरी हुई खूबानियाँ बीन रही है।

     बानो…

     मैं हौले से कहता हूँ… बानो।

     शिमले की एक दुपहर-जब मैं टैरेस पर लेटा हूँ-बीमारी के बाद के दिन हैं, जब हमें कोई नहीं पूछता। सब निश्चिंत से हो गए हैं, बाबू अब मेरे कमरे में हर शाम नहीं आते, बीरेन चाचा एक लंबे अर्से से दिखायी नहीं दिये। मेरे ठीक होने पर अगर दुख है तो शायद बानो को-मैं अगर बीमार बना रहता, तो दिल्ली जाने के दिन टलते रहते।

     टैरेस के पीछे दो छोटी-छोटी पहाड़ियाँ खुली हुई कैंची की तरह आकाश की ओर उठी है-उनके बीच पेड़ों की लंबी शृंखला दूर तक चली गयी है। जब कभी कालका जानेवाली ट्रेन वहाँ से गुजरती है, तो धुएँ की एक लट आकाश के चेहरे पर उड़ जाती है।

     बानो… हम दिल्ली जा रहे हैं।

     दिल्ली ! इस एक शब्द में कितनी स्मृतियाँ छिपी हैं-शिमला-कालका की साँप-सी बलखाती टेढ़ी-मेढ़ी लाइन, लंबी-लंबी अँधेरी सुरंगे और रेल के डिब्बे की खिड़की से बाहर हवा में फिसलते तारे… शाम हो जाती और मैं ऊँघ जाता। माँ कन्धा झकझोरकर जगातीं, “बच्ची, उठो !” मैं हड़बड़ाकर बैठता। बाहर अँधेरे मैदान में दूर-दूर तक कालका की झिलमिल-झिलमिल-सी रोशनियों को देखकर लगता मानो ढेर से तारे आकाश से उतरकर जमीन पर बिखर गए हों।

     बानो सीढ़ियाँ चढ़कर कब टैरेस पर आ गयी, मुझे पता नहीं लगा। उसने अपनी फ्रॉक को उठाकर झोला बना लिया है, जिसमें ठसाठस खूबानियाँ भरी हैं। नंगे पेट के चारों ओर जाँघिये के नेफे के निशान जहाँ-तहाँ छोटी-छोटी मछलियों से उभर आए हैं।

     वह फ्रॉक नीची करके खूबानियाँ बिखेर देती है-कच्ची, पक्की खूबानियाँ हैं, हरी, पीली, कुछ-कुछ लाल…

     “लो खाओ।“ वह एक पकी हुई पीले रंग की खूबानी मेरे आगे कर देती है।

     मैंने सिर हिला दिया। बाबू ने बाहर की कोई भी चीज खाने से मना किया है।

     “यह कच्ची नहीं है, इससे कुछ नहीं होगा,” किन्तु उसने मेरी स्वीकृति की प्रतीक्षा नहीं की और जो खूबानी वह मुझे दे रही थी, उसे निश्चिंत होकर खुद खाने लगी।

      खाने को खूबानी खा लेता, बाबू का तो बहाना है। असली कारण दूसरा है, जो कोई नहीं जानता, बानो बेचारी तो बिल्कुल नहीं जानती। जब से बुखार उतरा है, मुझे लगता है, जैसे मैं सब लोगों से भिन्न हूँ, अलग हूँ। कमजोरी के कारण जब कभी सिर चकराता है, पाँव काँपते हैं तो अच्छा लगता है, मन में अजीब-सी खुशी होती है, अपने पर गर्व होता है, लगता है, मुझमें एक अद्भुत परिवर्तन हो गया है और मैं असाधारण हूँ। पहले-बीमारी से पहले, माँ के मौसी के घर जाने से पहले-मेरा अपना घेरा था, जिसमें बानो और माँ, बीरेन चाचा और बाबू सब कोई थी। न मालूम, बीमारी के इस लंबे अर्से में कौन-सा क्षण आया था, जब यह घेरा टूट गया था। पिछले कुछ दिनों से मैं जिस चीज को जैसे देखता हूँ, वैसे शायद कोई नहीं देखता। पहले मैं हर चीज को दूसरों की आँखों से देखता था-और निश्चिंतता थी। अब उनके पीछे एक रहस्य है, डर है, जो मेरा अपना है, और जिसे कोई नहीं जानता।

      टैरेस के पास पवेलियन की छत पर खटखटाहट होती है। लगता है जैसे टपाटप बूंदें गिर रही हों। मैं जँगले के बाहर हाथ निकालकर देखता हूँ-बारिश नहीं है, केवल कुछ पहाड़ी चिड़ियाँ हैं, जो छत पर एक कोने से दूसरे कोने तक फुदक-फुदककर उड़ती हैं।

      बानो खूबानी को गाल के भीतर लट्टू की तरह घुमाती है-उसका कहना है कि इस तरह मुँह का सारा थूक खूबानी के भीतर जाकर रस बन जाता है।

      “दिल्ली जाना पक्का हो गया?”

      “माँ आ जायें, तब !”

      “कहाँ गयी हैं तुम्हारी माँ?”

      “मौसी के घर।“

      “तुम्हें पक्का मालूम है कि वह मौसी के घर गयी हैं?” बानो ने रहस्य-भरी आँखों से मेरी ओर देखा।

      मैं विस्मय से बानो की ओर देखता हूँ-“क्या बात है बानो?”

      “कुछ नहीं, ऐसे ही पूछा था,” बानो ने थूक में भीगी खूबानी को होंठों पर रगड़ते हुए कहा।

      “अम्मी ने मना किया है-कहा है तुमसे कुछ न कहूँ।“

       मैं चुपचाप लापरवाही से मुस्कराता हूँ। बानो पर मुझे बेहद गुस्सा है। मुझे जब बहुत गुस्सा आता है, तो मैं हमेशा मुस्कराता हूँ, ताकि कोई यह न समझे कि मेरा मन इतना कच्चा और छोटा है।

       सुर्मई रंग के बादल नीचे झुके आ रहे हैं। टैरेस के पीछे पहाड़ियाँ काली, भूरी-सी हो गयी हैं। जब कभी बादलों की ओर से सूरज का मुँह बाहर निकलता है, तो पतली-दुबली छायायें पूर्व से पश्चिम की ओर भागने लगती हैं।

       टैरेस पर- चारों ओर आस-पास अब सन्नाटा है। बरसों पहले एक मेम यहाँ रहती थी। उसके मार जाने के बाद अब यहाँ कोई नहीं रहता। बारहों महीने-गर्मी, सर्दी- कमरे बंद रहते हैं। बरामदा और उसके आगे लंबा गलियारा सूना पड़ा रहता है। हम गेस्ट हाउस के पिछवाड़े सीढ़ियाँ चढ़कर पवेलियन पर चोरी-चुपके चले जाते हैं और वहीं एक कोने में अपने अलूचे और खूबानियों का खजाना जमा करते हैं।

       कौन-सी बात है, जो बानो मुझसे छिपा रही है, क्या सचमुच उसकी अम्मी ने मना किया है, या वह सिर्फ मुझे चिढ़ाने के लिए बहका रही है।

       मैं टैरेस पर लेटे-लेटे अधमुँदी आँखों से अपने घर की छत देखता हूँ। दायीं ओर छज्जे के सिरे पर माँ के कमरे की खिड़की दिखायी देती है-माँ जब घर में नहीं होतीं, तो वह हमेशा बंद रहती है। वह अभी तक वापिस क्यों नहीं लौटीं? मौसी के घर वह इतने दिन कभी नहीं रहती थीं। क्या वह जानती हैं कि मैं अब चल-फिर लेता हूँ और बाबू ने मुझे अब यहाँ- मेम के भुतहे मकान तक आने की अनुमति दे दी है।

       उस रात से मैंने उन्हें नहीं देखा जब वह चीखती हुई मेरे दरवाजे तक आयी थीं और बाबू ने उन्हें भीतर आने से रोक दिया था। मैं निश्चय नहीं कर पाता कि क्या ऐसा सचमुच हुआ था, या मैंने सिर्फ कोई सपना देखा है।

       “दिल्ली पहाड़ों के ऊपर है या नीचे?” बानो ने पूछा।

       “दिल्ली मैदान में है-वहाँ जाने के लिए नीचे उतरना पड़ता है,” मैंने सुनी-सुनायी बात बड़े गर्व से कह दी।

        बानो ने अविश्वास भरी दृष्टि से मुझे देखा।

       “नीचे तो एननडेल का मैदान है और उसके नीचे खड्ड है-दिल्ली क्या खड्ड के नीचे है?”

      बानो कभी दिल्ली नहीं गयी, मुझे उस पर हमेशा तरस आता है। मैं उसकी जिज्ञासा को शांत करने का कोई प्रयत्न नहीं करता, और लापरवाही से सिर फेर लेता हूँ।

       बानो ने खूबानियों की गुठलियाँ पवेलियन के पीछे गेस्ट-रूम में फेंक दीं और वहीं कुछ देर तक दरवाजे से सटकर खड़ी रही।

       हवा से खूबानी के पेड़ की शाखाएं छतों पर झुकती हैं। खूबानियाँ झरती हैं-कुछ जमीन पर, कुछ पवेलियन की छत पर-खट-खट …

       दुपहर और शाम के बीच सारा शिमला चुप हो जाता है, बस केवल खूबानियों की खट-खट आवाज पहाड़ी हवा में गूँजती है…

       बानो ने हाथ के इशारे से मुझे अपने पास बुलाया है। गेस्ट-रूम के दरवाजे का एक शीशा टूटा हुआ था, उसी में अपना सिर डालकर वह कमरे के भीतर झाँक रही थी। उसके सिर के ऊपर जो जरा-सी खाली जगह बच गयी थी, वहीं मैंने खींचतान करके अपना सिर अड़ा दिया।

       कमरा बिल्कुल खाली था। दीवार के बेल-बूटेदार कागजों का रंग फीका पड़ गया था। छत के एक कोने में मकड़ी का जाला धीरे-धीरे फैल रहा था। बासी हवा की गंध चारों ओर फैली थी। फर्श के बीचोंबीच मैली-सी रोशनी जाम गयी थी, जो कभी पीली हो जाती थी, कभी फीकी-फीकी-सी सफेद। कमरे के धुंधलके में यह सफेद धब्बा बड़ा अजीब और भयावह-सा लग रहा था।

       “वह मेम यहाँ रहती होगी।“ बानो ने धीमे स्वर में कहा।

       “और शायद यहीं मरी होगी।“ मैंने कहा, और मेरे सारे शरीर में एक हल्की-सी झुरझुरी फैल गयी। मुझे लगा, सामने दीवार के कटे-फटे, उखड़े पलस्तर पर एक बेडौल-सा चेहरा उभर आया है-जिसके जबड़े खुले हैं, फटी-फटी-सी आँखें हैं और जो मेरी ओर देखता हुआ हँस रहा है। मुझे लगता है कि वह चेहरा उस मेम का रहा होगा, जो बरसों पहले उस कमरे में न जाने क्यों अपने-आप मर गयी थी… और वह हँसी, उस रात जैसे दरवाजे के पीछे माँ हँस रही थीं…

       टूटे हुए शीशे के भीतर झाँकता हुआ मेरा चेहरा बानो के सिर पर टिका है। मेरे मुँह के जरा नीचे बानो के अखरोटी रंग के बाल हैं, उन बालों की गंध पानी में भीगी मिट्टी की गंध से मिलती है। बालों के बीच छोटी-सी माँग है-माँ की माँग-जैसी, किन्तु माँ की माँग जरा लंबी थी और हमेशा बहुत उदास दिखती थीं।

       “बानो…” मेरे होंठों पर सफेद कागज-सा थूक जाम गया।

       “क्या?”

