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साहित्य इतिहास

अमीर खुसरो

अनुमानित समय : 5 मिनट-
अमीर खुसरो को खड़ी बोली हिन्‍दी का पहला कवि माना जाता है. इस भाषा का हिन्‍दवी नाम से उल्‍लेख सबसे पहले उन्‍हीं की रचनाओं में मिलता है. हालांकि वे फारसी के भी अपने समय के सबसे बड़े भारतीय कवि थे, लेकिन उनकी लोकप्रियता का मूल आधार उनकी हिन्‍दी रचनाएं ही हैं. अबुल हसन यमीनुद्दीन मुहम्मद का उपनाम खुसरो था, जिसे दिल्ली के सुलतान ज़लालुद्दीन खिलज़ी ने अमीर की उपाधि दी. उन्होंने स्वयं कहा है- ‘’मैं तूती-ए-हिन्‍द हूं. अगर तुम वास्तव में मुझसे जानना चाहते हो तो हिन्दवी में पूछो. मैं तुम्हें अनुपम बातें बता सकूंगा.’’ एक अन्‍य स्थान पर उन्होंने लिखा है, ‘’तुर्क हिन्दुस्तानियम मन हिंदवी गोयम जवाब (अर्थात् मैं हिन्दुस्तानी तुर्क हूं, हिन्दवी में जवाब देता हूं.)’’
 अमीर खुसरो को दिल्‍ली सल्‍तनत का राज्‍याश्रय हासिल था. अपनी दीर्घ जीवन-अवधि में उन्‍होंने गुलाम वंश, खिलजी वंश से लेकर तुगलक वंश तक 11 सुल्‍तानों का सत्ता-संघर्ष देखा था,लेकिन राजनीति का हिस्‍सा बनने के बजाए वे निर्लिप्‍त भाव से साहित्‍य सृजन व सूफी संगीत साधना में लीन रहे. अक्‍सर कव्‍वाली व गजल की परंपरा की शुरुआत अमीर खुसरो से ही मानी जाती है. उनकी रचना ‘जब यार देखा नैन भर।।’ को अनेक विद्वान हिन्‍दी की पहली गजल मानते हैं. उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत की खयाल गायकी के ईजाद का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है. कहा जाता है कि उन्होंने ध्रुपद गायन में फारसी लय व ताल को जोड़कर खयाल पैदा किया था. लोकमान्यता है कि उन्होंने पखावज (मृदंग) को दो हिस्सों में बांटकर ‘तबला’ नाम के एक नए साज का ईजाद किया.
माना जाता है कि अमीर खुसरो का जन्म ईस्‍वी सन् 1253 में उत्तर प्रदेश के एटा जिले में पटियाली नामक गांव में गंगा किनारे हुआ था. खुसरो की मां दौलत नाज़ एक भारतीय मुलसलमान महिला थीं. वे बलबन के युद्धमंत्री अमीर एमादुल्मुल्क की पुत्री थीं, जो राजनीतिक दवाब के कारण हिन्‍दू से नए-नए मुसलमान बने थे. इस्लाम धर्म ग्रहण करने के बावजूद इनके घर में सारे रीति-रिवाज हिन्दुओं के थे. इस मिले जुले घराने एवं दो परम्पराओं के मेल का असर बालक खुसरो पर पड़ा. आठ वर्ष की अवस्था में खुसरो के पिता का देहान्त हो गया. किशोरावस्था में उन्होंने कविता लिखना प्रारम्भ किया और बीस वर्ष के होते होते वे कवि के रूप में प्रसिद्ध हो गए.
जब खुसरो केवल सात वर्ष के थे,उनके पिता उन्हें लेकर हज़रत निजामुद्दीन औलिया की सेवा में उपस्थित हुए. इसी समय से आजीवन खुसरो औलिया के अनुयायी बने रहे.
