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जूते- कुंदन यादव की कहानी

जूते

डाक्टरी की लंबी पढ़ाई और इंटर्नशिप आदि पूरी करने और दिल्ली के एक बड़े निजी  अस्पताल में दो साल की प्रैक्टिस करने के बाद सरकारी डॉक्टर के तौर पर सार्थक की पहली तैनाती आगरा की बाह तहसील के एक ग्रामसभा के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में हुई। उसके साथ ही उसकी सहपाठी और अब मंगेतर डॉ नेहा ने भी पास के ब्लॉक के अस्पताल में अपनी तैनाती ले ली थी। सप्ताह में एकाध बार दोनों मिलते और अन्य डॉक्टरों के साथ लंच और कुछ न कुछ खेलकूद या पार्टी वगैरह का आयोजन करते। एक दिन पास के सरकारी स्कूल से प्रधानाचार्य और दो शिक्षक उसके दफ्तर में आए। वे शिक्षक दिवस के दिन सार्थक को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना चाहते थे। सार्थक ने सहर्ष स्वीकृति दे दी । शिक्षक दिवस के दिन स्कूल के कार्यक्रम में उसे बच्चों के बीच बहुत आनंद आया। उसने देखा कि अब सरकारी

गुड्डो

गुड्डो

वो मेरे सामने बेड पर पड़ी थी. उसके शरीर पे कपड़े की एक धज्जी भी न थी. मैंने उसे देखा फिर अपने मुंह पे हाथ रख कर उबकाई रोकने की भरसक कोशिश की. वहां दवाइयों की गंध से मेरा सर पहले से ही चक्कर खा रहा था और अब ये वीभत्स नजारा. उफ्फ !    पापा ने मुझे मना भी किया था कि तुम देख नहीं पाओगे, लेकिन मेरी जिद की वजह से उनकी एक न चली. हार कर वो मुझे साथ लेकर आये थे सेवा सदन नामक हॉस्पिटल के उस कमरे में जहाँ झुलसे हुए मरीजों को एडमिट किया जाता है.    वो लगभग अस्सी प्रतिशत जल चुकी थी. मच्छरदानी के अंदर पड़े पूरे शरीर पर बड़े बड़े फफोले पड़ चुके थे. उसका गोरा और सुंदर शरीर काला पड़ चुका था. उसका हसीं चेहरा भी जल चुका था. मुश्किल से सोलह साल की थी वो, मेरी ही हमउम्र. मेरी आँखों से

पति परमेश्वर

पति परमेश्वर

26 अगस्त 2018 ... मैं लिफ्ट के जरिये उपर चौथी मंजिल पर पहुंचा . मैंने एक फ्लैट के दरवाजे के सामने खड़े हो कर थोड़ी देर सोचा , फिर कॉलबेल पे ऊँगली रखी . तत्काल कहीं अन्दर एक मधुर घंटी की आवाज गूंजी . मेरे दिल की धड़कने अचानक पता नहीं क्यूँ तेज हो गई थी ? थोड़ी देर में दरवाजे का नॉक खुलने की आवाज आई और दरवाजा खुला . वो खुले बालों में मेरी नजरों के सामने खड़ी थी . "मुझे मालूम था तुम जरुर आओगे ." ये कहते हुए उसके चेहरे पे मुस्कराहट थी लेकिन आंखों में उदासी . "कैसी हो?" मैं बोला . "अंदर आओ ." उसने मेरे सवाल का जवाब गोल कर दिया . मैंने झिझकते हुए अंदर प्रवेश किया . फ्लैट बहुत ही शानदार था और करीने से सजा हुआ था . मैं हॉल के एक सोफे में धस गया और चारों ओर नजरें फिराई . सामने दीवार पे एक

