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यशपाल ने दिव्या को ‘बौद्धकालीन उपन्यास’ कहा है, अगर इससे यह भ्रम न उत्पन्न हो कि उपन्यास की रचना बौद्धकाल में हुई है, तो यह मानना पड़ेगा कि दिव्या का परिवेश बौद्धकालीन है। उपन्यास की प्रारम्भिक कथा भूमि मद्र गणराज्य की राजधानी सागल (शाकल) नगरी है, जिसकी समता आज के स्यालकोट से स्थापित की जाती है। लेखक के अनुसार इण्डो-ग्रीक शासक मिनाण्डर ने सम्राट पौरव को हरा कर मद्र पर अधिकार किया था। मिनाण्डर के बाद मद्र पर वहाँ के शक्तिशाली गणों का सामूहिक शासन प्रारम्भ हुआ। मिनाण्डर एक मात्र प्रामाणिक ऐतिहासिक पात्र है, जिसका उल्लेख उपन्यास में होता है। मिनाण्डर बौद्ध ग्रंथों में उल्लिखित मिलिन्द नामक शासक है- जिसका बौद्ध भिक्षु नागसेन से वार्तालाप मिलिन्दपन्हो में संकलित है। इतिहासकार आमतौर पर मिलिन्द या मिनाण्डर का काल ई. पू. 130 तक मानते हैं। इस लिहाज से यह कथा इसके बाद की ठहरती है। इस समय तक केन्द्रीय और पूर्वी भारत में शुंग वंश अपनी सत्ता के चरम पर था। ब्राह्मण धर्म पुनः महता प्राप्त कर रहा था। सांगल (शाकल) नगरी में ब्राह्मणों के प्रबल वर्ग का चित्रण स्वयं लेखक ने ही किया है। लेखक के अनुसार यवन युवतियां धीरे-धीरे आर्य संस्कृति को अपना रहीं थीं। ऐसी स्थिति में उपन्यास को बौद्धकालीन कहना थोड़ा खटकता है।

दिव्या को आमतौर पर ऐतिहासिक उपन्यास माना जाता है लेकिन शासक मिनाण्डर के उल्लेख को छोड़ दें तो उपन्यास में कोई ऐतिहासिक पात्र नहीं है। उपन्यासकार ने एक विशिष्ट उद्देश्य से भाषा, संस्कृति और वेशभूषा के आधार पर एक ऐतिहासिक वातावरण निर्मित करने की चेष्टा अवश्य की है, परन्तु सिर्फ इस आधार पर उपन्यास को ऐतिहासिक कहना थोड़ा मुश्किल लगता है।

