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“इज्जतदार घरों की लड़कियाँ इस तरह के गलत काम नहीं किया करतीं। जो घर बेइज्जत लोगों के हों, वहीं ऐसा होता है”,  एस0ओ0 प्रभुनाथ दहाड़ते हुये बोले। सुरेन्द्र ने कड़ा प्रतिवाद करते हुये तपाक से कहा ‘‘इसमें बेइज्जती की क्या बात है। लड़की मानसिक रूप से बीमार रहा करती थी। कुछ कम दिमाग की जन्म से थी वो, और फिर उसके कम दिमाग का होने से पूरा घर ही कैसे बेइज्जत लोगों का हो गया।“  पुलिसवाले को अपनी बात के इस तरह के प्रत्युत्तर की आशा न थी। उसने अपने नथुने फुलाये और आँखे चौड़ी की। वो किसी कड़े उत्तर की भूमिका बना ही रहा था कि नरेन्द्र बाबू ताड़ गये। नरेन्द्र बाबू ने नरम लहजे में बात को समेटने का प्रयास किया और मृदु स्वर में बोले ‘‘अरे सर, आजकल की इस नयी जेनेरेशन को क्या कहें। बिना सोचे-समझे इतना बड़ा कदम उठा लेती हैं, ये भी नहीं सोचते कि बाद में घरवाले किस मुँह से कानून और समाज का सामना करेंगे। किस-किस को सफाइयां देते फिरें हम, जबकि हम दोषी भी नहीं हैं सर।“  शिष्ट ढंग से कही गयी नरेन्द्र बाबू की मृदु बातों ने माहौल की तल्खी कुछ कम कर दी थी। पुलिसवाला कुछ-कुछ सहमत होता प्रतीत हो रहा था नरेन्द्र बाबू की बातों से। तभी सुरेन्द्र ने अपना नुक्ता पेश किया ‘‘अरे सर, अगर आप की छोटी बहन ऐसा कर देती तो आप क्या करते।“  पुलिस वाला हत्थे से उखड़ गया ‘‘मैं ऐसी नौबत ही नहीं आने देता। तेरी तरह इतने गये-गुजरे नहीं हैं हम लोग कि बहन-बेटियों की ऐसी गत बनायें। साला, अपने बराबर लगाता है।“  सुरेन्द्र का मुँह न्यून कोण की तरह बिगड़ा। नरेन्द्र बाबू थोड़ा और सहमें  ‘‘अब क्या होगा।“  मगर तब तक राय आ गया। आते ही बेवजह कुछ ज्यादा ही मुस्कराते हुये बोला ‘‘जय हिन्द सर।“  प्रभुनाथ ने सिर को हल्की सी जुंबिश दी और राय को गौर से देखा। लम्बी तगड़ी देह पर छोटा एवं मुँह ज्यादा खोल कर बात करने का विशेष अंदाज उसके चेहरे को खासा वीभत्स बना देता था। हमेशा की तरह राय के साथ तिवारी भी मौजूद था,  उसकी परछाईं के सदृश। तिवारी ने भी प्रभुनाथ को सलाम ठोंका,  मगर प्रभुनाथ ने जवाब नहीं दिया। अलबत्ता ‘‘जय हिन्द”  कहते  हुये तिवारी के पान की पीक का संतुलन होठों पर गड़बड़ा गया। तिवारी ने होंठो से गले तक का सफर तय कर चुकी पान की पीक को पहले शर्ट की कालर से पोंछा, उसने जब शेष बची पीक को शर्ट की बाँह से पोंछने का उपक्रम किया, तो प्रभुनाथ ने उसकी इस गन्दी आदत को हिकारत की नजर से देखा। प्रभुनाथ ने आँखों से ही सवाल दागा ‘‘यहाँ कैसे।“  वैसे भी रात के इस वक्त प्रभुनाथ को यहाँ किसी बाहरी व्यक्ति के मिलने की उम्मीद नहीं थी और किसी पुलिसवाले के मिल जाने की उम्मीद तो हर्गिज भी नहीं थी।

