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गाड़ी ठसाठस भरी थी. स्टेशन पर तीर्थयात्रियों का उफान सा उमड़ रहा था. एक तो माघ की पुण्यतिथि में अर्द्ध कुंभ का मेला, उस पर प्रयाग का स्टेशन. मैंने रिजर्वेशन स्लिप में अपना नाम ढूँढा और बड़ी तसल्ली से अन्य तीन नामों की सूची देखी. चलिए, तीनों महिलाएँ ही थीं. पुरुष सहयात्रियों के नासिकागर्जन से तो छुट्टी मिली. दो महिलाएँ आ चुकी थीं,एक जैसा कि मैंने नाम से अनुमान लगा लिया था कि महाराष्ट्री थी और दूसरी पंजाबी. तीसरी मैं थी और चौथी अभी आई नहीं थी. मैं एक ही दिन के लिए बाहर जा रही थी, इसी से एक छोटा बटुआ ही साथ में था. आसपास बिखरे दोनों महिलाओं के भारी भरकम सूटकेस, स्टील के बक्स और मेरू पर्वत से ऊँचे ठंसे कसे होल्डाल देखकर मैंने अपने को बहुत हल्का-फुल्का अनुभव किया. वैसे भी मैं सोचती हूँ, बक्स होल्डालहीन यात्रा में जो सुख है, वह अन्य किसी में नहीं. चटपट चढ़े और खटखट उतर गये. न कुलियों के हथेली पर धरे द्रव्य को अवज्ञापूर्ण दृष्टि से देखकर ‘ये क्या दे रही हैं, साहब’ कहने का भय, न सहयात्रियों के उपालंभ की चिंता. मेरे साथ की महाराष्ट्री महिला ने अपने वृहदाकार स्टील के बक्स एक के ऊपर एक चुनकर पिरामिड से सजा दिए थे. लगता था, वह प्रत्येक वस्तु के लिए स्थान और प्रत्येक स्थान के लिए वस्तु की उपादेयता में विश्वास रखती थी. वह स्वयं बड़ी शालीनता से लेटकर एक सीध में दो तकिये लगाये एक मराठी पत्रिका पढ़ने में तल्लीन थी. दूसरी पंजाबी महिला के पास एक सूटकेस, टोकरी और बिस्तरा ही था, पर तीनों बेतरतीबी से बिखरे पड़े थे. उनका एक सुराहीदान, जिसकी एक टाँग, अधिकांश सुराहीदानों की भाँति कुछ छोटी थी, बार-बार लुढ़ककर उनको परेशान किये जा रहा था. वे बेचारी चश्मा उतारकर रखतीं, हाथ की जासूसी अंग्रेजी पुस्तक, जिसे पढ़ने में उन्हें पर्याप्त रस आ रहा था, औंधी कर बर्थ पर टिकातीं, झुँझलाकर सुराहीदान ठिकाने से लगाकर जैसे ही हाथ की पुस्तक के रस की डुबकी लगातीं कि सुराहीदान फिर लुढ़क जाता. मुझे उनकी उलझन देखकर बड़ी हँसी आ रही थी, वैसे मैं उनकी परेशानी काफी हद तक दूर कर सकती थी, क्योंकि सुराहीदान मेरे पास ही धरा था. मैं उसकी लँगड़ी टाँग को अपने बर्थ से टिकाकर लुढ़कने से रोक सकती थी. पर सुराही को ऐसी बेतुकी काठ की सवारी में साथ लेकर चलनेवालों से मुझे कभी सहानुभूति नहीं रहती. पंजाबी महिला संभवत: किसी मीटिंग में भाग लेने जा रही थीं, क्योंकि उनके साथ एक मोटी सी फाइल भी चल रही थी, जिसे खोल वो बीच-बीच में हिल हिलकर कुछ आंकड़ों को पहाड़ों की भाँति रटने लगती और फिर बंद कर उपन्यास पढ़ने लगतीं. उनकी सलवार, कमीज, दुपट्टा, यहाँ तक कि रुमाल भी खद्दर का था और शायद उसी के संघर्ष से उनकी लाल नाक का सिरा और भी अबीरी लग रहा था. उनके चेहरे पर रोब था, किंतु लावण्य नहीं. रंग गोरा था, किंतु खाल में हाथ की बुनी खादी सा ही खुरदरापन था. ठुड्डी पर एक बड़े से तिल पर दो-तीन लंबे बाल लटक रहे थे, जिन्हें वे उँगली में लपेटती छल्ले सा घूमा रही थीं. या वे प्रौढ़ा कुमारी थीं, या विधवा, क्योंकि चेहरे पर एक अजीब रीतापन था. जीवन के उल्लास की एक आध रेखा मुझे ढूँढने से भी नहीं मिली. जासूसी पुस्तक को थामने वाली उनके हाथों की बनावट मर्दानी और पकड़ मजबूत थी. ये वे हाथ नहीं हो सकते, मैं मन में सोच रही थी, जो बच्चों को मीठी लोरी की थपकनें देकर सुलाते हैं. पति की कमीज के बटन टाँकते हैं, या चिमटा सँडसी पकड़ते हैं. ये वे हाथ नहीं हैं, जिनकी हस्तरेखाओं को उनकी कर्मरेखाएँ धूल-कालिख की दरारों से मलिन कर देती हैं.