यादों का झरोखा-बाजीगरी

ये उन दिनों की बात है, जब मैंने इंटर की परीक्षा पास कर बी ए में एडमिशन लिया था. शायद 1994 के शुरूआती महीनों की. अब तक का अपना सिनेमा देखने का अनुभव बड़ों के साथ उनकी निगरानी में ही रहा था. स्कूल के कई लड़के क्लास बंक करके सिनेमा देखने में माहिर थे, लेकिन अपनी न तो उन लड़कों से कोई दोस्ती थी और न ही इतनी हिम्मत कि ऐसा कुछ सोच भी पाता. ऐसे में हम तीन दोस्तों मैं, अजय और बबलू ने अकेले फिल्म देखने जाने की योजना बनाई. बिना किसी बड़े की निगरानी के मेरे लिए यह पहला मौका था, सिनेमा हॉल की दिशा में जाने का भी. शाहरुख खान की बाज़ीगर लगी हुई थी, जिसकी चर्चा गाहे-बगाहे कॉलोनी तक पहुँच ही जाती थी. डरते-डरते घर पर अनुमति की अर्ज़ी लगाई गई. पापाजी के

रावायण : मिथकों के पुनर्मूल्यांकन की अनोखी दास्तान

हर इंसान के अंदर भगवान और शैतान, दोनों, किसी न किसी रूप में मौजूद होते हैं। जब हम कोई सत्कार्य कर रहे हों तो उसे अपने अंदर मौजूद ईश्वरीय अंश का कृत्य मानते हैं, जबकि हर दुष्कृत्य के लिए अपने अंदर मौजूद शैतानीय अंश को उत्तरदायी मानते हैं। हमारे अंदर मौजूद ये दोनो ही अंश एक दूसरे को रोकने और आगे बढ़ कर मनुष्य के निर्णय लेने तक को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में इंसान के नाम, जाति, धर्म, क्षेत्र आदि मायने नहीं रखते, लेकिन फिर भी हम पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर एक सोच विकसित कर लेते हैं। कहा जाता है कि रावण ने अपनी अंतिम सांस लेने से पूर्व राम का नाम लिया था। उसके अंदर के ईश्वरीय अंश ने अंतिम समय में उसके अंदर के बुरे तत्वों पर विजय पा लिया था। ऐसे में किसी इंसान का नाम महत्व नहीं रखता कि क्या है। वर्तमान परिवेश

अंवरागेटा और सिरी – कुंदन यादव की कहानी

बात करीब दस बारह साल पहले की है, जब गोपाल होली की छुट्टियों में अपने पुस्तैनी घर आया था। उसके जन्म से पहले ही उसके पिता प्रभुनाथ सीआरपीएफ़ में कंपनी कमांडर हो गए थे। साल में एकाध बार ही घर आ पाते। बनारस कचहरी से लगभग दो फ़र्लांग बढ़ते ही गाजीपुर रोड पर सय्यद बाबा की मज़ार से बाएँ मुड़ती सड़क पर 200 मीटर बाद 25-30 घरों का पहाड़पुर मोहल्ला था। मोहल्ले की बसावट लंबाई में थी जो कि एक तरफ पुलिस लाइन और दूसरे तरफ एलटी कॉलेज की चहारदीवारी के बीच सैंडविच नुमा लगती थी। फागुन की दोपहर ढल रही थी। मोहल्ले की आधी जनसंख्या मतलब पुरुष काम धंधे पर गए थे और महिलाएं गोबर पाथने और होली के पापड़ आदि सुखाने में व्यस्त थीं। दोपहर का भोजन करके गोपाल अपने घर की ऊपरी मंज़िल पर लेटा ही था कि एक शोर सुनाई दिया। उसने खिड़की से देखा, सतेन्द्र

फूलचंद का स्कूटर- कुंदन यादव की कहानी

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      फूलचंद ठेकेदार दोपहर का भोजन करके सोने के बाद उठे, घड़ी की तरफ देखा. साढ़े तीन बजने वाले थे. उन्होंने जल्दी से चेहरा धोया और सुँघनी मंजन करते हुए घर से बाहर चबूतरे पर आए. मंजन करते हुए जब दाईं तरफ नज़र गई तो देखा स्कूटर नहीं था. थोड़ी देर में उनको अपनी निर्माणाधीन साइट पर जाना था . कुल्ला करके मुंह धोते हुए भीतर आए और पत्नी से पूछा राजू स्कूटर ले गया है क्या? पत्नी ने कहा नहीं वो तो ऊपर सो रहा है. चूंकि छोटा बेटा राजू स्कूटर बाइक आदि चलाना सीख ही रहा था इसलिए गाहे बगाहे वो स्कूटर लेकर गायब हो जाता. बेटी रीना टीवी देख रही थी. उन्होंने उससे भी स्कूटर की बाबत भी पूछा कि कोई मांग तो नहीं ले गया , लेकिन कोई सकारात्मक जवाब न देख वे चिंतित हो उठे. नीचे आकर कुर्ता पाजामा पहन बाहर निकले थे