उपन्यासकार का मूल उद्देश्य केन्द्रीय चरित्र दिव्या के माध्यम से समाज में नारी की त्रासदपूर्ण स्थिति को प्रदर्शित करना है। दिव्या मद्र के वयोवृद्ध धर्मस्थ देव शर्मा की प्रपौत्री थी तथा राजनर्तकी मल्लिका की प्रिय शिष्या भी। वार्षिक कला महोत्सव में ‘मराली का आत्मसमर्पण’ नामक नृत्य के लिए दिव्या को सर्वश्रेष्ठ नर्तकी चुना जाता है। इसी प्रतियोगिता में नगर श्रेष्ठी प्रेस्थ का पुत्र पृथुसेन सर्वश्रेष्ठ खड़गधारी चुना जाता है। प्रेसथ मिनाण्डर का दास था। तथागत धर्म मे दीक्षित होते समय मिनाण्डर ने प्रेस्थ को दासत्व से मुक्त किया बल्कि उसे कई विदेशी अश्व भी उपहार में दिये। उन अश्वों को बेंच कर पेस्थ ने प्रचूर सम्पत्ति कमाई और नगर श्रेष्ठी बन बैठा लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं कमा पाया। भद्र समाज में वह दास ही माना जाता रहा। यही कारण है कि पृथुसेन को सर्वश्रेष्ठ खड़गधारी होते हुये भी सर्वश्रेष्ठ नर्तकी दिव्या की शिविका को कन्धा देने के अधिकार से वंचित होना पड़ा। पृथुसेन शिकायत लेकर धर्मस्थ के पास पहुँचता है। जहां उसकी मुलाकात दिव्या से होती है। उदार हृदय और न्याय प्रिय देवशर्मा के सानिध्य में पलने वाली दिव्या स्वयं पृथुसेन के साथ हुए अन्याय से दुःखी थी। पृथुसेन के यह पूछने पर कि क्या मेरा शिविका को कन्धा देने का अधिकार मांगना अनुचित था, दिव्या कहती है नहीं आर्यपुत्र। इसी क्रम में वीर और महत्वाकांक्षी पृथुसेन तथा कोमलता, दयालुता और सौंदर्य की प्रति मूर्ति दिव्या के बीच प्रणय का अंकुर प्रस्फुटित होता है। इस बीच मद्र पर दार्वराज केन्द्रस के आक्रमण की आशंका मँडराने लगती है। गण सभा की बैठक बुलायी जाती है जिसमें आचार्य प्रवर्धन ब्राह्मण धर्म के समर्थकों को सेना के महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करवाने में कामयाब हो जाते है। पृथुसेन का सेनापति (बनाने) का दावा उपेक्षित पड़ा रह जाता है। सैन्य सामग्रियों की खरीद के बहाने आम जनता पर करों का बोझ बढ़ा दिया जाता है। राजपुरूष इस कर को शक्ति के साथ वसूल करते हैं। चार्वाकवादी मारिश इस अन्याय का विरोध करता है, लेकिन राजपुरूषों के अत्याचार को रोक नहीं पाता। केन्द्रस के शुरूआती हमले में मद्र सेना की नाकामी के बाद गणपति मिथोद्रस सम्पूर्ण अधिकार अपने हाथों में ले लेते हैं। पृथुसेन को नया सेनापति नियुक्त किया जाता है और रूद्रधीर को पृथुसेन का अपमान करने के अपराध में दो हजार दिनों के लिए देश निकाला दे दिया जाता है। पृथुसेन के युद्ध पर जाने से पूर्व दिव्या पृथुसेन के समक्ष आत्मसमर्पण कर देती है। पृथुसेन युद्धभूमि से विजय प्राप्त कर लौटता है और इधर दिव्या के गर्भ में पृथुसेन की संतान है। पृथुसेन दिव्या से मिलना चाहता है, परन्तु प्रेस्थ की महात्वाकांक्षा पुत्र को मद्र गणराज्य का सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्ति बनाना चाहती है। यह स्वप्न दिव्या के नहीं बल्कि सीरो के जरिेये पूरा हो सकता था, जो गणपति मिथोद्रस की पौत्री थी। प्रेस्थ की कूटनीतिक चालों के कारण पृथुसेन दिव्या से मिल नहीं पाता और सीरों से विवाह कर लेता है। दिव्या इस निस्सहाय अवस्था में पृथुसेन की दूसरी पत्नी बनने को भी तैयार है, परन्तु यहाँ भी