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ताई – विश्‍वंभरनाथ शर्मा कौशिक 

''ताऊजी, हमें लेलगाड़ी (रेलगाड़ी) ला दोगे?" कहता हुआ एक पंचवर्षीय बालक बाबू रामजीदास की ओर दौड़ा। बाबू साहब ने दोंनो बाँहें फैलाकर कहा- ''हाँ बेटा,ला देंगे।'' उनके इतना कहते-कहते बालक उनके निकट आ गया। उन्‍होंने बालक को गोद में उठा लिया और उसका मुख चूमकर बोले- ''क्‍या करेगा रेलगाड़ी?'' बालक बोला- ''उसमें बैठकर बली दूल जाएँगे। हम बी जाएँगे,चुन्‍नी को बी ले जाएँगे। बाबूजी को नहीं ले जाएँगे। हमें लेलगाड़ी नहीं ला देते। ताऊजी तुम ला दोगे, तो तुम्‍हें ले जाएँगे।'' बाबू- "और किसे ले जाएगा?'' बालक दम भर सोचकर बोला- ''बछ औल किछी को नहीं ले जाएँगे।'' पास ही बाबू रामजीदास की अर्द्धांगिनी बैठी थीं। बाबू साहब ने उनकी ओर इशारा करके कहा- ''और अपनी ताई को नहीं ले जाएगा?'' बालक कुछ देर तक अपनी ताई की और देखता रहा। ताईजी उस समय कुछ चि‍ढ़ी हुई सी बैठी थीं। बालक को उनके मुख का वह भाव अच्‍छा न लगा। अतएव वह बोला- ''ताई को नहीं

धर्म संकट -अमृतलाल नागर 

रायबहादुर - धर्म संकट -अमृतलाल नागर

शाम का समय था, हम लोग प्रदेश, देश और विश्‍व की राजनीति पर लंबी चर्चा करने के बाद उस विषय से ऊब चुके थे. चाय बड़े मौके से आई, लेकिन उस ताजगी का सुख हम ठीक तरह से उठा भी न पाए थे कि नौकर ने आकर एक सादा बंद लिफाफा मेरे हाथ में रख दिया. मैंने खोलकर देखा, सामनेवाले पड़ोसी रायबहादुर गिर्राज किशन (गिरिराज कृष्‍ण) का पत्र था, काँपते हाथों अनमिल अक्षरों और टेढ़ी पंक्तियों में लिखा था : माई डियर प्रताप, "मैंने फुल्‍ली को आदेश दे रक्‍खा है कि मेरी मृत्‍यु के बाद यह पत्र तुम्‍हें फौरन पहुँचाया जाए. तुम मेरे अभिन्‍न मित्र के पुत्र हो. रमेश से अधिक सदा आज्ञाकारी रहे हो. मेरी निम्‍नलिखित तीन अंतिम इच्‍छाओं को पूरा करना - " 1. रमेश को तुरंत सूचना देना. मेरी आत्‍मा को तभी शांति मिलेगी, जब उसके हाथों मेरे अंतिम संस्‍कार होंगे. मैंने उसके साथ अन्याय किया है. 2. फुल्‍ली को मैंने

थोड़ी दूर और – वृंदावनलाल वर्मा

महमूद गजनवी

जब महमूद गजनवी (सन 1025-26 में) सोमनाथ का मंदिर नष्ट-भ्रष्ट करके लौटा तब उसे कच्छ से होकर जाना पड़ा.गुजरात का राजा भीमदेव उसका पीछा किए चल रहा था.ज्यों-ज्यों करके महमूद गजनवी कच्छ के पार हुआ.वह सिंध होकर मुल्तान से गजनी जाना चाहता था.लूट के सामान के साथ फौज की यात्रा भारी पड़ रही थी.भीमदेव व अन्य राजपूत उस पर टूट पड़ने के लिए इधर-उधर से सिमट रहे थे.महमूद इनसे बच निकलने के लिए कूच पर कूच करता चला गया.अंत में लगभग छह सहस्र राजपूतों से उसकी मुठभेड़ हो ही गई. महमूद की सेना राजपूतों की उस टुकड़ी से संख्या में कई गुनी बड़ी थी.विजय का उल्लास महमूद की सेना में, मार्ग की बाधाओं के होते हुए भी, लहरें मार रहा था.उधर राजपूत जय की आशा से नहीं, मारने और मरने की निष्ठा से जा भिड़े थे. उन छह सहस्र राजपूतों में से कदाचित ही कोई बचा हो.परंतु अपने कम-से-कम दुगुने शत्रुओं को