आवभगत

बनारस शहर के दक्षिणी हिस्से में लंका से सामनेघाट होते हुए गंगा नदी के ऊपर बने पीपे के पुल वाले रास्ते में ही शिवधनी सरदार का घर था। खाते पीते परिवार के स्वामी थे । स्वयं विश्वविद्यालय में तृतीय श्रेणी कर्मचारी थे । एक बांस बल्ली की दुकान थी, जहां निर्माणाधीन मकानों के लिए किराए पर बल्ली पटरे उपलब्ध थे। इसके साथ ही दो-तीन जगह पुश्तैनी जमीन थी । अधिकतर को उन्होंने कई साल पहले बंटाई पर दे रखा था। बंटाईदार भी सालों से फसल कटने के महीने दो महीने के भीतर शिवधनी का हिस्सा पहुंचा देते थे। यद्यपि शिवधनी जानते थे कि बंटाईदार हिस्से में बेईमानी कर रहे हैं, लेकिन वो उसको परमात्मा की कृपा मान हील हुज्जत नहीं करते थे। पत्नी फसल के दिनों में ही बार-बार कहती कि जाकर देख आओ कि कितना अनाज हुआ है। कहीं बेईमानी से कम तो नहीं दे रहे हैं सब? शिवधनी

कोतवाल रामलखन सिंह

कोतवाल रामलखन सिंह अपने कमरे में कुछ उदासी भरी सोच की मुद्रा में बैठे थे. उन्होंने सपने में भी न सोचा था कि जरा से बवाल से कप्तान उन्हें लाइन हाजिर कर देगा. ऐसा भी नहीं था कि वे पहले निलंबित या  लाइन हाजिर नहीं हुए थे. कई बार तो उन्होंने सिर्फ कोतवाल बने रहने के लिए और डीएसपी के प्रमोशन से बचने के लिए भी कोई न कोई कांड करवा दिया, जिससे वे थानेदार या कोतवाल ही रहें. कोतवाल के पद को लेकर उनके मन में मुगलकालीन भारत के कोतवाल जैसी छवि उतर आती थी. अक्सर वे अपनी इस मान्यता को कोतवाली में किसी खाली शाम को लोकल पत्रकारों के बीच साझा करते, “यार देखो पुलिस में सबसे पुराना असरदार पद कोतवाल का ही है. इ सब डीआईजी पीआईजी , एसपी टेसपी तो बाद में आए. अवध में नवाबों के जमाने से कहावत चली आ रही है कि, कोतवाल

कोठे की अक्का

कोठे की अक्का

बाज़ार रोज़ से ज्यादा गर्म था। जिस तरफ देखो रौनक थी। डेनियल यूँ तो हर साल इंडिया आता था पर ऐसे नज़ारे उसे यहाँ कम ही देखने को मिलते थे। वो छः फिट से निकलते कद का, कोई 50 की उम्र का होते हुए भी 35 से ऊपर न लगता था। ऐसा था मानों टॉम क्रूज़ की हाइट बढ़ा दी गयी हो। उसे चावड़ी बाज़ार से निकलते ही दिल्ली बुरी और भीड़ भरी लगने लगती थी। वो दिल्ली के इस इलाके को किसी कसाई मुहल्ले सा समझता था; चारों तरफ़ मुर्गियां दौड़ रही हैं, लोग ज्यादा वजन वाली पहले खरीद रहे हैं। कोठो की श्रखलाओं से गुज़रता वो एक जगह ठिठका। पहली मंज़िल पर एक बमुश्किल 17 साल की लड़की, शरीर के ऊपरी हिस्से में न के बराबर कुछ पहने, चहलकदमी कर रही थी। ठीक उस कोठे के नीचे अच्छी खासी भीड़ जमा थी। कोई रिक्शे वाला उसी भीड़ में से चिल्लाया

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