           मेरा अनुमान ठीक था, स्वयं ही उन्होंने अपना परिचय दे दिया. वे पंजाब के एक विस्थापित स्त्रियों के लिए बनाये गये आश्रम की संचालिका थीं. हाल ही में विदेश से लौटी थीं और लखनऊ की किसी समाज-कल्याण गोष्ठी में भाग लेने जा रही थीं. समाज-सेविकाओं में उनका नाम अग्रणी था.

            महाराष्ट्री महिला के परिचय का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था. उस स्वल्प भाषिणी सुंदरी प्रौढ़ा ने हममें से किसी को भी मैत्री का हाथ बढ़ाकर प्रोत्साहित नहीं किया. हाथ की मराठी पत्रिका को पढ़ती वे कभी स्वयं ही मुस्कराती जा रही थीं और कभी गहरी उदासी से गर्दन मोड़ ले रही थीं. स्पष्ट था कि किसी कुशल मराठी कथा लेखक की सिद्ध कलम का जादू उन्हें कठपुतली-सी नचा रहा था. वे हमारे डिब्बे में होकर भी नहीं थीं. उनके गोरे रंग पर उनकी लाल शोलापुरी साड़ी लपटें सी मार रही थी. गोल परिपाटी से बाँधा गया जूड़ा एड़ी चुंबी केशराशि के मूलधन का परिचय दे रहा था. कानों में सात मोतियों के वर्तुलाकार कर्णफूल थे और गले में था दुहरी लड़ का मंगलसूत्र, जिसे वे अभ्यासवश बार-बार दाँतों में दबा ले रही थीं. उनके सामान पर संभवत: उनके पति के नाम का लेबल लगा था- मेजर जनरल विनोलकर और वे वास्तव में थीं भी मेजर जनरल की ही पत्नी होने के योग्य. पूरे चेहरे में दोनों आँखें ही सबसे ज्वलंत आभूषण थीं. वे कुछ भी नहीं बोल रही थीं, पर वे बड़ी-बड़ी आँखें निरंतर हँसती-मुस्कराती, परिचय देती, मजाक उड़ाती जा रही थी. कभी वे मुझे देखतीं, कभी उस पंजाबी महिला को, पर आँखें चार होते ही बड़ी अवज्ञा से दृष्टि फेर मंगलसूत्र दाँतों में दबा पत्रिका पढ़ने लगतीं.

          गाड़ी ने सीटी दी और ठीक इसी समय हमारे साथ की चौथी महिला ने डिब्बे में प्रवेश किया. गाड़ी मानो उन्हीं के लिए रुकी थी, डाँट-डपट की फुफकारें छोड़ती गाड़ी चली और उसी धक्के के साथ ये महिला फद्द से सीट पर लुढ़क पड़ीं. उनके हाथ में बेंत से बनी एक छोटी सी टोकरी थी और काँख में चौकोर बटुआ दबा था. ‘ओह! लगता था, गाड़ी छूट ही जाएगी. बाप रे बाप! कैसी दौड़ लगानी पड़ी.’ मैं उन्हें देखती ही रह गयी. समाज सेविका ने जासूसी उपन्यास बंद कर दिया,मराठी मोनालिसा ने चश्मा उतारकर हाथ में ले लिया और बैठ गयी.

