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उस बर्फीले तूफान में हीरावती की विचित्र खोह में बंदी हुआ श्रीधर भावनाओं के उफान में संयम के बंधन को तोड़कर जैसे आदिम मानव हो उठा और अस्वस्थ मन एवं शरीर, दोनों को वह पूर्ण विश्राम देना चाहता था. एक तो वह सर्वदा अपने प्रत्येक भाषण को बड़ी परिश्रम से प्रस्तुत करता था, फिर इस भाषण में तो उसे अपने आगामी चुनाव के प्रतिद्वंद्वी को धोबीपछाड़ की पटखनी देनी थी. मेज पर धरी दुग्ध धवल टोपी उसने सिर पर धर ली. जब तक वह अपने इस जादुई यंत्र को सिर पर धर उसके तीखे उस्तरे सी धार पर हाथ न फेरता, वीणावरदण्डमण्डितकरा देवी सरस्वती उससे रूठी ही रहती. टोपी सिर पर धर वह दर्पण के सम्मुख खड़ा होकर मुस्कुराया. प्रभावशाली प्रतिबिंब ने और भी अधिक आकर्षक स्मित का प्रत्युत्तर दिया.

              प्रशस्त ललाट, तीखी नासिका, विलासी क्यूपिड अधर और चिकना चुपड़ा चेहरा. श्रीधर को इस स्मित से संतोष नहीं हुआ. इस बार, वह और भी आकर्षक ढंग से मुस्कराया. होंठ भींचकर प्रस्तुत किये गये उस संयमित स्मित का आकर्षण वास्तव में अनुपम था.

              कौन कहेगा, वह पचपन वर्ष का है? काले बालों को कौन सी अमृत बूटी पिलाता है वह? गत वर्ष यही प्रश्न, विदेश यात्रा के बीच, उससे कई विदेशी गतयौवनाओं ने घुमा फिरा कर पूछा था.

              वह नम्र मिष्टभाषी भारतीय अपने यौवन की मरीचिका की व्याख्या संक्षिप्त शब्दों में देता, ‘मेरे चिर यौवन का रहस्य है – स्वस्थ मन एवं स्वस्थ शरीर. ‘ फिर वह मुस्कराकर अपने व्यक्तित्व का द्वार मखमली डिब्बा खोल जगमगाती दाड़िम सी दंतपंक्ति की रत्नराशि से भीड़ को मुग्ध कर देता.

           ‘क्षमा कीजिएगा’, यौवन को सदा गाँठ में बाँध  कब्र तक ले जाने वाली विदेशी रमणियाँ उसे फिर घेर लेतीं, “आपने यह डेंचर कहाँ बनवाया? हमें भी बनवाना है.”

              “आपको बड़ी दूर जाना पड़ेगा.” कहकर वह हँस कर आकाश की ओर उंगली उठा देता, “सौभाग्य से हम अधिकांश भारतीयों का एकमात्र डेंटिस्ट अभी भी विधाता ही है.”

          बड़ी देर तक विदेशी रमणियाँ उसे अविश्वास से घूरती रहतीं.

            आज एक बार फिर अपनी उसी स्वच्छ, बहुचर्चित दंतपंक्ति को गर्व से निहार, वह हाथ बाँधे दर्पण के सम्मुख अपने दूसरे दिन दिये जाने वाले भाषण की आवृति करने लगा. यह उसका नित्य का नियम था. विधानसभा हो या सार्वजनिक जलसा, बिना दर्पण के सम्मुख किये गये एक पक्के रिहर्सल के वह कभी भी अखाड़े में नहीं कूदता था. इसी से आत्मविश्वास का कभी न छूटने वाला पक्का रंग उसके गोल चेहरे को वार्निश की सी चमक से चमकाए रहता.

           वह अपने उन सहकर्मियों में से नहीं था, जो घर से भाषण का होमवर्क करके नहीं लाते, और एन भाषण के बीच विषय से इधर-उधर भटकते बगलें झाँकने लगते हैं. उनकी ओछी हरकतों से कभी-कभी उसका माथा लज्जा से झुक कर रह जाता था. सेक्रेटरी ने उल्टा-सीधा, लच्छेदार भाषा में भाषण लिख दिया, और उन्होंने करकराती शेरवानी और कलफ़ की टोपी पहन, मर्सिया सा पढ़ दिया. लच्छेदार भाषा ही तो सबकुछ नहीं होती. विषयवस्तु का भी तो कुछ स्थायी महत्व होता है, यह नहीं जानती थी उसकी मूर्ख बिरादरी. पर कौन समझाए उन्हें? उनके कानों में तालियों की गड़गड़ाहट और गले में फूलों की माला पड़ गयी, तो गंगा नहा ली. पर श्रीधर जनता को पहचानने लगा था. और जो कुछ भी हो, आज की बुद्धिजीवी जनता को छला नहीं जा सकता. इससे वह अपने दिमाग के कोठे को ठसाठस भरकर रखता था. उसके शब्दों के चयन, वाणी के ओज और उतार-चढा़व में ध्रुपद धमार के गायक की सीधी-आड़ी, दुगुन और चौगुन लयकारी रहती. जैसे लच्छेदार बातों के जाल में दर्शकों को उलझा, चतुर बाजीगर हाथ के कबूतर को सहसा हवा में फड़फड़ा अदृश्य कर देता है और उसी पल भीड़ को उलझन में डालने को चादर से ढँका अपने पैर का अंगूठा ऐसे हिला देता है, जैसे ठीक कबूतर की मुंडी हिल रही हो.

          “वह है. वह है. वहाँ छिपाया है. “दर्शक कहते हैं.

          “अरे यह? यह तो मेरे पैर का अंगूठा है भाई.”

      चतुर बाजीगर चादर हटा अपना नंगा अंगूठा हिला, अपने को उससे अधिक बुद्धिमान समझने वाले दर्शक को एक ही झटके में खिसियाकर धर देता है. ऐसे छोटे-मोटे अनेक रसीले लटकों से वह ओजस्वी वक्ता अपनी मीठी वाणी के मोहपाश में कड़े से कड़े आलोचक को भी बाँधकर रख देता था. फिर भी उसके व्यक्तित्व का आकर्षण विधाता की देन भले ही हो, उसकी प्रतिभा देवदत्त नहीं थी. उसके पीछे अथक परिश्रम का एक लंबा इतिहास था.

     श्रीधर ने एक साधारण गृह में जन्म लिया था. पिता थे एक शिव मंदिर के पुजारी और माता को उसके जन्म के मूल नक्षत्र ने उसी दिन डँस लिया था. पहाड़ के लाल मोटे चावल को नमक के साथ निगल, वह मीलों के तीखे उतार चढ़ाव पार कर पढ़ने जाता था. आठ ही वर्ष का था कि पिता का साया भी उठ गया. लोक लाज के भय से, ताऊ ने उसे अपने पास बुला लिया. ताई के दुर्व्यवहार और पहाड़ी पगडंडियों के उतार चढ़ाव ने उसे जीवन के उतार चढ़ाव के दुरूह पाठ को समय से पूर्व ही रटाकर पटु कर दिया था. इसी से उच्च पदारूढ़ होते ही उसने अपनी समग्र शक्ति अपनी पिछड़ी जन्मभूमि के शिक्षा सुधार की ओर लगा दी थी. यह उसी की अटूट निष्ठा का फल था कि आज उन दुर्गम शैल शिखरों पर, जहाँ चिड़िया भी नहीं चहकती थी, इतिहास, भूगोल और गणित की व्याख्याएँ गूँजने लगी थी. कहीं कहीं तो उसने चलते फिरते स्कूल भी खुलवा दिये थे. हिमपात होते ही खच्चरों पर लदा हेड मास्टर, अध्यापक और विद्यार्थियों सहित पूरे स्कूल का स्कूल घाटी में उतर आता. इसी से एक ही चुनाव की नहीं अगले कई चुनावों की विजय पताका एक साथ सिलवा वह मूँछों में ताव देता, निश्चिंत बैठ सकता था. गर्म चूड़ीदार, पट्टू की शेरवानी और नुकीली सफेद टोपीधारी उस सौम्य के भाषण के बीच जनता को चूँ करने का भी साहस न होता था. भाषण के एक एक चुने वाक्य मोतियों की लड़ियों की तरह स्वयं गूँथते चले आते. यहाँ तक कि उसकी किस उक्ति पर तालियों की गगनभेदी गूँजेंगी, यह भी उसे पहले से ज्ञात हो जाता, और वह स्वयं विराम अर्ध विराम लगाता रहता. श्रोताओं को कब मातृभाषा की फुलझड़ी से गुदगुदाना होगा, कब अपनी अर्जित अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का प्रसंग कैसे छेड़ना होगा कि दर्पोक्ति न लगे, यह सब वह राजनीति का कुटिल खिलाड़ी भली भाँति समझता था. सहसा वह दर्पण के सम्मुख, किसी को कुछ न समझने वाली नेपोलियन की गर्वीली मुद्रा में खड़ा हो गया. उसका गर्व मिथ्या नहीं था. जिन ग्रामों में कभी मिट्टी के तेल की बाती भी नहीं दपदपाई थी, वहीं आज उसके प्रयास से पहाड़ों की वेगवती अलकनंदा को बाँध विद्युत प्रवाहिणी उज्जवलता बिखेर दी गई थी. पर इस टोपी के ताज ने क्या उसे बिना कुछ किये ही बादशाह बना दिया था? क्या पुलिस की निर्मम लाठियों ने उसकी पसलियों का चूरा बनाकर नहीं धर दिया था? दुर्दांत गोरे सिपाहियों के बेटनों ने क्या उसकी दोनों कमान सी घनी भृकुटियों के बीच लंबा घाव स्वतंत्रता के विजय तिलक के रूप में सदा सदा के लिए सजाकर नहीं रख दिया था? और फिर अल्मोड़ा जेल की चारदीवारी में स्वेच्छा से ही बंदी बना लिया गया उसका यौवन, नैनी जेल की सड़ी गर्मी और लू की अविस्मरणीय लपटों से झुलसा दिया गया जवानी का बाँकपन क्या सहज में भुलाया जा सकता था? पर, क्या केवल देश प्रेम ने ही उसे सर्वस्व त्यागी बनने का आमंत्रण दिया था? अचानक श्रीधर के उल्लास की ज्योति स्वयं धीमी पड़ गयी. क्यों भाग गया था वह गाँव छोड़कर? जानबूझकर ही अंग्रेज कमिश्नर के बंगले के सम्मुख अनावश्यक धरना देकर क्या हथकड़ियों को रक्षाबंधन की भाँति ग्रहण करने को उसने ललककर कलाइयाँ बढ़ा दी थी?

