आप यहाँ हैं
होम > Author: Rajiv

लाल हवेली-शिवानी

जिस देवता ने उसके लिए सर्वस्व त्याग कर वैरागी का वेश धर लिया है, क्या एक बार भी उसके दर्शन नहीं मिलेंगे? किसी शैतान-नटखट बालक की भाँति उसकी आँखे चमकने लगीं।

एक कम – विष्णु खरे

विष्णु खरे को श्रद्धांजलि स्वरूप 1947 के बाद से इतने लोगों को इतने तरीकों से आत्मनिर्भर मालामाल और गतिशील होते देखा है कि अब जब आगे कोई हाथ फैलाता है पच्चीस पैसे एक चाय या दो रोटी के लिए तो जान लेता हूँ मेरे सामने एक ईमानदार आदमी, औरत या बच्चा खड़ा है मानता हुआ कि हाँ मैं लाचार हूँ कंगाल या कोढ़ी एक मामूली धोखेबाज़... या मैं भला चंगा हूँ और कामचोर लेकिन पूरी तरह तुम्हारे संकोच लज्जा परेशानी या गुस्से पर आश्रित तुम्हारे सामने बिलकुल नंगा निर्लज्ज और निराकांक्षी मैंने अपने को हटा लिया है हर होड़ से मैं तुम्हारा विरोधी प्रतिद्वंद्वी या हिस्सेदार नहीं मुझे कुछ देकर या न देकर भी तुम कम से कम एक आदमी से तो निश्चिंत रह सकते हो...

ताई – विश्‍वंभरनाथ शर्मा कौशिक 

''ताऊजी, हमें लेलगाड़ी (रेलगाड़ी) ला दोगे?" कहता हुआ एक पंचवर्षीय बालक बाबू रामजीदास की ओर दौड़ा। बाबू साहब ने दोंनो बाँहें फैलाकर कहा- ''हाँ बेटा,ला देंगे।'' उनके इतना कहते-कहते बालक उनके निकट आ गया। उन्‍होंने बालक को गोद में उठा लिया और उसका मुख चूमकर बोले- ''क्‍या करेगा रेलगाड़ी?'' बालक बोला- ''उसमें बैठकर बली दूल जाएँगे। हम बी जाएँगे,चुन्‍नी को बी ले जाएँगे। बाबूजी को नहीं ले जाएँगे। हमें लेलगाड़ी नहीं ला देते। ताऊजी तुम ला दोगे, तो तुम्‍हें ले जाएँगे।'' बाबू- "और किसे ले जाएगा?'' बालक दम भर सोचकर बोला- ''बछ औल किछी को नहीं ले जाएँगे।'' पास ही बाबू रामजीदास की अर्द्धांगिनी बैठी थीं। बाबू साहब ने उनकी ओर इशारा करके कहा- ''और अपनी ताई को नहीं ले जाएगा?'' बालक कुछ देर तक अपनी ताई की और देखता रहा। ताईजी उस समय कुछ चि‍ढ़ी हुई सी बैठी थीं। बालक को उनके मुख का वह भाव अच्‍छा न लगा। अतएव वह बोला- ''ताई को नहीं

जूते- कुंदन यादव की कहानी

जूते

डाक्टरी की लंबी पढ़ाई और इंटर्नशिप आदि पूरी करने और दिल्ली के एक बड़े निजी  अस्पताल में दो साल की प्रैक्टिस करने के बाद सरकारी डॉक्टर के तौर पर सार्थक की पहली तैनाती आगरा की बाह तहसील के एक ग्रामसभा के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में हुई। उसके साथ ही उसकी सहपाठी और अब मंगेतर डॉ नेहा ने भी पास के ब्लॉक के अस्पताल में अपनी तैनाती ले ली थी। सप्ताह में एकाध बार दोनों मिलते और अन्य डॉक्टरों के साथ लंच और कुछ न कुछ खेलकूद या पार्टी वगैरह का आयोजन करते। एक दिन पास के सरकारी स्कूल से प्रधानाचार्य और दो शिक्षक उसके दफ्तर में आए। वे शिक्षक दिवस के दिन सार्थक को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना चाहते थे। सार्थक ने सहर्ष स्वीकृति दे दी । शिक्षक दिवस के दिन स्कूल के कार्यक्रम में उसे बच्चों के बीच बहुत आनंद आया। उसने देखा कि अब सरकारी

