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लिहाफ- इस्मत चुगताई

इस्मत चुगताई

इस्मत चुगताई जी का जन्म बदायूं के एक उच्च वर्गीय परिवार में हुआ . वंश परंपरा से वे मुग़ल खानदान से जुड़ी थीं. पिता जज थे सो आपा को कई शहरों में रहने का अनुभव मिला. छह भाइयों की बहन होने की वजह से इस्मत आपा का बचपन में ‘टाम ब्वाय ‘ व्यक्तित्व रहा. वही अक्खड़पन और स्पष्टवादिता जीवन भर उनके पर्सोना के अंग रहे .बड़े भाई मशहूर अफसानानिगार थे,लेकिन आपा ने उनसे अलग अपनी एक पहचान बनाई. समलैंगिक स्त्री संबंधों पर आधारित कहानी ‘लिहाफ’ लिखने पर इस्मत आपा को 1944 में मुकदमे का सामना करना पड़ा था. लेखक-निर्देशक शाहिद लतीफ से उनकी शादी हुई . आपा की लिखी लंबी कहानी पर ‘गरम हवा ‘ फिल्म बनी है. चौबीस अक्टूबर उन्नीस सौ पचानबे को आपा का देहान्त हुआ. उनकी वसीयत के मुताबिक उनका दाहसंस्कार हुआ. आज की दस तथाकथित आधुनिक और सेकुलर लेखिकाओं (और लेखकों) से कहीं ज्यादा आधुनिक और सेकुलर थीं आपा.जन्मदिन की कोटिशः शुभकामनायें,आपा !आप अपनी किताबों में हमेशा जिन्दा हैं और रहेंगीं. इस्मत चुगताई जैसे लोग कहीं मरा करते हैं?  उनके  जन्मदिन के मौके पर प्रस्तुत है  ‘लिहाफ़’ …उनकी  सर्वाधिक चर्चित  और उतनी  ही विवादास्पद कहानी. (प्रस्तुति  : गजानन रैना )

जब मैं जाड़ों में लिहाफ ओढ़ती हूं, तो पास की दीवार पर उसकी परछाई हाथी की तरह झूमती हुई मालूम होती है और एकदम से मेरा दिमाग बीती हुई दुनिया के पर्दों में दौडने-भागने लगता है. न जाने क्या कुछ याद आने लगता है.

माफ कीजिएगा, मैं आपको खुद अपने लिहाफ का रूमानअंगेज जिक्र बताने नहीं जा रही हूं. न लिहाफ से किसी किस्म का रूमान जोड़ा ही जा सकता है. मेरे ख़याल में कम्बल कम आरामदेह सही, मगर उसकी परछाई इतनी भयानक नहीं होती जितनी, जब लिहाफ की परछाई दीवार पर डगमगा रही हो. यह जब का जिक्र है, जब मैं छोटी-सी थी और दिन-भर भाइयों और उनके दोस्तों के साथ मार-कुटाई में गुज़ार दिया करती थी. कभी-कभी मुझे ख्याल आता कि मैं कमबख्त इतनी लड़ाका क्यों थी? उस उम्र में जबकि मेरी और बहनें आशिक जमा कर रही थीं. मैं अपने-पराये हर लड़के और लड़की से जूतम-पैजार में मशगूल थी.

यही वजह थी कि अम्मा जब आगरा जाने लगीं तो हफ्ता-भर के लिए मुझे अपनी एक मुंहबोली बहन के पास छोड़ गईं. उनके यहां अम्मा खूब जानती थीं कि चूहे का बच्चा भी नहीं और मैं किसी से भी लड़-भिड़ न सकूंगी. सजा तो खूब थी मेरी! हां, तो अम्मा मुझे बेगम जान के पास छोड़ गईं. वही बेगम जान जिनका लिहाफ अब तक मेरे जहन में गर्म लोहे के दाग की तरह महफूज है. ये वो बेगम जान थीं जिनके गरीब मां-बाप ने नवाब साहब को इसलिए दामाद बना लिया कि वह पकी उम्र के थे मगर निहायत नेक. कभी कोई रण्डी या बाजारी औरत उनके यहां नजर न आई. खुद हाजी थे और बहुतों को हज करा चुके थे.