राय ने बातों में चाशनी घोलते हुये कहा ‘‘अरे सर, ये लोग रिलेशन में आते हैं, मौसी के लड़के लगते हैं।“  प्रभुनाथ ने पुनः लापरवाही से कहा ‘‘तो तुम इन्ही की जाति के हो, मैंने तो समझा था कि तुम……………हो।“  राय ने इस बार अपनी बातों में आत्मविश्वास की झलक पेश करते हुये कहा ‘‘नहीं सर, पूर्वांचल में हमारी जाति के लोग राय ही लिखते हैं।“  प्रभुनाथ के चेहरे पर आश्वासन के भाव न आये। उसने राय की बातों की उपेक्षा करते हुये खुद को तिवारी पर केन्द्रित करते हुये सवाल किया ‘‘और तुम इधर कैसे तिवारी।“  ‘‘सर, बस आपके दर्शन को चला आया। राय ने बताया था आप मिलेंगे। बस, आप ही के लिए आया हूँ”  खास पुलिसिया अंदाज में कहते हुये तिवारी ने अपने साहब को खुश करने की कोशिश की। तब तक सुरेन्द्र ने अपनी बुद्धिमता को व्यग्रता से प्रदर्शित करते हुये कहा ‘‘अरे साहब, हम सब एक ही जाति के तो हैं। कुछ ले देकर आपस में ही मामला रफा-दफा कर लीजिये।“  इस बार पुलिसवाले का धैर्य जवाब दे गया। प्रभुनाथ लगभग चीखते हुये बोले ‘‘इस नीच, कमीने को यहाँ से भगाओ,  नहीं तो सबको अन्दर कर दूँगा। भले ही लड़की आत्महत्या करके मरी है। मगर कानूनन तुम लोग भी गुनहगार हो, क्योंकि तुम्हीं लोगों ने ऐसे हालात पैदा किये कि मकतूला को खुदकशी करनी पड़ी। कायदे से पैरवी हो गयी तो तुम सब पर हत्या का मुकदमा चलेगा। एड़ियाँ रगड़-रगड़कर सबके सब मरोगे जेल में। हाईकोर्ट तक से जमानत नहीं होनी है तुम लोगों की। देखना कैसी केस-डायरी तैयार करता हूँ।“  अपनी बात को समाप्त करते हुये प्रभुनाथ ने अनगिनत माँ-बहन की गालियाँ भी बक डाली थीं। जेल की धमकी और पुलिसिया रूआब ने ऐसा असर दिखाया कि सब के सब सहम गये। राय ने पुनः माहौल को हल्का करने का प्रयास किया। उसने सुरेन्द्र को घुड़का ‘‘चूतिये कहीं के, साहब से बात करने की भी तमीज नहीं हैं।“  फिर वो प्रभुनाथ की तरफ मुखातिब हुआ ‘‘इसकी बात को मन से न लगायें सर। ये तो बिल्कुल बेवकूफ है। कुछ समझ ही नहीं पाता ये। आप पहले बैठिये तो साहब।“

तब जाकर सबको इस बात का इमकान हुआ कि साहब तो अभी तक खडे़ ही हैं। सब बैठ गये, सब चुप थे। कुछ खास बात जो होनी थी। राय ने आँखों ही आँखों में इशारा किया ‘‘तिवारी, तुम फूटो।“  तिवारी ने प्रतिवाद किया। किसी ने देखा नहीं, सुना नहीं। राय समझ गया। याचना हुयी, मिन्नतें हुईं और वास्ता तक दिया गया। अंततः तिवारी पसीज उठा। वो राय को राहत देते हुये बोला ‘‘अच्छा, मैं चलता हूँ। जय हिन्द सर।“  नरेन्द्र बाबू ने औपचारिकता निभायी ‘‘चाय तो पी लीजिये तिवारी जी।“  सुरेन्द्र तपाक से बोला ‘‘चाय बना कौन रहा है। घर की औरतें तो बगल के कमरे में बैठी यहाँ के हनुमान चालीसा का पाठ जो सुन रही हैं।“  राय जल्दी से बोला ‘‘तिवारी जी जल्दी में हैं। अभी इनकी शिफ्ट शुरू होने वाली होगी।