      श्रीधर की सफेट टोपी पसीने से तर हो गयी.

      कल अपने ग्राम के आकाश पर सर्र से निकलते अपने वायुयान की खिड़की से उसे अपने विस्मृत ताजमहल का गुंबद दिख गया, और रात भर वह सो नहीं पाया.

      एक गहरा नि:श्वास उसके होठों को कँपाता निकल गया. सिर की टोपी उतार, पंखे सा झलता, वह आरामकुर्सी पर लद गया.

      इन पच्चीस वर्षों में भी क्या मुँह का कड़वा स्वाद नहीं गया? कुर्सी पर अधलेटा श्रीधर आँखें मूँदे, स्वयं ही स्मृति के घाव को कुरेदने लगा.

      तब यौवन का बाँकपन उसकी मूँछों पर नवागत अतिथि बनकर उतरा ही उतरा था. ताई के दुर्व्यवहार से ऊबकर, वह अपने ग्राम की सीमांतवासिनी एक मिशनरी मेम के साथ रहने लगा था. लोग कहते थे कि बुढ़िया ने उसे अपने साथ गिरिजाघर ले जाकर पक्का किरिस्तान बना दिया है. किरिस्तान तो नहीं, पर विदेशी संतानहीना मेम के स्नेह और अनुशासन ने उसे आदमी अवश्य बना दिया था. मृत्यु से पूर्व उस निस्वार्थ वृद्धा ने उसे विश्वविद्यालय की उच्चतम परीक्षा उतीर्ण करा दी थी. यह ठीक था कि बेचारी की क्षीण पूँजी श्रीधर की शिक्षा में ही चुककर रह गई थी, किंतु अपनी अनमोल वसीयत के रूप में वह अपने सुदर्शन दत्तक पुत्र के नाम अपनी नम्रता मिष्ठभाषण एवं निष्कपट व्यवहार का कभी न शेष होने वाला कुबेर का सा कोष छोड़ गयी थी. इसी वसीयत ने श्रीधर को ग्रामवासियों के हृदय के सर्वोच्च आसन पर बिठा दिया. केवल उसी के नहीं, दूर दूर तक के ग्रामों में अनोखी सूझबूझ के उस न्यायप्रिय युवक की धाक जम गई. जहाँ पहले छोटी मोटी जमीन जायदाद और जर जेवर की समस्याएं लेकर ग्रामवासी अल्मोड़ा की कचहरी अदालत की धूल फांकते थे, वहाँ चुटकियों में श्रीधर अपने विलक्षण कानूनी नश्तर से उनके विकट से विकट घाव चीरकर रख देता. सर्वसम्मति से वह ग्राम का नेता चुन लिया गया था. किंतु चिंता एक ही बात की थी. उनका वह लोकप्रिय नेता एक नंबर का भगोड़ा था. कई बार ग्रामवासियों ने उससे अनुरोध किया था कि वह स्थायी रुप से ग्राम में न्यायाधीश का पद ग्रहण कर ले, किंतु श्रीधर तो रमता योगी था.

            आज कालीपार अघोरी बाबा के आश्रम में तो कल साबरमती. जब कभी वह ग्राम में आता, विविध प्रकार के मुकदमों की पोटलियाँ उसके प्रांगण में खुलने लगतीं. किसी ने किसी के खेत की तीन चार सीढ़ियाँ रात ही रात में काटकर अपने खेत में मिला ली, कोई एक लंबे अर्से तक फौज में रहा, और उसका सगा भाई उसकी सुंदर पत्नी को लेकर भाग गया.

       प्रत्येक मुकदमे में वह दूध का दूध पानी का पानी कर देता. लोग कहते थे कि शिवालय की कोठरी में एक लंबे अर्से तक पार्थिव पूजन कर, उसने शिवजी से अनोखा वरदान प्राप्त किया है. उसका अद्वितीय फैसला पक्ष और विपक्ष दोनों दलों को सदा मान्य रहता.

          एक बार ऐसे ही एक विचित्र मुकदमे में उसने अपने ग्राम की उस सैंडी टॉमसन को पहली बार देखा, जिसके सौंदर्य और दुश्चरित्रता की दिगंतव्यापी दंतकथाओं को वह कई दिनों से सुनता आ रहा था. ठीक जैसे मॉम की नायिका घृष्टा सैंडी ही लहंगा ओढ़नी पहनकर बैठ गयी हो. उसके विरुद्ध मुकदमा दायर करने आई थी स्वयं उसकी जुडवां बहन पिरभावती और पीछे पीछे थी पूरे ग्राम की भीड़.

         “न्याय करो लाल साहब!” विदेशी वृद्धा के दत्तक पुत्र श्रीधर को सब इसी नाम से पुकारते थे. “इसके ससुराल वालों से वैर मोल लेकर मैंने इस नागिन को आस्तीन में पाला और ठीक महीने भर में ही इसने मुझे डँस लिया.” और झोंटा पकड़ पिरू ने नागिन को खींचकर श्रीधर के पैरों के पास डाल, एक लात जमा दी.

           संकोची श्रीधर हड़बड़ाकर खड़ा हो गया. पर क्षण भर को उसके घुटनों से लगी वह लंबी, छरहरी, चौड़े मर्दाने कंधों वाली क्षत्राणी, कपड़ों की धूल झाड़ती ऐसे खड़ी हो गयी, जैसे पैर रपटने से गिर पड़ी हो. न उसके चेहरे पर लज्जा या खिसियाहट की एक रेखा खिंची, न उसने उस सार्वजनिक सभा में किये गये अपमान के विरुद्ध बड़ी बहन से कुछ कहा. सुंदर अम्लान चेहरा क्षणिक लाली से रंजित हुआ. पर दूसरे ही क्षण वह धृष्टा किशोरी वहीं पर धरे टीले पर तिनका चबाती ऐसे बैठ गयी, जैसे राजरानी हो. उस मुकदमें ने युवा न्यायाधीश को उलझन में डाल दिया. धनसिंह की पत्नी पिरू अपनी सुंदरी जुड़वां बहन हीरू को एक माह पूर्व अपने साथ ले आई थी. उसका भगिनीपति गंगा कुली था. कुछ ही माह पूर्व डायनामाइट ने चट्टान के साथ धीरू के सौभाग्य की भी धज्जियाँ उड़ा दी थी. तब से नित्य पिरभावती अपनी अठारह वर्षीय बहन के दुर्भाग्य की कहानियाँ सुन सुनकर व्याकुल हो जाती. आज सास ने उसे अंगारे से दाग दिया, आज देवर ने माथा फोड़ दिया. आदि आदि. फिर वह एक दिन उसे स्वयं ले आई. पर एक महीना भी नहीं बीता था कि हीरावती ने बहन की अनुपस्थिति में उसी के सौभाग्य कोष पर डाका डाल दिया. रंगे हाथों पकड़ा था पिरभावती ने.

           उधर पत्नी की दृष्टि में अपराधी धन सिंह अपने को दूध का धुला बता रहा था. “एक ही घड़ी में भगवान ने एक ही नक्शे की दो मूरतें रचकर रख दी तो आप ही न्याय करें सरकार, दोष मेरा या विधाता का? मैंने जरूर इस छोकरी का हाथ पकड़कर इसे छाती से लगाया, पर यह भी तो चुपचाप छाती से लगी हँसती रही. एक सी सूरत, एक सी धोती और एक सी हँसी. अब धनसिंह साला क्या कद्दू का चश्मा लगाए था.”

          धनसिंह का यह कद्दू के चश्मे वाला सस्ता मजाक जनता ने बेहद पसंद किया और एक तुमुल हास्य लहरी को रोकने के लिए स्वयं श्रीधर को खड़ा होना पड़ा था. “भाइयो, आप सब जानते हैं कि पंचायत में मुझे हँसी ठट्ठा पसंद नहीं है. धनसिंह ठाकुर को जो कुछ कहना हो, साफ साफ कहे.”

         “अब इससे ज्यादा साफ साफ और क्या कहूँ अन्नदाता?” धनसिंह ठाकुर अपनी रसिकता से बाज नहीं आया. “धोती खोलकर नंगा हो जाऊँ? पंचों के सामने अब और क्या कहूँ? पर गंगा की सौं, यह छोकरी टुकुर टुकुर मेरी ओर देखती हँसती रही. एक बार कहती कि ‘मैं तेरी साली हूँ’ तो क्या मैं इसे छूता?”

         टीले पर बैठी अब भी वह छोकरी टुकुर टुकुर धनसिंह को देखती वैसे ही हँस रही थी. श्रीधर ने दोनों बहनों को देखा. सचमुच एक ही ठप्पे पर दो बहनों की सृष्टि की गयी थी. अंतर दोनों में उतना ही जितना एक जोड़ी ऐसी धोतियों में होता है, जिनमें एक तो बिना धुली कोरी ही धरी हो, और दूसरी धोबी की पछाड़ ने साफ कर दी हो.

             “झूठ बोलता है, बेशरम!” पिरभावती ने घृणा से पति की ओर देख कर कहा. और सीना तानकर पंचों के बीच खड़ी हो गई.