गुड्डो

गुड्डो

वो मेरे सामने बेड पर पड़ी थी. उसके शरीर पे कपड़े की एक धज्जी भी न थी. मैंने उसे देखा फिर अपने मुंह पे हाथ रख कर उबकाई रोकने की भरसक कोशिश की. वहां दवाइयों की गंध से मेरा सर पहले से ही चक्कर खा रहा था और अब ये वीभत्स नजारा. उफ्फ !    पापा ने मुझे मना भी किया था कि तुम देख नहीं पाओगे, लेकिन मेरी जिद की वजह से उनकी एक न चली. हार कर वो मुझे साथ लेकर आये थे सेवा सदन नामक हॉस्पिटल के उस कमरे में जहाँ झुलसे हुए मरीजों को एडमिट किया जाता है.    वो लगभग अस्सी प्रतिशत जल चुकी थी. मच्छरदानी के अंदर पड़े पूरे शरीर पर बड़े बड़े फफोले पड़ चुके थे. उसका गोरा और सुंदर शरीर काला पड़ चुका था. उसका हसीं चेहरा भी जल चुका था. मुश्किल से सोलह साल की थी वो, मेरी ही हमउम्र. मेरी आँखों से

अछूत की शिकायत -हीरा डोम 

महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित ‘सरस्वती’ (सितंबर 1914) में प्रकाशित यह  कविता हिंदी दलित साहित्य की पहली रचना मानी जाती है. हमनी के राति दिन दुखवा भोगत बानी हमनी के सहेब से मिनती सुनाइबि। हमनी के दुख भगवानओं न देखता ते, हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि। पदरी सहेब के कचहरी में जाइबिजां, बेधरम होके रंगरेज बानि जाइबिजां, हाय राम! धसरम न छोड़त बनत बा जे, बे-धरम होके कैसे मुंहवा दिखइबि ।।1।। खंभवा के फारी पहलाद के बंचवले। ग्राह के मुँह से गजराज के बचवले। धोतीं जुरजोधना कै भइया छोरत रहै, परगट होके तहां कपड़ा बढ़वले। मरले रवनवाँ कै पलले भभिखना के, कानी उँगुरी पै धैके पथरा उठले। कहंवा सुतल बाटे सुनत न बाटे अब। डोम तानि हमनी क छुए से डेराले ।।2।। हमनी के राति दिन मेहत करीजां, दुइगो रूपयावा दरमहा में पाइबि। ठाकुरे के सुखसेत घर में सुलत बानीं, हमनी के जोति-जोति खेतिया कमाइबि। हकिमे के लसकरि उतरल बानीं। जेत उहओं बेगारीया में पकरल जाइबि। मुँह बान्हि ऐसन नौकरिया करत बानीं, ई कुल खबरी सरकार के सुनाइबि ।।3।। बभने के लेखे हम भिखिया न

मैला आँचल : एक विचार यह भी

मैला आँचल’ ! हैरत है उन पाठकों और समीक्षकों की अक्ल पर जो इसकी तुलना ‘गोदान’ से करने का सहस कर बैठे ! उछालिए साहब, उछालिये ! जिसे चाहे प्रेमचंद बना दीजिये, रविंद्रनाथ बना दीजिये, गोर्की बना दीजिये ! ज़माना ही डुग्गी पीटने का है !

