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सफरनामा सिंदबाद जहाजी का – कन्हैयालाल नंदन की बाल कथा

अरसा काफी लंबा गुजर चुका था. सिंदबाद के मन में यह लहर बार-बार दौड़ रही थी कि वह अपनी तिजारत को हिन्दुस्तान तक फैला दे. उसने एक दिन तय कर ही लिया कि वह हिन्दुस्तान जाएगा. उसने अपनी गठरियों में तिजारती सामान बाँध लिया. वह बसरा के लिए रवाना होने ही वाला था कि उसके पास एक आदमी दौड़ता हुआ आया. वह आदमी और कोई नहीं, वही हिंदबाद था जो बग़दाद की सड़कों पर टहलते हुए सिंदबाद के महल के नीचे आकर बैठ गया था. उसने बाइज्जत सिंदबाद को मशवरा दिया कि अब उसे समुद्री जहाज से जाने की ज़रुरत नहीं है. अब तो आपको हवाई जहाज से सफ़र करना चाहिए, वरना हिन्दुस्तान के लोग आपको निहायत पिछड़ा हुआ मानेंगे.         सिंदबाद ने मशविरे के लिए हिंदबाद का शुक्रिया अदा किया और अपना साफा संभालते हुए सोच में पड़ गया कि हवाई सफ़र पता नहीं कैसा हो. लेकिन तभी सिंदबाद को

गोनू झा और गहनों की पोटली

मिथिला के लोक में गोनू झा वैसे ही प्रसिद्ध हैं, जैसे अकबर के दरबार में बीरबल और कृष्णदेव राय के दरबार में तेनालीराम . गोनू झा की हाजिरजवाबी और तीक्ष्ण बुद्धि बड़ी से बड़ी समस्याओं का हल सहज ही निकाल लेती है. बिहार की लोककथाओं से पढ़िए गोनू झा की चतुराई का यह किस्सा.  गोनू झा की हाजिरजवाबी से खुश होकर राजा उन्हें अक्सर इनाम देते रहते थे. इस कारण लोगों को लगता था कि गोनू झा ने खूब सारे पैसे जमा कर रखे हैं. यही कारण है कि चोर भी गोनू झा के घर चोरी करने की ताक में रहा करते थे. एक रात चोरों ने गोनू झा के घर में सेंध लगा ही दी. चोर अंदर पहुँचे तो देखा कि घर के लोग जगे हुए हैं. चोरों ने गोनू झा के सोने के कमरे में रखे मिट्टी के भांडों के पीछे छिपने का ठिकाना ढूँढा और घर के लोगों के

शेखचिल्ली और चोरी में हिस्सा

शेखचिल्ली -चोरी में हिस्सा

शेखचिल्ली एक दिन अपने घर के सामने अहाते में बैठे भुने हुए चने खा रहे थे और साथ ही जल्दी-से-जल्दी अमीर बनने के सपने देख रहे थे. खुली आँखों से सपने देखते हुए कुछ चने खा रहे थे और कुछ नीचे गिरा रहे थे. संयोग से जमीन पर गिरे चने के दानों में एक दाना कच्चा था. कुछ ही दिनों में वहाँ चने का एक छोटा पौधा निकल आया. शेखचिल्ली अपनी इस अनजाने में की गयी खेती को देखकर खूब खुश हुए और जी जान से फसल की रखवाली में लग गए. उन्हें बड़ी चिंता थी कि उनके इकलौते चने के पौधे को कोई गाय-भैंस ना चर जाए, इसलिए अम्मी के सो जाने के बाद रात में भी फसल की निगरानी किया करते थे.               एक रात जब वो हाथ में डंडा लिए चने के पौधे की रखवाली कर रहे थे, तभी तीन-चार लोग खामोशी से छिपते-छिपाते कहीं जाते दिखाई दिए.

शेखचिल्ली-बुखार का इलाज

शेखचिल्ली

शेखचिल्ली अपने घर के बरामदे में बैठे-बैठे खुली आँखों से सपने देख रहे थे. उनके सपनों में एक विशालकाय पतंग उड़ी जा रही और शेखचिल्ली उसके ऊपर सवार थे. कितना आनंद आ रहा था आसमान में उड़ते हुए नीचे देखने में. हर चीज़ छोटी नज़र आ रही थी. तभी अम्मी की तेज़ आवाज ने उन्हें ख्यालों की दुनिया से बाहर निकाल दिया- “शेखचिल्ली ! शेखचिल्ली ! कहाँ हो तुम ? ‘आया अम्मी’, ख्यालों की दुनिया से निकल कर शेखचिल्ली घर के आँगन में पहुँचे. “मैं सलमा आपा के घर जा रही हूँ.उनकी बेटी की शादी की तैयारी कराने. शाम में आऊँगी. आऊँगी तो तुम्हारे लिए मिठाइयाँ भी लेकर आऊँगी. तब तक तुम दरांती लेकर जंगल से पड़ोसी की गाय के लिए घास काट लाना. कुछ पैसे मिल जायेंगे.” “जी अम्मी” शेखचिल्ली ने कहा और दरांती उठाकर जंगल जाने के लिए तैयार हो गए. “सावधानी से जाना और दिन में सपने मत देखने लग जाना.