“  हालाँकि तिवारी चाय पीकर ही जाना चाहता था। क्योंकि खाली हाथ लौटना उसने सात साल की नौकरी में सीखा ही नहीं था, चाय ही सही। मगर राय ने फिलहाल उसकी भी संभावना समाप्त कर दी थी। अंगारों पर लोटता हुआ और मन ही मन राय को गालियाँ देते हुये तिवारी वहाँ से विदा हुआ। राय ने चाकलेटी मुस्कान के साथ दाना डालना शुरू किया ‘‘अरे सर, बहुत भले लोग हैं। बडे़ ही इज्जतदार, बहुत सालों तक इनके दादाजी प्रधान रहे थे। स्वतंत्रता-संग्राम में जेल तक काटी थी उन्होंने। फैजाबाद में कौन इन लोगों को नहीं जानता। लड़की का दिमाग वास्तव में खराब था। वर्ना बिना किसी ठोस वजह के आत्महत्या जैसा बड़ा कदम क्यों उठाती।“  ‘‘मगर तुम्हारी पहली बहन के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था”  प्रभुनाथ ने खेले-खाये पुलिसिए की तरह सधा तीर छोड़ा।

“अरे साहब, हमारे घर-खानदान में लड़कियाँ छाजती ही नहीं हैं। सच यही है कि ये असर कई पुश्तों से चला आ रहा है साहब। मगर इस पीढ़ी की लड़कियों पर तो किसी ने कुछ करवा-धरवा दिया है” सुरेन्द्र ने भरसक दार्शनिकता का परिचय देते हुये कही ये बात। ‘‘शटअप”  प्रभुनाथ ने बात की समाप्ति का संकेत करते हुये फिल्मी अंदाज में घुड़की दी “ तुम लोग क्या समझते हो, पुलिस कुछ जानती समझती नहीं। मैं क्या यहाँ झक मारने आया हूँ। यहाँ आने से पहले मैंने तुम्हारे पूरे खानदान की केस-हिस्ट्री का पता लगा लिया है। तुम्हारी दूसरी बहन का मामला भी खुल सकता है। तब तो शर्तिया पूरे परिवार की जमानत हाईकोर्ट से भी नहीं होगी।“  प्रभुनाथ अपनी बात स्पष्ट रूप से कह नहीं पा रहे थे। या तो दोनों भाई प्रभुनाथ की बातों का मंतव्य समझना नहीं चाहते थे या शायद राय के आ जाने से उन दोनों की बुद्धि को ताले लग गये थे। मगर राय अपने स्टाफ के सीनियर की अनकही बात को समझ गया। उसने बात के मूल को पकड़ लेने का प्रदर्शन करते हुये कहा  ‘‘अरे सर, क्यों आप अपनी नींद खराब कर रहे हैं। सारे निष्कर्ष सुबह तक निकल आयेंगे। आप चलें सर, मैडम इन्तजार कर रही होंगी। मैं आप को छोड़ आता हूँ।“  प्रभुनाथ अपने विभागीय जूनियर की बुद्धिमत्ता पर मुग्ध हो उठे और लौटने लगे। राय ने भी उनका संग धरा।

प्रभुनाथ ने सोचा कि सुबह होने में देर ही कितनी है बस कुछ ही घंटे तो बाकी हैं। वो ये बात बेहतर जानते थे कि वो यहाँ ड्यूटी पर नहीं आये थे। तभी तो आधी रात को बिना स्टाफ, बिना जीप के अकेले आये थे। मगर पुलिसिया रूआब गालिब करने की ललक में वे बावर्दी और हथियार बन्द होकर आये थे।