कारमन – कुर्रतुल-एन-हैदर की उर्दू कहानी

कारमन- कुर्रतुल-एन-हैदर

रात के ग्यारह बजे टैक्सी शहर की खामोश सड़कों पर से गुजरती हुई एक पुराने किस्म के फाटक के सामने जाकर रुकी. ड्राईवर ने दरवाजा खोल कर बड़ी बेरुखी के साथ मेरा सूटकेस उतार कर फुटपाथ पर रखा और पैसों के लिए हाथ फैलाए तो मुझे जरा अजीब सा लगा.        “यही जगह है?” मैंने जरा संदेह से पूछा .        “जी हाँ” उसने सहजता से उत्तर दिया. मैं नीचे उतरी. टैक्सी गली के अँधेरे में विलीन हो गई और मैं सुनसान फुटपाथ पर खडी रह गई. मैंने फाटक खोलने की कोशिश की, मगर वह अंदर से बंद था. तब मैंने बड़े दरवाजे में जो खिड़की थी, उसे खटखटाया. कुछ देर बाद खिड़की खुली. मैंने चोरों की तरह अंदर झाँका. अंदर नीम-अँधेरा आँगन था, जिसके एक कोने में दो लड़कियाँ रात के कपडे पहने धीरे-धीरे बातें कर रही थीं. आँगन के सिरे पर एक छोटी सी टूटी-फूटी इमारत खड़ी थी. मुझे क्षण-भर

हिरनी – चंद्रकिरण सौनरेक्सा

हिरनी-खुदैजा- चन्द्रकिरण सौनरेक्सा

काली इटैलियन का बारीक लाल गोटेवाला चूड़ीदार पायजामा और हरे फूलोंवाला गुलाबी लंबा कुर्ता वह पहने हुई थी। गोटलगी कुसुंभी (लाल) रंग की ओढ़नी के दोनों छोर बड़ी लापरवाही से कंधे के पीछे पड़े थे, जिससे कुर्ते के ढीलेपन में उसकी चौड़ी छाती और उभरे हुए उरोजों की पुष्ट गोलाई झलक रही थी। अपनी लंबी मजबूत मांसल कलाई से मूसली उठाए वह दबादब हल्दी कूट रही थी। कलाई में फँसी मोटी हरी चूड़ियाँ और चाँदी के कड़े और पछेलियाँ बार-बार झनक रही थीं। उन्हीं की ताल पर वह गा रही थी - 'हुलर-हुलर दूध गेरे मेरी गाय... आज मेरा मुन्नीलाल जीवेगा कि नाय।' बड़ा लोच था उसके स्वर में। इस गवाँरू गीत की वह पंक्ति उस तीखी दुपहरी में भी कानों में मिश्री की बूँदों के समान पड़ रही थी। कुछ देर मैं छज्जे की आड़ में खड़ी सुनती रही। न उसने कूटना बंद किया और न वह गीत की पंक्ति 'हुलर-हुलर...।'

शाह की कंजरी – अमृता प्रीतम

वो कहानी मैंने अपनी आंखों के सामने घटित होते देखी थी, सन १९४५ में जब लाहौर में एक शादी वाले घर से निमंत्रण आया था, और मैं उस दिन वहां शामिल थी, जब घर में शादी ब्याह के गीतों वाला दिन बैठाया जाता है. उस दिन घर की मालकिन भी उस समागम में थी, और लाहौर की वो मशहूर नाजनीना भी, जिसे मल्लिकाये तरन्नुम कहा जाता था. और सब जानते थे कि वह घर के मालिक की रखैल थी. उस नाज़नीना के पास सब कुछ था, हुस्न भी, नाज़ नखरा भी, बेहद खूबसूरत आवाज भी, लेकिन समाज का दिया हुआ वहा आदरणीय स्थान नहीं था, जो एक पत्नी के पास होता है. और जो पत्नी थी उसके पास ना जवानी थी, न कोई हुनर, लेकिन उसके पास पत्नी होने का आदरणिय स्थान था. पत्नी होने का भी और मां होने का भी. दोनों औरतों के पास अपनी अपनी जगह थी, और

जंगली बूटी – अमृता प्रीतम

जंगली बूटी अमृता प्रीतम

अंगूरी, मेरे पड़ोसियों के पड़ोसियों के पड़ोसियों के घर, उनके बड़े ही पुराने नौकर की बिलकुल नयी बीवी है। एक तो नयी इस बात से कि वह अपने पति की दूसरी बीवी है, सो उसका पति ‘दुहाजू’ हुआ। जू का मतलब अगर ‘जून’ हो तो इसका मतलब निकला ‘दूसरी जून में पड़ा चुका आदमी’, यानी दूसरे विवाह की जून में, और अंगूरी क्योंकि अभी विवाह की पहली जून में ही है, यानी पहली विवाह की जून में, इसलिए नयी हुई। और दूसरे वह इस बात से भी नयी है कि उसका गौना आए अभी जितने महीने हुए हैं, वे सारे महीने मिलकर भी एक साल नहीं बनेंगे। पाँच-छह साल हुए, प्रभाती जब अपने मालिकों से छुट्टी लेकर अपनी पहली पत्नी की ‘किरिया’ करने के लिए गाँव गया था, तो कहते हैं कि किरियावाले दिन इस अंगूरी के बाप ने उसका अंगोछा निचोड़ दिया था। किसी भी मर्द का यह अँगोछा भले

