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खानाबदोश

अनुमानित समय : 15 मिनट-

सुकिया के  हाथ की पथी कच्ची ईंटें पकने के  लिए भट्टे में लगाई जा रही थीं। भट्टे के गलियारे में झरोखेदार कच्ची ईंटों की दीवार देखकर सुकिया आत्मिक सुख से भर गया था। देखते-ही-देखते हजारों ईंटें भट्टे के गलियारे में समा गई थीं। ईंटों के बीच खाली जगह में पत्थर का कोयला, लकड़ी, बुरादा, गन्ने की बाली भर दिए गए थे। असगर ठेकेदार ने अपनी निगरानी में हर चीज तरतीब से लगवाई थी। आग लगाने से पहले भट्टा-मालिक मुखतार सिंह ने एक-एक चीज का मुआयना किया था। चौबीसों घंटे की ड्यूटी पर मजदूरों को लगाया गया था, जो मोरियों से भट्टे में कोयला, बुरादा आदि डाल रहे थे। भट्टे का सबसे खतरेवाला काम था मोरी पर काम करना। थोड़ी-सी असावधानी भी मौत का कारण बन सकती थी। भट्टे की चिमनी धुआँ उगलने लगी थी। यह धुआँ मीलों दूर से दिखाई पड़ जाता था। हरे-भरे खेतों के  बीच गहरे मटमैले रंग का यह भट्टा एक धब्बे जैसा दिखाई पड़ता था। मानो और सुकिया महीना भर पहले ही इस भट्टे पर आए थे, दिहाड़ी मजदूर बनकर। हफ्ते भर का काम देखकर असगर ठेकेदार ने सुकिया से कहा था कि साँचा ले लो और ईंट पाथने का काम शुरू करो। हजार ईंट के रेट से अपनी मजदूरी लो। भट्टे पर लगभग तीस मजदूर थे जो वहीं काम करते थे। भट्टा-मालिक मुखतार सिंह और असगर ठेकेदार साँझ होते ही शहर लौट जाते थे। शहर से दूर, दिनभर की गहमा-गहमी के बाद यह भट्टा अँधेरे की गोद में समा जाता था।

एक कतार में बनी छोटी-छोटी झोंपड़ियों में टिमटिमाती ढिबरियाँ भी इस अँधेरे से लड़ नहीं पाती थीं। दड़बेनुमा झोंपड़ियों में झुककर घुसना पड़ता था। झुके -झुके ही बाहर आना होता था। भट्टे का काम खत्म होते ही औरतें चूल्हा-चौका सँभाल लेती थीं। कहने भर के लिए चूल्हा-चौका था। ईंटों को जोड़कर बनाए चूल्हे में जलती लकड़ियों की चिट-पिट जैसे मन में पसरी दुश्चिंताओं और तकलीफों की प्रतिध्वनियाँ थीं जहाँ सब कुछ अनिश्चित था। मानो अभी तक इस भट्टे की ज़िंदगी से तालमेल नहीं बैठा पाई थी। बस, सुकिया की जिद के सामने वह कमजोर पड़ गई थी। साँझ होते ही सारा माहौल भाँय-भाँय करने लगता था। दिनभर के थके-हारे मजदूर अपने-अपने दड़बों में घुस जाते थे। साँप-बिच्छू का डर लगा रहता था। जैसे समूचा जंगल झोंपड़ी के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया हो। ऐसे माहौल में मानो का जी घबराने लगता था। लेकिन करे भी तो क्या, न जाने कितनी बार सुकिया से कहा था मानो ने, अपने देस की सूखी रोटी भी परदेस के पकवानों से अच्छी होती है। ̧सुकिया के मन में एक बात बैठ गई थी। नर्क की ज़िंदगी से निकलना है तो कुछ छोड़ना भी पड़ेगा। मानो की हर बात का एक ही जवाब था उसके पास- बडे़-बूढे़ कहा करे हैं कि आदमी की औकात घर से बाहर कदम रखणे पे ही पता चले है। घर में तो चूहा भी सूरमा बणा रह। काँधे पर यो लंबा लट्ठ धरके चलणें वाले चौधरी सहर; शहर में सरकारी अफसरों के आग्गे सीध्धे खडे़ न हो सके हैं। बुड्ढी बकरियों की तरह मिमियाएँ हैं…और गाँव में किसी गरीब को आदमी भी न समझे हैं…’

    सुकिया की इन बातों से मानो कमजोर पड़ जाती थी। इसीलिए गाँव-देहात छोड़कर वे दोनों एक दिन असगर ठेकेदार के साथ इस भट्टे पर आ गए थे। पहले ही महीने में सुकिया ने कुछ रुपये बचा लिए थे। कई-कई बार गिनकर तसल्ली कर ली थी। धोती की गाँठ में बाँधकर अंटी में खोंस लिए थे। रुपये देखकर मानो भी खुश हो गई थी। उसे लगने लगा था कि वह अपनी ज़िंदगी के ढर्रे को बदल लेगा।

सुकिया और मानो की ज़िंदगी एक निश्चित ढर्रे पर चलने लगी थी। दोनों मिलकर पहले तगारी बनाते, फिर मानो तैयार मिट्टी लाकर देती। इस काम में उनके साथ एक तीसरा मजदूर भी आ गया था। नाम था जसदेव। छोटी उम्र का लड़का था। असगर ठेकेदार ने उसे भी उनके साथ काम पर लगा दिया था। इससे काम में गति आ गई थी। मानो भी अब फुर्ती से साँचे में ईंटें डालने लगी थी, जिससे उनकी दिहाड़ी बढ़ गई थी।

उस रोज मालिक मुखतार सिंह की जगह उनका बेटा सूबे सिंह भट्टे पर आया था। मालिक कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर चले गए थे। उनकी गैरहाजिरी में सूबेसिंह का रौब-दाब भट्टे का माहौल ही बदल देता था। इन दिनों में असगर ठेकेदार भीगी बिल्ली बन जाता था। दफ्तर के बाहर एक अर्दली की ड्यूटी लग जाती थी, जो कुर्सी पर उकड़ू  बैठकर दिनभर बीड़ी पीता था, आने-जानेवालों पर निगरानी रखता था। उसकी इजाज़त के बगैर कोई अंदर नहीं जा सकता था।

        एक रोज सूबेसिंह की नजर किसनी पर पड़ गई। तीन महीने पहले ही किसनी और महेश भट्टे पर आए थे। पाँच-छः महीने पहले ही दोनों की शादी हुई थी। सूबेसिंह ने उसे दफ्तर की सेवा-टहल का काम दे दिया था। शुरू-शुरू में किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया था। लेकिन जब रोज ही गारे-मिट्टी का काम छोड़कर वह दफ्तर में ही रहने लगी तो मजदूरों में फुसफुसाहटें शुरू हो गई थीं। तीसरे दिन सुबह जब मजदूर काम शुरू करने के  लिए झोंपड़ियों से बाहर निकल रहे थे, किसनी हैंडपंप के नीचे खुले में बैठकर साबुन से रगड़-रगड़कर नहा रही थी। भट्टे पर साबुन किसी के पास नहीं था। साबुन और उससे उठते झाग पर सबकी नजर पड़ गई थी। लेकिन बोला कोई कुछ भी नहीं था। सभी की आँखों में शंकाओं के गहरे काले बादल घिर आए थे। कानाफूसी हलके -हलके शुरू हो गई थी।

        महेश गुमसुम-सा अलग-अलग रहने लगा था। साँवले रंग की भरे-पूरे जिस्म की किसनी का व्यवहार महेश के लिए दुःखदाई हो रहा था। वह दिन-भर दफ्तर में घुसी रहती थी। उसकी खिलखिलाहटें दफ्तर से बाहर तक सुनाई पड़ने लगी थीं। महेश ने उसे समझाने की कोशिश की थी। लेकिन वह जिस राह पर चल पड़ी थी वहाँ से लौटना मुश्किल था।

        भट्टे की ज़िंदगी भी अजीब थी। गाँव-बस्ती का माहौल बन रहा था। झोंपड़ी के बाहर जलते चूल्हे और पकते खाने की महक से भट्टे की नीरस ज़िंदगी में कुछ देर के लिए ही सही, ताजगी का अहसास होता था। ज्यादातर लोग रोटी के साथ गुड़ या फिर लाल मिर्च की चटनी ही खाते थे। दाल-सब्जी तो कभी-कभार ही बनती थी। शाम होते ही हैंडपंप पर भीड़ लग जाती थी। जिस्म पर चिपकी मिट्टी को जितना उतारने की कोशिश करते, वह और उतना ही भीतर उतर जाती थी। नस-नस में कच्ची मिट्टी की महक बस गई थी। इस महक से अलग भट्टे का कोई अस्तित्व नहीं था।

        किसनी और सूबेसिंह की कहानी अब काफी आगे बढ़ गई थी। सूबेसिंह के अर्दली ने महेश को शराब की लत डाल दी थी। शराब पीकर महेश झोंपड़ी में पड़ा रहता था। किसनी के पास एक ट्रांजिस्टर भी आ गया था। सुबह-शाम भट्टे की खामोशी में ट्रांजिस्टर की आवाज गूँजने लगी थी। ट्रांजिस्टर वह इतने जोर से बजाती थी कि भट्टे का वातावरण फिल्मी गानों की आवाज से गमक उठता था। शांत माहौल में संगीत-लहरियों ने खनक पैदा कर दी थी।

         कड़ी मेहनत और दिन-रात भट्टे में जलती आग के बाद जब भट्टा खुलता था तो मजदूर से लेकर मालिक तक की बेचैन साँसों को राहत मिलती थी। भट्टे से पकी ईंटों को बाहर निकालने का काम शुरू हो गया था। लाल-लाल पक्की ईंटों को देखकर सुकिया और मानो की खुशी की इंतहा नहीं थी। खासकर मानो तो ईंटों को उलट-पुलटकर देख रही थी। खुद के हाथ की पथी ईंटों का रंग ही बदल गया था। उस दिन ईंटों को देखते-देखते ही मानो के मन में बिजली की तरह एक खयाल कौंधा था। इस खयाल के आते ही उसके भीतर जैसे एक साथ कई-कई भट्टे जल रहे थे। उसने सुकिया से पूछा था, एक घर में कितनी ईंटें लग जाती हैं?

बहुत…कई हजार…लोहा, सीमेंट, लकड़ी, रेत अलग से। ̧उसके मन में खयाल उभरा था। उसे तत्काल कोई आधार नहीं मिल पा रहा था। वह बेचैन हो उठी थी।

        उसे खामोश देखकर सुकिया ने कहा, चलो, काम शुरू करना है। जसदेव बाट देख रहा होगा। ̧ सुकिया के  पीछे-पीछे अनमनी ही चल दी थी मानो, लेकिन उसके दिलो-दिमाग पर ईंटों का लाल रंग कुछ ऐसे छा गया था कि वह उसी में उलझकर रह गई थी।

        झींगुरों की झिन-झिन और बीच-बीच में सियारों की आवाजें रात के सन्नाटे में स्याहपन घोल रही थीं। थके-हारे मजदूर नींद की गहरी खाइयों में लुढ़क गए थे। मानो के खयालों में अभी भी लाल-लाल ईंटें घूम रही थीं। इन ईंटों से बना हुआ एक छोटा-सा घर उसके जेहन में बस गया था। यह खयाल जिस शिद्दत से पुख्ता हुआ था, नींद उतनी ही दूर चली गई थी।

        दूर किसी बस्ती से हलके-हलके छनकर आती मुर्गे की बाँग, रात के आखिरी पहर के अहसास के साथ ही मानो की पलकें नींद से भारी होने लगी थीं। सुबह के जरूरी कामों से निबटकर जब सुकिया ने झोंपड़ी में झाँका तो वह हैरान रह गया था। इतनी देर तक मानो कभी नहीं सोती। वह परेशान हो गया था। गहरी नींद में सोई मानो का माथा उसने छूकर देखा, माथा ठंडा था। उसने राहत की साँस ली। मानो को जगाया, कितना दिन चढ़ गया है….उठने का मन नहीं है?  मानो अनमनी-सी उठी। कुछ देर यूँ ही चुपचाप बैठी रही। मानो का इस तरह बैठना सुकिया को अखरने लगा था, आज क्या बात है?…जी तो ठीक है?  मानो अपने खयालों में गुम थी। मन की बात बाहर आने के  लिए छटपटा रही थी। उसने सुकिया की ओर देखते हुए पूछा, क्यों जी…क्या हम इन पक्की ईंटों पर घर नहीं बणा सके हैं?  मानो की बात सुनकर सुकिया आश्चर्य से उसे ताकने लगा। कल की बात वह भूल चुका था। सुकिया ने गहरे अवसाद से भरकर कहा, पक्की ईंटों का घर दो-चार रुपये में ना बणता है।…इत्ते ढेर-से नोट लगे हैं घर बणाने में। गाँठ में नहीं है पैसा, चले हाथी खरीदने। महीनेभर में जो हमने इत्ती ईंटें बणा दी हैं…क्या अपणे लिए हम ईंटें ना बणा सके हैं? मानो ने मासूमियत से कहा। यह भट्टा मालिक का है। हम ईंटें उनके लिए बणाते हैं। हम तो मजदूर हैं। इन ईंटों पर अपणा कोई हक ना है। सुकिया ने अपने मन में उठते दबाव को महसूस किया।

         इन ईंटों पर म्हारा कोई भी हक ना है…क्यूँ… ̧, मानो ने ताज्जुब भरी कड़वाहट से कहा। उसके अंदर बवंडर मचल रहा था। कुछ देर की खामोशी के बाद मानो बोली, हर महीने कुछ और बचत करें…ज्यादा ईंटें बनाएँ…तब?… तब भी अपणा घर नहीं बणा सकते?  अपने भीतर कुलबुलाते सवालों को बाहर लाना चाहती थी मानो। इतनी मजदूरी मिलती कहाँ है? पूरे महीने हाड़-गोड़ तोड़ के भी कितने रुपये बचे! कुल अस्सी। एक साल में एक हजार ईंटों के दाम अगर हमने बचा भी लिए तो घर बणाने लायक रुपया जोड़ते-जोड़ते उम्र निकल जागी। फेर भी घर ना बण पावेगा। सुकिया ने दुखी मन से कहा। अगर हम रात-दिन काम करें तो भी नहीं?  मानो ने उत्साह में भरकर कहा। बावली हो गई है क्या?…चल उठ…चल, काम पे जाणा है। टेम ज्यादा हो रहा है। ठेकेदार आता ही होगा। आज पूरब की टाँग काटनी है लगार के लिए। सुकिया मानो के सवालों से घबरा गया था। उठकर बाहर जाने लगा। कुछ भी करो…तुम चाहो तो मैं रात-दिन काम करूँगी…मुझे एक पक्की ईंटों का घर चाहिए। अपने गाँव में…लाल-सुर्ख ईंटों का घर। ̧ मानो के भीतर मन में हजार-हजार वसंत खिल उठे थे।

         सुकिया और मानो को एक लक्ष्य मिल गया था। पक्की ईंटों का घर बनाना है…अपने ही हाथ की पकी ईंटों से। सुबह होते ही काम पर लग जाते हैं और शाम को भी अँधेरा होने तक जुटे रहते हैं। ठेकेदार असगर से लेकर मालिक तक उनके  काम से खुश थे।

         सूबेसिंह किसनी को शहर भी लेकर जाने लगा था। किसनी के रंग-ढंग में बदलाव आ गया था। अब वह भट्टे पर गारे-मिट्टी का काम नहीं करती थी। महेश रोज रात में शराब पीकर मन की भड़ास निकालता था। दिन में भी अपनी झोंपड़ी में पड़ा रहता था या इधर-उधर बैठा रहता था। किसनी कई-कई दिनों तक शहर से लौटती नहीं थी। जब लौटती थकी, निढाल और मुरझाई हुई। कपड़ों-लत्तों की अब कमी नहीं थी।

         उस रोज सूबेसिंह ने भट्टे पर आते ही असगर ठेकेदार से कहा था, मानो को दफ्तर में बुलाओ, आज किसनी की तबीयत ठीक नहीं है। असगर ठेकेदार ने रोकना चाहा था, छोटे बाबू मानो को… बात पूरी होने से पहले ही सूबेसिंह ने उसे फटकार दिया था, तुमसे जो कहा गया है, वही करो। राय देने की कोशिश मत करो। तुम इस भट्टे पर मुंशी हो। मुंशी ही रहो, मालिक बनने की कोशिश करोगे तो अंजाम बुरा होगा। असगर ठेकेदार की घिघ्घी बँध गई थी। वह चुपचाप मानो को बुलाने चल दिया था।

         असगर ठेकेदार ने आवाज देकर कहा था, मानो, छोटे बाबू बुला रहे हैं दफ्तर में। मानो ने सुकिया की ओर देखा। उसकी आँखों में भय से उत्पन्न कातरता थी। सुकिया भी इस बुलावे पर हड़बड़ा गया था। वह जानता था। मछली को फँसाने के लिए जाल फेंका जा रहा है। गुस्से और आक्रोश से नसें खिंचने लगी थीं। जसदेव ने भी सुकिया की मनःस्थिति को भाँप लिया था। वह फुर्ती से उठा। हाथ-पाँव पर लगी गीली मिट्टी छुड़ाते हुए बोला, तुम यहीं ठहरो…मैं देखता हूँ। चलो चाचा। असगर के पीछे-पीछे चल दिया। असगर ठेकेदार जानता था कि सूबेसिंह शैतान है। लेकिन चुप रहना उसकी मजबूरी बन गई थी। ज़िंदगी का खास हिस्सा उसने भट्टे पर गुजारा था। भट्टे से अलग उसका कोई वजूद ही नहीं था।

         असगर ठेकेदार के साथ जसदेव को आता देखकर सूबेसिंह बिफर पड़ा था। तुझे किसने बुलाया है? जी…जो भी काम हो बताइए…मैं कर दूँगा।…  जसदेव ने विनम्रता से कहा।

क्यों? तू उसका खसम है…या उसकी …पर चर्बी चढ़ गई है? सूबेसिंह ने अपशब्दों का इस्तेमाल किया।

बाबू जी…आप किस तरह बोल रहे हैं… , जसदेव के बात पूरी करने से पहले ही एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके गाल पर पड़ा। साले…भट्टे की आग में झोंक दूँगा…किसी को पता भी नहीं चलेगा। हड्डियाँ तक नहीं मिलेंगी राख से… समझा। सूबेसिंह ने उसे धकिया दिया। जसदेव गिर पड़ा था। जब तक वह सँभल पाता। लात-घूंसों से सूबेसिंह ने उसे अधमरा कर दिया था। चीख-पुकार सुनकर मजदूर उनकी ओर दौड़ पड़े थे। मजदूरों को एक साथ आता देखकर सूबेसिंह जीप में बैठ गया था। देखते-ही-देखते जीप शहर की ओर दौड़ गई थी। असगर ठेकेदार दफ्तर में जा घुसा था।

      सुकिया और मानो जसदेव को उठाकर झोंपड़ी में ले गए थे। वह दर्द से कराह रहा था। मानो ने उसकी चोटों पर हल्दी लगा दी थी। सुकिया गुस्से में काँप रहा था। मानो के अवचेतन में असंख्य अँधेरे नाच रहे थे। वह किसनी नहीं बनना चाहती थी। इज्जत की ज़िंदगी जीने की अदम्य लालसा उसमें भरी हुई थी। उसे एक घर चाहिए था।  पक्की ईंटों का, जहाँ वह अपनी गृहस्थी और परिवार के  सपने देखती थी।

      समूचा दिन अदृश्य भय और दहशत में बीता था। जसदेव को हलका बुखार हो गया था। वह अपनी झोंपड़ी में पड़ा था। सुकिया उसके पास बैठा था। आज की घटना से मजदूर डर गए थे। उन्हें लग रहा था कि सूबेसिंह किसी भी वक्त लौटकर आ सकता है। शाम होते ही भट्टे पर सन्नाटा छा गया था। सब अपने-अपने खोल में सिमट गए थे। बूढ़ा बिलसिया जो अकसर बाहर पेड़ के नीचे देर रात तक बैठा रहता था, आज शाम होते ही अपनी झोंपड़ी में जाकर लेट गया था। उसके खाँसने की आवाज भी आज कुछ धीमी हो गई थी। किसनी की झोंपड़ी से ट्रांजिस्टर की आवाज भी नहीं आ रही थी। बीच-बीच में हैंडपंप की खंच-खंच ध्वनि इस खामोशी में विघ्न डाल रही थी। पंप जसदेव की झोंपड़ी के ठीक सामने था। सभी को पानी के लिए इस पंप पर आना पड़ता था। भट्टे पर दवा-दारू का कोई इंतजाम नहीं था। कटने-फटने पर घाव पर मिट्टी लगा देना था। कपड़ा जलाकर राख भर देना ही दवाई की जगह काम आते थे।

     मानो ने अधूरे मन से चूल्हा जलाया था। रोटियाँ सेंककर सुकिया के सामने रख दी थी। सुकिया ने भी अनिच्छा से एक रोटी हलक के  नीचे उतारी थी। उसकी भूख जैसे अचानक मर गई थी। मानो को लेकर उसकी चिंता बढ़ गई थी। उसने निश्चय कर लिया था वह मानो को किसनी नहीं बनने देगा। मानो भी गुमसुम अपने आपसे ही लड़ रही थी। बार-बार उसे लग रहा था कि वह सुरक्षित नहीं है। एक सवाल उसे खाए जा रहा थाμ क्या औरत होने की यही सजा है। वह जानती थी कि सुकिया ऐसा-वैसा कुछ नहीं होने देगा। वह महेश की तरह नहीं है। भले ही यह भट्टा छोड़ना पड़े। भट्टा छोड़ने के  खयाल से ही वह सिहर उठी। नहीं…भट्टा नहीं छोड़ना है। उसने अपने आपको आश्वस्त किया, अभी तो पक्की ईंटों का घर बनाना है।

     मानो रोटियाँ लेकर बाहर जाने लगी तो सुकिया ने टोका, ‘कहाँ जा रही है?’  ‘जसदेव भूखा-प्यासा पड़ा है। उसे रोट्टी देणे जा रही हूँ।‘ मानो ने सहज भाव से कहा।

‘बामन तेरे हाथ की रोट्टी खावेगा।…अक्ल मारी गई तेरी’ ̧ सुकिया ने उसे रोकना चाहा।

‘क्यों मेरे हाथ की रोट्टी  में जहर लगा है?’ ̧ मानो ने सवाल किया। पल-भर रुककर बोली, बामन नहीं भट्टा मजदूर है वह…म्हारे जैसा। ̧

चारों तरफ सन्नाटा था। जसदेव की झोंपड़ी में ढिबरी जल रही थी। मानो ने झोंपड़ी का दरवाजा ठेला ‘जी कैसा है?’ ̧ भीतर जाते हुए मानो ने पूछा। जसदेव ने उठने की कोशिश की। उसके  मुँह से दर्द की आह निकली।

‘कमबख्त कीड़े पड़ के मरेगा। हाथ-पाँव टूट-टूटकर गिरेंगे…आदमी नहीं जंगली जिनावर है।‘ मानो ने सूबेसिंह को कोसते हुए कहा।

जसदेव चुपचाप उसे देख रहा था।

‘यह ले…रोट्टी  खा ले। सुबे से भूखा है। दो कौर पेट में जाएँगे तो ताकत तो आवेगी बदन में’, मानो ने रोटी और गुड़ उसके  आगे रख दिया था। जसदेव कुछ अनमना-सा हो गया था। भूख तो उसे लगी थी। लेकिन मन के  भीतर कहीं हिचक थी। घर-परिवार से बाहर निकले ज्यादा समय नहीं हुआ था। खुद वह कुछ भी बना नहीं पाया था। शरीर का पोर-पोर टूट रहा था।

‘भूख नहीं है।‘ जसदेव ने बहाना किया।

‘भूख नहीं है या कोई और बात है’… ̧ मानो ने जैसे उसे रंगे हाथों पकड़ लिया था।

‘और क्या बात हो सकती है?’ जसदेव ने सवाल किया।

‘तुम्हारे भइया कह रहे थे कि तुम बामन हो…इसीलिए मेरे हाथ की रोटी नहीं खाओगे। अगर यो बात है तो मैं जोर ना डालूँगी…थारी मर्जी…औरत हूँ…पास में कोई भूखा हो…तो रोटी का कौर गले से नीचे नहीं उतरता है।…फिर तुम तो दिन-रात साथ काम करते हो…, मेरी खातिर पिटे…फिर यह बामन म्हारे बीच कहाँ से आ गया…?’ मानो रुआँसी हो गई थी। उसका गला रुँध गया था। रोटी लेकर वापस लौटने के लिए मुड़ी। जसदेव में साहस नहीं था उसे रोक लेने के  लिए। उनके  बीच जुड़े तमाम सूत्र जैसे अचानक बिखर गए थे।

       अपनी झोंपड़ी में आकर चुपचाप लेट गई थी मानो। बिना कुछ खाए। दिन-भर की घटनाएँ उसके दिमाग में खलबली मचा रही थीं। जसदेव भूखा है, यह अहसास उसे परेशान कर रहा था। जसदेव को लेकर उसके मन में हलचल थी। उसे लग रहा था जैसे जसदेव का साथ उन्हें ताकत दे रहा है। ऐसी ताकत जो सूबेसिंह से लड़ने में हौसला दे सकती है। दो से तीन होने का सुख मानो महसूस करने लगी थी। सुकिया भी चुपचाप लेटा हुआ था। उसकी भी नींद उड़ चुकी थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था, क्या करे, इन्हीं हालात में गाँव छोड़ा था। वे ही फिर सामने खड़े थे। आखिर जाएँ तो कहाँ? सूबेसिंह से पार पाना आसान नहीं था। सुनसान जगह है कभी भी हमला कर सकता है। या फिर मानो को…विचार आते ही वह काँप गया था। उसने करवट बदली। मानो जाग रही थी। उसे अपनी ओर खींचकर सीने से चिपटा लिया था।

       जसदेव ने भी पूरी रात जागकर काटी थी। सूबेसिंह का गुस्सैल चेहरा बार-बार सामने आकर दहशत पैदा कर रहा था। उसे लगने लगा था कि जैसे वह अचानक किसी षड्यंत्र में फँस गया है। उसे यह अंदाजा नहीं था कि सूबेसिंह मारपीट करेगा। ऐसी कल्पना भी उसे नहीं थी। वह डर गया था। उसने तय कर लिया था, कि चाहे जो हो, वह इस पचड़े में नहीं पड़ेगा। सुबह होते ही वह असगर ठेकेदार से मिला था। असगर ही उसे शहर से अपने साथ लाया था। जसदेव ने असगर ठेकेदार से अपने मन की बात कही। ठेकेदार ने उसे समझाते हुए कहा था, ‘अपने काम से काम रखो। क्यों इन चमारों* के चक्कर में पड़ते हो।‘

       जसदेव के बदले हुए व्यवहार को मानो ने ताड़ लिया था। लेकिन उसने कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की थी। वह सहजता से अपने काम में लगी थी। वह जानती थी कि उनके बीच एक फासला आ गया है। लेकिन वह चुप थी। सूबेसिंह को भी लगने लगा था कि मानो को फुसलाना आसान नहीं है। उसकी तमाम कोशिश निरर्थक साबित हुई थी। इसीलिए वह मानो और सुकिया को परेशान करने पर उतर आया था। उसने असगर ठेकेदार से भी कह दिया था कि उससे पूछे बगैर उन्हें मजदूरी का भुगतान न करे, न कोई रियायत ही बरते उनके साथ।

       मानो से कुछ छुपा नहीं था। सूबेसिंह की हरकतों पर उसकी नजर थी। उसने अपने आप में निश्चय कर लिया था कि वह उसका मुकाबला करेगी। उठते-बैठते उसके मन में एक ही खयाल था। पक्की ईंटों का घर बनवाना है। लेकिन सूबेसिंह इस खयाल में बाधक बन रहा था। सुकिया और मानो दिन-रात काम में जुटे थे। फिर भी हर महीने वे ज्यादा कुछ बचा नहीं पा रहे थे। पिछले दिनों उन्होंने दुगुनी ईंटें पाथी थीं। उनके उत्साह में कोई कमी नहीं थी। एक ही उद्देश्य था- पक्की ईंटों का घर बनाना है। इसीलिए सूबेसिंह की ज्यादतियों को वे सहन कर रहे थे। लेकिन एक तड़प थी दोनों में, जो उन्हें सँभाले हुए थी।

        सूबेसिंह नित नए बहाने ढूँढ़ लेता था, उन्हें तंग करने के, एक शीत युद्ध जारी था उनके बीच, सुकिया से ईंट पाथने का साँचा वापस ले लिया गया था। उसे भट्टे की मोरी का काम दे दिया था। मोरी का काम खतरनाक था। मानो डर गई थी। लेकिन सुकिया ने उसे हिम्मत बँधाई थी, ‘काम से क्यूँ डरना…।‘ सुकिया का साँचा जसदेव को दे दिया गया था। साँचा मिलते ही जसदेव के रंग बदल गए थे। वह मानो पर हुक्म चलाने लगा था। मानो चुपचाप काम में लगी रहती थी।