प्रभुनाथ को इस बात की बड़ी तसल्ली थी कि उन्हें अपने मकसद की बात खुद अपने मुँह से नहीं कहनी पड़ी थी। क्योंकि राय सब कुछ समझ गया था। अब सारी जिम्मेदारी उसी की ही थी। अच्छा है, मुँह भी नहीं फाड़ना पड़ा और काम भी हो गया। कल का अगर कोई लफड़ा हो गया तो वो सब राय पर ही थोप देगा। वैसे भी किस-किस दर पर मुँह फाड़ने चले जाते हैं लोग। खुद लोग बड़े-बड़े अपराध करेंगे तब नहीं, और हम लोगों की जरा सी भी ऊपरी कमाई लोगों को कितनी अखरती है। अब इस युग में हरिश्चन्द्र बनने का ठेका क्या हमारे विभाग के लोगों ने ही ले रखा है। राय तकरीबन आधे घंटे बाद अपने सीनियर अफसर को विदा करके लौटा। हालांकि सुरेन्द्र के घर से उतनी दूरी का सफर बमुश्किल डेढ़ मिनट में तय कर सकता था। राय वहां से लौटते ही सोफे पर पसर गया। डर, व्यंग्य, तानों से सरोबार शब्द-बाणों से वो दोनों भाईयों को शर्मिन्दा करने लगा। राय ने माहौल ही ऐसा बनाया था मानो वो घर का बड़ा बेटा है, जो कमाऊ भी हैं और बड़ा भाई अपने छोटे भाइयों को जमाने की ऊँच-नींच समझा रहा हो। स्वाभाव के विपरीत नरेन्द्र बाबू हिम्मत जुटाते हुये बोले ‘‘सुरेन्द्र, तुम्हारी वजह से ही आज हमें ये दिन देखना पड़ रहा है’’। इससे पहले कि सुरेन्द्र अपने बडे़ भाई पर झपटता, राय ने उसे बीच में ही पकड़ लिया। सुरेन्द्र तिलमिलाया तो बहुत मगर राय की मजबूत पकड़ से छूट नहीं पाया। तब तक अम्मा कहीं से कराहती हुयी बोलीं ‘‘राय, इधर आ जा बेटा’’। राय वहाँ पहुँचा तो अम्मा ने राय के पांव पकड़ने का उपक्रम किया, मगर राय ने उन्हें बीच में ही रोक लिया। अम्मा याचना करते हुये बोलीं ’’मेरे घर को बचा लो बेटा, अब इस कुल की इज्जत मर्यादा तुम्हारे ही हाथ में हैं’’। राय ने उन्हें आश्वस्त किया ‘‘मैं हूँ अभी, सब संभाल लूँगा’’। हालाँकि ये भी विडम्बना ही थी कि इस सब के कर्ता-धर्ता राय ही थे। अम्मा सब जानती थीं। मगर खुलकर बोलने की उनकी कभी हिम्मत नहीं हुई थी, सुरेन्द्र के जुल्मों सितम के डर से। सुरेन्द्र, जो इण्टर भी नहीं पास हो पाया था। बमुश्किल उसका विवाह हुआ था। अल्लाम शराबी और शातिर चोर तो वो दाढ़ी उगने के पहले ही बन गया था। शायद ही दुनिया का ऐसा कोई दुष्कर्म होगा जिसमें सुरेन्द्र ने हाथ न आजमाये हों। बचपन से ही उसने घरवालों पर हाथ उठाना शुरू कर दिया था, और गालियाँ तो उसका तकिया-कलाम बन चुकी थीं। बीवी को अगर ‘कनिया’ कहकर बुलाता था, तो दोनों बहनों को जानवरों के नामों से मिश्रित गालियाँ दिया करता था। नरेन्द्र बाबू उससे सहमे ही रहते थे, क्योंकि बीवी के सामने वे अपने छोटे भाई से बेइज्जत नहीं होना चाहते थे। सुरेन्द्र ने अपने बाप को गांव में ही रख छोड़ा था, क्योंकि खेती कौन देखता और राशन लादकर शहर कौन पहुँचाता। दर्शन नगर गांव से देवकाली मोहल्ले तक सुरेन्द्र को सब जानते थे। सुरेन्द्र………..