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माघ का महीना। समूचे उत्तर भारत में प्राणलेवा शीतलहरी कहर बरपा रही थी। चरिंद-परिंद सभी की जिन्दगियाँ  कुदरत के इस कहर से बेहाल थीं। लगता था कि लखनऊ शहर की रूमानियत और हलचल को गोमती से उठा कोहरा धीरे-धीरे लील रहा था। कई दिनों से सूर्य के दर्शन नहीं हुये थे, सो वक्त का अंदाजा लगाना मुश्किल हो रहा था। क्योंकि धुंध और कोहरा ही चहुं ओर फैला था। गालिबन बाद दोपहर का वक्त रहा होगा। हालांकि अंधेरा अभी हुआ न था,  मगर फिर भी लोगों ने दिया-बत्ती से घरों को रोशन कर दिया था। हाड़ कंपा देने वाली ठंड और बोझिल इंतजार ने उन तीनों का मन खट्टा कर दिया था। मूने, पंइया और बरसाती बड़ी बेचैनी से जोखन की प्रतीक्षा कर रहे थे। जो केलो की अन्त्येष्टि का सामान लेकर आने वाला था। वैसे वे सब साथ के ही पियक्कड़ थे, मगर केलो, जोखन का खास हमप्याला था। केलो काफी दिनों से जोखन को उधार दारू पिला रहा था। गाहे-ब-गाहे केलो नगदी से भी जोखन की मदद किया करता था। मगर नगदी के मुकाबले दारू की उधारी बहुत ज्यादा थी। ज्यादातर उधारियाँ जुबानी जमानत की ही थी जो केलो ने कल्लो मौसी को दी थी कि जोखन अगर दारू के कर्जे न चुका पाया, तो उसके कर्जे केलो चुकायेगा। केलो खुद को पहाड़ी राजपूत बताता था। जो जमानत के लिए अपनी मूंछो को ही पर्याप्त बताता था। तब कच्ची शराब बनाने और बेचने वाली कल्लो मौसी उसकी बड़ी-बड़ी और बेतरतीब मूंछो को ममतामयी दृष्टि से देखा करती थी, मगर अगले ही क्षण अपनी विधवा बहू कबरी पर केलो की आसक्ति को सोचकर क्रुद्ध भाव भंगिमायें बना लिया करती थी। मगर तब मन ही मन उसे इस बात की तसल्ली भी हुआ करती थी कि उसके न रह जाने पर कबरी को भूखों न मरना पडे़गा, भई…… केलो है ना। मगर केलो ही न रहा। आज उसी दारू की भट्ठी के नजदीक औंधी पड़ी केलो की लाश के समीप कल्लो मौसी अकारण ही अपने आंखो से बहते झर-झर आंसुओं को रोक नहीं पा रही थी। ये गम उधारी के डूब जाने के सबब था या सहारे के खोने की चिंता के जानिब, किसे पता? मौसी कभी केलो की लाश को देखती तो कभी कबरी को। कबरी, न तो केलो की लाश की तरफ देखती थी और न ही मौसी से नजरें मिलाने का साहस कर पा रही थी। वो सिर झुकाये, सिरके को हिला-डुला कर तल्लीनता से मिलाने का असफल प्रयत्न कर रही थी ताकि अगले दिन अच्छी, कच्ची शराब बन सके। हाथ काम पर था, नजरें नीची थी, दिल में रंज था कि कहीं दुख फट न पडे़। विलाप की चहुंओर चुगली हो सकती थी, सफाइयां देनी पड़ सकती थी कि किसी गैर मर्द के निधन पर वैधव्य का विलाप क्यों? वो भी कबरी द्वारा। जिसे उसका पति कोढ़िन समझता था और सफेदा (ल्यूकोडर्मा) के दाग के कारण पहले उसे चितकबरी कहा करता था जो कि पुकारने की सुविधा हेतु कबरी बन गया। वैसे उसका नाम लक्ष्मी था। उसका पति लल्लन गुजर गया था। करीब अठारह वर्ष पहले, मगर कबरी नाम उसका तभी से पड़ा था। अब तक खुद वो अपना नाम लक्ष्मी भूल चुकी