कुंदन यादव भारतीय राजस्व सेवा के 2007 बैच के अधिकारी हैं. ठेठ बनारसी हैं या यूं कहें कि बनारस उनकी रगों में है. बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में डिग्रियां हासिल की है. सन 2003-04 में फुलब्राइट स्कॉलरशिप के तहत अमेरिका में विजिटिंग लेक्चरर के तौर पर इलिनॉय विश्वविद्यालय, शिकागो में हिंदी का अध्यापन भी कर चुके हैं। समकालीन स्थितियों पर मारक व्यंग्य उनके लेखन में दिखता है. संप्रति :- केंद्रीय प्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड नई दिल्ली में ज्वाइंट कमिश्नर पद पर कार्यरत संपर्क:-ईमेल :kundanyadav@gmail.com मोबाइल : 07905664743

7 Comments

  1. सिकंदर कुमार
    June 25, 2018 @ 11:08 am

    बचपन से ही गाँव में कुछ ऐसे लोग होते थे जो अङ्ग्रेज़ी शब्दों का जबर्दस्त इस्तेमाल करके या चोर बाज़ार से खरीदी नकली इंपोर्टेड चीजों का प्रयोग करके भौकाल कायम करते थे। वे लोग वास्तव में शरीफ और भोले होते थे लेकिन थोड़े बड़बोले। उन सभी अकिंचन होते हुए भी अकिंचनता से दूर रहने वालों की कहानी है यह अंवरागेटा और सिरी। बेजोड़ लेखन और जबरजस्त संवाद अदायगी के साथ घनीभूत जिजीविषा को महसूस करने वाली कहानी। सिरी चाचा का कॉमिक्स वाचन तो हंसा हंसा कर बेदम कर देने वाला है। कुन्दन जी को साधुवाद। उनसे बस यही कहना है , कहाँ थे अब तक महाराज ? और लिखिए , खूब लिखिए।

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  2. Shashikant Singh
    June 25, 2018 @ 11:15 am

    बहुत ही सुंदर रचना है यादव जी। मैंने भी एक कॉमिक्स सिरी चाचा की तरह बोल बोल कर पढ़ा। मज़ा आ गया। अंवरागेटा, इंपोर्टेड दाल, जापानी चाकू और समुराई के साथ साथ डेढ़ इंची पुरवा का जिक्र और बाल सखा के पान पर नौकरी कुर्बान। वाह रे सिरी। ऐसे ही लिखें जनाब।

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  3. Yateesh Sharma
    June 25, 2018 @ 11:21 am

    Very nice story Mr Yadav. Now a days we are not getting such refreshing and emotional stories in magazines. Aapse guzarish hai ki Srilal Shukl ji ki kami ko poora kariye. is website pe aapki sabhee kahaniyan bejod hain.

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  4. विकास कुमार सिंह
    June 25, 2018 @ 11:26 am

    बहुत ही शानदार और मौलिक रचना। सभी पात्र इस तरह से किस्सागोई करते हैं कि जैसे सामने सबकुछ घट रहा हो। कहानी में कोई लफ़्फ़ाज़ी नहीं फालतू का वितंडावाद नहीं। शब्द दर शब्द बहुत ही उपयोगी और सबसे बढ़कर सिरी के तेवर। एक निचले मध्यवर्ग के व्यक्ति को भी सम्मान से जीने का हक है।

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  5. हरी प्रकाश
    June 25, 2018 @ 11:32 am

    गुरर गुरर , अरे बाप रे भागो ये तो रॉकेट है , कर र र रच कर र र र ब ,गुरर गुरर , भौं भौं , ठाक तड़ाक , बू हू हू हू – यम यम। बचपन से हम सब कॉमिक्स पढ़ते रहे। असली मज़ा अब आया है। इया राजा कुक्कुर होय त आइसन की तर्ज पर मैं इतना ही कहूँगा की कहानी होय त आइसन। बहुत धन्यवाद। जनाब एक उपन्यास काहे नहीं लिखते?

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  6. Gajanan Raina
    June 25, 2018 @ 5:04 pm

    पहले अपनी प्रिय सूक्ति दोहरा लूँ, “एक बनारसी बनारस से निकल सकता है लेकिन एक बनारसी से बनारस कभी नहीं निकलता। ” कुंदन जी देश विदेश सब जगहों से हो आये लेकिन भीतर बनारस जस का तस बना हुआ है। अविरल बहती गंगा माँ से सीखा है कहानी कहने का हुनर,गंगा के इस बेटे ने। कथन शैली हो या फिर कथ्य,साधारणपन असाधारण बन कर आता है यहाँ।

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  7. Hitesh
    June 27, 2018 @ 2:10 pm

    Bahut badhiya

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