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अंवरागेटा और सिरी – कुंदन यादव की कहानी

बात करीब दस बारह साल पहले की है, जब गोपाल होली की छुट्टियों में अपने पुस्तैनी घर आया था। उसके जन्म से पहले ही उसके पिता प्रभुनाथ सीआरपीएफ़ में कंपनी कमांडर हो गए थे। साल में एकाध बार ही घर आ पाते। बनारस कचहरी से लगभग दो फ़र्लांग बढ़ते ही गाजीपुर रोड पर सय्यद बाबा की मज़ार से बाएँ मुड़ती सड़क पर 200 मीटर बाद 25-30 घरों का पहाड़पुर मोहल्ला था। मोहल्ले की बसावट लंबाई में थी जो कि एक तरफ पुलिस लाइन और दूसरे तरफ एलटी कॉलेज की चहारदीवारी के बीच सैंडविच नुमा लगती थी। फागुन की दोपहर ढल रही थी। मोहल्ले की आधी जनसंख्या मतलब पुरुष काम धंधे पर गए थे और महिलाएं गोबर पाथने और होली के पापड़ आदि सुखाने में व्यस्त थीं। दोपहर का भोजन करके गोपाल अपने घर की ऊपरी मंज़िल पर लेटा ही था कि एक शोर सुनाई दिया। उसने खिड़की से देखा, सतेन्द्र और गुड्डू भागते हुए आ रहे थे। अबे जल्दी से गाड़ी निकाल ,खोल केवाड़ी कहकर मोटर साइकिल निकाली और जो भी मिला उसको बैठाकर यह बताते हुए कि मजार पे भयंकर एक्सीडेंट हो गयल हव, कहकर निकल गए। अचानक इस हरकत से मोहल्ले के अधिकतर लड़के मज़ार की तरफ चल दिए । मज़ार के पास गाजीपुर जाने वाली सड़क पर काफी भीड़ जमा थी । एक साईकल सवार को कुचलते हुए एक सफ़ेद रंग की कार तेज़ी से पांडेपुर की तरफ भागी थी जिसका पीछा करने के लिए सतेन्द्र और गुड्डू अपने अपने दोपहिए से निकल पड़े थे। गोपाल भी तब तक नीचे आ गया। कुछ बच्चे अब बड़े हो रहे थे। कुछ नई भाभियाँ भी आ गईं थी। मोहल्ले की सड़क पर औरतों का एक झुंड खड़ा होकर बहस और आशंका में जुटा ही था कि श्रीनाथ उर्फ सिरी वापिस आते दिखाई पड़े।

कन्हैया बो ने पूछा , का भयल सिरी कौनों मार पीट हो गयल हव का ।

अरे नाहीं भऊजी एक मिला के कचर के कार वाला गाजीपुर ओरी भागल हव ।

ओहि त हम कहली कि बिना गोजी-गंडासा कुल लड़कन कहाँ केकरे पीछे भागत हऊवन ।

नंदू बो ने फिर पूछा

कहो तू त एही ठियन रहला, उहाँ कब पहुंचला?

अरे बड़की जैसही न गुड्डुवा गाड़ी निकाले बदे चिल्लायल, हम कुइयां पे कपड़ा धोवत रहली। कुल काम छोड़ के तनतनायल एकदम लप्प से मजारी पे भगली , तब से एक ठे टेम्पू पे कुल लाद के ले जात रहलन। लगत हव कौनों कबाड़ी रहल, काहे कि सइकिलिया पे तराजू, बटखरा और भोंपू लगल रहल । तुरंतय कुल कबड़िया के ले के कपिलचौरा अस्पताल भगलन, लेकिन बची न ।

महिलाओं ने समवेत स्वर में कहा- च्च च्च च्च च्च , अरे मोरी माई । अचानक रमजीउवा बो की आवाज़ आई, हे गंगा माई बचा लेतू बेचारा कबड़िया के ।

सिरी तुरंत बोल पड़े, बच जाए तअ बढ़िया हव, कहीं और पहिया चढ़ल रहत त कौनों उम्मीद रहल, लेकिन सरवा एकदम अंवरागेटा पे चढ़त चल गयल। एसे बस भगवाने मालिक हउवन। अस्पताल न पहुँच पाई ।

बड़की भउजी ने फिर कहा, का कहलअ ! केकरे ऊपर पहिया चढ़ गयल ?

श्रीनाथ ने तुरंत जवाब दिया, अरे तू सब न जनबी। ई जऊन खोपड़ी और गरदन के बीच का पोरशन हव न , अरे जहां खोपड़ी क हड्डी खतम होत हव , एके अंवरागेटा कहल जाला मेडिकल में। ई समझ लअ जा कि एके अगर सुन्न कर देवल जाए त जऊन तू सब लोग एहर ओहर का चुगलखोरी बतिया के मोहल्ले भर में झगड़ा लड़ाई फनले रहअलू , ऊ सब न कर पईबू जा। सबके शांति मिल जाई ।

सोनारी बुआ ने यह सुनते तपाक से कहा, चल हट बाई चढ़ऊना खाली हमने के पीछे पड़ल रही। जइसे हमने खाली झगड़े करीला !

गोपाल भी अंवरागेटा के अजीब उच्चारण पर हैरान रह गया।

महिलाओं में से किसी ने कहा, डढ़िजरौनू ! बड़का आयल हऊवन डगडरी पढ़ावे। माई करे कुटौनी पिसौनी, बेटवा क नाम हव दुरगादास। ई नाहीं कि सोझे सोझे बताईं कि , नटई पे गाड़ी क चक्का चढ़ गयल, त एनके अंवरागेटा भयल हव, फुकौनू नाहीं तअ।

इस वार्तालाप में कोसे जाने के बाद भी अपने बायोलोजिकल ज्ञान पर मुस्कुराते हुए श्रीनाथ ने बस इतना कहा, ‘अब के तोनहने के समझावे, एही से हम ई गोबरपाथ कंपनी के मुंह नाहीं लगाइत ; तू लोगन के का समझ में आई अंवरागेटा क मतलब ! चल तोन्हने चिपरी पाथ ; हुंह ” और रतन की दुकान की तरफ बढ़ गए। गोपाल अब समझ गया कि यह अंवरागेटा वास्तव में मस्तिष्क का निचला भाग मेंडला ओब्लोंगेटा है।

श्रीनाथ के जाने के बाद उसने पास खड़े बंटी से कहा , यार श्री चाचा पाँचवी फेल हैं इनको ये सब बायोलॉजी के टर्म्स कैसे पता हैं ?

