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गोदान को प्रेमचन्द का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास माना जाता है। तमाम त्रुटियों की ओर इशारा करने के बावजूद आलोचक इस विचार पर एक मत हैं कि गोदान प्रेमचन्द का चरम बिन्दु है। गोदान के साथ प्रेमचन्द की लेखन कला अपनी पूर्णता को प्राप्त करती है, साथ ही उनकी जीवन यात्रा भी। गोदान को आमतौर पर ‘किसान’ जीवन की त्रासदी या ‘कृषक जीवन का महाकाव्य’ के रूप में देखे जाने की प्रवृत्ति रही है, लेकिन गोदान को सिर्फ किसानों के शोषण की कथा के रूप में देखना उसे बहुत ही सीमित संदर्भो में देखना है। कृषक प्रेमचन्द की चिन्ता के मूल में रहा है। पहले उपन्यास सेवासदन में ही ‘चैतू प्रसंग’ के द्वारा प्रेमचन्द यह सूचना दे देते हैं कि उनकी यात्रा की दिशा क्या होगी। प्रेमाश्रम और कर्मभूमि तो मूलरूप से कृषक समस्याओं को आधार बनाकर ही लिखे गये हैं। गोदान में वस्तुतः प्रेमचन्द की चिन्ता इससे कहीं व्यापक है। यहाँ लेखक का उद्देश्य सामन्तवाद और पूंजीवाद के संक्रमण पर खड़े समाज की बदलती मानसिकता को उसकी तमाम खूबियों और खामियों के साथ चित्रित करने की है। तीस का दशक भारतीय समाज में आने वाले बहुत बड़े परिवर्तन को सामने लाता है। पूंजीवाद के आगमन के साथ सामन्तवाद की जड़ें हिलनी शुरू हो गयीं थीं। भारतीय पूंजीवाद कई मायनों में अन्य देशों के पूंजीवाद से भिन्न है। वहाँ पूंजीवाद का प्रसार विदेशी पूंजी के दम पर हो रहा था और वह विदेशी पूंजी कहीं और से नहीं, बल्कि ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय किसानों के शोषण से प्राप्त हो रही थी। इस पूंजीवाद ने समाज की मानसिकता और उसके मूल्यों पर अपना प्रभाव जमाना प्रारम्भ कर दिया था। प्रेमचन्द की चिन्ता इन्हीं प्रभावों को अपने सम्पूर्ण रंग रेशों के साथ दर्शाने की है, जिन्हें वह भारतीय समाज की बुनावट के लिए घातक समझते थे । गोदान के आस-पास ही प्रेमचन्द ने महाजनी सभ्यता नामक अपना प्रसिद्ध लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने इन प्रभावों की विस्तार से चर्चा की है। गोदान का नायक होरी युग सन्धि पर खड़ा है। उसकी एक छोटी सी महत्वाकांक्षा है-दरवाजे पर गाय देखने की। गाय किसान की सबसे बड़ी सम्पत्ति है, साथ ही भारतीय जनमानस की धार्मिक आस्था का प्रतीक भी। यह अनायास नहीं है कि ‘अर्थ’ और ‘धर्म’ होरी की शोषणकारी शक्तियों के सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपकरण हैं। होरी महज एक व्यक्ति नहीं है, बल्कि उस 80 प्रतिशत जनता का प्रतिनिधि है, जिनके कन्धों पर इस व्यवस्था ने शोषण का जुआ लाद रखा था। इस अर्थ में होरी एक वर्ग चरित्र है। डाॅ. काशीनाथ सिंह के शब्दों में कहे तो ‘‘होरी सामन्त और शासन के शोषण का अन्तहीन सिलसिला है।’’ वस्तुतः होरी के शोषण में सामन्त और शासन से बड़ी भूमिका धर्म और महाजन की है। अपनी छोटी सी महत्वाकांक्षा की पूर्ति की लड़ाई लड़ता होरी इन शोषणकारी शक्तियों से बार-बार जूझता है और अन्ततः जार-जार होकर बिखर जाता है। होरी की हार का कारण बदलते मूल्यों के साथ उसका सामंजस्य न बिठा पाना है। कार्ल मार्क्स जैसे विचारक पूंजीवादी व्यवस्था को सामंतवाद से बेहतर और प्रगतिशील मानते हैं, परन्तु प्रेमचन्द की दृष्टि में सामंत और उनके किसानों के सामन्ती मूल्य कहीं अधिक श्रेष्ठ थे, क्योंकि उनमें कहीं न कहीं मानवीयता का एक अंश विद्यमान था, जबकि महाजनी सभ्यता उनकी नजर में ऐसी हृदयहीन सभ्यता है जो अपने लाभ के लिए किसी का गला काटने से संकोच नहीं करती। होरी के मूल्य स्वनिर्भर सामन्ती ग्रामीण व्यवस्था के मूल्य हैं। मानवीयता, परिवारिकता, परस्पर सहयोग की भावना, धर्मभीरूता आदि ऐसे ही मूल्य होरी की आत्मा में रचे बसे है, जिन्हें वह चाहकर भी निकाल नहीं पाता। जहाँ कहीं भी इन मूल्यों पर आघात होता है, होरी की चेतना उसका सामना करने के लिए तन कर खड़ी हो जाती है। परन्तु, जहाँ पूरे समाज की मानसिकता ही बदल रही हो, वहाँ होरी के मूल्य ज्यादा देर तक बच नहीं सकते थे। होरी अपनी जमीन, अपने धर्म और अपने मरजाद को बचाने की लड़ाई लड़ता है, परन्तु अन्त में न जमीन बचती है, न धर्म और न मरजाद।
सामन्ती शोषण के चित्र प्रेमचन्द की कहानियों और उपन्यासों में बिखरे पड़े हैं। गोदान में भी राय साहब सामन्तवाद के प्रतिनिधि के रूप में सामने आते हैं। प्रेमचन्द की पूर्ववर्ती रचनाओं के बरअक्स गोदान को रख कर देखें तो यहाँ सामन्त का रूप कुछ बदला नजर आता है। राय साहब को अपने वर्ग की आसन्न समाप्ति साफ दिख रही है। इसलिए वह खन्ना जैसे पूंजीवादियों से गँठजोड़ करना चाहते हैं , ताकि उनकी सत्ता सुरक्षित रहे। आदर्शवादी वक्तव्य देने वाले राय साहब का वास्तविक चरित्र भी एक क्रूर शोषक सामन्त का ही है, जो मजदूरों द्वारा बेगार करने से मना करने पर विनम्रता का चोला उतारकर अपने वास्तविक रूप में आ जाता है। राय साहब की विनम्रता का आवरण होरी जैसे किसानों को बेवकूफ बनाने के लिए ओढ़े गये छद्म से ज्यादा कुछ नहीं है। गोबर इस छद्म को पहचानता है। वह कहता है ‘‘तुम्हारे राजा साहब अपनी हवेली और जमींदारी हमें क्यूं नहीं दे देते? बदले में हम उन्हें अपना हल, बैल और खेत देने के लिए तैयार हैं।’’ यहाँ होरी का शोषण करने वाला अकेला सामन्त ही नहीं। सामन्त एक है तो महाजन कई। प्रेमचन्द ने दिखाया है कि किस तरह महाजनी संस्कृति शहर के रास्ते चलकर गांव तक अपनी पहुंच बना रही थी-‘‘गांव में इन दिनों लोगों को महाजनी का चस्का लग गया था। जिसके पास भी कहीं से कुछ पैसे आ जाते, वही महाजनी करने लगता था। होरी ने भी अपने अच्छे दिनों में महाजनी की थी।’’ गोबर भी शहर में कुछ पैसे कमाकर महाजन बन जाता है। होरी ही नहीं समूचा गांव ही महाजनों के शिकंजे में बुरी तरह जकड़ा हुआ था। महाजनी शोषण का यह रूप अपने पूर्ववर्ती सामन्ती शोषण से कहीं अधिक भयावह और मारक था। सामन्त तो कई बार अतिवृष्टि और अनावृष्टि के समय अपने लगान माफ कर दिया करते थे, परन्तु ये महाजन तो मनुष्य की विपत्ति में भी शोषण के रास्ते ढूंढा करते हैं.गाय की मृत्यु के बाद पुलिसवालों को पैसे देने का षड्यंत्र इसलिए रचा जाता है कि पहले से ही ऋण के बोझ  से दबे होरी के कन्धों पर एक और बोझ डालकर शोषण की नयी जमीन तैयार की जा सके। यद्यपि धनिया की बहादुरी से यह षड्यन्त्र सफल नहीं हो पाता, लेकिन इस प्रक्रिया में होरी और धनिया पूरी शोषक मण्डली को अपना दुश्मन जरूर बना लेते हैं। शोषक मण्डली मौके की तलाश में है और मौका उन्हें मिलता है ,गोबर द्वारा झुनिया को गर्भवती करके भाग जाने पर। मानवीय मूल्यों में अदम्य आस्था रखने वाला होरी झुनिया को बेसहारा और निराश मरने के लिए नहीं छोड़ पाता और अपनी बहू मानकर उसे अपने घर में शरण देता है। शोषक मण्डली जिस मौके की तलाश में थी, वह उसे मिल जाता है। इनकी शह पर बिरादरी और उसके पंच होरी को बिरादरी से बाहर कर उसका हुक्का-पानी बन्द कर देते हैं।
‘पंच परमेश्वर में प्रेमचन्द ने दिखाया है कि पंच के आसन पर बैठा व्यक्ति अन्याय नहीं कर सकता। लेकिन, यह आदर्शवाद प्रेमचन्द के लिए बीते जमाने की बात है। उनका गोदान यथार्थ की ठोस भूमि पर खड़ा है। यहाँ पंच और बिरादरी न्याय के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि अन्यायी शोषक व्यवस्था के अंग है। हुक्का-पानी फिर शुरू करवाने की खातिर होरी को उन्हीं महाजनों के पास जाना पड़ता है, जिन्होंने यह जाल बिछाया था। इस प्रकार होरी शोषण के ऐसे दुश्चक्र में फँस जाता है कि जीवन भर उससे निकल नहीं पाता।
होरी के शोषण का सबसे बड़ा कारण उसकी बद्धमूल धार्मिक आस्था और कृषक संस्कार हैं, जो शोषण को अपनी नियति तथा विगत जन्मों के कर्मों का फल मानकर बिना किसी प्रतिरोध के उसे स्वीकार करते है। किसान स्वभाव से ही अन्धविश्वासी होता है। उसका सारा जीवन प्रकृति की कृपादृष्टि पर निर्भर होता है। यह अनिश्चतता उसे अंधविश्वासी और नियतिवादी बनाती है। होरी के यह धार्मिक संस्कार उसकी दुरवस्था को और बढ़ा देते हैं। दातादीन जैसे लोगों को वस्तुतः उसका शोषण करने के लिए कुछ करना ही नहीं पड़ता। उनका ब्राह्मण होना ही काफी है। ‘सेवासदन’ और ‘कर्मभूमि’ में गांव का महंत ही वहाँ का जमींदार भी हैं, जो क्रूरता की हद तक जाकर किसानों का शोषण करता है। यहाँ प्रेमचन्द धर्म की शोषक भूमिका को बखूबी रेखांकित कर रहे थे। उपरोक्त उपन्यासों के महंत जहां धर्म और सामन्तवाद के गंठजोड़ के प्रतीक है, वहीं गोदान का दातादीन धर्म और पूंजीवाद के गंठजोड़ का प्रतीक है। धर्म और पूंजीवाद का यह मेल शोषण को कई गुना बढ़ा देता है, क्योंकि यहाँ महाजन को अपने शोषण में किसी प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ता। मजदूर बनने के बाद होरी को दातदीन के खेत में मजदूरी करते दिखाकर प्रेमचन्द ने यह संकेत दे दिया है कि तत्कालीन समाज में धर्म शोषण में सर्वाधिक प्रभावी भूमिका निभा रहा है।