        हम तीनों की ही दृष्टि उस चौथी पर आबद्ध हो गयी. दोष हमारा नहीं था, वह चीज ही देखने लायक थी.

       हमारा घूरना उन्होंने भाँप लिया, “केम बेन, बहुत लंबी हूँ न मैं.” वह हँसी, “छह फुट साढ़े दस इंच टु बी एग्जैक्ट, शायद भारत की सबसे लंबी नारी. चलिए, यह अच्छा है कि इस डिब्बे में आज हम चारों महिलाएँ ही हैं, नहीं तो मुए पुरुष भी मुझे घूरते.” फिर वे दनादन हमारा इंटरव्यू लेने लगीं. पहला प्रहार मुझ पर ही हुआ. समाज-सेविका ने ठक-ठक कर रूखे उत्तरों के दो-तीन चाँटे धर दिये.

           महाराष्ट्री महिला ने ‘हिंदी नहीं जानता’ कह पीठ फेर ली, तो उस महिला ने त्रुटिहीन अंग्रेजी का धाराप्रवाह भाषण झाड़ दिया, “मुझे मदालसा कहते हैं. मदालसा सिंघानिया. कल ही प्रिटोरिया से आई हूँ, अपने पति की मृत देह लेने.” मैं चौंक गयी. समाज-सेविका ने अपने रूखे व्यवहार पर लज्जित होकर, चट आगे बढ़कर उसके दोनों हाथ थाम लिए, “अरे राम राम, कोई दुर्घटना हो गई थी क्या?” उन्होंने बड़े दर्द से पूछा.

         मदालसा की वेशभूषा में सद्य वैधव्य का कहीं कोई चिह्न नहीं था. वे लंबी होने पर भी पठानिन सी गठे कसे शरीर की लावण्यमयी गतयौवना थीं. उनके बाल किसी दामी सैलून में कटे सँवरे लग रहे थे. अपनी धानी रेशमी साड़ी को वे हाफ पैंट की भाँति ऊपर चढ़ा, दोनों पैरों की पालथी मार, आराम से जम गईं.

         “असल में पिछले वर्ष, एक पर्वतारोही दल के साथ मेरे पति भारत आए थे, वहीं एक एवलैंश (तूफान) के नीचे दबकर उनकी मृत्यु हो गई.”

         “च्च च्च च्च, तो क्या मृत देह अब मिली? मैंने पूछा.

         “हाँ, भारत सरकार ने मुझे सूचित किया, तो भागती आई. बर्फ में दबी देह, सुना ज्यों की त्यों मिली है. मेरे बुने स्वेटर का, जिसे इन्होंने पहना था, एक फंदा भी नहीं टूटा.”

      मृत पति की स्मृति ने उन्हें भाव विभोर कर दिया. बटुए से मर्दाना रूमाल निकाल, वे कभी आँखें पोंछने लगीं, कभी अपनी सूपनखा सी लंबी नाक. बेचारी करतीं भी क्या! कोई भी जनाना रूमाल उस नाक का अस्तित्व नहीं सँभाल सकता था.

           अचानक हम तीनों को, बेचारी मदालसा का एक वर्ष पुराना वैधव्य, एक दम ताजा लगने लगा.

         “तो क्या अब आप अपने “हसबैंड’ का ‘डेड बॉडी’ लेकर प्रिटोरिया ‘फ्लाई’ करेगा?” महाराष्ट्री महिला ने पूछा.

            “नहीं बेन” मदालसा सीट पर लेट गयी,तो लगा एक लंबे खजूर का कटा पेड़ ढह गया.

            एक लंबी साँस खींचकर उन्होंने कहा, “मैं असल में सती होने भारत आई हूँ.” हम तीनों को ए साथ अपने इस उत्तर का क्लोरोफॉर्म सुँघा, सती ने एकदम आँखें मूँद ली, जैसे वह चाह रही थी कि अब हम उन्हें शांति से पड़े रहने दें.

        ऐसा भी भला किसी ने सुना था इस युग में! सुस्पष्ट उच्चारण में अँग्रेजी बोलने वाली, छह फुट साढ़े दस इंच की यह काया, कल बर्फ में दबी पति की एक साल बासी लाश को छाती से लगा, जल भुनकर राख हो जायगी.