       “अम्मी ने क्या तुमसे माँ के बारे में कुछ कहा था?”

       “तुमसे क्या?” बानो ने ढीठ बनकर कहा।

       हवा चलने से सूने, खाली मकान के दरवाजे खड़खड़ा उठते हैं। फर्श पर सिमटा हुआ सफेद धब्बा धीरे-धीरे सरक रहा है।

       “बानो… जब मैं बीमार था, तो कभी-कभी बड़ा अजीब-सा लगता था..।“

       “कैसा… बच्ची?”

       “लगता था जैसे मैं भी माँ की तरह हूँ-जैसे उनकी कोई बात मुझमें भी है।“

       “कैसी बात?”

       “जिसे सब छिपाते हैं।“

       बानो का सिर सिहर जाता है।

       “एक सफेद छाया है बानो—जैसे बर्फ में लिपटी हो। वह अँधेरे में भी चमकती है और संगमरमर से सफेद उसके हाथ हैं, जो हमेशा हवा में खुले रहते हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि पीछे से चुपचाप आकर उसने मुझे अपने में ओढ़ लिया है, और मैं अपने से ही अलग हो गया हूँ-सच बानो-लगता है जैसे मैं अपने से ही अलग हो गया हूँ…”

        मुझे लगा कि बानो पत्ते-सी काँप रही है, भी से उसकी आँखें फैल गयी हैं।

        मैं हँसने लगता हूँ।

        “डर गयी बानो… ?”

        बानो चुप है, उसकी गर्म साँसें मेरे सूखे होंठों को छूती हैं।

        “बानो सच-मैं तुम्हें बहका रहा था-जो मैंने कहा वह बिल्कुल झूठ है।“ बानो कुछ नहीं कहती, वह दरवाजे को छोड़कर तेजी से टैरेस की सीढ़ियाँ उतरने लगती है।

        “बानो..” मैंने एक-दो बार उसे बुलाया, किन्तु उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

        बूंदें आती हैं, पवेलियन की छत टप-टप करती है… और मैं समझ नहीं पाता कि मेरे गालों पर जो बूँदें हैं, वे बादलों से आयी हैं-या पहले से ही वहाँ थीं…

        घर का सामान बाँधा जा चुका है। संदूकों, थैलों और बिस्तरों पर लेबल चिपकाये जा रहे हैं, जिन पर मोटी-मोटी सुर्खियों में ‘शिमला-दिल्ली’ और उसके नीचे बाबू का नाम लिखा है। घर में बड़ी चहल-पहल मची है-नौकर, जमादार, कुली और बाबू के दफ्तर के चपरासी सब इधर से उधर भागते हुए दिखायी देते हैं।

        माँ ऊपरवाले कमरे में हैं। वह इस बार कुछ काम नहीं कर रहीं-उनकी तबीयत शायद ठीक नहीं है, बाबू ने मुझे उनके पास जाने से मना किया है। जब से वह मौसी के घर से आयी हैं, मैंने उन्हें नहीं देखा, वह शायद रात को आयीं थीं, जब मैं सो रहा था।

        सब अपने काम में जुटे थे। मैं ही अकेला एक ऐसा था, जिसे कोई काम नहीं था। कभी छज्जे में जाता था, कभी बरामदे में, किन्तु हर जगह अपनी व्यर्थता महसूस होती थी। खाली-खाली से कमरे, नंगी दीवारें, कोनों में कूड़ों के ढेर… मेरा दम घुटने सा लगा और मैं बाबू की आँख बचाकर बाहर चला आया।

        पगडंडी से उतरकर मैं खड्ड के ऊपर नाले के किनारे-किनारे चलने लगा। कभी-कभी खड्ड के भीतर कोई बड़ा, मोटा-सा गेला मिल जाता तो उसे उठाकर जेब में रख लेता। रेल की खिड़की से मैं इन गेलों को छोटे-छोटे तालाबों में फेंका करता था। जब दोनों जेबें भर चुकीं तो देखा कि मैं घर से काफी दूर निकल आया हूँ। सूरज ढलने लगा था हालाँकि दूर की पहाड़ियों पर धूप अब भी थकी-माँदी-सी रेंग रही थी। मैं बीच रास्ते में मूड गया और एक छोटी-सी पगडंडी से घर की ओर चलने लगा।

        कुछ दूर चला हूँगा कि अचानक पाँव ठिठक गए। दायीं ओर नीचे की तरफ बीरेन चाचा की कॉटेज दिखायी दे रही थी। पेड़ों के झुरमुट में चारों ओर झाड़-झंखाड़ से घिरे उस घर को देखकर मुझे सहसा वह शाम याद आ गयी, जब मैं माँ के संग यहाँ आया था। माँ भूली-सी, खोयी-सी नीचे देख रही थीं, और मैं चुपचाप उनके पीछे खड़ा था। जब से माँ मौसी के घर गयी थीं, बीरेन चाचा हमारे घर नहीं आए थे। एक बार उनके बारे में बाबू से पूछा था, किन्तु बाबू का चेहरा इतना कठोर, इतना भावहीन-सा हो आया था कि आगे उनसे कुछ भी पूछने का साहस नहीं हुआ।

        ढलती धूप में कॉटेज की ढलुआँ छत लाल चमक रही थी। मैं धीरे-धीरे सड़क के किनारे लगी तार के संग नीचे उतरने लगा। फाटक खुला है। मैं दबे कदमों से भीतर चला आया हूँ। हवा आती है तो लॉन की घास पर छोटी-बड़ी सलवटें पड़ जाती हैं, झाड़ियों की सरसराहट आस-पास की नीरवता को और भी अधिक घनी बना जाती हैं। लॉन के किनारे वही पत्थर का बेंच है… जहाँ उस दिन माँ बैठी थीं।

       सोचता हूँ, वापिस लौट जाऊँ, लेकिन पाँव बजरी की सड़क पर बँधे से खड़े रह जाते हैं।

       दरवाजा खटकाता हूँ-धीरे-धीरे। “बीरेन चाचा… बीरेन चाचा”-मुझे अपनी आवाज उस अकेली, निस्तब्ध कॉटेज में गूँजती-सी सुनाई देती है। लगता है, यह कोई अजनबी आवाज है, जो मेरी आवाज के पीछे-पीछे दौड़ रही है।

       “बच्ची, भीतर आ जाओ, दरवाजा खुला है।“ बीरेन चाचा का स्वर सुनाई दिया।

       मेरे पाँव देहरी के भीतर जाते ही एक क्षण के लिए रुक गए हैं, टेबल लैम्प का मद्धिम-सा प्रकाश मेज पर बिखरे कागजों, किताबों पर गिर रहा है। एक-दो मिनट तक मैं बेवकूफ-सा देहरी पर खड़ा रहा-और तब सहसा आभास हुआ कि कमरा खाली नहीं है, कोने में ईजी चेयर पर बीरेन चाचा बैठे हैं। जहाँ वह बैठे थे, वहाँ अँधेरा था, इसलिए कमरे में घुसते ही वह मुझे एकदम दिखाई नहीं पड़े थे।

        उन्होंने मुझे अपने पलंग पर बैठने के लिए कहा और अपनी कुर्सी मेरे नजदीक खींच ली।

        “इतनी दूर अकेले आये हो?” उन्होंने मेरे हाथ को अपने हाथ में ले लिया और मुस्कराने लगे।

        मेरी आँखें अनायास अपने निकट की फूली हुई जेबों पर टिक गयीं। संकोच से मेरा मुँह लाल हो गया।

        “क्या भर रखा है इनमें—गेले हैं?”

        मैंने चुपचाप सिर हिला दिया।

        “क्या करोगे इनका?”

        “रेल के लिए रखे हैं।“ मैंने अटपटा-सा उत्तर दे दिया।

        “रेल के लिए?” बीरेन चाचा की प्रश्न-भरी दृष्टि मुझ पर टिक गयी। और तब सहसा मुझे ख्याल आया कि बीरेन चाचा को कुछ भी नहीं मालूम है। मुझे भीतर-ही-भीतर बहुत खुशी हुई कि मैं पहला व्यक्ति हूँ, जिससे उन्हें यह खबर मिलेगी।

        “बीरेन चाचा-आज रात हम दिल्ली जा रहे हैं।“

        वह कुछ देर तक अपलक मेरी ओर देखते रहे, मानो उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी। फिर वह कुर्सी से उठे और मेरी ओर कोई ध्यान दिए बिना खिड़की से बाहर देखने लगे।

        कुछ देर तक कमरे में घुटा-घुटा-सा सन्नाटा छाया रहा। मुझे लगा मानो बीरेन चाचा को यह बात पहले से ही मालूम थी, तभी शायद उन्होंने कोई कौतूहल नहीं दिखाया।

        तभी वह खिड़की से मुड़े। भूरी दाढ़ी के ऊपर उनकी नीली आँखें चमक रही थीं।

        “तुमने उस दिन जो फोटो लिया था-वह धुल गया है… देखोगे?”

        उन्होंने आलमारी से एक छोटा-सा लिफाफा निकालकर मेरे हाथ में रख दिया।

        “तुम्हारा हाथ बहुत सधा हुआ है, फोटो बिल्कुल साफ आया है।“

        मैंने फोटो निकाला और मुझे लगा मानो बहुत अर्से पहले की एक घड़ी-जिसे मैं बिल्कुल भूल चुका था-मेरी आँखों के सामने हू-ब-हू वैसी ही वापिस लौट आयी है।

        छज्जे के पीछे जंगले पर माँ की साड़ी सूख रही है-उसके पीछे पहाड़ियों की धुंधली-सी रेखा है, बिजली के तार हैं, कोने में सिमटा आकाश का एक टुकड़ा है। आगे के हिस्से में बीरेन चाचा जंगले से सटे खड़े हैं। उनकी एक बाँह माँ की साड़ी से छू भर गयी है और माँ … न जाने क्यों उनकी आँखें मुँद-सी गयी हैं, दोनों होंठ मरी हुई तितली के परों के समान अधखुले रह गये हैं, मानो वे कुछ कहते-कहते अचानक रुक गये हों।

        मैं न जाने कितनी देर तक फोटो को निहारता रहा।

        अचानक ध्यान आया कि मुझे बहुत देर हो गयी है। स्टेशन जाने का समय पास सरक आया था। बाबू देर से मेरी प्रतीक्षा करते होंगे।

        मैं झटपट पलंग से उतर आया।

        “अच्छा बीरेन चाचा…“ मुझसे आगे और कुछ नहीं कहा गया।

        बीरेन चाचा ने मुझे देखा-एकटक देखते रहे, फिर धीरे-से मेरे पास आये, अपने हाथों से मेरे बालों को छुआ और धीरे-से मेरे माथे को चूम लिया-बिल्कुल वैसे ही, जैसे उस रात माँ ने मुझे चूमा था।

        उन्होंने दरवाजा खोला और हम बाहर बरामदे में आ गये।

        “मैं तुम्हारे संग चलूँ-तुम्हें डर तो नहीं लगेगा?”