थी। फिर ये दुख उस केलो की खातिर क्यों था, जिसने कि एक गैर-जिम्मेदार जीवन जिया था। खाये-पिये, मस्त………..? कबरी को चाहने और उसके असरहीन विरोध के बावजूद उसे छूने से इसलिये घबराता था क्योंकि वो सफेदा को कोढ़ ही समझता था, जो कि कबरी को छूने से उसे भी हो सकता था। आखिर वो केलो भी तो इस दारू की ठेकी का एक सामान्य ग्राहक था। इस दारू की ठेकी पर हर किस्म के पियक्कड़ आते थे। शरीफ, बदमाश, चोर-दगाबाज से लेकर पंडा-पुजारी तक इस सस्ती दारू के तलबगार थे। कुछ यहीं पीते थे कुछ बंधवाकर ले जाते थे। गोमती तट पर बसी इन अनियोजित झुग्गियों में दारू बनाकर बेचना सरकार की नजरों में भले ही अवैध हो, मगर इस समाज में इसे एक कुटीर उद्योग माना जाता था जो कि श्रम एवं पूंजी से संचालित होता था एवं जहां गुणवत्ता  की गारण्टी देनी पड़ती थी। अचानक कबरी उठी, मौसी की मनोदशा को भांपते हुये और बगैर उससे कुछ कहे वो घाट की तरफ चल दी। वहां उन तीनों ठिठुरती प्राणियों से उसने संयत स्वर में कहा ‘‘लाश कब तक रोके रहोगे, टेम हो रहा है। मौसी बिगड़ रही है’’। प्रयक्षतः स्वर से रूखाई एवं उकताहट का इम्कान होता था मगर हकीकतन ये एक टीस भरा विलाप था ’’जा तन लोग, वा तन जाने’’। वे तीनों अवधी में प्रचलित क्लासिक गालियां जोखन के लिये बकते हुये भट्ठी पर पहुंचे। वे मौसी की शक्ल देखकर ही उसकी नाराजगी जान चुके थे। उन्होंने दो अद्धे (शराब की आधी भरी बोतल) लिये। जिन्हें देते हुये मौसी बड़बड़ाई। मौसी की नाराजगी को कम करने के लिये दुख की इस घड़ी में भी पंइया खींसे निपोर कर बोला ‘‘माघ की ठंडी है। कलेजा तक ठिठुरा जाता है। मुर्दा पहुंचाने जा रहे हैं। हमें खुद मुर्दा नहीं होना है। लाओ एक-एक गिलास लगा लें। सब इस शीतलहरी से बचे रहेंगे’’। मौसी टली नहीं। वो कुढ़ती, बड़बड़ाती और गरियाती रही। मगर कबरी जान चुकी थी कि बात चली है तो पिये बगैर ये लोग यहां से न हिलेंगे। और अगर ये लोग छिटक गये तो फिर इतने आदमियों को जोड़ना मुहाल हो जायेगा। तो फिर लाश की दुर्गति हो सकती है। जो उसे कतई गवारा न थी। वो मौसी की रजामंदी की परवाह किये बिना झट से गिलास ले आई। इस बार पीने के साथ खाने के लिये चना या चटनी की फरमाइश न हुई। बेशक उनमें स्वार्थ था मगर मौके की नजाकत भांपते हुये मानवीय संवेदना उनमें भी जागी। अब तक पराया समझकर केलो की लाश को हिकारत से देखने वाले उसके साथियों ने शराब पीते ही उसे अपनेपन से देखना शुरू कर दिया। ये वही शराब है, जिस पर इल्जाम है कि ये इंसान को जानवर बना देती है। मगर यहां पशुता की स्वार्थ सिद्धि तजकर, शराब पाते ही उन पियक्कड़ों में मनुष्यत्व की संवेदनायें जागृत हो गयी थीं।