बंटी से पहले ही राजू बोल पड़ा- भैया आप तो जानते ही हैं कि सिरी चाचा चित्र सुंदर बनाते हैं और मोहल्ले के सब लड़के लड़कियां हाई स्कूल के प्रेक्टिकल का डायग्राम उन्हीं से बनवाते हैं। वहीं से रट लिए होंगे। जब देखिए तब खाली भौकाल बनाने के चक्कर में रहते हैं। अभी पिछले साल जब दाल महंगी हो गई थी तब इन्होंने अखबार में पढ़ लिया कि भारत में अफ्रीका से दाल आ रही है। बस कुछ दिन बाद इनके बहनोई आए तो उनको खाना खिलाते हुए जब वो दोबारा दाल नहीं ले रहे थे, लगे बोलने, “लअ बहनोई और दलिया ल, नुकसान न करी , एकदम इंपोर्टेड दाल हव ”। इसी तरह अनिल चाचा ने स्विस मिलिटरी का एक चाकू दिया था, उसको तेज कराते हुए सान धराने वाले को फालतू हड़का रहे थे- अबे ठीक से धार बनाव। जानत हऊवे इ चक्कू जापानी स्टील से बनल हव, जऊने से समुराई वाला तलवार बनावल जा ला। एक्कै दाईं में काम तमाम।

तब तक पिंटू भी बताने लगा, भैया अब देखिये न सांड को प्रीमिजीनियस टौरस , गुड़हल के फूल को हिबिस्कस , मेंढक को भी राना टिगरीना और टोड बोलते हैं। पहिले आराम से फीगर बना देते थे, अब बहुत भाव खाते हैं। लड़कियन का तो तुरंत बनाते हैं, कहते भी हैं साबस बिटिया , खूब मन लगा के पढ़ लिख और डॉक्टर बन । और हमलोग से पहले गाड़ी धुलवाएंगे, फिर मालिश कराएंगे और कुछ न कुछ पूछकर बेइज्जती अलग। कई बार तो मम्मी पापा से बोल भी देते हैं- तोहार लड़का हाथ से निकलत हव। लगत हव एकरे ऊपर आर्किमिडीज़ क सिद्धान्त लागू हो गयल हव।

गोपाल ने पूछा आर्किमिडीज़ का सिद्धान्त स्टूडेंट्स पे लागू !!!

सभी लड़के हंसने लगे । पप्पू ने बताया भैया श्रीनाथ चाचा का आर्किमिडीज़ सिद्धान्त ये है कि जब कोई लड़का किसी लड़की के चक्कर में पड़ जाता है तो उसकी पढ़ाई में कमी की मात्रा उसके भटकाव के बराबर होती है।

गोपाल अब हंसी न रोक सका । हँसते हँसते उसके पेट में बल पड़ गए।

श्रीनाथ वैसे तो सूचना विभाग में अपर निदेशक कार्यालय में जीप चलाते थे। छ्ह फुटा कद, रोबीला चेहरा , महाराणा प्रताप जैसी बड़ी बड़ी मूछें, लेकिन पिछले कुछ महीनों से अपने अल्हड़पन और सहज आदतों जिन्हें कि सरकारी महकमे में अनुशासन हीनता कहा जाता है, के चलते निलंबित होकर सारा दिन मोहल्ले में ही रहते थे । एकाध घंटे के लिए हाज़िरी लगाने विभाग तक हो आते थे।

पिछले साल के पहले दिन श्रीनाथ के साहब दफ्तर से निकल कर रास्ते में अन्य अधिकारियों को शुभकामना देते हुए कलेक्ट्रेट से विश्वनाथ मंदिर गए और लौटते हुए चेतगंज मेन बाज़ार में गाड़ी रुकवाई और कुछ खरीदने के लिए हथुवा मार्केट में चले गए। इस बाज़ार से ही ख़रीदारी उनका आए दिन का क्रम था। साहब को दो तीन घंटे लग ही जाते थे। श्रीनाथ एकाध घंटे तक इधर उधर गाड़ी के अगल बगल घूमते रहे फिर ऊबन मिटाने के लिए सामने के एक शोरूम में घुस गए जो वुडलैंड का था। अभी सोच ही रहे थे कि जूते जैकेट आदि क्या देखें कि एक स्टोरबॉय जो कि उनको पिछले डेढ़ घंटे से देख रहा था और समझ भी रहा था कि श्रीनाथ ड्राईवर हैं, बोला, ’ भईया ई ब्रांडेड दुकान हव इहाँ तोहरे बजट के बाहर का समान मिली, अइसन करा सामने एक्शन या बाटा में देख ल।

बस पहचान में वह भूल कर बैठा। अबे समझले का हउवे बे तेरी माँ की…….. । आज ही मिले वेतन के हज़ार हज़ार के अठारह नोट जेब में थे और कुछ भरोसा भी। बोले ,” तोर पूरा दुकान खरीद लेब”। अगर ड्राईवरन के समान नाहीं बेचे के हव त लिख के गेट पे टांग दे। तोरे दुकाने थूके भी न आइब। सरऊवाले दुकानदार भयल हैन। शोर सुनकर मालिक भागा आया । क्षमा मांगी और सादर उनको भीतर ले गया। पानी पिलाया और बोला जी सेवा बताइये। मैं उसकी तरफ से माफी मांगता हूँ । श्रीनाथ बोले, बतावा ! बुजरौ वाले सोचत रहलन कि खाली दाम पूछे आयल हई। और उसी स्टोर बॉय को बोला , चल देखाव बे जूता। दो- चार जोड़ी देखने मापने के बाद तीन हज़ार रुपए का एक जूता अपने लिए पसंद किया , दो हजार का एक जूता बेटे के लिए और पत्नी कहीं इस खर्च पे हंगामा न करें इसलिए इनके लिए भी सोलह सौ की एक चप्पल ले ली। सारा समान पैक होने तक बैठे रहे , भुगतान के लिए भी पैसे उसी लड़के को दिए जिसने उनको एक्शन या बाटा जाने की सलाह दी थी। जब वो शेष खुले पैसे लेकर आया तो उसी को कहा कि , चल उठाव तीनों पैकेट और ले के चल गाड़ी पे। निकलते निकलते मालिक से एक पॉलिश की डिब्बी, और एक जोड़ी जुराबें ली। कैशियर मालिक को देख ही रहा था कि, उसकी ओर मुखातिब होकर बोले, एकर पर्चा मत काट दीहा, ई घेलुआ हव। बाहर निकले और जीप की पिछली सीट पर पोलिथीन सहित तीनों डिब्बे रखवा दिए। फिर न जाने क्या मन में आया कि अपना नया जूता निकाला और नए मोजे के साथ उसे पहना और पुराना स्पोर्ट शू उसी डिब्बे में डाल कर रख दिया और उसी दुकान के सामने चहलकदमी करते हुए भीतर से स्टोर वालों को खुद को देखते हुए मन ही मन खुश होते रहे जब तक साहब नहीं आ गए।