        मैंने सिर हिलाकर मना कर दिया, मुझे घर का रास्ता मालूम था।

        कुछ देर तक हम बरामदे में चुपचाप खड़े रहे।

        “बच्ची…” बीरेन चाचा का स्वर सुनकर मैं चौंक-सा गया। मैंने उनकी ओर देखा।

        “माँ ने एक किताब माँगी थी-मुझे याद नहीं रहा-“ वह झिझकते हुए चुप हो गए।

        “आप मुझे दे दीजिए-मैं दे दूँगा।“

        किताब देते हुए मुझे लगा मानो वह कुछ कहना चाह रहे हैं, किन्तु वह चुप रहे और मैं तेजी से फाटक की ओर चल पड़ा।

        कॉटेज बहुत पीछे छूट गयी है। मैं एक संकरी-सी सुनसान सड़क पर चल रहा हूँ। सामने पहाड़ी के ऊपर पेड़ों की एक लंबी कतार चली गयी है। उसके पीछे डूबते सूरज की पीली, गुलाबी, सोनाली छायाएँ आकाश पर खिंच आयी हैं। चारों ओर एक हल्की, हरी-सी धुंध फैल गयी है। घर से कुछ दूर मैं लैम्प पोस्ट के नीचे खड़ा हो गया और किताब खोलकर देखने लगा।

        मैंने देखा-पन्नों के बीच वही फोटोवाला लिफाफा रखा था।

        किताब बहुत पुरानी है- आज भी उसके जर्द, भुरभुरे पन्ने याद आते हैं-फ्लाबेज लेटर्स टु जॉर्ज साँ। उन दिनों न मैं फ्लाबे को जानता था, न जॉर्ज साँ को। बरसों बाद जब मैंने उसे पढ़ा तो माँ नहीं थीं और बीरेन चाचा एक लंबे अर्से से इटली में जाकर बस गये थे।

        किन्तु उस दिन मेरे लिए उस पुस्तक का कोई महत्व नहीं था। उसे हाथ में लिए मैं देर तक अँधेरे में खड़ा रहा-अपने घर के ऊपरवाले कमरे की ओर देखता रहा।

        माँ के कमरे की खिड़की बंद थी, सफेद-पीली रोशनी खिड़की के शीशे पर बुझी-बुझी-सी झिलमिला रही थी।

वह शिमले में हमारी आखिरी शाम थी।

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स्वातंत्र्योत्तर कहानियाँ

एक आदिम रात्रि की महक

अनुमानित समय : 16 मिनट-

…न …करमा को नींद नहीं आएगी।

नए पक्के मकान में उसे कभी नींद नहीं आती। चूना और वार्निश की गंध के मारे उसकी कनपटी के पास हमेशा चौअन्नी-भर दर्द चिनचिनाता रहता है। पुरानी लाइन के पुराने ‘इस्टिसन’ सब हजार पुराने हों, वहाँ नींद तो आती है।…ले, नाक के अंदर फिर सुड़सुड़ी जगी ससुरी…!

करमा छींकने लगा। नए मकान में उसकी छींक गूँज उठी।

‘करमा, नींद नहीं आती?’ ‘बाबू’ ने कैंप-खाट पर करवट लेते हुए पूछा।

गमछे से नथुने को साफ करते हुए करमा ने कहा – ‘यहाँ नींद कभी नहीं आएगी, मैं जानता था, बाबू!’

‘मुझे भी नींद नहीं आएगी,’ बाबू ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा – ‘नई जगह में पहली रात मुझे नींद नहीं आती।’

करमा पूछना चाहता था कि नए ‘पोख्ता’ मकान में बाबू को भी चूने की गंध लगती है क्या? कनपटी के पास दर्द रहता है हमेशा क्या?…बाबू कोई गीत गुनगुनाने लगे। एक कुत्ता गश्त लगाता हुआ सिगनल-केबिन की ओर से आया और बरामदे के पास आ कर रुक गया। करमा चुपचाप कुत्ते की नीयत को ताड़ने लगा। कुत्ते ने बाबू की खटिया की ओर थुथना ऊँचा करके हवा में सूँघा। आगे बढ़ा। करमा समझ गया – जरूर जूता-खोर कुत्ता है, साला!… नहीं, सिर्फ सूँघ रहा था। कुत्ता अब करमा की ओर मुड़ा। हवा सूँघने लगा। फिर मुसाफिरखाने की ओर दुलकी चाल से चला गया।

बाबू ने पूछा – ‘तुम्हारा नाम करमा है या करमचंद या करमू?’

…सात दिन तक साथ रहने के बाद, आज आधी रात के पहर में बाबू ने दिल खोल कर एक सवाल के जैसा सवाल किया है।

‘बाबू, नाम तो मेरा करमा ही है। वैसे लोगों के हजार मुँह हैं, हजार नाम कहते हैं।…निताय बाबू कोरमा कहते थे, घोस बाबू करीमा कह कर बुलाते थे, सिंघ जी ने ब दिन कामा ही कहा और असगर बाबू तो हमेशा करम-करम कहते थे। खुश रहने पर दिल्लगी करते थे – हाय मेरे करम!…नाम में क्या है, बाबू? जो मन में आए कहिए। हजार नाम…!’

‘तुम्हारा घर संथाल परगना में है, या राँची-हजारीबाग की ओर?’

करमा इस सवाल पर अचकचाया, जरा! ऐसे सवालों के जवाब देते समय वह रमते जोगी की मुद्रा बना लेता है। ‘घर? जहाँ धड़, वहाँ घर। माँ-बाप-भगवान जी!’…लेकिन, बाबू को ऐसा जवाब तो नहीं दे सकता!

…बाबू भी खूब हैं। नाम का ‘अरथ’ निकाल कर अनुमान लगा लिया – घर संथाल परगना या राँची-हजारीबाग की ओर होगा, किसी गाँव में? करमा-पर्व के दिन जन्म हुआ होगा, इसीलिए नाम करमा पड़ा। माथा, कपाल, होंठ और देह की गठन देख कर भी…।

…बाबू तो बहुत ‘गुनी’ मालुम होते हैं। अपने बारे में करमा को कुछ मालुम नहीं। और बाबू नाम और कपाल देख कर सब कुछ बता रहे हैं। इतने दिन के बाद एक बाबू मिले हैं, गोपाल बाबू जैसे!

करमा ने कहा – ‘बाबू, गोपाल बाबू भी यही कहते थे! यह ‘करमा’ नाम तो गोपाल बाबू का ही दिया हुआ है!’

करमा ने गोपाल बाबू का किस्सा शुरु किया – ‘…गोपाल बाबू कहते थे, आसाम से लौटती हुई कुली-गाड़ी में एक ‘डोको’ के अंदर तू पड़ा था, बिना ‘बिलटी-रसीद’ के ही…लावारिस माल।’

…चलो, बाबू को नींद आ गई। नाक बोलने लगी। गोपाल बाबू का किस्सा अधूरा ही रह गया।

…कुतवा फिर गश्त लगाता हुआ आया। यह कातिक का महीना है न! ससुरा पस्त हो कर आया है। हाँफ रहा है।…ले, तू भी यहीं सोएगा? ऊँह! साले की देह की गंध यहाँ तक आती है – धेत! धेत!

बाबू ने जग कर पूछा, ‘हूँ-ऊ-ऊ! तब क्या हुआ तुम्हारे गोपाल बाबू का?’

कुत्ता बरामदे के नीचे चला गया। उलट कर देखने लगा। गुर्राया। फिर, दो-तीन बार दबी हुई आवाज में ‘बुफ-बुफ’ कर जनाने मुसाफिरखाने के अंदर चला गया, जहाँ पैटमान जी सोता है।

‘बाबू, सो गए क्या?’

…चलो, बाबू को फिर नींद आ गई ! बाबू की नाक ठीक ‘बबुआनी आवाज’ में ही ‘डाकती’ है!…पैटमान जी तो, लगता है, लकड़ी चीर रहे हैं! – गोपाल बाबू की नाक बीन-जैसी बजती थी – सुर में!!…असगर बाबू का खर्राटा…सिंघ जी फुफकारते थे और साहू बाबू नींद में बोलते थे – ‘ए, डाउन दो, गाड़ी छोड़ा…!’

…तार की घंटी! स्टेशन का घंटा! गार्ड साहब की सीटी! इंजिन का बिगुल! जहाज का भोंपो! – सैकडों सीटियाँ…बिगुल…भोंपा…भों-ओं-ओं-ओं…!

– हजार बार, लाख बार कोशिश करके भी अपने को रेल की पटरी से अलग नहीं कर सका, करमा। वह छटपटाया। चिल्लाया, मगर जरा भी टस-से-मस नहीं हुई उसकी देह। वह चिपका रहा। धड़धड़ाता हुआ इंजिन गरदन और पैरों को काटता हुआ चला गया। …लाइन के एक ओर उसका सिर लुढ़का हुआ पड़ा था, दूसरी ओर दोनों पैर छिटके हुए! उसने जल्दी से अपने कटे हुए पैरों को बटोरा – अरे, यह तो एंटोनी ‘गाट’ साहब के बरसाती जूते का जोड़ा है! गम-बूट!…उसका सिर क्या हुआ?..धेत,धेत! ससुरा नाक-कान बचा रहा…!

‘करमा!’

– धेत-धेत!

‘उठ करमा, चाय बना?’

करमा धड़फड़ा कर उठ बैठा।…ले, बिहान हो गया। मालगाड़ी को ‘थुरु-पास’ करके, पैटमान जी हाथ में बेंत की कमानी घुमाता हुआ आ रहा है। …साला! ऐसा भी सपना होता है, भला? बारह साल में, पहली बार ऐसा अजूबा सपना देखा करमा ने। बारह साल में एक दिन के लिए भी रेलवे-लाइन से दूर नहीं गया, करमा। इस तरह ‘एकसिडंटवाला सपना’ कभी नहीं देखा उसने!

करमा रेल-कंपनी का नौकर नहीं। वह चाहता तो पोटर, खलासी पैटमान या पानी पाँडे़ की नौकरी मिल सकती थी। खूब आसानी से रेलवे-नौकरी में ‘घुस’ सकता था। मगर मन को कौन समझाए! मन माना नहीं। रेल-कंपनी का नीला कुर्ता और इंजिन-छाप बटन का शौक उसे कभी नहीं हुआ!

रेल-कंपनी क्या, किसी की नौकरी करमा ने कभी नहीं की। नामधाम पूछने के बाद लोग पेशे के बारे में पूछते हैं। करमा जवाब देता है – ‘बाबू के ‘साथ’ रहते हैं।’…एक पैसा भी मुसहरा न लेनेवालों को ‘नौकर’ तो नहीं कह सकते!

…गोपाल बाबू के साथ, लगातार पाँच वर्ष! इसके बाद कितने बाबुओं के साथ रहा, यह गिन कर कर बतलाना होगा! लेकिन, एक बात है – ‘रिलिफिया बाबू’ को छोड़ कर किसी ‘सालटन बाबू’ के साथ वह कभी नहीं रहा। …सालटन बाबू माने किसी ‘टिसन’ में ‘परमानंटी’ नौकरी करनेवाला – फैमिली के साथ रहनेवाला!