उन सभी ने थोड़ी-थोड़ी ही पी थी सो नशे का सवाल ही पैदा नहीं होता था। उनकी आंखों से आंसुओ की बूंदे शराब पीने के बाद ही टपकी थीं। ऐसे गमजदा हुये कि मानो पियक्कड़ केलो नहीं, बल्कि उनका कोई सगा, संबंधी गुजर गया हो। जोखन अब तक न आया था। सो इंतजार बेमानी था। जोखन को श्राप देते हुये मूने ने कोई गंदी सी गाली दी, जिसका बरसाती ने समर्थन किया। पंइया ने बात आगे बढ़ाते हुये केलो के मानवता के महान गुणों का वर्णन करने की शुरूआत थी, ताकि उसकी मृत्यु महत्वपूर्ण बन सके। तब तक मौसी ने उन सभी को डपटा ‘‘टेम देखो टेम। बतकही बात में’’। मौसी बखूबी जानती थी कि भले ही विद्युत शवदाह गृह में केलो की कर्माही होनी थी, खर्चा तो लगेगा ही। सो पहले से बुलाये गये टेम्पो चालक को मौसी ने सौ का तुड़ा-मुड़ा नोट देते हुये आंखो के इशारे से तत्काल प्रस्थान का आदेश दिया। मौसी ने कबरी को देखा तो कबरी सहम गयी। विधि विरूद्ध होने के बावजूद कबरी घर के अंदर से एक लोटे में गंगा जल ले आयी। भट्ठी से सटे पडे़ केलो के हाथों को हटाकर भट्ठी से मृत शरीर की स्पर्शता समाप्त की और केलो के मुंह में गंगाजल डाल दिया। टेम्पो चालक और उन तीनों ने मिलकर जब केलो की अर्थी उठायी तो मौसी फफक-फफककर रो पड़ी। रोते-रोते उन्होंने कबरी से कहा ‘‘दुल्हिन ठाकुर के पांव छू लेव। बहुत मरजादी पुरूष रहे, बड़ा पुण्य मिलेगा। राम इन्हैं सरग में जगह देंय’’। कबरी को दुख जरूर था। मगर स्त्रीत्व के भी अपने तर्क थे। लाज की बंदिशें थीं। सो चार बाहरी पुरूषों के समक्ष किसी गैर मर्द के पांव छूना कबरी को गवारा न हुआ। क्योंकि बात का बतंगड बन सकता था। नियति अपना दांव चल चुकी थी सो बतंगड़ को बात भी न बनने दिया गया। वैसे केलो के घरजमाई बनने में देर ही कितनी थी। प्रभावहीन विरोध के साथ मौन स्वीकृतियां भी थीं। केलो और कबरी उम्र के उस पड़ाव पर थे, जहां शारीरिक आकर्षण गौण हो चले थे। उन्हें एक दूसरे के साथ का पूरा आसरा था, भले ही वे रहते दूर-दूर थे। मौसी भी एक हद तक निश्चिन्त हो चली थीं कि उनके बाद कबरी को भीख मांगकर गुजारा नहीं करना पडे़गा क्योंकि पचास वर्ष के बाद की असहाय स्त्री इस बस्ती में किसी काम की न रह जाती थी। टेम्पो वाले की चीख ने उन दोनों महिलाओं की तन्द्रा भंग की और वे वर्तमान में लौट आयी, टेम्पो जा चुका था। बर्फीली हवाओं से बचने के लिये किवाड़ बन्द कर लिये गये। जहां केलो का मृत शरीर पड़ा था उस स्थान को लीप कर नहाने का हुक्म कबरी को मौसी ने दिया। लीपने से पूर्व उस स्थान की मिट्टी को कबरी ने अपने मुंह और मांग पर रगड़ लिया फिर लीपा। बन्द किवाड़ों के पीछे विलाप पर पर्दा न था। वैधव्य के आंसुओं से उसका चेहरा तर हो गया था। वो नहाने गयी तो पानी से धुलने के बजाय झाड़-पोंछकर चेहरे और मांग की मिट्टी को एक कपड़े में बांध लिया। इस मिट्टी की पोटली को संभालकर उन आभूषणों के साथ संदूक में रख दिया, जो उसने लल्लन की विधवा होने के बाद आज तक नहीं पहने थे। आभूषण और मिट्टी की पोटलियां उसके जीवन में आये दो पुरूषों की निशानियां थीं। अबला नारी फूट-फूट कर रोने लगी तो मौसी ने उसे ढाढ़स बंधाया। दोनों बड़ी देर तक आलिंगन बद्ध होकर फूट-फूटकर, बिलख-बिलखकर और हिचकियां लेते हुये रोती रहीं। वे जानती थीं