अमीर खुसरो बहुभाषा विद् थे. वे फ़ारसी, तुर्की और अरबी भाषा के प्रकांड पंडित थे. खड़ी बोली उन्हें विरासत में मिली थी. संस्कृत पर भी उन्हें पूरा अधिकार था. बंगाल, पंजाब, अवध, मुलतान, देवगिरी आदि स्थानों पर रहकर उन्होंने भारत की अनेक भाषाओं की जानकारी प्राप्त की थी. अमीर खुसरो भारत के पहले ऐसे कवि हैं जिन्होंने समस्त भारतीय भाषाओं का सर्वेक्षण अपनी मसनवी नूह सिपहर में किया है जिसका ऐतिहासिक महत्व है. सर जार्ज ग्रियर्सन के लगभग छ: सौ वर्ष पूर्व भाषाओं की जो स्थिति खुसरो द्वारा बताई गई थी, वह आज भी विद्यमान है. खुसरो ने स्वंय अपने ग्रंथ में लिखा है कि उन्होंने स्वंय कई भाषाओं के संबंध में जानकारी प्राप्त की है और उनमें से कई वे बोलते व समझते हैं.
ख़ुसरो में भाषा संबंधी पूर्वाग्रह नाम भर का भी न था. यही कारण है कि उन्होंने अनेक रचनाओं में फ़ारसी के साथ-साथ हिन्दी का प्रयोग किया. अमीर खुसरो द्वारा रचित एक चर्चित ग़ज़ल है –
“जिहाल-ए-मिस्कीं मकुन तगाफुल, दुराय नैना बनाय बतियाँ.
किताबे हिज्राँ, न दारम ऐ जाँ, न लेहु काहे लगाय छतियाँ।।
शबाने हिज्राँ दराज चूँ जुल्फ बरोजे वसलत चूँ उम्र कोताह.
सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ.
यकायक अज़दिल दू चश्मे जादू बसद फरेबम बवुर्द तस्कीं.
किसे पड़ी है जो जा सुनावे पियारे पी को हमारी बतियाँ
चूँ शम्आ सोजाँ, चूँ जर्रा हैराँ, हमेशा गिरियाँ ब इश्के आँ माह.
न नींद नैंना, न अंग चैना, न आप आये न भेजे पतियाँ।।
बहक्के रोजे विसाले दिलबर के दाद मारा फरेब खुसरो.
सपीत मन के दराये राखूँ जो जाय पाऊँ पिया की खतियाँ।।
अमीर खुसरो की 99 पुस्तकों का उल्लेख मिलता है, किन्तु 22 ही अब उपलब्ध हैं. हिन्दी में खुसरो की तीन रचनाएं मानी जाती हैं, किन्तु इन तीनों में केवल एक ‘खालिकबारी’ ही उपलब्ध है, जो कविता के रूप में हिन्‍दवी-फारसी शब्‍दकोश है. इसके अतिरिक्त खुसरो की फुटकर रचनाएं भी संकलित हैं, जिनमें पहेलियां, मुकरियां, गीत, निस्बतें, अनमेलियां आदि हैं.
अमीर खुसरो की पहेलियाँ
अमीर खुसरो ने हिन्दी साहित्य को पहेलियाँ दी है. पहेलियाँ मूलत: आम जनता की चीज है. खुसरो ने भी कदाचित लोक के प्रभाव से ही पहेलियों की रचना की. अमीर खुसरो ने दो प्रकार की पहेलियाँ लिखी :
(1)     बूझ पहेली (अंतर्लापिका)
यह वो पहेलियाँ हैं जिनका उत्तर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप में पहेली में दिया होता है यानि जो पहेलियाँ पहले से ही बूझी गई हों. जैसे –
(क)               गोल मटोल और छोटा-मोटा, हर दम वह तो जमीं पर लोटा.
खुसरो कहे नहीं है झूठा, जो न बूझे अकिल का खोटा।।
उत्तर – लोटा.
(ख)               श्याम बरन और दाँत अनेक, लचकत जैसे नारी.
          दोनों हाथ से खुसरो खींचे और कहे तू आ री।।
उत्तर – आरी
(ग)                हाड़ की देही उज्ला रंग, लिपटा रहे नारी के संग.
