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एक कम – विष्णु खरे

विष्णु खरे को श्रद्धांजलि स्वरूप 1947 के बाद से इतने लोगों को इतने तरीकों से आत्मनिर्भर मालामाल और गतिशील होते देखा है कि अब जब आगे कोई हाथ फैलाता है पच्चीस पैसे एक चाय या दो रोटी के लिए तो जान लेता हूँ मेरे सामने एक ईमानदार आदमी, औरत या बच्चा खड़ा है मानता हुआ कि हाँ मैं लाचार हूँ कंगाल या कोढ़ी एक मामूली धोखेबाज़... या मैं भला चंगा हूँ और कामचोर लेकिन पूरी तरह तुम्हारे संकोच लज्जा परेशानी या गुस्से पर आश्रित तुम्हारे सामने बिलकुल नंगा निर्लज्ज और निराकांक्षी मैंने अपने को हटा लिया है हर होड़ से मैं तुम्हारा विरोधी प्रतिद्वंद्वी या हिस्सेदार नहीं मुझे कुछ देकर या न देकर भी तुम कम से कम एक आदमी से तो निश्चिंत रह सकते हो...

अछूत की शिकायत -हीरा डोम 

महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित ‘सरस्वती’ (सितंबर 1914) में प्रकाशित यह  कविता हिंदी दलित साहित्य की पहली रचना मानी जाती है. हमनी के राति दिन दुखवा भोगत बानी हमनी के सहेब से मिनती सुनाइबि। हमनी के दुख भगवानओं न देखता ते, हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि। पदरी सहेब के कचहरी में जाइबिजां, बेधरम होके रंगरेज बानि जाइबिजां, हाय राम! धसरम न छोड़त बनत बा जे, बे-धरम होके कैसे मुंहवा दिखइबि ।।1।। खंभवा के फारी पहलाद के बंचवले। ग्राह के मुँह से गजराज के बचवले। धोतीं जुरजोधना कै भइया छोरत रहै, परगट होके तहां कपड़ा बढ़वले। मरले रवनवाँ कै पलले भभिखना के, कानी उँगुरी पै धैके पथरा उठले। कहंवा सुतल बाटे सुनत न बाटे अब। डोम तानि हमनी क छुए से डेराले ।।2।। हमनी के राति दिन मेहत करीजां, दुइगो रूपयावा दरमहा में पाइबि। ठाकुरे के सुखसेत घर में सुलत बानीं, हमनी के जोति-जोति खेतिया कमाइबि। हकिमे के लसकरि उतरल बानीं। जेत उहओं बेगारीया में पकरल जाइबि। मुँह बान्हि ऐसन नौकरिया करत बानीं, ई कुल खबरी सरकार के सुनाइबि ।।3।। बभने के लेखे हम भिखिया न

श्रीकृष्ण के लिए नज़ीर अकबराबादी – श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर

ख़ुर्शीद में जल्वा चाँद में भी । हर गुल में तेरे रुख़सार की बू । घूँघट जो खुला सखियों ने कहा । ऐ सल्ले अला, अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी । दिलदार ग्वालों, बालों का । और सारे दुनियादारों का । सूरत में नबी सीरत में ख़ुदा । ऐ सल्ले अला, अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी । इस हुस्ने अमल के सालिक ने । इस दस्तो जबलए के मालिक ने । कोहसार लिया उँगली पे उठा । ऐ सल्ले अला, अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी । मन मोहिनी सूरत वाला था । न गोरा था न काला था । जिस रंग में चाहा देख लिया । ऐ सल्ले अला, अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी । तालिब है तेरी रहमत का । बन्दए नाचीज़ नज़ीर तेरा । तू बहरे करम है नंद लला । ऐ सल्ले अला, अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

अहा ग्राम्य जीवन – मैथिलीशरण गुप्त

अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है, क्यों न इसे सबका मन चाहे, थोड़े में निर्वाह यहाँ है, ऐसी सुविधा और कहाँ है ? यहाँ शहर की बात नहीं है, अपनी-अपनी घात नहीं है, आडम्बर का नाम नहीं है, अनाचार का नाम नहीं है। यहाँ गटकटे चोर नहीं है, तरह-तरह के शोर नहीं है, सीधे-साधे भोले-भाले, हैं ग्रामीण मनुष्य निराले । एक-दूसरे की ममता हैं, सबमें प्रेममयी समता है, अपना या ईश्वर का बल है, अंत:करण अतीव सरल है । छोटे-से मिट्टी के घर हैं, लिपे-पुते हैं, स्वच्छ-सुघर हैं गोपद-चिह्नित आँगन-तट हैं, रक्खे एक और जल-घट हैं । खपरैलों पर बेंले

तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर- शंकर शैलेन्द्र

तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर, अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर! सुबह औ' शाम के रंगे हुए गगन को चूमकर, तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूमकर, तू आ मेरा सिंगार कर, तू आ मुझे हसीन कर! अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर! ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन, ये दिन भी जाएंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन, कभी तो होगी इस चमन पर भी बहार की नज़र! अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर! हमारे कारवां का मंज़िलों को इन्तज़ार है, यह आंधियों, ये बिजलियों की, पीठ पर सवार है, जिधर पड़ेंगे ये क़दम बनेगी एक नई डगर अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर! हज़ार भेष धर के आई मौत तेरे द्वार पर मगर तुझे न छल सकी चली गई वो हार कर नई सुबह के संग सदा तुझे मिली नई उमर अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार

नमामि मातु भारती-गोपाल प्रसाद व्यास

हिमाद्रि तुंग श्रृंगिनी त्रिरंग-रंग रंगिनी नमामि मातु भारती सहस्त्र दीप आरती !   समुद्र पाद पल्लवे विराट-विश्व वल्लभे प्रबुद्ध बुद्ध की धरा प्रणम्य है वसुंधरा !   स्वराज्य स्वावलम्बिनी सदैव सत्य-संगिनी अजेय, श्रेय-मंडिता समाज-शास्त्र पंडिता !   अशोक चक्र-संयुते समुज्जवले, समुन्नते मनोज्ञ मुक्ति-मंत्रिणी विशाल लोक-तंत्रिणी !   अपार शस्य-सम्पदे अजस्त्र श्री पदे-पदे शुभंकरे प्रियम्वदे दया-क्षमा वंशवदे !   मनस्विनी तपस्विनी रणस्थली यशस्विनी कराल काल-कालिका प्रचंड मुंड-मालिका !   अमोघ शक्ति-धारिणी कराल कष्ट-वारिणी अदैन्य मंत्र दायिका नमामि राष्ट्र नायिका !

वीरों का कैसा हो वसंत- सुभद्रा कुमारी चौहान

वीरों का कैसा हो वसंत? आ रही हिमालय से पुकार है उदधि गरजता बार-बार प्राची-पश्चिम, भू नभ अपार. सब पूछ रहे हैं दिग-दिगंत वीरों का कैसा हो वसंत? फूली सरसों ने दिया रंग मधु लेकर आ पहुंचा अनंग वसु-वसुधा पुलकित अंग-अंग हैं वीर वेश में किंतु कंत वीरों का कैसा हो वसंत? गलबांही हो, या हो कृपाण चल-चितवन हो, या धनुष-बाण हो रस-विलास, या दलित त्राण अब यही समस्या है दुरंत वीरों का कैसा हो वसंत? भर रही कोकिला इधर तान मारू बाजे पर उधर गान है रंग और रण का विधान मिलने आए हैं आदि अंत वीरों का कैसा हो वसंत? कह दे अतीत अब मौन त्याग लंके! तुझमें क्यों लगी आग ऐ कुरुक्षेत्र ! अब जाग, जाग बतला अपने अनुभव अनंत वीरों का कैसा हो वसंत ? हल्दीघाटी के शिलाखंड ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचंड राणा-ताना का कर घमंड दो जगा आज स्मृतियाँ ज्वलंत वीरों का कैसा हो वसंत?

झंडा ऊंचा रहे हमारा- श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’

झंडा ऊंचा रहे हमारा. विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा .   सदा शक्ति बरसाने वाला, प्रेम सुधा सरसाने वाला, वीरों को हरषाने वाला, मातृभूमि का तन-मन सारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा.   स्वतंत्रता के भीषण रण में, लखकर जोश बढ़े क्षण-क्षण में, कांपे शत्रु देखकर मन में, मिट जावे भय संकट सारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा.   इस झंडे के नीचे निर्भय, हो स्वराज्य जनता का निश्चय, बोलो भारत माता की जय, स्वतंत्रता ही ध्येय हमारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा.   आओ प्यारे वीरों आओ, देश-जाति पर बलि-बलि जाओ, एक साथ सब मिलकर गाओ, प्यारा भारत देश हमारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा.   इसकी शान न जाने पावे, चाहे जान भले ही जावे, विश्व-विजय करके दिखलावे, तब होवे प्रण-पूर्ण हमारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा.  

शहीदों की चिताओं पर- जगदम्बा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’

उरूजे कामयाबी पर कभी हिन्दोस्तां होगा | रिहा सैय्याद के हाथों से अपना आशियां होगा || चखाएंगे मजा बर्बादिये गुलशन का गुलचीं को | बहार आ जाएगी उस दम जब अपना बागबां होगा || ये आए दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ खंजरे क़ातिल | पता कब फैसला उनके हमारे दरम्यां होगा || जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दे वतन हर्गिज़ | न जाने बाद मुर्दन मैं कहाँ और तू कहाँ होगा || वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है | सुना है आज मकतल में हमारा इम्तहां होगा || शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले | वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा || कभी वह भी दिन आएगा जब अपना राज देखेंगे| जब अपनी ही जमीं होगी और अपना आसमां होगा ||    

हस्तक्षेप – श्रीकांत वर्मा

कोई छींकता तक नहीं इस डर से कि मगध की शांति भंग न हो जाए, मगध को बनाए रखना है, तो, मगध में शांति रहनी ही चाहिए मगध है, तो शांति है कोई चीखता तक नहीं इस डर से कि मगध की व्‍यवस्‍था में दखल न पड़ जाए मगध में व्‍यवस्‍था रहनी ही चाहिए मगध में न रही तो कहाँ रहेगी? क्‍या कहेंगे लोग? लोगों का क्‍या? लोग तो यह भी कहते हैं मगध अब कहने को मगध है, रहने को नहीं कोई टोकता तक नहीं इस डर से कि मगध में टोकने का रिवाज न बन जाए एक बार शुरू होने पर कहीं नहीं रूकता हस्‍तक्षेप- वैसे तो मगध निवासियों कितना भी कतराओ तुम बच नहीं सकते हस्‍तक्षेप से- जब कोई नहीं करता तब नगर के बीच से गुज़रता हुआ मुर्दा यह प्रश्‍न कर हस्‍तक्षेप करता है- मनुष्‍य क्‍यों मरता है?

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