‘कल तड़के ईंट पाथनी है। ईंटें हटाकर जगह बना दे।‘ जसदेव आदेश देकर अपनी झोंपड़ी की ओर चला गया था। मानो ने पाथी ईंटों को दीवार की शक्ल में लगा दिया था। कच्ची ईंटों को सुखाने के लिए दो, खड़ी दो आड़ी ईंटें रखकर जालीदार दीवार बना दी थी। ईंट पाथने की जगह खाली करके ही मानो लौटकर झोंपड़ी में गई थी। हैंडपंप पर भीड़ थी। सभी मजदूर काम खत्म करके हाथ-मुँह धोने के लिए आ गए थे।

     सुबह होने से पहले ही मानो उठ गई थी। उसे काम पर जाने की जल्दी थी। चारों तरफ अँधेरा था। सुबह होने का वह इंतजार करना नहीं चाहती थी। उसने जल्दी-जल्दी सुबह के काम निबटाए और ईंट पाथने के लिए निकल पड़ी थी। सूरज निकलने में अभी देर थी। जसदेव से पहले ही वह काम पर पहुँच जाती थी। इक्का-दुक्का मजदूर ही इधर-उधर दिखाई पड़ रहे थे। वह तेज कदमों से ईंट पाथने की जगह पर पहुँच गई थी। वहाँ का दृश्य देखकर अवाक रह गई थी। सारी ईंटें टूटी-फूटी पड़ी थीं। जैसे किसी ने उन्हें बेदर्दी से रौंद डाला था। ईंटों की दयनीय अवस्था देखकर उसकी चीख निकल गई थी। वह दहाड़ें मार-मारकर रोने लगी थी। आवाज सुनकर मजदूर इकट्ठा हो गए थे। जितने मुँह उतनी बातें, सब अपनी-अपनी अटकलें लगा रहे थे। रात में आँधी-तूफान भी नहीं आया था। न ही किसी जंगली जानवर का ही यह काम हो सकता है। कई लोगों का कहना था, किसी ने जान-बूझकर ईंटें तोड़ी हैं।

     मानो का हृदय फटा जा रहा था। टूटी-फूटी ईंटों को देखकर वह बौरा गई थी। जैसे किसी ने उसके पक्की ईंटों के मकान को ही धराशाई कर दिया था। जसदेव काफी देर बाद आया था। वह निरपेक्ष भाव से चुपचाप खड़ा था। जैसे इन टूटी-फूटी ईंटों से उसका कुछ लेना-देना ही न हो। सुकिया भी हो-हल्ला सुनकर मोरी का काम छोड़कर आया था। ईंटों की हालत देखकर उसका भी दिल बैठने लगा था। उसकी जैसे हिम्मत टूट गई थी। वह फटी-फटी आँखों से ईंटों को देख रहा था। सुकिया को देखते ही मानो और जोर-जोर से रोने लगी थी। सुकिया ने मानो की आँखों से बहते तेज  अँधड़ों को देखा और उनकी किरकिराहट अपने अंतर्मन में महसूस की। सपनों के टूट जाने की आवाज उसके कानों को फाड़ रही थी।

     असगर ठेकेदार ने साफ कह दिया था। टूटी-फूटी ईंटें हमारे किस काम की? इनकी मजदूरी हम नहीं देंगे। असगर ठेकेदार ने उनकी रही-सही उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया था। मानो ने सुकिया की ओर डबडबाई आँखों से देखा। सुकिया के चेहरे पर तूफान में घर टूट जाने की पीड़ा छलछला आई थी। उसे लगने लगा था, जैसे तमाम लोग उसके  खिलाफ हैं। तरह-तरह की बाधाएँ उसके सामने खड़ी की जा रही हैं। वहाँ रुकना उसके लिए कठिन हो गया था। उसने मानो का हाथ पकड़ा, ‘चल! ये लोग म्हारा घर ना बणने देंगे।‘ पक्की ईंटों के मकान का सपना उनकी पकड़ से फिसलकर और दूर चला गया था।

    भट्टे से उठते काले धुएँ ने आकाश तले एक काली चादर फैला दी थी। सब कुछ छोड़कर मानो और सुकिया चल पड़े थे। एक खानाबदोश की तरह, जिन्हें एक घर चाहिए था, रहने के लिए। पीछे छूट गए थे कुछ बेतरतीब पल, पसीने के  अक्स जो कभी इतिहास नहीं बन सकेंगे। खानाबदोश ज़िंदगी का एक पड़ाव था यह भट्टा।

    सुकिया के पीछे-पीछे चल पड़ने से पहले मानो ने जसदेव की ओर देखा था। मानो को यकीन था, जसदेव उनका साथ देगा। लेकिन जसदेव को चुप देखकर उसका विश्वास टुकड़े-टुकड़े हो गया था। मानो के सीने में एक टीस उभरी थी। सर्द साँस में बदलकर मानो को छलनी कर गई थी। उसके होंठ फड़फड़ाए थे कुछ कहने के लिए लेकिन शब्द घुटकर रह गए थे। सपनों के काँच उसकी आँख में किरकिरा रहे थे। वह भारी मन से सुकिया के पीछे-पीछे चल पड़ी थी, अगले पड़ाव की तलाश में, एक दिशाहीन यात्रा पर।

* ‘ऐसे शब्दों का प्रयोग असंवैधानिक है। समाज के  यथार्थ प्रतिबिंबन के लिए लेखक कई बार ऐसे शब्दों का प्रयोग साहित्य में करते रहे हैं,  किन्तु इसे व्यवहार में नहीं लाया जाना चाहिए।‘

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कहानियाँ

राजा

अनुमानित समय : 12 मिनट-

1

“सौ साल।”
मैं चौंक पड़ा। मुझे अपने कानों पर विश्‍वास न आया। मैंने कापी मेज पर रख दी और अपनी कुरसी को थोड़ा-सा आगे सरकाकर पूछा -“क्‍या कहा तुमने? सौ साल? तुम्‍हारी उम्र सौ साल है?”
तीनों कोटों को एक साथ बाँधते हुए धोबी ने मेरी तरफ देखा और उत्‍तर दिया – “हाँ बाबू साहब, मेरी उम्र सौ साल है। पूरे सौ साल। न एक साल कम, न एक साल ज्‍यादा। मेरी सूरत देखकर बहुत लोग धोखा खा जाते हैं।”
“मगर तुम इतने बड़े मालूम नहीं होते। मेरा विचार था, तुम सत्‍तर साल से ज्यादा न होगे।”
“नहीं बाबू साहब, पूरे सौ साल खा चुका हूँ।”
“बड़े भाग्‍यवान हो। आजकल तो पचास साल से पहले ही तैयारी कर लेते हैं।”
धोबी ने इसका कोई उत्‍तर न दिया।
सहसा मेरे हृदय में एक विचार उत्‍पन्‍न हुआ। मैंने पूछा – “अच्‍छा भाई धोबी यह कहो, तुमने सिक्‍खों का राज्‍य तो देखा होगा।”
“हाँ, देखा है।”
“उस राज्‍य में तुम सुखी थे या नहीं ? मेरा मतलब यह है उस राज्‍य में लोगों की क्‍या दशा थी?”
धोबी ने मेरी ओर सतृष्‍ण नेत्रों से देखा जैसे किसी को भूली हुई बात याद आ जाए और ठण्‍डी साँस भरकर बोला – “मैं उस जमाने में बहुत छोटा था। सिक्‍खों का राज्‍य कैसा था, यह नहीं कह सकता। हाँ, सिक्‍खों का राजा कैसा था, यह कह सकता हूँ।”
मेरे हृदय में गुदगुदी-सी होने लगी, पूछा – “तो तुमने महाराज का दर्शन किया है?”
“हाँ सरकार! दर्शन किया है। क्‍या कहना! अजीब आदमी थे। उनकी वह शक्‍ल-सूरत याद आती है तो दिल में भाले से चुभ जाते हैं। बहुत दयालु थे। राजा थे, मगर स्‍वभाव साधुओं का था। घमण्‍ड का नाम भी न था। मैं आपको एक बात सुनाता हूँ। शायद आपको उस पर विश्‍वास न आए। आप कहेंगे, यह कहानी है। मगर यह कहानी नहीं, सच्‍ची घटना है। इसमें झूठ जरा भी नहीं। इसे सुनकर आप खुश होंगे। आपको अचरज होगा। आप उछल पड़ेंगे। मैं मामूली हिंदी जानता हूँ, पर मैंने बहुत किताबें नहीं पढ़ीं। आप रात-दिन पढ़ते रहते हैं। परन्‍तु मुझे विश्‍वास है, ऐसी घटना आपने भी कम पढ़ी होगी।”

2

“मैं धोबी हूँ। मेरा बाप भी धोबी था। हम उन दिनों लाहौर में रहते थे। पर आज का लाहौर वह लाहौर नहीं। हम उस जमाने में जहाँ कपड़े धोया करते थे, वह घाट अब खुश्‍क हो चुका है। रावी नदी दूर चली गई है और उसके साथ ही वह दिन भी दूर चले गए हैं। भेद केवल यह है कि रावी थोड़ी दूर जाकर नजर आ जाती है, मगर वह जमाना कहीं दिखाई नहीं देता। भगवान जाने, कहाँ चला गया है।
“मेरी उम्र उन दिनों सात-आठ साल की थी, जब चारों तरफ अकाल का शोर मचा। ऐसा अकाल इससे पहले किसी ने न देखा था। लगातार अढ़ाई साल वर्षा न हुई। किसान रोते थे। तालाब, नदी, नाले सब सूख गए। पानी सिवाय आँखों के कहीं नजर न आता था। मुझे वे दिन आज भी कल की तरह याद हैं जब हम लँगोटे लगाए, मुँह काले कर बाजारों में डण्‍डे बजाते फिरते कि शायद इसी तरह वर्षा होने लगे। मगर वर्षा न हुई। लड़कियाँ गुड़ियाँ जलाती थीं और उनके सिर पर खड़ी होकर छाती कूटती थीं। पानी बरसाने का यह नुस्‍खा उस युग में बड़ा कारगर समझा जाता था, लेकिन उस समय इससे भी कुछ न बना। मुसलमान मस्जिदों में नमाज पढ़ते, हिंदू मंदिरों में पूजा करते, सिक्‍ख गुरुद्वारों में ग्रन्‍थ साहब का पाठ करते। मगर वर्षा न होती थी। भगवान कृपा ही न करता था। दुनिया भूखों मरने लगी। बाजारों में रौनक न थी। दुकानों पर ग्राहक न थे, घरों में अनाज न था। ऐसा मालूम होता था, जैसे प्रलय का दिन निकट आ गया है और सबसे बुरी दशा जाटों की थी। मेरा बाबा कहता था, इस समय उनके चेहरे पर खुशी न थी। आँखों में चमक न थी, शरीर पर माँस न था। सबकी आँखें आकाश की ओर लगी रहती थीं मगर वहाँ दुर्भाग्य की घटाएँ थीं, पानी की घटाएँ न थीं। अनाज रुपए का बीस सेर बिकने लगा।” मैंने आश्‍चर्य से कहा – “बीस सेर?”
“जी हाँ, बीस सेर! उस समय यह भी बहुत महँगा था। आजकल रुपए का सेर बिकने लगे तो भी बाबू लोग अनुभव नहीं करते। मगर उस समय यह दशा न थी। मेरे घर में एक मैं था, एक मेरा बूढ़ा बाबा, एक विधवा माँ, दो बहनें। इन सब का खर्च चार – पाँच रुपए मासिक से अधिक न था…”
मैंने अधीरतावश बात काटकर पूछा – “फिर?”
“हाँ तो फिर क्‍या हुआ। अनाज बहुत महँगा हो गया, लोग रोने लगे। अंत में यहाँ तक नौबत आ पहुँची कि हमारे घर में खाने को न रहा। जेवर, बरतन सब बेचकर खा गए। केवल तन के कपड़े रह गए। सोचने लगे, अब क्‍या होगा। मेरा बाबा, भगवान उसे स्‍वर्ग में जगह दे, बड़ा हँसमुख मनुष्‍य था। हर समय फूल की तरह खिला रहता था। प्राय: कहा करता था, जो संकट आए हँसकर काटो। रोने से संकट कम नहीं होता, बढ़ता है। मैंने सुना है, मेरे बाप के मरने पर उसकी आँख से आँसू की बूँद न गिरी थी। परन्‍तु इस समय वह भी रोता था। कहता था, कैसी तबाही है, बाल-बच्‍चे मेरे सामने भूखों मरते हैं और मैं कुछ कर नहीं सकता। यहाँ तक कि कई दिन हमने वृक्षों के पत्‍ते उबाल कर खाए। ‘
“एक दिन का जिक्र है। बाबा आँगन में बैठा हुक्‍का पीता था और आकाश की तरफ देखता था। मैंने कहा – “बाबा, अब नहीं रहा जाता। कहीं से रोटी का टुकड़ा ला दो! पत्‍ते नहीं खाए जाते।”
“बाबा ने ठंडी साँस भरी और कहा – ‘अब प्रलय का दिन दूर नहीं।”
“मैं – ‘प्रलय क्‍या होती है?”
“बाबा – ‘जब सब लोग मर जाते हैं।”
“मैं – ‘तो क्‍या अब सब लोग मर जाएँगे?”
“बाबा – ‘और क्‍या बेटा! जब खाने को न‍ मिलेगा, तब मरेंगे नहीं तो और क्‍या होगा?”
“मैं – ‘बाबा! मैं तो न मरूँगा। मुझे कहीं से रोटी मँगवा दो। बहुत भूख लगी है।”
“बाबा की आँखों में आँसू आ गए। भर्राई हुई आवाज से बोला – ‘ऐसा जमाना कभी न देखा था। तुम वृक्षों के पत्‍ते से उकता गए हो। गाँव के लोग तो मेढक और चूहे तक खा रहे हैं।”
“मैं – ‘बाबा ! ऐसी चीजें वे कैसे खा लेते हैं?”
“बाबा – ‘पेट सब कुछ करा लेता है।”
“मैं – “पर ये चीजें बड़ी घृणित हैं।”
“बाबा – ‘इस समय कौन परवाह करता है, भाई!”
“मैं – ‘उनका जी कैसे मानता है?”
“बाबा – ‘भगवान किसी तरह यह दिन निकाल दे।”
“मैं – ‘बाबा, मेंह क्‍यों नहीं बरसता?”
“बाबा – ‘हमारी नीयतें बदल गई हैं। वरना ऐसा समय कभी न सुना था। आज हरएक दृष्टि में लाली है मानो हर आँख में खून है, पानी नहीं है। तुम अजान हो, जाओ, कहीं से माँग लाओ। शायद कोई तरस खाकर तुम्‍हें रोटी का एक टुकड़ा दे दे।”
“मैं – ‘तो जाऊँ ?”
“बाबा – ‘भगवान अब मौत दे दे। गरीब थे, पर किसी के सामने हाथ तो न फैलाते थे।”

3

“मैं भूख से मर रहा था, रोटी माँगने को निकल पड़ा। मेरा विचार था, अकाल शायद गरीबों के यहाँ ही है। मगर बाहर निकला तो सभी को गरीब पाया। उदास सब थे, खुश कोई भी न था। मैं बहुत देर तक इधर-उधर माँगता फिरा, मगर किसी ने रोटी न दी। मैं निराश होकर घर को लौटा, पर पाँव मन-मन भर के भारी हो रहे थे।
“सहसा एक जगह लोगों का समूह नजर आया। मैं भी भागकर चला गया। देखा सरकारी आदमी मुनादी कर रहा है और लोग उसके गिर्द खड़े हो रहे हैं। मैं चकित रह गया। मैं समझ न सकता था कि उनके खुश होने का कारण क्‍या है। मगर थोड़ी देर बाद रहस्‍य खुल गया। महाराज रणजीतसिंह ने शाही किले में अनाज की कोठरियाँ खुलवा दी थीं और घोषणा कर दी थी कि जिस-जिस गरीब को आवश्‍यकता हो, ले जाए, दाम न लिया जाएगा। लोग महाराज की इस उदारता पर चकित रह गए। कहते थे ये आदमी नहीं, देवता हैं। मुसलमान कहते थे, कोई औलिया हैं। अब खुदा की खलकत भूखों न मरेगी। खुदा नहीं सुनता, राजा तो सुनता है। खलकत के लिए राजा ही खुदा है। एक आदमी कह रहा था, ‘महाराज ने आदमी बाहर भेजे हैं कि जितना अनाज मिल सके, खरीद लाओ। मेरी प्रजा मेरी संतान है, मैं उसे भूखों न मरने दूँगा।”
“दूसरा आदमी बोला – ‘मगर महाराज पहले क्‍या सो रहे थे? यह विचार पहले क्‍यों न आया, अब क्‍यों आया है?”
“पहले आदमी ने उत्‍तर दिया – ‘महाराज सोते नहीं थे, जागते थे। हर समय पूछते रहते थे कि अब अनाज का क्‍या भाव है, अब लोगों का क्‍या हाल है? कल तक यही पता था कि अनाज महँगा है। आज समाचार पहुँचा कि बाजार में अनाज का दाना भी नहीं मिलता। महाराज घबरा गए कि क्‍या होगा? आखिर उन्‍होंने आदमी बाहर भेज दिए कि जितना अनाज मिल सके, खरीद लाओ। मैं लोगों में मुफ्त बाँटूँगा। मेरे कोष में रुपया रहे या न रहे मगर लोग बच जाएँ।”
“एक हिंदू बोला – ‘इन्‍होंने तो कह दिया कि महाराज क्‍या पहले सोते थे? यह मालूम नहीं, महाराजाओं को एक की चिन्‍ता नहीं होती, सबकी चिन्‍ता होती है।”
“दूसरा – ‘भाई, मेरा अभिप्राय थोड़े ही था।”
“पहला – ‘एक और बात भी है। महाराज ने बाहर के किलेदारों को भी यही आज्ञा भेजी है।”
“दूसरा – ‘आफरीन हैं। राजा हो तो ऐसा हो।”
“तीसरा – ‘कोई और होता तो कहता, वर्षा नहीं हुई तो इसमें मेरा क्‍या दोष है। मेरे राजभवन में तो सब कुछ है।”
“दूसरा – ‘इस समाचार से मरते हुए लोगों में जान पड़ जाएगी।”
“तीसरा – ‘आज शहर की दशा देखना।”
“पहला – ‘किसी की आँख में चमक न थी।”
“दूसरा – ‘ऐसा अंधेर कभी न हुआ था।”
“तीसरा – ‘पर अब परमेश्‍वर ने सुन ली।”
“मैं यहाँ से चला तो ऐसा प्रसन्‍न था जैसे कोई अनमोल चीज पड़ी मिल गई हो। कुछ देर संयम करके मैं धीरे-धीरे चला, फिर दौड़ने लगा। डरता था कि यह शुभ समाचार घर में मुझसे पहले न पहुँच जाए। मैं चाहता था कि घर के लोग यह खबर मुझ ही से सुनें। गोली के सदृश भागा जाता था, मगर घर के पास पहुँचकर गति कम कर दी और धीरे-धीरे घर में दाखिल हुआ। मेरा बाबा उसी तरह सिर झुकाए बैठा था। मेरा हृदय खुशी से धड़कने लगा – वह अभी तक न जानता था।
“मुझे खाली हाथ देखकर बाबा ने ठण्‍डी साँस भरी और सिर झुका लिया। मैंने जाकर बाबा का हाथ पकड़ लिया और उसे जोर से घसीटता हुआ बोला – ‘उठो, चादर लेकर चलो, महाराज ने मुनादी कर दी है, अनाज मुफ्त मिलेगा।”
“मेरी माँ, मेरी बहनें, मेरा बाबा सब चौंक पड़े। उनको मेरे कहने पर विश्‍वास न हुआ। सिर हिलाते थे और कहते थे – ‘बच्‍चा है, किसी ने मजाक किया होगा। यह सब समझ बैठा है, भला महाराज सारे शहर को अनाज मुफ्त कैसे दे देंगे? बहुत कठिन है?”
“मगर मैंने कहा – ‘मैंने मुनादी अपने कानों से सुनी है। यह गलत नहीं है। लोग सुनते थे और खुश होते थे। तुम चादर लेकर मेरे साथ चलो।”
“मेरा बाबा चादर लेकर मेरे साथ चला। उसको अभी तक संदेह था कि यह मजाक है। लेकिन बाजार में आकर देखा तो हजारों लोग उधर ही जा रहे थे। अब उसको मेरी बात पर विश्‍वास हुआ।
“किले में पहुँचे तो वहाँ आदमी ही आदमी थे। पर किसी अमीर को अंदर जाने की आज्ञा न थी। फाटक पर सिपाही खड़े थे। वे जिसके कपड़े सफेद देखते उसे रोक लेते। कहते, यह अनाज गरीबों की सहायता के लिए है, अमीरों के घर तो अब भी भरे हुए हैं। यह गरीबों का लंगर था, अमीरों का भोज न था। मेरी इतनी उम्र हो गई है। मैंने अमीरों के लिए सब दर खुले देखे हैं, उनका कहीं रोक-टोक नहीं होती। पर वहाँ अमीर खड़े मुँह ताकते थे और उनकी कोई परवाह न करता था। हम गरीब थे, हमें किसी ने नहीं रोका। हम अंदर चले गए। वहाँ देखा कि सैकड़ों सरकारी आदमी तराजू लिए बैठे हैं और तोल-तोल कर 20-20 सेर अनाज सबको देते जाते हैं। लेकिन एक घर में एक ही आदमी को देते, दूसरों को लौटा देते थे। लोग बहुत थे, आगे बढ़ना आसान न था। मैं छोटा था, मेरा बाबा बूढ़ा था और हमारे साथ कोई जवान आदमी न था। हमने कई आदमियों से मिन्‍नत की कि हमें भी अनाज दिलवा दो, मगर उस आपाधापी के समय किसी की कौन सुनता है। मेरे बाबा ने दो बाद आगे बढ़ने का प्रयत्‍न किया मगर दोनों बार धक्‍के खाकर बाहर आ गया। तब मैं और मेरा बाबा दोनों एक तरफ खड़े हो गए और अपनी विवशता पर कुढ़ने लगे।

4

“संध्‍या के समय जब अँधेरा हो गया तब शंख के बजने की आवाज सुनाई दी। इनके साथ ही अनाज देने वालों ने अनाज देना बन्‍द कर दिया। हुक्‍म हुआ, बाकी लोग कल आकर ले जाएँ। लेकिन अगर कोई दुबारा आ गया तो उसकी खैर नहीं, महाराज खाल उतरवा लेंगे। लोग निराश हो गए, पर क्‍या करते। धीरे – धीरे सारा आँगन खाली हो गया। हम कैसे चले जाते? कई दिन से भूखे मर रहे थे। दोनों रोने लगे। बाबा बोला – ‘बेटा! हम कैसे अभागे हैं, नदी के किनारे आकर भी प्‍यासे लौट रहे हैं। जो भाग्‍यवान थे, वे झोलियाँ भर कर ले गए। हम खड़े देखते रहे। अब खाली हाथ लौट जाएँगे।”
“मैं – ‘बाबा! उनसे कहो, हमें दे दे। हम बहुत भूखे है।”
“बाबा – ‘कौन? चलो घर चलें। अनाज न मिलेगा, गालियाँ मिलेंगी।”
“मैं – ‘तुम कहो तो सही।”
“बाबा – ‘बेटा! तुम कैसी बातें करते हो। ये लोग अब न देंगे, कल फिर आना पड़ेगा।”
“मैं – ‘तो आज क्‍या खाएँगे?”
“बाबा – ‘गरीबों के लिए गम के सिवा और क्‍या है? आज की रात और सब्र करो।”
“मैं – ‘बाबा! मैं तो न जाऊँगा। कहो, शायद दे दें।”
“बाबा – ‘तुम पागल हो! क्‍या मैं भी तुम्‍हारे साथ पागल हो जाऊँ?”
“इतने में एक सरदार आकर हमारे पास खड़ा हो गया और बोला – ‘अब जाते क्‍यों नहीं? कल आ जाना, आज अनाज न मिलेगा।”
“बाबा – (ठण्‍डी साँस भरकर) ‘जाते हैं सरकार!”
“इस विवशता से उन सरदार साहब का दिल पसीज गया। जरा ठहरकर बोले – ‘तुम कौन हो?”
“बाबा – ‘धोबी हैं।”
“सरदार – ‘कल न आ सकोगे ?”
“बाबा – ‘आने को तो सिर के बल आएँगे, पर गरीब आदमी हैं। मैं बुड्ढा हूँ, यह अभी बच्‍चा है। भीड़ में पता नहीं कल भी अवसर मिले, न मिले। आज मिल जाता तो रात को पीसकर खा लेते।”
“सरदार – ‘तुम्‍हारे यहाँ कोई जवान आदमी नहीं है?”
“बाबा – ‘नहीं सरकार! इस बालक का बाप था, वह भी मर गया।”
“सरदार – ‘तो कल आना कठिन है तुम्‍हारे लिए?”
“मैं – ‘सरकार आज ही दिला दें।”
“सरदार – (हँसकर) ‘आओ, आज ही दिला दूँ।”
“मैं – ‘बाबा कहता था, आज न देंगे। क्‍यों बाबा ?”
“सरदार साहब हँसने लगे, मगर मेरे बाबा ने मुझे संकेत किया कि चुप रहो। मैं चुप हो गया। सरदार साहब ने कहा – ‘आओ तुम्‍हें दिला दूँ।”
“हम सरदार साहब के पीछे-पीछे चले। उन्‍होंने अनाज के ढेर के पास पहुँचकर एक आदमी से कहा – ‘इस बुड्ढे को बीस सेर गेहूँ दे दो।”
“वह आदमी मेरे बाबा से बोला – ‘चादर फैला दो।” और गेहूँ तोलने लगा।
“मेरा बाबा बोला – ‘सरकार! अब फिर कब मिलेगा?”
“सरदार – ‘अगले सप्‍ताह।”
“बाबा – ‘हम कई दिनों से भूखों मर रहे हैं।”
“सरदार – (हँसकर) “तो और क्‍या चाहते हो?”
“बाबा – ‘सरकार! कहते हुए भी शर्म आती है, क्‍या करूँ?”
“सरदार – ‘नहीं, कह दो। कोई बात नहीं।”
“बाबा – ‘बीस सेर और दिला दें तो बड़ी कृपा होगी। आपकी जान को दुआएँ देता रहूँगा।”
“सरदार – ‘बड़े लोभी हो।”
“बाबा – ‘सरदार साहब, पेट माँगता है जब जीभ खुलती है, नहीं तो हम ऐसे बेगैरत कभी न थे।”
“सरदार – ‘अगर इसी तरह तमाम लोग करें तो कैसे पूरा पड़े?”
“बाबा – ‘सरकार! राजा के महल में मोतियों की क्‍या कमी है। नहीं होता तो न दें, फिर द्वार पर आ पड़ेंगे। शहर में बड़ा यश हो रहा है। (मुझसे) बेटा! नमस्‍कार कर। इन्‍होंने हमें बचा लिया, नहीं तो रात रोते कटती।”
“मैं – (आगे बढ़कर) ‘जीते रहो बेटा! तुम्‍हारा क्‍या नाम है?”
“मैं – ‘जग्‍गो।”
“सरदार – ‘अब अनाज मिल गया ना, जाओ रोटियाँ पकाकर खाओ।”
“मैं – ‘सरकार! बीस सेर और दिला दें।”
“सरदार – ‘अरे! तू तो बाबा से भी लोभी निकला।”
“मैं – ‘नहीं सरकार, बीस सेर और दिला दें।”
“सरदार – (अनाज तोलने वाले से) ‘बीस सेर और तोल दे। बूढ़ा बाबा बार-बार कैसे आएगा?”
“बीस सेर और मिल गया।
“सरदार – ‘बाबा, अब तो खुश हो गए?”
“बाबा – ‘वाहे गुरु आपका यश दूना करे।”
“सरदार – ‘महाराज की जान की दुआ दो। यह सब उनकी कृपा है, नहीं तो लोग भूखों मर जाते और सच पूछो तो यह उनका धर्म था। न करते तो पाप के भागी बनते, राजा प्रजा का पिता होता है।”
“बाबा – ‘सच है सरकार! महाराज ऋषि है।”
“सरदार – ‘ऋषि तो क्‍या होंगे। आदमी बनें तो यह भी बड़ी बात है।”
“अब तक सब तोलने वाले आदमी जा चुके थे। किले में हमीं थे, और कोई न था। सरदार साहब बोले – ‘अब उठाकर ले जाओ।”
“गरीब दावत में जाकर खाता बहुत है, यह नहीं सोचता कि पचेगा या नहीं। बाबा ने भी अनाज ले ज्‍यादा लिया, अब उठाना मुश्किल था। क्‍या करे, क्‍या न करे। उस समय सिक्‍खों का वही रोब था, जो आज अंग्रेजों का है। बाबा सहमकर बोला – ‘सरदार साहब, गठरी भारी है। कोई सिर पर रख दे तो ले जाऊँ।”
“सरदार साहब ने गठरी उठाकर मेरे बाबा के सिर पर रख दी।
“बाबा दो कदम चलकर गिर गया।
“सरदार साहब बोले – ‘क्‍यों भाई! इतना अनाज क्‍यों बँधवा लिया जो उठाए नहीं उठता। बीस सेर लेते तो यह तकलीफ न होती। लोभ करते हो, अपनी देह की ओर नहीं देखते। जाओ, अपने किसी आदमी को बुला लाओ। तुमसे न उठेगा।”
“मेरे बाबा ने आह भरी और कहा – ‘सरकार! मेरी सहायता कौन करेगा?”
“सरदार साहब ने कुछ देर सोचा, फिर वह गठरी अपने सिर पर उठाकर चलने लगे। हम दंग रह गए। हमारे शरीर के एक-एक अंग से उनके लिए दुआ निकल रही थी। हम सोचते थे, यह आदमी नहीं देवता है।”

