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पद्मावत-सिंहलद्वीप वर्णन खंड-छठा पृष्ठ-मलिक मुहम्मद जायसी

पुनि चलि देखा राज-दुआरा । मानुष फिरहिं पाइ नहिं बारा ॥
हस्ति सिंघली बाँधे बारा । जनु सजीव सब ठाढ पहारा ॥
कौनौ सेत, पीत रतनारे । कौनौं हरे, धूम औ कारे ॥
बरनहिं बरन गगन जस मेघा । औ तिन्ह गगन पीठी जनु ठेघा ॥
सिंघल के बरनौं सिंघली । एक एक चाहि एक एक बली ॥
गिरि पहार वै पैगहि पेलहिं । बिरिछ उचारि डारि मुख मेलहिं ॥
माते तेइ सब गरजहिं बाँधे । निसि दिन रहहिं महाउत काँधे ॥

धरती भार न अगवै, पाँव धरत उठ हालि ।
कुरुम टुटै, भुइँ फाटै तिन हस्तिन के चालि ॥21

अर्थ: इसके बाद चलकर राजद्वार को देखें. मनुष्य कहीं भी घूम ले, ऐसा द्वार नहीं पा सकता. राजद्वार पर सिंहली हाथी बंधे हुए हैं, जो साक्षात् पहाड़ की तरह लगते हैं. इन हाथियों में कोई सफ़ेद है, कोई पीला तो कोई लाल. कोई हरा है, कोई धुएँ के रंग का तो कोई काला. उनका रंग आकाश के बादलों जैसा है. इनकी ऊँचाई इतनी है,जैसे इन्होंने आकाश को अपनी पीठ पर टिका रखा है. ये सिंहलद्वीप के एक से एक बलवान सिंहली हाथी हैं. ये पहाड़ों को पूरी गति से धकेल देते हैं और पेड़ों को उखाड़कर अपने मुंह में डाल लेते हैं. ये सारे मत्त होकर गरजते हुए राजद्वार पर बंधे हुए हैं, जिनके कन्धों पर रात-दिन महावत बैठे रहते हैं.

धरती भी इन हाथियों के बोझ को सहन नहीं कर पाती और उनके पाँव रखते ही हिलने लगती है. इनके बोझ से भूमि फट गई और महाकच्छप की पीठ टूट गयी.

पुनि बाँधे रजबार तुरंगा । का बरनौं जस उन्हकै रंगा ॥
लील, समंद चाल जग जाने । हाँसुल, भौंर, गियाह बखाने ॥
हरे, कुरंग, महुअ बहु भाँती । गरर, कोकाह, बुलाह सु पाँती ॥
तीख तुखार चाँड औ बाँके । सँचरहिं पौरि ताज बिनु हाँके ॥
मन तें अगमन डोलहिं बागा । लेत उसास गगन सिर लागा ॥
पौन-समान समुद पर धावहिं । बूड न पाँव, पार होइ आवहिं ॥
थिर न रहहिं, रिस लोह चबाहीं । भाँजहिं पूँछ, सीस उपराहीं ॥

अस तुखार सब देखे जनु मन के रथवाह ।
नैन-पलक पहुँचावहिं जहँ पहुँचा कोइ चाह ॥22

अर्थ: हाथियों के अतिरिक्त राजद्वार पर घोड़े भी बंधे हुए हैं. उनके रंग ऐसे हैं कि उनका वर्णन करना मुश्किल है. कोई नीले रंग का है तो कोई बादामी,जिनकी चाल का सबको पता है.ये सारे हंसुल, भौंर और कियाह जैसे उच्च जातियों के घोड़े हैं. ये हरे, लाल और महुए जैसे रंग के हैं. तुषार देश के घोड़े काफी तीव्र, प्रचंड और शक्तिशाली हैं.ये बिना चाबुक हिलाए ही भागने के लिए तत्पर रहते हैं. लगाम हिलाते ही ये मन से तीव्र गति से भागते हैं और सांस की सांस आकाश छूने लगते हैं. ये हवा के समान समुद्र पर दौड़ते हैं और उनके पाँव जल में डूबने की बजाय पार हो जाते हैं. इन्हें स्थिर रहना पसंद नहीं और ऐसा होने पर क्रोध में लगाम में लगे लोहे चबाने लगते हैं और पूँछ हिलाते हुए सिर ऊपर उठा लेते हैं.