…जा रे गोपाल बाबू! वैसा बाबू अब कहाँ मिले? करमा का माय-बाप, भाय-बहिन, कुल-परिवार जो बूझिए – सब एक गोपाल बाबू!…बिना ‘बिलटी-रसीद’ का लावारिस माल था, करमा। रेलवे अस्पताल से छुड़ा कर अपने साथ रखा गोपाल बाबू ने।जहाँ जाते, करमा साथ जाता। जो खाते, करमा भी खाता। …लेकिन आदमी की मति को क्या कहिए! रिलिफिया काम छोड़ कर सालटानी काम में गए। फिर, एक दिन शादी कर बैठे। …बौमा …गोपाल बाबू की ‘फैमली’ – राम-हो-राम! वह औरत थी? साच्छात चुड़ैल! …दिन-भर गोपाल बाबू ठीक रहते। साँझ पड़ते ही उनकी जान चिड़िया की तरह ‘लुकाती’ फिरती।…आधी रात को कभी-कभी ‘इसपेसल’ पास करने के लिए बाबू निकलते। लगता, अमरीकन रेलवे-इंजिन के ‘बायलर’ में कोयला झोंक कर निकले हैं। …करमा ‘क्वाटर’ के बरामदे पर सोता था। तीन महीने तक रात में नींद नहीं आई, कभी। …बौमा ‘फों-फों’ करती – बाबू मिनमिना कुछ बोलते। फिर शुरु होता रोना-कराहना, गाली-गलौज, मारपीट। बाबू भाग कर बाहर निकलते और वह औरत झपट कर माथे का केश पकड़ लेती। …तब करमा ने एक उपाय निकाला। ऐसे समय में वह उठ कर दरवाजा खटखटा कर कहता – ‘बाबू, ‘इसपेशल’ का ‘कल’ बोलता है…।’ बाबू की जान कितने दिनों तक बचाता करमा? …बौमा एक दिन चिल्लाई – ‘ए छोकरा हरामजदा के दूर करो। यह चोर है, चो-ओ-ओ-र!’

…इसके बाद से ही किसी ‘टिसन’ के फैमिली क्वाटर को देखते ही करमा के मन में एक पतली आवाज गूँजने लगती है – चो-ओ-ओ-र! हरामजदा! फैमिली क्वाटर ही क्यों – जनाना मुसाफिरखाना, जनाना दर्जा, जनाना… जनाना नाम से ही करमा को उबकाई आने लगती है।

…एक ही साल में गोपाल बाबू को ‘हाड़-गोड़’ सहित चबा कर खा गई, वह जनाना! फूल-जैसे सुकुमार गोपाल बाबू! जिंदगी में पहली बार फूट-फूट कर रोया था, करमा।

…रमता-जोगी, बहता-पानी और रिलिफिया बाबू! हेड-क्वाटर में चौबीस घंटे हुए कि ‘परवाना’ कटा – फलाने टिशन का मास्टर बीमार है, सिक-रिपोट आया है। तुरंत ‘जोआएन’ करो।…रिलिफिया बाबू का बोरिया-बिस्तर हमेशा ‘रेडी’ रहना चाहिए। कम-से-कम एक सप्ताह रिलिफिया बाबू। …लकड़ी के एक बक्से में सारी गुहस्थी बंद करके – आज यहाँ, कल वहाँ।…पानीपाड़ा से भातगाँव, कुरैहा से रौताड़ा। पीर, हेड-क्वाटर, कटिहार! …गोपाल बाबू ने ही घोस बाबू के साथ लगा दिया था – ‘खूब भालो बाबू। अच्छी तरह रखेगा। लेकिन, घोस बाबू के साथ एक महीना से ज्यादा नहीं रह सका, करमा। घोस बाबू की बेवजह गाली देने की आदत! गाली भी बहुत खराब-खराब! माँ-बहन की गाली।…इसके अलावा घोस बाबू में कोई ऐब नहीं था। अपने ‘समांग’ की तरह रखते थे। …घोस बाबू आज भी मिलते हैं तो गाली से ही बात शुरु करते हैं – ‘की रे…करमा? किसका साथ में हैं आजकल मादर्च…?’

घोस बाबू को माँ-बहन की गाली देनेवाला कोई नहीं। नहीं तो समझते कि माँ-बहन की गाली सुन कर आदमी का खून किस तरह खौलने लगता है। किसी भले आदमी को ऐसी खराब गाली बकते नहीं सुना है करमा ने, आज तक।

…राम बाबू की सब आदत ठीक थी। लेकिन – भा-आ-री ‘इस्की आदमी।’ जिस टिसन में जाते, पैटमान-पोटर-सूपर को एकांत में बुला कर घुसर-फुसर बतियाते। फिर रात में कभी मालगोदाम की ओर तो कभी जनाना मुसाफिरखाना में, तो कभी जनाना-पैखाना में…छिः-छिः…जहाँ जाते छुछुआते रहते – ‘क्या जी, असल-माल-वाल का कोई जोगाड़ जंतर नहीं लगेगा?’…आखिर वही हुआ जो करमा ने कहा था – ‘माल’ ही उनका ‘काल’ हुआ। पिछले साल, जोगबनी-लाइन में एक नेपाली ने खुकरी से दो टुकड़ा काट कर रख दिया। और उड़ाओ माल! …जैसी अपनी इज्जत वैसी पराई !

…सिंघ जी भारी ‘पुजेगरी’! सिया सहित राम-लछमन की मूर्ति हमेशा उनकी झोली में रहती थी। रोज चार बजे भोर से ही नहा कर पूजा की घंटी हिलाते रहते। इधर ‘कल’ की घंटी बजती। …जिस घर में ठाकुर जी की झोली रहती, उसमें बिना नहाए कोई पैर भी नहीं दे सकता। …कोई अपनी देह को उस तरह बाँध कर हमेशा कैसे रह सकता है? कौन दिन में दस बार नहाए और हजार बार पैर धोए! सो भी, जाड़े के मौसम में! …जहाँ कुछ छुओ कि हूँहूँहूँ-हाँहाँहाँ-अरेरेरे-छू दिया न? …ऐसे छुतहा आदमी को रेल-कंपनी में आने की क्या जरुरत? …सिंघ जी का साथ नहीं निभ सका।

…साहू बाबू दरियादिल आदमी थे। मगर मदक्की ऐसे कि दिन-दोपहर को पचास-दारु एक बोतल पी कर मालगाड़ी को ‘थुरुपास’ दे दिया और गाड़ी लड़ गई। करमा को याद है, ‘एकसिडंट’ की खबर सुन कर साहू बाबू ने फिर एक बोतल चढ़ा लिया। …आखिर डॉक्टर ने दिमाग खराब होने का ‘साटिफिटिक’ दे दिया।

…लेकिन, उस ‘एकसिडंट’ के समय भी किसी रात को करमा ने ऐसा सपना नहीं देखा!

…न …भोर-भार ऐसी कुलच्छन-भरी बात बाबू को सुना कर करमा ने अच्छा नहीं किया। रेलवे की नौकरी में अभी तुरत ‘घुसवै’ किए हैं।

…न…बाबू के मिजाज का टेर-पता अब तक करमा को नहीं मिला है। करीब एक सप्ताह तक साथ में रहने के बाद, कल रात में पहली बार दिल खोल कर दो सवाल-जवाब किया बाबू ने। इसीलिए, सुबह को करमा ने दिल खोल कर अपने सपने की बात शुरु की थी। चाय की प्याली सामने रखने के बाद उसने हँस कर कहा – ‘हँह बाबू, रात में हम एक अ-जू-ऊ-ऊ-बा सपना देखा। धड़धड़ाता इंजिन… लाइन पर चिपकी हमारी देह टस-से-मस- नहीं… सिर इधर और पैर लाइन के उधर… एंटोनी गाट साहब के बरसाती जूते का जोड़ा… गमबोट…!’

‘धेत! क्या बेसिर-पैर की बात करते हो, सुबह-सुबह? गाँजा-वाँजा पीता है क्या?’

…करमा ने बाबू को सपने की बात सुना कर अच्छा नहीं किया।

करमा उठ कर ताखे पर रखे हुए आईने में अपना मुँह देखने लगा। उसने ‘अ-जू-ऊ-ऊ-बा’ कह कर देखा। छिः उसके होंठ तीतर की चोच की तरह…।

‘का करमचन? का बन रहा है?’

…पानी पाँड़े भला आदमी है। पुरानी जान-पहचान है इससे, करमा की। कई टिसन में संगत हुआ हैं। लेकिन, यह पैटमान ‘लटपटिया’ आदमी मालूम होता है। हर बात में पुच-पुच कर हँसनेवाला।

‘करमचन, बाबू कौन जाती के हैं?’

‘क्यों? बंगाली हैं।’

‘भैया, बंगाली में भी साढ़े-बारह बरन के लोग होते है।’

पानी पाँड़े जाते-जाते कह गया, ‘थोड़ी तरकारी बचा कर रखना, करमचन!’

…घर कहाँ? कौन जाति? मनिहारी घाट के मस्ताना बाबा का सिखाया हुआ जवाब, सभी जगह नहीं चलता – हरि के भजे सो हरी के होई! मगर, हरि की भी जाति थी! …ले, यह घटही-गाड़ी का इंजन कैसे भेज दिया इस लाइन में आज? संथाली-बाँसी जैसी पतली सीटी-सी-ई-ई!!

…ले, फक्का! एक भी पसिंजर नहीं उतरा, इस गाड़ी से भी। काहे को इतना खर्चा करके रेल-कंपनी ने यहाँ टिसन बनाया, करमा के बुद्धि में नहीं आता। फायदा? बस, नाम ही आदमपुरा है – आमदनी नदारद। सात दिन में दो टिकट कटे हैं और सिर्फ पाँच पासिंजर उतरे हैं, तिसमें दो बिना टिकट के। …इतने दिन के बाद पंद्रह बोरा बैंगन उस दिन बुक हुआ। पंद्रह बैंगन दे कर ही काम बना लिया, उस बूढ़े ने।…उस बैंगनवाले की बोली-बानी अजीब थी। करमा से खुल कर गप करना चाहता था बूढ़ा। घर कहाँ है? कौन जाति? घर में कौन-कौन हैं? …करमा ने सभी सवालों का एक ही जवाब दिया था – ऊपर की ओर हाथ दिखला कर! बूढ़ा हँस पड़ा था। …अजीब हँसी!

…घटही-गाड़ी! सी-ई-ई-ई!!

करमा मनिहारीघाट टिसन में भी रहा है, तीन महीने तक एक बार, एक महीना दूसरी बार। …मनिहारीघाट टिसन की बात निराली है। कहाँ मनिहारीघाट और कहाँ आदमपुरा का यह पिद्दी टिसन!

…नई जगह में, नए टिसन में पहुँच कर आसपास के गाँवों में एकाध चक्कर घुमे-फिरे बिना करमा को न जाने ‘कैसा-कैसा’ – लगता है। लगता है, अंध-कूप में पड़ा हुआ है। …वह ‘डिसटन-सिंगल’ के उस पार दूर-दूर तक खेत फैले हैं। …वह काला जंगल …ताड़ का वह अकेला पेड़ …आज बाबू को खिला-पिला कर करमा निकलेगा। इस तरह बैठे रहने से उसके पेट का भात नहीं पचेगा। …यदि गाँव-घर और खेत मैदान में नहीं घूमता-फिरता, तो वह पेड़ पर चढ़ना कैसे सीखता? तैरना कहाँ सीखता?

…लखपतिया टिसन का नाम कितना ‘जब्बड़’ है! मगर टिसन पर एक ‘सत्तू-फरही’ की भी दुकान नहीं। आसपास में, पाँच कोस तक कोई गाँव नहीं। मगर, टिसन से पूरब जो दो पोखरे हैं, उन्हें कैसे भूल सकता है करमा? आईना की तरह झलमलाता हुआ पानी। …बैसाख महीने की दोपहरी में, घंटो गले-भर पानी में नहाने का सुख! मुँह से कह कर बताया नहीं जा सकता!

