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गोटे की टोपी

अनुमानित समय : 23 मिनट-

‘चाची लो, तुम्हारा पत्र आया है।’ नवल ने एक मैला-सा लिफ़ाफ़ा चौके में बैठी चाची की ओर बढ़ा दिया। ‘मेरा पत्र? मेरे पास किसका ख़त आयेगा? ऐसा फूटा भाग लेकर संसार में आयी हूं कि सभी को निगल गयी। मैके में कोई न रहा, अपने सिर-पेट को उजाड़ ही चुकी। वहां एक भतीजी बची है, यहां तुम सब हो, भगवान् तुम्हें सुखी रखें, मुझसे तो मौत भी दूर भागती है।’ पार्वती को यह सब कहते-कहते पति की याद तो हो ही आयी, परन्तु उस चार दिन के शिशु का ध्यान भी आ गया, जो संसार में थोड़े समय के लिए आकर पार्वती की कोख को सूनी कर गया। नवल को इस समय चाची की लम्बी-चौड़ी वक्तृता तनिक भी न भायी। उसने पत्र को रसोई की परिधि के प्रमाणस्वरूप खींची गयी रेखा के बाहर रख दिया। बोला — ‘यह तो तुम्हीं जानोगी, जब पढ़ोगी कि पत्र किसका है। मोहर तो इस पर माणिकगंज की ही पड़ी हुई है और पता किसी स्त्री के हाथ का लिखा जान पड़ता है, इतना तो मैं बता सकता हूं।’ ‘माणिकगंज? वहां तो भैया, वह मंजरी ब्याही है, पर उसका तो कभी पहले कोई खत-पत्तर आया हो, तो आया हो, इधर दो-अढ़ाई साल से तो मुझे उसका कोई भी समाचार मिला ही नहीं।’ पार्वती की वाणी से उद्विग्नता तथा नेत्रों से आश्चर्य प्रकट हो रहा था। नवल चला गया। पृथ्वी पर पड़ा हुआ वह काग़ज़ का टुकड़ा अपने अस्तित्व पर अभी पश्चात्ताप कर ही रहा था कि नवल की मां ने वहां आकर उस पर पैर रखते हुए कहा — ‘यह क्या छोटी बहू? किसका ख़त आया है?’ ‘क्या मालूम? शायद मंजरी का आया हो, चौके में से निकलूं, तो देखूंगी। और माणिकगंज से किसका आता?’ पार्वती की वाणी में किसी प्रकार का कौतूहल न था। ‘तुम्हें कोई चैन से बैठकर दो रोटी न खाने देगा छोटी बहू। और क्या? अब तो भूले-बिसरे सभी याद कर लेंगे, तब किसी ने भी बात न पूछी। अच्छा, अब जल्दी से चूल्हे पर तवा टेक दो, नवल नहाने गया है, उसके बाबूजी कभी के पूजा भी कर चुके। रोज़ कहते हैं कि कचहरी जाने को देर हो जाती है। कहते थे, न हो, अच्छी-सी कोई मिसरानी ही ढूंढ़ लो, पर कोई ठीक मिले, तभी तो? नवल को भी कॉलेज जाने को रोज़ देर हो जाती है। क्या करूं, मेरी तो काया निगोड़ी भी अपने बूते की न रही? काया के साथ ही सारे काम हैं…।’ इत्यादि कहती हुई गृह-स्वामिनी मालिश का तेल और खाने की दवा की पुड़िया लेकर छत पर धूप में जा बैठी। बेचारी पार्वती को दो बातों का उत्तर दे देने का भी अवसर न मिला, न उसमें वैसा कुछ साहस ही था। वह मन-ही-मन सोचती रह गयी — ‘यह सब क्या कह गयीं? किसने कब मेरी सुध नहीं ली? था ही कौन, जो बात पूछता? क्या भतीजी के घर जाकर रहती? वह मेरी बात पूछती? राम-राम, संसार में बहुत-सी विधवाएं हैं, तो क्या वह सब लड़की या भतीजी के आश्रय में रहती होंगी? पीहर या ससुराल, दो ही जगह रहने की होती हैं। फिर जब वहां कोई भी न रहा, तो कहां चली जाऊं?’ उसकी आंखों में आंसू भर आये। नवल ने आकर कहा — ‘रोटी हो गयी न चाची?’ किन्तु कोई उत्तर न पाकर उसने देखा, उसकी चाची रो रही है। सामने पड़े हुए पत्र को उठाकर बोला — ‘यह क्या? तुम रो क्यों रही हो? ख़त तो अभी खोला भी नहीं, फिर…फिर…।’ ‘कुछ नहीं, रो कहां रही हूं भैया? लाओ, इस चिट्ठी को चूल्हे में झोंक दें, क्या करूं! चौका छूट जायेगा, नहीं तो अभी उठकर फाड़ फेंकती। आओ, तुम रोटी खा लो, नहीं तो देर हो जायेगी। चिट्ठी आले में रख दो और अपने बाबूजी को भी बुला लो।’ फिर महरी से कहा, ‘दो आसन बिछाकर थाली व पानी रख दे।’ जल्दी और तेज़ी से फुलके बनाने लगी। आंखों में उमड़ते हुए आंसू आंखों से ही पी डाले। हृदय की ज्वाला शान्त करने के लिए, कदाचित् यही एक साधन है। वह दालान में बैठी लौकी संवार रही थी। नवल ने कॉलेज से आकर कहा — ‘भूख बड़े ज़ोर की लगी है अम्मां, कुछ खाने को है?’ ‘खाने को क्या धरा है? आज छोटी बहू की भतीजी का ख़त आया है, इसी झमेले में कुछ नाश्ता बन ही नहीं पाया। क्या किया जाये? बेचारी इतनी छोटी उम्र में ही बिगड़ गयी। छह मास का दुधमुंहा बच्चा छोड़ गया है, उसे कौन देखे-सुनेगा? लड़की की उम्र तो कोई बहुत होगी, तो सोलह साल की होगी, बस! क्यों न छोटी बहू?’ ‘हां, और क्या जीजी! बस, यही होगी।’ ‘अच्छा, तो अब सोच करने से ही क्या? जैसी राम की इच्छा। न हो, नवल के लिए जल्दी से चार चंदिया बना दो, दिन-भर का भूखा होगा। और हां, देखना, जगदीश के लिए सागूदाना भी बनाना है। दोपहर से उसने कुछ खाया ही नहीं। क्या करें, भगवान् जैसी कुछ डालता है, सब सहनी पड़ती है। अब हमारी ही काया नहीं चलती, तो क्या डूब मरें? न हो, तो चैत में देवी व्रतों में एक दिन को जाकर देख आना, उन दिनों कोई ऐसा काम भी नहीं रहता। मैं तो उपासी ही रहूंगी, जगदीश के इम्तिहान हो जायेंगे, तो वह चला ही जायेगा। वह गांव जाने को कह रहे हैं, फिर अगले दिन तुम लौट ही आओगी। साथ में न होगा, नवल ही चला जायेगा।’ जेठानी की बातों पर पार्वती ने तो कुछ विशेष ध्यान नहीं दिया, क्योंकि उन्हें तो प्रतिदिन सुनते-सुनते ऐसी बातें सुनने का अभ्यास हो चला था। आज चार वर्ष से इन्हीं जेठानी के आश्रय में रहकर तो वैधव्य की यातनाएं झेल रही हैं, परन्तु नवल कुछ देर तक मां की ओर देखता रह गया। फिर कहा — ‘चाची, तुम कोई मशीन तो हो नहीं कि यह भी कर और वह भी कर। जगदीश (नवल का ममेरा भाई) के लिए तो सागूदाना बनाना ज़रूरी है, मेरी चिन्ता न करना। मैं भिक्का से चाय बनवाकर पिये लेता हूं। चंदिया-वंदिया बनाने की ज़रूरत नहीं है। बस, रात को खाना ही खाऊंगा।’ इसी प्रकार एक सप्ताह और बीत गया। तभी माणिकगंज से एक पत्र और आया। उसमें लिखा था —

