PC:Youtube बहुत ही मीठे स्वरों के साथ वह गलियों में घूमता हुआ कहता – “बच्चों को बहलानेवाला, खिलौनेवाला।” इस अधूरे वाक्य को वह ऐसे विचित्र किन्तु मादक-मधुर ढंग से गाकर कहता कि सुननेवाले एक बार अस्थिर हो उठते। उनके स्नेहाभिषिक्त कंठ से फूटा हुआ उपयुक्त गान सुनकर निकट के मकानों में हलचल मच जाती। छोटे-छोटे […]
1 “किरन! तुम्हारे कानों में क्या है?” उसके कानों से चंचल लट को हटाकर कहा – “कँगना।” “अरे! कानों में कँगना?” सचमुच दो कंगन कानों को घेरकर बैठे थे। “हाँ, तब कहाँ पहनूँ?” किरन अभी भोरी थी। दुनिया में जिसे भोरी कहते हैं, वैसी भोरी नहीं। उसे वन के फूलों का भोलापन समझो। नवीन चमन […]
हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ। सुनो बात मेरी – अनोखी हवा हूँ। बड़ी बावली हूँ, बड़ी मस्तमौला। नहीं कुछ फिकर है, बड़ी ही निडर हूँ। जिधर चाहती हूँ, उधर घूमती हूँ, मुसाफिर अजब हूँ। न घर-बार मेरा, न उद्देश्य मेरा, न इच्छा किसी की, न आशा किसी की, न प्रेमी न दुश्मन, […]
सतपुड़ा के घने जंगल। नींद मे डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल। झाड ऊँचे और नीचे, चुप खड़े हैं आँख मीचे, घास चुप है, कास चुप है मूक शाल, पलाश चुप है। बन सके तो धँसो इनमें, धँस न पाती हवा जिनमें, सतपुड़ा के घने जंगल ऊँघते अनमने जंगल। सड़े पत्ते, गले पत्ते, हरे पत्ते, […]
प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी अपनी रचना ‘प्रेमचंद घर में’ के लिए चर्चित रही हैं , पर शायद कई लोगों को यह न पता हो कि वे अपने समय की चर्चित कथाकार भी रही हैं . प्रस्तुत है , उनकी कहानी ‘कप्तान’ ज़ोरावर सिंह की जिस दिन शादी हुई, बहू आई, उसी रोज़ ज़ोरावर सिंह […]
1892 में प्रकाशित काबुलीवाला रविंद्रनाथ टैगोर की सर्वाधिक चर्चित कहानियों में से एक है . 1957 में तपन सिन्हा ने इस कहानी को आधार बना कर इसी नाम से एक बांग्ला फिल्म का निर्देशन किया . बाद में बिमल राय ने हिंदी में काबुलीवाला का निर्माण किया , जिसे हेमेन गुप्ता ने निर्देशित किया. हिंदी […]
आज कवि त्रिलोचन का जन्मदिन है. हिंदी प्रगतिशील काव्यधारा को स्थापित करने वाले कवियों में त्रिलोचन का नाम महत्वपूर्ण है . यूं ही कुछ मुस्काकर तुमनेपरिचय की वो गांठ लगा दी! था पथ पर मैं भूला भूला फूल उपेक्षित कोई फूला जाने कौन लहर ती उस दिन तुमने अपनी याद जगा दी। कभी कभी यूं हो जाता है गीत […]
एक थे नव्वाब, फ़ारस से मंगाए थे गुलाब। बड़ी बाड़ी में लगाए देशी पौधे भी उगाए रखे माली, कई नौकर गजनवी का बाग मनहर लग रहा था। एक सपना जग रहा था सांस पर तहजबी की, गोद पर तरतीब की। क्यारियां सुन्दर बनी चमन में फैली घनी। फूलों के पौधे वहाँ लग रहे थे खुशनुमा। […]
पन्त जी की भारतमाता ग्रामवासिनी की स्मृति में लिखी गयी कविता धरती का आँचल है मैला फीका-फीका रस है फैला हमको दुर्लभ दाना-पानी वह तो महलों की विलासिनी भारत पुत्री नगरवासिनी विकट व्यूह, अति कुटिल नीति है उच्चवर्ग से परम प्रीति है घूम रही है वोट माँगती कामराज कटुहास हासिनी भारत पुत्री नगरवासिनी खीझे चाहे […]