        “नहीं, आपको ऐसी मूर्खता करने का कोई अधिकार नहीं है. यह एक अपराध है, क्या आप यह नहीं जानतीं?” खादीधारी महिला उठकर मदालसा के सिरहाने बैठी, उसे गंभीर भाषण की गोलाबारी झाड़ने लगी, जैसे चिता सचमुच प्रज्वलित हो चुकी है और सती लपटों में कूदने को तत्पर है. ‘भावावेश के दुर्बल क्षणों में नारी कभी बड़ा बचपना कर बैठती है, इसका मुझे व्यापक अनुभव है. अभी हाल ही में मेरे आश्रम की दो युवतियाँ ऐसी मूर्खता कर बैठीं. मुझे ही देखिये, भारत विभाजन के समय मेरे पति की हत्या कर दी गई,पर मैं क्या सती हो गयी? सिली सेंटिमेंट! यदि मैं भी उस दिन आपकी भाँति सती हो जाती, तो आज यह देह दीन-दुखियों के काम आ सकती थी? पहले मॉडल जेल की अध्यक्षा रही और अब गिरी बहनों के आश्रम की देखरेख करती हूँ.”

           “ना बेन, ना”, मदालसा ने करवट बदली, “मैं तो सती होने ही भारत आयी हूँ. हाय मेरा नीलरतन, नीलू डार्लिंग!” कह वह फिर मर्दाने रूमाल में मुँह छिपाकर सिसकने लगीं.

       “आप चाहें तो मैं आपके साथ चल सकती हूँ. आपके पति के अंतिम संस्कार में आपकी सहायता कर आपको अपने आश्रम में ले चलूँगी.” समाज-सेविका ने अपने उदार प्रस्ताव का चुग्गा डालकर मदालसा को रिझाने की चेष्टा की.

          मदालसा बड़ी उदासी से हँसी, “धन्यवाद बेन, पर ब्रह्मा भी अब मुझे अपने निश्चय से नहीं डिगा सकते. यह रोग हमारे खानदान में चला आया है. मेरी परनानी तो राजा राममोहन राय और सर विलियम बेंटिक को भी घिस्सा देकर सती हो गयी थीं. और नानी के लिए तो लोग कहते हैं कि नानाजी की मृत देह गोद में लेकर चिता में बैठते ही, स्वयं चिता धू धू कर जल उठी थी. फिर मेरी माँ और अब मैं.”

     “खैर हटाइये भी, पता नहीं किस धुन में आकर आप लोगों से कह गयी. ‘आई शुड नॉट हैव टोल्ड यू.’(मुझे आपसे नहीं कहना चाहिए था.) चलिए, हाथ-मुँह धोकर खाना खा लिया जाय. क्यों, क्या ख्याल है?” उन्होंने अपनी कदली स्तंभ सी जंघाओं पर दोनों हाथों से त्रिताल का टुकड़ा सा बजाया.

          हम तीनों को एक बार फिर आश्चर्य उदधि में गोता लगाने को छोड़, वे टोकरी से एक स्वच्छ तौलिया, साबुन निकाल गुसलखाने में घुस गयीं.

         उनके जाते ही हम तीनों परम मैत्री की एक डोर में गुँथ गये.

“अजीब औरत है! क्या आप सोचती हैं यह सचमुच सती होने जा रही है?” मैंने मराठी महिला से पूछा.

     “देखिए, मरने वाला कभी ढिंढोरा पीटकर नहीं मरता.” वह हँसकर बोली, “हमको तो इसका यह स्क्रू ढीला लगता है.” उन्होंने अपने माथे की ओर अँगुली घुमाई, “इस जमाने में ऐसे सती-फती कोई नहीं होती.”

       “क्षमा कीजिएगा”, खादीधारी महिला बड़ी गंभीरता से बोली, “मुझे औरतों का अनुभव आ दोनों से अधिक है. मैं ऐसी भावुक प्रकृति की भोली औरतों को चेहरा देखते ही पहचान लेती हूँ. आँखें नहीं देखी आपने? कितनी निष्पाप, पवित्र और उदार हैं. मुझे पक्का विश्वास है कि पति की मृत देह देखते ही यह वही मूर्खता कर बैठेगी, जिसका यह खुलेआम ऐलान कर रही है. लगता है मुझे अपना प्रोग्राम कैंसिल कर, इसके साथ जा पुलिस को खबर देनी होगी. तभी इसे बचाया जा सकता है.”