           चोरी की ना खून किया वाका सर क्यों काट लिया.
उत्तर – नाखून.
(घ)                बाला था जब सबको भाया, बड़ा हुआ कुछ काम न आया.
खुसरो कह दिया उसका नाव, अर्थ करो नहीं छोड़ो गाँव।।
उत्तर – दिया.
 (2)    बिन बूझ पहेली या बहिर्लापिका, जिसका उत्तर पहेली से बाहर होता है-
(क) एक जानवर रंग रंगीला, बिना मारे वह रोवे.
   उस के सिर पर तीन तिलाके, बिन बताए सोवे।।
उत्तर – मोर.
(ख) चाम मांस वाके नहीं नेक, हाड़ मास में वाके छेद.
    मोहि अचंभो आवत ऐसे, वामे जीव बसत है कैसे।।
उत्तर – पिंजड़ा.
(ग)    स्याम बरन की है एक नारी, माथे ऊपर लागै प्यारी.
      जो मानुस इस अरथ को खोले, कुत्ते की वह बोली बोले।।
उत्तर – भौं (भौंए आँख के ऊपर होती हैं.)
(घ)    एक गुनी ने यह गुन कीना, हरियल पिंजरे में दे दीना.
       देखा जादूगर का हाल, डाले हरा निकाले लाल.
उत्तर – पान.
दो सखुने
सखुन फारसी भाषा का शब्द है,जिसका अर्थ कथन या उक्ति है. अमीर खुसरो के दोसखुनों में दो कथनों या उक्तियों का एक ही उत्तर होता है. इसका मूल आधार शब्द के एक से अधिक अर्थ हैं.
(क)    दीवार क्यों टूटी? राह क्यों लूटी ? उत्तर – राज न था.
दीवार बनाने वाला राजगीर नहीं था,अत: दीवार टूटी रह गई. राज्य (राज) व्यवस्था नहीं थी अत: राह लुट गई.
(ख)    जोगी क्यों भागा? ढोलकी क्यों न बजी? उत्तर – मढ़ी न थी. रहने के लिए झोंपड़ी (मढ़ी) या कुटी न थी और ढोलकी चमड़े से मढ़ी हुई नहीं थी.
(ग)    पथिक प्यासा क्यों? गधा उदास क्यों? उत्तर – लोटा न था. पथिक (यात्री) के पास पानी पीने के लिए कोई लोटा (बर्तन) न था. अत: वह प्यासा रह गया. गधा मिट्टी में लोटा नहीं था अत: वह उदास था.
(घ)    रोटी जली क्यो? घोड़ा अड़ा क्यों? पान सड़ा क्यो? उत्तर – फेरा न था. रोटी को फेरा (पलटा) नहीं गया था. अत: वह जल गई. घोड़े की पैदाइशी आदत होती है, एक जगह खड़े होकर फेरा लगाना. न लगा सकने की स्थिति में वह चलता नहीं और एक जगह पर ही अड़ जाता है. पानी में पड़े पान के पत्तों को पनवाड़ी बार-बार फेरता रहता है. इससे पान का पत्ता सड़ता नहीं. न फेरो तो सड़ जाता है.
कहमुकरियाँ या मुकरियाँ
कहमुकरियों का अर्थ है कि किसी उक्ति को कह भी दिया और मानने से भी मुकर गए. यह चार पंक्तियों में होती है. तीन या उससे अधिक में पहेली होती है और चौथी या आखिरी पंक्ति में पहले तो खुसरो ए सखी साजनके रुप में पहेली का उत्तर देते हैं. इनमें से अधिकांश पहेलीनुमा गीतों का जवाब साजन है यानि प्रियतम और साथ में एक दूसरा जवाब भी है – जो इस उक्ति का आखिरी शब्द है-
(क)    बरस-बरस वह देस में आवे, मुँह से मुँह लाग रस प्यावे.
       वा खातिर मैं खरचे दाम, ऐ सखी साजन न सखी आम।।
(ख)    सगरी रैन मोरे संग जागा, भोर भई तब बिछुड़न लागा.