धर्म संकट -अमृतलाल नागर 

रायबहादुर - धर्म संकट -अमृतलाल नागर

शाम का समय था, हम लोग प्रदेश, देश और विश्‍व की राजनीति पर लंबी चर्चा करने के बाद उस विषय से ऊब चुके थे. चाय बड़े मौके से आई, लेकिन उस ताजगी का सुख हम ठीक तरह से उठा भी न पाए थे कि नौकर ने आकर एक सादा बंद लिफाफा मेरे हाथ में रख दिया. मैंने खोलकर देखा, सामनेवाले पड़ोसी रायबहादुर गिर्राज किशन (गिरिराज कृष्‍ण) का पत्र था, काँपते हाथों अनमिल अक्षरों और टेढ़ी पंक्तियों में लिखा था : माई डियर प्रताप, "मैंने फुल्‍ली को आदेश दे रक्‍खा है कि मेरी मृत्‍यु के बाद यह पत्र तुम्‍हें फौरन पहुँचाया जाए. तुम मेरे अभिन्‍न मित्र के पुत्र हो. रमेश से अधिक सदा आज्ञाकारी रहे हो. मेरी निम्‍नलिखित तीन अंतिम इच्‍छाओं को पूरा करना - " 1. रमेश को तुरंत सूचना देना. मेरी आत्‍मा को तभी शांति मिलेगी, जब उसके हाथों मेरे अंतिम संस्‍कार होंगे. मैंने उसके साथ अन्याय किया है. 2. फुल्‍ली को मैंने

पति परमेश्वर

पति परमेश्वर

26 अगस्त 2018 ... मैं लिफ्ट के जरिये उपर चौथी मंजिल पर पहुंचा . मैंने एक फ्लैट के दरवाजे के सामने खड़े हो कर थोड़ी देर सोचा , फिर कॉलबेल पे ऊँगली रखी . तत्काल कहीं अन्दर एक मधुर घंटी की आवाज गूंजी . मेरे दिल की धड़कने अचानक पता नहीं क्यूँ तेज हो गई थी ? थोड़ी देर में दरवाजे का नॉक खुलने की आवाज आई और दरवाजा खुला . वो खुले बालों में मेरी नजरों के सामने खड़ी थी . "मुझे मालूम था तुम जरुर आओगे ." ये कहते हुए उसके चेहरे पे मुस्कराहट थी लेकिन आंखों में उदासी . "कैसी हो?" मैं बोला . "अंदर आओ ." उसने मेरे सवाल का जवाब गोल कर दिया . मैंने झिझकते हुए अंदर प्रवेश किया . फ्लैट बहुत ही शानदार था और करीने से सजा हुआ था . मैं हॉल के एक सोफे में धस गया और चारों ओर नजरें फिराई . सामने दीवार पे एक

थोड़ी दूर और – वृंदावनलाल वर्मा

महमूद गजनवी

जब महमूद गजनवी (सन 1025-26 में) सोमनाथ का मंदिर नष्ट-भ्रष्ट करके लौटा तब उसे कच्छ से होकर जाना पड़ा.गुजरात का राजा भीमदेव उसका पीछा किए चल रहा था.ज्यों-ज्यों करके महमूद गजनवी कच्छ के पार हुआ.वह सिंध होकर मुल्तान से गजनी जाना चाहता था.लूट के सामान के साथ फौज की यात्रा भारी पड़ रही थी.भीमदेव व अन्य राजपूत उस पर टूट पड़ने के लिए इधर-उधर से सिमट रहे थे.महमूद इनसे बच निकलने के लिए कूच पर कूच करता चला गया.अंत में लगभग छह सहस्र राजपूतों से उसकी मुठभेड़ हो ही गई. महमूद की सेना राजपूतों की उस टुकड़ी से संख्या में कई गुनी बड़ी थी.विजय का उल्लास महमूद की सेना में, मार्ग की बाधाओं के होते हुए भी, लहरें मार रहा था.उधर राजपूत जय की आशा से नहीं, मारने और मरने की निष्ठा से जा भिड़े थे. उन छह सहस्र राजपूतों में से कदाचित ही कोई बचा हो.परंतु अपने कम-से-कम दुगुने शत्रुओं को

यू पी एस सी - हिन्दी साहित्य कोचिंग के लिए संपर्क करें - 8800695993-94-95 या और जानकारी प्राप्त करें 

Top