शेखचिल्ली और तेल का गिलास

शेखचिल्ली इस समय वही कर रहा था, जिसमें उसमें सबसे ज्यादा मज़ा आता था- पतंगबाज़ी . वो इस समय अपने घर की छत पर खड़ा था और आसमान में लाल-हरी पतंगों के उड़ने का मजा ले रहा था. शेख की कल्पना भी उड़ान भरने लगी. वह सोचने लगा- काश मैं इतना छोटा होता कि पतंग पर बैठकर हवा में उड़ पाता..... “बेटा, तुम कहाँ हो?” उसकी अम्मी ने धूप की चौंध से आँखों को बचाते हुए छत की ओर देखते हुए कहा. “बस अभी आया अम्मी.” शेख ने कहा. काफी दुखी होते हुए उसने अपनी उड़ती पतंग को जमीन पर उतारा और फिर दौड़ता हुआ नीचे गया. शेख अपनी माँ की इकलौती औलाद था. पति की मौत के बाद वही उनका एकमात्र रिश्तेदार था. इसलिए अम्मी शेख को बहुत प्यार करती थी.      “बेटा, झट से इसमें आठ आने का सरसों तेल ले आओ,” उन्होंने कहा और अठन्नी के साथ-साथ शेख को एक

टिपटिपवा – उत्तरप्रदेश की लोककथा

टिपटिपवा

राजीव रोशन के सौजन्य से एक थी बुढ़िया. उसका एक पोता था. पोता रोज़ रात में सोने से पहले दादी से कहानी सुनता. दादी रोज़ उसे तरह-तरह की कहानियाँ सुनाती. एक दिन मूसलाधार बारिश हुई. ऐसी बारिश पहले कभी नहीं हुई थी. सारा गाँव बारिश से परेशान था. बुढ़िया की झोंपड़ी में पानी जगह-जगह से टपक रहा था---- टिपटिप टिपटिप . इस बात से बेखबर पोता दादी की गोद में लेटा कहानी सुनने के लिए मचल रहा था. बुढ़िया खीझकर बोली—“अरे बचवा, का कहानी सुनाएँ? ई टिपटिपवा से जान बचे तब न ! पोता उठकर बैठ गया. उसने पूछा- दादी, ये टिपटिपवा कौन है? टिपटिपवा क्या शेर-बाघ से भी बड़ा होता है? दादी छत से टपकते पानी की तरफ़ देखकर बोली—हाँ बचवा, न शेरवा के डर, न बघवा के डर,

हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के पिंजरबद्ध न गा पाएँगे, कनक-तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाऍंगे। हम बहता जल पीनेवाले मर जाएँगे भूखे-प्‍यासे, कहीं भली है कटुक निबोरी कनक-कटोरी की मैदा से, स्‍वर्ण-श्रृंखला के बंधन में अपनी गति, उड़ान सब भूले, बस सपनों में देख रहे हैं तरू की फुनगी पर के झूले। ऐसे थे अरमान कि उड़ते नील गगन की सीमा पाने, लाल किरण-सी चोंचखोल चुगते तारक-अनार के दाने। होती सीमाहीन क्षितिज से इन पंखों की होड़ा-होड़ी, या तो क्षितिज मिलन बन जाता या तनती साँसों की डोरी। नीड़ न दो, चाहे टहनी का आश्रय छिन्‍न-भिन्‍न कर डालो, लेकिन पंख दिए हैं, तो आकुल उड़ान में विघ्‍न न डालो।

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी – सुभद्रा कुमारी चौहान

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी लक्ष्मी थी या दुर्गा थी, वह स्वयं वीरता की अवतार देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार नकली युद्ध व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़ महाराष्टर कुल देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह

यह कदम्ब का पेड़ -सुभद्रा कुमारी चौहान

यह कदंब का पेड़

यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे मै भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे ले देती यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली किसी तरह नीची हो जाती यह कदम्ब की डाली तुम्हे नहीं कुछ कहता, पर मै चुपके चुपके आता उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता वही बैठ फिर बड़े मजे से मै बांसुरी बजाता अम्मा-अम्मा कह बंसी के स्वर में तुम्हे बुलाता सुन मेरी बंसी माँ, तुम कितना खुश हो जाती मुझे देखने काम छोड़कर, तुम बाहर तक आती तुमको आती देख, बांसुरी रख मै चुप हो जाता एक बार माँ कह, पत्तो में धीरे से छिप जाता तुम हो चकित देखती, चारो ओर ना मुझको पाती व्याकुल-सी हो तब कदम्ब के नीचे तक आ जाती पत्तो का मरमर स्वर सुन, जब ऊपर आँख उठाती मुझे देख ऊपर डाली पर, कितना घबरा जाती गुस्सा होकर मुझे डांटती, कहती नीचे आ जा पर जब मै ना उतरता, हंसकर कहती मून्ना राजा नीचे उतरो मेरे भैया, तुम्हे मिठाई दूंगी नए खिलौने-माखन-मिश्री-दूध-मलाई दूंगी मै हंसकर सबसे

टेसू राजा अड़े खड़े

आज प्रख्यात कवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्मदिन है. प्रस्तुत है उनकी एक बाल कविता टेसू राजा अड़े खड़ेमाँग रहे हैं दही बड़े।बड़े कहाँ से लाऊँ मैं?पहले खेत खुदाऊँ मैं,उसमें उड़द उगाऊँ मैं,फसल काट घर लाऊँ मैं।छान फटक रखवाऊँ मैं,फिर पिट्ठी पिसवाऊँ मैं,चूल्हा फूँक जलाऊँ मैं,कड़ाही में डलवाऊँ मैं,तलवा कर सिकवाऊँ मैं।फिर पानी में डाल उन्हें,मैं लूँ खूब निचोड़ उन्हें।निचुड़ जाएँ जब सबके सब,उन्हें दही में डालूँ तब।नमक मिरच छिड़काऊँ मैं,चाँदी वरक लगाऊँ मैं,चम्मच एक मँगाऊँ मैं,तब वह उन्हें खिलाऊँ मैं।

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