…मुदा, कदमपुरा – सचमुच कदमपुरा है। टिसन से शुरु करके गाँव तक हजारों कदम के पेड़ हैं। …कदम की चटनी खाए एक युग हो गया!

…वारिसगंज टिसन, बीच कस्बा में है। बड़े-बड़े मालगोदाम, हजारों गाँठ-पाट, धान-चावल के बोरे, कोयला-सीमेंट-चूना की ढेरी! हमेशा हजारों लोगों की भीड़! करमा को किसी का चेहरा याद नहीं। …लेकिन टिसन से सटे उत्तर की ओर मैदान में तंबू डाल कर रहनेवाले गदहावाले मगहिया डोमों की याद हमेशा आती है। …घाघरीवाली औरतें, हाथ में बड़े-बड़े कड़े, कान में झुमके …नंगे बच्चे, कान में गोल-गोल कुंडलवाले मर्द! …उनके मुर्गे! उनके कुत्ते!

…बथनाह टिसन के चारों ओर हजार घर बन गए हैं। कोई परतीत करेगा कि पाँच साल पहले बथनाह टिसन पर दिन-दोपहर को टिटही बोलती थी।

…कितनी जगहों, कितने लोगों की याद आती है! …सोनबरसा के आम …कालूचक की मछलियाँ …भटोतर की दही …कुसियारगाँव का ऊख!

…मगर सबसे ज्यादा आती है मनिहारीघाट टिसन की याद। एक तरफ धरती, दूसरी ओर पानी। इधर रेलगाड़ी, उधर जहाज। इस पार खेत-गाँव-मैदान, उस पार साहेबगंज-कजरोटिया का नीला पहाड़। नीला पानी – सादा बालू! …तीन एक, चार-चार महीने तक तीसों दिन गंगा में नहाया है, करमा। चार ‘जनम तक’ पाप का कोई असर तो नहीं होना चाहिए! इतना बढ़िया नाम शायद ही किसी टिसन का होगा – मनीहार। …बलिहारी! मछुवे जब नाव से मछलियाँ उतारते तो चमक के मारे करमा की आँखे चौंधिया जातीं।

…रात में, उधर जहाज चला जाता – धू-धू करता हुआ। इधर गाड़ी छकछकाती हुई कटिहार की ओर भागती। अजू साह की दुकान की ‘झाँपी’ बंद हो जाती। तब घाट पर मस्तानबाबा की मंडली जुटती।

…मस्तानबाबा कुली-कुल के थे। मनिहारीघाट पर ही कुली का काम करते थे। एक बार मन ऐसा उदास हो गया कि दाढ़ी और जटा बढ़ा कर बाबा जी हो गए। खंजड़ी बजा कर निरगुन गाने लगे। बाबा कहते – ‘घाट-घाट का पानी पी कर देखा – सब फीका। एक गंगाजल मीठा…।’ बाबा एक चिलम गाँजा पी कर पाँच किस्सा सुना देते। सब बेद-पुरान का किस्सा! करमा ने ग्यान की दो-चार बोली मनिहारीघाट पर ही सीखीं। मस्तानबाबा के सत्संग में। लेकिन, गाँजा में उसने कभी दम नहीं लगाया। …आज बाबू ने झुँझला कर जब कहा, ‘गाँजा-वाँजा पीते हो क्या’ – तो करमा को मस्तानबाबा की याद आई। बाबा कहते – हर जगह की अपनी खुशबू-बदबू होती है! …इस आदमपुरा की गंध के मारे करमा को खाना-पीना नहीं रुचता।

…मस्तानबाबा को बाद दे कर मनिहारीघाट की याद कभी नहीं आती।

करमा ने ताखे पर रखे आईने में फिर अपना मुखड़ा देखा। उसने आँखे अधमुँदी करके दाँत निकाल कर हँसते हुए मस्तानबाबा के चेहरे की नकल उतारने की चेष्टा की – ‘मस्त रहो! …सदा आँख-कान खोल कर रहो। …धरती बोलती है। गाछ-बिरिच्छ भी अपने लोगों को पहचानते हैं। …फसल को नाचते-गाते देखा है, कभी? रोते सुना है कभी अमावस्या की रात को? है…है…है – मस्त रहो…।’

…करमा को क्या पता कि बाबू पीछे खड़े हो कर सब तमाशा देख रहे हैं। बाबू ने अचरज से पूछा, ‘तुम जगे-जगे खड़े हो कर भी सपना देखता है? …कहता है कि गाँजा नहीं पीता?’

सचमुच वह खड़ा-खड़ा सपना देखने लगा था। मस्तानबाबा का चेहरा बरगद के पेड़ की तरह बड़ा होता गया। उसकी मस्त हँसी आकाश में गूँजने लगी! गाँजे का धुआँ उड़ने लगा। गंगा की लहरे आईं। दूर, जहाज का भोंपा सुनाई पड़ा – भों-ओं-ओं!

बाबू ने कहा, ‘खाना परोसो। देखूँ, क्या बनाया है? तुमको लेकर भारी मुश्किल है…।’

मुँह का पहला कौर निगल कर बाबू करमा का मुँह ताकने लगे, ‘लेकिन, खाना तिओ बहोत बढ़िया बनाया है!’

खाते-खाते बाबू का मन-मिजाज एकदम बदल गया। फिर रात की तरह दिल खोल कर गप करने लगे, ‘खाना बनाना किसने सिखलाया तुमको? गोपाल बाबू की घरवाली ने?’

…गोपाल बाबू की घरवाली? माने बौमा? वह बोला, ‘बौमा का मिजाज तो इतना खट्टा था कि बोली सुन कर कड़ाही का ताजा दूध फट जाए। वह किसी को क्या सिखावेगी? फूहड़ औरत?’

‘और यह बात बनाना किसने सिखलाया तुमको?’

करमा को मस्तान बाबा की ‘बानी’ याद आई, ‘बाबू,सिखलाएगा कौन? …सहर सिखाए कोतवाली!’

‘तुम्हारी बीबी को खूब आराम होगा!’

बाबू का मन-मिजाज इसी तरह ठीक रहा तो एक दिन करमा मस्तानबाबा का पूरा किस्सा सुनाएगा।

‘बाबू, आज हमको जरा छुट्टी चाहिए।’

‘छुट्टी! क्यों? कहाँ जाएगा?’

करमा ने एक ओर हाथ उठाते हुए कहा, ‘जरा उधर घूमने-फिरने…।’

पैटमान जी ने पुकार कर कहा, ‘करमा! बाबू को बोलो, ‘कल’ बोलता है।’

…तुम्हारी बीबी को खूब आराम होगा! …करमा की बीबी! वारीसगंज टिसन …मगहिया डोमो के तंबू …उठती उमेरवाली छौंड़ी …नाक में नथिया …नाक और नथिया में जमे हुए काले मैले …पीले दाँतो में मिस्सी!!

करमा अपने हाथ का बना हुआ हलवा-पूरी उस छौंड़ी को नहीं खिला सका। एक दिन कागज की पुड़िया में ले गया। लेकिन वह पसीने से भीग गया। उसकी हिम्मत ही नहीं हुई। …यदि यह छौंड़िया चिल्लाने लगे कि तुम हमको चुरा-छिपा कर हलवा काहे खिलाता है? …ओ, मइयो-यो-यो-यो-यो-यो…!!

…बाबू हजार कहें, करमा का मन नहीं मानता कि उसका घर संथाल-परगना या राँची की ओर कहीं होगा। मनिहारीघाट में दो-दो बार रह आया है, वह। उस पार के साहेबगंज-कजरौटिया के पहाड़ ने उसको अपनी ओर नहीं खींचा कभी! और वारिसगंज, कदमपुरा, कालूचक, लखपतिया का नाम सुनते ही उसके अंदर कुछ झनझना उठता है। जाने-पहचाने, अचीन्हे, कितने लोगों के चेहरों की भीड़ लग जाती है! कितनी बातें सुख-दुख की! खेत-खलिहान, पेड़-पौधे, नदी-पोखरे, चिरई-चुरमुन-सभी एक साथ टानते हैं, करमा को!

…सात दिन से वह काला जंगल और ताड़ का पेड़ उसको इशारे से बुला रहे है। जंगल के ऊपर आसमान में तैरती हुई चील आ कर करमा को क्यों पुकार जाती है? क्यों?

रेलवे-हाता पार करने के बाद भी जब कुत्ता नहीं लौटा तो करमा ने झिड़की दी, ‘तू कहाँ जाएगा ससुर? जहाँ जाएगा झाँव-झाँव करके कुत्ते दौड़ेंगे। …जा! भाग! भाग!!’

कुत्ता रुक कर करमा को देखने लगा। धनखेतों से गुजरनेवाली पगडंडी पकड़ कर करमा चल रहा है। धान की बालियाँ अभी फूट कर निकली नहीं हैं। …करमा को हेडक्वाटर के चौधरी बाबू की गर्भवती घरवाली की याद आई। सुना है, डॉक्टैरनी ने अंदर का फोटो ले कर देखा है – जुड़वाँ बच्चा है पेट में!

…इधर, ‘हथिया-नच्छत्तर अच्छा ‘झरा’ था। खेतों में अभी भी पानी लगा हुआ है। …मछली?

…पानी में माँगुर मछलियों को देख कर करमा की देह अपने-आप बँध गई। वह साँस रोक कर चुपचाप खड़ा रहा। फिर धीरे-धीरे खेत की मेंड़ पर चला गया। मछलियाँ छलमलाईं। आईने की तरह थिर पानी अचानक नाचने लगा। …करमा कया करे? …उधर की मेंड़ से सटा कर एक ‘छेंका’ दे कर पानी को उलीच दिया जाए तो…?

…हैहै-हैहै! साले! बन का गीदड़, जाएगा किधर? और छ्लमलाओ! …अरे, काँटा करमा को क्या मारता है? करमा नया शिकारी नहीं।

आठ माँगुर और एक गहरी मछली! सभी काली मछलियाँ! कटिहार हाट में इसी का दाम बेखटके तीन रुपयो ले लेता। …कर्मा ने गमछे में मछलियों को बाँध लिया। ऐसा ‘संतोख’ उसको कभी नहीं हुआ, इसके पहले। बहुत-बहुत मछली का शिकार किया उसने!

एक बूढ़ा भैंसवार मिला जो अपनी भैंस को खोज रहा था, ‘ए भाय! उधर किसी भैंस पर नजर पड़ी है?’

भैंसवार ने करमा से एक बीड़ी माँगी। उसको अचरज हुआ – कैसा आदमी है, न बीड़ी पीता है, न तंबाकू खाता है। उसने नाराज हो कर जिरह शुरु किया, ‘इधर कहाँ जाना है? गाँव में तुम्हारा कौन है? मछली कहाँ ले जा रहे हो?’

…ताड़ का पेड़ तो पीछे की ओर घसकता जाता है! करमा ने देखा, गाँव आ गया। गाँव में कोई तमाशावाला आया है। बच्चे दौड़ रहे हैं। हाँ, भालू वाला ही है। डमरु की बोली सुन कर करमा ने समझ लिया था।

…गाँव की पहली गंध! गंध का पहला झोंका!