      इतने ही में मदालसा, हाथ मुँह धोकर ताजा चेहरा लिए आ गयी. मेल गाड़ी वन, ग्राम, नदी, नाले, पुल कूदती-फाँदती सर्राटे से भागी जा रही थी. मदालसा ने अपनी टोकरी खोलकर नाश्तादान निकाल लिया. जैसे खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग पकड़ता है, ऐसे ही एक यात्री को खाते देख दूसरे सहयात्री को भी भूख लग आती है. क्षणभर में सती प्रथा पर चल रही बहस, कपूर धुएँ की भाँति उड़ गयी और चटाचट नाश्तेदान खुलने लगे.

           “आइये न, एक साथ बैठकर खाया जाय.” मदालसा ने कहा और बड़े यत्न से, स्वच्छ नैपकिन बिछा, छोटे-छोटे स्टील के कटोरदान सजाने लगी.

        “धन्यवाद!” मैंने कहा, “पर हमारे साथ भी तो खाना है. इसे कौन खाएगा?”

         “वाह जी वाह, उसे हम खाएँगी. ईश्वर ने यह छह फुट साढ़े दस इंच का दुर्ग आखिर बनाया किसलिए है?” उनकी भुवनमोहिनी हँसी ने हमें पराजित कर दिया. वैसे भी हम तीनों ने, एक दूसरी को काकदृष्टि से, सती के घृत पकवान को आँखों ही आँखों में घूरते चखते पकड़ भी लिया था. सुनहरी मोयनदार कचौड़ियाँ थीं, मसालों की गहरी पर्त में डूबी सब्जियाँ थीं,रायता था, चटनी थी– और थे ठाँस – ठाँसकर बाँधे गये, मेवा जड़े बूँदी के लड्डू!

      “यह तो सफर का खाना नहीं, अच्छा खासा विवाह भोज है.” समाज-सेविका की आँखों से लार टपक रही थी, “बड़ा हैवी खाना लेकर चली हैं आप!” उन्होंने कहा और कचौड़ियों पर टूट पड़ीं.

        हम तीनों के पास, भारतीय रेल यात्रियों के साथ युग युगांतर से चली आ रही वही पूरी तरकारी और आम के अचार की फाँकें थीं. अपना खाना खाया ही किसने! मदालसा के स्वादिष्ट भोजन को चटखारे ले लेकर हम तीनों ने साफ कर दिया,उधर वे अकेली ही हम तीनों के नाश्तादानों को जीभ से चाट गयीं थीं. विधाता ने सचमुच ही उनके शरीर के दुर्ग में असीम गोला-बारूद भरने के लिए अनेक कोष्ठ-प्रकोष्ठों की रचना की थी. महातृप्ति के कई तार और मंद्र सप्तक के डकार लेकर,  हाथ-मुँह धो मदालसा ने टोकरी में से एक मस्जिद के गुंबद के आकार का पानदान निकाला.

         “यह मेरे नीलू ने मुझे बगदाद से लाकर भेंट किया था. उसे पान बेहद पसंद थे, इसी से एक ढोली मघई पान और यह पानदान लेकर ही कल चिता में उतरूँगी.” इसी शहीदाना अदा से, हम तीनों को घायल कर उन्होंने केवड़ा, इलायची और मैनपुरी सुपारी से ठँसा बीड़ा थमाया.

         सती प्रथा पर फिर जोरदार बहस छिड़ गयी–”हाय, मेरे अंतिम सफर की प्यारी साथिनों, तुम अब हमें नहीं रोक सकती.” मदालसा लेट गयी और बड़ी सधी आवाज में गाने लगी, “न जाणयू जानकी नाथे सवारे शू थवानू छे”, “समझी इसका अर्थ” उन्होंने हँसकर मुझसे पूछा, “जानकीनाथ भी यह नहीं जान सके थे कि सुबह क्या होगा.”