गोदान में प्रेमचन्द ने अस्पृश्यता और दलितों के शोषण को भी बखूबी उभारा है। मातादीन सिलिया का छुआ नहीं खा सकता, लेकिन उसके साथ दैहिक सम्बन्ध स्थापित करने में उसका धर्म भ्रष्ट नहीं होता। सिलिया मातादीन को अपना सर्वस्व अर्पित कर देती है, लेकिन इसके बावजूद मातादीन के खेत से उसे अपने लिए दो मुट्ठी अन्न उठाने की इजाजत नहीं है। तत्कालीन भारतीय समाज ज्योतिबा फुले, ई.वी. रामास्वामी नायकर और भीमराव अम्बेडकर.जैसे नेताओं की प्रेरणा से अस्पृश्यता विरोधी दलित आंदोलन की शुरूआत हो चुकी थी। गोदान में हरखू और उसके साथियों द्वारा मातादीन के मुंह में हड्डी का टुकड़ा डालने को इन आन्दोलनों का प्रभाव माना जा सकता है। यह घटना तत्कालीन सामाजिक सन्दर्भो में अतिरंजित लग सकती है, परन्तु सन्देश बहुत स्पष्ट है- ‘तुम हमें ब्राह्मण नहीं बना सकते तो क्या हुआ? हम तो तुम्हें… बना सकते है।’
मातादीन का वापस सिलिया के पास आना कई विद्वानों को आदर्शवादी हृदय परिवर्तन लगा है और इस आधार पर उन्होंने गोदान के यथार्थवाद पर सवाल खड़े किये हैं। गौर से देखें तो यह मातादीन का हृदय परिवर्तन नहीं, बल्कि उसकी विकल्पहीनता है। सिलिया और अपने बेटे से लगाव रखने के बावजूद उनसे दूरी बनाये रखने का एकमात्र कारण उसका ब्राह्मण समाज और धर्म थे। जब उसने देखा कि तमाम प्रायश्चितों और कर्मकाण्डों के बाद भी उसके अपने समाज में उसके लिए जगह नहीं बची तो सिलिया के पास जाने के सिवा उसके पास रास्ता ही क्या था?
पूंजीवाद के आगमन के साथ-साथ उदित होते नव मध्यवर्ग को भी प्रेमचन्द ने अपने विचार का विषय बनाया है। प्रेमचन्द स्वयं मध्यवर्ग के प्रतिनिधि थे, फिर भी मध्यवर्ग की चारित्रिक दुर्बलताओं को उन्होंने बखूबी उभारा है। विनय (रंगभूमि) और अमरकांत (कर्मभूमि) ऐसे मध्यवर्गीय चरित्र हैं, जो अपने निजी स्वार्थों के लिए एक महान आन्दोलन को बीच में छोड़ने या उसके विरूद्ध कार्य करने से गुरेज नहीं करते। मार्क्स ने ऐसे ही चरित्रों को ‘पेट्टी बुर्जुआ’ चरित्र कहा है। गोदान के मिर्जा खुर्शेद और ओंकारनाथ जैसे चरित्र भी मजदूर आन्दोलन तक आते है, परन्तु उसे किसी तार्किक परिणति तक पहुंचाये बिना पीछे हट जाते है।
ग्राम कथा-नगर कथा गोदान की संरचना आरम्भ से ही आलोचकों की चर्चा और विवाद का केन्द्र रही। कई आलोचकों ने तो इसकी नगर कथा को गोदान की मूल कथा के लिहाज से अनावश्यक करार दिया है। गोदान की रचना के कुछ समय बाद ही जैनेन्द्र ने ‘‘प्रेमचन्द का गोदान यदि मैं लिखता’’ नामक निबन्ध लिखकर प्रेमचन्द पर वाग्स्फीति का आरोप लगाया और नगर कथा के अधिकांश हिस्सों को काटकर अलग कर दिया। वस्तुतः जो लोग गोदान को प्रेमचन्द