नाकामी मिलने के बाद उसका अपने घर या समाज में कोई स्थान नहीं रह जाता। दिव्या ने अपराध किया था- भयानक अपराध! उसने ब्राह्मणवादी व्यवस्था के वर्चस्व को चुनौती दी थी। उसने न सिर्फ स्वयं अपने साथी का चयन किया था बल्कि बिना विवाह किये गर्भधारण भी किया था। दिव्या के सामने कोई दूसरा रास्ता नहीं था। वह घर छोड़कर निकलती है और दास व्यवसायियों के चंगुल में फँस जाती है। यहाँ उसका नया नामकरण होता है दारा। दास व्यवसायी प्रबल दारा को पचास स्वर्ण मुद्राओं में ब्राह्मण चक्रधर के हाथों बेच देता है, जहां उसका काम ब्राह्मण पुत्र को अपने स्तन से दूध पिलाना होता है, नीचे पुत्र को मिल सके। यशपाल ने इस पूरे घटना क्रम के माध्यम से समाज में दासों की स्थिति का मार्मिक अंकन किया है। वस्तुतः दास के शरीर पर ही नहीं बल्कि उसकी आत्मा पर भी उसका क्रेता अधिकार करना चाहता है। पुत्र को बेचे जाने के निर्णय की खबर सुनते ही दिव्या पुत्र को लेकर ब्राह्मण के घर से भाग जाती है। दिव्या भागती हुयी शरण की तलाश में बौद्ध मठ तक पहुंचती है। मठ मंे शरण की अनुमति देने से पहले स्थविर दिव्या से पिता, पुत्र या पति की अनुमति की मांग करता है। दिव्या द्वारा असमर्थता जताने पर वह स्त्री के मठ प्रवेश के लिए अभिभावक की अनुमति की अनिवार्यता को लेकर दिव्या को मठ में प्रवेश देने से इंकार कर देता है। दिव्या के द्वारा यह कहने पर कि तथागत ने वेश्या आम्रपाली को भी मठ में शरण दी थी, भिक्षु का जवाब होता है ‘वेश्या स्वतन्त्र नारी है देवी’। इस बौद्ध मठ में एक वेश्या के लिए जगह है, परन्तु चारों तरफ से सतायी एक निस्सहाय अबला नारी के लिए कोई जगह नहीं। दिव्या की अवस्था देखकर भी स्थविर का हृदय नहीं पिघलता। लेखक ने दिखलाया है कि कालक्रम में बौद्ध धर्म भी उन्हीं जड़ताओं का शिकार हो गया था, जिसके विरोध में यह महान आन्दोलन खड़ा हुआ था। ब्राह्मण धर्म हो या बौद्ध धर्म स्त्री दोनों ही स्थानों पर पराधीन है। ‘सेवासदन’ की सुमन की तरह दिव्या को वेश्या जीवन अपने जीवन से श्रेष्ठ लगने लगता है और वह वेश्या बनने का निर्णय करती है। राहगीरों से वेश्याओं के आवास का पता पूछती हुई वह आगे बढ़ती है कि तभी ब्राह्मण मालिक और उसके साथ की भीड़ से बचने के लिए दिव्या को नदी में कूदना पड़ता है,  जहां से उसे मथुरा की राजनर्तकी रत्नप्रभा द्वारा बचाया जाता है। महाउपरिक रविशर्मा द्वारा मानवतावादी दृष्टिकोण से विचार करने के बाद दिव्या पर ब्राह्मण के दावे को अस्वीकार कर दिया जाता है और रत्नप्रभा दिव्या को अपने साथ ले जाती है। दारा के बाद अब दिव्या का नामकरण होता है- अंशुमाला। अंशुमाला शीघ्र ही रत्नप्रभा के नृत्यागार की सर्वश्रेष्ठ नृत्यांगना बन जाती है- जिसकी ख्याति दूर-दूर तक फैल जाती है। निर्वासन भुगत रहा रूदधीर भी अंशुमाला की ख्याति सुनकर आता है और दिव्या को पहचान लेता है। विवाहित रूद्रधीर आरम्भ में भी दिव्या को अपनी दूसरी पत्नी बनाना चाहता था। वह दिव्या से पुनः प्रणय निवेदन करता है परन्तु दिव्या इस निवेदन को अस्वीकार कर देती है। रत्नप्रभा के यहाँ दिव्या की मुलाकात मारिश से भी होती है। मारिश का संसर्ग दिव्या को अच्छा लगता है लेकिन वह मारिश के प्रणय निवेदन को स्वीकार करने में भी असमर्थता जताती है।