नीचे के कपड़े – अमृता प्रीतम

नीचे के कपड़े -अमृता प्रीतम

अमृता प्रीतम के जन्मदिन पर... अचानक मेरे सामने कई लोग आकर खडे हो गए हैं, जिन्होंने कमर से नीचे कोई कपड़ा नहीं पहना हुआ है. पता नहीं मैंने कहाँ पढा था कि खानाबदोश औरतें अपनी कमर से अपनी घघरी कभी नहीं उतारती हैं. मैली घघरी बदलनी होतो सिर की ओर से नई घघरी पहनकर, अंदर से मैली घघरी उतार देती हैं और जब किसी खानाबदोश औरत की मृत्यु हो जाती है तो उसके शरीर को स्नान कराते समय भी उसकी नीचे की घघरी सलामत रखी जाती है. कहते हैं, उन्होंने अपनी कमर पर पडी नेफे की लकीर में अपनी मुहब्बत का राज खुदा की मखलूक से छिपाकर रखा होता है. वहाँ वे अपनी पसंद के मर्द का नाम गुदवाकर रखती हैं, जिसे खुदा की ऑंख के सिवा कोई नहीं देख सकता. और शायद यही रिवाज मर्दों के तहमदों के बारे में भी होता होगा. लेकिन ऐसे नाम गोदने वाला जरूर एक बार औरतों

प्रथम स्मगलर (रामकथा क्षेपक)- हरिशंकर परसाई

लक्ष्मण मेघनाद की शक्ति से घायल पड़े थे। हनुमान उनकी प्राण-रक्षा के लिए हिमाचल प्रदेश से "संजीवनी" नाम की दवा ले कर लौट रहे थे कि अयोध्या के नाके पर पकड़ लिए गए। पकड़ने वाले नाकेदार को पीटकर हनुमान ने लेटा दिया। राजधानी में हल्ला हो गया कि बड़ा "बलशाली" स्मगलर आया हुआ है। पूरा फ़ोर्स भी उसका मुकाबला नहीं कर पा रहा है। आखिर भरत और शत्रुघ्न आए। अपने आराध्य रामचन्द्र के भाइयों को देखकर हनुमान दब गए। शत्रुघ्न ने कहा - इन स्मगलरों के मारे हमारी नाक में दम है, भैया। आप तो सन्यास ले कर बैठ गए। मुझे भुगतना पड़ता है। भरत ने हनुमान से कहा - कहाँ से आ रहे हो? हनुमान - हिमाचल प्रदेश से। -क्या है तुम्हारे पास? सोने के बिस्किट, गांजा, अफीम? -दवा है। शत्रुघ्न ने कहा - अच्छा, दवाइयों की स्मगलिंग चल रही है। निकालो कहाँ है? हनुमान ने संजीवनी निकालकर रख दी। कहा - मुझे आपके बड़े भाई रामचंद्र ने इस दवा को लेने भेजा है। शत्रुघ्न ने भरत की तरफ देखा। बोले - बड़े भैया यह क्या करने लगे हैं। स्मगलिंग में

बरात की वापसी-हरिशंकर परसाई

बरात-की-वापसी

बरात में जाना कई कारणों से टालता हूँ. मंगल कार्यों  में हम जैसे चढ़ी उम्र के कुँवारों का जाना अपशकुन है. महेश बाबू का कहना है, हमें मंगल कार्यों से विधवाओं की तरह ही दूर रहना चाहिए. किसी का अमंगल अपने कारण क्यों हो ! उन्हें पछतावा है कि तीन साल पहले जिनकी शादी में वह गए थे, उनकी तलाक की स्थिति पैदा हो गयी है. उनका यह शोध है कि महाभारत युद्ध न होता, अगर भीष्म की शादी हो गयी होती. और अगर कृष्ण मेनन की शादी हो गयी होती, तो चीन हमला न करता.           सारे युद्ध प्रौढ़ कुँवारों के अहं की तुष्टि के लिए होते हैं. 1948 में तेलंगाना में किसानो का सशस्त्र विद्रोह देश के वरिष्ठ कुँवारे विनोबा भावे के अहं की तुष्टि के लिए हुआ था. उनका अहं भूदान के रूप में तुष्ट हुआ.      अपने पुत्र की सफल बारात से प्रसन्न मायाराम के मन में उस

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