…गाँव का पहला आदमी। यह बूढ़ा गोबी को पानी से पटा रहा है। बाल सादा हो गए हैं, मगर पानी भरते समय बाँह में जवानी ऐंठती है! …अरे, यह तो वही बूढ़ा है जो उस दिन बैंगन बुक कराने गया था और करमा से घुल-मिल कर गप करना चाहता था। करमा से खोद-खोद कर पूछता था – माय-बाप है नहीं या माय-बाप को छोड़ भाग आए हो? …ले, उसने भी करमा को पहचान लिया!

‘क्या है, भाई! इधर किधर?’

‘ऐसे ही। घूमने-फिरने! …आपका घर इसी गाँव में है?’

बूढ़ा हँसा। घनी मूँछें खिल गई। …बूढ़ा ठीक सत्तो बाबू टीटी के बाप की तरह हँसता है।

एक लाल साड़ीवाली लड़की हुक्के पर चिलम चढ़ा कर फूँकती हुई आई। चिलम को फूँकते समय उसके दोनों गाल गोल हो गए थे। करमा को देख कर वह ठिठकी। फिर गोभी के खेत के बाड़े को पार करने लगी। बूढ़े ने कहा, ‘चल बेटी, दरवाजे पर ही हम लोग आ रहे हैं।’

बूढ़ा हाथ-पैर धो कर खेत से बाहर आया, ‘चलो!’

लड़की ने पूछा, ‘बाबा, यह कौन आदमी है?’

‘भालू नचानेवाला आदमी।’

‘धेत्त!’

करमा लजाया। …क्या उसका चेहरा-मोहरा भालू नचानेवाले-जैसा है? बूढ़े ने पूछा, ‘तुम रिलिफिया बाबू के नौकर हो न?’

‘नहीं, नौकर नहीं।…ऐसे ही साथ में रहता हूँ।’

‘ऐसे ही? साथ में? तलब कितना मिलता है?’

‘साथ में रहने पर तलब कितना मिलेगा?’

…बूढ़ा हुक्का पीना भूल गया। बोला, ‘बस? बेतलब का ताबेदार?’

बूढ़े ने आँगन की ओर मुँह करके कहा, ‘सरसतिया! जरा माय को भेज दो, यहाँ। एक कमाल का आदमी…।’

बूढ़ी टट्टी की आड़ में खड़ी थी। तुरत आई। बूढ़े ने कहा, ‘जरा देखो, इस किल्लाठोंक-जवान को। पेट भात पर खटता है। …क्यों जी, कपड़ा भी मिलता है?…इसी को कहते हैं – पेट-माधोराम मर्द!’

…आँगन में एक पतली खिलखिलाहट! …भालू नचानेवाला कहीं पड़ोस में ही तमाशा दिखा रहा है। डमरु ने इस ताल पर भालू हाथ हिला-हिला कर ‘थब्बड़-थब्बड़’ नाच रहा होगा – थुथना ऊँचा करके! …अच्छा जी भोलेराम!

…सैकड़ों खिलखिलाहट!!

‘तुम्हारा नाम क्या है जी? …करमचन? वाह, नाम तो खूब सगुनिया है। लेकिन काम? काम चूल्हचन?’

करमा ने लजाते हुए बात को मोड़ दिया, ‘आपके खेत का बैंगन बहोत बढ़िया है। एकदम घी-जैसा…।’ बूढ़ा मुसकराने लगा।

और बूढ़ी की हँसी करमा की देह में जान डाल देती है। वह बोली, ‘बेचारे को दम तो लेने दो। तभी से रगेट रहे हो।’

‘मछली है? बाबू के लिए ले जाओगे?’

‘नहीं। ऐसे ही… रास्ते में शिकार…।’

‘सरसतिया की माय! मेहमान को चूड़ा भून कर मछली की भाजी के साथ खिलाओ! …एक दिन दूसरे के हाथ की बनाई मछली खा लो जी!’

जलपान करते समय करमा ने सुना – कोई पूछ रही थी, ‘ए, सरसतिया की माय! कहाँ का मेहमान है?’

‘कटिहार का।’

‘कौन है?’

‘कुटुम ही है।’

‘कटिहार में तुम्हारा कुटुम कब से रहने लगा?’

‘हाल से ही।’

…फिर एक खिलखिलाहट! कई खिलखिलाहट!! …चिलम फूँकते समय सरसतिया के गाल मोसंबी की तरह गोल हो जाते हैं। बूढ़ी ने दुलार-भरे स्वर में पूछा, ‘अच्छा ए बबुआ! तार के अंदर से आदमी की बोली कैसे जाती है? हमको जरा खुलासा करके समझा दो।’

चलते समय बूढ़ी ने धीरे-से कहा, ‘बूढ़े की बात का बुरा न मानना। जब से जवान बेटा गया, तब से इसी तरह उखड़ी-उखड़ी बात करता है। …कलेजे का घाव…।’

‘एक दिन फिर आना।’

‘अपना ही घर समझना!’

लौटते समय करमा को लगा, तीन जोड़ी आँखें उसकी पीठ पर लगी हुई हैं। आँखें नहीं – डिसटन-सिंगल, होम-सिंगल और पैट सिंगल की लाल गोल-गोल रोशनी!

जिस खेत में करमा ने मछली का शिकार किया था उसकी मेंड़ पर एक ढोढ़िया-साँप बैठा था। फों-फों करता भागा। …हद है! कुत्ता अभी तक बैठा उसकी राह देख रहा था! खुशी के मारे नाचने लगा करमा को देख कर!

रेलवे-हाता में आ कर करमा को लगा, बूढ़े ने उसको बना कर ठग लिया। तीन रुपए की मोटी-मोटी माँगुर मछलियाँ एक चुटकी चूड़ा खिला कर, चार खट्टी-मीठी बात सुना कर…।

…करमा ने मछली की बात अपने पेट में रख ली। लेकिन बाबू तो पहले से ही सबकुछ जान लेनेवाला – ‘अगरजानी’ है। दो हाथ दूर से ही बोले, ‘करमा, तुम्हारी देह से कच्ची मछली की बास आती है। मछली ले आए हो?’

…करमा क्या जवाब दे अब? जिंदगी में पहली बार किसी बाबू के साथ उसने विश्वासघात किया है। …मछली देख कर बाबू जरुर नाचने लगते!

पंद्रह दिन देखते देखते ही बीत गया।

अभी, रात की गाड़ी से टिसन के सालटन-मास्टर बाबू आए हैं – बाल बच्चों के साथ। पंद्रह दिन से चुप फैमिली-क्वाटर में कुहराम मचा है। भोर की गाड़ी से ही करमा अपने बाबू के साथ हेड-क्वाटर लौट जाएगा।…इसके बाद मनिहारीघाट?

…न …आज रात भी करमा को नींद नहीं आएगी। नहीं, अब वार्निश-चुने की गंध नहीं लगती। …बाबू तो मजे से सो रहे हैं। बाबू, सचमुच में गोपाल बाबू जैसे हैं। न किसी की जगह से तिल-भर मोह, न रत्ती-भर माया। …करमा क्या करे? ऐसा तो कभी नहीं हुआ। …’एक दिन फिर आना। अपना ही घर समझना। …कुटुम है… पेट-माधोराम मर्द!’

…अचानक करमा को एक अजीब-सी गंध लगी। वह उठा। किधर से यह गंध आ रही है? उसने धीरे-से प्लेकटफार्म पार किया। चुपचाप सूँघता हुआ आगे बढ़ता गया। …रेलवे-लाइन पर पैर पड़ते ही सभी सिंगल – होम, डिसटट और पैट- जोर-जोर से बिगुल फूँकने लगे। …फैमिली-क्वाटर से एक औरत चिल्लाने लगी – ‘चो-ओ-ओ-र!’ वह भागा। एक इंजिन उसके पीछे-पीछे दौड़ा आ रहा है। …मगहिया डोम की छौंड़ी? …तंबू में वह छिप गया। …सरसतिया खिलखिला कर हँसती है। उसके झबरे केश, बेनहाई हुई देह की गंध, करमा के प्राण में समा गई। …वह डर कर सरसतिया की गोद में …नहीं, उसकी बूढ़ी माँ की गोद में अपना मुँह छिपाता है। …रेल और जहाज के भोंपे एक साथ बजते हैं। सिंगल की लाल-लाल रोशनी…।

‘करमा, उठ! करमा, सामान बाहर निकालो!’

…करमा एक गंध के समुद्र में डूबा हुआ है। उसने उठ कर कुरता पहना। बाबू का बक्सा बाहर निकाला। पानी-पाँड़े ने ‘कहा-सुना माफ करना’ कहा। करमा डूब रहा!

…गाड़ी आई। बाबू गाड़ी में बैठे। करमा ने बक्सा चढ़ा दिया। …वह ‘सरवेंट-दर्जा’ में बैठेगा। बाबू ने पूछा, ‘सबकुछ चढ़ा दिया तो? कुछ छूट तो नहीं गया?’…नहीं, कुछ छूटा नहीं है। …गाड़ी ने सीटी दी। करमा ने देखा, प्लेाटफार्म पर बैठा हुआ कुत्ता उसकी ओर देख कर कूँ-कूँ कर रहा है। …बेचैन हो गया कुत्ता!

‘बाबू?’

‘क्या है?’

‘मैं नहीं जाऊँगा।’ करमा चलती गाड़ी से उतर गया। धरती पर पैर रखते ही ठोकर लगी। लेकिन सँभल गया।

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स्वातंत्र्योत्तर कहानियाँ

संवदिया

अनुमानित समय : 10 मिनट-

हरगोबिन को अचरज हुआ – तो, आज भी किसी को संवदिया की जरूरत पड़ सकती है! इस जमाने में, जबकि गांव गांव में डाकघर खुल गए हैं, संवदिया के मार्फत संवाद क्यों भेजेगा कोई? आज तो आदमी घर बैठे ही लंका तक खबर भेज सकता है और वहां का कुशल संवाद मंगा सकता है। फिर उसकी बुलाहट क्यों हुई है?

हरगोबिन बड़ी हवेली की टूटी ड्योढ़ी पार कर अंदर गया। सदा की भांति उसने वातावरण को सूंघकर संवाद का अंदाज लगया। …निश्चय ही कोई गुप्त संवाद ले जाना है। चांद-सूरज को भी नहीं मालूम हो! परेवा-पंछी तक न जाने!

‘‘पांवलागी बड़ी बहुरिया!’’

बड़ी हवेली की बड़ी बहुरिया ने हरगोबिन को पीढ़ी दी और आंख के इशारे से कुछ देर चुपचाप बैठने को कहा… बड़ी हवेली अब नाम-मात्र को ही बड़ी हवेली है! जहां दिन-रात नौकर-नौकरानियों और जन-मजदूरों की भीड़ लगी रहती थी, वहां आज हवेली की बड़ी बहुरिया अपने हाथ से सूप में अनाज लेकर झटक रही है। इन हाथों में सिर्फ मेंहदी लगाकर ही गांव की नाइन परिवार पालती थी। कहां गए वे दिन? हरगोबिन ने एक लंबी सांस ली।

बड़े भैया के मरने के बाद ही जैसे सब खेल खत्म हो गया। तीनों भाइयों ने आपस में लड़ाई-झगड़ा शुरू कर दिया। रैयतों ने ज़मीन पर दावे करके दखल किया। फिर, तीनों भाई गांव छोड़कर शहर जा बसे। रह गयी अकेली बड़ी बहुरिया। कहां जाती बेचारी!