5

यहाँ पहुँचकर धोबी रुक गया। कहानी ने बहुत मनोरंजक रूप धारण कर लिया था। मैं इसका अगला भाग सुनने को अधीर हो रहा था। मैंने जल्‍दी से कहा – “क्‍यों भाई धोबी! फिर क्‍या हुआ?”
धोबी ने वायुमण्‍डल में इस भाँति देखा जैसे कोई खोई वस्‍तु को खोज रहा हो और फिर दीर्घ नि:श्‍वास लेकर बोला – “जब हम घर पहुँचे और सरदार साहब अनाज की गठरी हमारे आँगन में रखकर लौटे तो मैं और मेरा बाबा दोनों उनके साथ बाजार तक चले आए। मेरा बाबा बार-बार कहता था, इसका फल आपको वाहे गुरु देंगे, मैं इसका बदला नहीं दे सकता। एकाएक उधर से एक फौजी सिक्‍ख निकल आए। सरदार साहब जहाँ खड़े थे, वहाँ रोशनी थी। फौजियों ने उनको पहचान लिया और तलवारें निकालकर सलाम किया। यह देखकर मेरा बाबा डर गया, सोचा – यह कौन है? कोई बड़ा ओहदेदार होगा, वरना ये लोग इस प्रकार सलाम न करते। जब सरदार, साहब चले गए तब मेरा बाबा उन फौजियों के पास पहुँचा और पूछा – ‘यह कौन थे?”
“उनमें से एक ने बाबा की तरफ आश्‍चर्य से देखा और जवाब दिया – ‘तुम नहीं जानते? यह हमारे महाराज थे।”
“बाबा चौंक पड़ा। उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं। उसके मुँह से एक शब्‍द भी न निकला।
“यह महाराज थे। वही महाराज, जिनकी आँख के इशारे पर फौजों में हलचल मच जाती थी, जो अपने युग के सबसे बड़े राजा थे, जिनके सामने अभ्‍युदय हाथ बाँधता था। आज ये एक धोबी के घर गेहूँ की गठरी छोड़ने आए हैं। यह सच्‍चे महाराज हैं। इनका राज्‍य जन-जन के दिलों पर है।
“उस रात हमें नींद न आई। सारा घर जागता था और महाराज के लिए दुआ माँगता था। दूसरे दिन बड़े जोर की वर्षा हुई।”
यह कहानी सुनाकर धोबी चुप हो गया। मेरे रोंए खड़े हो गए। आँखों में पानी भर आया। आज वह समय कहाँ चला गया? आज ऐसे राजा लोग क्‍यों नहीं नजर आते? आज के राजाओं को भ्रमण का शौक है, विषय-वासना का चाव है, परन्‍तु अपनी प्रजा के हित-अहित का ध्‍यान नहीं।
मैंने धोबी की तरफ देखा, उसकी भी आँखें सजल थीं। मैंने ठण्‍डी साँस भरी।
धोबी ने कपड़े गिनकर कहा – “बाबू साहब! लिखिए – चौदह पायजामे, बीस कमीजें।”
मैंने कापी उठा ली और लिखने लगा।

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मैना

अनुमानित समय : 10 मिनट-

अलियार जब मरा, तो दो पुत्र, छोटा सा घर और थोड़ी-सी जमीन छोड़कर मरा। दसवें के दिन दोनों भाई क्रिया-कर्म समाप्त करके सिर मुड़ाकर आए, तो आने के साथ ही बँटवारे का प्रश्न छिड़ गया। और इस समस्या के समाधान के लिए इतने जोरों से लाठियाँ चली कि दोनों भाइयों के मुंडित मुंड फूट गए।

         दोनों भाइयों ने इस प्रकार एक दूसरे का सिर फोड़कर अपना-अपना अपमान माँ लिया। बड़े भाई ‘मुसाफिर’ की धारणा थी कि छोटे भाई ने सिर फोड़कर मेरा भारी अपमान किया है। छोटे भाई ‘जगन’ की भी यही शिकायत थी कि बड़के भैया ने बड़ी मजबूत लाठी से मेरा अपमान किया है। दोनों ने प्रतिज्ञा की कि इस अपमान का बदला नहीं लिया, तो मेरा नाम नहीं।

         किन्तु अपमान के प्रतिशोध के लिए मुकदमा लड़ने को किसी के पास पैसे नहीं थे। केवल लाठियों का भरोसा था; लेकिन इसका मौका नहीं था। दोनों ही सतर्क रहते थे। खैर, किसी प्रकार दोनों भाई अपने उसी घर में, एक म्यान में दो तलवार की तरह रहने लगे, लेकिन एक म्यान में दो तलवारों के रहने से तलवारों का उतना नुकसान नहीं होता, जितना कि बेचारे म्यान का। दोनों का क्रोध अपने घर ही पर उतरता था। मुसाफिरराम को जरूरत हुई, तो छोटे भाई के लगाए हुए कुम्हड़े और करेले की लताओं को तहस-नहस करके अपनी गोशाला बना ली। इधर जगन ने आवश्यक समझते ही बड़े भाई के भंडार घर को तोड़ कर दरवाजे के साथ मिला दिया। घर तोड़ने की खबर सुनते ही मुसाफिरराम अपने भाई का सिर तोड़ने के लिए तैयार हो गए, किन्तु गाँववालों ने बीचबचाव करके झगड़ा शांत करा दिया।

         यह लड़ाई केवल पुरुषों तक ही थी, यह बात नहीं है। स्त्रियों में भी ऐसा घमासान वाग्युद्ध होता था, जिसका ठिकाना नहीं।

         हाथ चमकाकर, माथा मटकाकर, नथ हिलाकर, ऐसी-ऐसी गालियों की बौछार की जाती थी, जिसका अमृतरस लूटने के लिए गाँव की सारी महिलायें एकत्र हो जाती थीं। मुनिया को आदमी का माँस खाना अभीष्ट नहीं था, फिर भी बड़ी तेजी से निनाद करके रधिया को धमकी देती थी—“तेरा भतार खा जाऊँगी।“ रधिया भला अपनी चीज कैसे दे सकती थी? चट से कहती—“मेरा भतार क्यों खाएगी, तेरा मुस्टंडा तो अभी जीता ही है, उसी को चबा।“ इसी प्रकार दोनों देवरानी-जेठानी साहित्य के नवरसों से भिन्न गाली-रस की सृष्टि करती थी।

         यह लड़ाई-झगड़ा, गाली-गलौज, एक-दो दिन रहता, तब तो ठीक; यहाँ तो महीने की लंबी डग मारता हुआ साल चला गया। घर और बाहर सभी इस झगड़े से ऊब उठे। गाँववालों ने कहा-“भाई, तुमलोग आपस में क्यों इतना झगड़ा करते हो? अपनी-अपनी चीजें बराबर बाँट लो, बस झगड़ा खत्म हो गया।

         दोनों ने सकार लिया, बात ठीक है।

         आखिर एक दिन गाँववालों की पंचायत जमा हुई। सब कुछ देखभाल कर दुखहरन पांडे ने, तंबाकू फाँकते हुए फैसला सुना दिया। और तब, आँगन के बीच में दीवार खींच दी गई। घर की कोठरियों को गिन-गिनकर अलग किया गया। हल, बैल, खेती, बारी सबकुछ अलग-अलग हो गए। अब कोई भाई किसी से बोलना भी पसंद नहीं करता था। एक दूसरे को देखते ही घृणा से मुँह फेर लेता था।

2

         उपर्युक्त घटना को दो वर्ष बीत गए।

         बिल्ली की तरह घर-घर घूमनेवाली पद्मिनी काकी एक दिन मुसाफिर के घर में जाकर बोली—“मुँह मीठा कराओ, तो एक बात कहूँ!”

         रधिया ने उत्सुकता से पूछा-“कौन बात है काकी, कहो न?”

         ‘तुम्हारा भतीजा होनेवाला है।‘

         रधिया का चेहरा घृणा से सिकुड़ गया। क्रोध से जल उठी। मुँह बिचकाकर बोली—“अय नौज, चूल्हे-भनसार में पड़े भतीजा, और देवी मइया के खप्पर में जायँ हमारे देवर-देवरानी। इनको बेटी-बेटा हो, इससे हमको क्या और नहीं हो, इससे क्या। अगर इनलोगों का बस चले, तो हमलोगों को न जाने कब फाँसी लटका दे। ये लोग जैसे अपने हैं, उससे गैर ही कहीं अच्छे।“

         इस प्रकार रधिया ने भली-भाँति साबित कर दिया, कि इससे मुझे तनिक भी खुशी नहीं और पद्मिनी काकी का मुँह मीठा खाने लायक नहीं है।

         यह बात बड़े विस्तारपूर्वक मुनिया के निकट पहुँची। रधिया जलती है, यह सुनते ही उसे एक ईर्ष्यामय आनंद हुआ। बोली-“अभी से उस कलमुंही के कपार में आग लग गई, तब तो लड़का होने से वह छाती फाड़कर मार जाएगी।

         जगन घर में आया, तो उसे भी यही समाचार सुनना पड़ा। सुनकर उसे हर्ष नहीं हुआ। घृणा से जी छोटा हो गया। अपने भाई-भौजाई होकर भी ये लोग कितने नीच हैं! बोला-“वे लोग तो जन्म के जलंत, उनकी बात को लेकर कहाँ तक क्या किया जाए?”

         उन दिनों पद्मिनी काकी प्रतिदिन, एक नई सनसनीदार घटना की खबर लेकर, मुनिया के निकट उपस्थित होती थी। आज रधिया देवी मैया के मंदिर में धरना देने गई है, कि तुम्हारे पेट का लड़का नष्ट हो जाए। आज एक ओझा बुलाया गया है। बड़ा नामी ओझा है। उसके मंतर का मारा हुआ पानी भी नहीं पीता। भगवान जाने क्या होगा। रोज इसी प्रकार की नई घटनाओं का उल्लेख करके वह मुनिया से कुछ-न-कुछ जोग-टोट के लिए झटक ही लेती थी।

         किसी प्रकार इन मारण-मोहन-उच्चाटन-वशीकरण से घोर युद्ध करता हुआ, कई महीनों का सुदीर्घ समय व्यतीत हो गया। आज मुनिया को लड़का होनेवाला है। उसकी वर्षों की मुराद पूरी होगी। खाली गोद भर जाएगी। जगन के इष्टमित्र भी चहक रहे थे-“भाई, भरपेट खिलाना पड़ेगा, यहाँ पौने तीन सेर से छटाँक भर भी कम नहीं खाते। जगन प्रसन्नता पुलकित होते उत्तर देता-“अरे इतना खिलाऊँगा कि खाते-खाते पेट फट जाएगा। भीतर गाँव की बड़ी-बूढ़ी स्त्रियाँ बच्चे की सेवा-सुश्रूषा कर रही थीं। अन्य महिलायें स्वयंसेविकाओं की तरह दूसरे-दूसरे काम में व्यस्त थीं; किन्तु न मुसाफिर का पता था, न रधिया का। बाहर एक आदमी ने जगन से कहा-“इस समय तुम्हें सब बैर भूलकर अपने भाई को बुलाना चाहिए था।“ जगन ने उत्तर दिया-“बुलाया भाई, पचासों दफे आदमी भेजा, खुद गया, जब आते ही नहीं, तो क्या करूँ?”

           भीतर की औरतें आपस में कह रही थीं, ऐसे समय में आदमी सब लागडाँट भूल जाते हैं। भाई-भौजाई होकर भी वे लोग नहीं आए।

           इस समय भी मुनिया कहने से न चूकी—चूल्हे में जाएँ वे लोग, नहीं आए, यही अच्छा हुआ!

           उस समय रधिया अपने घर में चिंता में चूर बैठी थी। ईर्ष्या से उसका कलेजा जल रहा था। बार-बार भगवान को दोष दे रही थी, उसे क्यों लड़का हो रहा है, मुझे क्यों नहीं हुआ?

           मुसाफिर को तो ऐसा मालूम होता था, जैसे उसका सर्वस्व लुट गया। अगर कहीं लड़का हुआ, तो मेरे घर-द्वार का भी वही मालिक होगा। आज तक उसने कभी अपने निःसंतान होने के विषय में नहीं सोचा था। किन्तु अब यही बात, तीर की तरह, उसके हृदय को बार-बार वेध रही थी। माथे पर हाथ रखे वह इन्हीं ईर्ष्यामय विचारों में मग्न था। पड़ोस का शोर उसे ऐसा मालूम होता था, जैसे यह सब आयोजन उसी को चिढ़ाने के लिए किया गया है।

        इसी समय मालूम हुआ कि जगन के यहाँ लड़की पैदा हुई है।

        मुसाफिर ने एक लंबी साँस खींचकर कहा-“जाने दो, लड़का नहीं पैदा हुआ, यह अच्छा हुआ।“

        यह उसके मन की वह प्रवृत्ति थी, जो निराशा की डाल पर भी संतोष के घोंसले बनाती है।

3

        समय-पंछी उड़ता हुआ छः वर्षों का पथ और भी पार कर गया।

        जगन की लड़की मैना अपने द्वार पर बैठी हुई धूल के घरौंदे बनाती और बिगाड़ती नजर आती थी। उसे देखकर मुसाफिर को क्रोध नहीं आता था, एक प्रकार का ममत्व जागृत हो उठता था। जी में आता था कि उस धूलि-धूसरित बालिका को गोद में उठाकर चूम ले। वह दूर से बैठकर उसकी बाल-क्रीड़ा को देखता था और फूला न समाता था। मैना को गोद में लेने की बलवती इच्छा को वह कैसे दबाता था, यह उसके सिवा और किसी को नहीं मालूम।

        असाढ़ रथ द्वितीया के दिन, उसी के गाँव के समीप, करौंदी में मेला लगता था। उस मेंले में कोई खास बात नहीं थी। जगन्नाथ स्वामी के मंदिर में खूब घड़ियाल-घंटा बजाकर उनकी पूजा होती थी। संध्या के समय, मनुष्यों के रथ पर लादकर, देवताओं को एक मंदिर से दूसरे मंदिर में पहुँचा दिया जाता था। आसपास के सभी गाँववाले वहाँ एकत्र होते थे, काफी भीड़ जुट जाती थी। मुसाफिर भी वहाँ गया था। वहाँ खिलौनों की दूकान देखकर ठिठक गया। इच्छा हुई कि मैना के लिए कुछ खिलौने लेता चलूँ। फिर सोचा-“मगर इसके लिए कहीं जगन या उसकी बहू कुछ कह दें तब?” उसने इच्छा को बलपूर्वक त्याग दिया और आगे बढ़ा। आगे भी खिलौने की दूकान थी, एक-से-एक अच्छे खिलौने भलीभाँति सजाकर रखे हुए थे। मुसाफिर रुक गया और दूकान की ओर देखने लगा। खिलौने सभी सुंदर थे, जिसपर दृष्टि जाती थी, उससे आँखों को हटाना कठिन था। यदि उनमें से एक भी खिलौना मैना को मिले, तो वह कितनी खुश होगी! मुसाफिर की कल्पना की आँखों के आगे मैना उसके दिए हुए खिलौने को लेकर छाती से लगाए हुए दिखलाई पड़ने लगी। वह इसी आत्म विस्मृत दशा में दूकान के सामने जाकर खड़ा हो गया। एक खिलौना उठाकर पूछा-“इसका कितना दाम है?

     “छः आने।“

     मुसाफिर को मानो होश हुआ। यह खिलौना मैं किसके लिए खरीद रहा हूँ। उसी के लिए जो मेरे वैरी की लड़की है। मगर अब क्या करता? दाम पूछ चुका था, अगर यहाँ से यूँ ही चल देता तो बड़ी हेठी होती।

     टाल देने के लिए बोला-“तीन आने में देते हो तो दे दो।“

     “अगर लेना ही है तो चार आने से कौड़ी कम नहीं लूँगा।“

     अब तो सिर्फ चार पैसों पर बात अटक गई। अगर ले ही लूँ, तो क्या होगा। मेरा दुश्मन जगन है कि उसकी लड़की! बेचारी का क्या कसूर! जैसे वह जगन की लड़की है, वैसे ही मेरी लड़की है। बेचारी को मैंने कभी कुछ नहीं दिया। लोग अपने भतीजे-भतीजी को लाख-दो लाख दे देते हैं, अगर मैंने एक चार आने का खिलौना ही दे दिया, तो क्या दिया!

      मुसाफिर जब खिलौने को खरीदकर चला, तो उसके हृदय में जितना उल्लास था, उतनी ही झगड़े की आशंका भी थी।

     साँझ के समय घर पहुँचा। मैना उस समय अपने पिता से पाई हुई सीटी बजा-बजाकर खुश हो रही थी। इसी समय मुसाफिर जाकर उसके सामने खड़ा हो गया। खिलौना हाथ पर रखकर कहा- देख बेटी, यह खिलौना तेरे लिए लाया हूँ, पसंद है?

     मैना खुशी से नाच उठी। बोली- हाँ, चाचा, खूब पसंद है; अबकी मेले में जाओगे, तो मेरे लिए एक हाथी, एक खरगोश और एक कछुआ लेते आओगे?

     अच्छा लेता आऊँगा-कहकर मुसाफिर ने उसे गोद में उठाकर चूम लिया।

     मैना बोली- तुम बड़े अच्छे आदमी हो चाचा, तुम मेरे लिए मेले से खिलौना ला देते हो, गोद में लेकर दुलार करते हो।

     मुसाफिर ने स्नेह से पूछा- और तेरा बाप दुलार नहीं करता?

     मैना सिर हिलाती हुई बोली- नहीं, वह दुलार नहीं करता। वह तो मुझे गोद में भी नहीं लेता।

4

     एक दिन मुसाफिर गोद में मैना को लिए घर के भीतर गया, तो रधिया बोली- तुम्हारे रंग-ढंग मुझे अच्छे नहीं लगते!

     मुसाफिर ने सहज उत्सुकता से पूछा- क्यों, क्या हुआ?

     ‘पराई बेटी के पीछे काम-धंधा छोड़कर, दिन-रात पागल बने फिरते हो। अगर अपनी बेटी होती तो क्या करते? कल खेत पर भी नहीं गए, सारा दिन बाँस की गाड़ी बनाने में बिता दिया।‘

     मुसाफिर ने हँस कर कहा- पराई बेटी कैसे हुई? क्यों मैना, तू दूसरे की बेटी है?

     मैना ने सिर हिलाकर कहा- नहीं!

     ‘तब किसकी बेटी है?’

     मैना उसके गले में अपनी दोनों बाहें डालकर बोली- तुम्हारी !

     मुसाफिर मुसकुराता हुआ गर्व से अपनी पत्नी की ओर देखकर बोला-देखती हो?

     रधिया ने कहा- सब देखती हूँ; लेकिन अगर कुछ हो गया, तो यही समझ लो कि तुम्हारे सिर का बाल भी नहीं बचेगा। जो कुछ असर-कसर बाकी है, वह भी पूरी हो जायेगी।

     मुसाफिर ने मैना को चूमकर कहा- मेरी बेटी को क्यों कुछ होगा, जो कुछ होना होगा, सो इसके दुश्मन को होगा। क्यों बेटी?

     मैना ने सिर हिलाकर अपनी सम्मति जता दी।

     रधिया ने मुँह फुलाकर कहा- एक दफे कपार फुटवा ही चुके, अबकी मालूम होता है, मूँछ उखड़वाओगे।

     मुसाफिर के दिल में कुछ चोट लगी। उसने सिर उठाकर कहा- तुम तो मैना को फूटी आँखों भी नहीं देख सकती। यह मेरी गोद में नहीं आए, तब तुम्हारा कलेजा ठंडा रहेगा।

     रधिया तीव्र स्वर में बोली- कौन कहता है कि मैना मुझे फूटी आँखों नहीं सुहाती? बोलते कुछ लाज भी लगती है या नहीं! लड़के-बच्चे भी किसी के दुश्मन होते हैं? मैना को देखती हूँ, तो गोद में लेने के लिए तरसकर रह जाती हूँ, मगर करूँ तो क्या, इसके माँ-बाप ऐसे हैं, जिनसे दुश्मन भी भला! छोड़ देती हूँ, कौन जाने मैना को दुलार करने से हमारी मालकिनजी रांड-निपूती कहने लगें।

    इसी समय मैना अपने चाचा की गर्दन झकझोरकर बोली- चाचा, चाचा, चलो गाड़ी पर चढ़ाकर टहला दो।

    ‘चल !’ कहता हुआ मुसाफिर उसे लिए हुए घर से बाहर चला गया।

    उस दिन मैना गाड़ी पर चढ़कर खूब घूमी, लेकिन जब उसकी छोटी-सी गाड़ी समस्त गाँव की परिक्रमा करके लौटी, तो उसे कुछ ज्वर-सा हो आया था। मुसाफिर ने देखा कि उसका शरीर कुछ गर्म है। बोला-घर चली जाओ, बेटी, शायद तुम्हें बुखार आएगा।

     मैना जिद करने लगी- नहीं चाचा, थोड़ा और घुमा दो। थोड़ा सा ! फिर घर चली जाऊँगी।

     ‘नहीं-नहीं, अब घर जाओ।‘

     मैना मलिन मन गाड़ी से उतर कर घर चली गई। उस दिन वह बहुत उदास हो गई थी। चाचा यदि थोड़ा और घुमा देते तो क्या होता?

5

     दूसरे दिन, मुसाफिर दिन-भर मैना को नहीं देख सका। मालूम हुआ कि उसे ज्वर हो आया है। मुसाफिर दिन-भर बहुत ही उदास रहा। खेत पर भी नहीं जा सका। बैल भूखे थे, उन्हें सानी देने की भी याद नहीं रही। मालूम होता था, जैसे वह निर्वासित कर दिया गया है। मैना के बिना उसे अपना जीवन सुनसान और भयावना प्रतीत होता था। वह जहाँ बैठ था, दिन भर वहीं बैठा रह गया। रात हुई तो रधिया आकर बोली- आज खाओगे नहीं क्या?

    ‘ना, आज भूख नहीं है।‘

    ‘तुम तो मुफ़्त में अपनी जान गँवा रहे हो। जिन लोगों के लिए प्राण हत रहे हो, उन्हें तो तुम्हारी परवाह नहीं है। यह किसी से नहीं हुआ कि तनिक बुलाकर दिखला देते। हाय री बच्ची, कल ही भली-चंगी थी, आज न जाने कैसे क्या हो गया! मेरा तो जी चाहता है कि जाकर एक बार देख आती।‘

    मुसाफिर प्रसन्न होकर बोला- चली जाओ न, देखती आना।

    रधिया ने कहा- जाती तो, लेकिन महारानीजी से डर लगता है कि कहीं डाइन कहके बदनाम न कर दे। और तुम्हारा सपूत भाई भी कम नहीं है। ना, मैं नहीं जाऊँगी; तुम्ही जाओ।

    ‘तुम्हारे जाने से लोग बुरा मानेंगे, तो क्या मेरे जाने से भला मानेंगे?’

    ‘तो जाने दो, मगर चलो कहा लो। ऐसे कब तक रहोगे?’

    ‘जब तक मन करेगा।‘

    ‘भगवान् लोगों को दुख देते हैं, तो क्या सभी खाना छोड़ देते हैं? दुनिया का काम तो सभी को करना ही पड़ता है।‘

    ‘खाऊँगा तो जरूर; लेकिन अभी भूख नहीं है।‘

    रधिया निराश होकर चली गई। मुसाफिर वहाँ बैठा-बैठा क्या सोच रहा था, यह वही जाने; लेकिन जब रात भीग गई, दस से ऊपर हो गए और रात्रि के सन्नाटे में कुत्तों का भूँकना जारी हो गया, तब मुसाफिर जगत के द्वार पर जाकर खड़ा हो गया। दीवार से कान लगाकर, बहुत देर तक मैना की बोली सुनने की चेष्टा की; किन्तु निष्फल ही रहा। अंत में निराश होकर घर लौट आया और चुपचाप सो गया।

    मैना तीन-चार दिनों तक तो बुखार में डूबी रही, पाँचवे दिन सन्निपात हो गया। बचने की आशा जाती रही। मुसाफिर यह सब सुनता था और मन-ही-मन हाय करके रह जाता था।

    आखिर एक दिन मुनिया के क्रंदन से जगत का घर गूँज उठा। मुसाफिर के हाथ-पाँव फूल गए। वह पागल की तरह दौड़ा हुआ जगन के आँगन में पहुँच गया। घबराया हुआ बोला- जगन, जगन, क्या हुआ? जगन रोता हुआ घर से निकला- भैया, हम लुट गए, मैना, मैना !…

    मुसाफिर भी कातर भाव से हाहाकार करके रो उठा, हाय मेरी बेटी !

    जब लोग मैना की लाश को उठाकर ले चले, उस समय मुनिया भी सिर के बाल खोले पागलों की तरह रोती हुई जा रही थी। हाय रे ! मेरी फूल-सी बच्ची को लेकर तुम लोग कहाँ जा रहे हो? लाओ, उसे मुझे दो, वह दूध पीकर चुपचाप सो जाएगी। हाय रे, मेरी बच्ची ! सुनो… सुनो तो…

    इसी समय रधिया अपने घर से दौड़ती हुई निकली और मुनिया को पकड़ लिया। उसे अपनी छाती से लगाकर बोली- न रोओ बहन, न रोओ ! भगवान् ने हम लोगों को दुख दिया है, तो सहना ही पड़ेगा।

    उस समय तक शव ले जानेवाले आँखों की ओट हो चुके थे।

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हाजी कुल्फीवाला

अनुमानित समय : 9 मिनट-

    जागता है खुदा और सोता है आलम।

    कि रिश्‍ते में किस्‍सा है निंदिया का बालम।।

    ये किस्सा है सादा नहीं है कमाल।।

    न लफ्जों में जादू बयाँ में जमाल।।

    सुनी कह रहा हूँ न देखा है हाल।।

    फिर भी न शक के उठाएँ सवाल।।

    कि किस्‍से पे लाजिम है सच का असर।।

    यहीं झूठ भी आके बनता हुनर।

छापे का किस्‍सागो अर्ज करता है कि –

     एक है चौक नखास का इलाका और एक हैं हाजी मियाँ बुलाकी कुल्फीवाले। पिचासी-छियासी बरस की उमर है; दोहरा थका बदन है। पट्टेदार बाल, गलमुच्‍छे और आदाब अर्ज करते हुए उनके हाथ उठाने के अंदाज में वह लखनऊ मिल जाता है जो आमतौर पर अब खुद लखनऊ को ही देखना नसीब नहीं होता। किसी जमाने में हाजी मियाँ बुलाकी की बरफ और निमिष खाने के लिए गोंडा, बहराइच, बलरामपुर, कानपुर और दूर-दूर से रईस शौकीन गर्मी-सर्दी के मौसमों में दो बार लखनऊ तशरीफ लाते थे। बुलाकी की बदौलत चार नाचने-गानेवालियों, उनके लगुए-भगुओं और चार किस्म के सौदागरों का भी भला हो जाता था। बुलाकी मियाँ ने हजारों रुपये पैदा किए। पक्‍का दो-मंजिला मकान बनवाया। दो बार हज कर आए। पहले लड़के और फिर लड़की की शादी धूमधाम से की। न लड़की रही न लड़का; पंद्रह-बीस बरसों के आटे-पाटे में हाजी साहब पिस गए।

लड़की का गम लड़के के दम पर सह लिया। लड़का भी ऐसा होशियार था कि बाप का नाम दोबाला किया। सत्रह-अठारह साल हुए, एक दिन राह चलते हार्ट फेल हुआ और चटपट हो गया। अपने पैरों घर से गया था; पराए हाथों उठकर उसकी लाश आई।

साल डेढ़ साल तो गम में टूटे सिमटे बदहवास बैठे रहे, मगर फिर पोतों के मुँह देखकर हाजी बुलाकी मियाँ ने अपना जी कड़ा किया। सोचा कि घर से निकालकर खाते-खाते तो एक दिन कारूँ का खजाना भी चुक जाता है, फिर मेरे बाद इन बच्‍चों का क्‍या होगा? इसलिए हाथ-पैर गो थके ही सही, मगर जब तक चलते हैं तब तक पुराने हुनर से इतने जनों का पेट क्‍यों न भरूँ – कुल्फियाँ धोने और दूध बगैरा औटाने-भरनेके चक्कर में बूढ़ी का ध्‍यान बँटेगा, दुलहिन का वक्त कटेगा, बच्‍चों के पेट में बहाने से कुछ न कुछ-मेवा भी पहुँचता रहेगा और मेरा भी बाहर निकलना हो जाएगा – अब और किया क्‍या जाए?