         अब मुझे लगता है, उस गुजराती पद की व्याख्या उन्होंने संभवत: हमारे ही हित में की थी. “चलो जी, अब सो जाओ सब. आज इस पृथ्वी पर मेरी यह अंतिम निद्रा है बेन, बहस व्यर्थ है. चलो गुड नाइट और बहुत प्यारे-प्यारे सपने दिखें तुम तीनों को.” सचमुच ही उसकी शुभकामनाओं ने जादू का असर किया. ऐसी नींद तो पहले कभी आई ही नहीं थी! और सपने?

     कभी लगता — जगमगाते आभूषणों के ढेर में गोते खा रही हूँ, हीरे के हारों से गर्दन टूटी जा रही है, बाजूबंद-अँगुठियों के भार से हड्डियाँ खिसकी जा रही हैं. और साड़ियाँ? क्या-क्या रंग हैं! कैसा चिकना रेशम! साड़ियों के विशाल उदधि में रंगीन कीमती साड़ियों की तरंगें रह रहकर उठ रही हैं. इससे प्यारे सपने और क्या दिख सकते थे? पर सपनों का अंत भी समुद्र के ज्वार भाटे की ही भाँति हुआ– वास्तविकता की अंतिम तरंग ने पटाक से हम तीनों को धोबीपछाड़ दी, आँखें खोली तो सती गायब थी.

           “हाय मेरे स्टील का बक्स!” मिसेज वनोलकर बर्थ से उतरते ही लड़खड़ा गईं, “उसमें तो मेरे विवाह का जड़ाऊ सेट था. लगता है वह सती की बच्ची हमें कुछ विष खिला गयी. सिर फटा जा रहा है.” उनका गला भर्रा गया. हाँ, ठीक ही तो कह रही थी, मुझे कोई जैसे सावन के झूले की ऊँची ऊँची पेंगें दे रहा था, पूरा डिब्बा गोल-गोल घूम रहा था. पंखे के चारों ओर बल्ब, बल्ब के चारों ओर छत और छत के इर्दगिर्द कई रे‌शमी साड़ियाँ और भारी-भारी आभूषण पहने स्वयं मैं लट्टू सी घूम रही थी. कभी जी में आ रहा था जोर-जोर से हँसूँ, कभी दहाड़े मारकर, रोने को तड़प रही थी. बहुत पहले एक बार भाभी ने भंग खिलाकर ऐसी ही अवस्था कर दी थी.

        सुना गया है कि कुकुरमुत्तों को पीसकर बनाया गया विष भी ऐसे ही मीठे सपने दिखाता है. उनको खाते ही गहरी नींद आ जाती है, जो कभी-कभी दिनों तक नहीं टूटती.

        मीठे सपने दिखा सजग मनुष्य को अर्द्धविक्षिप्त सा कर देने वाला यह अवश्य वही विष होगा. समाज-सेविका दोनों हाथों से सिर थामे बिलख रही थी, “हाय, मैं तो लुट गयी! मेरे सूटकेस में आश्रम का दस हजार रुपया था.”

      और मैं? सहसा गोल-गोल घूमते रेल के डिब्बे में गोल घूमते मेरे दिमाग ने मुझे सूचित किया, “तुम्हारा बटुआ ले गयी है, बटुआ!”

और ले भी क्या जाती! सामान तो कुछ था नहीं. पचपन रुपये और एक फर्स्ट क्लास का वापसी टिकट. सती की चिता में, मैं यही सामान्य सी घृताहुति दे पाई. चेन खींचकर गाड़ी रोकी गयी. सचमुच ही समाज-सेविका को पुलिस को खबर देनी पड़ी, पर सती को बचाने नहीं, पकड़वाने के लिए. वह मिल जाती तो शायद, हम तीनों स्वयं उसकी चिता चुनकर उसे झोंक देतीं. पर कहना व्यर्थ है, आज तक पुलिस उस सती मैया के फूल नहीं चुन पाई.

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शिवानी

शिवानी

जन्म: 17 अक्तूबर 1923, राजकोट, मृत्यु: 21 मार्च 2003, नई दिल्ली कहानियाँ : करिये छिमा, लाल हवेली, पिटी हुई गोट उपन्यास: मायापुरी, कृष्णकली, चौदह फेरे, कैंजा, अपराधिनी

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