यद्यपि आमतौर पर वे साहब को देखते ही आगे बढ़कर हाथ से सामान ले लेते थे लेकिन आज सीधे अपनी सीट पर आ गए। साहब के हाथ में वैसे भी एक साड़ी का पैकेट और कुछ अन्य हल्का- फुल्का सामान था । साहब को थोड़ा नागवार गुजरा। जीप में बैठते ही साहब ने जैसे ही वुडलैंड के तीन बड़े पैकेट देखे, बोले ये सब किसका है ? श्रीनाथ ने कहाँ , साहब हमार हव। साहब फिर बोले तीनों? श्रीनाथ, हाँ और का । साहब ने फिर पूछा क्या है इसमें। श्रीनाथ ने अपना पहना हुआ जूता दिखाते हुए कहाँ , ई देखिये जूता है। एक ठो लड़के के लिए और एक ठो चप्पल उसकी अम्मा के लिए ले लिए हैं। नए साल का गिफ्ट, ओइसही जैसे आप लिए हैं मैडम के लिए । साहब का मुंह उतर गया। जीप चलती रही। दोनों कुछ देर शांत बने रहे।

साहब ने फिर पूछा, कुल कितने का पड़ा ये सब? श्रीनाथ ने कुछ आत्म मुग्ध होते हुए बताया कि तीन हज़ार का हमारा दो का बेटे का और सोलह सौ की चप्पल। कुल छह हज़ार छह सौ। साहब बोले एक तिहाई तंख्वाह तुमने जूते चप्पल पे ही खर्च कर दी । श्रीनाथ ने दार्शनिक भाव से कहा साहब, ई पइसा न हाथ का मइल है। हमारे बाउजी कहते थे कि पइसा अपने आराम के लिए होता है न कि ई साले को बैंक में धरके हम उसको आराम कराएं और हंस पड़े।

साहब ने प्रतिवाद किया , एक तिहाई का तो जूता खरीद लिए बाकी का खर्चा कैसे चलाओगे? इस तरह जोश में पैसा उड़ाना बेवकूफी है। दो-दो लड़कियां हैं। शादी के लिए कुछ जमा बचत नहीं करोगे तो कहाँ हाथ फैलाओगे? हमारी तनख़ाह तो तुमसे तिगुनी-चौगुनी है लेकिन इकट्ठे इतना खर्च करने जैसी मूर्खता हम कभी भी नहीं कर सकते , वह भी जूते पर।

श्रीनाथ पिछले तीन चार घंटे से जोश में थे ही, उनको साहब कि आलोचना पर ताव आ गया। बोले साहब , अब देखिए न चौक के अगल बगल जितनी बनारसी साड़ियों की गद्दी है, सब के सब साले करोड़पति हैं। लेकिन रहन सहन देखिए तो वही मारकीन का नगौछा कुर्ता पहन के बैठे रहेंगे। कहीं जाएंगे तो पैर में चमरौंधे वाला नागरा या फिर पनही। जूता लाख काटेगा लेकिन बढ़िया नहीं लेंगे। जबकि रामलीला का या शिव बारात का चंदा देना हो तो हज़ार रु तुरंत दे देंगे। इसलिए खर्चा करने के लिए ज्यादा या कम पैसा होना कोई ज़रूरी नहीं, जिगर में गूदा होना चाहिए।

अंतिम वाक्य पूरा करते हुए उन्होंने कनखियों से साहब को देखा। साहब ने अपना अपमान महसूस कर लिया था लेकिन कुढ़कर रह गए। अगले दिन जब श्रीनाथ अपने जूते की टकटक आवाज निकलते दफ्तर में चहल कदमी कर रहे थे तब उनहोंने बड़े बाबू को बुला कर कहा , जीप की लॉग बुक और डीजल माइलेज , मेंटेनेंस आदि पर कड़ी नज़र रखना।

साहब ने एक दूरी बना ली थी और श्रीनाथ को सबक सीखने का मौका ढूँढने लगे।

एक दिन उनके साहब जिसे वे सहबवा कहते, ने उनको पान खाने के लिए टोका। यदि व्यक्ति बनारसी हो और बिना पान के 12 घंटे रहना, मतलब दिन भर की चौकसी, ऊर्जा, खुशी, मस्ती, चैतन्यता आदि में पचहत्तर फीसदी की कमी। दो चार दिन तो श्रीनाथ ने बिना पान रहने की कोशिश की , फिर बिना चूने का बीड़ा घुलाने लगे जिससे मुंह लाल न हो और साहब के गाड़ी लगाने के आदेश पर तुरन्त मुंह साफ कर लेते। लेकिन हफ्ता भर भी नहीं बीता कि उनके बाल सखा संतलाल संकट मोचन दर्शन के बाद हनुमान जी का प्रसाद और चौक की नामी पान की दुकान से , जिसमें कई प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों को पान पेश करते हुए पानवाले के दादा परदादा की तस्वीरें थीं, कुछ किमामी व जाफरानी ज़र्दा युक्त चाँदी के वर्क में लपेटे मगही पान लेकर उनके दफ्तर के सामने से गुजरे। श्रीनाथ दफ्तर के बाहर सड़क पर बच्चेलाल की चाय की दुकान पर ही खड़े थे। उनको देख संतलाल ने आवाज़ दी, का हो सिरी !! और मिलते ही प्रसाद दिया। श्रीनाथ ने उनको डेढ़ इंची पुरवे वाली स्पेशल चाय पिलाई। इसके बाद पान के लिए लड़के को आवाज़ दी कि संतलाल बोल पड़े, अरे नाहीं गुरु, तू राहे दअ। चऊक से चौरसिया के इहाँ से पान बन्हवइले हई । ल तहूँ और हम चलब, बलिया जात हई भूसा लेवे।

संतलाल को विदा देकर श्रीनाथ दफ्तर के अहाते में बैठे और एक बीड़ा मुंह में दबा लिया। जनवरी माह के खिचड़ी के बाद वाले हफ्ते की मीठी गुनगुनाती धूप, मुंह में किमाम, पिपरमिंट, लौंग और मैनपुरी सुपारी के साथ भोला जाफरानी ज़र्दे की जुगलबंदी में घुलते मगही पान के असर में श्रीनाथ लगभग ऊंघ ही रहे थे कि अचानक सोहन चपरासी ने उन्हें हिलाकर जगाया, अरे सिरी भइया जल्दी गाड़ी पे चलअ , साहब बहरे अउतै हौवन’’