दूसरी ओर सागल (शाकल) में रूद्रधीर मल्लिका की सहायता से पृथुसेन का तख्ता पलटने में कामयाब हो जाता है। भद्र में ब्राह्मण राज्य की पुनस्र्थापना होती है और पराजित पृथुसेन बौद्ध धर्म में शरण ढूँढता है।

अंशुमाला की ख्याति मल्लिका तक भी पहुंचती है। वह उससे मिलने के लिए रत्नप्रभा के यहाँ पहुंचती है और अपनी प्रिय शिष्या को पहचान लेती है। रत्नप्रभा से मांगकर उसे अपनी उत्तराधिकारिणी बनाने के लिए वह दिव्या को वापस शाकल ले आती है। उत्तराधिकारणी की घोषणा के अवसर पर नागरिकों द्वारा दिव्या को पहचान लिया जाता है। दिव्या को पहचानते ही ब्राह्मण समाज उसके राजनर्तकी बनने पर अपना विरोध जताता है। ‘द्विज कन्या किसी भी हाल में वेश्या नहीं बन सकती’। द्विज कन्या दास तो बन सकती है परन्तु उसे वेश्या बनने का अधिकार नहीं है। निराश दिव्या अकेली पैदल चलती हुई एक पन्थागार तक पहुंचती है। वहाँ लेखक नाटकीय रूप से दिव्या के जीवन में आये तीनों पुरूषों को उसके सामने उपस्थित कर देता है। आचार्य रूद्रधीर दिव्या को अनी पत्नी के रूप मे कुलवधू और कुल माता का आसन देना चाहते है, परन्तु दिव्या की नजर में कुल बधू और कुलमाता के आसन का मूल्य नारी की स्वतंत्रता  है। अपनी स्वतंत्रता की बलि चढ़ाकर ही स्त्री इस सम्मान को प्राप्त कर सकती है। वास्तव में यह स्त्री का सम्मान नहीं बल्कि पराक्रमी पुरूष का सम्मान है। दिव्या को अपनी स्वतंत्रता का त्याग स्वीकार नहीं है। पृथुसेन दिव्या को अपने साथ बौद्ध संघ में आने का आमन्त्रण देता है परन्तु स्वयं उसके ही अनुसार धर्म में स्त्री त्याज्य है और पुरूष के निर्वाण में बाधक है। दिव्या के अनुसार स्त्री का चरम लक्ष्य निर्वाण नहीं बल्कि सृष्टि है, इसलिए वह पृथुसेन के आमंत्रण को भी ठुकरा देती है। तीसरा आमंत्रण मारिश का है। चार्वाकवादी मारिश स्त्री को शरण देने की बजाय शरण के आदान-प्रदान की बात करता है। इस प्रकार वह स्त्री-पुरूष समानता की संकल्पना रखता है। अंततः दिव्या मारिश से अश्रय की प्रार्थना करती है। उल्लेखनीय है कि मारिश स्त्री-पुरूष के बीच आश्रय के आदान-प्रदान की बात करता है, लेकिन उपन्यास की आखिरी पंक्तियों में दिव्या द्वारा मारिश से आश्रय की प्रार्थना करना नारी को यहाँ भी पुरूष के अधीन बना देता है। अपने जीवन अनुभव से वारांगणात्व को (वेश्या जीवन को) श्रेष्ठ मानने वाली दिव्या अन्ततः मारिश की भुजाओं में शरण ढूंढती है। सम्पूर्ण कथा के निष्कर्ष इस घटना की तार्किक संगति बैठाना थोड़ा मुश्किल है।

विचारधारा को परे रखकर देखे तो उपन्यासकार ने तत्कालीन समाज में एक स्त्री के दैन्यावस्था का चित्रण करने में पूर्ण सफलता पायी है। दिव्या का करूण जीवन पाठक के हृदय को विचलित कर देता है। इस प्रकार कुछ खामियों के बावजूद दिव्या भारतीय समाज में नारी की स्थिति को चित्रित करने वाला महत्वपूर्ण उपन्यास है।

           नारी विमर्श प्रारम्भ से ही हिन्दी उपन्यास की चिंता के मूल में रहा है। हिन्दी के शुरूआती उपन्यास या उपन्यासनुमा किस्सों- देवरानी, जेठानी की कहानी, वामा शिक्षक, भाग्यवती आदि में नारी की केन्द्रीय चिंता को पहचाना जा सकता है। मुंशी प्रेमचन्द भी अपने पहले उपन्यास ‘सेवासदन’ में नारी समस्या को लेकर ही सामने आते है। सेवा सदन के अतिरिक्त निर्मला, वरदान जैसे उपन्यास प्रेमचन्द द्वारा नारी समस्या को महत्वपूर्ण मानने के स्पष्ट संकेत देने है।

यशपाल के ‘दादा कामरेड’ और ‘पार्टी’ कामरेड जैसे उपन्यासों में भी नारी विमर्श उपस्थित रहा है। दिव्या तो उनका मूल रूप से नारी समस्या पर केन्द्रित उपन्यास है। यशपाल ने केन्द्रीय चरित्र दिव्या के माध्यम से स्वतंत्रता पूर्व भारतीय समाज में नारी की त्रासदपूर्ण स्थिति को और उससे जुड़े ज्वलंत मुद्दों को सामने रखने की कोशिश की है। इसके लिए उन्होंने ईसा पूर्व पहली सदी के आस-पास का काल खण्ड चुना है।