          “मेरी हालत देखो, लाल साहब!” उसका स्वर उत्तेजना से कांपने लगा. “क्या मेरी घाघरी गले से नहीं बंधी है? और क्या इस फटफटी छोकरी का पेट पीठ से नहीं लग रहा है?”

         उसकी किसी चतुर क्रिमिनल वकील की सी इस दलील ने मुकदमे को जटिल बना दिया. अपनी गर्भावस्था के अंतिम उभार का समुचित प्रदर्शन करने के बाद बैठकर वह प्यासी कुतिया सी हाँफने लगी.

       ठीक ही कह रही थी वह. दोनों के चेहरे भले ही एक से हो, शरीर की गढ़न में किसी प्रकार की छलना के लिए गुंजाइश नहीं थी.

         टीले पर बैठी इकहरे शरीर की सुंदरी स्वामिनी तिनका चबाती अब भी उतनी ही रहस्यमयी रही. पंचों की जूरी श्रीधर से विचार विमर्श करने पास की गंधाती गोशाला के पिछवाड़े चली गई. अंतिम फैसला देने से पूर्व इस विचित्र अदालत का यही नियम था.

         पता नहीं क्या फैसला देंगे लाल साहब! उनका फैसला सदा बेजोड़ होता है.

        श्रीधर का गंभीर कंठस्वर पहाड़ी मंदिर के दमामे-सी चोट करता गूँज उठा था -” भाइयो, पंचों के मत से धनसिंह ठाकुर निर्दोष हैं”

         “धन्य हो लाल साहब!” धनसिंह के पांचो पांडवों जैसे भाई टोपियाँ उछालने लगे थे.

          “हो सकता है” श्रीधर कहता जा रह था, “कि अँधेरे में ठाकुर अपनी साली का चेहरा ही देख पाए हों, शरीर नहीं. और दोनों बहनों के चेहरों में तिल रत्ती का भी अंतर नहीं है. यह तो आप स्वीकार करेंगे ही.” सैकड़ों आँखों का फोकस एकसाथ ही प्रमुख नायिका के चेहरे की ओर घूम गया. “दोष निश्चय ही हीरावती देवी का है. क्या आप घबराहट से चीख नहीं पाईं?” श्रीधर ने अपने इस सहृदय प्रश्न से अड़ियल घोड़ी की लगाम में ढील दी कि शायद इस प्रश्न का सहारा पाकर कह दे कि हाँ, मैं घबरा गई थी. पर वह तो निरुत्तर सिर नीचा किये, अपनी उसी रहस्यात्मक मुद्रा में मुसकराती रही. उस उद्दंड किशोरी की इस चोरी और सीनाजोरी को देख, न्यायप्रिय श्रीधर का खून खौल गया. इसके पूर्व भी उसके पास, इस दूसरे ग्राम से आ टपकी महामारी सी मारक दुश्चरित्रा हीरावती के उन्मूलन के अनुरोध की प्रार्थना करते कई गुमनाम पत्र आ चुके थे.

             “हीरावती देवी, आपको दस मिनट का समय और दिया जाता है. इस बीच भी आप अपनी सफाई न दे सकीं, तो पंचों को अपना फैसला देना ही होगा.” श्रीधर ने दृढ़ स्वर में कहा था.

          हीरावती ने बड़ी उपेक्षापूर्ण दृष्टि से श्रीधर को देखा, फिर द्रोणगिरि के पीछे लाल आग के गोले से डूबते सूर्य की ओर अपनी दृष्टि निबद्ध कर दी, जैसे अस्ताचलगामी सूर्य के साथ ही पंचों के निरर्थक प्रश्न को भी डुबो रही हो. दस मिनट तो क्या, दस वर्ष की अवधि दिये जाने पर भी शायद हीरावती उसी दार्शनिक मुद्रा में मुसकराती रहती.

          हारकर पंचों ने फैसला दे ही दिया, क्योंकि दोनों जुड़वां बहनों का रंग रूप एक ही था, शरीर के आकार का अंतर भी स्थायी नहीं था, गर्भ भार से मुक्त होने पर पिरभावती फिर अपनी जुड़वां बहन का अविकल प्रतिरूप बन जाएगी, और ठाकुर धनसिंह की अपनी घातक भूल दोहराने की संभावना और अधिक बढ़ जाएगी. इसी से श्रीमती हीरावती को आदेश दिया कि वे बारह घंटे के भीतर ग्राम की सरहद खाली कर दें.

        फैसला सुनते ही हीरावती मुस्कराकर श्रीधर की ओर मुँह फेरकर खड़ी हो गई. पहली बार उसने मुँह खोला, “ठीक है पंचों, मैं आज से कोढ़ी साहब के ओड्यार में रहूँगी. वह तो आपके गाँव की सरहद के बाहर है न?”

          उसने एक बार फिर अपनी रससिक्त मुस्कान से ग्राम के मनचलों को तिलमिलाकर धर दिया. अचानक भीड़ स्तब्ध हो गई. कहती क्या है छोकरी? कोढ़ी साहब की गुफा में रहेगी? चारों तरफ से मीठे सेब, नाशपाती, अखरोट और मिहिल के वृक्षों से आच्छादित उस लंबी रेल टनल सी बनी अंधकारपूर्ण प्राकृतिक गुहा में बहुत पहले एक विदेशी चित्रकार आकर रहने लगा था. अब ग्रामवासियों के कथनानुसार वह गुहा उसी साहब की प्रेतयोनि का स्थायी आवास बन गई थी. अपने वीभत्स महारोग को, अपनी ग्रीक देवता सी सुंदर देह में छिपाए वह विदेशी जब गुहा में रहने आया, तो उसके रोग का कोई भी बाह्य चिह्न देखने में नहीं आता था. ग्रामवासी उसे ‘पादड़ी साहब’ कहकर पुकारते थे. धीरे धीरे किसी खंदक में छिपे कुटिल शत्रु की भाँति, उसके रोग ने उस पर अचानक आक्रमण कर दिया और वह निहत्था नहीं जूझ सका. पहले हाथ की अंगुलियाँ गयीं, फिर पलकें. और एक ही वर्ष में वह बुरी तरह लँगड़ाने लगा. कुछ दिनों तक वह अपने ठूँठ से हाथों से गुहा भित्ति को अपनी अनूठी कला से विभूषित करता रहा. पर एक दिन विवश तूलिका नीचे गिर पड़ी. साहब फिर भी सहज में पराजय स्वीकार करने को तत्पर नहीं हुआ. जो कलात्मक हाथ तूलिका को धन्य करते थे, उन्होंने कुदाली थाम ली. जलना, रामगढ़ और कुल्लू से सुनहरे सेब नाशपातियों की पौध मँगाकर कोढ़ी साहब ने अपने विकृत हाथों से फल और पुष्पों के भावी नंदनवन की सृष्टि कर दी. यह ठीक था कि वह स्वयं फल खाने तक जीवित नहीं रहेगा, क्या मीठे कुएँ का पानी पीकर लोग कुआँ खोदने वाले को स्मरण नहीं करेंगे?

         इधर रोग अब छाती पर चढ़ बैठा था. एक दिन शायद उसकी मानसिक व्यथा शारीरिक व्यथा से भी अधिक असह्य हो उठी. एक ग्वाले के पुत्र को उसने कभी पढ़ाया था. वही पाव भर दूध नित्य साहब के आले में धरे मग में उड़ेल कर जाता था. एक दिन वह आया, तो मग नहीं था. खिड़की से झाँका और चीख कर भाग गया. गुहा भित्ति की किसी अदृश्य खूँटी से टँगी, साहब की निर्जीव देह झूल रही थी.

               फिर किसी को भी उस ओर जाने का साहस नहीं हुआ. अल्मोड़ा के ही दो तीन मिशनरी आकर उसी के बाग में उसे दफनाकर चले गए. तब से प्रतिवर्ष सेब और नाशपाती के वैभव से गदराए, कोढ़ी साहब के बाग का व्यर्थ यौवन अनाघ्रात पुष्प की भाँति झर झरकर मुरझा जाता. लोगों का कहना था कि गुहा की छत से झूलता कोढ़ी साहब संध्या होते ही कूद जाता है और बड़ी चौकसी से अपने बाग की रखवाली करता है. उसी ओड्यार में सुंदरी हीरावती के रहने का अमानवीय संकल्प सुनकर उसकी बहन ने कहा, “बहुत देखे हैं ऐसे ओड्यार में रहने वाले.”

            पर जब तीसरे ही दिन उस दुस्साहसिनी नारी को किसी ने साहब के बाग के सुनहरे सेब बेचने बाजार जाते देखा तो पूरा ग्राम दंग रह गया. कुछ ही घंटों में वह टोकरी भर सेब बेच अपनी नई गृहस्थी बसाने के सामान से भरी पोटलियाँ लेकर मुस्काती लौटी, तो स्त्रियों में कानाफूसी होने लगी, “देखा, कितने बड़े बम गोले से सेब आड़ू हैं. कोढ़ी साहब की हड्डियों की खाद डली है, इसी से.”

            फिर तो हीरावती हर तीसरे दिन भरी – भरी टोकरियाँ सिर पर धर मटकती बाजार को जाती. कभी नाशपाती, कभी अखरोट और कभी किसी महादानव की उँगलियों सी दैत्याकार भिंडियाँ. “लगता है कि कोढ़ी साहब के प्रेत को ही फाँस लिया है छिनाल ने, नहीं तो ये बेमौसमी भिंडियाँ आईं कहाँ से?” स्त्रियाँ कहतीं.