कि इन आंसुओं का बहना मुफीद है, जिन्दा रहने के लिये। उधर वे तीनों गरियाते-श्रापते कोसते भैंसाकुण्ड पहुँचे, जिनका केन्द्र बिन्दु जोखन ही था। रास्ते में टेम्पों पर लटककर बैठा होने के कारण ठोकर लगने से बरसाती के पांव में चोट भी लग गयी थी। सो वो रास्ते भर कलपता-कराहता रहा और केलो को बद्दुआयें भी देता रहा। भैंसाकुण्ड पर भी बहुत भीड़ थी। श्मशान में इतनी बड़ी भीड़ कौतूहल का सबब थी। तमाम आला अफसरान और पुलिस की गारद भी मौजूद थी, लिखा-पढ़ी चल रही थी। बयान न सिर्फ लिये जा रहे थे बल्कि लिखे और रिकार्ड भी किया जा रहे थे। खबरनवीस, टी0वी0 चैनलों के नुमाइंदे, गमजदा परिवार वाले मातम पुर्सी के तमाशबीनों की खासी तादाद मौजूद थी। दरयाफ्त की गयी कि गुलजारे-श्मशान की वजह क्या है? पता चला कि गोमती नदी के निचले इलाके की कच्ची बस्ती में जहरें की शराब पीने से गुजरी रात कई लोग गुजर गये और अभी भी तमाम लोगों के मरने की उम्मीद है। तमाम लाशें आ चुकी थीं, पता नहीं अभी कितनी और आयेंगी। देर-सबेर हो सकती है इस मुकाम पर फिर पुलिस जॉच हो गयी तो लेने के देने। हम चारों अंदर हो सकते हैं। फिर केलो का पोस्टमार्टम, लाश लावारिस हो जायेगी। क्योंकि सगे वालों की तलाश होगी। मगर इतनी जांच-पड़ताल क्यों? अरे सबकी मौत का मुआवजा जो बँटना है भाई। कहीं गलत आदमी को चेक न मिल जाये तो लेने के देने पड़ जाये। मगर इस सबसे बड़ा खतरा पुलिस की पूछ-तांछ का था, जिससे हर शख्स हर्गिज-हर्गिज बचना चाहता था। उन्होंने विद्युत चालित शवगृह से पिंड छुड़ाया और वहाँ से चलने को हुये तब तक दूसरे टेम्पों से जोखन उतरता दिखा। वो अंत्येष्टि का सामान्य लिये हुये था। वह कुछ पूछता इससे पहले ही जोखन को खींचकर वे पांचों केलो के मृत शरीर के साथ पुनः टेम्पों में सवार हुये और उन्होंने गोमती के निचले इलाके में बसी एक दूसरी बदनाम बस्ती बसारत पुरवा की तरफ कूच कर दिया। जोखू ने रास्ते में वापसी का सबब पूछा तो उसके तीनों पियक्कड़ मित्रों ने इन्तजार कराने की एवज में उसी अवधी में प्रचलित सारी अति वर्जित गालियाँ दे डाली। इतंजार का डाह निष्पादित करने के पश्चात उन्होंने बताया कि पुलिस के लफडे़ से बचने के लिये वे लोग वहाँ से उल्टे पाँव भागे है। बरसाती ने पुनः अपनी चोट के लिये केलो और जोखन को बारी-बारी से कोसा। अब तक माघ की सर्दी जानलेवा दुश्मन की शक्ल में हाजिर हो चुकी थी। ठंड नसों में उतरती महसूस हो रही थी। कोहरा गोमती नदी के अस्तित्व को झुठला रहा था। धुंए और फाहों की गझिनता इतनी थी कि हाथ को हाथ तक न सूझता था। इसी सर्दी से जूझते हुये उन चारों ने लाश नीचे उतारी, टेम्पो वाला इस बार की किसी अनहोनी की आशंका से बढ़ा हुआ किराया मांगे बिना नौ दो ग्यारह हो गया। मौसम की मार और अनहोनियों से जूझते हुये उन चारों को इम्कान होने लगा था कि आज केलो का दाह संस्कार होना मुश्किल है। मगर कभी-कभार दूसरों की मुसीबतें किसी-किसी के लिये राहत भी बन जाती