इस तरह एक दिन बादाम, पिस्‍ता, चिरौंजी, इलायची, जाफरान, शकर, संतरे और अनारों का सौदा कर लाए; दूध, रबड़ी, बालाई लाए, कुल्फियाँ धोई; कढ़ाव चढ़ाया। उन्‍नीसवीं सदी में उस्‍तादों की चिलमें भर-भर के सीखे हुए हुनर के हाथ रच-रचकर दिखलाए। फिर हाजी बुलाकी मियाँ की तजुर्बेकार बीवी उम्र-भर के सधे हाथों से डले में कुल्फियाँ सजाने बैठी। बरफ भरकर हाँडी हिलाई। तब तक हाजी बुलाकी मियाँ ने पुराने वक्‍तों में रईसों-नवाबों और अंग्रेज हिंदुस्तानी हाकिमों से मिले सार्टिफिकेटों का रजिस्‍टर निकाला। यह चमड़े का रजिस्‍टर वजीरे ने मरने के कुछ ही दिनों पहले कानपुर से पिचहत्तर रुपये में बनवाया था। हर पुश्‍त पर दो सर्टिफिकेट चमड़े के फ्रेम में मढ़ दिए। उसमें न टूटनेवाले कागजी काँच भी जड़े हैं। अब्‍बा को अपने ये सर्टिफिकेट बहुत प्‍यारे हैं, इसलिए वजीरे यह कीमती रजिस्‍टर बनवाकर लाया था। हाजी उस दिन फूले न समाए थे, आज उस दिन को रोए। फिर अपने को सँभाला, कहीं बूढ़ी न देख ले। उजला कुरता, चूड़ीदार पाजामा और टोपी पहनी। मजदूर को बुलवाया, डला उसके सिर पर लादा और करीब सत्रह-अठारह बरसों के बाद अल्‍लाह का नाम लेकर कुल्फियाँ बेचने निकले। इस बार बूढ़े-बूढ़ी दोनों एक-दूसरे की आँखों को आँसुओं के हमले से न बचा सके। परदे की ओट में दुलहिन भी रो पड़ी। उसकी सिसकी सुनकर हाजी बुलाकी तेजी से बाहर चले आए। गली से बाहर आकर नखास बाजार में पहली आवाज लगी, ‘कु‍ल्‍फी मलाई की बरफ!’ गला भर-भर आया।

दूसरी आवाज में ही बुलाकी मियाँ ने अपने-अपने सँभाल लिया। वह इनसान ही क्‍या जो मुसीबत न झेल सके। घंटे के हिसाब से एक इक्‍का तय किया और उम्र-भर के बरते हुए बाजार को छोड़कर हजरतगंज, जापलिंग, रोड और पंचबंगलियों की तरफ चले। हिंदुस्‍तान को आजादी बस मिलनेवाली ही थी। नया दौर शुरू हो चुका था। एक आला हाकिमे-जमाना के वालिद बुजुर्गवार का दिया हुआ सर्टिफिकेट भी उनके रजिस्‍टर में मौजूद था। उन्‍हीं की कोठी का नंबर पूछते-पूछते जा पहुँचे। इक्‍का कोठी से बाहर ही खड़ा करवाया और रजिस्‍टर लिए अंदर गए। अर्दली से पूछा तो मालूम हुआ कि साहब पीछेवाले बगीचे में फुरसत से बैठे हैं। अर्दली से पूछा तो मालूम हुआ कि साहब पीठेवाले बागीचे में फुरसत से बैठै हैं। अर्दली को दुआएँ दी और कहा कि जरी ये खत हुजूर की खिदमत में पेश कर दो; मेरे बुढ़ापे पे तरस खाओ। अर्दली को रजिस्‍टर खोलकर दिया और खत पर हाथ रखकर बतला भी दिया। हाकिमे-जमाना बाप की लिखावट बरसों बाद अचानक देखकर बहुत खुश हुए, रजिस्‍टर के दूसरे सर्टिफिकेट पढ़ने लगे, फिर बुलाकी मियाँ को बुलवा लिया।

हाजी बुलाकी मियाँ महज खालिस माल से ही नहीं, बल्कि अपनी बातों और अदब-कायदे से भी ग्राहकों को खुश करते हैं। हाकिमें-जमाना, उनकी बेगम साहबा और दोनों जवान बेटियों के हाथ में तश्‍तरियाँ पहुँची नहीं कि हाजी बुलाकी ले उड़े : “कुल्फी में हूजूर दूध औटाने और शकर मिलाने में ही सिफ्त होती है। कुल्फी की तारीफ तो तब है जब कि यहाँ खोली जाए और बनारसी बाग में जाकर खाई जाए। इतनी देर में अगर कुल्फी गल जाए तो फिर हुजूर वह शौ‍कीनों के खाने के काबिल नहीं। और बात सरकार यहीं तक नहीं, कुल्फी जमाने के फेर में अगर इतनी बरफ डाल दी कि खानेवाले के दाँत गले और जबान ठिठुरी तो फिर हुजुर सिफ्त क्‍या रही! आजकल के कुल्फी वाले लखनऊ के पुराने हुनर को नहीं जानते। हमारे उस्‍ताद ने सिखाया था कि अव्‍वल तो ये समझो कि कुल्फी में तरावट किस चीज की है, बरफ की या दूध, मलाई, रबड़ी, फलों, मेवों की। यही तो पकड़ की बात है बेगम साहबा, अल्‍ला आप सबको जीता रक्‍खे। माल को हुजूर तरावट इतनी ही देनी चाहिए कि उस पर से मौसमे-गर्मी का असर हट जाए। अगर दाँत गले तो परखैया परखेगा क्‍या?”

पढ़ी-लिखी लड़कियों और हाकिमे-आला पर बातों का असर होने लगा।

बुलाकी मियाँ ने लड़कियों की ओर मुखातिब होकर सुनाया, ”आपके जन्‍नतनशीं दादाजान को खुश करना हर एक के बस की बात न थी, हुजूर मेरी बात के गवाह होंगे। आपके दादाजान एक बार छोटे लाट साहब के यहाँ खाना खाने गए थे। वहाँ मुर्ग-मुसल्‍ल्‍म की बड़ी तारीफ हो रही थी। कई और अंग्रेज हाकिम थे। शहर के कुछ रईस नवाब भी थे। सभी लाट साहब के बावर्ची के लाम बाँध चले। आपके दादाजान खामोश बैठे रहे। लाट साहब बोले कि नवाब साहब आपने तारीफ नहीं की। आपके दादाजान ने फरमाया कि हुजूर, तारीफ के काबिल कोई चीज तो हो। फिर उन्‍होंने अपने यहाँ सबको दावत दी। साहबजादियों, मेरी बात के चश्‍मदीद गवाह हमारे सरकार यहाँ तशरीफ-फर्मा हैं। जहाँ तक मुझे ध्‍यान है, हुजूर उस वक्त कोई दस या ग्‍यारह साल के रहे होंगे।”

इसके बाद हाकिमे-जमाना और उनका खानदान हाजी बुलाकी मियाँ का अजसरे नौ सरपरस्‍त हो गया। फिर कोई शानदार कोठी-बँगलेवाला हाजी बुलाकी की कुल्फियों से महरूम न रहा। हाजी बुलाकी की कुल्फी और निमिष का शुमार भी लखनऊ के कल्‍चर में हो गया। विदेशी मेहमानों को लखनऊ आने पर चिकन के कुरते, दुपलिया टोपी, रूमाल और साड़ियाँ, मिट्टी के खिलौने और मशहूर इत्रों के तोहफे तो दिए ही जाते थे, हाजी बुलाकी की कुल्फी या सर्दियों में निमिष भी खिलाई जाने लगी। अंग्रेजी के अखबारवालों ने उनकी तस्‍वीरें तक छापीं। साल-भर में हाजी साहब का कारबार चल निकला। जो पहले की आमदनी के मुकाबिले में अब चौथाई भी न होती थी, क्‍योंकि इनाम-इकराम देनेवाले रईस अब नहीं रहे, पर जमाने को देखते हुए हाजी साहब की रोजी सध गई। मुनाफे के लालच में माल निखालिस न किया, इ़ज्जत और नाम पर डटे रहे। धीरे-धीरे दो पोतों को हाकिमे-जमाना की बदौलत मुस्‍तकिल चपरासियों में भरती करवाया। मुहल्‍ले-पड़ोस और रिश्‍तेदारी के कई लड़कों को छोटे-मोटे काम दिलाए। बड़ी इज्जत बढ़ गई। खुदा का शुक्र है, बूढ़ी जि़ंदा है, बहू है, बड़े पोते की बहू है। अल्‍लाह के फजलो-करम से उसके आगे भी दो बच्‍चे हैं। छोटे पोते की शादी भी पारसाल कर दी, मगर वह लड़की बड़ी कल्‍लेदराज है। सुख-चैन के चाँद में बस यही एक गहन लग गया है, वरना हाजी बुलाकी अब अपना गम भूल चुके हैं।

ए‍क दिन किसी वक्त की नामी नाचनेवाली मुश्‍तरीबाई का आदमी उन्‍हें बुलाने आया। हाजी दोपहर के वक्त उसके यहाँ गए। उन्‍होंने मुश्‍तरी को बच्‍ची से जवान और बूढ़ी होते देखा था। उसका जमाना देखा था कि रईसों-नवाबों के पलक-पाँवड़ों पर चलती थी। अब भी पुरानी लाखों की माया है मगर जमाना अब तवायफों का नहीं रहा। लड़कियों को बी.ए., एम.ए. पास कराया है, मगर अब गाड़ी आगे नहीं चलती। दरअस्‍ल मुश्‍तरी चाहती है कि दोनों की कहीं शादियाँ कर दे। यही नामुमकिन लगता है। हारकर दोनों को अदब-तहजीब सिखाई और थोड़ी-बहुत नाच और गाने की तालीम भी दिलवा दी है। कचोट लड़कियों के जी में भी है, मुश्‍तरी के मन में भी। आजकल सहारनपुर का एक रईसजादा दोनों लड़कियों का नया-नया दोस्‍त हुआ है। उसे शादी करने से एतराज नहीं, क्‍योंकि उसकी माँ एक योरोपियन नर्स थी, जिसे उसके वालिद ने मुसलमान बनाकर अपनी कानूनी बीवी बनाया था। यह लड़का जब लखनऊ आता है तो फलाँ-फलाँ अफसर के घर मेहमान होता है। उनके यहाँ हाजी की निमिष खा चुका है, हाजी को जानता है। मुश्‍तरी हाजी बुलाकी की बातों के कमाल को जानती है। बाप की तरह उनके पैर पकड़कर कहा, ”उस लड़के को अपने शीशे में उतार लें हाजी साहब तो बड़ा सबाब होगा। मैं जानती हूँ, आयंदा जमाने में ये जिंदगी इन लड़कियों से न सधेगी। अब इस पेशे में इज्जत नहीं रही। एक से पार पाऊँ तो दूसरी के हाथ पीले करने का रास्‍ता खुले।”

हाजी बुलाकी मान गए। दूसरे दिन शाम की मुश्‍तरी के यहाँ जा पहुँचे। बड़ी आवभगत हुई। सहारनपुरी रईसजादा वहाँ मौजूद था, दोनों लड़कियाँ तो थीं ही।

हाजी ने गले में हाथ डालते हुए कहा, ”छोटे सरकार, खाना-पहनना और इश्क करना यों तो परिंदे-दरिंदे तक जानते हैं, मगर इनमें तमीज रखने और हजार पर्तें छानकर इनकी खूबी और अस्लियत पहचानने की कूवत अल्‍लाह ताला ने सिरिफ इनसान को ही अता फरमाई है। वो भी हर एक को नसीब नहीं। आपको अपने लड़कपन का हाल सुनाता हूँ। कोई सोलह-सत्रह बरस की उमर होगी मेरी। उस्‍ताद के साथ जाया करता था। एक बहुत बड़े ताल्‍लुकेदार थे। लंबा-चौड़ा डील-डौल, गोरा सुर्खाबी बदन और उनकी बड़ी-बड़ी आँखें हसीन नाजनियों के लिए चुंबक थीं। आला ईरानी खानदान के, पुश्‍त-दर-पुश्‍त से पोतड़ों के रईस थे। मगर आम रईसों की तरह भोले-भाले न थे। उनके दो आँखें ऊपर थीं तो चार भीतर थीं। सबका राज लेकर किसी को अपना राज न देते थे। अपने जमाने के पक्‍के खिलाड़ी थे। सरकार, हजारों ने घेरा उन्‍हें, सैकड़ों ने रिझाया, जाल-कंपे डाले, मगर जिस तवायफ का मैं जिकर कर रहा हूँ वह अपने जमाने की नामी और हसीन थी। दिल में तमन्‍ना रखकर भी उसने कभी मुँह से कुछ न कहा। नवाब साहब उसकी खि़दमतों को समझते रहे। जब खूब परख लिया तो उसे निहाल भी कर दिया। बाकी सब मुँह देखते ही रह गईं। फिर ऐसा भी वक्त आया कि नवाब साहब अपने चचा से मुकदमा लड़कर अपनी कुल इस्‍टेट हाई कोरट में हार गए। तब उस तवायफ ने कहा कि जानेमन, तुम हो मेरे, ये जेवर, दौलत और जायदाद मेरी नहीं है। इससे लंदनवाली अदालत तक मुकदमा लड़ो और सुर्खरूई हासिल करो। यही हुआ भी। नवाब साहब फिर मालामाल हो गए। बाद में नवाब साहब ने उस तवायफ से पूछा कि तुमने मुझमें ऐसा क्‍या देख लिया, जो औरों की नजर में न पड़ा। तवायफ बोली, ‘मैंने देखा कि तुम उतावले नहीं, बल्कि पारखी हो और इनसाफ-पसंद हो। बस इसके सिवा फिर कुछ देखने को नहीं रहा।’ इस पर नवाब साहब ने उससे कहा, ‘सैलाबे-इश्क अब अपनी हद पर है। अब मैं तुम्‍हें अपनी नौकर तवायफ की हैसियत से नहीं देख पाता। तुम मेरी मलिका हो।’ बाकायदा हुजूर निकाह पढ़वाकर उसे अपने महलों में ले गए। तो इश्क इसे कहते हैं। हर चीज हुजूर समझदारी माँगती है। अब कुल्फियों को ही ले लीजिए – एक-एक ठंडा रेशा मुँह की गर्मी पाते ही पहले तो खिले और फिर धीरे-धीरे घुलता जाए। ज्‍यों-ज्‍यों घुले त्‍यों-त्‍यों मिठास बढ़ती जाए। जो खुशबू या जो मसाले डाले हों, वे अपनी जगह पर बोलें। …यही मजा इश्क का भी है। सरकार का रुतबा आला है, मगर उम्र में हुजूर मेरे बच्‍चों के बच्‍चे के बराबर हैं। मेरी बातें आजमा देखिएगा।”

हुजूर पर हाजी की बातों का सुरूर गँठने लगा। हाजी बुलाकी कुल्फियाँ खिलाते चले। लड़कियों और मुश्‍तरी की तारीफ करते चले, ”लड़कियाँ रतन हैं, मगर खुदा के इनसाफ से जिस पेशे में जन्‍म लिया है, उसमें बेचारियों को बेकुसूर घुटना होगा। कहाँ तो ये पढ़ी-लिखी तहजीब-याफ्ता लड़कियाँ, और कहाँ आज के जमाने का दोजख…।

”हुजूर, यह मुश्‍तरी बड़ी नेक लड़की है। इसने अपना जमाना देखा है। मगर मैं इसके मुँह पर कहता हूँ कि अभी तो लड़कियों का मुँह देखकर इस फिराक में हैं कि इनकी शादियाँ हो जाएँ। मगर खुदा मेरी इन बच्चियों को हर खतरे से बचाए, महज बात के तौर पर ही कह रहा हूँ कि बाद में हारकर यही मुश्‍तरी लड़कियों से कहेगी कि पेशा करो, यारों को ठगो और मेरे कहे मुताबिक तुम लोग नहीं करोगी तो घर से निकलो। अरे हुजूर, झूठ नहीं कहता, अपनी लड़कियों के हक में इन नायकाओं से बढ़ कर कोई बुरा नहीं होता। रुपयों की लूट के पीछे दीवानी ये और कुछ भी नहीं सोचतीं। आपको एक किस्‍सा सुनाता हूँ गरीब-परवर। एक नौजवान रईस थे। एक तवायफ से दिल मिल गया। उसे निहाल कर दिया। मगर नायका का पेट इतने से ही न भरा। एक और बूढ़े भोंदू रईस को भी फँसा लिया। लड़की लाख कहे कि अम्‍मा मुझसे बेवफाई न कराओ मगर अम्‍मा झिड़क-झिड़क दें। कहें कि ऐसा सदा से होता आया है। खैर हुजूर होते, करते एक दिन नौजवान रईस को भी पता चल गया। वह चार गुंडों को लेकर उसके कोठे पर चढ़ आया। तवायफ की नाक काटी, बूढ़े की तोंद में करौली घुपी। बड़ा बावेला, तोबा-तिल्‍ला मचा। खैर, किस्‍सा खत्‍म हुआ मगर बेचारी लड़की नाक कटने के बाद दीनो-दुनिया, किसी अरथ की न रही। बतलाइए, मला उसका क्‍या कुसूर था, जो ये सजा पाई। यही न कि तवायफ के घर पैदा हुई थी; इसलिए अपने आशिक से शादी न कर सकी और अपनी नायका – अम्‍मा के बस में उसे रहना पड़ा। मैं ऐसी-ऐसी सैकड़ों मिसालें दे सकता हूँ। इस बच्‍ची की सूरत देखकर तरस आता है। अब तो सरकार भी यह पेशा खत्‍म कर रही है। खुदा इन पर रहम करें।”

बातों का सिलसिला बढ़ाते रहे और दो-तीन रोज में ही लड़का राजी हो गया। मुश्‍तरी अब हाजी बुलाकी के पाँव पकड़ती है, कहती है, दूसरी की शादी भी करवा दो, तब घर बैठकर खुदा का नाम लेना।

लेकिन अब एक मुश्‍तरी की लड़कियाँ ही नहीं, कई और भी हाजी साहब से नई जिंदगी माँगती हैं। हाजी दिल ही दिल में परेशान रहते हैं कि सबको कहाँ पार लगाएँ।