माणिकगंज 8.2.33

बूआ! भाग्य तो फूट ही गया, पर तुम भी शायद रूठ गयीं? अब क्या करूं? अकेली कैसे रहूं? न यहां कोई है, न वहां। घर फाड़ खाने को आता है। चार दिन से मुन्नू बुख़ार में पड़ा है, कोई सुध लेने वाला नहीं। यह (बच्चा) न होता, तो क्या प्राणों से वैसा कुछ मोह था, पर अब तो मरा भी नहीं जाता। बताओ, कहां जाऊं? जवाब जल्दी देना, जी घबरा रहा है।

अभागी मंजरी

पार्वती ने पत्र पढ़ा, उन्हें चक्कर-सा आ गया। न जाने क्या सोचकर, कौन से दिनों की याद करके उनके हृदय से एक गहरी श्वास निकल पड़ी। वह दीवार का सहारा लेकर और माथा पकड़कर बैठ गयीं। नवल ने पूछा — ‘क्या लिखा है चाची?’ बिना कुछ उत्तर दिये पार्वती ने पत्र उसके सामने डाल दिया। चिट्ठी पढ़कर युवक के चेहरे पर अनेक भावों की झलक आयी और चली गयी। क्षण-भर बाद बोला — ‘क्या थोड़े दिन के लिए वह यहां नहीं आ सकती? जब चाचाजी थे, तब तो वह छुटपन में कितनी ही बार तुम्हारे पास आयी है?’ ‘हां भैया! तब की बात और थी। अब तो मुझे भी अपने दिन काटने भारी हो रहे हैं। मैं उसे आज ही लिख दूंगी, न हो, अकबरपुर चली जाये। न हो, दो किरायेदार बसा लेगी। उसके खाने-भर को आ ही जायेगा और अकेली भी न रहेगी। पर गावों में शहर के नाईं भाड़े पर कौन रहता है भैया? बड़ी तबाही है — क्या करूं?’ ‘करना क्या? मैं तुम्हारी ओर से अभी पत्र लिख देता हूं कि न हो, किसी को साथ लेकर थोड़े दिन के लिए यहीं आ जाओ।’ ‘ना नवल, ऐसा न करना भैया! तुम जान-बूझकर अनजान न बन जाओ, बहुत कुछ सुनते-सुनते कलेजा पक गया है — अब और न सहा जायेगा। उसका बच्चे का साथ है …ठहरो नवल, सुन तो जाओ।’ ‘सो कुछ नहीं चाची।’ कहता हुआ युवक तेज़ी से बाहर निकल गया। पार्वती सोचने लगी — ‘यह अपनी मां के ऊपर क्यों नहीं हुआ? कितनी दया-माया है इसके मन में।’ परिस्थितियां हमें कितना विवश कर देती हैं। मंजरी आ गयी। बूआ ने उसे छाती से लगाकर आंसू पोंछ डाले। और बुआ की जेठानी ने अपनी धुली हुई धोती को बचाते हुए दूर से ही उसे बैठ जाने का आदेश दिया। मन में सोचा — ‘ऐसा रूप कहां समायेगा?’ नवल ने अभागी विधवा के फूल से शिशु को गोद में लेकर ऊपर तक उछालकर हृदय से चिपटा लिया। फिर उसको प्यार से दुलारते हुए पूछा — ‘भला इसका क्या नाम है…चाची।’ ‘नाम! नाम अभागे का क्या होता भैया?’ ‘ऐसा न कहो, मैंने आज से इसका नाम प्रवाल रख दिया है।’ फिर मन-ही-मन सोचा — ‘कितना सुन्दर शिशु है यह? बिल्कुल ही मां जैसा?’ बालक उसकी गोद में खिलखिला रहा था और वह एकाएक उसे देख रहा था। कुछ देर यही क्रम चलता रहा। गृहिणी ने अचानक मौनता को भंग करते हुए कहा — ‘जा नवल, देख तो, तेरे बाबूजी आ गये क्या? घर में बैठा-बैठा… और हां, छोटी बहु, जाओ लड़के के कपड़े वगैरा उतरवाओ, खाने-पीने का समय हो गया।’ गृहस्वामिनी की बात सुनकर सब ऐसे चौंक पड़े, मानो भूचाल ही आ गया। पार्वती मंजरी को घर में ले गयी। वहां जाकर कहा — ‘देख बीबी! जीजी का स्वभाव कुछ ऐसा ही है। महीना-दो महीना जब तक यहां रहो, सदा उन्हें प्रसन्न रखने का…?’ पार्वती की वाणी कांप रही थी। जब नवल प्रवाल को लेकर बाहर जाने लगा, तब उसकी मां हरप्यारी ने चीख़कर कहा — ‘हें-हें, अरे! इसे लेकर न जा…। पराये बच्चे को छूने से डरता भी नहीं बाबा! ज़रा में हाथ-पैर उतर जाये, तो बस।’ ‘पराया? पराया किसका अम्मा! अब तो यह हमारे घर आ गया, तो हमारा ही है।’ पुत्र की बात सुनकर माता का मुंह खुला का खुला रह गया। नेत्र थोड़े और भी फैल गये। नवल प्रवाल को उछालता हुआ बाहर चला गया। धीरे-धीरे मंजरी को इस घर में आये दो मास बीत गये। इतने थोड़े ही समय में, इस घर के लिए वह ऐसी हो गयी, मानो सदा से ही यहां से उसका कोई घनिष्ठ नाता है। चूल्हे-चौके के काम से लेकर, घर की सफ़ाई तक की देखभाल अब उसे ही करनी पड़ती है। यहां तक कि दो-चार बार मना करने के उपरान्त, बड़ी बूआ अब मंजरी से ही तेल की मालिश कराना अधिक पसन्द करती हैं। बदन तो उनका आज तक वैसा किसी ने दबाया ही नहीं, जैसा मंजरी को दबाना आता है और शायद इसी की सेवा से प्रसन्न होकर एक दिन एक फेरीवाले बजाज से उन्होंने मंजरी के बच्चे के लिए बहुत विरोध करने पर भी दो कुरतों की जापानी छींट ख़रीद डाली। इतना