श्रीनाथ के मन में एक पल में पान थूकने का विचार आया लेकिन मुंह में घुलते हुए पान से वे बेरुखी न कर सके। एक तरफ दबाकर तुरंत पहुंचे और गाड़ी स्टार्ट की। साहब भी बैठ गए और पूछा, छोटे बेटे का कोचिंग सेंटर देखे हो? श्रीनाथ ने सिर हिलाते हुए आवाज़ निकाली, हूँ। साहब ने फिर कहा वहीं ले चलो और टिफ़िन बॉक्स रखवा लिया था? श्रीनाथ कहना चाहते थे पता नहीं सोहनवा रखा होगा लेकिन उच्चारण निकला , “पड़ा वई वोअवनवा अक्खा वोआ”। साहब ने उनकी आवाज़ सुनकर देखा और गुस्से में चिल्लाए , तुम्हारी ये हिम्मत ! मुझसे पान खाकर बात कर रहे हो जबकि मैंने मना किया है। साहब को गुस्से में देख दांतों के बीच कि जगह के माध्यम से पीक को अलग करके ठोस पान को एक तरफ दबाया और पीक थूकते हुए बोले , साहब आपका आदेश बिलकुल मानते हैं लेकिन क्या बताएँ आज एक बचपन का लंगोटिया दोस्त चौक से पान लगवा के ले आया था। इसलिए खा लिए , चाहे तो आप दफ्तर में किसी से पूछ लीजिये। हम नहीं मंगाए थे वही लिआया था। उनका उच्चारण पूरा पान न थूके जाने से अभी भी आंशिक अस्पष्ट था। बस यही बात साहब को खल गई।

वे बोले , मेरे टोकने के बावजूद भी मुंह मे दबाए हुए हो । श्रीनाथ ने बड़े भोले पन से उत्तर दिया , सर जेतना घुल चुका था सब थूक दिए बस थोड़ा ही रह गया है, देखिये अब त आवाज़ भी ठीक हो गई है। साहब गुस्से से काँपते हुए बोले गाड़ी दफ्तर के लिए वापिस लो और दफ्तर आकर अनुशासन हीनता के आरोप में उन्हें निलंबित कर दिया। निलंबन आदेश टाइप होने के दौरान बड़े बाबू ने आकर कहा भी , अरे सिरी, यार जाके साहब का गोड़ धय ले , शायद एदा पारी माफ कर दें। श्रीनाथ बड़े बाबू के कहने पर दरवाजे तक गए भी लेकिन साहब को वुडलैंड जूतों से लेकर आज तक के घटनाक्रम ने पसीजने न दिया। एक बार फिर पूरे स्टाफ नें मिलकर श्रीनाथ के लिए याचना करने की योजना बनाई लेकिन श्रीनाथ ने यह कह कर सबको रोक लिया कि , जाए द बड़े बाबू जरतूहा हव सरवा। जब से जूता लेले हई तब से एके उफ्फ़र पड़ल हव। एनके त कोई दोस्त पान लियाके दे ला नाहीं त ई का समझिहैं दोस्ती। जऊन करे तउन करेन द आप लोग । सस्पेंडय न करिहैं कि काला पानी दे देइहैं बुजरौ के। और देखत जा तू लोग जब हाज़िरी देवे आइब त पान घुलौले आइब। देखी ला तब का करलन? डामिन-फांसी तअ न न दे देइहन । और श्री नाथ जीप की चाभी देकर घर आ गए। घर में पत्नी को भी बताया तो पत्नी ने भी कहा ठीक कईला तू। हम त जनतै रहली कि सहबवा तब्बै से जर बुतायल हव जब से हमने बदे जूता खरीदले रहला। मुंह फुकौना एके उफफर पड़े, मर किरौना त नाहीं । लेकिन जब श्रीनाथ ने बताया कि आधा तनखा मिली, तो पत्नी की आँखों में आँसू आ गए। श्रीनाथ ने टोका , करे रोवत हई ? पत्नी ने तुरंत आँसू पोंछते हुए जवाब दिया, नाहीं पइसा तोहरे इज्ज़त से बढ़ के हव का ? रोवब काहे।

अब श्रीनाथ के पास समय ही समय था । कुछ दिन तो इधर उधर की बैठकी में गुजारे लेकिन जल्द ही उन्होंने भाँप लिया कि उनको लोग खलिहर, चिपकू और निखट्टू समझने लगे हैं। खाली समय में वे टीवी देखते लेकिन 12 घंटे की बिजली कटौती में अपनी ऊब का कोई अन्य रास्ता खोजना ज़रूरी था । बचपन से ही वे बहुत अच्छा चित्र बनाते थे इसलिए बच्चे अपने कॉपियों में उनसे मछली मेंढक आदि बनवाते कभी वो अपने घर के पुराने कैलेंडर के पीछे सादे पन्ने पर आगे के चित्र की हूबहू नकल करते । शिक्षा के नाम पर वे पाँचवी फेल थे लेकिन धीरे धीरे बोलकर पढ़ लेते। मोहल्ले के शुरू में ही रतन की दुकान थी जो रोज़मर्रा की चीजों के अलावा कॉमिक्स भी किराए पर देता। तब तक बच्चों के इम्तहान खत्म हो गए और यूपी बोर्ड परीक्षा के चलते मार्च में छुट्टी थी। अगल बगल के बच्चे किराए पर कॉमिक्स लाते और पढ़ते। एक दिन श्रीनाथ ने भी एक कॉमिक पढ़ना शुरू किया और तब से उनको चस्का लग गया।

होली के दो-चार दिन बाद गोपाल ने एक दिन लगभग 11 बजे दिन में जबकि अधिकतर नौकरी पेशा वाले लोग काम पर चले जाते थे , श्रीनाथ को रतन की दुकान पर कॉमिक्स के लिए मनुहार करते देखा। मनुहार की यह अदा इतनी निराली थी कि गोपाल वहीं रुक गया। दरअसल श्रीनाथ मुफ्त में कॉमिक्स लेते और कई बार देर से वापिस करते या पुस्तक के पन्ने मुड़ – तुड़ जाते। रतन भी चाचा कहने के नाते लिहाज करता लेकिन कब तक? दुकान पे दृश्य जारी था जो स्वयं किसी कॉमिक सा था।

श्रीनाथ- अबे रतनवा , अबे देएए । देख अब कौनों पेज न फटी। अबे देख ‘”नागराज का बदला”” क आधा कहानी दिमाग में नाचत हव । शेष अगले अंक वाली कितबिया दे दे बे। देएएएए, दे बे दे।