अय्याश, चोर, दगाबाज और न जाने क्या-क्या। काफी पहले जुआ और गिरोहबन्दी के जुर्म में एक बार सुरेन्द्र बन्द हुआ था। उसे छुड़ाने की पैरवी के दौरान किसी कालेज सहपाठी के साढ़ू के तौर पर नरेन्द्र बाबू का परिचय राय से हुआ था। तब रिश्तेदारी का दबाव बना कर, मिन्नतें करके और दो सौ रूपये देकर रियायत भाव में सुरेन्द्र को थाने से ही छुड़वा लिया गया था। बाद में सुरेन्द्र द्वारा राय से सम्बन्ध बढ़ाने की जुगत में एक जोरदार दावत घर पे दी गयी थी। देशी मुर्गे और अंग्रेजी दारू के साथ। बस तभी से राय का इस परिवार में आना-जाना शुरू हुआ था। राय भी ताड़ गया था, कि उसके मतलब की जगह है। वो फ्रीडम नचाते हुये पहुंच जाता सुबह-शाम, सुरेन्द्र से मिलने के बहाने। अमूमन ऐसे वक्त ही आता था जब सुरेन्द्र के घर पर मिलने की संभावना कम से कम होती थी। सुरेन्द्र घर पर होता या नहीं होता, मुरीद घरवाले खूब आव-भगत करते थे राय की। यदि सुरेन्द्र घर पर मिल जाता था तो बड़ी देर तक खाना-पीना होता तथा साथ में लम्बी-लम्बी गप्पें एवं लोक निंदा। सुनीता और गीता भी ‘‘भैया-भैया’’ करते हुये चाय-पानी एवं अन्य आवश्यक वस्तुयें लाया ही करती थीं। बड़ी बहन सुनीता राय के सामने कम ही आती थी। क्योंकि वो अपनी काफी बढ़ चुकी उम्र के बावजूद कुँवारी रह जाने पर शर्मिन्दा रहती थी। राय ने न जाने किस तरह रिश्तों का सूत्र जोड़ते हुये सुरेन्द्र की अम्मा को अपनी मौसी बना लिया था। राय और सुरेन्द्र के सम्बन्ध घरेलू हो चले थे। दोनों घरों के औरतों की आवाजाही भी शुरू हो चुकी थी। दो-चार बार सुरेन्द्र के घर राय की पत्नी भी आ चुकी थीं, और राय के दिल्ली दरवाजा स्थित क्वार्टर पर सुरेन्द्र के घर की लड़कियाँ औरतें भी कई मर्तबा जा चुकी थीं। फिर आयी थी पच्चीस दिसम्बर की रात। राय ने एक प्रस्ताव रखा सुरेन्द्र क सामने, खूब ठोंक बजाकर। राय ने कहा ‘‘मेरा ट्रांसफर बिजनौर हो गया है। उसे रूकवाने के प्रयास में हूँ। सी0ओ0 साहब को घर पर खाने पर बुलाया है। शायद बात बन जाये। क्रिसमस तो बहाना है, मगर उसी बहाने के नाम पर छोटी सी पार्टी रखी है। तुम्हारी भाभी कह रही थीं कि अगर सुनीता आकर कुछ हाथ बँटा देती तो। काम-वाम कुछ नहीं करना है। महरी तो है ही। सारे काम वो और तुम्हारी भाभी मिलकर करेंगी। बस डेढ़ साला बच्ची को संभालना है। मुख्य बात ये है कि साहब की मैडम भी आयेंगी। अब उनसे बात-चीत करने के लिए भी तो कोई पढ़ी-लिखी और सलीकेदार लेडी वहाँ होनी चाहिए। मैं और सी0ओ0 साहब शायद बाहर ही उठें-बैठें। वैसे भी, हर हाल में साढ़े नौ बजे के पहले मैं उसे घर लाकर छोड़ जाऊँगा’’। सुरेन्द्र ने तत्काल खुशी से सहमति दे दी। सुनीता के ही जाने के बाबत राय ने बाखूबी तर्क पेश किया था। उसका नुक्ता यूं था ‘‘नरेन्द्र बाबू से पूछे बगैर बड़ी भाभी जायेंगी नहीं। तुम्हारे पैरों पर प्लास्टर चढ़ा है, सो तुम्हे उठाने- बैठाने या तुम्हारी सेवा के लिए तुम्हारी मिसेज का यहाँ होना बेहद जरूरी है। रहा सवाल गीता का