दिव्या मद्र के धर्मस्थ देवशर्मा की प्रपौत्री है, जो अत्यन्त लाड प्यार में पली है। जीवन की सुख सुविधा के सारे साधन उसे उपलब्ध है, परन्तु स्थितियां अचानक बदल जाती है जब वह प्रेमी पृथुसेन के समक्ष आत्मसमर्पण कर गर्भधारण कर लेती है। जो दिव्या कभी रूद्रधीर के प्रणय निवेदन को सिर्फ इस कारण से ठुकरा चुकी थी कि वह पहले से विवाहित है वहीं दिव्या अब पृथुसेन की दूसरी पत्नी बनने को तैयार है। पृथुसेन के पिता प्रेस्थ के कुचक्रों के कारण दिव्या और पृथुसेन का मेल नहीं हो पाता और गर्भवती दिव्या के लिए परिवार और समाज के सारे दरवाजे बन्द हो जाते है। नाजों पली दिव्या सड़कों पर भातालों के दुव्र्यवहार के लिए प्रस्तुत कर दी जाती है। दिव्या का अपराध बस यही था कि उसने व्यवस्था के नियमों के विरूद्ध प्रणय किया था और बिना विवाह के गर्भधारण किया था। इस व्यवस्था में स्त्री को सारी सुख सुविधाएं और अधिकार तभी तक प्राप्त है जब तक वह व्यवस्था के नियमों के अनुरूप चलती है। जैसे ही वह व्यवस्था के नियमों के विरोध का साहस करती है, समाज उसे तिरस्कृत करने में एक पल नहीं लगाता। इस पुरूषवादी व्यवस्था में स्त्रियों की स्वतंत्रता की हद वहीं तक है जहां तक वह पुरूषों के भागवृत्ति में सहायक है। तत्कालीन समाज के एक कुलीन ब्राह्मण परिवार की लड़की के राजनर्तकी मल्लिका के शिष्या बनने और नृत्य का सार्वजनिक प्रदर्शन करने को कुछ आलोचकों ने स्त्री की स्वतंत्रता का संकेत माना है। वस्तुतः नृत्य का सार्वजनिक प्रदर्शन पुरूष की भोगवादी मनोवृत्ति की पुष्टि का उपकरण मात्र है इसलिए स्त्री को वहाँ स्वतंत्रता देने में पुरूषवादी व्यवस्था को कोई आपत्ति नहीं हैं।

परिवार और समाज से बेसहारा दिव्या मातालों के चंगुल से बचती है तो दास व्यापारियों के चंगुल में फंस जाती है। एक दासी के रूप में स्त्री की नियति और भी त्रासद है। उस पर न सिर्फ शारीरिक और मानसिक अत्याचार किये जाते हैं, बल्कि वह स्वामी की काम  तुष्टि का साधन भी बनती है। उसके अपने स्तन के दूध पर भी उसका अधिकार नहीं होता। अपने ब्राह्मण स्वामी से भागकर बौद्ध मठ का शरण लेने पहुँची दिव्या को वहाँ भी आश्रय नहीं मिलता। बौद्ध स्थविर के अनुसार स्त्री के मठ प्रवेश के लिए उसके स्वामी पिता, पति या पुत्र की अनुमति आवश्यक है।े तात्पर्य यह कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था ही नहीं बौद्ध धर्म भी स्त्री को पुरूष के संरक्षण में रखा जाना ही उचित मानता है। बिना पुरूष के अभिभावकत्व के नारी की कहीं गति नहीं। इस सामाजिक व्यवस्था में वेश्या स्वतंत्र नारी कही जा सकती है, परन्तु दिव्या जैसी अभागी और बेसहारा स्त्रियां पुरूष की छत्रछाया के बिना अपूर्ण है। जीवन के कठिन अनुभव से प्राप्त सहज निष्कर्ष दिव्या को वेश्या बनने के लिए प्रेरित करता है। दिव्या अंशुमाला बन जाती है- मथुरा की राजनर्तकी रत्नप्रभा के नृत्यशाला की सर्वश्रेष्ठ नृत्यागंना। दिव्या को कुलवधू  के सम्मान से वेश्या की आत्म निभर्रता ज्यादा वरेण्य है। मारिश के तर्कों के जवाब में वह बार-बार वेश्या जीवन को कुल नारी के जीवन से श्रेष्ठ बताती है। मारिश के तर्क लेखक के तर्क है। इसलिए दिव्या अन्ततः लाजवाब हो जाती है परन्तु पाठक के मन पर मारिश के बौद्धिक तर्क की अपेक्षा जीवन अनुभव से प्राप्त दिव्या का तर्क ज्यादा प्रभावी सिद्ध होते हैं।