रतन- नाहीं नाहीं तोहें एकदम न देब । देखत हऊवा ई नीली घाटी क डाइन कअ पिछला 2 पेज गायब हव। अब इ किताब बेकार, कोई लेबै न करी।

श्रीनाथ- अबे एममे हमार गलती ना हव बे। अबे दुपहर में पढ़त रहली। खाली साँड़ हंकावे बदे एके खिड़की पे रख के बहरे गईली कि छोटकी बछियवा चबावे लगल। जनते हउवे ओकर दाँत निकलत हव। कुच्छौ पाई बस चबावे लगअला । परसों तोरे चाची कअ नयकी धोती एक तरफ से चबा देलेस।

रतन- देख अ ई सब कहानी हम न सुनब। तोहरे बछिया क जिम्मा हमार ना हव। किताब त फट गइल न।

श्रीनाथ- अबे त ओकर कारण भी सुनबे कि खाली हमही के दोष देबे ! चल जायन दे बे जऊन भयल, तउन भयल अब एकदम न होई। आजू से बछियवा के बहरे बांधब। चल मान जो और शेष भाग दे दे नाहीं त नागराज क बदला वाली आधा कहानी भुला जाई।

रतन- ई सब बहानाबाजी हव। बिल्लू और उड़नतश्तरी वाली किताब याद हव , आज तक नाहीं लउटईला। एक हफ्ता हो गयल।

श्रीनाथ- अबे ऊ घरे में ही कहीं रक्खल होई , घबड़ों मत। कल पूरे घर क सफाई करब । कहीं न कहीं मिली जरूर।

रतन- त जा पहिले ओके खोज के ली आवअ तब दूसर ले जा।

श्रीनाथ – अबे भरोसा रख। बिल्लुआ कहीं भाग न जाई, ठीक से खोजब त मिल जाई । तब ले नगरजवा वाला आधा भाग त दे दे बे। देख यार एतना तेल लगावत हई । अब त दे दे

रतन- नाहीं नाहीं कत्तई न देब। कसम खा चुकल हई कि अब तोके न देब। एक त फ्री मे पढ़बअ और टाइम से देबअ नाहीं । त अब जब ले बिल्लुआ वाली कॉमिक्स न मिली तोहें नया किताब न लेवे देब।

रतन की दुकान के बाहर ही उसकी अम्मा सूप में तंबाकू और तेंदू के पत्ते से बीड़ी बना रहीं थीं। रतन को पसीजते न देख श्रीनाथ उनकी तरफ मुखतिब हुए और गुहार लगाई – देखत हऊ भौजी , रतनवा के। आधा घंटा से रिरियात हई , भरोसा देत हई कि अब कौनों किताब न फटी, लेकिन एकदम गब्बर मतिन अड़ गयल हव ; तनिको सुनतै ना हव एकरी माँ की ।

इतना सुनते ही रतन की अम्मा चिल्लाईं- दे काहे नाहीं देते रे फुकऊना जऊन मांगत हउवन । कब से गारी सुनत हउवे। दे के हटाव।

रतन ने बेमन से नागराज का बदला का शेष भाग श्रीनाथ को दिया और श्रीनाथ ने उसके साथ एक और चाचा चौधरी की किताब लेकर कहा , भौजी एकदम समझ ल देवी हइन । कोई के दुआरे से खाली हाथ नाहीं लौटे दे लिन। और रतन को इशारा करते हुए बोले – एक ठे ई सरवा बनियागिरी सीख लेले हव, कहते हुए अपने घर की ओर बढ़ गए।

गोपाल को मनुहार का यह अंदाज बड़ा अजीब लगा। उसने आश्चर्य से रतन से पूछा कि क्या श्री चाचा बच्चों की कॉमिक्स पढ़ते हैं?

रतन- हाँ गुरु जब से सस्पेंड भए हैं तब से आदत पकड़ लिए हैं और इतना धीरे धीरे पढ़ते हैं कि एक कॉमिक्स में 3-4 दिन लगा देते हैं पढ़ने में। लौटाने में और सुस्त।

गोपाल- फिर आपने क्यों दिया

रतन- अब चाचा लगते हैं, एक मोहल्ले में हैं । एक दूसरे के साथ रहना है ।

गोपाल अपने घर आया लेकिन मन में एक कौतूहल बना ही रहा कि श्रीनाथ को कॉमिक्स पढ़ते देखें।

अगले दिन दोपहर के भोजन के बाद गोपाल टहलते हुए श्रीनाथ के घर चला गया। चाची के पाँव छूए । उन्होंने कुशल क्षेम पूछी। चाय पानी कराया । कुछ देर में नहा कर श्रीनाथ भी आ गए। लाल गमछा लपेटे हुए , सूरज को एक लोटा जल चढ़ाने के बाद उन्होंने बैठक से ही आवाज लगाई, खाना लियाव रे । गोपाल के लिए भी भोजन परोसने को कहा। गोपाल ने बताया कि खाकर आए हैं। तो पत्नी से बोले अच्छा इसको दही-चीनी दे दो। भोजन के उपरांत बाहर गए कुल्ला किया और भीतर चारपाई पर आकर लेट गए। कुछ देर बाद उन्होंने चाचा चौधरी वाली कॉमिक्स उठाई , खाट को खिड़की की तरफ खींच कर एक तकिया लगाया और पढ़ने लगे। उनके पढ़ने का तरीका दूसरी-तीसरी कक्षा के बच्चे सा यानी सस्वर था । गोपाल आँख मूँदकर सुनने लगा।

पहला पन्ना पलटते ही श्रीनाथ की वाणी गूंजी –

चाचा चौधरी और साबू काले टापू में

एक टॅक्सी तेज़ी से हवाई अड्डे की तरफ भागी जा रही थी

अरे भाई आऊर तेज चलाओ। होटल

बाशाओ हुने पहुंचाए देने आं

फिस्सस्स । हुन एयर पोर्ट नहीं पहुँच सक्दे टायर पंचर हो गया है

ऊ हु हु हु हु । ऊ हू हू हू

साबू किसी के रोने की आवाज़ आ रही है। अरे विलायती राम मुफ्त का बाजा क्यों बजा रहे हो?