हैं। सर्दी ने लखनऊ में तमाम जाने ली थीं, सो तीन-चार वहां भी जलने की कतार में थीं। उन्होंने पंडित से बात की। हामी हो गयी। सबकी जेबें टटोली गयीं। सारे खर्चों और वापसी के किराये के अनुमान के बावजूद उनकी जेब में डेढ दो सौ रूपये बच रहे थे। उन सबों को किसी प्रकार की जल्दी न थी। मगर बाकी के लोगों के परिवार वाले ठंड से कांप रहे थे। वे जल्दी-जल्दी को रट लगाये थे और ज्यादा पैसे देने का प्रलोभन भी दे रहे थे। मगर प्रकृति की मार के कारण उस शीतलहर में लाशें बहुत वेग से न जल पा रही थी। वहाँ मौजूद सभी लोगों के चेहरों पर बेचैनी, अकुलाहट एवं झुंझलाहट थी। इधर ये चारों सर्द हवाओं की मार से पस्त थे। समय था, पैसा बच रहा था, सर्दी थी ही, तो क्या रोड़ा था। रखवाली, किसकी रखवाली? मुर्दा लेकर कौन भागेगा? फिर भी पंडित को मुर्दे की खैरियत तकाकर वे चारों किसी पास की दारू की ठेकी की तलाश में निकल पडे़। उन्हें आधे घण्टे में वापसी की ताकीद की गयी थी, जो कबूल थी। उन्हें कौन सा ठेकी पर धूनी रमानी थी। चलते-चलते वे हनुमान सेतु तक आ गये। सेतु तक आ गये थे, तो लगे हाथ हनुमान जी को उन्होंने प्रणाम किया और मंदिर के पिछवाडे़ से ही सटी बांस की फट्ठी से बनी पुलिया पर से उतरकर वे ठेकी पर पहुँच गये। वहां उन्होंने उन सारे पैसों की शराब पी, जो कर्माही के बाद बचने थे। सर्दी की सुरसुराहट से जूझते हुये उन्होंने अद्धो के कई दौर चलाये सो उन्हें घंटो लग गये।

                इस बेतरतीब बैठक में उन्होंने केलो के सद्गुणों को याद किया, अवगुणां के जिक्र से परहेज किया और एक अच्छे साथी को खोने के गम में फूट-फूट कर रोये भी, भले ही नशे के आवेग में। जब तक उन्हें अपनी वापसी के सबब याद आते। पौने छः बज चुके थे, जबकि पंडित ने उन्हें हर हाल में सवा पांच तक लौट आने की ताकीद की थी। केलो का जिक्र आते ही वे यों फिक्रमन्द हो गये, मानो केलो मुर्दा न होकर मरीज हो, जिसकी हालत गुजरते वक्त के साथ बिगड़ती चली जा रही हो। देरी की वजह से हल्कान मुर्दे के खैरख्वाह खुद को और एक दूसरे को कोसते हुये वहां से भागे। नशा काफूर हो चुका था। जिम्मेदारियों ने उन्हें बेचैन कर दिया था। एक दूसरे के आगे पीछे चलते हुये वे केलो के जिस्म के पास पहुँचे तो उन्हें तसल्ली हुई कि मुर्दा सही-सलामत था, तो उनके चेहरों पर जिन्दगी की अलामतें लौट आयीं थी। उनकी फिक्र बिला वजह न थी। क्योंकि मूने और बरसाती ने एक बार मुर्दा चुराया था और उसे बेच भी दिया था तीन हजार में। किसी मेडिकल-वेडिकल के लाइन के आदमी को। वे लोग केलो को चुराकर क्या कर सकते थे-क्या पता? इसीलिये इन चारों का मुर्दे के लिए डर लाजिमी था। तहजीब और नफासत के शहर लखनऊ में जिन्दा मुर्दा कोई सलामत न था। आनन-फानन में अन्त्येष्टि की तैयारी हो गयी। छः बज चुके थे। सारी तैयारियां होने के बाद पंडित कल्लू शुक्ल को मंत्रोच्चार हेतु बुलाया गया। मगर पंडित जी के प्रस्ताव ने तो उन चारों को बेचैन कर