भगवान भले आदमी को ही कष्ट देते हैं। नहीं तो एक घंटे की बीमारी में बड़े भैया क्यों मरते? …. बड़ी बहुरिया की देह से जवेर खींच-खींच कर बंटवारे की लीला हुई, हरगोबिन ने देखी है अपनी आंखों से द्रौपदी-चीरहरण लीला! बनारसी साड़ी को तीन टुकड़े करके बंटवारा किया था, निर्दयी भाइयों ने। बेचारी बड़ी बहुरिया!

गांव की मोदिआइन बूढ़ी न जाने कब से आंगन में बैठकर बड़बड़ा रही थी – ‘‘उधार का सौदा खाने में बड़ा मीठा लगता है और दाम देते समय मोदिआइन की बात कड़वी लगती है। मैं आज दाम लेकर ही उठूंगी।’’
बड़ी बहुरिया ने कोई जवाब नहीं दिया।

हरगोबिन ने फिर लम्बी सांस ली। जब तक यह मोदिआइन आंगन से नहीं टलती, बड़ी बहुरिया हरगोबिन से कुछ नहीं बोलेगी। वह अब चुप नहीं रह सका, ‘‘मोदिआइन काकी, बाकी-बकाया वसूलने का यह काबुली कायदा तो तुमने खूब सीखा है!’’

‘काबुली कायदा’ सुनते ही मोदिआइन तमककर खड़ी हो गई, ‘‘चुप रह, मुंहझौंसे! निमोंछिये…!

‘‘क्या करूं काकी, भगवान ने मूंछ-दाढ़ी दी नहीं, न काबुली आगा साहब की तरह गुलज़ार दाढ़ी…!

‘‘फिर काबुल का नाम लिया तो जीभ पकड़कर खींच लूंगी।’’

हरगोबिन ने जीभ बाहर निकालकर दिखलाई। अर्थात् – ‘‘खींच ले।’’

…पांच साल पहले गुल मुहम्मद आगा उधार कपड़ा लगाने के लिए गांव आता था और मोदिआइन के ओसारे पर दुकान लगाकर बैठता था। आगा कपड़ा देते समय बहुत मीठा बोलता और वसूली के समय जोर-जुल्म से एक का दो वसूलता। एक बार कई उधार लेनेवालों ने मिलकर काबुली की ऐसी मरम्मत कर दी कि फिर लौटकर गांव में नहीं आया। लेकिन इसके बाद ही दुखनी मोदिआइन लाल मोदिआइन हो गयी। …काबुली क्या, काबुली बादाम के नाम से भी चिढ़ने लगी मोदिआइन! गांव के नाचवालों ने नाम में काबुली का स्वांग किया था: ‘‘तुम अमारा मुलुम जाएगा मोदिआइन? अम काबुली बादाम-पिस्ता-अकरोट किलायगा…!’’

मेदिआइन बड़बड़ाती, गाली देती हुई चली गई तो बड़ी बहुरिया ने हरगोबिन से कहा, ’’हरगोबिन भाई, तुमको एक संवाद ले जाना है। आज ही। बोलो, जाओगे न ?

‘‘कहां?’’

‘‘मेरी मां के पास!’’

हरगोबिन बड़ी बहुरिया की छलछलाई हुई आंखों में डूब गया, ’’कहिए, क्या संवाद?’’

संवाद सुनाते समय बड़ी बहुरिया सिसकियां लेने लगी। हरगोबिन की आंखें भी भर आईं। …बड़ी हवेली की लछमी को पहली बार इस तरह सिसकते देखा है हरगोबिन ने। वह बोला, ‘‘बड़ी बहुरिया, दिल को कड़ा कीजिए।’’

‘‘और कितना कड़ा करूं दिल?’’ …मां से कहना मैं भाई-भाभियों की नौकरी करके पेट पालूंगी। बच्चों के जूठन खाकर एक कोने में पड़ी रहूंगी, लेकिन यहां अब नहीं… अब नहीं रह सकूंगी। …कहना, यदि मां मुझे यहां से नहीं ले जाएगी तो मैं किसी दिन गले में घड़ा बांधकर पोखरे में डूब मरूंगी। …बथुआ साग खाकर कब तक जीऊं ? किसलिए…. किसके लिए?’’

हरगोबिन का रोम-रोम कलपने लगा। देवर-देवरानियां भी कितने बेदर्द हैं। ठीक अगहनी धान के समय बाल-बच्चों को लेकर शहर से आएंगे। दस-पंद्रह दिनों में कर्ज-उधार की ढेरी लगाकर, वापस जाते समय दो-दो मन के हिसाब से चावल-चूड़ा ले जाएंगे। फिर आम के मौसम में आकर हाजिर। कच्चा-पक्का आम तोड़कर बोरियों में बंद करके चले जाएंगे। फिर उलटकर कभी नहीं देखते… राक्षस हैं सब!

बड़ी बहुरिया आंच के खूंट से पांच रूपए का एक गन्दा नोट निकालकर बोली, ‘‘पूरा राह खर्च भी नहीं जुटा सकी। आने का खर्चा मां से मांग लेना। उम्मीद है, भैया तुहारे साथ ही आवेंगे।’’

हरगोबिन बोला, ‘‘बड़ी बहुरिया, राह खर्च देने की जरूरत नहीं। मैं इन्तजाम कर लूंगा।’’

‘‘तुम कहां से इन्तजाम करोगे?’’

‘‘मैं आज दस बजे की गाड़ी से ही जा रहा हूं।’’

बड़ी बहुरिया हाथ में नोट लेकर चुपचाप, भावशून्य दृष्टि से हरगोबिन को देखती रही। हरगोबिन हवेली से बाहर आ गया। उसने सुना, बड़ी बहुरिया कह रही थी, ‘‘मैं तुम्हारी राह देख रही हूं।’’
संवदिया! अर्थात् संवादवाहक!
हरगोबिन संवदिया! …संवाद पहुंचाने का काम सभी नहीं कर सकते। आदमी भगवान के घर से ही संवदिया बनकर आता है। संवाद के प्रत्येक शब्द को याद रखना, जिस सुर और स्वर में संवाद सुनाया गया है, ठीक उसी ढंग से जाकर सुनाना, सहज काम नहीं। गांव के लोगों की गलत धारणा है कि निठल्ला, कामचार और पेटू आदमी ही संवदिया का काम करता है। न आगे नाथ, न पीछे पगहा। बिना मजदूरी लिए ही जो गांव-गांव संवाद पहुंचावे, उसको और क्या कहेंगे? …औरतों का गुलाम। ज़रा-सी मीठी बोली सुनकर ही नशे में आ जाए, ऐसे मर्द को भी भला मर्द कहेंगे? किन्तु, गांव में कौन ऐसा है, जिसके घर की मां-बहू-बेटी का संवाद हरगोबिन ने नहीं पहुंचाया है। ….लेकिन ऐसा संवाद पहली बार ले जा रहा है वह।
गाड़ी पर सवार होते ही हरगोबिन को पुराने दिनों और संवादों की याद आने लगी। एक करूण गीत की भूली हुई कड़ी फिर उसके कानों के पास गूंजने लगीः

‘‘पैयां पड़ूं दाढ़ी धरूं….
हमरी संवाद लेले जाहु रे संवदिया या-या!…’’

बड़ी बहुरिया के संवाद का प्रत्येक शब्द उसके मन में कांटे की तरह चुभ रहा है – किसके भरोसे यहां रहूंगी? एक नौकर था, वह भी कल भाग गया। गाय खूंटे से बंधी भूखी-प्यासी हिकर रही है। मैं किसके लिए इतना दुःख झेलूं?
हरगोबिन ने अपने पास बैठे हुए एक यात्री से पूछा, ‘‘क्यों भाई साहेब, थाना बिहपुर में सभी गाड़ियां रूकती हैं या नहीं?’’
यात्री ने मानो कुढ़कर कहा, ’’थाना बिहपुर में सभी गाड़ियां रूकती हैं।’’
हरगोबिन ने भांप लिया यह आदमी चिड़चिड़े स्वभाव का है। इससे कोई बातचीत नहीं जमेगी। वह फिर बड़ी बहुरिया के संवाद को मन ही मन दुहराने लगा। …लेकिन, संवाद सुनाते समय वह अपने कलेजे को कैसे संभाल सकेगा! बड़ी बहुरिया संवाद कहते समय जहां-जहां रोई है, वहां भी रोएगा!
कटिहार जंक्शन पहुंचकर उसने देखा, पन्द्रह-बीस साल में बहुत कुछ बदल गया है। अब स्टेशन पर उतरकर किसी से कुछ पूछने की कोई जरूरत नहीं। गाड़ी पहुंची और तुरन्त भोंपे से आवाज़ अपने-आप निकलने लगी – थाना बिहपुर, खगड़िया और बरौनी जानेवाली यात्री तीन नम्बर प्लेटफार्म पर चले जाएं। गाड़ी लगी हुई है।
हरगोबिन प्रसन्न हुआ-कटिहार पहुंचने के बाद ही मालूम होता है कि सचमुच सुराज हुआ है। इसके पहले कटिहार पहुंचकर किस गाड़ी में चढ़ें और किधर जाएं, इस पूछताछ में ही कितनी बार उसकी गाड़ी छूट गई है।
गाड़ी बदलने के बाद फिर बड़ी बहुरिया का करूण मुखड़ा उसकी आंखों के सामने उभर गयाः ‘हरगोबिन भाई, मां से कहना, भगवान ने आंखें फेर ली, लेकिन मेरी मां तो है… किसलिए… किसके लिए… मैं बथुआ की साग खाकर कब तक जीऊं ?’
थाना बिहपुर स्टेशन पर जब गाड़ी पहुंची तो हरगोबिन का जी भारी हो गया। इसके पहले भी कई भला-बुरा संवाद लेकर वह इस गांव में आया है, कभी ऐसा नहीं हुआ। उसके पैर गांव की ओर बढ़ ही नहीं रहे थे। इसी पगडंडी से बड़ी बहुरिया अपने मैके लौट आवेगी। गांव छोड़ चली आवेगी। फिर कभी नहीं जाएगी!
हरगोबिन का मन कलपने लगा – तब गांव में क्या रह जाएगा? गांव की लक्ष्मी ही गांव छोड़कर चली आवेगी! …किस मुंह से वह ऐसा संवाद सुनाएगा? कैसे कहेगा कि बड़ी बहुरिया बथुआ साग खाकर गुजर कर रही है। …सुननेवाले हरगोबिन के गांव का नाम लेकर थूकेंगे, कैसा गांव है, जहां लक्ष्मी जैसी बहुरिया दुःख भोग रही है।
अनिच्छापूर्वक हरगोबिन ने गांव में प्रवेश किया।
हरगोबिन को देखते ही गांव के लोगों ने पहचान लिया – जलालगढ़ गांव का संवदिया आया है!… न जाने क्या संवाद लेकर आया है!
‘‘राम-राम भाई! कहो, कुशल समाचार ठीक है न?’’
‘‘राम-राम भैया जी। भगवान की दया से सब आनन्दी है।’’
‘‘उधर पानी-बूंदी पड़ा है?’’
बड़ी बहुरिया के बड़े भाई ने पहले हरगोबिन को नहीं पहचाना। हरगोबिन ने अपना परिचय दिया, तो उन्होंने सबसे पहले अपनी बहिन का समाचार पूछा, ’’दीदी कैसी हैं?’’
‘‘भगवान की दया से सब राजी-खुशी है।’’
मुंह-हाथ धोने के बाद हरगोबिन की बुलाहट आंगन में हुई। अब हरगोबिन कांपने लगा। उसका कलेजा धड़कने लगा – ऐसा तो कभी नहीं हुआ?
…बड़ी बहुरिया की छलछलाई हुई आंखें! …सिसकियों से भरा हुआ संवाद! उसने बड़ी बहुरिया की बूढ़ी माता को पांवलागी की।
बूढ़ी माता ने पूछा, कहो बेटा, क्या समाचार है?’’
‘‘मायजी, आपके आर्शीवाद से सब ठीक है।’’
‘‘कोई संवाद?’’
‘‘एं ? …संवाद ? …जी, संवाद तो कोई नहीं। मैं कल सिरसिया गांव आया था, तो सोचा कि एक बार चलकर आप लोगों का दर्शन कर लूं।’’

बूढ़ी माता हरगोबिन की बात सुनकर कुछ उदास-सी हो गई, तो तुम कोई संवाद लेकर नहीं आए हो?’’