मैंने टोकियो की फ्लाइट पकडनी थी, दो मिनट रह गए हैं

चिंता मत करो, हवाई जहाज़ इधर से गुजरेगा तो साबू तुम्हें बैठा देगा।

यह ठीक है

कुछ देर में ग ड़ड़ड़ड़ ड़ ड़ ,

वो रहा हवाई जहाज , साबू मुझे बैठा दो

जय बजरंग बली , याहू , ढप्प

वाह साबू सचमुच बड़े काम का आदमी है

गोपाल हतप्रभ सा उन्हें देखता रहा

तभी अगला पृष्ठ शुरू हुआ

लपट और झपट दो चोर

लपट चाचा चौधरी और साबू लकड़ियाँ काटने जंगल गए हैं और चाची भी मंदिर जाने वाली हैं। चलो टीवी चुरा लेते हैं

वो तो ठीक है झपट लेकिन चाचा चौधरी के घर चोरी खतरे से खाली नहीं

यार लपट खतरा यानि साबू तो जंगल गया है और ये देखो चाची भी निकल गईं।

भीतर घुसते ही

गुरर गुरर

अरे बाप रे भागो ये तो रॉकेट है

कर र र रच कर र र र ब

गुरर गुरर , भौं भौं

ठाक तड़ाक , बू हू हू हू

लपट मैंने कहा था न चाचा चौधरी के घर चोरी करना खतरे से खाली नहीं

यह वाक्य खत्म करते ही श्रीनाथ चहक कर बोले

“इया रजा कुक्कुर होय त अइसन”

एक थे ई हव , कहते हुए उन्होंने खाट के नीचे सो रहे अपने देसी कुत्ते को देखा और “”खाली खाए के पसेरी भर दे दा ससुर के”” कहते हुए एक लात मारी। कुत्ता कूँ ऊँ करके थोड़ा आगे उनके पैरों की पहुँच से कुछ आगे बढ़ कर पुनः सो गया।

गोपालने कहा भी, चाचा क्यों मार रहे हैं बेचारे को?

श्रीनाथ कॉमिक्स के उसी पन्ने पर चाचा चौधरी के कुत्ते रॉकेट का चित्र दिखाते हुए बोले”, अरे नाहीं बेटा देखो ये भी तो कुत्ता ही है न । कोई नहीं है फिर भी घर की रखवारी कर रहा है। एक ठो ई है साला। नाम है टाइगर लेकिन कोई भी आ जाए भोंकना तो दूर पोंछ हिलाने लगता है”। फिर बाहर खेल रहे बच्चों को सुनाते हुए बोले , एकर नाम माउस रखे के चाहत रहल। और आगे पढ़ने लगे। गोपाल का हँसते हँसते बुरा हाल था। ऐसा कॉमिक्स वाचन दुर्लभ था। श्रीनाथ कॉमिक्स के संवाद, वर्णन आदि के साथ साथ ध्वनि प्रभाव को भी बोल बोल कर पढ़ रहे थे। बीच में उन्होंने गोपाल से पूछा , बेटा ई यम यम काहे लिखा है। गोपाल ने बताया कि स्वादिष्ट खाने पीने को देख मुंह में जो पानी आता है उसके लिए। परंतु श्रीनाथ सहमत नहीं हुए उसी तरह उच्चारण सहित कॉमिक्स वाचन करते रहे। गोपाल एक उपन्यास पढ़ने का अभिनय करते हुए मुंह छुपाकर हँसते हँसते बेदम हो गया। श्रीनाथ को लगा शायद कोई मज़ेदार कहानी गोपाल पढ़ रहा है और वे निर्विकार भाव से कॉमिक्स में लगे रहे।

छुट्टियों के बाद दिल्ली आकर गोपाल ने अपने कई जाननेवालों, दोस्तों को कॉमिक्स पढ़ने का यह ढंग अभिनय करके बताया । यद्यपि उसका अभिनय वैसा न था लेकिन जो भी सुनता हंस हंस के बेहाल हो जाता।

धीरे धीरे दस-बारह साल बीत गए। गोपाल भी इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी करके बंगलोर में नौकरी करने लगा। इस बीच उसके पिता जी ने अवकाश प्राप्ति के बाद पहाड़पुर से हटकर सारनाथ की तरफ अशोकनगर कॉलोनी में एक नया बड़ा मकान बना लिया था। पहाड़पुर वाले मकान के अपने हिस्से के दोनों कमरों में जिनमें एकाध पलंग, बिस्तर , कुर्सी मेज आदि थे, रखकर ताला लगा दिया था।चूंकि गोपाल जब भी आता नए घर से ही स्टेशन आत जाता , इसलिए पुस्तैनी मोहल्ले में गए सालों हो गए। पिछली बार दिवाली की छुट्टी पर जब वह आया तो धनतेरस के दिन माँ ने कहा कि बेटा पहाड़पुर के दोनों कमरों की सफ़ाई करवा दो । चूंकि क्रिकेट मैच आ रहा था इसलिए गोपाल ने अनमने ढंग से कहा- कभी रहते तो हो नहीं आपलोग। कई बार मैंने कहा कि सुरेश चाचा को दे दो अब तो सुशील की भी शादी हो गई है, उनको कमरों की जरूरत होगी। साफ-सफ़ाई भी हो जाएगी। आखिर जब कोई यूज नहीं है तब फिर क्यों लॉक करके रख हुआ है?

पिताजी बोले , ऐसा नहीं कहते बेटा। वे दो कमरे अपने पुरखों की अमानत है। हमारी जड़ जमीन वही है। हम वहीं से बड़े हुए हैं। हमारी यादें बसी हैं। कोई बात नहीं तुम मैच देखो। मैं जाकर साफ करा लूँगा। सुरेश की दोनों बेटियाँ हमेशा मेरे कमरा खोलते ही झाड़ू-पोछा कर देती हैं। अरे हाँ गोपाल क अम्मा,- एक थे झोला में दो-चार पैकेट मीठा और मोमबत्ती दिया सलाई रख दअ, सुरेशवा के यहाँ दे देब। गोपाल ने लज्जित होकर कहा नहीं पापा हम चले जाएंगे। सबसे मिल भी लेंगे।

पहाड़पुर आकर गोपाल ने सुरेश चाचा के परिवार से भेंट की। कमरा धूल से भरा था और मकड़ी के जाले भी काफी थे। वह दरवाजे पर खड़े होकर भीतर निहार ही रहा था कि, चचेरे भाई सुशील की आवाज़ सुनाई दी- अरे गोपाल। तू पहिले इहाँ आवा । चला मैच देखअ। कमरा साफ हो जाई। अरे पिंकिया कहाँ गइल? पिंकी ने बगल वाले घर से उत्तर दिया, हाँ पापा। सुशील बोले- सुन इहाँ , देख गोपाल चच्चा आयल हौवन। बबलिया और रिंकूआ के लेके तुरंत लग जो दूनों कमरन में। और पोछा दू दाईं मार दिहे। गोपाल कुछ कहता इसके पहिले ही सुशील ने हाथ पकड़कर कहा- तू चला मरदवा , देखत का हऊआ। बड़का बाऊ जब आव लन त बस चाभी दे देलन और ई दूनों लपट जा लिन। चला मैच देखा , बिराट कोहलिया आउट हो गयल हव, कहीं सरवा मैच फंस न जाए।