मगर उन्हें एक निहायत अजीबो-गरीब शौक था. लोगों को कबूतर पालने का जुनून होता है, बटेरें लड़ाते हैं, मुर्गबाजी करते हैं, इस किस्म के वाहियात खेलों से नवाब साहब को नफरत थी. उनके यहां तो बस तालिब इल्म रहते थे. नौजवान, गोरे-गोरे, पतली कमरों के लड़के, जिनका खर्च वे खुद बर्दाश्त करते थे. मगर बेगम जान से शादी करके तो वे उन्हें कुल साजो-सामान के साथ ही घर में रखकर भूल गए और वह बेचारी दुबली-पतली नाजुक-सी बेगम तन्हाई के गम में घुलने लगीं. न जाने उनकी जिन्दगी कहां से शुरू होती है? वहां से जब वह पैदा होने की गलती कर चुकी थीं, या वहां से जब एक नवाब की बेगम बनकर आयीं और छपरखट पर जिन्दगी गुजारने लगीं या जब से नवाब साहब के यहां लड़कों का जोर बंधा. उनके लिए मुरग्गन हलवे और लजीज खाने जाने लगे और बेगम जान दीवानखाने की दरारों में से उनकी लचकती कमरोंवाले लड़कों की चुस्त पिण्डलियां और मोअत्तर बारीक शबनम के कुर्ते देख-देखकर अंगारों पर लोटने लगीं.

या जब से वह मन्नतों-मुरादों से हार गईं. चिल्ले बंधे और टोटके और रातों की वजीफाख्वानी भी चित हो गई. कहीं पत्थर में जोंक लगती है! नवाब साहब अपनी जगह से टस-से-मस न हुए. फिर बेगम जान का दिल टूट गया और वह इल्म की तरफ मोतवज्जो हुई. लेकिन यहां भी उन्हें कुछ न मिला. इश्किया नावेल और जज्बाती अशआर पढ़कर और भी पस्ती छा गई. रात की नींद भी हाथ से गई और बेगम जान जी-जान छोड़कर बिल्कुल ही यासो-हसरत की पोट बन गईं. चूल्हे में डाला था ऐसा कपड़ा-लत्ता. कपड़ा पहना जाता है किसी पर रोब गांठने के लिए. अब न तो नवाब साहब को फुर्सत कि शबनमी कुर्तों को छोड़कर जरा इधर तवज्जो करें और न वे उन्हें कहीं आने-जाने देते. जब से बेगम जान ब्याहकर आई थीं, रिश्तेदार आकर महीनों रहते और चले जाते, मगर वह बेचारी कैद की कैद रहतीं.

उन रिश्तेदारों को देखकर और भी उनका खून जलता था कि सबके-सब मज़े से माल उड़ाने, उम्दा घी निगलने, जाड़े का साज़ो-सामान बनवाने आन मरते और वह बावजूद नई रूई के लिहाफ के पड़ी सर्दी में अकड़ा करतीं. हर करवट पर लिहाफ नईं-नईं सूरतें बनाकर दीवार पर साया डालता. मगर कोई भी साया ऐसा न था जो उन्हें जिन्दा रखने लिए काफी हो. मगर क्यों जिये फिर कोई? ज़िन्दगी! बेगम जान की ज़िन्दगी जो थी! जीना बंदा था नसीबों में, वह फिर जीने लगीं और खूब जीं. रब्बो ने उन्हें नीचे गिरते-गिरते संभाल लिया. चटपट देखते-देखते उनका सूखा जिस्म भरना शुरू हुआ. गाल चमक उठे और हुस्न फूट निकला. एक अजीबो-गरीब तेल की मालिश से बेगम जान में जिन्दगी की झलक आई. माफ कीजिएगा, उस तेल का नुस्खा आपको बेहतरीन-से-बेहतरीन रिसाले में भी न मिलेगा.

जब मैंने बेगम जान को देखा तो वह चालीस-बयालीस की होंगी. ओफ्फोह! किस शान से वह मसनद पर नीमदराज थीं और रब्बो उनकी पीठ से लगी बैठी कमर दबा रही थी. एक ऊदे रंग का दुशाला उनके पैरों पर पड़ा था और वह महारानी की तरह शानदार मालूम हो रही थीं. मुझे उनकी शक्ल बेइन्तहा पसन्द थी. मेरा जी चाहता था, घण्टों बिल्कुल पास से उनकी सूरत देखा करूं. उनकी रंगत बिल्कुल सफेद थी. नाम को सुर्खी का जिक्र नहीं और बाल स्याह और तेल में डूबे रहते थे. मैंने आज तक उनकी मांग ही बिगड़ी न देखी. क्या मजाल जो एक बाल इधर-उधर हो जाए. उनकी आंखें काली थीं और अबरू पर के ज़ायद बाल अलहदा कर देने से कमानें-सीं खिंची होती थीं. आंखें जरा तनी हुई रहती थीं. भारी-भारी फूले हुए पपोटे, मोटी-मोटी पलकें. सबसे जियाद जो उनके चेहरे पर हैरतअंगेज जाजिबे-नजर चीज थी. वह उनके होंठ थे. अमूमन वह सुर्खी से रंगे रहते थे. ऊपर के होंठ पर हल्की-हल्की मूंछें-सी थीं और कनपटियों पर लम्बे-लम्बे बाल. कभी-कभी उनका चेहरा देखते-देखते अजीब-सा लगने लगता था, कम उम्र लड़कों जैसा.

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