तुषार देश के घोड़े मन रुपी रथ को खींचते हैं अर्थात् उनकी गति मन से तीव्र है. ये पलक झपकते ही सवार को उसके इच्छित जगह पर पहुंचा देते हैं.

राजसभा पुनि देख बईठी । इंद्रसभा जनु परि गै डीठी ॥
धनि राजा असि सभा सँवारी । जानहु फूलि रही फुलवारी ॥
मुकुट बाँधि सब बैठे राजा । दर निसान नित जिन्हके बाजा ॥
रूपवंत, मनि दिपै लिलाटा । माथे छात, बैठ सब पाटा ॥
मानहुँ कँवल सरोवर फूले । सभा क रूप देखि मन भूले ॥
पान कपूर मेद कस्तूरी । सुगँध बास भरि रही अपूरी ॥
माँझ ऊँच इंद्रासन साजा । गंध्रबसेन बैठ तहँ राजा ॥

छत्र गगन लगि ताकर, सूर तवै जस आप ।
सभा कँवल अस बिगसै, माथे बड परताप ॥23

अर्थ: राजद्वार के अंदर जाने पर राजसभा बैठी दिखाई देती है, जिसे देख कर ऐसा लगता है, जैसे इन्द्रसभा पर नजर पड़ गई हो. वह राजा धन्य है, जिसकी ऐसी सभा है. ऐसा लग रहा है, जैसे फुलवारी में फूल खिले हुए हैं. सभी अधीनस्थ राजा मुकुट बांधे बैठे हुए हैं. ये ऐसे प्रतापी राजा हैं, जिनके दरवाजे पर हमेशा नगाड़े बजते हैं (लेकिन गन्धर्वसेन के अधीन हैं). ये सारे रूपवान हैं, जिनके मस्तक पर मणियाँ शोभा दे रही हैं. इनके सर पर छत्र हैं और ये सभी सिंहासनों पर बैठे हुए हैं. ऐसा लग रहा है, जैसे सरोवर में कमल खिले हों. इस सभा का रूप देखकर मन सबकुछ भूल जाता है अर्थात् सभा के सौंदर्य में खो जाता है. चारों ओर पान, कपूर और कस्तूरी की अपूर्व सुगंध व्याप्त है. इनके बीच इंद्र के आसन जैसे ऊँचे सिंहासन पर राजा गन्धर्वसेन बैठे हैं.

राजा गंधर्वसेन का छत्र इतना ऊँचा है कि जैसे आकाश को छू रहा है. तेजस्वी इतना है, जैसे तपता हुआ सूर्य हो और इस सूर्य समान राजा को देखकर संपूर्ण सभा कमल की तरह खिल रही है. राजा का मस्तक बहुत ही प्रतापी है.

साजा राजमंदिर कैलासू । सोने कर सब धरति अकासू ॥
सात खंड धौराहर साजा । उहै सँवारि सकै अस राजा ॥
हीरा ईंट, कपूर गिलावा । औ नग लाइ सरग लै लावा ॥
जावत सबै उरेह उरेहे । भाँति भाँति नग लाग उबेहे ॥
भाव कटाव सब अनबत भाँती । चित्र कोरि कै पाँतिहिं पाँती ॥
लाग खंभ-मनि-मानिक जरे । निसि दिन रहहिं दीप जनु बरे ॥
देखि धौरहर कर उँजियारा । छपि गए चाँद सुरुज औ तारा ॥

सुना सात बैकुंठ जस तस साजे खँड सात ।
बेहर बेहर भाव तस खंड खंड उपरात ॥24

राजा गंधर्वसेन का महल स्वर्ग की तरह सुशोभित हो रहा है, जिसके फर्श, छत और दीवारें सोने की बनी हुई हैं. यह श्वेत महल सात खण्डों का है. ऐसे सुंदर महल को गंधर्वसेन जैसा राजा ही संभाल सकता है. इसे बनाने के लिए हीरों के ईंटों को कपूर के गारे में चिना गया है और स्वर्ग से लाये गए रत्नों को जड़ा गया है. नागों के द्वारा भांति-भांति के चित्र दीवारों पर उकेरे गए हैं. महल के स्तंभों में भी मणि-माणिक्य जड़े हुए हैं, जिन्हें देखकर ऐसा लगता है कि दिए जल रहे हैं. इस धवलगृह के प्रकाश को देखकर चाँद, तारे और सूर्य शर्मिंदा होकर छिप गए हैं.

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