ही नहीं, धोबी की धुलाई तथा ग्वाले के दूध का हिसाब उसे ही जोड़ना पड़ता है। शाम के बिस्तरे तक बिछवाना भी उसी के ज़िम्मे आ पड़ा है। यद्यपि मंजरी को वैसा तो कोई अधिकार किसी ने दे नहीं रखा है, फिर भी, महरी से लेकर घर की महतारी तक का दुखड़ा उसे सुनना पड़ ही जाता है। नवल के पिता को न तो और किसी का बनाया अब खाना ही पसन्द आता है, और न भिखारी की पीसी हुई ठंडाई में ही अब मज़ा आता है। नवल के मन को वही जाने, वह किसी पर कोई बात कभी प्रकट करता ही नहीं। हां, पहले से कुछ अधिक चुस्त, फुर्तीला और कर्तव्यनिष्ठ अवश्य दीख पड़ता है। पहले घर में किसी वस्तु की आवश्यकता होती, तो यह दो-दो दिन तक यूं ही टाल देता, परन्तु अब ऐसा नहीं होता। पहले तो थोड़े-बहुत प्रबन्ध की चिन्ता पिता को भी अपने माथे लेनी पड़ती थी, किन्तु अब नवल ने उन्हें छुट्टी-सी दे दी है। पहले वह कितनी ही बातों को पढ़ने के बहाने या अवकाश न मिलने के कारण यूं ही टाल देता था, परन्तु अब ऐसा नहीं करता। कॉलेज से आकर नवल ने भिक्का से कहा — ‘यदि इसी प्रकार आप रोज़ ही बिना कहे मेरे कमरे की सफ़ाई कर दिया करें, तो मुझे बेकार बक-झक करने से छुट्टी मिल जाये।’ भिखारी मालिक के मुंह की ओर देखकर चुपचाप सिर खुजाने लगा। नवल ने फिर कहा — ‘बोलो, स्वीकार है न मेरी प्रार्थना?’ अब के मालिक के शब्दों में कुछ तीव्रता-सी थी। वह घबराकर बोला — ‘भैया! बाबू! हम तो नाहिन… कछु नहीं कीन्ह रहांय? ई सब उहै… कीन्ह रहांय… उहै।’ ‘उहै-उहै क्या बकता है? साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहता?’ — नवल ने हंसी को रोककर कहा। ‘उहै सरकार! जौन बीबी जो आइन रहांय कि नाहिं।’ ‘अच्छा जाओ, चाय तैयार करो, तुम बड़े आराम-पसन्द हुए जा रहे हो।’ नवल सोचने लगा — ‘मंजरी…उसी ने किया है यह सब? इतनी सुघराई और सफ़ाई से? वह इतनी निकट क्यों होती जाती है? और मुन्नू कितना प्यारा लगता है? चलूं देखूं, प्रवाल सो रहा है या जाग रहा है?’ घर में आकर देखा, आंगन में पड़ी हुई चारपाई के ऊपर साकार शैशव हाथ-पांव फेंक रहा है। नवल ने उसे अपनी गोदी में उठाते हुए अपनी मां से कहा — ‘अम्मां, देखो हमारा प्रवाल कैसा भाग्यवान् है? आज मालूम हुआ कि बाबूजी की तनख़्वाह में पूरे पचास रुपये बढ़ गये, अब मिलेंगे पूरे चार सौ।’ मां ने तो इस बात पर कोई उत्तर नहीं दिया, किन्तु चाची कह उठीं — ‘अरे भैया! भाग्यवान् होता, तो क्या होते ही…।’ ‘छिः छिः! ऐसी बात न कहो चाची?’ अबकी गृहिणी भी बोल उठीं — ‘ठीक तो कहती हो छोटी बहू, होते ही तो बाप को डस गया।’ नवल ने एक तीव्र दृष्टि मां पर डालकर मन में कहा — ‘ये सब कितने निष्ठुर हैं!’ और फिर चौके की ओर देखता हुआ बाहर चला गया। देख गया, मंजरी चाय का पानी छान रही है। बिल्कुल तल्लीन होकर, मानो यह बात उसने सुनी ही नहीं। हृदय के दुखते हुए छाले वाक्य-बाणों से बिंधकर कसक उठते हैं। आज एकादशी का दिन था। छोटी बहू पार्वती तो निर्जल व्रत रखती ही थीं, बड़ी बहू हरप्यारी आज के दिन कच्ची रसोई नहीं जीमती थीं। यद्यपि सुहागिन होने के कारण वह व्रत नहीं रखती थीं। मंजरी ने बड़े आग्रह से पार्वती से कहा — ‘बूआ, आज रसोई मैं ही बनाये लेती हूं, आप लोग तो आज रसोई जीमेंगी नहीं?’  

पार्वती कुछ सम्मति दे, इससे पहले ही गृहिणी ने विरोध करते हुए कहा — ‘मैं और तुम्हारी बूआ नहीं खायेंगी, तो क्या मंजरी, तनिक सोच-समझकर तो बात किया करो। वह क्या (नवल के पिता) तुम्हारी बनायी रोटी खा सकेंगे? तुम्हारा बच्चे का साथ है। इस घर के मर्द कोई छुई-भिड़ी धोती से बनायी गयी रोटी खाना पसन्द थोड़े ही करते हैं?’ ‘लेकिन बड़ी बूआ, मैं तो इसलिए कहती थी कि बूआ आज उपासी हैं, मैं ही रसोई बना लेती। वैसे लल्ला को अभी तक तो मैंने छुआ नहीं है।’ ‘सो क्या हुआ? आख़िर धोती कैसे अछूती रह सकती है, जब तक इस पर पूरा ध्यान न दिया जाये?’ नवल ने अपने कमरे के दरवाज़े पर खड़े होकर कहा — ‘क्यों अम्मां, धोती में छूत कहां से घुस गयी? मैं तुम से पचास बार छू जाऊं, तुम मुझे तो कभी रोकती नहीं।’ ‘मर्दों का विचार गिना थोड़े ही जाता है बेटा! तू इन बातों को क्या समझे?’ मां की बात का उत्तर देने के बदले नवल ने अपनी धुली हुई धोती लाकर आंगन में पड़ी चौकी के ऊपर डालते हुए कहा — ‘लो, यह धोती!’…मंजरी ने आज पहली बार ही नवल को सिर से पांव तक एक छिपी हुई दृष्टि से देखा और फिर वह न जाने क्या सोचकर कमरे में भाग गयी। हरप्यारी मानो आकाश से गिर पड़ी, वाणी को थोड़ा तीव्र करके बोली — ‘राम-राम भैया! घोर कलियुग आ गया, लाज-शर्म का तो नाम ही नहीं रहा। मर्द की धोती पहनने में क्या लज्जा न आयेगी?’ गृहस्वामिनी की बात सुनकर अभागिन विधवा खड़ी-की-खड़ी रह गयी। क्या? उसने कभी नवल की धोती पहनने का मन में विचार तक भी किया है? कमरे में से ही केवल इतना कहा — ‘बूआ, केवल लाकर डाल देने से ही तो धोती नहीं पहन ली गयी। मेरी धोती सूखी नहीं, तो क्या गीली ही पहनकर रोटी बनाने-भर से मर थोड़े ही जाऊंगी?’ ‘चुप रह मंजरी, अधिक ज़बान मत चला, रोटी मैं ही बनाऊंगी।’ कहकर पार्वती चौके में आ बैठी। नवल सब कुछ सुनता हुआ आज बिना खाये ही कॉलेज चला गया। मां ने थोड़ा क्रोध दिखलाया, चाची ने सोचा — ‘भूखा तो रह चुका, किसी मित्र के यहां खा लेगा’ — पर मंजरी… उसके मन की वही जाने। आज उसने भी भय के कारण केवल नाम मात्र को ही खाया, बार-बार उसके मन में एक बात उठने लगी — ‘वह यहां क्यों आयी?’ जब रात को नवल घर में आया, तो उसका मन बहुत ही अशान्त और दुखी-सा था। मित्रों के विशेष आग्रह करने पर ही आज वह सिनेमा देखने चला गया। खेल था — ‘देवदास।’ पार्वती का प्रेम, उसकी मूक भाषा तथा चुभते हुए भाव और पात्रों के विवश जीवन का प्रभाव नवल के हृदय में रेखाएं-सी खींच गया। देवदास की दुर्दशा देखकर तो उसकी आंखें रोते-रोते लाल हो गयी थीं। मित्रों ने न जाने कितना मज़ाक उड़ाया, फिर भी, वह अपने को रोक न सका। गिरता-पड़ता घर आकर वह अपने कमरे में पड़ी हुई आरामकुरसी पर लेटकर न जाने क्या-क्या सोचता रहा। अचानक कैंची के गिरने की-सी आवाज़ से वह चौंक उठा। देखा, मंजरी बहुत से कपड़ों का ढेर लगाये, ठीक उसके कपड़ों की अलमारी के सामने बैठी कुछ सी रही है। नवल एकदम कुरसी से उठकर खड़ा हो गया, कौतूहल का कुछ पारावार न था। ‘इतनी रात को…मेरे कपड़े ठीक कर रही है? अकेली मेरे कमरे में? अम्मां क्या कहती होंगी? चाची ही क्या कहेंगी? मंजरी को मेरी इतनी चिन्ता क्यों है? वास्तव में, वह मेरी कौन है?’ इत्यादि बातों ने नवल के मस्तिष्क में हलचल-सी मचा दी। जो कुछ वह अभी देखकर आ रहा था, हृदय को उद्वेलित करने के लिए क्या कुछ कम था? वह धीरे-धीरे बाहर चला आया। बरामदे में आकर, बड़े साहस से मां को आवाज दी, चाची को पुकारा — ‘मुझे दूध दे जाओ।’ आज उसकी हिम्मत मंजरी से दूध मांगने की न हुई। मां ने कहा — ‘आज मेरे पैरों में बड़ा दर्द है।’ चाची ने उत्तर दिया — ‘आयी भैया! देख तो, मंजरी इसी आसरे में वहीं कहीं बैठी होगी, मुन्नू को अकेला कैसे छोड़ आऊं?’ नवल की आवाज़ सुनकर मंजरी का ध्यान टूट गया। जल्दी-जल्दी कपड़ों को यथास्थान यूं ही सरकाकर वह बाहर निकल आयी। नवल ठगा हुआ-सा यह सब देख रहा था। पर मंजरी के हृदय में न कोई भाव दिख पड़ता था और न नेत्रों में कोई कौतूहल ही नाच रहा था। जल्दी से चौके में गयी और दूध का गिलास भर लायी। बूआ ने उसके हाथ से गिलास लेकर कहा — ‘जा, लल्ला अकेला है, मैं दूध दे आऊं।’ रात को नवल बहुत देर तक जागता रहा, नींद आती ही न थी। एक के बाद एक-एक करके उसके मस्तिष्क में विचार आने-जाने लगे। नवल को उस दिन की बात भी याद हो आयी, जब वह दालान में खड़ा अपनी क़मीज़ में बटन टांक रहा था। मंजरी देखती हुई उसके सामने से निकल गयी, परन्तु यह नहीं कहा कि तुम्हें क्या बटन टांकना आयेगा या कॉलिज को देर हो जायेगी, लाओ, मैं ही लगा दूं। नवल ने उस दिन मन-ही-मन कहा था — ‘कितनी अभिमानिनी लड़की है।’ पर आज उसके हृदय से वह भाव कितनी जल्दी लुप्त होकर केवल थोड़ा-सा पश्चात्ताप छोड़ गया। यह स्वयं नवल भी ठीक-ठीक न समझ सका। धीरे-धीरे कई मास बीत गये। अब मंजरी की प्रत्येक गतिविधि का ध्यान बड़ी सूक्ष्म दृष्टि से किया जाने लगा। वैसे तो वह घर का प्रत्येक कार्य बड़े उत्साह और सुचारुता से करती ही थी, किन्तु जो कुछ और जितने भी कार्य, वह नवल से सम्बन्ध रखने वाले करती, उन पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा। और कोई तो पीछे ही रहा, सबसे पहले तो उसकी बूआ ही बहुत सतर्क रहने लगी, पर जब उन्होंने देखा कि स्वयं नवल ही अब बड़ी झिझक और संकोच के साथ घर में आता है और मंजरी तो कभी उसकी ओर आंख उठाकर देखती भी नहीं, तब उन्हें कुछ सन्तोष-सा हो गया। कारण न मिलने से संशय का क्रम आप ही मन्द पड़ता गया। अब नवल ने प्रवाल को भी अधिक खिलाना कम कर दिया था। सब ने सोचा — ‘उसकी पढ़ाई के दिन हैं।’ मन ही मन में यह बातें उठीं और पनपने के पहले ही मन में ही दब गयीं। मंजरी ने यह भूल जाना चाहा था कि यह दूसरे का घर है, कुछ सफल भी हुई, परन्तु अब न जाने क्यों, उसे अपने घर की याद आने लगी। उन टूटे-फूटे खण्डहरों में एक प्रकार की स्वच्छन्दता, एक प्रकार का सन्तोष निहित था। किन्तु इस इतने बड़े पक्के मकान में एक प्रकार की जलन, एक प्रकार का अपमान और कटुता का आभास अब मंजरी के अनुभव में आने लगा। एक दिन बूआ से उसने कहा — ‘बरसात ऊपर से आ रही है, दोनों ही जगह के मकानों की कच्ची छतें हैं, उन्हें तो देखना ही चाहिए न? दूसरे, घर की और भी बहुत-सी चीजें बरबाद हो रही होंगी।’ पार्वती उसके इस विचार से सहमत होकर बोली — ‘हां, आखिर घर से तो सदा काम रहेगा, घर उजाड़ देने से कैसे बनेगा बेटी? न हो, थोड़े दिन के लिए ही चली जाओ, यहां ऐसे कब तक बीतेगा?’ ‘लेकिन मैं अकेली उस घर में क्योंकर पैर रखूंगी बुआ? क्या तुम दो-चार दिन के लिए भी नहीं चल सकतीं?’ ‘तू देखती नहीं मंजरी, मैं कितनी विवश और पराधीन हूं। बड़ी जीजी से तो कुछ होता ही नहीं, और जब से तू आयी है, तब से तो वह अपने शरीर का भी कुछ नहीं कर पातीं। देख, अकबरपुर में मेरी मौसी की लड़की है, न हो, तू उसे ही थोड़े दिनों के लिए साथ रख लेना, मैं खत लिख दूंगी, वह तेरा सारा काम करवा देगी। फिर कोई बूढ़ी-ठेरी औरत मिल जाने पर अपने पास डाल लीजियो। ज़िन्दगी के दिन तो किसी प्रकार काटने ही पड़ेंगे लाडो! देख, आ सकी, तो दो-चार दिन के लिए मैं भी आ जाऊंगी।’ कहते-कहते पार्वती की आंखों में आंसू भर आये, मंजरी भी रो पड़ी। शाम को नवल कॉलेज से आया, तो उसके सामने यह प्रस्ताव रखा गया कि वह जगदीश के साथ मंजरी को भेजने का प्रबन्ध कर दे, किन्तु नवल ने क्षण-भर सोचने के बाद कहा — ‘उसके साथ तो मैं हरगिज़ भी किसी का आना-जाना पसन्द न करूंगा चाची, वह बड़ी ख़राब आदत का लड़का है। दूसरे, जाने की ऐसी जल्दी भी क्या है? वहां अकेले रहना क्या ठीक होगा? प्रवाल को ही तब कौन देखे-सुनेगा?’ भतीजे की बात सुनकर चाची अचम्भे में आ गयी। और तो कुछ नहीं कहा, बस, इतना कहा — ‘नवल, जान पड़ता है कि अपनी स्त्री से भी अधिक तू बच्चों की विशेष चिन्ता किया करेगा। प्रवाल को कौन देखेगा-सुनेगा भैया! उसे देखने-सुनने वाला ही न रहा।’ युवक कुछ झेंपकर बाहर चला गया। दो दिन बाद पार्वती ने जगदीश के साथ मंजरी को भेजने का आयोजन कर ही दिया। नवल स्टेशन पर मंजरी को पहुंचाने गया, तो उसने केवल उससे यही कहा — ‘प्रवाल को अच्छी तरह से रखना।’ आगे वह कुछ न कह सका। जगदीश टिकट लेकर लौटा, तो नवल ने डब्बे में सामान रखकर बैठ जाने का आदेश करके, गाड़ी आने पर मंजरी को जनाने दर्जे में चढ़ा देने का विचार किया, किन्तु जगदीश को यह रुचा नहीं। मन में आया कि कह दूं — ‘तुम कौन? यह अधिकार तो मुझे ही मिलना चाहिए, मैं जी चाहे जैसे और जहां बैठा दूं… मैं पहुंचाने जा रहा हूं, और तुम स्टेशन पर केवल अपनी इच्छा से चले आये।’ परन्तु यह सब केवल सोचने-भर की बातें थीं, ट्रेन के आने पर वही हआ, जो कुछ नवल ने चाहा था। उसकी बात दुलखने की हिम्मत जगदीश में तो क्या, बहुतों में न थी। नवल ने गार्ड से कुछ कहा, जिसके उत्तर में वह बोला — ‘आप चिन्ता न करें बाबू…आपके घर के लोग अच्छी तरह उतार दिये जायेंगे।’ और फिर वह मुसकराकर हलके छींटे डालता हुआ चला गया। नवल के चेहरे पर हलकी लाली दौड़ गयी और मंजरी ने अपना सिर घुटनों में डाल लिया। इंजन ने सीटी दी, तो नवल प्रवाल का मुख चूमकर तेज़ी से स्टेशन के बाहर चला गया। मंजरी ने केवल एक ही बार दृष्टि उठाकर देखा था कि उस सहृदय युवक की पलकें गीली हो गयी थीं। जगदीश जब कुलियों को पैसे दे चुका, तब खिड़की से मुंह निकाल मंजरी की ओर देखकर बोला — ‘जिस चीज़ की ज़रूरत हो, बता देना, मैं बराबर में ही बैठा हूं।’ और फिर मन-ही-मन सोचने लगा — नवल कितनी दृढ़ता से मुझे आज ही शाम को वापस लौट आने की आज्ञा दे गया।’ गाड़ी धक-धक करती हुई हवा से बाज़ी लेने लगी। मंजरी ने आंचल के छोर से अपने नेत्र मल डाले। पास ही बैठी हुई एक दूसरी महिला ने पूछा — ‘क्या यह तुम्हारेÉ?’ पर बात पूरी न सुनने के विचार से मंजरी ने अपना मुंह दूसरी ओर फेर लिया, मानो वह कुछ सुनना ही नहीं चाहती थी। प्रवाल अब भी हाथ-पैर पटक रहा था। क्रमश: डेढ़ वर्ष बीत गया। जो दु:ख से घबरा उठे थे, उन्होंने अपने हृदय को सब सहने योग्य बना लिया था, और जो सुखी थे, उनकी कल्पना में दुखियों के दुःख पर विचार करने की गुंजाइश ही न थी। नवल साल-भर वकालत कर लेने के पश्चात् अब मुंसिफ़ी की परीक्षा में बैठने की तैयारी कर रहा था। पार्वती गृहकार्यों से छुट्टी पाकर अपना अधिकांश समय पूजा-पाठ की ओर अधिक लगाने लगी, किन्तु न तो नवल को कोई कन्या ही पसन्द आती थी, और न वह अभी नौकरी मिलने से पहले विवाह ही करना चाहता था। स्वावलम्बी बनकर ही शादी करेगा, यही उसका निश्चय था। नवरात्रि के दिन आ गये। गांव से जगदीश के पिता तथा नवल के मामा-मामी सपरिवार रामलीला देखने के लिए, बहिन के घर सीतापुर आये हुए हैं। नवल की मां ने शाहाबाद से अपनी भानजी और भतीजी उमा को भी बुला रखा है, अपने दो छोटे बच्चों के साथ वह भी बुआ के घर आयी हुई हैं। मंजरी को शायद इस घर के सभी लोग भूल-से गये, क्योंकि जब से गयी है, उसका कभी कोई ज़िक्र ही नहीं आया। खाना खाते समय नवल ने चाची से कहा — ‘न हो, थोड़े दिन के लिए प्रवाल को भी बुला लो। दो-चार दिन रहकर मेला ही देख जायेगा। बहुत दिन हो गये, उसे देखने को मन कर रहा है। अब तो न जाने कैसा लगता होगा? शायद कुछ-कुछ चलने भी लगा हो। क्यों चाची, अब तो वह उमा जीजी की छोटी मुन्नी के बराबर हो गया होगा?’ ‘हां भैया! मंजरी का एक खत आया तो था, लिखा था कि थोड़ा-थोड़ा बोलने भी लगा है, खूब तमाशे करता है, अब तो वह चलने लगा है। पर बुलाऊं कैसे नवल? तुम तो सब जानते हो। जब वह चली गयी थी, तब जीजी ने कहा था — ‘मेरे घर में किसी रांड़ विधवा सयानी लड़की का कब तक गुजर होता, छोटी बहू? यह तुमने अच्छा ही किया, जो उसे भेज दिया।’ ‘लेकिन चाची! अब तो मैं भी नौकर हो जाऊंगा, तब क्या मैं अकेला ही परदेश में रहूंगा? तुम मेरे साथ न चलोगी? अम्मां के बस का तो कुछ है नहीं चाची, तुम्हीं को चलना होगा, तब तुम किसी को भी बुलाकर रख सकोगी।’ ‘खैर, तब जैसा कुछ होगा, देखा जायेगा। तुम्हारे पास तब दुलहिन रहेगी नवल, मेरा रहास कहां हो सकता है भैया? और न मुझे कोई यहां से कभी निकलने ही देगा। यहीं के धन्धों से फुरसत नहीं मिलती, जीजी के बस का तो अब पानी भी लेकर पीना नहीं रहा।’ ‘और जो मैं विवाह ही न करूं, तब?’ ‘दुश…तू अपनी मां का इकलौता बेटा है चन्दा! फिर मेरे ही कौन बैठा है? दो घर का दीया तेरे ही वंश से तो जलता रहेगा मुन्ना।’ ‘यह सब कुछ नहीं चाची, जिसे अपना मान लिया, वही अपना है। संसार में आकर कुछ दूसरों के दु:ख को बांटना भी मनुष्य का कर्तव्य है। मुझे वैसा कुछ शादी-वादी का ढोंग नहीं सुहाता। अपने सुख में ही डूबे रहना क्या कोई जीवन है? महात्माजी ने एक बार कहा था कि दीन और अनाथ तथा विधवाओं की रक्षा का भार आजकल के पढ़े-लिखे नवयुवकों को अपने ऊपर लेना ही चाहिए, तभी जाति और समाज का उद्धार होगा।’ ‘यह आज तू कैसी बातें कर रहा है नवल?’ पार्वती ने उसकी बात काटकर कहा। इसी समय उमा अपने बच्चे को गोद में लिये आयी और बोली — ‘दूध दे दो बूआ! लल्ला कब का भूखा रो रहा है।’ ‘देती हूं।’ — कहकर वह दूध ठंडा करने चली गयी। नवल ने कहा — ‘क्या तुम्हारे हाथ नहीं रहे उमा जीजी? चाची दिन-रात काम करती-करती मरी जा रही हैं।’ फिर कुल्ला करके मां के पास जा बैठा। धीरे-धीरे उनके पांव दबाकर बोला — ‘अम्मां! आजकल काम बहुत बढ़ रहा है, मिसरानी वगैरह तुम्हें कोई जंचती नहीं, न हो थोड़े दिनों के लिए मंजरी को ही बुला लो। जब यह सब लोग चले जायेंगे, तब उसे भी भेज देना। बहुत दिन से उसका कोई समाचार भी नहीं मिला। इधर तुम्हारी सेवा भी वैसी कुछ ठीक नहीं हो पाती।’ हरप्यारी आंखें फैलाये पुत्र के मुंह की ओर देखती रहीं। नवल ने कहा — ‘हां, बस यही ठीक है, मैं इसका प्रबन्ध किये देता हूं। मुझसे तुम्हारा दु:ख नहीं देखा जाता।’ ‘सो तो ठीक है नवल! परन्तु तुझे उस लड़की की इतनी चिन्ता क्यों है? उसका ब्योरा जाने बिना क्या रोटी न पचेगी?’ ‘नहीं अम्मां, यह बात नहीं है, लेकिन मनुष्य की चिन्ता करना मनुष्य का कर्तव्य है न? मैं उसी की बात कह रहा था,’ और फिर वह उठकर चल दिया। हरप्यारी कहती रह गयीं — ‘अरे सुन, ठहर तो नवल।’ ‘मुझे ज़रा काम है अम्मां, आया।’ कहता हुआ वह चला ही गया। पार्वती के आने पर हरप्यारी कहने लगीं — ‘आज लड़के को क्या पढ़ा दिया? न हो, दो-चार नौकर-दासी और लगा लो।’ पार्वती की समझ में ख़ाक न आया। वह अवाक् होकर जेठानी का मुंह ताकती रह गयीं। अचानक हुए वज्रपात के विषय में कोई क्या अनुमान लगाये? दशहरे का दिन आ गया। घर के सभी बालक रामलीला जाने की खुशी में फूले न समाते थे। ‘अहा जी, आज तो रावण फुंकेगाÉ हम तो तीर-कमान लायेंगे।’ एक दूसरे बच्चे ने चीख़कर कहा — ‘और मैं गुब्बारा।’ इसी समय उमा की मुन्नी ने अपने सिर की टोपी की ओर इशारा करके कहा — ‘देखो जी, अहा! हमारी टोपी नयी, चमकनी, गोटे की।’ इत्यादि कहकर वह पल-भर में वहां पहुंच गयी, जहां दीवार के सहारे प्रवाल खड़ा-खड़ा निमाना-सा सबकी ओर देख-देख आंखें झुका लेता था। मुन्नी अपनी टोपी दिखाकर प्रवाल के सिर में एक हलकी-सी चपत लगाकर अपनी नानी के पास भाग गयी। इस ओर किसी का भी ध्यान न था। बच्चों के शोर-गुल से कानों के परदे फटे जाते थे। मंजरी जल्दी-जल्दी पूरियां बेल रही थी और पार्वती उतारती जाती थी। नवल ने रसोई की चौखट पर खड़े होकर कहा — ‘क्या प्रवाल मेला देखने न जायेगा चाची? उसे तो अभी कपड़े भी नहीं पहनाये गये। क्या ऐन जाने के वक्त ही उसे तैयार किया जायेगा? उठो, सुनती हो या नहीं?’ पर दोनों में से एक ने भी उसकी बात का उत्तर नहीं दिया। नवल जानता था कि इधर कुछ दिनों से चाची मुझसे नाराज़-सी रहती हैं। मंजरी में इतना साहस ही कहां था? अबकी उसने कुछ लापरवाही से कहा — ‘ठीक है, अच्छा लो, हम भी नहीं जाते।’ यह सुनकर पार्वती झल्ला उठी — ‘क्या और कोई नया काण्ड रचने की सूझी है नवल? मुझे अब इस घर में रहना भी भारी हो उठा है, तुम क्यों न जाओगे? प्रवाल को मैं नहीं भेजूंगी, उस पर मेरा अधिकार है।’ बूआ की पिछली बात सुनकर चाहे नवल उतना विस्मित न हुआ हो, जितनी कि मंजरी। वह स्तम्भित होकर उसका मुंह देखने लगी। इच्छा हुई कि एक बार आंगन की ओर मुंह फेरकर देख ले कि वह गये या हैं, पर साहस न हुआ। इसी समय दालान की ओर से बड़ा शोर-गुल सुन पड़ा, मानो एक साथ कई कण्ठों से निकली हुई तीव्र ध्वनि किसी आने वाली विपत्ति की सूचना दे रही है। ‘अरे ले कम्बख्त, मुन्नी के बाल खींचकर टोपी छीनकर भाग गया न, बड़ा शौकीन बना है। होते ही तो बाप को खा गया, …अब कौन लाकर उढ़ावे-पहनावे। मां भी ख़ूब है भई, अपने बच्चे को ज़रा भी डांटकर नहीं रखती। चार दिन शहर में रहकर निगोड़े को दिन ही लग गये।’ इत्यादि कर्णकटु शब्दों की बौछार से मंजरी का हृदय फटने लगा। पार्वती ने उधर कान लगाये, मंजरी बेलन फेंककर भागी और नवल आग्नेय दृष्टि से उमा को निगलता हुआ पल-भर में प्रवाल के पास जा पहुंचा। टोपी छीनकर दूर नाली पर फेंक दी और प्रवाल को उठाकर गोद में ले लिया। मंजरी वहीं खड़ी रह गयी। आंखों में आंसू थे और होंठों पर थी एक मन्द मुसकान। क्षण में यह सब हो गया। उमा का भारी चेहरा फुलकर कुप्पा बन गया, हरप्यारी की भवें तन गयीं तथा नवल की मामी के बत्तीसों दांत किटकिटाने लगे। पल-भर पश्चात् नवल की मां ने गरजकर कहा — ‘तुम मेरे घर का सत्यानाश करने पर क्यों तुल गयीं छोटी बहू? कहो, तो काला मुंह करके मैं कहीं निकल ही जाऊं?’ ‘नहीं अम्मां, तुम्हें तो कहीं भी जाना न होगा, मैं ही अपना काला मुंह करके निकल जाने की बात सोच रहा हूं, फिर सब झगड़ा ही मिट जायेगा…मेरे ही कारण तो यह सब हो रहा है न?’ ‘यह कुछ नहीं करना होगा भैया नवल, और जीजी, तुम सब शान्त हो जाओ। मैं कल दिन निकलने से पहले ही इन दोनों अभागों को यहां से निकाल दूंगी। यह कलमुंहा क्या जाने कि जिसके बाप होता है, वही गोटे की टोपी ओढ़ सकता है।’ फिर मंजरी की ओर घूमकर पार्वती ने कहा — ‘जा डायन, अपना सामान ठीक कर ले, फिर मुझे कभी अपना मुंह न दिखाना।’ मंजरी को उस समय कुछ न सूझ रहा था, वह मूर्च्छिता-सी होकर, धम से नवल के कमरे की चौखट पर जा गिरी। कनपटी से फूटकर रक्त की धारा बह चली। युवक ने प्रवाल को लिये ही लिये, युवती को खींचकर अन्दर करके कमरे के किवाड़ बन्द कर लिये। नवल के सामने बोलने का साहस ही किसे था? ज्ञान-शक्ति हमारी वेदना को और भी तड़पा देती है, और शायद बेहोशी उसके दर्द को कम करने का यत्न करने लगती है। शरद पूर्णिमा का दिन था। प्रकृति चन्द्रमा की चांदनी में मल-मलकर स्नान कर रही थी और तारिकाएं उसकी मांग भरने के लिए, मोतियों की लड़ियां गूंथ रही थीं। छत पर खड़ी हुई मंजरी चांद दिखा दिखाकर प्रवाल को बहला रही थी। द्वार पर किसी ने धक्का मारा, सांकल झनझना उठी। नीचे आंगन में पड़ी हुई खाट पर मंजरी के एकाकी जीवन की एकमात्र सहारा, बुढ़िया ग्वालिन चीख़ उठी — ‘कौन है रे…?’ ऊपर से मुंडेर पर बैठते हुए मंजरी ने भी वंशी में फूंक मार दी — ‘कौन है दादी?’ उत्तर आया — ‘मैं ही हूं, किवाड़ खोल दो।’ मंजरी की उर-तन्त्री आप से आप ही बज उठी। ‘वही, क्या आप आये हैं? इतने दिन के बाद, इतनी रात को?’ उसने सिर का आंचल ठीक कर लिया। फिर अपनी धोती की ओर देखकर मन-ही-मन कहा — ‘ठीक है, वैसी मैली तो नहीं दिख रही।’ और फिर जल्दी से चौबारे में सूखता हुआ प्रवाल का धुला कुरता ले आयी। बुढ़िया से कहा — ‘किवाड़ खोल दो दादी, और दूध में थोड़े चौले भिगोकर चांदनी में रख दो।’ मंजरी ने देखा — सूट-बूट से सुसज्जित नवल, कितने आकर्षक रूप में, पल में आकर मंजरी के सामने खड़ा हो गया। पर पहले से कुछ लम्बा और दुबला-सा भी दिख रहा था। न जाने कब की पड़ी हुई एक टूटी-सी कुरसी लाकर मंजरी ने छत पर डाल दी, पर वह उस पर बैठा नहीं। जिस चारपाई पर प्रवाल पड़ा था, वह उसी के पैताने बैठ गया। मंजरी सोच रही थी — ‘यह क्यों आये? अब तो मैं इनकी चौखट पर कभी भी पैर न रखूंगी। चाहे भूखी ही क्यों न मर जाऊं और चाहे प्रवाल ही क्यों न म…।’ आगे उससे सोचा ही न गया, उसका हृदय कांप उठा। मंजरी को किसी उलझन में पड़ी देख, नवल ने ही बात शुरू की, पूछा — ‘अच्छी तो हो मंजरी, प्रवाल तो अच्छा रहा, कुछ दुबली अधिक हो गयीं।’ ‘नहीं तो, अच्छी हूं।’ फिर चुप। अबकी उसने प्रवाल का सहारा लेकर कहा — ‘देखा प्रवाल तुमने? तुम्हारी अम्मां अकारण ही मुझसे रूठ गयीं। घर आये अतिथि का सत्कार क्या ऐसे ही किया जाता है? भूख तो बड़े ज़ोर की लगी है। मैं तो आया था भर-पेट मावे के गूंझे खाने, पर जान पड़ता है कि भूखे ही रहना पड़ेगा।’ युवती का तन-मन सिहर उठा, वह आगे कुछ सुनने से पहले ही जल्दी से नीचे जाकर, कटोरा-भर चौले और थोड़ी-सी बेसन की पापड़ी ले आयी। नवल ने हंसते हुए वह सब उसके हाथ से लेते हुए कहा — ‘यह सब तो शायद कम हो जायेगा मंजरी! बताओ, और भी कुछ है या नहीं? मैं फिर उसी अन्दाज़ से खाना शुरू करूं।’ ‘हां, बहुत है।’ वह भी इतना कहकर हंस पड़ी। नवल ने खाते-खाते कहा — तुम सोच रही होगी कि यह दाना अचानक कहां से आ पड़ा? पर मैं ख़ाली तुम्हें यही बताने आया था मंजरी कि अब प्रवाल को गोटे की टोपी की कमी न रहेगी, अब मैं नौकर हो गया हूं, पूरे अढ़ाई सौ एक महीने में मिल जाया करेंगे। अच्छा, जाओ तो….नीचे मेरे सामान में काग़ज़ का एक गोल डब्बा रखा होगा, उसे उठा लाओ। बहुत भारी नहीं है, आसानी से उठा सकोगी, न होगा, ज़ीने पर से मैं थप्प लूंगा।’ युवती चुपचाप आज्ञापालन कर आयी। डब्बा खोलकर देखा, एक न दो, पूरी चार टोपियां सलमे और ज़री के काम से पुती हुई धरी हैं। देखकर बोली — ‘यह क्या? यह सब इतनी सारी क्यों ले आये? बेकार पैसे फेंकने से क्या लाभ? बहुत पैसा दिख रहा हो, तो थोड़ा ग़रीबों को ही दे डालो?’ ‘हां, यही सब पैसे-वैसे का हिसाब रखने के लिए ही तो मैं तुम्हें लेने आया हूं। मैं अपना बाहर का काम देखूं या घर-गृहस्थी सहेजता रहूं। तुम तो यहां हो, वहां कोई अभी जाना ही नहीं चाहते, फिर घर कौन देखे?’ युवती का बदन कांपने-सा लगा, वह आज कैसी बातें सुन रही है? हिन्दू घर की अभागी विधवा को यह सब कैसे रूचता? बड़ा साहस करके बोली — ‘ऐसी बातें न कहो, मुझे इन बातों से कोई ख़ुशी नहीं होती।’ ‘यही तो मैं भी कहता हूं मंजरी! बातें करना मुझे वैसे आता ही कब है? वही सब तो तुमसे सीख लेने की ज़रूरत मालूम हुई। तभी तो चला आया। और जहां तक ख़ुशी का सवाल है, वहां तक मैं तुम्हें ख़ुश करने तो आया नहीं, मैं तो अपनी ख़ुशी को लेकर ही यहां तक चला आया हूं। अच्छा बोलो, कब चलने का विचार है? छुट्टी तो सिर्फ दो ही दिन की मिल सकी, ज्यादा मिली ही नहीं?’ ‘चलने का विचार है? कहां चलने का?’ युवती ने आश्चर्य से पूछा — ‘यह कैसे बताऊं?’ मेरे या अपने, वह किसी के भी घर चलने का विचार पूछ रहा है? यह है तो आख़िर घर ही, पक्का सीमेण्ट और चूने का बना है। ‘मेरा घर तो कच्चा-पक्का जैसा भी कुछ है, मेरे लिए बहुत है। पर मैं वहां तो भूलकर भी अब पैर न रखूंगी, किस मुंह से जाऊं?’ ‘क्यों, मुंह में क्या हो गया? भई, तुम्हारे घर तो मैं तुम्हें अकेली छोड़ नहीं सकता, मेरे घर अथवा अम्मां की चौखट पर तुम चढ़ने की नहीं, तो फिर प्रवाल के घर सही, वहीं मैं तुम्हें ले जाना चाहता हूं, समझीं। मेरी बदली वहीं की तो हो गयी है मंजरी, गांव का नाम है बांदा।’ ‘मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझी, साफ़-साफ़ कहो। क्या तुम मुझे बिल्कुल ही धूल में मिला देना चाहते हो?’ ‘हां, ऐसा ही समझ लो। धूल में से ही हीरे का जन्म होता है मंजरी! और धूल में मिलकर ही तो बीज पौधे का रूप धारण करके, सुन्दर-सुन्दर फूलों की सृष्टि करके संसार को मुग्ध कर आश्चर्य में डाल देता है।’ नवल ने कहा। ‘मैं तो कलंक का टीका अपने माथे पर नहीं लगवाना चाहती न?’ ‘देखो मंजरी! चन्द्रमा में भी कलंक है, और शायद सभी अच्छी वस्तुओं में किसी-न-किसी रूप में थोड़ा-बहुत कलंक छिपा होता है। मैं तुम्हें छोड़कर जीते जी तो जाऊंगा नहीं। हां, यह बात दूसरी है कि तुम इसी घर में मुझे फूंक-फांककर ख़त्म कर दो, फिर जाने-आने का कोई सवाल ही नहीं उठेगा।’ युवक की बातों से युवती का सिर चकराने लगा, पर इस समय वह अपने घर थी, स्वाधीन थी, उन टूटे-फूटे खण्डहरों में रहते हुए भी उसके शरीर में शक्ति थी और आत्मा में बल था, दृढ़ता से बोली — ‘यह सब कुछ न हो सकेगा नवल बाबू! वह स्त्रियां और ही होती होंगी, जो इस प्रकार पुरुषों की बातों में आकर, अपना सर्वस्व गंवा बैठती हैं, मैं तो रूखी-सूखी रोटी का टुकड़ा अपनी मेहनत-मजदूरी करके ही पैदा कर लूंगी और उसी से अपना पेट भर लूंगी।’ ‘सो तो ठीक है मंजरी। मुझे भी एक ऐसी ही स्त्री की ज़रुरत थी। लेकिन यह तो मैं खूब जानता हूं कि तुम्हें नहीं चाहिए…न तुम्हें किसी चीज़ का लोभ है, और न ही ज़रूरत है…परन्तु…परन्तु मंजरी! प्रवाल को तो एक पिता की ज़रुरत महसूस होती ही है न? मैं यह सब उसी की बात को लेकर कह रहा था।’ युवक की बात सुनकर युवती के सारे शरीर में बिजली-सी दौड़ गयी। बालक ने, न जाने क्या सोचकर, नवल के गले में अपने छोटे-छोटे मृदुल कर डाल दिये और फिर वह उसकी पीठ पर झूल गया। वह हार गयी, परास्त होकर उसकी उठी हुई पलकें आप-से-आप नीचे को झुककर उमड़ते आंसुओं को छिपाने का यत्न करने लगीं। नवल ने कहा — ‘देखा तुमने? मेरा प्रवाल कैसा राजा बेटा है? तुमसे तो यही अच्छा है …कम-से-कम यह अपने घर आये अतिथि का अनादर तो न करेगा,’ और फिर वह प्रवाल का मुंह चूमकर खिलखिलाकर हंस पड़ा। नवल ने देखा, युवती मौन है। अपने बचे हुए चौलों में से उसने चम्मच-भर चौले प्रवाल के मुंह में भर दिये। फिर दूसरा चम्मच भर के मंजरी की ओर बढ़ाकर कहा — ‘तुम भी खाओ चौले? खिला दूं?’ प्रवाल ने अपने नन्हे से हाथ का सहारा देकर नवल का हाथ मां की ओर बढ़ा दिया। नवल ने जबरन दूसरा चम्मच मंजरी के मुंह में ढूंस दिया। ज्योत्स्ना झिलमिलाकर हंस पड़ी। बालक भी किलकारी मार हंसा। कहीं दूर पर पपीहा पुकार उठा — ‘पी, पी’।

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By होमवती देवी

होमवती देवी (1902-1951) का जन्म मेरठ, उत्तर प्रदेश में हुआ। इनके प्रमुख कहानी-संग्रह हैं — ‘निसर्ग’, ‘धरोहर’, ‘स्वप्नभंग’ तथा ‘अपना घर’ और दो कविता-संग्रह ‘उद्गार’ और ‘अर्थी’ हैं।

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दिल गद् गद् होगया सच्ची

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दिल गद् गद् होगया सच्ची में