तो उसकी परीक्षायें काफी नजदीक हैं। अब बचीं अम्मा, तो वो सी0ओ0 साहब की मैडम से क्या बतियायेंगी। इसलिए ले-देकर सुनीता ही एकमात्र विकल्प बच रही है। वैसे जैसा तुम कहो’’। सुरेन्द्र, राय के जरियें इतनी ऐय्याशियां कर चुका था कि राय की सेवकाई का ये सुनहरा मौका अपने हाथ से निकलने नहीं देना चाहता था। अगर कहीं सचमुच राय का ट्रांसफर हो गया तो उस पर तो मुसीबतों के पहाड़ टूट पड़ेंगे। उसने सुनीता को तत्काल राय के साथ जाने का हुक्म दिया था। मगर सुनीता ने जाने की रजामंदी नहीं दी थी। सुरेन्द्र तुरन्त मारपीट पर उतारू हो गया तो सुनीता को राय के साथ जाना ही पड़ा था। जाने से पहले सुनीता के सिर पर अम्मा ने हाथ फेरा तो वो फफक-फफक कर रो पड़ी थी। डबडबाई आंखों से सुनीता राय के साथ घर से निकली थी, और यूं कातर दृष्टि से अम्मा को देखती रही थी मानो चिड़ियां के सामने उसके बच्चे का शिकार किया जा रहा हो और वो कुछ भी न कर पा रही हो। रंगारंग रास्तों से फ्रीडम नचाते हुये राय ने जब घर पहुंचकर ताला खोला था तो सुनीता के आश्चर्य की सीमा न रही। खींसे निपोरते हुये राय ने कहा था ‘‘पड़ोस में तुम्हारी भाभी गयी हैं, वहां भी क्रिसमस की पार्टी है बस आती ही होंगी’’। थोड़ी देर बाद रोना, चीखना, पांव पकड़ना, मिन्नतें करके भगवान का वास्ता देने के साथ-साथ हल्की-हल्की कराहों एवं सिसकियों के बीच सब सुलट गया। साढे़ नौ के पहले ही राय, सुनीता को घर छोड़ गया था। सुनीता के होशो हवास देखकर ही अम्मा को कुछ-कुछ अंदेशा हो गया था। इसका मतलब सुनीता के सुरक्षित लौट आने के बाबत गांव के पीपत से लेकर महादेव बाबा को लेकर मानीं गयी उनकी तमाम मनौतियां व्यर्थ हो गयी थीं। कुछ ही माह बाद कुंवारी सुनीता को अपने रूके मासिक धर्म के जरिये अपनी संभावित दुर्दशा का अंदाजा हो चला था। उसकी लाश पंखे से लटकती हुयी पायी गयी थी। मगर बीमारी से हुई मृत्यु का बहाना बनाकर उसकी अन्त्येष्टि आनन-फानन में कर दी गयी थी। तब भी अम्मा कुछ ना कर सकी थी। बहुओं ने अपने पतियों से कुछ-कुछ बताया तो वे डपट दी गयीं। कनिया बहू को तो सुरेन्द्र ने दो चार करारे हाथ भी लगाये थे। तब सुरेन्द्र ने ही रहस्योद्घाटन किया था ‘‘इकतीस साल की हो गयी थी, मरती न तो क्या करती। जरूर कोई चक्कर-वक्कर रहा होगा’’। अम्मा बिलखती रहीं मगर बोलीं कुछ नहीं। उनके बोलने से होता भी क्या।

ढाई साल बाद बाइस वर्षीय गीता पर राय साहब की नजरे इनायत होने लगी थीं। अलबत्ता इन ढाई वर्षों के दरम्यान शुरूआत के कुछ महीनों तक कटे-कटे रहने के बावजूद सुरेन्द्र से राय की प्रगाढ़ता बदस्तूर जारी रही थी।