उपन्यास के अन्त में लेखक दिव्या के समक्ष तीन विकल्प रखता है- रूद्रधीर, पृथुसेन और मारिश का दिव्या रूद्रधीर के आमन्त्रण को यह कह कर अस्वीकार कर देती है कि कुलवधू और कुलनारी के सम्मान का मूल्य नारी की स्वतंत्रता है। यह वास्तव में नारी का नहीं पुरूष के पराक्रम का सम्मान है। दिव्या के स्वतंत्रता की कीमत पर कुल नारी का सम्मान नहीं चाहिए पृथुसेन के बौद्ध धर्म में स्त्री पुरूष के लिए त्याज्य है क्योंकि वह पुरूष को निवृत्ति के मार्ग से भटकाती है। दिव्या के अनुसार पृथुसेन का चरम लक्ष्य निर्वाण है जबकि स्त्री का चरम लक्ष्य सृष्टि है इसलिए वह पृथुसेन के आमंत्रण को भी अस्वीकार कर देती है। मारिश दिव्या को आश्रय के अदान-प्रदान का आमंत्रण देता है वह सुख-दुख में दिव्या की सहभागिता की बात भी करता हैं यह आमंत्रण निश्चय ही पूर्व के दोनों आमंत्रणों से ज्यादा प्रगतिशील है। अंततः दिव्या मारिश से आश्रय की प्रार्थना करती है। वहाँ यह देखना उल्लेखनीय है कि मारिश की नजर में स्त्री की क्या भूमिका है। मारिश स्त्री को सृष्टि के मूल साधन के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानता। उल्लेखनीय है कि प्रेमचन्द ने गोदान में मेहता के माध्यम से ऐसे ही विचार व्यक्त किये है- ‘‘नारी सबसे पहले केवल माता है।’’ नारी की सार्थकता सृष्टि में मानने वाला मारिश अपने वक्तव्यों और व्यवहारों से नारी को कामवस्तु (ैमग वइरमबज) ही मानता प्रतीत होता है। उसकी नजर में नारी की समस्त शक्तियों उसकी काम शक्ति का विस्तार मात्र है। वह कहता है कि पुरूष नारी के प्रति अनुराग के कारण ही उसे अपने वश में रखना चाहता है। मारिश के शब्दों में यशपाल का यह तर्क निश्चय ही नारी स्वतंत्रता के विरोध में जाता है।

उपन्यास की घटनाओं का स्वाभाविक निष्कर्ष निश्चय ही वेश्या जीवन के आत्म-निर्भरता को कुलवधू के सुनहरे पिंजरे से श्रेष्ठ सिद्ध करता है। ऐसी स्थिति में दिव्या द्वारा मारिश से आश्रय की प्रार्थना करना जबरन थोपा हुआ लेखकीय निष्कर्ष जान पड़ता है। लेखक अपने माक्र्सवादी विचारों की उपन्यास की घटनाओं के साथ तार्किक संगति नहीं बिठा पाता। नारी की दुरवस्था का समाधान कैसे हो यह सवाल अनुतरित छूट जाता है। वस्तुतः जब तक स्त्री को आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होती, सामाजिक दृष्टि से उसका स्वतंत्र होना मुश्किल प्रतीत होता है।

अपनी तमाम खामियों के बावजूद यशपाल की दिव्या को यह श्रेय जाता है कि उसने प्राचीन सामंतवादी भारत की परम्परा में स्वाधीनता पूर्व के भारत की स्त्री स्थिति को जाँचने की कोशिश की है। उसने ब्राह्मणवादी व्यवस्था को चुनौती देनेवाली स्त्री को अस्वीकृति और चयन का अधिकार देकर स्त्री की गरिमा को गौरव प्रदान किया है।

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राजीव सिन्हा

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर के बाद दिल्ली में अध्यापन
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