‘‘जी नहीं, कोई संवाद नहीं। …ऐसे बड़ी बहुरिया ने कहा है कि यदि छुट्टी हुई तो दशहरा के समय गंगाजी के मेले में आकर मां से भेंट-मुलाकात कर जाऊंगी।’’ बूढ़ी माता चुप रही। हरगोबिन बोला, ‘‘छुट्टी कैसे मिले! सारी गृहस्थी बड़ी बहुरिया के ऊपर ही है।’’

बूढ़ी माता बोली, “मैं तो बबुआ से कह रही थी कि जाकर दीदी को लिवा लाओ, यहीं रहेगी। वहां अब क्या रह गया है? ज़मीन-जायदाद तो सब चली ही गई। तीनों देवर अब शहर में जाकर बस गए हैं। कोई खोज-खबर भी नहीं लेते। मेरी बेटी अकेली….!’’

‘‘नहीं, मायजी। जमीन-जायदाद अभी भी कुछ कम नहीं। जो है, वही बहुत है। टूट भी गई है, तो आखिर बड़ी हवेली ही है। ‘सवांग’ नहीं है, यह बात ठीक है। मगर, बड़ी बहुरिया का तो सारा गांव ही परिवार है। हमारे गांव की लछमी है बड़ी बहुरिया। …गांव की लछमी गांव को छोड़कर शहर कैसे जाएगी? यों, देवर लोग हर बार आकर ले जाने की जिद्द करते हैं।’’

बूढ़ी माता ने अपने अपने हाथ हरगोबिन को जलपान लाकर दिया, ‘‘पहले थोड़ा जलपान कर लो, बबुआ।’’
जलपान करते समय हरगोबिन को लगा, बड़ी बहुरिया दालान पर बैठी उसकी राह देख रही है- भूखी, प्यासी…! रात में भोजन करते समय भी बड़ी बहुरिया मानों सामने आकर बैठ गई…कर्ज-उधार अब कोई देते नहीं। ….एक पेट तो कुत्ता भी पालता है। लेकिन, मैं ?….मां से कहना…!!

हरगोबिन ने थाली की ओर देखा – भात-दाल, तीन किस्म की भाजी, घी, पापड़ अचार।… बड़ी बहुरिया बथुआ साग उबालकर खा रही होगी।

बूढ़ी माता ने कहा, ‘‘क्यों बबुआ, खाते क्यों नहीं?’’

‘‘मायजी, पेट भर जलपान जो कर लिया है।’’

‘‘अरे, जवान आदमी तो पांच बार जलपान करके भी एक थाल भात खाता है।’’

हरगोबिन ने कुछ नहीं खाया। खाया नहीं गया।

संवदिया डटकर खाता है और ‘अफर’ कर सोता है, किन्तु हरगोबिन को नींद नहीं आ रही है। …यह उसने क्या किया? क्या कर दिया? वह किसलिए आया था? वह झूठ क्यों बोला? …नहीं, नहीं, सुबह उठते ही वह बूढ़ी माता को बड़ी बहुरिया का सही संवाद सुना देगा- अक्षर-अक्षर: ‘मायजी, आपकी एकलौती बेटी बहुत कष्ट में है। आज ही किसी को भेजकर बुलवा लीजिए। नहीं तो वह सचमुच कुछ कर बैठेगी। आखिर, किसके लिए वह इतना सहेगी!… बड़ी बहुरिया ने कहा है, भाभी के बच्चों के जूठन खाकर वह एक कोने में पड़ी रहेगी…!’

रात-भर हरगोबिन को नींद नहीं आई।

आंखों के सामने बड़ी बहुरिया बैठी रही-सिसकती, आंसू पोंछती हुई। सुबह उठकर उसने दिल को कड़ा किया। वह संवदिया है। उसका काम है सही-सही संवाद पहुंचाना। वह बड़ी बहुरिया का संवाद सुनाने के लिए बूढ़ी माता के पास जा बैठा। बूढ़ी माता ने पूछा, ‘‘क्या है बबुआ, कुछ कहोगे?’’

‘‘मायजी, मुझे इसी गाड़ी से वापस जाना होगा। कई दिन हो गए।’’

‘‘अरे इतनी जल्दी क्या है! एकाध दिन रहकर मेहमानी कर लो।’’

‘‘नहीं, मायजी, इस बार आज्ञा दीजिए। दशहरा में मैं भी बड़ी बहुरिया के साथ आऊंगा। तब डटकर पंद्रह दिनों तक मेहमानी करूंगा।’’

बूढ़ी माता बोली, ‘‘ऐसा जल्दी थी तो आए ही क्यों! सोचा था, बिटिया के लिए दही-चूड़ा भेजूंगी। सो दही तो नहीं हो सकेगा आज। थोड़ा चूड़ा है बासमती धान का, लेते जाओ।’’

चूड़ा की पोटली बगल में लेकर हरगोबिन आंगन से निकला तो बड़ी बहुरिया के बड़े भाई ने पूछा, ‘‘क्यों भाई, राह खर्च है तो?’’

हरगोबिन बोला, “भैयाजी, आपकी दुआ से किसी बात की कमी नहीं।’’

स्टेशन पर पहुंचकर हरगोबिन ने हिसाब किया। उसके पास जितने पैसे हैं, उससे कटिहार तक का टिकट ही वह खरीद सकेगा। और यदि चौअन्नी नकली साबित हुई तो सैमापुर तक ही। …बिना टिकट के वह एक स्टेशन भी नहीं जा सकेगा। डर के मारे उसकी देह का आधा खून गया।

गाड़ी में बैठते ही उसकी हालत अजीब हो गई। वह कहां आया था? क्या करके जा रहा है? बड़ी बहुरिया को ज्या जवाब देगा?

यदि गाड़ी में निरगुन गाने वाला सूरदास नहीं आता, तो न जाने उसकी क्या हालत होती! सूरदास के गीतों को सुनकर उसका जी स्थिर हुआ, थोड़ा –

…कि आहो रामा!
नैहरा को सुख सपन भयो अब,
देश पिया को डोलिया चली…ई…ई….ई,
माई रोओ मति, यही करम गति…!!

सूरदास चला गया तो उसके मन में बैठी हुई बड़ी बहुरिया फिर रोने लगी – ‘किसके लिए इतना दुःख सहूं ?’
पांच बजे भोर में वह कटिहार स्टेशन पहुंचा। भोंपे से आवाज़ आ रही थी- बैरगाछी, कुसियार और जलालगढ़ जाने वाली यात्री एक नम्बर प्लेटफार्म पर चले जाएं।

हरगोबिन को जलालगढ़ स्टेशन जाना है, किन्तु वह एक नम्बर प्लेटफार्म पर कैसे जाएगा? उसके पास तो कटिहार तक का ही टिकट है। …जलालगढ़! बीस कोस! बड़ी बहुरिया राह देख रही होगी। … बीस कोस की मंजिल भी कोई दूर की मंजिल है? वह पैदल ही जाएगा।

हरगोबिन महावीर-विक्रम-बजरंगी का नाम लेकर पैदल ही चल पड़ा। दस कोस तक वह मानो ‘बाई’ के झोंके पर रहा। कसबा शहर पहुंचकर उसने पेट भर पानी पी लिया। पोटली में नाक लगाकर उसने सूंघा: अहा! बासमती धान का चूड़ा है। मां की सौगात-बेटी के लिए। नहीं, वह इससे एक मुठ्ठी भी नहीं खा सकेगा। ….किन्तु वह क्या जवाब देगा बड़ी बहुरिया को!

उसके पैर लड़खड़ाए। …उंहूं, अभी वह कुछ नहीं सोचेगा। अभी सिर्फ चलना है। जल्दी पहुंचना है, गांव। …बड़ी बहुरिया की डबडबाई हुई आंखें उसको गांव की ओर खींच रही थीं – ‘मैं बैठी राह ताकती रहूंगी!…’
पन्द्रह कोस! …मां से कहना, अब नहीं रह सकूंगी।

सोलह…सत्रह…अठ्ठारह…जलालगढ़ स्टेशन का सिग्नल दिखाई पड़ता है… गांव का ताड़ सिर ऊंचा करके उसकी चाल को देख रहा है। उसी ताड़ के नीचे बड़ी हवेली के दालान पर चुपचाप टकटकी लगाकर राह देख रही है बड़ी बहुरिया- भूखी-प्यासी: ‘हमरो संवाद लेले जाहु रे संवदिया…या…या…या!!’

लेकिन, यह कहां चला आया हरगोबिन? यह कौन गांव है? पहली सांझ में ही अमावस्या का अंधकार! किस राह से वह किधर जा रहा है? …नदी है? कहां से आ गई नदी? नदी नहीं, खेत है। ….ये झोंपड़े हैं या हाथियों का झुण्ड? ताड़ का पेड़ किधर गया? वह राह भूलकर न जाने कहां भटक गया… इस गांव में आदमी नहीं रहते क्या? …कहीं कोई रोसनी नहीं, किससे पूछे? …वहां, वह रोशनी है या आंखें? वह खड़ा है या चल रहा है? वह गाड़ी में है या धरती पर….?

‘‘हरगोबिन भाई, आ गए?’’ बड़ी बहुरिया की बोली या कटिहार स्टेशन का भोंपा बोल रहा है?
‘‘हरगोबिन भाई, क्या हुआ तुमको…’’

‘‘बड़ी बहुरिया?’’

हरगोबिन ने हाथ से टटोलकर देखा, वह बिछावन पर लेटा हुआ है। सामने बैठी छाया को छूकर बोला, ‘‘बड़ी बहुरिया?’’

‘‘हरगोबिन भाई, अब जी कैसा है? …लो, एक घूंट दूध और पी लो। …मुंह खोलो…हां…पी जाओ। पीयो!!’’
हरगोबिन होश में आया। …बड़ी बहुरिया दूध पिला रही है?

उसने धीरे से हाथ बढ़ाकर बड़ी बहुरिया का पैर पकड़ लिया, ”बड़ी बहुरिया। …मुझे माफ करो। मैं तुम्हारा संवाद नहीं कह सका। …तुम गांव छोड़कर मत जाओ। तुमको कोई कष्ट नहीं होने दूंगा। मैं तुम्हारा बेटा! बड़ी बहुरिया, तुम मेरी मां, सारे गांव की मां हो! मैं अब निठल्ला बैठा नहीं रहूंगा। तुम्हारा सब काम करूंगा। …बोलो, बड़ी मां …तुम गांव छोड़कर चली तो नहीं जाओगी? बोलो….!!’’

बड़ी बहुरिया गर्म दूध में एक मुठ्ठी बासमती चूड़ा डालकर मसकने लगी। …संवाद भेजने के बाद से ही वह अपनी गलती पर पछता रही थी!