बीच में चाय नाश्ते के दौरान ही सुशील ने बताया कि श्रीनाथ को पिछले महीने ब्रेन स्ट्रोक आ गया था। समय से सही इलाज़ न होने से अब वे अधिकतर बिस्तर पर ही रहते हैं। ठीक से बोल नहीं पाते। लेकिन लोगों को पहचान लेते हैं, जवाब थोड़ी देर इशारे से या बड़बड़ा कर देते हैं। खुशी की बात यह है कि उनका लड़का रेलवे में लग गया है। गोपाल को सहसा विश्वास न हुआ कि इतना ज़िंदादिल आदमी भी इस हाल में होगा। उसने सुशील से कहा कि श्री चाचा से मिल कर आता हूँ। सुशील ने कहा ठीक हव तू हो आव। हम न चल पाइब काहे से कि अम्मा क श्री बो से लड़ाई भयल हव , तब से बोल चाल ना हव। गोपाल ने कहा कोई बात नही।

उसने झोले से एक मिठाई का डिब्बा लिया और श्रीनाथ के घर पहुँच बैठक का दरवाजा खटखटाया। श्री की छोटी बेटी ने दरवाजा खोला । श्रीनाथ पिछले कमरे में थे। गोपाल को देखते ही उन्होने रिमोट से टीवी बंद कर दिया और सहारे से तखत पर दीवार से टिक कर बैठ गए । उसने जैसे ही श्री के पाँव छूए,उन्होंने सिर पर हाथ फेरकर आशीर्वाद दिया। बोले कुछ नहीं लेकिन आँखों से आँसू टपकने लगे। गोपाल उनकी इस हालत को देख सन्न रह गया। उसके भी आँसू निकलने को ही थे लेकिन दिल कड़ा करके उसने कहा- चाचा आप बिलकुल रोएँगे नहीं। जो आदमी अपनी मर्ज़ी का मालिक हो जैसे तिरंगा फिल्म में ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह थे, अपने दोस्त का लाया हुआ पान खाकर सस्पेंशन का सामना करे और सहबवा को जिगर में गूदा होने का मतलब समझा दे, उसके आँखों में आँसू अच्छे नहीं लगते। यह सुन श्रीनाथ फफक फफक कर रोने लगे। गोपाल ने कंधे को सहलाते हुए उनके कई पुराने किस्से याद किए। लगभग पाँच मिनट बाद सामान्य होकर उन्होंने एक छोटी सी पीतल की घंटी बजाई। पत्नी भीतर आई तो उसको कप पकड़ने का इशारा करते हुए चाय बनाने का इशारा किया। गोपाल ने जैसे ही कहा चाय पीकर आया हूँ, उसकी ओर मुखातिब होकर होंठों पर उंगली रख चुप रहने की हिदायत दी। धनतेरस के दिन ऐसा सन्नाटा गोपाल को जैसे निगल रहा था। तभी पत्नी चाय लेकर आ गई और बीमारी का सारा वृतांत बताने लगीं । श्रीनाथ ने पहले तो चाय के दोनों कपों को देखा और लड़खड़ाती ध्वनि में कुछ कहने का प्रयास किया। न तो गोपाल ना ही उनकी पत्नी के कुछ पल्ले पड़ा । फिर कुछ झुँझलाकर गोपाल को इशारे से सामने की अलमारी से पेन व कॉपी देने को कहा। पत्नी ने टोका, अरे चाय पियअ कि अब लिखबा? लेकिन घुटने पर कॉपी टिकाकर लगभग दो-तीन मिनट तक श्रीनाथ कुछ लिखते रहे। पत्नी ने कहा हम त पढ़ ले ना हई , शायद तोहरे बदे कुछ लिखल चाहत हऊवन।

गोपाल कॉपी लेकर मौन रहा। उसने पढ़ना टालने की कोशिश की। लेकिन श्रीनाथ झकझोरते रहे। वे बार बार इशारा करते कुछ बोलने की कोशिश करते, लेकिन गोपाल सकुचा जाता। इस नूरा कुश्ती को देख पत्नी ने खिड़की से बाहर झांक कर आवाज दी- हरे रिंकुआ देख एन का लिखले हौवन , तई पढ़ त ।

बाहर से किसी बालक की हँसने की आवाज़ आई- दादी के लिखले हव? श्री बो ने चिढ़कर कहा अब पढ़बे कि पूछा- पुछौव्वल करबे। बालक पढ़ने लगा। लिखल हव -बेटा इ अपने चाची को जस का तस पढ़ कर सुना दो :- ‘करे ! तेरी माँ की। लड़का एतने दिन बाद मिले आयल हव, खाली छुच्छे चाय पियईबी । न बिस्कुट न निमकी। चल पापड़ ओपड़ छान आ नाहीं त पकउड़ी बनाव। माई-बिटिया दूनों के कौनों सहूर ना हव’। बस एतने लिखल हव। ल दादी इ आपन कॉपी हम झिंगन के दुकाने जात हई चीनी लेवे ।

गोपाल जहां श्रीनाथ के मेहमान नवाज़ी के इस बेधड़क अंदाज से स्तब्ध रह गया। उनके इस तेवर से गोपाल को सहसा मिर्ज़ा ग़ालिब की एक ग़ज़ल की लाइनें याद हो आई –

इक खेल है औरंग ए सुलेमां मिरे नजदीक; इक बात है एजाज ए मसीहा मिरे आगे

होता है निहाँ गर्द में सहरा मिरे होते ; घिसता है जबीं खाक पे दरिया मिरे आगे

जुज़ नाम नहीं हस्ती ए आलम मुझे मंजूर ; जुज़ वहम नहीं हस्ती ए अशिया मिरे आगे

गो हाथ में जुंबिश नहीं आँखों में तो दम है; रहने दो अभी साग़र ओ मीना मेरे आगे

उनकी पत्नी कुछ सकुचा गईं। बोलीं- अरे बनाइत न । एतने दिन पे आयल हयन त खाली तोहीं बतियाइबा, हम न बतियाइब । बस 10 मिनट मे बनावत हई।

लेकिन गोपाल ने बहुत आग्रह करके मना कर दिया। दिवाली की मिठाई ज्यादा खा लेने और पेट भरे होने आदि का बहाना बना कर पकौड़ी न बनाने को राजी कर लिया । बोला चाची आज कमरा साफ करने आए थे, अभी काम बाकी है, चलने दीजिए। दिवाली के दिन फिर आएंगे, खूब पड़ाका छोड़ाई करेंगे, मिठाई खाएँगे और अगले जनम में छछूंदर का जनम टालने वाला सूरन का भर्ता भी।