       वाके बिछुड़त फाटे हिया, ऐ सखी साजन न सखी दिया।।
(ग)    नित मेरे घर आवत है, रात गए फिर जावत है.
       फँसत अमावस गोरी के फंदा, ऐ सखी साजन न सखी चंदा।।
(घ)    आठ प्रहर मेरे संग रहे, मीठी प्यारी बातें करे.
       श्याम बरन और राती नैंना, ऐ सखी साजन न सखी मैंना।।

 

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साहित्य इतिहास

हिन्दी साहित्य का आदिकाल -नामकरण की समस्या

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आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के आदिकाल को वीरगाथा काल नाम दिया है. इसके लिए तर्क देते हुए वो कहते हैं- “ राजाश्रित कवि और चारण जिस प्रकार नीति, श्रृंगार आदि के फुटकल दोहे राजसभाओं में सुनाया करते थे, उसी प्रकार अपने आश्रयदाता राजाओं के पराक्रमपूर्ण चरितों या गाथाओं का वर्णन भी किया करते थे। यही प्रबंध परंपरा रासोके नाम से पाई जाती है, जिसे लक्ष्य करके इस काल को हमने, ‘वीरगाथाकालकहा है।
            प्रवृत्ति के निर्धारण के लिए भी आचार्य शुक्ल ने दो कसौटियां निर्धारित की हैं:
(क)   विशेष ढंग की रचना की प्रचुरता
(ख)   विशेष  ढंग की रचना की लोक प्रसिद्धि
           आदिकाल की समयसीमा में शुक्लजी ने हिन्दी भाषा की 12 रचनाएँ ढूंढ कर सामने रखी हैं-
1)      खुमाण रासो
2)      विजयपाल रासो
3)      हम्मीर रासो
4)      परमाल रासो (आल्हा)
5)      बीसलदेव रासो
6)      पृथ्वीराज रासो
7)      जयचंद्र प्रकाश
8)      जयमयङ्क जसचन्द्रिका
9)      कीर्तिलता
10)   कीर्तिपताका
11)   विद्यापति की पदावली
12)   अमीर खुसरो की पहेलियाँ
शुक्लजी के अनुसार , बीसलदेव रासो, विद्यापति की पदावली और अमीर खुसरो की पहेलियों को छोड़कर शेष सभी रचनाएँ वीरगाथात्मक हैं, जिससे एक विशेष ढंग की रचना की प्रचुरता सिद्ध होती है.
दूसरी ओर, परमाल रासो जैसी रचनाओं की जनप्रियता के आधार पर शुक्लजी ने यह मान लिया कि निश्चित तौर पर तत्कालीन जनता में शौर्य की प्रवृत्ति की प्रमुखता रही होगी.
      इसीलिए शुक्लजी ने आलोच्य कालखंड को वीरगाथा काल नाम दिया .
                               अगर शुक्लजी के तर्कों और मान्यताओं को ध्यान से देखें तो यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने आदिकाल की पुस्तकों के चयन में पूर्वग्रह से काम लिया है. उन्होंने सिद्धों – नाथों और जैन कवियों की रचनाओं को धार्मिक कह कर अपनी सूची में शामिल नहीं किया है. उनके अनुसार, ये रचनाएँ इस जीवन-जगत की बात न कर पारलौकिक जगत की बात करती हैं. शुक्लजी के इस तर्क से सहमत होना थोड़ा कठिन है. जिन रचनाओं को वे धार्मिक ,पारलौकिक और रहस्यात्मक मान कर खारिज़ कर रहे हैं, वस्तुतः उन्हीं रचनाओं में इस जीवन जगत का सच्चा प्रतिनिधित्व हुआ है. दरबारी कवियों के विपरीत ,ये कवि आम जनता के बीच रहते हैं और उनकी भावनाओं ,उनके दुःख दर्द को अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त करते हैं. दूसरी बात, इन रचनाओं को यदि साहित्य की सीमा से बाहर कर दिया गया तो भक्तिकालीन संत काव्य की जड़ें खोजनी मुश्किल हो जायगी. रहस्यवाद को कारण बनाकर अगर इन रचनाओं को खारिज़ किया जाता है तो कबीर , छायावादी कवि तथा अज्ञेय जैसे आधुनिक कवियों की रचनाओं को किस आधार पर साहित्य के रूप में स्वीकार किया जायगा?