       पर उसकी भिंडियाँ, चाहे वे इहलोक की रही हों या परलोक की, बिककर चुटकियों में टोकरी श्रृंगार प्रसाधन की सामग्री से भर जाती थी. कभी टोकरी में धरा चौकोर दर्पण उसकी समवयस्काओं की आँखें चौंधिया जाता, कभी गौर मृणालदंड से सुकुमार हाथों में चमचमाती लाल हरी रेशमी चूड़ियाँ देखने वालों का कलेजा भूज कर रख देती. हीरावती भी जानबूझकर ही अपनी उत्तरोत्तर बढ़ती समृद्धि का इंधन ग्रामवधुओं की ईर्ष्याग्नि में झोंकती रहती. कोढ़ी साहब के बम गोले से सेबों की लालिमा ने उसके मंगोल कपोलों को अपनी अनुपम तूलिका से रंग दिया. नित्य के फलाहार ने वनदेवी के सलोने चेहरे की चिकनाई पर नवनीत का प्रलेप कर उसे नवजात शिशु के चेहरे सा सुचिक्कन बना दिया. वह जिस पथ से फलों का निर्यात करने जाती, वहाँ पर जानबूझकर ही गाँव के मनचलों की टोलियाँ चक्कर लगाने लगीं. एक तो वह जब से उस भुतही गुहा में रहने लगी थी, उसका मूल्य तरुण वर्ग में बहुत बढ़ गया था. वह गिरिशिखर, शेर और भालुओं का कुख्यात अड्डा था. उस पर तीन मील की तीखी चढ़ाई नित्य पार कर चढ़ना उतरना हँसी खेल नहीं था. फिर दिन डूबे लौटने पर कोढ़ी साहब के प्रेत का सान्निध्य. “मसान साध रही है चुड़ैल.” स्वयं उसकी बहन ही इधर-उधर कहती फिरती. पर गुहावासिनी, विचित्र कपालकुंडला को किसी की चिंता नहीं थी. श्रीधर के शिवालय की खिड़की से तुंग पर्वत की शुकनासिका सी मुड़ी चोटी पर बनी हीरावती की लंबी गुहा किसी मृत गैंडे की मटमैली देह सी पड़ी स्पष्ट दिखती थी. कभी-कभी खद्योत सा दीपक टिमटिमाता दिख जाता, और कभी गुहा की चिमनी पर मँडराती धूम लेखा. ‘क्या सचमुच ही मसान साध रही होगी हीरावती?’ श्रीधर मन ही मन सोचता.

          पगडंडियों से उतरती, उस अनुपम लावण्यमयी ग्राम्या को लोलुप दृष्टि से निहारते, वह ग्राम के कितने युवा, प्रौढ़, यहाँ तक कि वृद्धों के पोपले मुखों को भी लार टपकाते देख चुका था. यह ठीक था कि मांस के बोझ को थामने में लचक गयी कटि की मोहक भंगिमा प्रदर्शन में स्वयं उस मायाविनी की कोई कुचेष्टा नहीं रहती थी. वह मोहक लचक तो प्रत्येक कुमाउनी घसियारिन को विधाता का देवदत्त वरदान है. जिस नृत्य प्रवीणा की सी स्वर लय के साथ संगत देती चाल की शिक्षा आधुनिक युग की गगन चारिणी विमान परिचारिकाओं को माथे पर पुस्तक धर महीनों कड़े अनुशासन के चाबुक की मार से दी जाती है, उसे कुमायूँ की यह पर्वत कन्या सहज स्वाभाविकता से घास का असह बोझ सिर पर धरते ही सीख लेती है.

         ऐसी ही संगीत मुखर चाल के घुँघरू बजाती हीरावती घास का गट्ठर सिर पर धरे उतरती तो आसपास से सीटियाँ बजने लगतीं. कमर से कसकर बाँधा पिछौटा, कसी बास्कट के खुल खुल जाते बटनों पर पीली पीली मालाओं का उठता गिरता जाल और भुजंगप्रयात के से छंद में बँधी मीठी पदचाप. ‘अपने सात्त्विकी ग्राम से हीरावती की मनहूस छाया हटानी ही चाहिए मुझे.’ नित्य श्रीधर अपना एक ही संकल्प दोहराता. पर अब तो हीरावती को उसका न्याय दंड स्पर्श नहीं कर सकता था. वह तो सचमुच ही ग्राम की सरहद के बाहर थी. इधर भ्रष्टा हीरावती ने उसका सिरदर्द और बढ़ा दिया था. ग्राम के प्रवेश द्वार में उसका शिवालय था और हीरावती नित्य वहाँ से उतरते हुए अकारण खाँसती खखारती शिवालय का घंटा जोर-जोर से बजाने लगती.

        “शंभू, हरहर “कहती हुई. वह कभी-कभी उसकी सांकल भी खड़खड़ा जाती, “उठो हो जज साहब. तुम्हारी कचहरी का टाइम हो गया.”

        उसकी ओछी हँसी का स्वर श्रीधर को जहर- सा लगता. पर झुंझलाकर वह खून का घूँट पी जाता. एक तो औरत जात, ऊपर से ऐसी बेगैरत. कौन मुँह लगे. वह रजाई सिर तक खींचकर सोता रहता. एक दिन हीरावती समय से कुछ पूर्व ही आ धमकी. मंदिर का घंटा शायद उसने जानबूझकर ही नहीं बजाया. रात बीतने ही को थी कि खुसर फुसर सुनकर श्रीधर जग गया. कार्तिक का महीना था. आए दिन शिव मंदिर में पार्थिव पूजन कर गाँव की स्त्रियाँ शिवलिंग को दूध दही से नहला जातीं. हो न हो कोई कुत्ता ही शिवलिंग को चाटने घुस आया होगा. श्रीधर ने लाठी उठाई और दबे पाँव जाकर खिड़की से झाँका. कल भी ठीक आधी रात को एक काली कुतिया दूधिया शिवलिंग को अपवित्र करने घुस आई थी.

           ‘कल तो हाथ नहीं आई, आज कमर तोड़कर रख दूँगा’ सोचता श्रीधर झाँकने को बढ़ा. पर वहाँ तो कोई दूसरी ही छाया अपनी अपावन उपस्थिति से शिवालय को अपवित्र कर रही थी. शिवलिंग के सम्मुख घुटने टेके, आँखें मूँदे भावविभोर होकर हीरावती मीठे करुण स्वर में गा रही थी ——

         नरेणा नरेणा

        मेरी कइया नी कइया

        करिया नी करिया

        करिये छिमा

       छिमा मेरे परभू.

   नारायण, हे नारायण

   मेरा किया, ना किया

   कहा, अनकहा

   सब करना छिमा

   छिमा मेरे प्रभू.

दोनों आँखों से आँसू की अविरल धारा बहाती, वह शिवलिंग का अभिषेक सा कर रही थी. नित्य इन्हीं आँखों से हँसने, खिलखिलाने और चिढ़ाने वाली आनंदी हीरावती आज किस दुख से रो रही है? उस रहस्यमयी नारी के हृदय का भेद लेने को श्रीधर व्याकुल हो उठा. वह धीमे पैरों से बढ़कर खिड़की के पास सट गया. ओह, ग्राम छोड़कर जा रही है हीरावती. पास की टोकरी में उसके कपड़े, शृंगार पिटारी, बर्तन भांडे धरे हैं. शायद जुड़वां बहन की समता उसे रुला रही है या ग्रामवासियों का निर्मम व्यवहार. पर वह स्वयं रुपवती हीरावती को रुला सकता है, यह बात वह वीतरागी संयमी युवक स्वप्न में भी नहीं सोच सका. वह तो चुपचाप स्वयं ही अपनी शंका का समाधान कर कोठरी में लौट आया और सांकल चढ़ाकर सो गया. तब तक किसी भी विकार ने उसके निष्कलुष चित्त को दग्ध नहीं किया था. हीरावती उसके लिए एक ऐसी सुंदर जंगली गुलाब थी, जिसे हवा में झूमते देखना कला पारखी चित्त को निश्चय ही रूचता था, किंतु उसे तोड़कर कभी सूँघा भी जा सकता है, यह उसने कभी सोचा भी नहीं था.

             दूसरे दिन, तीसरे दिन और कई दिनों तक हीरावती नहीं दिखी. “निश्चय ही कोढ़ी साहब का प्रेत उसे अपने साथ कब्र में खींच ले गया है”, ग्राम की स्त्रियाँ कहतीं तो श्रीधर को मन ही मन हँसी आती. वह तो हीरावती को माल-असबाब सहित जाती देख चुका था. चलो, अच्छा हुआ. फोड़ा फूट गया. उसे नश्तर नहीं लगाना पड़ा.

        पर ठीक महीने भर बाद ही हीरावती एक दिन अपने गिलट के आभूषणों की नकली चमक से अपने यौवन की असली चमक को द्विगुणित करती, ग्राम भर की औरतों की छाती पर मूँग दलती, अलस पगों से पगडंडी की चढ़ाई चढ़ने लगी तो आँगन में खड़ी उसकी सौत बन गई बहन अपने क्रोध को नहीं रोक सकी.

          “कहाँ से मुँह काला करके लौटी है, अभागी? वहीं क्यों नहीं डूब मरी?” उसने चीख कर पूछा, तो कई स्त्रियों के झुंड खिड़कियों से झाँकने लगे. श्रीधर बाहर ही बैठा जनेऊ कात रहा था. नये आभूषणों से जगमगाती हीरावती थमककर पलटी, “डूबने ही तो गयी थी, दीदी.” वह हँसी और उसके गालों के दो मनोहर गढ़ों पर फहराती स्मर ध्वजा को श्रीधर ने पहली बार देखा. “डूबने कहाँ दिया मुए परदेसियों ने? कहने लगे – ‘हीरावती, ऐसी हीरे की देह को डूबाता भला कौन है? इसे तो सजाया जाता है.’ यह देखो, दीदी, चंद्रहार, हमेल मूँगे की नेपाली माला, सब ले दी परदेसियों ने.”

          घृणा से थूककर, पिरभावती ने द्वार बंद कर लिए, तो हीरावती अपनी निलज्ज हँसी की खनक से पगडंडी गुँजाती चली गई.