तभी उसकी नज़र श्रीनाथ के बिस्तर के बराबर में रखे मेज पर गई जहां कुछ मुड़ी तुड़ी कॉमिक्स और बच्चों की मैगजीन बेतरतीब रहीं थीं। उसे दस बारह साल पुराना कॉमिक्स वाचन याद आ गया। उसने जैसे ही कहा, अरे वाह चाचा अभी भी कॉमिक्स पढ़ते हैं, श्रीनाथ की पत्नी बोल पड़ीं – पढ़ तअ नाहीं पउतन , खाली देख ले लन। श्रीनाथ ने इस पर लगभग अस्पष्ट और काँपते स्वर में कड़ी प्रतिक्रिया दी – सुन, जब बोलब तब्बै मनबी कि पढ़त हई । और तुरंत फिर गोपाल को कॉपी पर लिखकर दिखाया – ,” बेटा अब मन में पढ़ लेते हैं। इस गँवार को लगता है कि हम खाली कार्टून देख रहे हैं।” और धीरे धीरे पत्नी की तरफ देख हंसने लगे ।

गोपाल ऐसी जिजीविषा देख दंग रह गया। फिर उसने कहा चाची तब परसों बड़ी दिवाली और गोवर्धन पूजा दोनों दिन फिर आऊँगा, आप अच्छे से चाचा का ख्याल रखिए। मेरे लायक कोई भी काम हो तो बेहिचक बताइएगा। यह रहा मेरा कार्ड इसमें मोबाइल नं है। भगवान की मर्ज़ी पे किसका वश चलता है। भले ही किस्मत ने ब्रेन हैमरेज की परेशानी दे दी लेकिन संतोष इस बात का है कि इतनी विपदा के बाद भी चाचा का अंवरागेटा एकदम सही है। देखिए ! क्या बढ़िया लिखते हैं, ज़िंदादिली से कोई समझौता नहीं-कहते हुए उठकर उसने श्रीनाथ की गरदन के पिछले हिस्से को हल्के से सहला दिया । ये सुनते ही श्रीनाथ के साथ तीनों ठहाका मार कर हँसने लगे। श्रीनाथ ने गोपाल का हाथ पकड़कर अपनी तरफ खींचा और कुछ अस्पष्ट ध्वनि में , जीय जीय सरऊ मज़ाक उड़ावत हऊवा हमार, कहते हुए उसकी पीठ पर एक प्यार भरा धौल जमा दिया

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कुंदन यादव भारतीय राजस्व सेवा के 2007 बैच के अधिकारी हैं. ठेठ बनारसी हैं या यूं कहें कि बनारस उनकी रगों में है. बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में डिग्रियां हासिल की है. सन 2003-04 में फुलब्राइट स्कॉलरशिप के तहत अमेरिका में विजिटिंग लेक्चरर के तौर पर इलिनॉय विश्वविद्यालय, शिकागो में हिंदी का अध्यापन भी कर चुके हैं। समकालीन स्थितियों पर मारक व्यंग्य उनके लेखन में दिखता है. संप्रति :- केंद्रीय प्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड नई दिल्ली में ज्वाइंट कमिश्नर पद पर कार्यरत संपर्क:-ईमेल :kundanyadav@gmail.com मोबाइल : 07905664743

7 thoughts on “अंवरागेटा और सिरी – कुंदन यादव की कहानी

  1. बचपन से ही गाँव में कुछ ऐसे लोग होते थे जो अङ्ग्रेज़ी शब्दों का जबर्दस्त इस्तेमाल करके या चोर बाज़ार से खरीदी नकली इंपोर्टेड चीजों का प्रयोग करके भौकाल कायम करते थे। वे लोग वास्तव में शरीफ और भोले होते थे लेकिन थोड़े बड़बोले। उन सभी अकिंचन होते हुए भी अकिंचनता से दूर रहने वालों की कहानी है यह अंवरागेटा और सिरी। बेजोड़ लेखन और जबरजस्त संवाद अदायगी के साथ घनीभूत जिजीविषा को महसूस करने वाली कहानी। सिरी चाचा का कॉमिक्स वाचन तो हंसा हंसा कर बेदम कर देने वाला है। कुन्दन जी को साधुवाद। उनसे बस यही कहना है , कहाँ थे अब तक महाराज ? और लिखिए , खूब लिखिए।

  2. बहुत ही सुंदर रचना है यादव जी। मैंने भी एक कॉमिक्स सिरी चाचा की तरह बोल बोल कर पढ़ा। मज़ा आ गया। अंवरागेटा, इंपोर्टेड दाल, जापानी चाकू और समुराई के साथ साथ डेढ़ इंची पुरवा का जिक्र और बाल सखा के पान पर नौकरी कुर्बान। वाह रे सिरी। ऐसे ही लिखें जनाब।

  3. Very nice story Mr Yadav. Now a days we are not getting such refreshing and emotional stories in magazines. Aapse guzarish hai ki Srilal Shukl ji ki kami ko poora kariye. is website pe aapki sabhee kahaniyan bejod hain.

  4. बहुत ही शानदार और मौलिक रचना। सभी पात्र इस तरह से किस्सागोई करते हैं कि जैसे सामने सबकुछ घट रहा हो। कहानी में कोई लफ़्फ़ाज़ी नहीं फालतू का वितंडावाद नहीं। शब्द दर शब्द बहुत ही उपयोगी और सबसे बढ़कर सिरी के तेवर। एक निचले मध्यवर्ग के व्यक्ति को भी सम्मान से जीने का हक है।

  5. गुरर गुरर , अरे बाप रे भागो ये तो रॉकेट है , कर र र रच कर र र र ब ,गुरर गुरर , भौं भौं , ठाक तड़ाक , बू हू हू हू – यम यम। बचपन से हम सब कॉमिक्स पढ़ते रहे। असली मज़ा अब आया है। इया राजा कुक्कुर होय त आइसन की तर्ज पर मैं इतना ही कहूँगा की कहानी होय त आइसन। बहुत धन्यवाद। जनाब एक उपन्यास काहे नहीं लिखते?

  6. पहले अपनी प्रिय सूक्ति दोहरा लूँ, “एक बनारसी बनारस से निकल सकता है लेकिन एक बनारसी से बनारस कभी नहीं निकलता। ” कुंदन जी देश विदेश सब जगहों से हो आये लेकिन भीतर बनारस जस का तस बना हुआ है। अविरल बहती गंगा माँ से सीखा है कहानी कहने का हुनर,गंगा के इस बेटे ने। कथन शैली हो या फिर कथ्य,साधारणपन असाधारण बन कर आता है यहाँ।

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