महफिलों, शराब और मांसाहारी दावतों के जरिये सुनीता और उसके अतीत को उस घर के लोगों ने भुला डाला था। सुनीता की मृत्यु के बाद उसके पिताजी गीता को गांव ले जाना चाहते थे। घर में बलवा हो जाने के आसार बन गये थे। अकेली जवान लड़की, इतना बड़ा गांव। पिताजी तो अक्सर खेत-सिवान में ही रहते हैं। खतरा ही खतरा है। कहीं कुछ ऊँच-नींच हो गयी या लड़की हाथ से निकल गयी तो। मगर वास्तव में घर की बहुओं को गीता और उसकी इज्जत की चिन्ता उतनी नहीं थी, जितनी वे मुफ्त की नौकरानी सदृश ननद के चली जाने की आशंका से हलकान हुयी जा रही थी। गीता को लेकर घर में शीत युद्ध की स्थिति बन गयी थी। इस बात को लेकर के गीता देवकाली में रहेगी या दर्शननगर में। पिता का अगर प्रस्ताव मात्र था तो बहुयें अड़ी हुयी थी और उनके पतियों का उन्हें मुखर समर्थन प्राप्त था, और अम्मा की हैसियत एक तमाशबीन से ज्यादा न थी।

गीता को लेकर हलकान हो रहे दोनों पक्षों की चिन्ताओं पर राय ने एक प्रस्ताव रखा, जो दोनों धड़ों को वाजिब लगा था। बड़ी गम्भीरता से राय ने अपनी योजना का ताना बाना सुझाया ‘‘मेरे फूफा का लड़का सुल्तानपुर में है। कमला नेहरू संस्थान से एम0टेक0 कर रहा है। नाम है सुशील, जैसा नाम वैसा ही स्वभाव। फुआ-फूफा से बात हो गयी है। वे कहते हैं कि अगर लड़का हाँ कर दे तो पाँच मुट्ठी अक्षत लेकर ही ब्याह लायेंगे। दान दहेज का तो कोई मसला ही नहीं है। वैसे भी ताम-झाम वाली शादियां और उनके तौर तरीके उन्हें सख्त नापसंद हैं। इसी हफ्ते लड़के के कालेज में एक ट्रेड फेयर का आयोजन है। सुशील भी स्टाल लगा रहा है। गीता को किसी तरह मैं सुशील से मिलवा दूंगा। ये अच्छा भी रहेगा कि गीता भी सुशील को देख लेगी। आखिर किसी से कम है क्या अपनी गीता’’।

बात सभी को जँची। मगर सुरेन्द्र हमेशा की भाँति अति उत्साह में व्यग्रता से बोला ‘‘मैं भी चलूँगा’’। राय ने उसे बड़े भाई की भांति दुनियादारी समझायी ‘‘तुम कुछ समझ ही नहीं पाते। तुम्हारे जाने से सुशील भड़क सकता है। वहां तुम्हें जानने वाला कोई न कोई अवश्य मिल जायेगा। फिर तुम्हारी पोल सुशील के सामने जरूर खुल जायेगी। बना-बनाया खेल बिगड़ जायेगा। मैं तुमसे कोई अलग थोडे़ ही हूँ। फिर मंगलवार को ही, सिर्फ एक दिन का ही तो फेयर है। शायद मंगल को तुम्हारी पेशी भी तो है। इस बार हाजिरी माफी मिलने से रही। शर्तिया वारंट हो जायेगा’’। राय के इस वार से सुरेन्द्र चित हो गया। आखिर राय ने ठोंक बजाकर ही ये फुलप्रूफ योजना तैयार की थी। सुरेन्द्र भी निश्चिन्त था कि सुल्तानपुर ना जाने से अव्वल तो वो जेल जाने से बच जायेगा, दूसरे वो जाता तो पैसे भी उसी के खर्च होते और पलक झपकते ही मंगलवार का दिन आ गया था। अम्मा से अश्रुपूर्ण विदाई लेकर गीता रवाना हुई। अम्मा इस बार आधी आशंकित और आधी निश्चिन्त थीं। क्योंकि तब की बात और थीं, रात थी। इस बार दिन ही दिन का मसला है। राय अपनी चमचमाती फ्रीडम और चमकती आंखों के साथ गीता को लेकर ग्यारह बजे रवाना हुआ और पांच बजे तक वापस लौट आया। अम्मा ने चैन की सांस ली क्योंकि अभी दिन का उजाला बाकी था, और उनकी बेटी सकुशल घर वापस आ गयी थी। गीता न तो खुश दिख रही थी और न ही दुखी। उसके खूबसूरत चेहरे पर हर्ष या बिषाद का कोई लक्षण मौजूद नहीं था, बस जैसे काठ मार गया हो।