         फिर कई दिनों तक हीरावती नीचे नहीं उतरी. लगता था कि हमदर्द परदेशियों ने उसके कई दिनों तक नीचे न उतरने का प्रबंध कर दिया था. ‘कौन जाने, बीमार ही पड़ गयी हो?’ श्रीधर सोचता. फिर स्वयं ही झुंझला उठता. उसे क्या? मरे ससुरी हीरावती. पर झुंझलाने से क्या होता? रात को गिलट के आभूषणों में जगमगाती मेनका विश्वामित्र के स्वप्नों के रंगमंच पर उतर ही आती और ऐसा उत्पात मचाती कि श्रीधर शिवलिंग के सम्मुख औंधा होकर सुबकने लगता-” कैसा दंड दे रहे हो, भोलेनाथ? ऐसी नीच स्त्री को पाने को मैं स्वप्नों के शून्याकाश में भी बाहें क्यों फैलाता हूँ?”

         उसके संयम दुर्ग के किसी अरक्षित छिद्र से ही विकार का यह सर्प घुस आया था. अब इसको कुचलने का एक ही उपाय था. तड़के ही उठकर वह साबरमती चला जाएगा और बापू के पावन चरणों में अपने हृदय में छिपे कुटिल शत्रु को बाँध कर डाल देगा. तभी उसे शांति मिलेगी. पर हृदय में छिपा यह चतुर शत्रु क्या सहज ही पकड़ में आता है? अविवेक, विकार और मिथ्या दलीलों की पुष्ट शाखाओं पर विचरते, इस शाखामृग को मानवीय बंधन बड़ी कठिनता से जकड़ पाता है. रात ही को श्रीधर ने ग्राम त्याग दिया. पर जिस पगडंडी चढ़ उसे बस स्टेशन पहुँचना था, उसे छोड़ उसने जिस दूसरी छद्मवेशिनी पगडंडी की उंगली पकड़ी, वह अंतहीन बनती, उसे किसी गहन वन में खींच ले गई. दुरूह पगडंडी की पहेली न समझ पाने से झुंझलाया, क्लांत श्रीधर एक झरने के पास बैठा सुस्ता ही रहा था कि किसी के कराहने की आवाज से चौंका. क्या उसी की भाँति कोई मार्ग भूल गया है? माघ का महीना था. ठंढ से दाँत से दाँत बज रहे थे. सामान्य सी बूँदाबाँदी अब गर्जन-तर्जनपूर्ण शिला वृष्टि के रूप में चट्टानों पर किसी कुशल तबला वादक की दक्षता से त्रिताल के से टुकड़े बजा रही थी. वह लपककर पेड़ों के झुरमुट को छाता बनाने को बढ़ा, तो कराह की ध्वनि स्पष्ट होकर उसके पैरों से टकरा गई.

     “कौन?” अँधकार के काले कंबल ने उसका गला घोंट दिया.

     “ओह, लाल साहब, तुम हो! बचा लिया शंभो! मैं हूँ हीरावती.”

     जिन बेड़ियों का बंधन काटने वह ग्राम छोड़कर भाग रहा था, उन्हीं के लौहपाश ने उसके दोनों पैरों को जकड़ लिया. हीरावती ऐसे सिसक रही थी, जैसे सिसकी के साथ ही प्राण निकल जाएँगे.

          “घास काट कर लौट रही थी. मोच आ गयी. बस किसी तरह खींच-खांच कर मेरी गुफा में पटक दो, लाल साहब. तुम्हारे गुण नहीं भूलूँगी.”

           श्रीधर अजीब पशोपेश में पड़ गया. हीरावती को वह खूब पहचानता था. कहीं बहाना बनाकर वह छाया ग्राहिणी सिंहिका उसे अपनी गुहा में अपनी लोकप्रसिद्ध क्षुधा का ग्रास बनाने को तो नहीं खींच रही थी?

            “देर मत करो, लाल साहब! हत्यारा आता ही होगा. देखते नहीं बदबू आने लगी है.” उसने अधैर्य से कहा तो श्रीधर भी चौंक उठा. वनराज की निकट आती, असह्य दुर्गंध को जन्म से ही वनों में रहने वाला श्रीधर भी खूब पहचानता था. वह तड़पकर झुका और भीगी घास पर असहाय पड़ी हीरावती को उसने अपनी बलिष्ठ भुजाओं में उठा लिया.

       “आह, धीरे पकड़ो, लाल साहब! पैर में ठेस लग रही है. हाय! मेरा हंसिया तो उठा लो.” हीरावती ने कराहकर कहा.

       “भाड़ में जाए तेरा हंसिया. बोल, कहाँ है तेरी गुफा?” झुँझलाकर श्रीधर हाँफने लगा. हीरावती की गठी काठी का बोझ असामान्य रूप से भारी लगने लगा था.

          सहमकर हीरावती ‘इधर-उधर’ करती, कई क्षीण-दुरूह पगडंडियों का प्रदर्शन करती गुफा तक पहुँच गई.

           “बस, यहीं भीतर पटक दो मुझे. भगवान तुम्हें लाट कमिश्नर बनाए, लाल साहब! तुम न मिलते तो अभागा आज मुझे खा ही डालता.”

             गुहा में प्रवेश करते ही श्रीधर को लगा, जैसे वह किसी गर्म दहकती भट्टी के पास खड़ा हो गया–बाह्य और गुहा के तापमान में धरती आकाश का अंतर था. हीरावती को नीचे उतारकर, वह रूमाल से पसीना पोंछ ही रहा था कि अब तक पंगु बनी हीरावती छलांग लगाकर भागी और पास ही धरी एक विराट शिला को लुढ़काकर उसने गुहा द्वार बंद कर लिया.

         “बाप रे बाप!” वह लंगड़ाती हुई चट्टान का ही सहारा लेकर खड़ी हो गई.

         कभी-कभी तो बिल्ली के पंजे टेक कर आता है हरामी. देखो.” उसने श्रीधर को खींचकर दरार के पास खड़ा कर दिया. “देखो”, वह हँसकर फुसफुसाई.

         साथ ही साथ एक विकट गर्जना से वन के ओर-छोर गूँज उठे. साहसी श्रीधर को भी पसीना आ गया. गुहा द्वार पर लुढ़काई चट्टान के पास दोनों खूनी पंजे टेके, ऋषि-मुनियों की जटाजूट सी अपनी सुनहरी अयाल पीताभ स्कंधों पर बिखराए कुमाऊँ के क्रूर नरभक्षी ने दूसरी गर्जना की.

        ‘नित्य आकर ऐसे ही बैठ जाता है हरामी, कि कब मौका लगे और मुझे टप् से उठाकर मुँह में धर ले. एक-एक पंजा देखा? कितना चौड़ा है – – तुमसे भी चौड़ा.”

           बड़े लाड़ से हीरावती श्रीधर की हथेली पकड़ने को झुकी, तो वह झिड़क कर दूर हट गया, “छोड़ो, मुझे जाना है.”

        “कहाँ?” हीरावती धृष्टता से मुसकराने लगी, बाहर पंजा टेके तुम्हारा दादाजी बैठा है और इस छोटी खिड़की से तुम्हारे पहाड़ी ‘जतिया’ के से कंधे छिटक नहीं पाएँगे. बैठो, मैं आग जलाती हूँ, चाय पीकर सुस्ता लो, फिर जाना. मैं क्या तुम्हें बाँध कर रखूँगी?”

        हारकर श्रीधर बैठ गया. बाहर शायद बर्फ गिरने लगी थी. एक अद्भुत शांति और सन्नाटे से घिरे, गिरि शिखर स्तब्ध खड़े थे. चट्टान के बाहर अडिग भव्यता से विराजे वन केसरी कभी अधैर्य से गरजते, कभी-कभी धुनिया की भाँति अपने धनुष के से कंधे हिलाकर बर्फ की रुई सी धुनकर फैला देते.

           हीरावती ने मशाल सी जलने वाली लकड़ी (छिलुक) को जलाकर चूल्हे के पास गाड़ दिया था. उसी तीव्र शिखा से आलोकित गुहा की चित्र प्रदर्शनी देख कर श्रीधर स्तब्ध रह गया. क्या यह कोढ़ी साहब की एक ही दिव्य तूलिका का चमत्कार था? कहीं कांगड़ा-गढ़वाल शैली की कृष्णवधू वर्षा मुखरित रात्रि के अभेद्य अंधकार की कुण्डलिया कुचलती, अभिसार के पथ पर चली जा रही थी. कहीं एड़ियाँ टिकाए प्रियतम की प्रतीक्षा में द्वार पर खड़ी, चौखट में मढ़ी सुप्रिया. कहीं गुजरात की सोलंकी मूर्तिकला को लज्जित करती, दोनों हाथों की चंपक उंगलियों से नग्न वक्षस्थल ढाँपती अप्सरा और अजंता के भित्ति चित्रों के गांभीर्य का जाल बुनती शैव द्वारपाल की अविकल प्रतिमूर्ति. खजुराहो और कोणार्क के शार्दूल, सुर-सुंदरियाँ, शालभंजिकाएँ और अपूर्व सुंदरी नाग कन्याओं के जाल में भटकता, कला पारखी मुग्ध श्रीधर पूरी गुहा की परिक्रमा करता, चट्टान के उसी द्वार पर पहुँच, हाथ में गर्म चाय का गिलास थामे खड़ी हीरावती से टकरा गया.

             गर्म चाय ठंडे पैरों पर छलकी तो वह चौंका.

       “लगता है मेरे रनिवास महल ने लाल साहब को मोह लिया है. देखा न बगुला भक्त साहब को? बड़ा पादरी बना फिरता था. पेट में ऐसी विद्या भरी न होती, तो अकेली गुफा में भला ऐसी-वैसी नंगी औरतों की फोटो उतारता? कहीं अपने ईसा की भी एक तस्वीर बनाई पादरी साहब ने? लो, चाय पियो. देखूँ, चौकीदार गया या नहीं.” श्रीधर को गिलास थमा, उसने खिड़की से झाँका.

