कुंदन यादव भारतीय राजस्व सेवा के 2007 बैच के अधिकारी हैं. ठेठ बनारसी हैं या यूं कहें कि बनारस उनकी रगों में है. बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में डिग्रियां हासिल की है. सन 2003-04 में फुलब्राइट स्कॉलरशिप के तहत अमेरिका में विजिटिंग लेक्चरर के तौर पर इलिनॉय विश्वविद्यालय, शिकागो में हिंदी का अध्यापन भी कर चुके हैं। समकालीन स्थितियों पर मारक व्यंग्य उनके लेखन में दिखता है. संप्रति :- केंद्रीय प्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड नई दिल्ली में ज्वाइंट कमिश्नर पद पर कार्यरत संपर्क:-ईमेल :kundanyadav@gmail.com मोबाइल : 07905664743

10 Comments

  1. Dileep Kumar Yadav
    October 21, 2018 @ 10:06 pm

    Very good bhaiya ji.
    I. Am proud of you

    I am brother of RJ Yadav

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  2. आनंद
    October 21, 2018 @ 10:30 pm

    कहानी पढ़ कर महसूस होता है कि काश हम भी मदद नवागांव के उस घटनाक्रम में किरदार होते। शुद्ध बनारसी पन दिखाई पड़ता है। बेजोड़ लेखन।

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  3. आनंद
    October 21, 2018 @ 10:32 pm

    कहानी पढ़ कर महसूस होता है कि काश हम भी मदरवां गांव के उस घटनाक्रम में किरदार होते। शुद्ध बनारसी पन दिखाई पड़ता है। बेजोड़ लेखन।

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  4. Saurabh kumar
    October 22, 2018 @ 11:56 am

    मुक्तिबोध ने मठ और गढ़ के दमंचकरा का इशारा किया था अपनी कविता “”अंधेरे में ” में एक फ़ाइंटेसी के रूप में। वैसे ही सामाजिक अंधेरे को बड़े ही सरल तरीके से कुन्दन जी ने इस कहानी में उतारा है। जुआ, पुलिस, नेता, अधिकारी, सरकारी जमीन पे कब्जा, निर्माणाधीन पुलिया से थोड़ा थोड़ा बालू गिट्टी मंदिर के नाम पर जुटाना और दिन दहाड़े शिवलीला के नाम पर जुए का आयोजन यानी समाज के सब कुछ की विद्रूपता के हमारे जीवन में सहज और निर्विरोध प्रवेश की तरफ इशारा करने वाली कहानी है। बहुत बहुत साधुवाद।

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  5. Ashish Kumar
    October 22, 2018 @ 12:00 pm

    ‘गंडासा गुरु की शपथ’ कहानी आंचलिकता के ढर्रे में आने वाले युगीन बदलावों की कहानी है। ये बदलाव मनुष्य की आदिम वृतियों के कुंठित दायरों का स्फोट बनकर सामने आते हैं। मदरवां गांव को एक रूपक में लिया जा सकता है, एक ऐसा रूपक जो संवेदनाओं के दोहन की हर चेष्टा का सापेक्षिक प्रमाण है। गजाधर तिवारी हों या गंगाप्रसाद या मिश्रा जी मेरी समझ में इनमें से सारे चरित्र मानवीय हैं लेकिन वे केंद्रीय चरित्र नहीं हैं,केंद्रीय चरित्र और कथानक तो मदरवां का रुपक है क्योंकि यह रूपक रमना,बनपुरवा,डाफी आदि का प्रतिरूप है..कहानी का अर्थ भी इन्हीं रूपकों के बीच ही खुलता है.। सामाजिक विडंबनाओं और उनसे जुड़ी भावुक संवेदनाओं के दुरुपयोग पर यह कहानी मारक व्यंग्य करती है…शिल्प का भदेसपन इसे भीड़ से अलग पहचान देता है, जिससे रचनाकार की सुलझी हुई समझ के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए..।

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  6. Ramji Singh
    October 22, 2018 @ 12:02 pm

    कहानी भारतीय सामाजिक संरचना का बहुत सघन यथार्थ प्रस्तुत करती है । खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार की सामाजिक संरचना का। लेकिन जिस तरह से आपने लिखा है वह संवेदनात्मक स्तर पर बहुत ही कमज़ोर है। यानी विषय वस्तु अधिक है रचनाशीलता कमज़ोर है। असल में यह उपन्यास का विषय है और चरित्रों का सही विस्तार भी तभी हो सकता है। गंडासा गुरु जितना शातिर और बदमाश है वह पहली ही घटना के विवरण से प्रकट होना कम होने लगता है और कहानी एकांगी होती चली जाती है। लगता है जैसे बाकी चीजें स्वाभाविक रूप से वह सब आकार ग्रहण कर रही हैं जो कहानी में दिख रहा है जबकि वास्तव में आप वहां तक उतर नहीं पाए हैं जहां तक उनका विस्तार है। गंडासा तिवारी जैसा टिपिकल चरित्र उत्तर भारत के बाभन युवाओं का एक प्रतिनिधि चरित्र हो सकता है बशर्ते सीर गोवर्धनपुर , मदरवा और लंका थाने के चरित्र भी अपने लालच और दुरभिसंधियों के साथ खुल सकें। कुल मिलाकर आपमें कथाकार की संभावना है लेकिन परिश्रम की घोर जरूरत भी है

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  7. Hari Narayan
    October 22, 2018 @ 12:05 pm

    Kya bat hai!!! Shreelal shukl ki yad dila di aapne. Wahi shaili.. wahi kuredati aur gudgudati shaili. Shandaar. bahut badhai. Kisi patrika mein chhapawaiye.

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  8. Digvijay singh
    October 22, 2018 @ 3:18 pm

    एक और बेजोड़ रचना…कुंदन जी की ठेठ देहाती भाषा शैली उनकी खासियत है उनकी कहानियों में आंचलिक खुसबू साफ साफ महसूस होती है…भाषा और ग्रामीण रहन सहन पर उनकी विशिष्ट पकड़ है जो उन्हें बाकी लेखकों से अलग करती है, समकालीन लेखकों में मुझे इनकी कहानियां सर्वाधिक प्रिय है….इनकी रचनाये जल्द ही हार्ड कॉपी में पढ़ने को मिले यही कामना है

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  9. Nishant Singh
    October 23, 2018 @ 12:51 pm

    कुन्दन जी की कहानिया शुरू से ही कहानी लेखन के आजकल के दौर में किस्सागोई और सरलता के माध्यम से प्रेमचंद और श्रीलाल शुक्ल की मिलीजुली परंपरा की तरफ ले जाती हैं। गंडासा गुरु भारत के हिन्दी प्रदेश के गाँव गाँव में पाए जाते है किसी न किसी रूप में। कुन्दन साहब आप ऐसे ही लिखते रहें।

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  10. Mahendra Goel
    October 26, 2018 @ 9:19 am

    Kundan yadav Ji is truly blessed by Goddess of wisdom and his crude but most meaningful creations, seamlessly framed and articulated ,speaks of same DNA style which our respectable Orem Chand ji other superlative Hindi poets must have possessed . Ur nectar and musk of such writings will spread far and wide and time is not too far when u will become apostle and epitome. Of Hindi literature
    Regards MahendraGoel 09810808800

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