आचार्य शुक्ल ने जिन रचनाओं को अपनी सूची में शामिल किया है, वे भी विवाद से परे नहीं हैं. हम्मीर रासो अबतक संपूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं है. इसके कुछ छंद ही प्राकृत पैंगलम नामक ग्रन्थ में मिले हैं, जिसके आधार पर शुक्लजी ने इसमें वीरगाथात्मकता की प्रवृत्ति निर्धारित की है. कुछ छंदों के आधार पर पूरी पुस्तक का प्रवृत्ति निर्धारण तर्कसंगत नहीं माना जा सकता. इसके रचनाकार को लेकर भी मतभेद हैं. शुक्लजी इसे सारंगधर की रचना मानते हैं तो राहुल सांकृत्यायन के अनुसार यह जज्जन की कृति है. इसी प्रकार विजयपाल रासो में तोप का वर्णन इसे 16वीं शताब्दी या इसके बाद की रचना सिद्ध करता है. खुमाण रासो का रचनाकार दलपतिविजय स्वयं को नवीं सदी के खुमाण का समकालीन कहता है , लेकिन इसी रचना में सत्रहवीं सदी के चितौड़ नरेश राजसिंह का वर्णन भी मिलता है. प्रामाणिकता को लेकर सबसे ज्यादा विवाद पृथ्वीराजरासो के साथ जुड़े हैं. इसकी तिथियों और तथ्यों की इतिहास के साथ संगति नहीं बैठती. तिथियों में प्रायः 90 से 100 सालों का अंतर मिलता है. पृथ्वीराज की माँ का नाम यहाँ कमला बताया गया है, जबकि पृथ्वीराज विजय (जयानक कवि ) जैसे अन्य स्त्रोत कर्पूरी बताते हैं. पृथ्वीराज के हाथों मुहम्मद गोरी और गुजराज के राजा भीमसिंह का वध इतिहाससम्मत नहीं है.
इस प्रकार स्पष्ट है कि शुक्ल जी द्वारा जिन रचनाओं के आधार पर इस कालखंड को वीरगाथा काल नाम दिया गया है, वे अप्रामाणिक और संदिग्ध हैं.
         जॉर्ज ग्रियर्सन और रामकुमार वर्मा इस काल को चारण काल कहते हैं. वस्तुतः रासो काव्य को चारण काव्य कहना किसी भी दृष्टि से सही नहीं है. रासो काव्यों में सिर्फ बढ़ा-चढ़ा कर की गई प्रशंसा ही नहीं है, बल्कि इसमें यथार्थपूर्ण साहसिकता का भी चित्रण मिलता है. इन रचनाओं में चारणत्व है , लेकिन उनकी प्रधानता नहीं.
                राहुल सांकृत्यायन इस कालखंड को ‘सिद्ध-सामंत काल’ कहते हैं. इस नाम से प्रवृत्तियों का बोध नहीं होता. सिद्ध रचनाकार हैं और सामंत रचना के आलंबन. दूसरी बात, सामंत कहने से वीरता की अपेक्षा विलासिता का भाव ज्यादा दिखता है.

 

महावीर प्रसाद द्विवेदी इसे ‘बीज वपन काल’ कहते हैं ,जबकि हजारी प्रसाद द्विवेदी इसके लिए आदिकाल नाम सुझाते हैं. इन दोनों नामों में अर्थ की दृष्टि से ज्यादा अंतर नहीं है. हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस काल की रचनाओं में तीन तरह की प्रवृत्तियाँ मिलती हैं- धार्मिकता, वीरगाथात्मकता और श्रृंगार. इसी कारण द्विवेदी जी इस कालखंड को प्रवृत्ति के आधार पर अभिहित करने की बजाय काल के आधार पर आदिकाल कहना पसंद करते हैं.  