        “गया हत्यारा. कितनी बर्फ गिर गई है. एकदम बदरी केदारनाथ बन गया है. एक बार बर्फ गिरने पर यहाँ सात-आठ दिन तक नहीं गलती. चलो, अकेली से दुकेली भली.” वह चाय की चुस्कियाँ लेती श्रीधर के पैरों के पास खिसक आई.

         मूर्खा हीरावती. वह क्या सोचती है कि श्रीधर कभी बर्फीली पगडंडियों पर चला ही नहीं है? अभी देख लेगी, कि कैसे दोनों हाथ फैलाकर स्केट सा करता, वह हवा के झोंके सा निकल जाएगा. वह चट्टान हटाने को बढ़ा ही था कि बर्फीली हवा के एक तीव्र झोंके ने लकड़ी की मशाल को झपट्टा मारकर बुझा दिया. घने अंधकार में डूबा वह इधर-उधर हाथ पैर मारने लगा. जिधर बढ़ता, उधर ही दो सुकोमल बाँहों का बंधन उसे जकड़ लेता. एक ही हीरावती के क्या खिलखिलाते-हँसते कई संस्करण बन गये थे? या गुहाभित्ति की सुर सुंदरियों, अप्सराओं और उल्का नायिकाओं को कोढ़ी साहब के अदृश्य प्रेत ने जीवित कर धरा पर अवतरित कर दिया था? पर मीठा कंठ स्वर तो एक ही कंठ का था, और उसे खूब पहचानता था श्रीधर. वह तो निश्चय ही इसी लोक की थी.

           “मूर्ख मत बनो.” हीरावती कहने लगी, “कहाँ भाग रहे हो? ऐसी बर्फीली रात में तो चिड़िया भी डाली पर अकड़ी मरी मिलती है. फिर तुम क्या सोचते हो, कि मेरा चौकीदार चला गया होगा? तुम्हारी ही ताक में छिपा किसी खंदक में बैठा होगा. ऐसी कंचन सी देह उस हरामी के पेट में जाने दे, ऐसी मूर्ख नहीं है हीरावती.”

           वह पालतू बिल्ली सी उसके कंधे से अपने सुकोमल कपोल घिसती और भी निकट खिसक आई. उसने अभी किसी भी स्त्री का स्पर्श तो दूर उसकी छाया का भी स्पर्श नहीं किया था. वह इस घातक अनुभव से तिलमिला उठा. एक नरभक्षी बाहर था, तो दूसरी नरभक्षिणी भीतर. अचानक उसकी संयमित चेतना सुप्त अग्नि-सी जगकर फुफकार उठी.

           “दूर हट, तूने मुझे समझा क्या है?” वह उत्तेजना, विवशता और क्रोध से बुरी तरह हाँफता, चट्टान उठाने को बढ़ा तो हीरावती दोनों हाथों को बाँधे, मार्ग अवरूद्ध कर खड़ी हो गई, “मैं भी देखती हूँ कि कौन माई का लाल हटा सकता है मुझे.”

       जितनी बार श्रीधर उसकी दर्पपूर्ण चुनौती से जूझने को आगे बढ़ता उतनी ही बार सतर्क खड़ी, हीरावती की कंचन सदृश देह की दुर्भेद्य प्राचीर उसे बिजली के सौ सौ तारों से झनझना देती. पता नहीं कब तक दोनों रात्रि के सूचीभेद्य अँधकार में साँप-नेवले की भाँति अपने आमने सामने तने खड़े रहे. अंत में जीत नेवले की ही हुई.

        “आओ”, पराजित योद्धा के दोनों हाथ पकड़कर हीरावती ने मृदुल स्वर में कहा, “तुमने क्या मुझे इतनी ओछी समझा है? मैं कभी झूठ नहीं बोलती. मेरे पास दो पुआल के गद्दे हैं. एक में तुम निश्चिंत होकर सोते रहना. जो तुम्हें छुए, साली गोमांस खाए.” हीरावती ने न जाने किस ताक से पुआल का गद्दा उठाकर जमीन पर डाल दिया और उसे हाथ पकड़कर ऐसे ले चली जैसे फूल शैय्या की ओर किसी सलज्ज बालिका नववधू को ले जा रही हो.

          सचमुच ही झूठ नहीं बोलती थी हीरावती. दूसरे पुआल के गद्दे को खींच कर पटके जाने की शब्द बेधी क्रिया से साँसे रोककर लेटे श्रीधर ने अनुमान लगाया कि शत्रु पक्ष ने अपने दूसरे गद्दे का खेमा गाड़ने में व्यवधान रखा था, और उसमें उसकी कोई कुटिल चाल नहीं थी.

             थोड़ी ही देर में हीरावती निष्पाप शिशु की सी निद्रा में डूब गयी. पर श्रीधर व्याकुल करवटें बदलता रहा. अब सोने वाली स्वयं ही मार्ग से दूर हट गयी तो दूसरी चिंता निद्रा अपहरण करने लगी. यह दूसरा पुआल का गद्दा क्यों रखती थी हीरावती? क्या निशाचर अतिथियों के रात्रि यापन की व्यवस्था का प्र‌श्न प्राय: ही इस गुहा निवासिनी के सम्मुख आता होगा?

        पर उसका माथा क्यों दुख रहा है भला? ग्राम में हीरावती को कौन नहीं जानता? यह कौन सी दूध की धुली सती सावित्री है?

          इसी उधेड़बुन में न जाने कब उसकी आँख लग गयी. सुबह उठा, तो हीरावती ने शायद खिड़की का पत्थर हटा दिया था. सूर्य का क्षणिक मुट्ठी भर उजाला गुहा में फैलता गुहाभित्ति की अनूठी चित्रकला का नवीन रूप प्रस्तुत कर रहा था. वह मुग्ध दृष्टि से चित्र प्रदर्शनी के वैविध्य को देख ही रहा था कि उसकी आँखें स्वयं हीरावती की ओर घूम गयीं. उसे लगा कि झुक कर आग फूँकती रूपवती हीरावती को वह आज पहली बार देख रहा था.

            हीरावती को भी शायद उसकी मुग्ध दृष्टि गुदगुदा गयी. मुस्कराकर उसने सिर उठाया तो झेंपकर श्रीधर ने सहसा दृष्टि ऐसे फेर ली जैसे चोरी करते हुए रंगे हाथों पकड़ लियागया हो.

       “लो, गरम चाय पियो” हीरावती ने उसे गिलास थमाया और अपना पुआल का एकमात्र गद्दा लपेटने लगी.

       तो क्या अपने सब पहाड़ी थुल्मे नम्दे उसे ओढ़ाकर वह रात भर ठिठुरती रही?

       “बहुत बरफ गिर गई है. तीन चार दिन तक सूरज नहीं निकलेगा.” हीरावती ने खिड़की से झाँककर कहा.

          सूर्य देवता से भी क्या हीरावती की साँठ गाँठ थी? चार दिन तक निरंतर बर्फ गिरती रही. चट्टान को भी बर्फ की मोटी तहों ने जम जमाकर अदृश्य कर दिया. भीमकाय मिहिल मंदार और देवदारू के वृक्ष हिम भार से दातौन से तड़ाक तड़ाक टूटने लगे. बचपन में पढ़ी भूगोल की पुस्तक में चित्रित, अपनी इग्लू सी हिमाच्छादित गुहा में श्रीधर बंदी शेर की भाँति चक्कर लगाता रहता.

         “लाख सिर पटको, जज साहब”, हीरावती हँसकर कहती है, “एक कदम भी बाहर नहीं निकल सकते.”

            वैसे हीरावती ने अपने रूखे पाहुने की अभ्यर्थना में कोई त्रुटि नहीं रहने दी थी. न जाने किन अदृश्य तालों से वह छोटी-मोटी पोटलियाँ निकालती रहती. दाख, अखरोट, जर्दालू, भुने काजू, खोये के पेड़े, सोहन हलुवा, भाड़ में भुंजी पहाड़ी गेठी और धानी नमक. वह सुरदुर्लभ खाद्य-सामग्री उसकी मेजबान ने रुद्राक्ष की माला जपकर नहीं जुटाई होगी, यह खूब समझता था श्रीधर. ऐसी हराम की कमाई को वह भला हाथ कैसे लगाता? दो दिन उसने काली चाय के अधसेरी गिलास गटककर काट दिए . सूखा-सा मुँह लटकाए हीरावती भी भूखी ही सो जाती. पर तीसरे दिन हीरावती ने सोए हुए शत्रु पर ही आक्रमण कर दिया. श्रीधर के उठने से पहले ही उसने न जाने किन-किन खुशबूदार पहाड़ी गंध्रैणी और जम्बू के ऐसे मसालों से सब्जी छौंक दी कि श्रीधर अपने सारे संस्कार और नाज-नखरे भुला-बिसराकर रह गया. पहाड़ी घाट के पिसे गेहूँ की सोंधी-सोंधी मक्खन चुपड़ी रोटी पर सब्जी धरकर, हीरावती ने अतिथि के दोनों पैर पकड़ लिए, “क्यों भूखे-प्यासे बैठे हो लाल साहब! मैं क्या डोमनी हूँ ? फिर तुम तो गांधी बाबा के भक्त हो. वह तो मेहतरों के हाथ की भी छूत नहीं मानते.”

           इस दलील ने श्रीधर को पराजित कर दिया. फिर तो पता नहीं एक के बाद एक वह कितनी रोटियाँ चट कर गया. शायद हीरावती के लिए कुछ बचा ही नहीं. खा-पीकर वह सोया, तो कुम्भकरणी नींद पूरी होने का नाम ही नहीं लेती थी.

           गुहा के अन्धकार में रात्रि और दिवस के अंतर का प्रश्न ही नहीं उठता था. पर उस दिन पता नहीं क्यों, हीरावती ने नित्य की मशाल भी नहीं जलाई थी. बर्फीली हवा के एक तीव्र झोंके से गहन निद्रामग्न श्रीधर अचानक हड़बड़ाकर उठ बैठा. हड्डियों को छेदनेवाली इस ठण्डी हवा में ठिठुरती, हीरावती बिना कुछ ओढ़े पुआल के गद्दे पर बैठी होगी, यह ध्यान आते ही श्रीधर को अपने स्वार्थ पर स्वयं ही क्षोभ हो उठा.

