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देवनागरी लिपि : नामकरण और विकास

देवनागरी लिपि का उद्गम प्राचीन भारतीय लिपि ब्राह्मी से माना जाता है. 7वीं शताब्दी से नागरी के प्रयोग के प्रमाण मिलने लगते हैं.
नागरीशब्द की उत्पत्ति के विषय में विद्वानों में काफी मतभेद है। कुछ लोगों के अनुसार यह नाम  नगरों में व्यवहतहोने के कारण दिया गया. इससे अलग कुछ लोगों का मानना है कि गुजरात के नागर ब्रह्मणों के कारण यह नाम पड़ा। गुजरात में सबसे पुराना प्रामाणिक लेख, जिसमें नागरी अक्षर भी हैं, जयभट तृतीय का कलचुरि (चेदि) संवत् 456 (ई० स० 706) का ताम्रपत्र है। गुजरात में जितने दानपत्र नागरी लिपि में मिले हैं वे बहुधा कान्यकुब्ज, पाटलि, पुंड्रवर्धन आदि से लिए हुए ब्राह्मणों को ही प्रदत्त हैं। राष्ट्रकूट (राठौड़) राजाओं के प्रभाव से गुजरात में उत्तर भारतीय लिपि विशेष रूप से प्रचलित हुई और नागर ब्राह्मणों के द्वारा व्यबह्वत होने के कारण वहाँ नागरी कहलाई।

शामशास्त्री के अनुसार,प्राचीन समय में प्रतिमा बनने के पूर्व देवताओं की पूजा कुछ सांकेतिक चिह्नों द्वारा होती थी, जो कई प्रकार के त्रिकोण आदि यंत्रों के मध्य में लिखे जाते थे। ये त्रिकोण आदि यंत्र देवनगरकहलाते थे। उन देवनगरोंके मध्य में लिखे जानेवाले अनेक प्रकार के सांकेतिक चिह्न कालांतर में अक्षर माने जाने लगे। इसी से इन अक्षरों का नाम देवनागरीपड़ा
नागरी लिपिका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलता। प्राचीन बौद्ध ग्रंथ ललितविस्तरमें उन 64 लिपियों के नाम गिनाए गए हैं, जो बुद्ध को सिखाई गई, उनमें नागरी लिपिनाम नहीं है जबकि ब्राह्मी लिपि का नाम है। जैन ग्रंथों पन्नवणासूत्र और समवायांग सूत्रमें 18 लिपियों के नाम दिए हैं, जिनमें पहला नाम बंभी (ब्राह्मी) है। जैन ग्रंथ भगव्रतीसूत्र का आरंभ नमो बंभीए लिबिए‘ (ब्राह्मी लिपि को नमस्कार) से होता है। नवीं और दसवीं शताब्दी से नागरी का स्वरूप होता दिखता है।
भारत की प्राचीनतम लिपि अशोक के अभिलेखों की है.पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्रों को छोड़कर अशोक के अभिलेखों में प्रयुक्त लिपि ब्राह्मी है. अशोकपूर्व के पिपरहवालेख के अक्षरों और अशोक के अक्षरों में कोई विशेष अंतर नहीं है।

अशोककालीन ब्राह्मी  


350 ई. के आसपास ब्राह्मी की दो लेखन शैलियाँ निकलती दिखाई देती हैं. विंध्य से उत्तर की शैली उत्तरी तथा दक्षिण की (बहुधा) दक्षिणी शैली।
(1) उत्तरी शैली के प्रथम रूप का नाम “गुप्तलिपि” है। गुप्तवंशीय राजाओं के लेखों में इसका प्रचार था। इसका काल ईसवी चौथी पाँचवीं शती है। गुप्तलिपि की भी पश्चिमी और पूर्वी शैली में स्वरूप अंतर है। पूर्वी शैली के अक्षरों में कोण तथा सिरे पर रेखा दिखाई पड़ने लगती है। इसे सिद्धमात्रिका कहा गया है।
(2) कुटिल लिपि का विकास “गुप्तलिपि” से हुआ और छठी से नवीं शती तक इसका प्रचलन मिलता है। आकृतिगत कुटिलता के कारण यह नामकरण किया गया। इसी लिपि से नागरी का विकास नवीं शती के अंतिम चरण के आसपास माना जाता है।

राष्ट्रकूट” राजा “दंतदुर्ग” के एक ताम्रपत्र के आधार पर यह कहा जा सकता है कि दक्षिण में “नागरी” का प्रचलन 754 ई. में था। वहाँ इसे “नंदिनागरी” कहते थे। 

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एक नंदिनागरी पाण्डुलिपि-विकीपीडिया से साभार


देवनागरी या नागरी से ही “कैथी”, “महाजनी”, “राजस्थानी” और “गुजराती” आदि लिपियों का विकास हुआ। प्राचीन नागरी की पूर्वी शाखा से दसवीं शती के आसपास “बँगला” का आविर्भाव हुआ। 11वीं शताब्दी के बाद की “नेपाली” तथा वर्तमान “बँगला”, “मैथिली”, एवं “उड़िया”, लिपियाँ इसी से विकसित हुई। भारतवर्ष के उत्तर पश्चिमी भागों में (कश्मीर और पंजाब) 8वीं शती तक “कुटिल लिपि” प्रचलित थी। 10वीं शताब्दी के आस पास “कुटिल लिपि” से ही “शारद लिपि” का विकास हुआ। वर्तमान कश्मीरी, टाकरी (और गुरुमुखी के अनेक वर्णसंकेत) उसी लिपि के परवर्ती विकास हैं।

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2 thoughts on “देवनागरी लिपि : नामकरण और विकास

  1. बढ़िया जानकारी। लेख के साथ उन लिपियों के उदाहरण (चित्र) भी होते तो बढ़िया रहता। आशा है ऐसे ही रोचक लेख आते रहेंगे।

  2. सुझाव के लिए धन्यवाद .कुछ चित्र इस लेख में जोड़े हैं. आगे भी ध्यान रखूंगा…..

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