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गौरी

अनुमानित समय : 12 मिनट-

शाम को गोधूलि की बेला, कुली के सिर पर सामान रखवाये जब बाबू राधाकृष्ण अपने घर आये, तब उनके भारी-भारी पैरों की चाल, और चेहरे के भाव से ही कुंती ने जान लिया कि काम वहाँ भी नहीं बना। कुली के सिर पर से बिस्तर उतरवाकर बाबू राधाकृष्ण ने उसे कुछ पैसे दिए। कुली सलाम करके चला गया और वह पास ही पड़ी, एक आराम कुर्सी पर जिसके स्प्रिंग खुलकर कुछ ढीले होने के कारण इधर-उधर फैल गए थे, गिर से पड़े। उनके इस प्रकार बैठने से कुछ स्प्रिंग आपस में टकराए, जिससे एक प्रकार की झन-झन की आवाज़ हुई। पास ही बैठे कुत्ते ने कान उठाकर इधर-उधर देखा फिर भौं-भौं करके भौंक उठा। इसी समय उनकी पत्नी कुंती ने कमरे में प्रवेश किया। काम की सफलता या असफलता के बारे में कुछ भी न पूछकर कुंती ने नम्र स्वर में कहा, “चलो हाथ-मुंह धो लो, चाय तैयार है।
‘चाय’, राधाकृष्ण चौंक से पड़े, “चाय के लिए मैंने नहीं कहा था।”
“नहीं कहा था तो क्या हुआ, पी लो।” कुंती ने आग्रहपूर्वक कहा।
“अच्छा चलो”, कहकर राधाकृष्ण कुंती के पीछे-पीछे चले गए।
गौरी, अपराधिनी की भाँति, माता-पिता दोनों की दृष्टि से बचती हुई, पिता के लिए चाय तैयार कर रही थी। उसे ऐसा लग रहा था कि पिता की सारी कठिनाइयों की जड़ वही है। न वह होती और न पिता को उसके विवाह की चिन्ता में, इस प्रकार स्थान-स्थान घूमना पड़ता। वह मुँह खोलकर किस प्रकार कह दे कि उसके विवाह के लिए इतनी अधिक परेशानी उठाने की आवश्यकता नहीं। माता-पिता चाहे जिसके साथ उसकी शादी कर दें, वह सुखी रहेगी। न करें तो भी वह सुखी है। जब विवाह के लिए उसे जरा भी चिन्ता नहीं, तब माता-पिता इतने परेशान क्यों रहते हैं–गौरी यही न समझ पाती थी। कभी-कभी वह सोचती–क्या मैं माता-पिता को इतनी भारी हो गयी हूँ? रात-दिन सिवा विवाह के उन्हें और कुछ सूझता नहीं। तब आत्मग्लानि और क्षोभ से गौरी का रोम-रोम व्यथित हो उठता। उसे ऐसा लगता कि धरती फटे और वह समा जाय, किन्तु ऐसा कभी न हुआ।
गौरी, वह जो पूनो के चाँद की तरह बढ़ना भर जानती थी, घटने का जिसके पास कोई साधन न था, बाबू राधाकृष्ण के लिए चिंता की सामग्री हो गई थी। गौरी उनकी एकमात्र संतान थी। उसका विवाह वे योग्य वर के साथ करना चाहते थे, यही सबसे बड़ी कठिनाई थी। योग्य पात्र का मूल्य चुकाने लायक उनके पास यथेष्ट संपत्ति न थी। यही कारण था कि गौरी का यह उन्नीसवाँ साल चल रहा था। फिर भी वे कन्या के हाथ पीले न कर सके थे। गौरी ही उनकी अकेली संतान थी । छुटपन से ही उसका बड़ा लाड़-प्यार हुआ था । प्राय: उसके उचित-अनुचित सारे हठ पूरे हुआ करते थे । इसी कारण गौरी का स्वभाव निर्भीक, दृढ़-निश्चयी और हठीला था । वह एक बार जिस बात को सोच-समझकर कह दे, फिर उस बात से उसे कोई हटा नहीं सकता था । पिता की परेशानियों को देखते हुए अनेक बार उसके जी में आया कि यह पिता से साफ-साफ पूछे कि आखिर वे उसके विवाह के लिए इतने चिंतित क्यों हैं ? वह स्वयं तो विवाह को इतना आवश्यक नहीं समझती । और अगर पिता विवाह को इतना अधिक महत्त्व देते हैं, तो फिर पात्र और कुपात्र क्या ? विवाह करना है कर दें, किसी के भी साथ, वह हर हालत में सुखी और संतुष्ट रहेगी । उनकी यह परेशानी, इतनी चिंता अब उससे सही नहीं जाती । किंतु संकोच और लज्जा उसकी जबान पर ताला-सा डाल देते । हजार बार निश्चय करके भी वह पिता से यह बात न कह सकी ।
पिता को आते देख, गौरी चुपके से दूसरे कमरे में चली गई । राधाकृष्ण बाबू ने जैसे बेमन से हाथ-मुँह धोया और पास ही रखी एक कुरसी पर बैठ गए । वहीं एक मेज पर कुन्ती ने चाय और कुछ नमकीन पूरियाँ पति के सामने रख दीं । पूरियों की तरफ राधाकृष्ण ने देखा भी नहीं । चाय का प्याला उठाकर पीने लगे ।
ऐसी कन्या को जन्म देकर, जिसके लिए वर ही न मिलता हो, कुन्ती स्वयं ही जैसे अपराधिन हो रही थी । कुन्ती ने डरते-डरते पूछा, जहाँ गए थे क्या वहाँ भी कुछ ठीक नहीं हुआ ?
-ठीक ! ठीक होने को वहाँ धरा ही क्या है, चाय का घूँट गले से नीचे उतारते हुए बाबू राधाकृष्ण ने कहा, सब हमीं लोगों पर है । विवाह करना चाहें तो सब ठीक है, न करना चाहें तो कुछ भी ठीक नहीं है।
कुन्ती ने उत्सुकता से पूछा, फिर क्या बात है, लड़के को देखा?
-हाँ देखा, अच्छी तरह देखा हूँ ! कह राधाकृष्ण फिर चाय पीने लगे । कुन्ती की समझ में यह पहेली न आई, उसने कहा, ‘जरा समझाकर कहो । तुम्हारी बात तो समझ में ही नहीं आती ।’
राधाकृष्ण ने कहा, “समझाकर कहता हूँ, सुनो। वह लड़का, लड़का नहीं आदमी है। तुम्हारी गौरी के साथ मामूली चपरासी की तरह दिखेगा। बोलो करोगी ब्याह?”
कुंती बोली, ”विवाह की बात तो पीछे होगी। क्या रूप-रंग बहुत खराब है ? फोटो में तो वैसा नहीं जान पड़ता।”
राधाकृष्ण ने कहा, “रूप-रंग नहीं, रहन-सहन बहुत खराब है । उम्र भी अधिक है, पैंतीस-छस्तीस साल । साथ ही दो बच्चे भी । उन्हीं बच्चों को सँभालने के लिए तो वह विवाह करना चाहते हैं, वरना वे शायद कभी न करते। उनकी यह दूसरी शादी होगी। उनकी उमंगें , उत्साह सब कुछ ठंडा पड़ चुका है। वे अपने बच्चों के लिए एक धाय चाहते हैं”, मेरी लड़की की तो दूसरी शादी नहीं है। वे साफ़-साफ़ कहते हैं कि मैं बच्चों के लिए शादी कर रहा हूँ।”
कुंती ने कहा, है ‘जिन्हें दूसरी शादी करनी होती है वे ऐसे ही कहते हैं।”
राधाकृष्ण बोले, “अरे नहीं-नहीं यह आदमी कपटी नहीं है। उसके भीतर कुछ और बाहर कुछ नहीं हो सकता। उसका हदय तो दर्पण की तरह साफ़ है। उसका खादी कुरता, गांधी टोपी, फटे-फटे चप्पल देखकर जी हिचकता है। वह नेता बनकर व्याख्यान तो दे सकता है, पर दूल्हा बनकर आने लायक नहीं है। तीस रुपए कुल उनकी तनख्वाह है। कांग्रेस के दफ्तर में वे सेक्रेटरी हैं। तीन बार जेल जा चुके हैं, फिर कब चले जाएँ कुछ पता नहीं।’
कुंती बोली, “आदमी तो बुरा नहीं जान पड़ता।’
राधाकृष्ण ने कहा, “बुरा आदमी तो मैं भी नहीं कहता उसे, पर वह गौरी का पति होने लायक नहीं । सच बात यह है।”
कुंती बोली, “फिर तुमने क्या कह दिया?”
राधाकृष्ण ने कहा, “क्या कह देता? उन्हें बुला आया हूँ। अगले इतवार को आवेंगे। आने के लिए भी वे बडी मुश्किल सै तैयार हुए: कहने लगे, नहीं साहब ! मैं लड़की देखने न जाऊँगा। इस तरह लड़की देखकर मुझसे किसी लड़की का अपमान नहीं किया जाता। जब मैंने समझाकर कहा कि आप लड़की देखेंगे लड़की और उसकी माँ आपको देखेंगी, तब जाकर कहीं बड़ी मुश्किल से राजी हुए ।”
गौरी दरवाजे की आड़ में खड़ी सब बातें सुन रही थी है जिस व्यक्ति के प्रति उनके पिता इतने असंतुष्ट और उदासीन थे, उसके प्रति गौरी के हदय में अनजाने ही कुछ श्रद्धा के भाव जाग्रत हो गए । राधाकृष्ण बाबू पान का बीड़ा उठाकर अपनी बैठक में चले गए । और उसी रात फिर उन्होंने अपने कुछ मित्रों और रिश्तेदारों को गौरी के लिए योग्य वर तलाशने को कई पत्र लिखे ।
अगला इतवार आया । आज ही बाबू सीताराम जी, गौरी को देखने या अपने आपको दिखलाने आवेंगे । राधाकृष्ण जी ने यह पहले से ही कह दिया है कि किसी बाहर वाले को कुछ न मालूम पड़े कि कोई गौरी को देखने आया है । अतएव यह बात कुछ गुप्त रखी गई है । घर के भीतर आँगन में ही उनके बैठने का प्रबंध किया गया है । तीन-चार कुर्सियों के बीच एक मेज है, जिस पर एक साफ धुला हुआ खादी का कपड़ा बिछा दिया गया है । और एक गिलास में आंगन के ही गुलाब के कुछ फूलों को तोड़कर, गुलदस्ते का स्वरूप दिया गया है । बहुत ही साधारण-सा आयोजन है । सीताराम जी सरीखे व्यक्ति के लिए किसी विशेष आडंबर की आवश्यकता भी तो न थी ।
यथासमय बाबू सीताराम जी अपने दोनों बच्चों के साथ आए । बच्चे भी वही खादी के कुरते और हाफपैंट पहने थे । न जूता न मोजा, न किसी प्रकार का ठाटबाट । पर दोनों बड़े प्रसन्न, हँसमुख; आकर घर में वे इस प्रकार खेलने लगे जैसे इस घर से चिरपरिचित हों । कुंती एक तरफ बैठी थी । बच्चों के कोलाहल से परिपूर्ण घर उसे क्षण भर के लिए नंदनकानन-सा जान पड़ा । उसने मन-ही-मन सोचा, कितने अच्छे बच्चे हैं । यदि बिना किसी प्रकार का संबंध हुए भी, सीताराम इन बच्चों के संभालने का भार उसे सौंप दें, तो वह खुशी-खुशी ले ले । वह बच्चों के खेल में इतनी तन्मय हो गई कि क्षण भर के लिए भूल बैठी कि सीताराम भी बैठे हैं, और उनसे भी कुछ बातचीत करनी है । इसी समय अचानक छोटे बच्चे को जैसे कुछ याद आ गया हो, दौड़कर पिता के पास आया । उनके पैरों के बीच में खड़ा होकर बोला, बाबू, तुम तो कैते थे न कि माँ को दिखाने ले चलते हैं । माँ कआँ है, बतलाओ?
बाबू ने किंचित् हँसकर कहा, ये माँ जी बैठी हैं, इनसे कहो, यही तुम्हें दिखाएँगी ।
बालक ने मचलकर कहा, ‘ऊँ हूँ तुम दिकाओ ।’ और इसी समय एक बड़ी-सी सफेद बिल्ली आँगन से होती हुई भीतर को भाग गई । बच्चे बिल्ली के पीछे सब कुछ भूलकर, दौड़ते हुए अंदर पहुंच गए । गौरी पिछले दरवाजे पर चुपचाप खड़ी थी । वह न जाने किस खयाल में थी । छोटे बच्चे ने उसका आँचल पकड़कर खींचते हुए पूछा, तुम अमारी मां हो ?
गौरी ने देखा हृष्ट-पुष्ट सुंदर-सा बालक, कितना भोला, कितना निश्चल । उसने बालक को गोद में उठाकर कहा, हां ।
बच्चे ने फिर उसी स्वर में पूछा, अमारे घर चलोगी न ? बाबू तो तुम्हें लेने आए हैं औल हम भी आए हैं।
अब तो गौरी उसकी बातों का उत्तर न दे सकी । पूछा, मिठाई खाओगे ?
कुछ क्षण बाद कुंती ने अंदर देखा, छोटा बच्चा गौरी की गोद में और बड़ा उसी के पास बैठा मिठाई खा रहा है । एक नि:श्वास के साथ कुंती बाहर चली गई और थोड़ी देर बाद ज्योंही गौरी ने ऊपर आँख उठाई, उसने माता-पिता दोनों को सामने खड़ा पाया । पिता ने स्नेह से पुत्री से कहा, बेटा जरा चलो, चलती हो न ?
गौरी ने कोई उत्तर न दिया । उसने बच्चों का हाथ-मुँह धुलाया, उन्हें पानी पिलाया, फिर मां के पीछे-पीछे बाहर चली गई । बच्चे अब भी उसी को घेरे हुए थे । वे उसे छोड़ना नहीं चाहते थे । बही मुश्किल से सीताराम जी उन्हें बुलाकर कुछ देर तक अपने पास बिठा सके, किंतु जरा-सा मौका पाते ही वे फिर जाकर गौरी के आसपास बैठ गए । पिता के विरुद्ध उन्हें कुछ नालिशें भी दायर करनी थीं, जो पिता के पास बैठकर न कर सकते थे।
छोटे ने कहा, बाबू हमें कबी खिलौने नहीं ले देते।
बड़े ने कहा, मिठाई भी तो कभी नहीं खिलाते ।
छोटा बोला, और अमें छोड़कर दफ्तर जाते हैं, दिन भर नई आते, बाबू अच्छे नई हैं ।
बड़ा बोला, मां तुम चलो, नहीं तो हम भी यहीं रहेंगे ।
बच्चों की बातों से सभी को हंसी आ रही थी । कुन्ती ने बच्चों से कहा, तो तुम दोनों भाई यहीं रह जायो, बाबू को जाने दो, है न ठीक?
काफी देर हो गई यह देखकर सीताराम जी ने कहा, समय बहुत हो चुका है, अब चलूँगा, नहीं तो शाम की ट्रेन न मिल सकेगी । फिर राधाकृष्ण की तरफ देखकर कहा, आप लोगों से मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई । लड़की तो आपकी साक्षात् लक्षमी है । और यह मैं जानता था कि आपकी लड़की ऐसी ही होगी, इसीलिए देखने को आना नहीं चाहता था । फिर कुछ ठहरकर बोले, और सच बात तो यह है कि मुझे पत्नी की उतनी जरूरत नहीं, जितनी इन बच्चों को जरुरत है एक मां की । मेरा क्या ठिकाना ? आज बाहर हूँ कल जेल में । मेरे बाद इनकी देख-रेख करने बाला कोई नहीं रहता । यही सोच-समझकर विवाह करने को तैयार हो सका हूँ, अन्यथा इस उमर में विवाह? कहकर वे स्वयं हँस पड़े ।
राधाकृष्ण ने मन-ही-मन सोचा, तो मेरी लड़की इनके बच्चों की धाय बनकर जाएगी । कुंती ने सोचा, कोई भी स्त्री ऐसे बच्चों का लालन-पालन कर अपना जीवन सार्थक बना सकती है! गौरी ने मन-ही-मन इस महापुरुष के चरणों में प्रणाम किया और बच्चों की और ममता-भरी दृष्टि से देखा । जैसे यह दृष्टि कह रही थी कि किसी विलासी युवक की पत्नी बनने से अधिक मैं इन भोले-भाले बच्चों की मां बनना पसंद करूँगी । सीताराम जी को जाने के लिए प्रस्तुत देख, बच्चे फिर गौरी से लिपट गए । झूठ ही सही, यदि राधाकृष्ण एक बार भी कहते कि बच्चों को छोड़ जाओ तो सीताराम बच्चों को छोड़कर निश्चिंत होकर चले जाते । परंतु इस ओर से जब ऐसी कोई बात न हुई तो बच्चों को सिनेमा, सरकस और मिठाई का प्रलोभन देकर बड़ी कठिनाई से गौरी से अलग करके वे ले जा सके । जाते समय सीताराम जी को पक्का विश्वास था कि विवाह होगा, केवल तारीख निश्चित करने भर की देर है ।
सीताराम जी उस पत्र की प्रतीक्षा में थे जिसमें विवाह की निश्चित तारीख लिखकर आने वाली थी । देश की परिस्थिति, गवर्नमेंट का रुख, और महात्माजी के वक्तव्यों को पढ़कर, वे जानते थे कि निकट भविष्य में फिर सत्याग्रह-संग्राम छिड़ने बाला है । न जाने किस दिन उन्हें फिर जेल का मेहमान बनना पड़े । पिछली बार जब गए थे तब उनकी बूढ़ी बुआ थीं, पर अब तो वे भी नहीं रहीं । यह कहारिन क्या बच्चों की देखभाल कर सकेंगी । बच्चों की उन्हें बड़ी चिंता थी । और बच्चे भी सदा ही मां-मां की रट लगाए रहते थे । उन्होंने फिर एक पत्र बाबू राधाकृष्ण को शीघ्र ही तारीख निश्चित काने के लिए लिख भेजा । उधर राधाकृष्ण जी दूसरी ही बात तय कर रहे थे । उन्होंने सीताराम के पत्र के उत्तर में लिख भेजा कि गौरी की मां पुराने खयाल की है । वे बिना जन्मपत्री मिलवाए विवाह नहीं करना चाहतीं । अतएव आप अपनी जन्मपत्री भेज दें । पत्र पढ़ने के साथ ही सीताराम को यह समझने में देर न लगी कि यह विवाह न करने का केवल बहाना मात्र है, किन्तु फिर भी उन्होंने जन्मपत्री भेज दी । जन्मपत्री भेजने के कुछ ही दिन बाद उत्तर भी आ गया कि जन्मपत्री नहीं मिलती, इसलिए विवाह न हो सकेगा, क्षमा कीजिएगा ।
बाबू राधाकृष्ण को गौरी के लिए दूसरा वर मिल गया था, जो उनकी समझ में गौरी ” के बहुत योग्य था । धनवान ये भी अधिक न थे । पर अभी-अभी नायब तहसीलदार के पद पर नियुक्त हुए थे, आगे और भी उन्नति की आशा थी । बी०ए० पास थे । देखने में अधिक सुंदर न थे । बदशक्ल भी कहे जा सकते थे, पर पुरुषों की भी कहीं सुंदरता देखी जाती है ? उमर कुछ अधिक न थी, यही 24-25 साल । लेने-देने का झगड़ा यहाँ भी न था । पहली शादी थी और माँ-बाप, भाई-बहन से भरा-पूरा परिवार था । राधाकृष्ण जी इससे अधिक और चाहते ही क्या थे । ईश्वर को उन्होंने कोटिश: धन्यवाद दिए, जिसकी कृपा से ऐसा अच्छा वर उन्हें गौरी के लिए मिल गया ।
विवाह आगामी आषाढ़ में होना निश्चित दुआ । दोनों तरफ से विवाह की तैयारी हो रही थी । राधाकृष्ण जी की यही तो एक लड़की थी । वे बड़ी तन्मयता के साथ गहने-कपड़ों का चुनाव करते थे । सोचते थे, देर से शादी हुई तो क्या हुआ वर भी तो क्तिना अच्छा ढूँढ़ निकाला है । कुन्ती भी बहुत खुश थी । उसकी आँखों में यह दृश्य झूलने लगता था कि उसका दामाद छोटा साहब हो गया है, बेटी-दामाद छोटे-छोटे बच्चों के साथ उससे मिलने आए हैं । किंतु बच्चों की बात सोचते ही उसे सीताराम जी के दोनों बच्चे तुरंत याद आ जाते और याद आ जाती उनकी बात । बच्चों की देख-रेख करने वाला कोई नहीं है । फिर वह सोचती, ऊंह, दुनिया में और भी तो लड़कियाँ हैं । कर लें शादी, क्या मेरी गौरी ही है । इस प्रकार पति-पत्नी दोनों ही प्रसन्न थे, पर गौरी से कौन पूछता कि उसके हृदय में कैसी हलचल मची रहती है । रह-रहकर उसे उन बच्चों का भोला-भाला मुंह और मीठी-मीठी बातें याद आ जातीं । साथ ही याद आ जाते विनयी, नम्र और सादगी की प्रतिमा सीताराम जी । उनकी याद आते ही श्रद्धा से गौरी का माथा अपने आप ही झुक जाता । देशभक्त त्यागी वीरों के लिए उसके हदय में बड़ा सम्मान था । सीताराम जी ने भी तो देश के लिए अपने जीवन का उत्सर्ग कर दिया है, नहीं तो बी०ए० पास करने के बाद क्या प्रयत्न करने पर उन्हें नायब तहसीलदार की नौकरी न मिल जाती ? मिलती क्यों नहीं ? पर सीताराम जी सरकार की गुलामी पसंद करते तब न ?
दूसरी और थे उसके होनेवाले वर-नायब तहसीलदार साहब, जिन्हें अपने आराम, अपने ऐश के लिए ब्रिटिश गवर्नमेंट के जरा से इंगित मात्र से निरीह देशवासियों के गले पर छुरी फेरने में जरा भी संकोच या हिचक नहीं । जिनके सामने कुछ चाँदी के दुकड़े दिए जाते हैं और ये दुम हिलाते हुए, निंद्य-से-निंद्य कर्म करने में भी किंचित् लज्जित नहीं होते । घृणा से गौरी का जी भर जाता, किन्तु उसके इन मनोभावों को जानने वाला यहाँ कोई भी न था । वह रात-दिन एक प्रकार की अव्यक्त पीड़ा से विकल-सी रहती । बहुत चाहती थी कि अपनी मां से कह दे कि वह नायब तहसीलदार से शादी न करेगी, किंतु लज्जा उसे कुछ भी न कहने देती । ज्यों-ज्यों विवाह की तिथि नजदीक आती, गौरी की चिंता बढ़ती ही जाती थी ।
विवाह की निश्चित तारीख से पंद्रह दिन पहले एकाएक तार आया कि नायब तहसीलदार के पिता का देहांत हो गया । इस मृत्यु के कारण विवाह साल भर को टल गया । गौरी के माता-पिता बड़े दुखी हुए, किंतु गौरी के सिर पर से जैसे चिंता का पहाड़ हट गया ।
इसी बीच सत्याग्रह आंदोलन की लहर सारे देश में बड़ी तीव्र गति से फैल गई । शहर-शहर में गिरफ्तारियों का तांता लग गया । रोज ही न जाने कितने गिरफ्तार होते, कितनों को सजा होती । कहीं लाठी चार्ज !- कहीं 144 ! सरकार की दमन की चक्की बड़े भयंकर रूप से चल रही थी । गौरी को चिंता थी उन बच्चों की । जब से सत्याग्रह-संग्राम छिड़ा था, तभी से उसे फिकर थी कि न जाने कब सीताराम जी गिरफ्तार हो जाएँ । और फिर वे बच्चे बेचारे-उन्हें कौन देखेगा । रोज का अखबार ध्यान से पढ़ती, कानपुर का समाचार तो और भी ध्यान से देखती थी । इसी प्रकार उसने एक दिन पढ़ा कि राजद्रोह के अपराध में सीताराम जी गिरफ्तार हो गए । और उन्हें एक साल का सपरिश्रम कारावास हुआ है । इस समाचार को पढ़कर गौरी कुछ क्षण तक स्तब्ध-सी खड़ी रही, फिर कुछ सोचती हुई टहलने लगी । कुछ ही देर बाद उसने अपना कर्तव्य निश्चित कर लिया । वह मां के पास गई, मां कोई पुस्तक देख रही थी । उसने अपने सारे साहस को समेटकर दृढ़ता से कहा, ‘मां, मैं कानपुर जाऊँगी ।’
‘कानपुर में क्या है ?’ आश्चर्य से कुंती ने पूछा ।
गौरी ने कहा, ‘वहां बच्चे हैं ।’
मां ने उसी स्वर में कहा, ‘बच्चे ? कैसी बात करती हो गौरी, पागलों-सी ?’
गौरी बोली, ‘नहीं माँ, मैं पागल नहीं हूँ । बच्चों को तुम भी जानती हो । उनके पिता को राजद्रोह के मामले में साल भर की सजा हो गई । बच्चे छोटे हैं । मैं जाऊँगी माँ । मुझे जाना ही पड़ेगा ।’

गौरी के स्वभाव से कुन्ती भली-भांति परिचित थी । वह जानती थी कि गौरी जिस बात की हठ पकड़ती है, कभी छोड़ती नहीं है अतएव सहसा वह गौरी का विरोध न कर सकी, बोली, पर तेरे बाबू जी तो बाहर गए हैं, उन्हें तो आ जाने दे ।

गौरी ने दृढ़ता के साथ कहा, बाबूजी के आने तक नहीं ठहर सकूंगी मां। मुझे जाने दो । रास्ते में मुझे कुछ कष्ट न होगा । अब मैं काफी बड़ी हो गई हूँ ।

और उसी दिन शाम को एक नौकर के साथ गौरी कानपुर चली गई ।

अपनी सजा पूरी करके सीताराम घर लौटे । इस साल भर के भीतर उन्होंने बच्चों को एक बार भी न देखा था । उन्हें कायदे के अनुसार हर महीने उनका कुशल-समाचार मिल जाता था, पर बच्चों की चिंता उन्हें लगातार बनी ही रहती थी । जिस कहारिन के भरोसे वे बच्चों को छोड़ गए थे, उसके भी तीन-चार बच्चे थे । वह बच्चों को कैसे रखेगी, सो सीताराम जी जानते थे; पर विवशता थी क्या करते । सबेरे-सबेरे छै बजे ही जेल से मुक्त कर दिए गए । एक ताँगे पर बैठकर वे घर की ओर चले । जेब में कुछ पैसे थे । एक जगह गरम-गरम जलेबियां बन रही थीं । बच्चों के लिए थोड़ी-सी खरीद लीं । घर के दरवाजे पर पहुंचे । दरवाजा खुला था । घर के अंदर पैर रखने में हृदय धड़कता था । न जाने किस हालत में हों । वे चोरों की तरह चुपके-चुपके घर में घुसे । परंतु यह क्या ? आँगन में पहुंचते ही वे ठगे-से खड़े रह गए । फिर जरा आगे बढ़कर उन्होंने कहा, आप ?

गौरी ने झुककर उनकी पद-धूलि माथे से लगा ली ।

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एक रात

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इस ‘आज’, ‘कल’, ‘अब’, ‘जब’, ‘तब’ से सम्पूर्ण असहयोग कर यदि कोई सोचे क्या, खीज उठे कि इतना सब कुछ निगलकर – सहन कर इस हास्यास्पद बालि ने काल को क्यों बाँधा। इस ‘भूत’, ‘भविष्य’, ‘वर्तमान’ का कार्ड – हाउस क्यों खड़ा किया, हाँ, यदि सोचे क्या, खीज उठे कि कछुए के समान सब कुछ अपने में समेटे वर्तमान कितना शीतल और कठोर है और फिर उसे देखे, उसे क्यों, सृजन के इस अन्ध विपुल जन-संघात से किसी एक कृति को उठाकर माइक्रोस्कोपिक विज्ञता में पिघला दे; पर उसी को क्यों न देखे। हाँ, उसका – स्त्री का – शरीर, उसका नाम, उसका हर रूपेण सुरक्षित होना देखे और खीज उठे।

पर खीज क्यों उठे? आखिर क्यों? क्या खीज जाना इतना अन्तिम है? क्या उसके बिना ट्रेजडी बरबस एक असुन्दरता से खिलखिला ही उठेगी। यह सच है, वह विज्ञान के अपरिवर्तनशील नियम से द्रव के समान जीवन के साँचे में पड़ते ही ढल गई।, उसने एक पुरुष से प्रेम किया, दूसरे से विवाह किया, एक का हृदय तोड़ दिया, और उसका फोटो चूमा, दूसरे से अधिक – अत्यधिक निकट आकर विकृत कर दिया और यदि उसके ऊपर सुरक्षित कोई आँसू बहाने वाला होगा, तो वह अवश्य हँस दिया होगा।

‘‘प्रेमा’’, – उस भग्न-हृदय ने रुके हुए कंठ से कहा – ’’प्रेमा, यह खेल नहीं है। यह…’’

‘‘काश! यह खेल ही होता, सच मानो, मैं अपनी हार भुलाकर तुम्हारी विजय पर बधाई देती।’’ उसकी आत्मा पशु की आत्मा-सी रीति और सम्पूर्ण थी।

प्रेमा से उस भग्न-हृदय ने दृढ़ता से कहा – ’तुम पछताओगी, तुम – ’

‘‘सब कुछ किया है यह भी कर लूँगी।’’

जीवन का पावना रत्ती-रत्ती चुकाना होता है, उसकी आत्मा में दार्शनिक की छिछली प्रगल्भता थी। और उसके बाद उसने अपने आँसू दिखाकर छिपाए। उसकी सौगन्ध खाने के बदले में अपनी सौगन्ध खिलाई, ‘रुसवाई’ का अर्थ जानते हुए भी इसका प्रयोग तीन बार किया; पर इस सब पर समय की धूलि जम चुकी थी। अब वह चारों ओर से दृढ़, असम्पूर्णता में सम्पूर्ण, सम्पूर्णता में असम्पूर्ण सम्भ्रान्त रमणी थी, केशव के पत्र एक-एक अपने पति को पढ़वाकर जला दिए और अपनी पहली फैंसी पर हँसी और पति को बलात् हँसाया। उसका फोटो अपने सोने के कमरे में टाँगा, उसके उपहारों को सहेजा, लापरवाही से डाल दिया, फिर सहेजा, फिर उनकी असाधारणता भूलकर चारों ओर से एक कुशल निश्चिन्तता की साँस ली; जैसे उसका सारा जीवन, सारा अच्छा-बुरा मादा कंगारू के शिशु के समान उसके अंग ही में तो है। यह सब, पाँच वर्षों में अनियमित उपक्रम बिखरा हुआ है। इन पाँच वर्षों में केशव उससे दूर, सुदूर होता गया, निकट होने का कोई अर्थ भी न था, पर पाँच वर्ष बाद इस ‘मेरी गो-राउण्ड’ में वह फिर एक-दूसरे के सामने खड़े हो गए और कुछ विचित्र हास्यास्पद जीर्ण और अपंग उनके बीच में था। उसकी कथा इस प्रकार है –

प्रेमा के पति रेलवे के ऑफिसर हैं। प्रायः हेडक्वार्टर से बाहर जाते हैं, प्रेमा उन्हें स्टेशन पहुँचाने जाती है, वह उसकी ओर देखकर मुस्कराते हैं, यह उसकी ओर। वह कुछ गंभीर बात करना चाहते हैं, यह पूछती है, वह कौन है? वह जिसके साथ कुत्ते-ही-कुत्ते हैं? वह उसका हाथ दबाते हैं, वह मुस्कराती है, ऊँची एड़ियों की शिकायत करती है और गाड़ी चल देने पर रूमाल या घबराहट में छाता हिलाती है और उसके बाद अन्यमनस्क तेज-तेज चल देती है। ऐसी ही एक रात वह अकेली नहीं अपने दो वर्षीय शिशु को लेकर पति को विदा करने आई। चलते समय उसने शिशु को लेना चाहा; पर वह न आया और वह वैसे ही बोली ‘जाओ, इसे लिये जाओ, पापू से इसका जी ही भर जाए’ और वह सचमुच उसे लेकर चल दिए। उनका चपरासी चुटकियाँ बजा-बजाकर पोपले मुँह से उसकी हँसी की नकल कर रहा था और वह डूबकर अपने को सम्पूर्णतः भूलकर रेंगती हुई गाड़ी के साथ भागी। ‘माई बूबी’ पति ने घबराकर, डरकर, खीजकर कहा – विहेव’ उस स्वर में खीज थी या डपट वह निश्चय न कर सकी। और एक मिनट रिक्त रुककर तेज-तेज लौट पड़ी, लौटकर देखा एक कोने में ‘हिन्दू पानी’ से पीठ अड़ाए होल्डाल पर बैठा है केशव। वह ठिठकी, डरी और फिर खड़े होकर मुस्कराने लगी; पर केशव रेलवे टाइमटेबल इस त्याग से पढ़ रहा है जैसे ‘निराला’ की कविता हो। वह फिर मुस्कराई। अधिक हाव से और केशव उठा और उठकर रह गया।

प्रेमा ने कहा – ’तो बीमे का काम करते हो?’ और छठी बार निरर्थक हँस दी और केशव स्वादहीन, रंगहीन जीवन से कुछ खोज निकालने के प्रयास में उसे और भी उलझा रहा था।

‘और’, – प्रेमा उच्छ्वास लेकर बोली।

और केशव रिक्त नयनों से उसकी ओर देखकर बाहर अन्धकार में देखने लगा।

‘कपूर के यहाँ क्या खाया होगा, कुछ बनवाऊँ?’ दिक्कत है, मैं कुछ न खाऊँगी, नहीं तो अब तक बन जाता।

‘नहीं, नो-नो।’

‘चाय।’

‘ऊहूँ हूँ।’

फिर चुप-चुप दोनों इतने निकट आ गए कि प्रेमा उठी अचानक भद्देपन से ‘देखूँ’ और केशव ने सिगरेट जलाई और पाँच वर्षों को तत्परता से एकत्र कर टटोलने लगा। वह प्रेमा को भूल-सा गया था। पुरुषोचित शौर्य से बाधित वह भूल ही गया था; पर आज वह सोच रहा था कि वह इससे पहले इसी तरह अचानक वहाँ, जहाँ उसे सींग भली-भाँति समा सकते हैं, इससे पहले क्यों नहीं आया और प्रेमा क्या समय-चक्र के साथ इतनी तेजी से नहीं घूमती? वह बाहर बरामदे में निकल आया। देखा, प्रेमा एक कुर्सी पर बुत बनी बैठी है। अन्धकार में अनिश्चिन्तता में, उसके पद-चाप सुनकर वह उठ खड़ी हुई और हँस दी और यह हँसी केशव की रीढ़ की हड्डी में झनझना उठी, वह चुपचाप उसके निकट गया। शायद वह देखना चाहता था, उसको आत्मा के भीतर बिलकुल उसकी राक बॉटम में देखना चाहता हो, पर यह तो, हमारा खयाल है, प्रेमा ने लाइट जला दी और बिजली के तीव्र एकरस प्रकाश से उसका मुख एकबारगी अप्रतिभ हो गया।

‘लो, मेरा बीमा कर लो’, वह फिर हँस दी।

और केशव ने तिलमिलाकर सिगरेट को दो बार चूसकर फेंक दिया।

वह दोनों बैठ गए और फिर चुप; पर केशव जैसे अपने आपको अचानक एक क्षण में पा गया।

‘कौन जानता था (उच्छवास) कि हम लोग फिर मिलेंगे इस प्रकार (स्टॉप)।’

‘फिर मिलेंगे’… वह जैसे इन एक-एक शब्दों की सूक्ष्म ध्वनि नहीं, स्थूल शरीर दाँतों से चबाना चाहती है। केशव हताश हो गया।

‘प्रेमा’ – उसके स्वर में विचित्रता थी; पर वह इस विचित्रता से चौंकी नहीं, इंट्रीग्ड न हुई।

प्रेमा, तुम्हारे कै बच्चे हैं’ – जैसे इसी प्रश्न को करने के लिए शब्दों का दास बना हुआ है केशव। जैसे उसे यह प्रश्न करने का निर्विवाद अधिकार है। प्रेमा ने निर्विकार कहा – ’एक’, ‘नहीं’, जैसे वह साधारण ताश के खेल के ट्रम्पों से इनकार कर रही हो।

‘एक नहीं’ – वह चौंक उठा, एक विचित्र सन्तोष से, जैसे यह उत्तर पाने के लिए ही उसने यह प्रश्न किया था, फिर बोला – ’क्या तुम सुखी नहीं हो?’

‘सुखी’ – वह बोली जैसे वह कुछ न समझ रही हो।

‘प्रेमा’ – अब केशव ढर्रे पर आ रहा था, उसे एक अद्भुत असन्तोष ने आन्दोलित कर दिया। वह कुर्सी को दीवार से अड़ाता था। एक बार उसने हाथ बढ़ाकर उसकी शीतल, गोरी बाँहों को भी छूना चाहा, हाँ, छूना और उसे ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे इसमें कुछ भी आत्मीयता नहीं है, कुछ भी; पर प्रेमा चुप थी, शरीर और आत्मा से, यह नहीं कि वह केशव को जान-बूझकर अपने से दूर रखना चाहती थी, यह नहीं कि उसका मन इस विशेष परिस्थिति में व्यर्थ हो रहा था, वह अपनी ‘बेबी’ तक को भूल गयी थी, जैसे उसके कभी कोई बच्चा न था – जैसे जीवन में कहीं से कहीं लौट आना नितान्त सरल है। इस प्रकार हँसकर बोली – ’तुमने बच्चों की बात क्यों पूछी?

केशव जवाब देने के लिए मुस्कराया; पर तुरन्त ही गंभीर होकर कहने लगा – ’अच्छा यह स्वेटर किसके लिए बुन रही हो? क्या’…

प्रेमा एकदम नाटकीय हो उठी। उसका मुख खिल गया। उसके नेत्रों से सहस्रों फूल खिल गए और एक ‘धुत्’ करके वह कमरे की ओर लपकी।

केशव ने सहसा उठकर एक क्षण में उसका हाथ पकड़ लिया। उफ्, उसके हाथ कितने शीतल थे और उस क्षण की परिधि में उसने उसे छोड़ दिया। प्रेमा ने जाना, उसे सम्पूर्णतः जान लिया। उसका हाथ पकड़ना और इससे अधिक उसका छोड़ देना।

उसने कमरे में घुसकर द्वार बन्द कर लिये और नितान्त साधारण स्वर में बोली – ’’मैं सोती हूँ, तुम भी सोओ। बिस्तरा बिछा लो, नौकर कोई न आएगा।’

केशव – चुप।

प्रेमा – ’सो गए’?

केशव – ’प्रेमा!’