           “हीरावती, तुम्हारे पास क्या ओढ़ने को कुछ भी नहीं है?” उसने पूछा.

           जो व्यक्ति तीन दिन से बिना एक शब्द बोले, उसे आँखों-ही आँखों में अपने विकट क्रोध की ज्वाला से निरंतर भूँज रहा था, उसका हमदर्दी  में डूबा बदला गिरगिटी रंग देखकर, हीरावती चौंकी. पर जैसे तप्त दहकती मरूभूमि में वर्ष की पहली बूँद पड़ते ही सूखकर विलीन हो जाती है, ऐसा ही श्रीधर का सरस प्रश्न भी कंठ से निकलते ही सूखकर रह गया.

            हीरावती ने कोई उत्तर नहीं दिया. पर अन्धकार में ठक-ठक काँपती मानिनी की व्यथा चार कंबलों से लदे सोनेवाले को छू गई. जिसकी रूपशिखा का स्वप्न कई दिनों तक उसकी नींद में डूबी पलकों को झुलसता रहा था, वही उस अंतहीन माघी विभावरी में उसकी जगी पलकों पर साकार होकर थिरकने लगा.

           “हीरावती!” उसने थर्राए-भर्राए कंठ-स्वर से पुकारा. पुरुष-कंठ के इस भर्राए-थर्राए कंठ-स्वर के आह्वान को तो हीरावती खूब पहचानती थी. विमुग्ध, विस्फारित दृष्टि से अन्धकार को चीरती मुग्धा अभिसारिका ने एक क्षण का भी विलम्ब नहीं किया.

            दूसरे दिन गुहा-वातायन की क्षीण-कटि से पाँच दिन से रूठे सूर्य ने धरा पर गिरी बर्फ का प्रतिबिंब लेकर अपना दर्पण चमकाया और श्रीधर चौंककर जग गया . उसके कंधे पर माथा धरे हीरावती ऐसी अंतरंग धृष्टता से सो रही थी, जैसे वर्षों से उसी कंधे पर सोती चली आ रही हो.

          “भारद्वाज गोत्रोत्पन्न श्रीधर शर्मणस्य सकल इप्सित कामना….” कुछ ही दिन पूर्व शिवालय में पार्थिव-पूजन के समय किया गया संकल्प श्रीधर को स्मरण हो आया. हड़बड़ाकर वह उठने लगा.

           हीरावती जग गई. “क्या कर रहे हो? लेट जाओ न. ठंड लग रही है.” दोनों हाथों से उसे जकड़कर, उसने फिर अपने पार्श्व में सुला लिया.

           पल-भर को निकला सूर्य फिर किसी मेघखंड में दुबक गया और तड़ातड़ ओलों के चांटे मार-मारकर प्रकृति ने एक बार फिर श्रीधर के विवेक को दूर भगा दिया.

          हीरावती अब उसे धागे में बंधी काठ की चरखी-सी घुमाती, किसी भी दिशा में उछालकर फिर अपनी और खींच सकती थी. वह अब संस्कारी, सुशिक्षित, भारद्वाज गोत्रोत्पन्न श्रीधर शर्मा नहीं था, वह तो अब सदियों के मलबे से निकला आदिकाल का गुहा-मानव था, जिसका न कोई गोत्र ही था, न कोई संस्कार. वह डांसी पत्थरों को रगड़कर आग जलाना सीख गया था, जंगली सुखाए-भुंजे मांस को चिचोड़-चिचोड़कर खाने की क्रिया में वह अपनी गुहा-प्रेयसी के हाथ से अधिक चर्बीली बोटी को लपककर छीन, अपने असभ्य जंगली ठहाके से गुहा की दीवार गुंजा देता. कभी उसे बांहों में भींच ऐसे रख देता था, जैसे कीमा ही बना देगा. इस युग का पहला बीटनिक शायद वही था. और हीरावती? उसी को मॉडल बनाकर क्या पादड़ी साहब ने गुहा-भित्तियां अलंकृत की थीं? बंकिम कटाक्ष; मंदोदरी की लचक, सुडौल अंग का उभार यदि इंच-टेप से भी नापे जाते तो दीवार पर अंकित अपूर्व सुंदरियों की काठी में ठीक बैठती.

       “हीरावती!” एक दिन जान-बूझकर भी, वह एक मूर्खतापूर्ण प्रश्न कर बैठा. वह तो जानता था कि हीरावती कभी झूठ नहीं बोलती, “गाँववाले जो तेरे लिए कहते हैं, वह क्या सच है, हीरावती?”

        हीरावती का चेहरा फक पड़ गया. इतने आमोद-प्रमोद के उत्सव के बीच जैसे उसे किसी ने झोंटा पकड़कर ज़मीन पर घसीट लिया हो.

        वह एक शब्द नहीं बोली. रक्तहीन कपोलों पर टपकते आंसुओं ने ही श्रीधर के प्रश्न का उत्तर दे दिया.

        बात सच न होती तो क्या मुखरा हीरावती चुप बैठी आँसू बहाती?

        एक लंबी सांस खींचकर वह उस दिन बिना खाए ही उठ गया. छि:-छि: , कैसी नीच औरत थी हीरावती ! बर्फ न गिरी होती और मौसम साफ़ होता तो शायद वह गुफा में ही हीरावती के एक-दो प्रेमियों से टकरा जाता.

         उस दिन भी हीरावती न जाने कब तक चूल्हे के पास भूखी बैठी काँपती रही. कभी खाँसता, कभी उसाँसे भरता, कभी अकारण ही कराहता श्रीधर करवटें बदलता रहा. पर अंत में भूखा भिक्षु विवाह-भोज के छप्पन व्यंजनों की जूठन देख, एक बार फिर अपना विवेक, संस्कार, निष्ठा- सब भूल-भालकर, जूठी पत्तलों की ओर बढ़ गया.

          “हीरावती !” उसके थर्राए-भर्राए कंठ स्वर ने पुकारा.

          और फिर हीरावती भला क्यों चूकती?

   छठे दिन कड़ी धूप ने बर्फ पिघलाकर बहा दी थी. हीरावती टूटे वृक्षों की टहनियाँ बटोरने चली गयी थी. खिड़की पर श्रीधर खड़ा हुआ ही था कि सुदूर घाटी से गूंजते शिवालय के घंटे की ध्वनि सुन, उसका रोम-रोम सिहर उठा. “पूर्वकृत पापों ने बहुत दंड दे दिया है, प्रभु.”

        उसने अदृश्य शिवलिंग की ओर हाथ जोड़े, “मुझे क्षमा करो, और शक्ति दो.” कहता, वह बिना गुहा की ओर दृष्टिपात किए, तीर-सा निकल गया.

        फिर उसने अपने ग्राम की देहरी आज तक नहीं लांघी. शनि की दशा की भांति उसके जीवन में आ गई हीरावती की क्रूर दृष्टि को उसने कवच-कीलकों से प्रभावहीन कर दिया. एक लंबे अरसे तक वह देशप्रेम का अनोखा दु:साहसी दीवाना बना फिरता रहा. न उसे ललमुँहे गोरों का भय था, न पुलिस की लाठी का.

        एक बार हीरावती का समाचार उसे जेल ही में मिला था. उसी का परिचित एक साथी उसे जेल में मिलने आया था. “अपने गाँव की हीरावती भी तो इसी जेल में थी. आज ही बरेली ले गए हैं उसे.”

        हीरावती ! सहसा अल्मोड़ा जेल की काली चारदीवारी पर असंख्य सुर-सुंदरियाँ और नाग कन्याएँ अंकित हो गईं. ‘हीरावती! वह क्या करने आई है यहाँ?’ और फिर तो उसके जघन्य अपराध की विस्तृत वर्णना सुन श्रीधर स्तब्ध रह गया.

        अलकनंदा में अपने नवजात शिशु पुत्र की मूड़ी डुबोए, हीरावती को ग्राम के डाकिये ने देखा और जब तक वह भागकर पटवारी को बुलाकर लाया, नन्हीं लाश को तीव्र लहरें अदृश्य कर चुकी थीं.

“ऐसी बेहया नंगी औरत है,” उसका साथी कह रहा था, “हमारे गाँव की इज्जत मिटटी में मिला दी. हाकिम ने पूछा, ‘हीरावती देवी, क्या यह सच है कि तुम अपने बच्चे की मूड़ी नदी में डुबोए बैठी थी.’

      “सिर झुकाए, वैसे ही मुस्कराती रही हरामी, जैसे तुम्हारी अदालत में मुस्कराती रही थी.

      “ ‘किसका था?’ हाकिम ने पूछा तो बोली, ‘सरकार, आप तो दिन-रात पहाड़ों का दौरा करते हैं. कई झरनों का पानी पीते होंगे. कभी आपको जुकाम भी हो जाता होगा.क्या आप बता सकते हैं कि किस झरने के पानी से आपको जुकाम हुआ है?’

     “कटकर रह गए हम लोग, अब भुगत रही है, हत्यारिन !”

      आज इतने वर्षों पश्चात् उसी हत्यारिन की स्मृति श्रीधर को विह्वल कर रही थी. क्या अब भी वहीँ रह रही होगी? क्या सचमुच ही उन सुकुमार हाथों ने अलकनंदा की तीव्र हिमशीतल लहरों में किसी नन्ही सी देह को निर्ममता से बहा दिया होगा?