का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास मानते हैं, वो भी इसकी नगर कथा के प्रति सशंकित दृष्टि अपनाते हैं। नगर कथा की यह आलोचना गोदान को कृषक जीवन की कथा के सीमित सन्दर्भो में देखने का परिणाम है। लेकिन, जैसा कि हम पहले कह चुके हैं प्रेमचन्द का उद्देश्य महज किसान जीवन की कथा कहना न होकर युगीन बदलाव के बिन्दुओं को पहचानना भी था। सामन्तवाद और पूंजीवाद के संक्रमण की कथा ग्राम और नगर के संयोजन के बगैर पूरी नहीं हो सकती थी। गांव का होरी झुनिया और सिलिया को अपना सबकुछ लुटा कर भी शरण देता है। अपनी गाय को जहर देने वाले भाई के जाने के बाद उसके परिवार का भी पालन करता है। दूसरी ओर है गोबर, जो शहर जाते ही महाजनी संस्कृति के रंग में रंग जाता है और अपने शरणदाता मिर्जा खुर्शेद को दो रूपये देने से बचने के लिए -झूठी कसम खाता है। मिर्जा खुर्शेद को देने के लिए उसके पास पैसे नहीं हैं, क्योंकि वापसी की कोई उम्मीद नहीं है जबकि ब्याज पर देने के लिए पैसे तुरन्त निकल आते हैं। और तो और, पैसों के लिए वह अपनी पत्नी झुनिया से भी झूठ बोलता है। जब वह पूछती है दिखाओ क्या कमा कर लाये , तो वह अपने पैसे छुपाता हुआ कहता है अभी कहां कमाया तुम चलोगी तब कमाउंगा।
गोदान की ग्राम कथा में है होरी और धनिया का अटूट दाम्पत्य, जो तमाम झंझावातों और आपदाओं के बीच अपना अस्तित्व बरकरार रखता है,तो नगर कथा में है खन्ना और गोविन्दी का,मीनाक्षी और विक्रमसिंह का टूट कर बिखरता दाम्पत्य और साथ ही मेहता और मालती का कम्पैनियनशिप।
यह सही है कि गोदान की ग्राम कथा जितनी सशक्त बन पड़ी है उसकी नगर कथा नहीं। प्रेमचन्द के जीवन का अधिकांश नगरों में बीता। उन्होंने रंगभूमि और गबन जैसे नगर केन्द्रित उपन्यास भी लिखे। इसके बावजूद प्रेमचन्द को ग्रामकथा विशेषज्ञ के रूप में देखा जाना ही उचित है। व्यक्ति की जानकारी जहां सीमित होती है, वहाँ उसे अधिक बोलने की जरूरत होती है। ग्रामकथा के चित्रण में प्रेमचन्द को कहीं भी अधिक बोलने की जरूरत नहीं पड़ती। महज कुछ ही शब्दों में स्थितियों का पूरा चित्र पाठक के सामने साकार कर देते हैं। इसके विपरीत नगर कथा में लम्बे-लम्बे वर्णनात्मक प्रसंग है, भाषणों और वक्तव्यों की शृंखला है। इन सबके बावजूद पाठक के मन पर ग्रामकथा का जो अमिट प्रभाव पड़ता है, वह नगर कथा का नहीं। सम्भवतः यही कारण है कि आलोचकों को गोदान की नगर कथा अनावश्यक, विशृंखल और कृत्रिम प्रतीत होती है। इन सबके बावजूद यह मानना होगा कि गोदान का दोहरा या समानान्तर शिल्प अथवा नगर कथा का अस्तित्व ऐसी अनिवार्यता है जिसे विलग करके गोदान की कल्पना नहीं की जा सकती।
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राजीव सिन्हा

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर के बाद दिल्ली में अध्यापन
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