दिया। ठंड और देरी का चक्रवृद्धि व्याज लगाते हुये उन्होंने अपने मेहनताने की रकम को तीन गुना कर दिया था। पंडितजी को पता था कि इतनी देर हो जाने के कारण कोई दूसरा पंडित उन्हें नहीं मिलेगा, फिर पंडितजी को खुन्नस भी हो गयी थी कि इन मुओं के पास दारू में उड़ाने के पैसे हैं तो फिर अन्त्येष्टि सस्ते में वे क्यों करें। मगर मोल-भाव करते-करते ड्योढ़ी रकम पर मामला तय हो गया। फिर जब रकम जोड़ी गयी तो वो उतनी ही थी जितनी कि पीने के बाद बची थी। कल्लू शुक्ला टस से मस न हुये। मुर्दे की रखवाली, जानलेवा शीतलहरी और इतने इन्तजार के बाद, श्मशान में उधारी नहीं चलेगी। पंडितजी ने अपना अनुभव बताया कि श्मशान और जुए की उधारी कभी किसी ने लौटकर नहीं चुकायी है। सो उधारी कबूल न हुई। गिड़गिड़ाना, कसम, आश्वासन से पंडितजी का रोज का वास्ता था इस श्मशान में। सो वे न पसीजे। सर्दी बढ़ रही थी। पूरी रकम शुक्लाजी के सामने थी। उन्हें रस महसूस न हुआ। कुद्ध दृष्टि से पहले उन्होंने पहले रकम को देखा, फिर उन चारों को। उन्होंने ‘राम-राम’ कहा और वो चलते बने। वे चारों किंकर्तव्यविमूढ़ थे। अंधेरा और सर्दी बढ़ रही थी। घाट सूने हो रहे थे। उनकी संवेदनायें जेब के अर्थशास्त्र से हार चुकी थी। अन्तिम विकल्प यानी मंत्र किसे आते थे, मगर ईश्वर में आस्था तो थी, उसी को सर्वोपरि मानकर तौर तरीकों के लिये माफी मांगी गयी। चिता को तीन बार वे तीनों घूमें। बरसाती दूर ही खड़ा रहा। मूने चिता को तीन बार घूम कर बोला-‘‘हे ब्रह्मा जी, केलो स्वर्ग आ रहा है’’। ऐसा ही जोखन ने किया, तीन बार घूम कर हाथ जोड़कर बोला-‘‘हे बिष्णु महराज, केलो को स्वर्ग में ले लेना’’। पुनः पंइया ने भी ऐसा ही किया- हे शंकरजी, केलो की स्वर्ग यात्रा आसान करना’’। तीनों हाथ जोड़कर खडे़ हो गये तो बरसाती हाथ उठाकर बोला, ‘‘केलो, इस दुनिया में एक अच्छा आदमी था वो मरकर भी खुश रहेगा’’ और फिर केलो की चिता जला दी गयी। चिता जलते ही वे आहलादित हो गये। उनके चेहरों पर उल्लास था। अन्त्येष्टि की चिन्ता काफूर हो चुकी थी। चिता से निकलती लपटों और उसमें जलते केलो के जिस्म से वे केलो को साक्षात स्वर्ग जाता देख रहे थे। मूने बोला, ‘‘केलो धांसू आदमी था। भगवान इसे स्वर्ग ही भेजना। मेरे हिस्से का पुण्य भी इसे ही दे देना, अगर कम पडे़ तो’’। पंइया भी धीरे से बोला ‘‘केलो ने कभी किसी का दिल नहीं दुखाया। जानकीनाथ इसकी सब भूल-चूक माफ करना और इसे स्वर्ग में ही लेना’’। बरसाती मुस्कराते हुये बोला ‘‘या अल्लाह, फिर गड़बड़ा गया। हे भगवान, केलो को स्वर्ग ही भेजना। उसके जाने से किसी का रास्ता जो साफ हो गया, क्यों बे जोखना’’। जोखन ने कबरी को लेकर कहे गये बरसाती के कुटिल व्यंग्य पर एक गंदी सी गाली दी, फिर ठंडी आह भरते हुये बोला ‘‘हाँ भगवान, केलो भाई को स्वर्ग ही भेजना। मुझे बहुत उधार दारू पिलाई उसने। बड़ा मरदराज आदमी था। कबरी को उसने नहीं छोड़ा, जबकि जानता था कि उसे सफेदा है। भगवान, स्वर्ग ही देना। मूने ने पूछा ‘‘का फर्क है कोढ़ और सफेदा में। केलो भाई को जाने से तो कबरी रांड़ हो जायेगी।