      श्रीधर ने हाथ की घड़ी देखी. भाषण की एक भी आवृति पूरी नहीं कर पाया था. न जाने किन-किन चिंताओं के गड़े मुर्दे उखाड़ने में स्वयं ही सिर दर्द मोल ले लिया. चिन्ताएँ भी क्या एकाध थीं? रुग्णा पत्नी का चिड़चिड़ा, विलासी स्वभाव उसे बुरी तरह उबा देता और वह वनबिलाव सा अनावश्यक दौरों में जंगलों की ख़ाक छानता फिरता. चारों पुत्रियों का विवाह कर चुका था, पर चारों जामाताओं की ठगी प्रथा को विलियम बैंटिक की ही भांति जड़ से उखाड़ने के प्रयत्न में वह घर-भर से बैर मोल ले चुका था. उधर इकलौते पुत्र ने लड़कियों के-से बाल बढ़ा लिए थे और पुरखों की कुल-कीर्ति पर झाडू फेरकर रख दी थी. विद्यार्थियों की हड़ताल हुई तो काला झंडा लिए, उसके कुल-दीपक ने ही स्वयं पिता का पुतला जला, विद्यार्थी समाज में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया था. जहाँ नेता का पद प्राप्त करने में पिता को अपना सर्वस्व त्यागना पड़ा था, वहीं पुत्र ने तीन ही दिन में सात बसें जला, असंख्य सरकारी इमारतों के बेंच तोड़, एक रेलगाड़ी उलट, नेता का सर्वोच्च पद अनायास ही प्राप्त कर लिया था. उसी अशांति से बचने श्रीधर सिर मुंडाकर घर से भागा, तो ओले पड़ने लगे. अपनी जन्मभूमि के सूखाग्रस्त इलाके का हवाई दौरा करने निकला, और उस विस्मृत घाटी में झंखाड़-से ताजमहल के गुंबद ने दबे नासूर को फिर उभार दिया.

         “सॉरी, सर!” पी.ए. ने खिसियाए विवश स्वर में कहा, “आपसे मिलने एक पगली-सी औरत आई है. कहती है कि आप ही के गाँव की है. बस दर्शन करके चली जाएगी. मानती ही नहीं.”

    पी.ए. अपना वाक्य पूरा भी नहीं कर पाया था कि पगली-सी औरत सिर पर मैली पोटली में गुड़ की भेली बाँधे सजे कक्ष के रेशमी पर्दे के पास फटे पैबंद-सी चिपक गई.

    “यह कैसे आ गयी यहाँ? क्या मेरी इच्छाशक्ति इसे खींच लाई?” मन-ही-मन श्रीधर सोचने लगा. पर विरोधी पक्ष की दुधारी तलवारों से दिन-रात जूझनेवाला सेनानी चौकन्ना हो गया. उसका पी.ए. एक नंबर का घाघ था. कहीं हीरावती के कलुषित अतीत का आंशिक विवरण भी सुन लिया होगा तो प्रेस रिपोर्टर की सतर्कता से मन की कलम संभाल ली होगी पट्ठे ने. और दिन-रात अपने कई सहकर्मियों की चरित्रहत्या को क्या स्वयं दिन-दहाड़े नहीं देख चुका है?

    “आओ, आओ, बहन हीरावती,” उसने हँसकर कहा.

    हीरावती चौंकी. अब तक वह मुग्ध दृष्टि से श्रीधर के विलासी कक्ष के भित्ति-चित्रों को ठीक वैसे ही देख रही थी, जैसे पच्चीस वर्ष पूर्व श्रीधर ने उसकी गुहा-भित्ति को देखा था.

    “बैठो, हीरावती!”  क्लांत स्वर में अब प्रणयी का घर्राया आह्वान नहीं था. यह तो एक थका-मांदा पथिक दूसरे पथिक को दो घड़ी साथ बैठकर सुस्ताने का स्नेहपूर्ण निमंत्रण दे रहा था. पर सकुची-सिमटी-सी हीरावती मखमली सोफे पर नहीं बैठी. वह सिर की पोटली बिना उतारे ही, श्रीधर के चरणों के पास ऐसे बैठ गयी, जैसे गली के शरारती छोकरों के ढेले-पत्थरों से नित्य मारकर भगाई गई कुतिया को बहुत दिनों से बिछुड़े मालिक ने पुचकारकर बुला लिया हो, और वह डरती हुई, बड़े अविश्वास से आगे बढ़ रही हो.

    “हीरावती, तुम चुप क्यों हो?” श्रीधर का गला भर्रा गया.

 इतने वर्षों बाद भी इस अलौकिक नारी की उपस्थिति उसे झूमते, सम्मोहित नाग-सा झुमा रही थी.

     कितना झटक गई थी हीरावती. फिर भी छरहरे बालों में चाँदी चमकने लगी थी. होठों की मधुर लालिमा नीली पड़ गई थी. निमग्न नयनों की काली भँवर पुतलियों ने कितनी पीड़ा सही थी, उसका लेखा-जोखा लिखने में अनाड़ी विधाता ने स्याही आँखों के ही नीचे फैलाकर रख दी थी. फटी बास्कट पर झूलती असंख्य मालाओं के बचे-खुचे दो-तीन मोटी, उसके विगत यौवन के बिखरे मोतियों की ही भांति एक मैले-से काले पड़े डोरे में बंधे लटक रहे थे.

     “कहाँ रहती हो अब?” श्रीधर ने दूसरा प्रश्न पूछा.

     “वहीँ साहब के ओड्यार में.”

  गला भी न जाने कैसा भारी-भारी हो गया था हीरावती का. जिसे विदेशी ‘व्हिस्की वायस’ कहते हैं, ऐसी ही बैठी आवाज, क्या पीने भी लगी होगी अभागी?

      “तुमने ऐसा क्यों किया हीरावती?” प्रश्न के कंठ से छूटते ही, श्रीधर को पसीना छूटने लगा. क्यों कर बैठा ऐसी मूर्खता? क्या वह नहीं जानता था कि हीरावती कभी झूठ नहीं बोलती?

      “जनमते ही उसने आँखें खोलीं.” हीरावती ने मैली ओढ़नी से आँखें पोंछी. “मैंने पहचान लिया. अदालत में मैं पहली बार झूठी बनी. तुम्हारी ही कंजी आँखें थीं. यही नाक. वैसे ही टेढ़े होंठ कर मुस्कराया भी था दुसमनिया. सोचा कि मैं तो बदनाम हूँ ही, तुम्हें कीचड़ में क्यों घसीटूं? सारा गाँव तुम्हें पूजता था. बड़ा होता, सब पहचान लेते कि किसका बेटा है.”

      श्रीधर पत्थर की मूरत बना बैठा रहा.

      “चलूँ, लाल साहब. मोटर का टैम हो गया है. बाहर के साहब से कह आई थी कि बस दरसन करके चली जाऊँगी.”

       और दर्शन करके ही चली गई हीरावती. वह क्या कभी झूठ बोलती थी? न एक शब्द उपालम्भ का, न लांछन का, न याचना का, न अधिकार का.

        सिर पर मैली ओढ़नी से बंधी गुड़ की भेली धरे, वह चली गई.

        किसने कहा है, इमर्सन ने या किसी और ने कि संसार की अदालत अभियुक्त को भले ही क्षमादान देकर मुक्त कर दे, स्वयं उसके अंतःकरण की अदालत कभी क्षमा नहीं करती.

        आज इसी अदालत में बेड़ियों से जकड़ा वर्षों का फरार अपराधी सिर झुकाए खड़ा था.

        अचानक वह उठा. सिर की टोपी उतारकर दूर पटक दी. एक ग्रामीण की भेंट की गई मोटे ऊन की खुरदरी पंखी निकाल, उसने ओढ़नी की भांति लपेट ली. अब कोई नहीं पहचान पाएगा उसे. पिछवाड़े की खिड़की से कूदकर वह सड़क पर निकल आया. इधर-उधर देखता, वह मंदिर की ठंडी सड़क पर पहुँच गया. ताल की कगार स्पर्श करती ढलने को तत्पर, ऊंचे-ऊंचे विलो वृक्षों की लंबी कतार. सूनी सड़क पर ठंड से ठिठुरते एक-आध कुली. और पंखों में लिपटा किसी ग्रामीण-सा गँवारू बना स्वयं श्रीधर. बीच-बीच में ताल की हिम-शीतल हवा कानों में थप्पड़-सी मार जाती और वह कछुए की तरह गर्दन सिकोड़ लेता. मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़कर वह सुस्ताने लगा.

     निभृत मंदिर के सम्मुख लगी छोटी-बड़ी घंटियों की कतार को छूते ही जलतरंग की मधुर खनक से देवालय गूँज उठा. वह मीठी खनकती घंटियाँ श्रीधर को अतीत की विस्मृत घाटी में अंगुली पकड़कर खींच ले गई.

     इसी गुहास्थित पाषाण देवी की स्निग्ध सिन्दूरी मूर्ति के सम्मुख नतमस्तक हो, उसने कितना कुछ माँगा है. पुत्रियों के लिए वर, कर्कश पत्नी से मुक्ति, कुपुत्र को सन्मति, चुनाव की जीत. पर न तो मोक्ष की आकांक्षा है, न वैभव की. पंखी में लिपटा, दीन-दरिद्र याचक आँखें मूँदे मूर्तिवत खड़ा रहा. क्षण-भर को उसे लगा कि शरीर से उपस्थित न होने पर भी काला फटा लहंगा फटफटाती, सिर पर मैली पोटली में गुड़ की भेली धरे, डरी-सहमी उसकी आदर्शिनी गुहा-प्रेयसी उसके पास सट कर बैठी, करुण स्वर में गा रही है:

        “कइया नी कइया, करिया नी करिया

         करिए छिमा, छिमा मेरे परभू.”

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शिवानी

शिवानी

जन्म: 17 अक्तूबर 1923, राजकोट, मृत्यु: 21 मार्च 2003, नई दिल्ली कहानियाँ : करिये छिमा, लाल हवेली, पिटी हुई गोट उपन्यास: मायापुरी, कृष्णकली, चौदह फेरे, कैंजा, अपराधिनी
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