भाभियों ने बहुत कुरेदा, चुहलबाजियाँ की। मगर गीता ने, ‘‘करम, किस्मत, जो बदा होगा वही होगा’’ जैसे दार्शनिक जवाब दिये। गीता के मुँह से ऐसे बडे़-बडे़ शब्द सुनकर अम्मा का धीरज जवाब देने लगा। उन्होंने अपनी कसम देकर गीता से दृढ़ता से पूछा ‘‘अपनी बहन जैसी मत बन, तू इस घर की इज्जत है। सच-सच बता आखिर बात क्या है’’। गीता सोचने लगी’’ ‘घर की इज्जत’ पिछले ढ़ाई वर्षों से उसे दिन रात इसी नाम की घुट्टी पिलाई जा रही थी। नसीहतें एवं वास्ते दिये जा रहे थे कि वो ‘घर की इज्जत’ न हुयी मानो सफेद पेंट की गयी दीवार हो, जिस पर कोई भी रंग-बिरंगी पीक थूककर गायब हो सकता था। ‘घर की इज्जत’ दुनिया जहान की नजरों से बचाई गयी थी। उसे पिता तक के पास सुरक्षित नहीं समझा गया था। जिसके लिए अपनी बड़ी बहन का नाम लेना और सुनना पाप करार दे दिया गया था। उसी इज्जत के रखवाले, घरवालों ने ही उसकी इज्जत का होम करने के लिए सौप दिया था उसी को, जिससे बचाई जाती रही थी। गीता अंधेरे में सुबकते हुये बोली ‘‘अब कहने-सुनने को बचा ही क्या है अम्मा। मैं दीदी से अलग थोडे़ ही हूँ। जैसे उनका करम, वैसे मेरा भी। मैं भी इसी घर की हूँ और तुम क्या इस घर की हकीकत और सड़ी हुयी झूठी शान से वाकिफ नहीं हों’’। अम्मा ने लाचारी से गीता को अपने अंक में भर लिया। अपने आँसू और उसके आँसू मिला लिये। देर रात तक, अंधेरे कमरे में दोनों कर्म, किस्मत और औरत होने पर रोती रही थी। अम्मा ने गीता से बहन का अनुसरण न करने का वचन ले लिया था। घुप्प अंधेरे में अम्मा ने कही थी, सांत्वना का मलहम लगाती पते की बात ‘‘तब की बात और थी। फिलहाल तू ही, अब भी इस घर की इज्जत है’’। काफी दिनों बाद गीता की लाश क्षत-विक्षत अवस्था में फैजाबाद जंक्शन के आउटर पर पायी गयी थी। उसके अगले दिन आधी रात को, एस0ओ0 प्रभुनाथ के चले जाने के बाद राय सोच रहा था कि सुबह किसी न किसी तरह मामला हर हाल में सुलझाना है। करीब-करीब मामला सेट कर लिया गया है। आगे का मामला भी साहब को अपना बनाकर सुलटा लिया जायेगा। आखिर अपने ही जाति-बन्धु हैं साहब भी।

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दिलीप कुमार

दिलीप कुमार

1980में जन्म , दो कथा संग्रह, एक उपन्यास प्रकाशित, कथा, व्यंग्य, लघुकथा विधा में लेखन , सम्प्रति-सरकारी सेवा , सम्पर्क 9454819660 ईमेल[email protected], लेखन हेतु कई पुरस्कार/सम्मान प्राप्त
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