जोखन ने मूने को गरियाते हुये कहा ‘‘भगवान केलो भाई की आत्मा को शान्ति दे। मगर कबरी कहां भला केलो से अहिबाती (सुहागन) थी। क्यों मियां‘’? बरसाती की तरफ देखते हुये जोखन ने अपनी बात पूरी की। बरसाती गुर्राते हुए बोला ‘‘अब चुप भी करो रांड़ के जनों। ये श्मशान है, दिल्लगी का अड्डा नहीं। कबरी की बात छोड़, केलो भाई की बात कर’’। अपने-अपने हाथ जोड़कर अपने-अपने इष्ट देवों को उन्होंने केलो को समर्पित किया। बरसाती ने पहले दुआ के लिये हाथ उठाये थे, मगर तड़ाक से प्रार्थना हेतु हाथ जोड़ दिये अन्य तीनों की भांति। मिनट भर बाद ही, अपने-अपने भगवानों को उन्होंने केलो की मृत्यु के बाद की औपचारिकताओं हेतु तका किया। फौरन उन्होंने श्मशान के सेवक को बुलाकर कहा कि वो देर-सबेर केलो की अस्थियां गोमती में प्रवाहित कर दें। उन्होंने अपने सम्मिलित रकम का आधा हिस्सा उस सेवक को दे दिया। हालॉकि उस सेवक में विसर्जन का ये काम महज एक अद्धे में कर देने का वादा किया। मगर वे चारों जानते थे कि दारू की एवज में दिये गये वचन बहुत ही पक्के होते हैं। फिर वे हजरात इस रकम को बचाना बेमानी और फिजूल समझते थे। मूने ने समझाया कि सब नदियाँ आपस में बहनें होती हैं। अस्थियां चाहे गंगा में डालो या गोमती में। बात एक ही होती है। तीनों ने उनकी बात का समर्थन किया और सेवक ने सहमति दे दी। पैसे फिर भी बच रहे थे। दुःख था, सर्दी थी। जिम्मेदारी उतारने की संतुष्टि भी थी फिर इन्तजार किसका था? कुछ घंटे बाद वे लुढ़कते सुबकते मौसी के ठेकी पर हाजिर थे। ठेकी आज सिर्फ उन चारों हेतु ही खुली थी। मौसी ने बताया कि देर से नहाने के कारण कबरी को बुखार चढ़ गया है मगर उन चारों का खाना उसने फिर भी बना दिया था। वे चारों अद्धे की बोतलों में पानी मिला-मिलाकर उसे पूरा करके पी रहे थे और केलो की यादों को ताजा कर रहे थे। उनकी बतकही से मौसी कुढ़ रही थी, कि बिना ब्राह्मण के की गयी अन्त्येष्टि केलो के स्वर्ग जाने में बाधक थी। सो उन लोगों ने अनर्थ कर डाला। मगर वे चारो आश्वस्त थे कि उन्होंने केलो की कर्माही पूरे मन से की है। भगवान ने उनकी प्रार्थना अवश्य सुनी होगी। केलो जरूर स्वर्ग जायेगा। मौसी लगातार बड़बड़ाये जा रही थी। दूसरे कमरे में पड़ी कबरी सिसक रही थी और वे चारों पीते-पीते फफक कर रो पडते़ थे। कुहरा बढ़ता जा रहा था। रात गहराती जा रही थी।

                                                ……………………समाप्त

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दिलीप कुमार

दिलीप कुमार

1980में जन्म , दो कथा संग्रह, एक उपन्यास प्रकाशित, कथा, व्यंग्य, लघुकथा विधा में लेखन , सम्प्रति-सरकारी सेवा , सम्पर्क 9454819660 ईमेल-jagmagjugnu84@gmail.com, लेखन हेतु कई पुरस्कार/सम्मान प्राप्त
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