प्रेमा – ’सो जाओ।’

केशव – (भावुकता से) ‘प्रेमा, यहाँ आओ।’

प्रेमा – हम तो सो गए।’

केशव चुप-चुप-चुप जैसे वह सब कुछ प्रासंगिक द्रुतवेग से भूला जा रहा है, जैसे उसके चारों ओर के बन्धन उसे बलात् मुक्त कर देना चाहते हों और कुछ ही दूर एक स्त्री विचित्र-विचित्र; पर उसकी विचित्रता की कोई निश्चित छाया उसके मस्तिष्क तक नहीं पहुँचती थी। उसने कुछ सँभलकर कहा –

‘प्रेमा, मुझे नींद नहीं आ रही है, आओ कुछ देर बातें करें।’

‘क्या बातें करें?’ प्रेमा ने सम्पूर्णत: जाग्रत स्वर में कहा – ’कुछ!’

‘कुछ’ – प्रेमा ने यंत्रवत् दुहराया…

‘नहीं’, फिर कुछ रुककर कहा – ’मैंने अपनी साड़ी उतर दी है।’ केशव चुप, उसे चुप रहने का एक कारण मिला। उसका मन इसे खोज रहा हो एक विचित्र निश्चिन्तता से जैसे उसका कोई मुख्य अंग बुझ गया और वह केन्द्र-हीन भार-हीन होकर या तो तप्त हो गया या उसकी जीवन की परिधि को वह पार कर गई – वह भौंचक्का-सा बैठा रहा और फिर कुर्सी पर गिरकर वहीं सो गया।

सवेरे दिन चढ़े नौकर ने प्रेमा को जगाया। खिड़की की ओर से मेम साहब ‘बहू रानी’ की गुहार लगाकर। वह उठी। मलिन श्रमित आँखें सूजी थीं। ओठ विकृत थे, नौकर बोला – वह बाबू सबेरे ही चले गए? सहसा उसने उसकी आँखों में देखकर इसकी तसदीक कर ली। केशव एक पत्र छोड़ गया था, भारी-सा नीला लिफाफा। उसने बार-बार उसे उलटा-पलटा और बाद में वैसा ही सन्दूक में रख दिया। दिन-भर वह कुछ अनमनी-सी रही और एक स्वेटर बुनती रही। शाम को बाहर पति का स्वर सुनकर भी न उठी। पति ने द्वार में घुसते कहा – लीजिए साहबजादे को, देख लीजिए मैंने कुछ छुटा लिया हो और फिर यह सोचकर कि कहीं यह अधिक तीता न हो गया हो, असंगत हँस दिए। नहाकर, कपड़े बदलकर उन्होंने देखा, बच्चा अनमना प्रेमा के पैरों में लिपटा और वह वैसे ही यंत्रचालित स्वेटर के फन्दे डाले जा रही है। उन्होंने कुर्सी के हत्थे पर बैठकर उसे खींचकर कहा – ’क्यों, बहुत नाराज हो’ उसने बाधा न डाली, हुलसी नहीं, सहज अनमनी सूखा-मुख ऊपर उठाकर कहा – ’केशव।’

‘क्या केशव यहाँ आया था?’ उन्होंने सहज भाव; पर किंचित् उतावली से कहा?

‘नही’, उसने अपने पति की गहरी नीली आँखों में देखकर कहा, फिर बोली – ’हाँ मैं उसे रात-भर स्वप्न में देखती रही जैसे वह मर गया हो, हटाओ।’ उसके पति ने बीच में रोके हुए कहा – ’मरने के लिए मैं क्या कम हूँ’, और उन्होंने उसका पूरा मुख दोनों अधर, दोनों कोरें चूम ली; पर आज वह एक अज्ञात रस की प्यासी थी। उसकी आत्मा तृषित-तृषित भारहीन हो, शून्य में उड़ना चाहती थी।

खैर यह तो सब कविता है।

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दादी अम्माँ-कृष्णा सोबती की कहानी

अनुमानित समय : 17 मिनट-

बहार फिर आ गई। वसन्त की हल्की हवाएँ पतझर के फीके ओठों को चुपके से चूम गईं। जाड़े ने सिकुड़े-सिकुड़े पंख फड़फड़ाए और सर्दी दूर हो गई। आँगन में पीपल के पेड़ पर नए पात खिल-खिल आए। परिवार के हँसी-खुशी में तैरते दिन-रात मुस्कुरा उठे। भरा-भराया घर। सँभली-सँवरी-सी सुन्दर सलोनी बहुएँ। चंचलता से खिलखिलाती बेटियाँ। मजबूत बाँहोंवाले युवा बेटे। घर की मालकिन मेहराँ अपने हरे-भरे परिवार को देखती है और सुख में भीग जाती हैं यह पाँचों बच्चे उसकी उमर-भर की कमाई हैं। उसे वे दिन नहीं भूलते जब ब्याह के बाद छह वर्षों तक उसकी गोद नहीं भरी थी। उठते-बैठते सास की गंभीर कठोर दृष्टि उसकी समूची देह को टटोल जाती। रात को तकिए पर सिर डाले-डाले वह सोचती कि पति के प्यार की छाया में लिपटे-लिपटे भी उसमें कुछ व्यर्थ हो गया है, असमर्थ हो गया है। कभी सकुचाती-सी ससुर के पास से निकलती तो लगता कि इस घर की देहरी पर पहली बार पाँव रखने पर जो आशीष उसे मिली थी, वह उसे सार्थक नहीं कर पाई। वह ससुर के चरणों में झुकी थी और उन्होंने सिर पर हाथ रखकर कहा था, “बहूरानी, फूलो-फलो।” कभी दर्पण के सामने खड़ी-खड़ी वह बाँहें फैलाकर देखती-क्या इन बाँहों में अपने उपजे किसी नन्हे-मुन्ने को भर लेने की क्षमता नहीं!

छह वर्षों की लम्बी प्रतीक्षा के बाद सर्दियों की एक लम्बी रात में करवट बदलते-बदलते मेहराँ को पहली बार लगा था कि जैसे नर्म-नर्म लिहाफ़ में वह सिकुड़ी पड़ी है, वैसे ही उसमें, उसके तन-मन-प्राण के नीचे गहरे कोई धड़कन उससे लिपटी आ रही है। उसने अँधियारे में एक बार सोए हुए पति की ओर देखा था और अपने से लजाकर अपने हाथों से आँखें ढाँप ली थीं। बन्द पलकों के अन्दर से दो चमकती आँखें थीं, दो नन्हें-नन्हे हाथ थे, दो पाँव थे। सुबह उठकर किसी मीठी शिथिलता में घिरे-घिरे अँगड़ाई ली थी। आज उसका मन भरा है। मन भरा है। सास ने भाँपकर प्यार बरसाया थाः

“बहू, अपने को थकाओ मत, जो सहज-सहज कर सको, करो। बाकी मैं सँभाल लूँगी।”

वह कृतज्ञता से मुस्कुरा दी थी। काम पर जाते पति को देखकर मन में आया था कि कहे- ‘अब तुम मुझसे अलग बाहर ही नहीं, मेरे अंदर भी हो।’

दिन में सास आ बैठी; माथा सहलाते-सहलाते बोली, “बहूरानी, भगवान मेरे बच्चे को तुम-सा रूप दे और मेरे बेटे-सा जिगरा।”

बहू की पलकें झुक आईं।

“बेटी, उस मालिक का नाम लो, जिसने बीज डाला है। वह फल भी देगा।”

मेहराँ को माँ का घर याद हो आया। पास-पड़ोस की स्त्रियों के बीच माँ भाभी का हाथ आगे कर कह रही है, “बाबा, यह बताओ, मेरी बहू के भाग्य में कितने फल हैं?”

पास खड़ी मेहराँ समझ नहीं पाई थी। हाथ में फल?

“माँ, हाथ में फल कब होते हैं? फल किसे कहती हो माँ?”

माँ लड़की की बात सुनकर पहले हँसी, फिर गुस्सा होकर बोली, “दूर हो मेहराँ, जा, बच्चों के संग खेल!”

उस दिन मेहराँ का छोटा सा मन यह समझ नहीं पाया था, पर आज तो सास की बात वह समझ ही नहीं, बूझ भी रही थी। बहू के हाथ में फल होते हैं, बहू के भाग्य में फल होते हैं और परिवार की बेल बढ़ती है। मेहराँ की गोद से इस परिवार की बेल बढ़ी है। आज घर में तीन बेटे हैं, उनकी बहुएँ हैं। ब्याह देने योग्य दो बेटियाँ हैं। हल्के-हल्के कपड़ों में लिपटी उसकी बहुएँ जब उसके सामने झुकती हैं तो क्षण-भर के लिए मेहराँ के मस्तक पर घर की स्वामिनी होने का अभिमान उभर आता है। वह बैठे-बैठे उन्हें आशीष देती है और मुस्कुराती है। ऐसे ही, बिल्कुल ऐसे ही वह भी कभी सास के सामने झुकती थी। आज तो वह तीखी , निगाहवाली मालकिन, बच्चों की दादी अम्माँ बनकर रह गई है। पिछवाड़े के कमरे में से जब दादा के साथ बोलती हुई अम्मा की आवाज़ आती है तो पोते क्षण-भर ठिठककर अनसुनी कर देते हैं। बहुएँ एक-दूसरे को देखकर मन-ही-मन हँसती हैं। लाड़ली बेटियाँ सिर हिला-हिलाकर खिलखिलाती हुई कहती हैं, “दादी अम्माँ बूढ़ी हो आई, पर दादा से झगड़ना नहीं छोड़ा।”

मेहराँ भी कभी-कभी पति के निकट खड़ी हो कह देती है, “अम्मा नाहक बापू के पीछे पड़ी रहती हैं। बहू-बेटियोंवाला घर है, क्या यह अच्छा लगता है?”

पति एक बार पढ़ते-पढ़ते आँखें ऊपर उठाते हैं। पल-भर पत्नी की ओर देख दोबारा पन्ने पर दृष्टि गड़ा देते हैं। माँ की बात पर पति की मौन-गंभीर मुद्रा मेहराँ को नहीं भाती। लेकिन प्रयत्न करने पर भी वह कभी पति को कुछ कह देने तक खींच नहीं पाई। पत्नी पर एक उड़ती निगाह, और बस। किसी को आज्ञा देती मेहराँ की आवाज़ सुनकर कभी उन्हें भ्रम हो आता है। वह मेहराँ का नहीं अम्मा का ही रोबीला स्वर है। उनके होश में अम्मा ने कभी ढीलापन जाना ही नहीं। याद नहीं आता कि कभी माँ के कहने को वह जाने-अनजाने टाल सके हों। और अब जब माँ की बात पर बेटियों को हँसते सुनते हैं तो विश्वास नहीं आता। क्या सचमुच माँ आज ऐसी बातें किया करती हैं कि जिन पर बच्चे हँस सकें।

और अम्मा तो सचमुच उठते-बैठते बोलती है, झगड़ती है, झुकी कमर पर हाथ रखकर वह चारपाई से उठकर बाहर आती है तो जो सामने हो उस पर बरसने लगती है।

बड़ा पोता काम पर जा रहा है। दादी अम्माँ पास आ खड़ी हुई। एक बार ऊपर-तले देखा और बोली, “काम पर जा रहे हो बेटे, कभी दादा की ओर भी देख लिया करो, कब से उनका जी अच्छा नहीं। जिसके घर में भगवान के दिए बेटे-पोते हों, वह इस तरह बिना दवा-दारू पड़े रहते हैं।”

बेटा दादी अम्माँ की नज़र बचाता है। दादा की ख़बर क्या घर-भर में उसे ही रखनी है! छोड़ो, कुछ-न-कुछ कहती ही जाएँगी अम्मा, मुझे देर हो रही है। लेकिन दादी अम्माँ जैसे राह रोक लेती है, “अरे बेटा, कुछ तो लिहाज करो,बहू-बेटे वाले हुए, मेरी बात तुम्हें अच्छी नहीं लगती!”

मेहराँ मँझली बहू से कुछ कहने जा रही थी, लौटती हुई बोली, “अम्मा कुछ तो सोचो, लड़का बहू-बेटोंवाला है। तो क्या उस पर तुम इस तरह बरसती रहोगी?”

दादी अम्माँ ने अपनी पुरानी निगाह से मेहराँ को देखा और जलकर कहा, “क्यों नहीं बहू, अब तो बेटों को कुछ कहने के लिए तुमसे पूछना होगा! यह बेटे तुम्हारे हैं, घर-बार तुम्हारा है, हुक्म हासिल तुम्हारा है।”

मेहराँ पर इस सबका कोई असर नहीं हुआ। सास को वहीं खड़ा छोड़ वह बहू के पास चली गई। दादी अम्माँ ने अपनी पुरानी आँखों से बहू की वह रोबीली चाल देखी और ऊँचे स्वर में बोली, “बहूरानी, इस घर में अब मेरा इतना-सा मान रह गया है! तुम्हें इतना घमंड…!”

मेहराँ को सास के पास लौटने की इच्छा नहीं थी, पर घमंड की बात सुनकर लौट आई।

“मान की बात करती हो अम्मा? तो आए दिन छोटी-छोटी बात लेकर जलने-कलपने से किसी का मान नहीं रहता।”

इस उलटी आवाज़ ने दादी अम्माँ को और जला दिया। हाथ हिला-हिलाकर क्रोध में रुक-रुककर बोली, “बहू, यह सब तुम्हारे अपने सामने आएगा! तुमने जो मेरा जीना दूभर कर दिया है, तुम्हारी तीनों बहुएँ भी तुम्हें इसी तरह समझेंगी। क्यों नहीं, जरूर समझेंगी।”

कहती-कहती दादी अम्माँ झुकी कमर से पग उठाती अपने कमरे की ओर चल दी। राह में बेटे के कमरे का द्वार खुला देखा तो बोली, “जिस बेटे को मैंने अपना दूध पिलाकर पाला, आज उसे देखे मुझे महीनों बीत जाते हैं, उससे इतना नहीं हो पाता कि बूढ़ी अम्मा की सुधि ले।”

मेहराँ मँझली बहू को घर के काम-धन्धे के लिए आदेश दे रही थी। पर कान इधर ही थे। ‘बहुएँ उसे भी समझेंगी’ इस अभिशाप को वह कड़वा घूँट समझकर पी गई थी, पर पति के लिए सास का यह उलाहना सुनकर न रहा गया। दूर से ही बोली, “अम्मा, मेरी बात छोड़ो, पराए घर की हूँ, पर जिस बेटे को घर-भर में सबसे अधिक तुम्हारा ध्यान है, उसके लिए यह कहते तुम्हें झिझक नहीं आती? फिर कौन माँ है, जो बच्चों को पालती-पोसती नहीं!”

अम्मा ने अपनी झुर्रियों-पड़ी गर्दन पीछे की। माथे पर पड़े तेवरों में इस बार क्रोध नहीं भर्त्सना थी। चेहरे पर वही पुरानी उपेक्षा लौट आई, “बहू, किससे क्या कहा जाता है, यह तुम बड़े समधियों से माथा लगा सब कुछ भूल गई हो। माँ अपने बेटे से क्या कहे, यह भी क्या अब मुझे बेटे की बहू से ही सीखना पड़ेगा? सच कहती हो बहू, सभी माएँ बच्चों को पालती हैं। मैंने कोई अनोखा बेटा नहीं पाला था, बहू! फिर तुम्हें तो मैं पराई बेटी करके ही मानती रही हूँ। तुमने बच्चे आप जने, आप ही वे दिन काटे, आप ही बीमारियाँ झेलीं!”

मेहराँ ने खड़े-खड़े चाहा कि सास यह कुछ कहकर और कहतीं। वह इतनी दूर नहीं उतरी कि इन बातों का जवाब दे। चुपचाप पति के कमरे में जाकर इधर-उधर बिखरे कपड़े सहेजने लगी। दादी अम्माँ कड़वे मन से अपनी चारपाई पर जा पड़ी। बुढ़ापे की उम्र भी कैसी होती है! जीते-जी मन से संग टूट जाता है। कोई पूछता नहीं, जानता नहीं।

घर के पिछवाड़े जिसे वह अपनी चलती उम्र में कोठरी कहा करती थी, उसी में आज वह अपने पति के साथ रहती है। एक कोने में उसकी चारपाई और दूसरे कोने में पति की, जिसके साथ उसने अनगिनत बहारें और पतझर गुज़ार दिए हैं। कभी घंटों वे चुपचाप अपनी-अपनी जगह पर पड़े रहते हैं। दादी अम्माँ बीच-बीच में करवट बदलते हुए लम्बी साँस लेती है। कभी पतली नींद में पड़ी-पड़ी वर्षों पहले की कोई भूली-बिसरी बात करती है, पर बच्चों के दादा उसे सुनते नहीं। दूर कमरों में बहुओं की मीठी दबी-दबी हँसी वैसे ही चलती रहती है। बेटियाँ खुले-खुले खिलखिलाती हैं। बेटों के कदमों की भारी आवाज़ कमरे तक आकर रह जाती है और दादी अम्माँ और पास पड़े दादा में जैसे बीत गए वर्षों की दूरी झूलती रहती है।

आज दादा जब घंटों धूप में बैठकर अंदर आए तो अम्मा लेटी नहीं, चारपाई की बाँह पर बैठी थी। गाढ़े की धोती से पूरा तन नहीं ढका था। पल्ला कंधे से गिरकर एक ओर पड़ा था। वक्ष खुला था। आज वक्ष में ढकने को रह भी क्या गया था? गले और गर्दन की झुर्रियाँ एक जगह आकर इकट्ठी हो गई थीं। पुरानी छाती पर कई तिल चमक रहे थे। सिर के बाल उदासीनता से माथे के ऊपर सटे थे।

दादा ने देखकर भी नहीं देखा। अपने-सा पुराना कोट उतारकर खूँटी पर लटकाया और चारपाई पर लेट गए। दादी अम्माँ देर तक बिना हिले-डुले वैसी-की-वैसी बैठी रही। सीढ़ियों पर छोटे बेटे के पाँवों के उतावली-सी आहट हुई। उमंग की छोटी सी गुनगुनाहट द्वार तक आकर लौट गई। ब्याह के बाद के वे दिन, मीठे मधुर दिन। पाँव बार-बार घर की ओर लौटते हैं। प्यार-सी बहू आँखों में प्यार भर-भरकर देखती है, लजाती है, सकुचाती है और पति की बाँहों में लिपट जाती है। अभी कुछ महीने हुए, यही छोटा बेटा माथे पर फूलों का सेहरा लगाकर ब्याहने गया था। बाजे-गाजे के साथ जब लौटा तो संग में दुलहिन थी।

सबके साथ दादी अम्माँ ने भी पतोहू का माथा चूमकर उसे हाथ का कंगन दिया था। पतोहू ने झुककर दादी अम्माँ के पाँव छुए थे और अम्मा लेन-देन पर मेहराँ से लड़ाई -झगड़े की बात भूलकर कई क्षण दुलहिन के मुखड़े की ओर देखती रही थी। छोटी बेटी ने चंचलता से परिहास कर कहा था, “दादी अम्माँ, सच कहो भैया की दुलहिन तुम्हें पसंद आई? क्या तुम्हारे दिनों में भी शादी-ब्याह में ऐसे ही कपड़े पहने जाते थे?”

कहकर छोटी बेटी ने दादी के उत्तर की प्रतीक्षा नहीं की। हँसी-हँसी में किसी और से उलझ पड़ी।

मेहराँ बहू-बेटे को घेरकर अंदर ले चली। दादी अम्माँ भटकी-भटकी दृष्टि से वे अनगिनत चेहरे देखती रही। कोई पास-पड़ोसिन उसे बधाई दे रही थी, “बधाई हो अम्मा, सोने-सी बहू आई है शुक्र है उस मालिक का, तुमने अपने हाथों छोटे पोते का भी काज सँवारा।”

अम्मा ने सिर हिलाया। सचमुच आज उस-जैसा कौन है! पोतों की उसे हौंस थी, आज पूरी हुई। पर काज सँवारने में उसने क्या किया, किसी ने कुछ पूछा नहीं तो करती क्या? समधियों से बातचीत, लेन-देन, दुलहिन के कपड़े-गहने, यह सब मेहराँ के अभ्यस्त हाथों से होता रहा है। घर में पहले दो ब्याह हो जाने पर अम्मा से सलाह-सम्मति करना भी आवश्यक नहीं रह गया। केवल कभी-कभी कोई नया गहना गढ़वाने पर या नया जोड़ा बनवाने पर मेहराँ उसे सास को दिखा देती रही है।

बड़ी बेटी देखकर कहती है, “माँ! अम्मा को दिखाने जाती हो, वह तो कहेंगी, ‘यह गले का गहना हाथ लगाते उड़ता है। कोई भारी ठोस कंठा बनवाओ, सिर की सिंगार-पट्टी बनवाओ। मेरे अपने ब्याह में मायके से पचास तोले का रानीहार चढ़ा था। तुम्हें याद नहीं, तुम्हारे ससुर को कहकर उसी के भारी जड़ाऊ कंगन बनवाए थे तुम्हारे ब्याह में!'”

मेहराँ बेटी की ओर लाड़ से देखती है। लड़की झूठ नहीं कहती। बड़े बेटों की सगाई में, ब्याह में, अम्मा बीसियों बार यह दोहरा चुकी हैं। अम्मा को कौन समझाए कि ये पुरानी बातें पुराने दिनों के साथ गईं!

अम्मा नाते-रिश्तों की भीड़ में बैठी-बैठी ऊँघती रही। एकाएक आँख खुली तो नीचे लटकते पल्ले से सिर ढक लिया। एक बेख़बरी कि उघाड़े सिर बैठी रही। पर दादी अम्माँ को इस तरह अपने को सँभालते किसी ने देखा तक नहीं। अम्मा की ओर देखने की सुधि भी किसे है?

बहू को नया जोड़ा पहनाया जा रहा है। रोशनी में दुलहिन शरमा रही है। ननदें हास-परिहास कर रही हैं। मेहराँ घर में तीसरी बहू को देखकर मन-ही-मन सोच रही है कि बस, अब दोनों बेटियों को ठिकाने लगा दे तो सुर्खरू हो।

बहू का शृंगार देख दादी अम्माँ बीच-बीच में कुछ कहती है, “लड़कियों में यह कैसा चलन है आजकल? बहू के हाथों और पैरों में मेहँदी नहीं रचाई। यही तो पहला सगुन है।”

दादी अम्माँ की इस बात को जैसे किसी ने सुना नहीं। साज-शृंगार में चमकती बहू को घेरकर मेहराँ दूल्हे के कमरे की ओर ले चली। नाते-रिश्ते की युवतियाँ मुस्कुरा-मुस्कुराकर शरमाने लगीं, दूल्हे के मित्र-भाई आँखों में नहीं, बाँहों में नए-नए चित्र भरने लगे और मेहराँ बहू पर आशीर्वाद बरसाकर लौटी तो देहरी के संग लगी दादी अम्माँ को देखकर स्नेह जताकर बोली, “आओ अम्मा, शुक्र है भगवान का, आज ऐसी मीठी घड़ी आई।”

अम्मा सिर हिलाती-हिलाती मेहराँ के साथ हो ली, पर आँखें जैसे वर्षों पीछे घूम गईं। ऐसे ही एक दिन वह मेहराँ को अपने बेटे के पास छोड़ आई थी। वह अंदर जाती थी, बाहर आती थी। वह इस घर की मालकिन थी। पीछे, और पीछे – बाजे-गाजे के साथ उसका अपना डोला इस घर के सामने आ खड़ा हुआ। गहनों की छनकार करती वह नीचे उतरी। घूँघट की ओट से मुस्कुराती, नीचे झुकती और पति की बूढ़ी फूफी से आशीर्वाद पाती।

दादी अम्माँ को ऊँघते देख बड़ी बेटी हिलाकर कहने लगी, “उठो अम्मा,जाकर सो रहो, यहाँ तो अभी देर तक हँसी-ठट्ठा होता रहेगा।”

दादी अम्माँ झँपी-झँपी आँखों से पोती की ओर देखती है और झुकी कमर पर हाथ रखकर अपने कमरे की ओर लौट जाती है।

उस दिन अपनी चारपाई पर लेटकर दादी अम्माँ सोई नहीं। आँखों में न ऊँघ थी, न नींद। एक दिन वह भी दुलहिन बनी थी। बूढ़ी फूफी ने सजाकर उसे भी पति के पास भेजा था। तब क्या उसने यह कोठरी देखी थी? ब्याह के बाद वर्षों तक उसने जैसे यह जाना ही नहीं कि फूफी दिन-भर काम करने के बाद रात को यहाँ सोती है। आँखें मुँद जाने से पहले जब फूफी बीमार हुई तो दादी अम्माँ ने कुलीन बहू की तरह उसकी सेवा करते-करते पहली बार यह जाना था कि घर में इतने कमरे होते हुए भी फूफी इस पिछवाड़े में अपने अन्तिम दिन-बरस काट गई है। पर यह देखकर, जानकर उसे आश्चर्य नहीं हुआ था।

घर के पिछवाड़े में पड़ी फूफी की देह छाँहदार पेड़ के पुराने तने की तरह लगती थी, जिसके पत्तों की छाँह उससे अलग, उससे परे, घर-भर पर फैली हुई थी।

आज तो दादी अम्माँ स्वयं फूफी बनकर इस कोठरी में पड़ी है। ब्याह के कोलाहल से निकलकर जब दादा थककर अपनी चारपाई पर लेटे तो एक लम्बा चैन का-सा साँस लेकर बोले, “क्या सो गई हो? इस बार की रौनक, लेन-देन तो मँझले और बड़े बेटे के ब्याह को भी पार कर गई। समधियों का बड़ा घर ठहरा!”

दादी अम्माँ लेन-देन की बात पर कुछ कहना चाहते हुए भी नहीं बोली। चुपचाप पड़ी रही। दादा सो गए, आवाज़ें धीमी हो गईं। बरामदे में मेहराँ का रोबीला स्वर नौकर-चाकरों को सुबह के लिए आज्ञाएँ देकर मौन हो गया। दादी अम्माँ पड़ी रही और पतली नींद से घिरी आँखों से नए-पुराने चित्र देखती रही। एकाएक करवट लेते-लेते दो-चार क़दम उठाए और दादा की चारपाई के पास आ खड़ी हुई। झुककर कई क्षण तक दादा की ओर देखती रही। दादा नींद में बेख़बर थे और दादी जैसे कोई पुरानी पहचान कर रही हो। खड़े-खड़े कितने पल बीत गए! क्या दादी ने दादा को पहचाना नहीं? चेहरा उसके पति का है पर दादी तो इस चेहरे को नहीं, चेहरे के नीचे पति को देखना चाहती है। उसे बिछुड़ गए वर्षों में से वापस लौटा लेना चाहती है।

सिरहाने पर पड़ा दादा का सिर बिल्कुल सफे़द था। बन्द आँखों से लगी झुर्रियाँ-ही-झुर्रियाँ थीं। एक सूखी बाँह कम्बल पर सिकुड़ी-सी पड़ी थी। यह नहीं….यह तो नहीं…. दादी अम्माँ जैसे सोते-सोते जाग पड़ी थी, वैसे ही इस भूले-भटके भँवर में ऊपर-नीचे होती चारपाई पर जा पड़ी।

उस दिन सुबह उठकर जब दादी अम्माँ ने दादा को बाहर जाते देखा तो लगा कि रात-भर की भटकी-भटकी तस्वीरों में से कोई भी तस्वीर उसकी नहीं थी। वह इस सूखी देह और झुके कन्धे में से किसे ढूँढ़ रही थी? दादी अम्माँ चारपाई की बाँहों से उठी और लेट गई। अब तो इतनी-सी दिनचर्या शेष रह गई है। बीच-बीच में कभी उठकर बहुओं के कमरों की ओर जाती है तो लड़-झगड़कर लौट आती हैं कैसे हैं उसके पोते जो उम्र के रंग में किसी की बात नहीं सोचते? किसी की ओर नहीं देखते? बहू और बेटा, उन्हें भी कहाँ फुरसत है?