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हिन्दी साहित्य का इतिहास -प्रारम्भ

अनुमानित समय : 2 मिनट-
राहुल सांकृत्यायन ने अपनी पुस्तक ‘काव्यधारा’ में 7वीं सदी के अपभ्रंश के कवि सरहपा को हिन्दी का पहला कवि माना है. डॉ रामकुमार वर्मा हिन्दी साहित्य का प्रारम्भ संवत् 750 से मानते हैं. जॉर्ज ग्रियर्सन के अनुसार, हिन्दी साहित्य की शुरुआत संवत् 700 (643 ई) से होती है. स्पष्टतया, अधिकांश विद्वान अपभ्रंश के उस दौर से प्रारम्भिक हिन्दी की शुरुआत मानते हैं, जहाँ सहायक क्रियाओं और परसर्गों का विकास साफ़ परिलक्षित होने लगता है.
हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने की पहली कोशिश फ्रांस के गार्सा द तासी ने की. तासी रचित ‘इस्त्वार द ल लितरेत्यूर ऐन्दूई ऐन्दूस्तानी’ का प्रथम भाग 1839 में और द्वितीय भाग 1847 में प्रकाशित हुआ. 1883 ई में शिवसिंह सेंगर का शिवसिंह सरोज प्रकाशित हुआ. इसमें लगभग एक हज़ार कवियों की रचनाओं और उनके जीवन का संक्षिप्त परिचय मिलता है. इस लिहाज़ से यह पुस्तक साहित्येतिहास से ज्यादा कविवृत्तसंग्रह है. इसी पुस्तक को आधार बनाकर जॉर्ज ग्रियर्सन ने 1888 में अपना इतिहासग्रंथ ‘द मॉडर्न वर्नाकुलर लिटरेचर ऑफ़ नॉर्दन हिंदुस्तान’ लिखा. 1913 ई में मिश्रबंधुओं (गणेश बिहारी, श्याम बिहारी और शुकदेव बिहारी) ने अपना इतिहास ग्रंथ मिश्रबंधु विनोद के नाम से लिखा, जिसमे लगभग पांच हजार साहित्यकारों का परिचय मिलता है.
               वस्तुतः 1929 में प्रकाशित आचार्य रामचंद्र शुक्ल के ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ के पूर्व प्रकाशित पुस्तकों को साहित्य इतिहास कहने की बजाय कविवृत संग्रह या इतिहास लेखन के प्रयत्न कहना ज्यादा सही होगा. सही अर्थों में आचार्य शुक्ल को ही हिन्दी साहित्य का पहला इतिहासकार कहना चाहिए. शुक्लजी ने इसे पहले हिन्दी शब्दसागर की भूमिका के रूप में लिखा था, जिसे बाद में स्वतंत्र और परिवर्धित रूप में 1929 में प्रकाशित किया गया.
अपनी पुस्तक में आचार्य शुक्ल साहित्य के इतिहास की परिभाषा देते हुए कहते हैं- “जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चितवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है तब यह निश्चित है कि चित्तवृत्ति में परिवर्तन की परंपरा के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में परिवर्तन होता चलता है. आदि से अंत तक चित्तवृत्तियों की परंपरा को परखते हुए साहित्य परंपरा के साथ उसका सामंजस्य दिखाना ही साहित्य का इतिहास कहलाता है.”
आचार्य शुक्ल ने हिन्दी साहित्य का प्रारंभ संवत् 1050 से मानते हुए उसे चार भागों में विभाजित किया है –
कालक्रम के आधार पर               प्रवृत्ति के आधार पर               काल सीमा (संवत् में)
आदि काल                             वीरगाथा काल                    1050-1375
पूर्व मध्यकाल                           भक्तिकाल                       1375-1700
उत्तर मध्यकाल                          रीति काल                       1700-1900
आधुनिक काल                          गद्य काल                       1900 से आगे