मेहराँ तो कुछ-न-कुछ कहकर चोट करने से भी नहीं चूकती। लड़ने को तो दादी भी कम नहीं, पर अब तीखा-तेज़ बोल लेने पर जैसे वह थककर चूर-चूर हो जाती है। बोलती है, बोले बिना रह नहीं पाती, पर बाद में घंटों बैठी सोचती रहती है कि वह क्यों उनसे माथा लगाती है, जिन्हें उसकी परवा नहीं। मेहराँ की तो अब चाल-ढाल ही बदल गई है। अब वह उसकी बहू नहीं, तीन बहुओं की सास है। ठहरी हुई गंभीरता से घर का शासन चलाती है। दादी अम्माँ का बेटा अब अधिक दौड़-धूप नहीं करता। देखरेख से अधिक अब बहुओं द्वारा ससुर का आदर-मान ही अधिक होता है। कभी अंदर-बाहर जाते अम्मा मिल जाती है तो झुककर बेटा माँ को प्रणाम अवश्य करता है। दादी अम्माँ गर्दन हिलाती-हिलाती आशीर्वाद देती है, “जीयो बेटा, जीयो।”

कभी मेहराँ की जली-कटी बातें सोच बेटे पर क्रोध और अभिमान करने को मन होता है, पर बेटे को पास देखकर दादी अम्माँ सब भूल जाती है। ममता-भरी पुरानी आँखों से निहारकर बार-बार आशीर्वाद बरसाती चली जाती है, “सुख पाओ, भगवान बड़ी उम्र दे….” कितना गंभीर और शीलवान है उसका बेटा! है तो उसका न? पोतों को ही देखो, कभी झुककर दादा के पाँव तक नहीं छूते। आखिर माँ का असर कैसे जाएगा? इन दिनों बहू की बात सोचते ही दादी अम्माँ को लगता है कि अब मेहराँ उसके बेटे में नहीं अपने बेटों में लगी रहती है। दादी अम्माँ को वे दिन भूल जाते हैं जब बेटे के ब्याह के बाद बहू-बेटे के लाड़-चाव में उसे पति के खाने-पीने की सुधि तक न रहती थी और जब लाख-लाख शुक्र करने पर पहली बार मेहराँ की गोद भरनेवाली थी तो दादी अम्माँ ने आकर दादा से कहा था, “बहू के लिए अब यह कमरा खाली करना होगा। हम लोग फूफी के कमरे में जा रहेंगे।”

दादा ने एक भरपूर नज़रों से दादी अम्माँ की ओर देखा था, जैसे वह बीत गए वर्षों को अपनी दृष्टि से टटोलना चाहते हों। फिर सिर पर हाथ फेरते-फेरते कहा था, “क्या बेटे वाला कमरा बहू के लिए ठीक नहीं? नाहक क्यों यह सबकुछ उलटा-सीधा करवाती हो?”

दादी अम्माँ ने हाथ हिलाकर कहा, “ओह हो, तुम समझोगे भी! बेटे के कमरे में बहू को रखूँगी तो बेटा कहाँ जाएगा? उलटे-सीधे की फिक्र तुम क्यों करते हो, मैं सब ठीक कर लूँगी।”

और पत्नी के चले जाने पर दादा बहुत देर बैठे-बैठे भारी मन से सोचते रहे कि जिन वर्षों का बीतना उन्होंने आज तक नहीं जाना, उन्हीं पर पत्नी की आशा विराम बनकर आज खड़ी हो गई है। आज सचमुच ही उसे इस उलटफेर की परवा नहीं।

इस कमरे में बड़ी फूफी उनकी दुलहिन को छोड़ गई थी। उस कमरे को छोड़कर आज वह फूफी के कमरे में जा रहे हैं। क्षण-भर के लिए, केवल क्षण-भर के लिए उन्हें बेटे से ईष्र्या हुई और उदासीनता में बदल गई और पहली रात जब वह फूफी के कमरे में सोए तो देर गए तक भी पत्नी बहू के पास से नहीं लौटी थी। कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद उनकी पलकें झँपी तो उन्हें लगा कि उनके पास पत्नी का नहीं…फूफी का हाथ है। दूसरे दिन मेहराँ की गोद भरी थी, बेटा हुआ था। घर की मालकिन पति की बात जानने के लिए बहुत अधिक व्यस्त थी।

कुछ दिन से दादी अम्माँ का जी अच्छा नहीं। दादा देखते हैं, पर बुढ़ापे की बीमारी से कोई दूसरी बीमारी बड़ी नहीं होती। दादी अम्माँ बार-बार करवट बदलती है और फिर कुछ-कुछ देर के लिए हाँफकर पड़ी रह जाती है। दो-एक दिन से वह रसोईघर की ओर भी नहीं आई, जहाँ मेहराँ का आधिपत्य रहते हुए भी वह कुछ-न-कुछ नौकरों को सुनाने में चूकती नहीं है। आज दादी को न देखकर छोटी बेटी हँसकर मँझली भाभी से बोली, “भाभी, दादी अम्माँ के पास अब शायद कोई लड़ने-झगड़ने की बात नहीं रह गई, नहीं तो अब तक कई बार चक्कर लगातीं।”

दोपहर को नौकर जब अम्मा के यहाँ से अनछुई थाली उठा लाया तो मेहराँ का माथा ठनका। अम्मा के पास जाकर बोली, “अम्मा, कुछ खा लिया होता, क्या जी अच्छा नहीं?”

एकाएक अम्मा कुछ बोली नहीं। क्षण-भर रुककर आँखें खोली और मेहराँ को देखती रह गई।

“खाने को मन न हो तो अम्मा दूध ही पी लो।”

अम्मा ने ‘हाँ’ – ‘ना’ कुछ नहीं की। न पलकें ही झपकीं। इस दृष्टि से मेहराँ बहुत वर्षों के बाद आज फिर डरी। इनमें न क्रोध था, न सास की तरेर थी, न मनमुटाव था। एक लम्बा गहरा उलाहना-पहचानते मेहराँ को देर नहीं लगी।

डरते-डरते सास के माथे को छुआ। ठंडे पसीने से भीगा था। पास बैठकर धीरे से स्नेह-भरे स्वर में बोली, “अम्मा, जो कहो, बना लाती हूँ।”

अम्मा ने सिरहाने पर पड़े-पड़े सिर हिलाया – नहीं, कुछ नहीं- और बहू के हाथ से अपना हाथ खींच लिया।

मेहराँ पल-भर कुछ सोचती रही और बिना आहट किए बाहर हो गई। बड़ी बहू के पास जाकर चिंतित स्वर में बोली, “बहू, अम्मा कुछ अधिक बीमार लगती हैं, तुम जाकर पास बैठो तो मैं कुछ बना लाऊँ।”

बहू ने सास की आवाज़ में आज पहली बार दादी अम्माँ के लिए घबराहट देखी। दबे पाँव जाकर अम्मा के पास बैठ हाथ-पाँव दबाने लगी। अम्मा ने इस बार हाथ नहीं खींचे। ढीली सी लेटी रही।

मेहराँ ने रसोईघर में जाकर दूध गर्म किया। औटाने लगी तो एकाएक हाथ अटक गया-क्या अम्मा के लिए यह अन्तिम बार दूध लिये जा रही है?

दादी अम्माँ ने बेखबरी में दो-चार घूँट दूध पीकर छोड़ दिया। चारपाई पर पड़ी अम्मा चारपाई के साथ लगी दीखती थीं। कमरे में कुछ अधिक सामान नहीं था। सामने के कोने में दादा का बिछौना बिछा था। शाम को दादा आए तो अम्मा के पास बहू और पतोहू को बैठे देख पूछा,”अम्मा तुम्हारी रूठकर लेटी है या….?”

मेहराँ ने अम्मा की बाँह आगे कर दी। दादा ने छूकर हौले से कहा, “जाओ बहू, बेटा आता ही होगा। उसे डॉक्टर को लिवाने भेज देना।”

मेहराँ सुसर के शब्दों को गंभीरता जानते हुए चुपचाप बाहर हो गई। बेटे के साथ जब डॉक्टर आया तो दादी अम्माँ के तीनों पोते भी वापस आ खड़े हुए। डॉक्टर ने सधे-सधाए हाथों से दादी की परीक्षा की। जाते-जाते दादी के बेटे से कहा, “कुछ ही घंटे और…।”

मेहराँ ने बहुओं को धीमे स्वर में आज्ञाएँ दीं और बेटों से बोली, “बारी-बारी से खा-पी लो, फिर पिता और दादा को भेज देना।”

अम्मा के पास से हटने की पिता और दादा की बारी नहीं आई उस रात। दादी ने बहुत जल्दी की। डूबते-डूबते हाथ-पाँवों से छटपटाकर एक बार आँखें खोलीं और बेटे और पति के आगे बाँहे फैला दीं। जैसे कहती हो-‘मुझे तुम पकड़ रखो।’

दादी का श्वास उखड़ा, दादा का कंठ जकड़ा और बेटे ने माँ पर झुककर पुकारा, “अम्मा,…अम्मा।”

“सुन रही हूँ बेटा, तुम्हारी आवाज़ पहचानती हूँ।”

मेहराँ सास की ओर बढ़ी और ठंडे हो रहे पैरों को छूकर याचना-भरी दृष्टि से दादी अम्माँ को बिछुरती आँखों से देखने लगी। बहू को रोते देख अम्मा की आँखों में क्षण-भर को संतोष झलका, फिर वर्षों की लड़ाई-झगड़े का आभास उभरा। द्वार से लगी तीनों पोतों की बहुएँ खड़ी थीं। मेहराँ ने हाथ से संकेत किया। बारी-बारी दादी अम्माँ के निकट तीनों झुकीं। अम्मा की पुतलियों में जीवन-भर का मोह उतर गया। मेहराँ से उलझा कड़वापन ढीला हो गया। चाहा कि कुछ कहे….कुछ…. पर छूटते तन से दादी अम्माँ ओंठों पर कोई शब्द नहीं खींच पाई।

“अम्मा, बहुओं को आशीष देती जाओ….,” मेहराँ के गीले कंठ में आग्रह था, विनय थी।

अम्मा ने आँखों के झिलमिलाते पर्दे में से अपने पूरे परिवार की ओर देखा-बेटा….बहू….पति….पोते-पतोहू…पोतियाँ। छोटी पतोहू की गुलाबी ओढ़नी जैसे दादी के तन-मन पर बिखर गई। उस ओढ़नी से लगे गोर-गोरे लाल-लाल बच्चे, हँसते-खेलते, भोली किलकारियाँ…।

दादी अम्माँ की धुँधली आँखों में से और सब मिट गया, सब पुँछ गया, केवल ढेर-से अगणित बच्चे खेलते रह गए…! उसके पोते, उसके बच्चे….।

पिता और पुत्र ने एक साथ देखा, अम्मा जैसे हल्के से हँसी, हल्के से….।

मेहराँ को लगा, अम्मा बिल्कुल वैसे हँस रही है जैसे पहली बार बड़े बेटे के जन्म पर वह उसे देखकर हँसी थी। समझ गई-बहुओं को आशीर्वाद मिल गया।

दादा ने अपने सिकुड़े हाथ में दादी का हाथ लेकर आँखों से लगाया और बच्चों की तरह बिलख-बिलखकर रो पड़े।

रात बीत जाने से पहले दादी अम्माँ बीत गई। अपने भरेपूरे परिवार के बीच वह अपने पति, बेटे और पोतों के हाथों में अंतिम बार घर से उठ गई।

दाह-संस्कार हुआ और दादी अम्माँ की पुरानी देह फूल हो गई। देखने-सुननेवाले बोले, “भाग्य हो तो ऐसा, फलता-फूलता परिवार।”

मेहराँ ने उदास-उदास मन से सबके लिए नहाने का सामान जुटाया। घर-बाहर धुलाया। नाते-रिश्तेदार पास-पड़ोसी अब तक लौट गए थे। मौत के बाद रूखी सहमी-सी दुपहर। अनचाहे मन से कुछ खा-पीकर घरवाले चुपचाप खाली हो बैठे। अम्मा चली गई, पर परिवार भरापूरा है। पोते थककर अपने-अपने कमरों मे जा लेटे। बहुएँ उठने से पहले सास की आज्ञा पाने को बैठी रहीं। दादी अम्माँ का बेटा निढाल होकर कमरे में जा लेटा। अम्मा की खाली कोठरी का ध्यान आते ही मन बह आया। कल तक अम्मा थी तो सही उस कोठी में। रुआँसी आँखें बरसकर झुक आईं तो सपने में देखा, नदी-किनारे घाट पर अम्मा खड़ी हैं अपनी चिता को जलते देख कहती है, ‘जाओ बेटा, दिन ढलने को आया, अब घर लौट चलो, बहू राह देख रही होगी। जरा सँभलकर जाना। बहू से कहना, बेटियों को अच्छे ठिकाने लगाए।’

दृश्य बदला। अम्मा द्वार पर खड़ी है। झाँककर उसकी ओर देखती है, ‘बेटा, अच्छी तरह कपड़ा ओढ़कर सोओ। हाँ बेटा, उठो तो! कोठरी में बापू को मिल आओ, यह विछोह उनसे न झेला जाएगा। बेटा, बापू को देखते रहना। तुम्हारे बापू ने मेरा हाथ पकड़ा था, उसे अंत तक निभाया, पर मैं ही छोड़ चली।’

बेटे ने हड़बड़ाकर आँखें खोलीं। कई क्षण द्वार की ओर देखते रह गए। अब कहाँ आएगी अम्मा इस देहरी पर…।

बिना आहट किए मेहराँ आई। रोशनी की। चेहरे पर अम्मा की याद नहीं, अम्मा का दुख था। पति को देखकर ज़रा सी रोई और बोली, “जाकर ससुरजी को तो देखो। पानी तक मुँह नहीं लगाया।”

पति खिड़की में से कहीं दूर देखते रहे। जैसे देखने के साथ कुछ सुन रहे हों- ‘बेटा, बापू को देखते रहना, तुम्हारे बापू ने तो अंत तक संग निभाया, पर मैं ही छोड़ चली।’

“उठो।” मेहराँ कपड़ा खींचकर पति के पीछे हो ली। अम्मा की कोठरी में अँधेरा था। बापू उसी कोठरी के कोने में अपनी चारपाई पर बैठे थे। नज़र दादी अम्माँ की चारपाईवाली खाली जगह पर गड़ी थी। बेटे को आया जान हिले नहीं।

“बापू, उठो, चलकर बच्चों में बैठो, जी सँभलेगा।”

बापू ने सिर हिला दिया।

मेहराँ और बेटे की बात बापू को मानो सुनाई नहीं दी। पत्थर की तरह बिना हिले-डुले बैठे रहे। बहू-बेटा, बेटे की माँ…..खाली दीवारों पर अम्मा की तस्वीरें ऊपर-नीचे होती रहीं। द्वार पर अम्मा घूँघट निकाले खड़ी है। बापू को अंदर आते देख शरमाती है और बुआ की ओट हो जाती है। बुआ स्नेह से हँसती है। पीठ पर हाथ फेरकर कहती है, ‘बहू, मेरे बेटे से कब तक शरमाओगी।?’

अम्मा बेटे को गोद में लिये दूध पिला रही हैं बापू घूम-फिरकर पास आ खड़े होते हैं। तेवर चढ़े। तीखे बालों को फीका बनाकर कहते हैं, ‘मेरी देखरेख अब सब भूल गई हो। मेरे कपड़े कहाँ डाल दिए?’ अम्मा बेटे के सिर को सहलाते-सहलाते मुस्कुराती है। फिर बापू की आँखों में भरपूर देखकर कहती है, ‘अपने ही बेटे से प्यार का बँटवारा कर झुँझलाने लगे!’

बापू इस बार झुँझलाते नहीं, झिझकते हैं, फिर एकाएक दूध पीते बेटे को अम्मा से लेकर चूम लेते हैं। मुन्ने के पतले नर्म ओठों पर दूध की बूँद अब भी चमक रही है। बापू अँधेरे में अपनी आँखों पर हाथ फेरते हैं। हाथ गीले हो जाते हैं। उनके बेटे की माँ आज नहीं रही।

तीनों बेटे दबे-पाँवों जाकर दादा को झाँक आए। बहुएँ सास की आज्ञा पा अपने-अपने कमरों में जा लेटीं। बेटियों को सोता जान मेहराँ पति के पास आई तो सिर दबाते-दबाते प्यार से बोली, “अब हौसला करो”… लेकिन एकाएक किसी की गहरी सिसकी सुन चौंक पड़ी। पति पर झुककर बोली, “बापू की आवाज़ लगती है, देखो तो।”

बेटे ने जाकर बाहरवाला द्वार खोला, पीपल से लगी झुकी-सी छाया। बेटे ने कहना चाहा, ‘बापू’! पर बैठे गले से आवाज़ निकली नहीं। हवा में पत्ते खड़खड़ाए, टहनियाँ हिलीं और बापू खड़े-खड़े सिसकते रहे।

“बापू!”

इस बार बापू के कानों में बड़े पोते की आवाज़ आई। सिर ऊँचा किया, तो तीनों बेटों के साथ देहरी पर झुकी मेहराँ दीख पड़ी। आँसुओं के गीले पूर में से धुंध बह गई। मेहराँ अब घर की बहू नहीं, घर की अम्मा लगती है। बड़े बेटे का हाथ पकड़कर बापू के निकट आई। झुककर गहरे स्नेह से बोली, “बापू, अपने इन बेटों की ओर देखो, यह सब अम्मा का ही तो प्रताप है। महीने-भर के बाद बड़ी बहू की झोली भरेगी, अम्मा का परिवार और फूले-फलेगा।”

बापू ने इस बार सिसकी नहीं भरी। आँसुओं को खुले बह जाने दिया। पेड़ के कड़े तने से हाथ उठाते-उठाते सोचा-दूर तक धरती में बैठी अगणित जड़ें अंदर-ही-अंदर इस बड़े पुराने पीपल को थामे हुए हैं। दादी अम्माँ इसे नित्य पानी दिया करती थी। आज वह भी धरती में समा गई है। उसके तन से ही तो बेटे-पोते का यह परिवार फैला है। पीपल की घनी छाँह की तरह यह और फैलेगा। बहू सच कहती है। यह सब अम्मा का ही प्रताप है। वह मरी नहीं।

वह तो अपनी देह पर के कपड़े बदल गई है, अब वह बहू में जीएगी, फिर बहू की बहू में…।

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गुलकी बन्नो- धर्मवीर भारती

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‘‘ऐ मर कलमुँहे !’ अकस्मात् घेघा बुआ ने कूड़ा फेंकने के लिए दरवाजा खोला और चौतरे पर बैठे मिरवा को गाते हुए देखकर कहा, ‘‘तोरे पेट में फोनोगिराफ उलियान बा का, जौन भिनसार भवा कि तान तोड़ै लाग ? राम जानै, रात के कैसन एकरा दीदा लागत है !’’ मारे डर के कि कहीं घेघा बुआ सारा कूड़ा उसी के सर पर न फेक दें, मिरवा थोड़ा खिसक गया और ज्यों ही घेघा बुआ अन्दर गयीं कि फिर चौतरे की सीढ़ी पर बैठ, पैर झुलाते हुए उसने उल्टा-सुल्टा गाना शुरू कर किया, ‘‘तुमें बछ याद कलते अम छनम तेरी कछम !’’ मिरवा की आवाज़ सुनकर जाने कहाँ से झबरी कुतिया भी कान-पूँछ झटकारते आ गयी और नीचे सड़क पर बैठकर मिरवा का गाना बिलकुल उसी अन्दाज़ में सुनने लगी जैसे हिज़ मास्टर्स वॉयस के रिकार्ड पर तसवीर बनी होती है।

अभी सारी गली में सन्नाटा था। सबसे पहले मिरवा (असली नाम मिहिरलाल) जागता था और आँख मलते-मलते घेघा बुआ के चौतरे पर आ बैठता था। उसके बाद झबरी कुतिया, फिर मिरवा की छोटी बहन मटकी और उसके बाद एक-एक कर गली के तमाम बच्चे-खोंचेवाली का लड़का मेवा, ड्राइवर साहब की लड़की निरमल, मनीजर साहब के मुन्ना बाबू-सभी आ जुटते थे। जबसे गुलकी ने घेघा बुआ के चौतरे पर तरकारियों की दुकान रखी थी तब से यह जमावड़ा वहाँ होने लगा था। उसके पहले बच्चे हकीमजी के चौतरे पर खेलते थे। धूप निकलते गुलकी सट्टी से तरकारियाँ ख़रीदकर अपनी कुबड़ी पीठ पर लादे, डण्डा टेकती आती और अपनी दुकान फैला देती। मूली, नीबू, कद्दू, लौकी, घिया-बण्डा, कभी-कभी सस्ते फल ! मिरवा और मटकी जानकी उस्ताद के बच्चे थे जो एक भंयकर रोग में गल-गलकर मरे थे और दोनों बच्चे भी विकलांग, विक्षिप्त और रोगग्रस्त पैदा हुए थे। सिवा झबरी कुतिया के और कोई उनके पास नहीं बैठता था और सिवा गुलकी के कोई उन्हें अपनी देहरी या दुकान पर चढ़ने नहीं देता था।

आज भी गुलकी को आते देखकर पहले मिरवा गाना छोड़कर, ‘‘छलाम गुलकी !’’ और मटकी अपने बढ़ी हुई तिल्लीवाले पेट पर से खिसकता हुआ जाँघिया सँभालते हुए बोली, ‘‘एक ठो मूली दै देव ! ए गुलकी !’’ गुलकी पता नहीं किस बात से खीजी हुई थी कि उसने मटकी को झिड़क दिया और अपनी दुकान लगाने लगी। झबरी भी पास गयी कि गुलकी ने डण्ड उठाया। दुकान लगाकर वह अपनी कुबड़ी पीठ दुहराकर बैठ गयी और जाने किसे बुड़बुड़ाकर गालियाँ देने लगी। मटकी एक क्षण चुपचाप रही फिर उसने रट लगाना शुरू किया, ‘‘एक मूली ! एक गुलकी !…एक’’ गुलकी ने फिर झिड़का तो चुप हो गयी और अलग हटकर लोलुप नेत्रों से सफेद धुली हुई मूलियों को देखने लगी। इस बार वह बोली नहीं। चुपचाप उन मूलियों की ओर हाथ बढ़ाया ही था कि गुलकी चीख़ी, ‘‘हाथ हटाओ। छूना मत। कोढ़िन कहीं की ! कहीं खाने-पीने की चीज देखी तो जोंक की तरह चिपक गयी, चल इधर !’’ मटकी पहले तो पीछे हटी पर फिर उसकी तृष्णा ऐसी अदम्य हो गयी कि उसने हाथ बढ़ाकर एक मूली खींच ली। गुलकी का मुँह तमतमा उठा और उसने बाँस की खपच्ची उठाकर उसके हाथ पर चट से दे मारी ! मूली नीचे गिरी और हाय ! हाय ! हाय !’’ कर दोनों हाथ झटकती हुई मटकी पाँव पटकपटक कर रोने लगी। ‘‘जावो अपने घर रोवो। हमारी दुकान पर मरने को गली-भर के बच्चे हैं-’’ गुलकी चीख़ी ! ‘‘दुकान दैके हम बिपता मोल लै लिया। छन-भर पूजा-भजन में भी कचरघाँव मची रहती है !’’ अन्दर से घेघा बुआ ने स्वर मिलाया। ख़ासा हंगामा मच गया कि इतने में झबरी भी खड़ी हो गयी और लगी उदात्त स्वर में भूँकने। ‘लेफ्ट राइट ! लेफ्ट राइट !’ चौराहे पर तीन-चार बच्चों का जूलूस चला आ रहा था। आगे-आगे दर्जा ‘ब’ में पढ़नेवाले मुन्ना बाबू नीम की सण्टी को झण्डे की तरह थामे जलूस का नेतृत्व कर रहे थे, पीछे थे मेवा और निरमल। जलूस आकर दूकान के सामने रूक गया। गुलकी सतर्क हो गयी। दुश्मन की ताक़त बढ़ गयी थी।

मटकी खिसकते-खिसकते बोली, ‘‘हमके गुलकी मारिस है। हाय ! हाय ! हमके नरिया में ढकेल दिहिस। अरे बाप रे !’’ निरमल, मेवा, मुन्ना, सब पास आकर उसकी चोट देखने लगे। फिर मुन्ना ने ढकेलकर सबको पीछे हटा दिया और सण्टी लेकर तनकर खड़े हो गये। ‘‘किसने मारा है इसे !’’

‘‘हम मारा है !’’ कुबड़ी गुलकी ने बड़े कष्ट से खड़े होकर कहा, ‘‘का करोगे ? हमें मारोगे !’’ मारोगे !’’ मारेंगे क्यों नहीं ?’’ मुन्ना बाबू ने अकड़कर कहा। गुलकी इसका कुछ जवाब देती कि बच्चे पास घिर आये। मटकी ने जीभ निकालकर मुँह बिराया, मेवा ने पीछे जाकर कहा, ‘‘ए कुबड़ी, ए कुबड़ी, अपना कूबड़ दिखाओ !’’ और एक मुट्ठी धूल उसकी पीठ पर छोड़कर भागा। गुलकी का मुँह तमतमा आया और रूँधे गले से कराहते हुए उसने पता नहीं क्या कहा। किन्तु उसके चेहरे पर भय की छाया बहुत गहरी हो रही थी। बच्चे सब एक-एक मुट्ठी धूल लेकर शोर मचाते हुए दौड़े कि अकस्मात् घेघा बुआ का स्वर सुनाई पड़ा, ‘‘ए मुन्ना बाबू, जात हौ कि अबहिन बहिनजी का बुलवाय के दुई-चार कनेठी दिलवायी !’’ ‘‘जाते तो हैं !’’ मुन्ना ने अकड़ते हुए कहा, ‘‘ए मिरवा, बिगुल बजाओ।’’ मिरवा ने दोनों हाथ मुँह पर रखकर कहा, ‘‘धुतु-धुतु-धू।’’ जलूस आगे चल पड़ा और कप्तान ने नारा लगाया:

अपने देस में अपना राज !

गुलकी की दुकान बाईकाट !

नारा लगाते हुए जलूस गली में मुड़ गया। कुबड़ी ने आँसू पोंछे, तरकारी पर से धूल झाड़ी और साग पर पानी के छींटे देने लगी।

गुलकी की उम्र ज़्यादा नहीं थी। यही हद-से-हद पच्चीस-छब्बीस। पर चेहरे पर झुर्रियाँ आने लगी थीं और कमर के पास से वह इस तरह दोहरी हो गयी थी जैसे अस्सी वर्ष की बुढ़िया हो। बच्चों ने जब पहली बार उसे मुहल्ले में देखा तो उन्हें ताजुज्ब भी हुआ और थोड़ा भय भी। कहाँ से आयी ? कैसे आ गयी ? पहले कहाँ थी ? इसका उन्हें कुछ अनुमान नहीं था ? निरमल ने ज़रूर अपनी माँ को उसके पिता ड्राइवर से रात को कहते हुए सुना, ‘‘यह मुसीबत और खड़ी हो गयी। मरद ने निकाल दिया तो हम थोड़े ही यह ढोल गले बाँधेंगे। बाप अलग हम लोगों का रुपया खा गया। सुना चल बसा तो डरी कि कहीं मकान हम लोग न दखल कर लें और मरद को छोड़कर चली आयी। खबरदार जो चाभी दी तुमने !’’ ‘‘क्या छोटेपन की बात करती हो ! रूपया उसके बाप ने ले लिया तो क्या हम उसका मकान मार लेंगे ? चाभी हमने दे दी है। दस-पाँच दिन का नाज-पानी भेज दो उसके यहाँ।’’

‘‘हाँ-हाँ, सारा घर उठा के भेज देव। सुन रही हो घेघा बुआ !’’

‘‘तो का भवा बहू, अरे निरमल के बाबू से तो एकरे बाप की दाँत काटी रही।’’ घेघा बुआ की आवाज़ आयी-‘‘बेचारी बाप की अकेली सन्तान रही। एही के बियाह में मटियामेट हुई गवा। पर ऐसे कसाई के हाथ में दिहिस की पाँचै बरस में कूबड़ निकल आवा।’’

‘‘साला यहाँ आवे तो हण्टर से ख़बर लूँ मैं।’’ ड्राइवर साहब बोले, ‘‘पाँच बरस बाद बाल-बच्चा हुआ। अब मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ तो उसमें इसका क्या कसूर ! साले ने सीढ़ी से ढकेल दिया। जिन्दगी-भर के लिए हड्डी खराब हो गयी न ! अब कैसे गुजारा हो उसका ?’’

‘‘बेटवा एको दुकान खुलवाय देव। हमरा चौतरा खाली पड़ा है। यही रूपया दुइ रूपया किराया दै देवा करै, दिन-भर अपना सौदा लगाय ले। हम का मना करित है ? एत्ता बड़ा चौतरा मुहल्लेवालन के काम न आयी तो का हम छाती पर धै लै जाब ! पर हाँ, मुला रुपया दै देव करै।’’

दूसरे दिन यह सनसनीख़ेज ख़बर बच्चों में फैल गयी। वैसे तो हकीमजी का चबूतरा पड़ा था, पर वह कच्चा था, उस पर छाजन नहीं थी। बुआ का चौतरा लम्बा था, उस पर पत्थर जुड़े थे। लकड़ी के खम्भे थे। उस पर टीन छायी थी। कई खेलों की सुविधा थी। खम्भों के पीछे किल-किल काँटे की लकीरें खींची जा सकती थीं। एक टाँग से उचक-उचककर बच्चे चिबिड्डी खेल सकते थे। पत्थर पर लकड़ी का पीढ़ा रखकर नीचे से मुड़ा हुआ तार घुमाकर रेलगाड़ी चला सकते थे। जब गुलकी ने अपनी दुकान के लिए चबूतरों के खम्भों में बाँस-बाँधे तो बच्चों को लगा कि उनके साम्राज्य में किसी अज्ञात शत्रु ने आकर क़िलेबन्दी कर ली है। वे सहमे हुए दूर से कुबड़ी गुलकी को देखा करते थे। निरमल ही उसकी एकमात्र संवाददाता थी और निरमल का एकमात्र विश्वस्त सूत्र था उसकी माँ। उससे जो सुना था उसके आधार पर निरमल ने सबको बताया था कि यह चोर है। इसका बाप सौ रूपया चुराकर भाग गया। यह भी उसके घर का सारा रूपया चुराने आयी है। ‘‘रूपया चुरायेगी तो यह भी मर जाएगी।’’ मुन्ना ने कहा, ‘‘भगवान सबको दण्ड देता है।’’ निरमल बोली ‘‘ससुराल में भी रूपया चुराये होगी।’’ मेवा बोला ‘‘अरे कूबड़ थोड़े है ! ओही रूपया बाँधे है पीठ पर। मनसेधू का रूपया है।’’ ‘‘सचमुच ?’’ निरमल ने अविश्वास से कहा। ‘‘और नहीं क्या कूबड़ थोड़ी है। है तो दिखावै।’’ मुन्ना द्वारा उत्साहित होकर मेवा पूछने ही जा रहा था कि देखा साबुनवाली सत्ती खड़ी बात कर रही है गुलकी से-कह रही थी, ‘‘अच्छा किया तुमने ! मेहनत से दुकान करो। अब कभी थूकने भी न जाना उसके यहाँ। हरामजादा, दूसरी औरत कर ले, चाहे दस और कर ले। सबका खून उसी के मत्थे चढ़ेगा। यहाँ कभी आवे तो कहलाना मुझसे। इसी चाकू से दोनों आँखें निकाल लूँगी !’’

बच्चे डरकर पीछे हट गये। चलते-चलते सत्ती बोली, ‘‘कभी रूपये-पैसे की जरूरत हो तो बताना बहिना !’’

कुछ दिन बच्चे डरे रहे। पर अकस्मात् उन्हें यह सूझा कि सत्ती को यह कुबड़ी डराने के लिए बुलाती है। इसने उसके गु़स्से में आग में घी का काम किया। पर कर क्या सकते थे। अन्त में उन्होंने एक तरीक़ा ईजाद किया। वे एक बुढ़िया का खेल खेलते थे। उसको उन्होंने संशोधित किया। मटकी को लैमन जूस देने का लालच देकर कुबड़ी बनाया गया। वह उसी तरह पीठ दोहरी करके चलने लगी। बच्चों ने सवाल जवाब शुरू कियेः

‘‘कुबड़ी-कुबड़ी का हेराना ?’’

‘‘सुई हिरानी।’’

‘‘सुई लैके का करबे’’

‘‘कन्था सीबै! ’’

‘‘कन्था सी के का करबे ?’’

‘‘लकड़ी लाबै !’’

‘‘लकड़ी लाय के का करबे ?’’

‘‘भात पकइबे! ’’

‘‘भात पकाये के का करबै ?’’

‘‘भात खाबै !’’

‘‘भात के बदले लात खाबै।’’

और इसके पहले कि कुबड़ी बनी हुई मटकी कुछ कह सके, वे उसे जोर से लात मारते और मटकी मुँह के बल गिर पड़ती, उसकी कोहनिया और घुटने छिल जाते, आँख में आँसू आ जाते और ओठ दबाकर वह रूलाई रोकती। बच्चे खुशी से चिल्लाते, ‘‘मार डाला कुबड़ी को । मार डाला कुबड़ी को।’’ गुलकी यह सब देखती और मुँह फेर लेती।

एक दिन जब इसी प्रकार मटकी को कुबड़ी बनाकर गुलकी की दुकान के सामने ले गये तो इसके पहले कि मटकी जबाव दे, उन्होंने ने अनचिते में इतनी ज़ोर से ढकेल दिया कि वह कुहनी भी न टेक सकी और सीधे मुँह के बल गिरी। नाक, होंठ और भौंह ख़ून से लथपथ हो गये। वह ‘‘हाय ! हाय !’’ कर इस बुरी तरह चीख़ी कि लड़के कुबड़ी मर गयी चिल्लाते हुए सहम गये और हतप्रभ हो गये। अकस्मात् उन्होंने देखा की गुलकी उठी । वे जान छोड़ भागे। पर गुलकी उठकर आयी, मटकी को गोद में लेकर पानी से उसका मुँह धोने लगी और धोती से खून पोंछने लगी। बच्चों ने पता नहीं क्या समझा कि वह मटकी को मार रही है, या क्या कर रही है कि वे अकस्मात् उस पर टूट पड़े। गुलकी की चीख़े सुनकर मुहल्ले के लोग आये तो उन्होंने देखा कि गुलकी के बाल बिखरे हैं और दाँत से ख़ून बह रहा है, अधउघारी चबूतरे से नीचे पड़ी है, और सारी तरकारी सड़क पर बिखरी है। घेघा बुआ ने उसे उठाया, धोती ठीक की और बिगड़कर बोलीं, ‘‘औकात रत्ती-भर नै, और तेहा पौवा-भर। आपन बखत देख कर चुप नै रहा जात। कहे लड़कन के मुँह लगत हो ?’’ लोगों ने पूछ तो कुछ नहीं बोली। जैसे उसे पाला मार गया हो। उसने चुपचाप अपनी दुकान ठीक की और दाँत से खू़न पोंछा, कुल्ला किया और बैठ गयी।

उसके बाद अपने उस कृत्य से बच्चे जैसे खु़द सहम गये थे। बहुत दिन तक वे शान्त रहे। आज जब मेवा ने उसकी पीठ पर धूल फेंकी तो जैसे उसे खू़न चढ़ गया पर फिर न जाने वह क्या सोचकर चुप रह गयी और जब नारा लगाते जूलूस गली में मुड़ गया तो उसने आँसू पोंछे, पीठ पर से धूल झाड़ी और साग पर पानी छिड़कने लगी। लड़के का हैं गल्ली के राक्षस हैं !’’ घेघा बुआ बोलीं। ‘‘अरे उन्हें काहै कहो बुआ ! हमारा भाग भी खोटा है !’’ गुलकी ने गहरी साँस लेकर कहा….।

इस बार जो झड़ी लगी तो पाँच दिन तक लगातार सूरज के दर्शन नहीं हुए। बच्चे सब घर में क़ैद थे और गुलकी कभी दुकान लगाती थी, कभी नहीं, राम-राम करके तीसरे पहर झड़ी बन्द हुई। बच्चे हकीमजी के चौतरे पर जमा हो गये। मेवा बिलबोटी बीन लाया था और निरमल ने टपकी हुई निमकौड़ियाँ बीनकर दुकान लगा ली थी और गुलकी की तरह आवाज़ लगा रही थी, ‘‘ले खीरा, आलू, मूली, घिया, बण्डा !’’ थोड़ी देर में क़ाफी शिशु-ग्राहक दुकान पर जुट गये। अकस्मात् शोरगुल से चीरता हुआ बुआ के चौतरे से गीत का स्वर उठा बच्चों ने घूम कर देखा मिरवा और मटकी गुलकी की दुकान पर बैठे हैं। मटकी खीरा खा रही है और मिरवा झबरी का सर अपनी गोद में रखे बिलकुल उसकी आँखों में आँखें डालकर गा रहा है।

तुरन्त मेवा गया और पता लगाकर लाया कि गुलकी ने दोनों को एक –एक अधन्ना दिया है दोनों मिलकर झबरी कुतिया के कीड़े निकाल रहे हैं। चौतरे पर हलचल मच गयी और मुन्ना ने कहा, ‘‘निरमल ! मिरवा-मटकी को एक भी निमकौड़ी मत देना। रहें उसी कुबड़ी के पास !’’ ‘‘हाँ जी !’’ निरमल ने आँख चमकाकर गोल मुंह करके कहा, ‘‘हमार अम्माँ कहत रहीं उन्हें छुयो न ! न साथ खायो, न खेलो। उन्हें बड़ी बुरी बीमारी है। आक थू !’’ मुन्ना ने उनकी ओर देखकर उबकायी जैसा मुँह बनाकर थूक दिया।

गुलकी बैठी-बैठी सब समझ रही थी और जैसे इस निरर्थक घृणा में उसे कुछ रस-सा आने लगा था। उसने मिरवा से कहा, ‘‘तुम दोनों मिल के गाओ तो एक अधन्ना दें। खूब जोर से !’’ भाई-बहन दोनों ने गाना शुरू किया-माल कताली मल जाना, पल अकियाँ किछी से…’’ अकस्मात् पटाक से दरवाजा खुला और एक लोटा पानी दोनों के ऊपर फेंकती हुई घेघा बुआ गरजीं, दूर कलमुँहे। अबहिन बितौ-भर के नाहीं ना और पतुरियन के गाना गाबै लगे। न बहन का ख्याल, न बिटिया का। और ए कुबड़ी, हम तुहूँ से कहे देइत है कि हम चकलाखाना खोलै के बरे अपना चौतरा नहीं दिया रहा। हुँह ! चली हुँआ से मुजरा करावै।’’

गुलकी ने पानी उधर छिटकाते हुए कहा, ‘‘बुआ बच्चे हैं। गा रहे हैं। कौन कसूर हो गया।’’

‘‘ऐ हाँ ! बच्चे हैं। तुहूँ तो दूध पियत बच्ची हौ। कह दिया कि जबान न लड़ायों हमसे, हाँ ! हम बहुतै बुरी हैं। एक तो पाँच महीने से किराया नाहीं दियो और हियाँ दुनियाँ-भर के अन्धे-कोढ़ी बटुरे रहत हैं। चलौ उठायो अपनी दुकान हियाँ से। कल से न देखी हियाँ तुम्हें राम ! राम ! सब अघर्म की सन्तान राच्छस पैदा भये हैं मुहल्ले में ! धरतियौ नहीं फाटत कि मर बिलाय जाँय।’’

गुलकी सन्न रह गयी। उसने किराया सचमुच पाँच महीने से नहीं दिया था। ब्रिक्री नहीं थी। मुहल्ले में उनसे कोई कुछ लेता ही नहीं था, पर इसके लिए बुआ निकाल देगी यह उसे कभी आशा नहीं थी। वैसे भी महीने में बीस दिन वह भूखी सोती थी। धोती में दस-दस पैबन्द थे। मकान गिर चुका था एक दालान में वह थेड़ी-सी जगह में सो जाती थी। पर दुकान तो वहाँ रखी नहीं जा सकती। उसने चाहा कि वह बुआ के पैर पकड़ ले, मिन्नत कर ले। पर बुआ ने जितनी जोर से दरवाजा खोला था उतनी ही जोर से बन्द कर दिया। जब से चौमास आया था, पुरवाई बही थी, उसकी पीठ में भयानक पीड़ा उठती थी। उसके पाँव काँपते थे। सट्टी में उस पर उधार बुरी तरह चढ़ गया था। पर अब होगा क्या ? वह मारे खीज के रोने लगी।

इतने में कुछ खटपट हुई और उसने घुटनों से मुँह उठाकर देखा कि मौका पाकर मटकी ने एक फूट निकाल लिया है और मरभुखी की तरह उसे हबर-हबर खाती जा रही थी है, एक क्षण वह उसके फूलते-पचकते पेट को देखती रही, फिर ख्याल आते ही कि फूट पूरे दस पैसे का है, वह उबल पड़ी और सड़ासड़ तीन-चार खपच्ची मारते हुए बोली, ‘‘चोट्टी ! कुतिया ! तोरे बदन में कीड़ा पड़ें !’’ मटकी के हाथ से फूट गिर पड़ा पर वह नाली में से फूट के टुकड़े उठाते हुए भागी। न रोयी, न चीख़ी, क्योंकि मुँह में भी फूट भरा था। मिरवा हक्का-बक्का इस घटना को देख रहा था कि गुलकी उसी पर बरस पड़ी। सड़-सड़ उसने मिरवा को मारना शुरू किया, ‘‘भाग, यहाँ से हरामजादे !’’ मिरवा दर्द से तिलमिला उठा, ‘‘हमला पइछा देव तो जाई।’’ ‘‘देत हैं पैसा, ठहर तो।’’ सड़ ! सड़।… रोता हुआ। मिरवा चौतरे की ओर भागा।

निरमल की दुकान पर सन्नाटा छाया हुआ था। सब चुप उसी ओर देख रहे थे। मिरवा ने आकर कुबड़ी की शिकायत मुन्ना से की। और घूमकर बोला, ‘‘मेवा बता तो इसे !’ मेवा पहले हिचकिचाया, फिर बड़ी मुलायमियत से बोला, ‘‘मिरवा तुम्हें बीमारी हुई है न ! तो हम लोग तुम्हें नहीं छुएँगे । साथ नहीं खिलाएँगें तुम उधर बैठ जाओ।’’

‘‘हम बीमाल हैं मुन्ना ?’’

मुन्ना कुछ पिघला, ‘‘हाँ, हमें छूओ मत। निमकौड़ी खरीदना हो तो उधर बैठ जाओ हम दूर से फेंक देंगे। समझे !’’ मिरवा समझ गया सर हिलाया और अलग जाकर बैठ गया। मेवा ने निमकौड़ी उसके पास रख दी और चोट भूलकर पकी निमकौड़ी का बीजा निकाल कर छीलने लगा। इतने में उधर से घेघा बुआ की आवाज आयी, ‘‘ऐ मुन्ना !’’ तई तू लोग परे हो जाओ ! अबहिन पानी गिरी ऊपर से !’’ बच्चो ने ऊपर देखा। तिछत्ते पर घेघा बुआ मारे पानी के छप-छप करती घूम रही थीं। कूड़े से तिछत्ते की नाली बन्द थी और पानी भरा था। जिधर बुआ खड़ी थीं उसके ठीक नीचे गुलकी का सौदा था। बच्चे वहाँ से दूर थे पर गुलकी को सुनने के लिए बात बच्चों से कही गयी थी। गुलकी कराहती हुई उठी। कूबड़ की वजह से वह तनकर चिछत्ते की ओर देख भी नहीं सकती थी। उसने धरती की ओर देखा ऊपर बुआ से कहा, ‘‘इधर की नाली काहे खोल रही हो ? उधर की खोलो न !’’

‘‘काहे उधर की खोली ! उधर हमारा चौका है कि नै !’’

‘‘इधर हमारा सौदा लगा है।’’

‘‘ऐ है !’’ बुआ हाथ चमका कर बोलीं, सौदा लगा है रानी साहब का ! किराया देय की दायीं हियाव फाटत है और टर्राय के दायीं नटई में गामा पहिलवान का जोर तो देखो ! सौदा लगा है तो हम का करी। नारी तो इहै खुली है !’’

‘‘खोलो तो देखैं !’’ अकस्मात् गुलकी ने तड़प कर कहा। आज तक किसी ने उसका वह स्वर नहीं सुना था-‘‘पाँच महीने का दस रूपया नहीं दिया बेशक, पर हमारे घर की धन्नी निकाल के बसन्तू के हाथ किसने बेचा ? तुमने। पच्छिम ओर का दरवाजा चिरवा के किसने जलवाया ? तुमने। हम गरीब हैं। हमारा बाप नहीं है सारा मुहल्ला हमें मिल के मार डालो।’’

‘‘हमें चोरी लगाती है। अरे कल की पैदा हुई।’’ बुआ मारे ग़ुस्से के खड़ी बोली बोलने लगी थीं।

बच्चे चुप खड़े थे। वे कुछ-कुछ सहमे हुए थे। कुबड़ी का यह रूप उन्होंने कभी न देखा न सोचा था

‘‘हाँ ! हाँ ! हाँ। तुमने, ड्राइवर चाचा से, चाची ने सबने मिलके हमारा मकान उजाड़ा है। अब हमारी दुकान बहाय देव। देखेंगे हम भी। निरबल के भी भगवान हैं !’’

‘‘ले ! ले ! ले ! भगवान हैं तो ले !’’ और बुआ ने पागलों की तरह दौड़कर नाली में जमा कूड़ा लकड़ी से ठेल दिया। छह इंच मोटी गन्दे पानी की धार धड़-धड़ करती हुई उसकी दुकान पर गिरने लगी। तरोइयाँ पहले नाली में गिरीं, फिर मूली, खीरे, साग, अदरक उछल-उछलकर दूर जा गिरे। गुलकी आँख फाड़े पागल-सी देखती रही और फिर दीवार पर सर पटककर हृदय-विदारक स्वर में डकराकर रो पड़ी, ‘‘अरे मोर बाबू, हमें कहाँ छोड़ गये ! अरे मोरी माई, पैदा होते ही हमें क्यों नहीं मार डाला ! अरे धरती मैया, हमें काहे नहीं लील लेती !’’

सर खोले बाल बिखेरे छाती कूट-कूटकर वह रो रही थी और तिछत्ते का पिछले पहले नौ दिन का जमा पानी धड़-धड़ गिर रहा था।

बच्चे चुप खड़े थे। अब तक जो हो रहा था, उनकी समझ में आ रहा था। पर आज यह क्या हो गया, यह उनकी समझ में नहीं आ सका । पर वे कुछ बोले नहीं। सिर्फ मटकी उधर गयी और नाली में बहता हुआ हरा खीरा निकालने लगी कि मुन्ना ने डाँटा, ‘‘खबरदार ! जो कुछ चुराया।’’ मटकी पीछे हट गयी। वे सब किसी अप्रत्याशित भय संवेदना या आशंका से जुड़-बटुरकर खड़े हो गये। सिर्फ़ मिरवा अलग सर झुकाये खड़ा था। झींसी फिर पड़ने लगी थी और वे एक-एक कर अपने घर चले गये।

दूसरे दिन चौतरा ख़ाली थी। दुकान का बाँस उखड़वाकर बुआ ने नाँद में गाड़कर उस पर तुरई की लतर चढ़ा दी थी। उस दिन बच्चे आये पर उनकी हिम्मत चौतरे पर जाने की नहीं हुई। जैसे वहाँ कोई मर गया हो। बिलकुल सुनसान चौतरा था और फिर तो ऐसी झड़ी लगी कि बच्चों का निकलना बन्द। चौथे या पाँचवें दिन रात को भयानक वर्षा तो हो ही रही थी, पर बादल भी ऐसे गरज रहे थे कि मुन्ना अपनी खाट से उठकर अपनी माँ के पास घुस गया। बिजली चमकते ही जैसे कमरा रोशनी से नाच-नाच उठता था छत पर बूदों की पटर-पटर कुछ धीमी हुई, थोड़ी हवा भी चली और पेड़ों का हरहर सुनाई पड़ा कि इतने में धड़-धड़-धड़-धड़ाम ! भयानक आवाज़ हुई। माँ भी चौंक पड़ी। पर उठी नहीं। मुन्ना आँखें खोले अँधेरें में ताकने लगा। सहसा लगा मुहल्ले में कुछ लोग बातचीत कर रहे हैं घेघा बुआ की आवाज़ सुनाई पड़ी-‘‘किसका मकान गिर गया है रे’’ ‘‘गुलकी का !’’-किसी का दूरागत उत्तर आया। ‘‘अरे बाप रे ! दब गयी क्या ?’’ ‘‘नहीं, आज तो मेवा की माँ के यहाँ सोई है ! मुन्ना लेटा था और उसके ऊपर अँधेरे में यह सवाल-जवाब इधर-से-उधर और उधर-से-इधर आ रहे थे। वह फिर काँप उठा, माँ के पास घुस गया और सोते-सोते उसने साफ़ सुना-कुबड़ी फिर उसी तरह रो रही है, गला फाड़कर रो रही है ! कौन जाने मुन्ना के ही आँगन में बैठकर रो रही हो ! नींद में वह स्वर कभी दूर कभी पास आता हुआ लग रहा है जैसे कुबड़ी मुहल्ले के हर आँगन में जाकर रो रही है पर कोई सुन नहीं रहा है, सिवा मुन्ना के।

बच्चों के मन में कोई बात इतनी गहरी लकीर बनाती कि उधर से उनका ध्यान हटे ही नहीं। सामने गुलकी थी तो वह एक समस्या थी, पर उसकी दुकान हट गयी, फिर वह जाकर साबुन वाली सत्ती के गलियारे में सोने लगी और दो-चार घरों से माँग-मूँगकर खाने लगी, उस गली में दिखती ही नहीं थी। बच्चे भी दूसरे कामों में व्यस्त हो गये। अब जाड़े आ रहे थे। उनका जमावड़ा सुबह न होकर तीसरे पहर होता था। जमा होने के बाद जूलूस निकलता था। और जिस जोशीले नारे से गली गूँज उठती थी वह था-‘घेघा बुआ को वोट दो।’’ पिछले दिनों म्युनिसिपैलिटी का चुनाव हुआ था और उसी में बच्चों ने यह नारा सीखा था। वैसे कभी-कभी बच्चों में दो पार्टियाँ भी होती थीं, पर दोनों को घेघा बुआ से अच्छा उम्मीदवार कोई नहीं मिलता था अतः दोनों गला फाड़-फाड़कर उनके ही लिए बोट माँगती थीं।

उस दिन जब घेघा बुआ के धैर्य का बाँध टूट गया और नयी-नयी गालियों से विभूषित अपनी पहली इलेक्शन स्पीच देने ज्यों ही चौतरे पर अवतरित हुईं कि उन्हें डाकिया आता हुआ दिखाई पड़ा। वह अचकचाकर रूक गयीं। डाकिये के हाथ में एक पोस कार्ड था और वह गुलकी को ढूँढ़ रहा था। बुआ ने लपक कर पोस्टकार्ड लिया, एक साँस में पढ़ गयीं। उनकी आँखें मारे अचरज के फैल गयीं, और डाकिये को यह बताकर कि गुलकी सत्ती साबुनवाली के ओसारे में रहती है, वे झट से दौड़ी-दौड़ी निरमल की माँ ड्राइवर की पत्नी के यहाँ गयीं। बड़ी देर तक दोनों में सलाह-मशविरा होता रहा और अन्त में बुआ आयीं और उन्होंने मेवा को भेजा, ‘‘जा गुलकी को बुलाय ला !’’

पर जब मेवा लौटा तो उसके साथ गुलकी नहीं वरन् सत्ती साबुनवाली थी और सदा की भाँति इस समय भी उसकी कमर से वह काले बेंट का चाकू लटक रहा था, जिससे वह साबुन की टिक्की काटकर दुकानदारों को देती थी। उसने आते ही भौं सिकोड़कर बुआ को देखा और कड़े स्वर में बोली, ‘‘क्यों बुलाया है गुलकी को ? तुम्हारा दस रूपये किराया बाकी था, तुमने पन्द्रह रूपये का सौदा उजाड़ दिया ! अब क्या काम है !’’ ‘‘अरे राम ! राम ! कैसा किराया बेटी ! अन्दर जाओ-अन्दर जाओ !’ बुआ के स्वर में असाधारण मुलायमियत थी। सत्ती के अन्दर जाते ही बुआ ने फटाक् से किवाड़ा बन्द कर लिये। बच्चों का कौतूहल बहुत बढ़ गया था। बुआ के चौके में एक झँझरी थी। सब बच्चे वहाँ पहुँचे और आँख लगाकर कनपटियों पर दोनों हथेलियाँ रखकर घण्टीवाला बाइसकोप देखने की मुद्रा में खड़े हो गये।

अन्दर सत्ती गरज रही थी, ‘‘बुलाया है तो बुलाने दो। क्यों जाए गुलकी ? अब बड़ा खयाल आया है। इसलिए की उसकी रखैल को बच्चा हुआ है जो जाके गुलकी झाड़ू-बुहारू करे, खाना बनावे, बच्चा खिलावे, और वह मरद का बच्चा गुलकी की आँख के आगे रखैल के साथ गुलछर्रे उड़ावे !’’

निरमल की माँ बोलीं, ‘‘अपनी बिटिया, पर गुजर तो अपने आदमी के साथ करैगी न ! जब उसकी पत्नी आयी है तो गुलकी को जाना चाहिए। और मरद तो मरद। एक रखैल छोड़ दुई-दुई रखैल रख ले तो औरत उसे छोड़ देगी ? राम ! राम !’’

‘‘नहीं, छोड़ नहीं देगी तो जाय कै लात खाएगी ?’’ सत्ती बोली।

‘‘अरे बेटा !’’ बुआ बोलीं, ‘‘भगवान रहें न ? तौन मथुरापुरी में कुब्जा दासी के लात मारिन तो ओकर कूबर सीधा हुइ गवा। पती तो भगवान हैं बिटिया। ओका जाय देव !’’

‘‘हाँ-हाँ, बड़ी हितू न बनिये ! उसके आदमी से आप लोग मुफ्त में गुलकी का मकान झटकना चाहती हैं। मैं सब समझती हूँ।’’

निरमल की माँ का चेहरा ज़र्द पड़ गया। पर बुआ ने ऐसी कच्ची गोली नहीं खेली थी। वे डपटकर बोलीं, ‘‘खबरदार जो कच्ची जबान निकाल्यो ! तुम्हारा चरित्तर कौन नै जानता ! ओही छोकरा मानिक…’’

जबान खींच लूँगी, ‘‘सत्ती गला फाड़कर चीख़ी जो आगे एक हरूफ़ कहा।’’ और उसका हाथ अपने चाकू पर गया-

‘‘अरे ! अरे ! अरे !’’ बुआ सहमकर दस क़दम पीछे हट गयीं-‘‘तो का खून करबो का, कतल करबो का ?’’ सत्ती जैसे आयी थी वैसे ही चली गयी।

तीसरे दिन बच्चों ने तय किया कि होरी बाबू के कुएँ पर चलकर बर्रें पकड़ी जायें। उन दिनों उनका जहर शान्त रहता है, बच्चे उन्हें पकड़कर उनका छोटा-सा काला डंक निकाल लेते और फिर डोरी में बाँधकर उन्हें उड़ाते हुए घूमते। मेवा, निरमल और मुन्ना एक-एक बर्रे उड़ाते हुए जब गली में पहुँचे तो देखा बुआ के चौतरे पर टीन की कुरसी डाले कोई आदमी बैठा है। उसकी अजब शक्ल थी। कान पर बड़े-बड़े बाल, मिचमिची आँखें, मोछा और तेल से चुचुआते हुए बाल। कमीज और धोती पर पुराना बदरंग बूट। मटकी हाथ फैलाये कह रही है, “एक डबल दै देव! एक दै देव ना?” मुन्ना को देखकर मटकी ताली बजा-बजाकर कहने लगी, “गुलकी का मनसेधू आवा है। ए मुन्ना बाबू! ई कुबड़ी का मनसेधू है।” फिर उधर मुड़कर- “एक डबल दै देव।” तीनों बच्चे कौतूहल में रुक गये। इतने में निरमल की माँ एक गिलास में चाय भरकर लायी और उसे देते-देते निरमल के हाथ में बर्रे देखकर उसे डाँटने लगी। फिर बर्रे छुड़ाकर निरमल को पास बुलाया और बोली, “बेटा, ई हमारी निरमला है। ए निरमल, जीजाजी हैं, हाथ जोड़ो! बेटा, गुलकी हमारी जात-बिरादरी की नहीं है तो का हुआ, हमारे लिए जैसे निरमल वैसे गुलकी। अरे, निरमल के बाबू और गुलकी के बाप की दाँत काटी रही। एक मकान बचा है उनकी चिहारी, और का?”; एक गहरी साँस लेकर निरमल की माँ ने कहा।

“अरे तो का उन्हें कोई इनकार है?”; बुआ आ गयी थीं, “अरे सौ रुपये तुम दैवे किये रहय्यू, चलो तीन सौ और दै देव। अपने नाम कराय लेव?”

“पाँच सौ से कम नहीं होगा?” उस आदमी का मुँह खुला, एक वाक्य निकला और मुँह फिर बन्द हो गया।

“भवा! भवा! ऐ बेटा दामाद हौ, पाँच सौ कहबो तो का निरमल की माँ को इनकार है?”

अकस्मात् वह आदमी उठकर खड़ा हो गया। आगे-आगे सत्ती चली आ रही थी | पीछे-पीछे गुलकी। सत्ती चौतरे के नीचे खड़ी हो गयी। बच्चे दूर हट गये। गुलकी ने सिर उठाकर देखा और अचकचाकर सर पर पल्ला डालकर माथे तक खींच लिया। सत्ती दो-एक क्षण उसकी ओर एकटक देखती रही और फिर गरजकर बोली, “यही कसाई है! गुलकी, आगे बढ़कर मार दो चपोटा इसके मुँह पर! खबरदार जो कोई बोला?”; बुआ चट से देहरी के अन्दर हो गयीं, निरमल की माँ की जैसे घिग्घी बँध गयी और वह आदमी हड़बड़ाकर पीछे हटने लगा।

“बढ़ती क्यों नहीं गुलकी! बड़ा आया वहाँ से बिदा कराने?”

गुलकी आगे बढ़ी ; सब सन्न थे ; सीढ़ी चढ़ी, उस आदमी के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। गुलकी चढ़ते-चढ़ते रुकी, सत्ती की ओर देखा, ठिठकी, अकस्मात् लपकी और फिर उस आदमी के पाँव पर गिर के फफक-फफककर रोने लगी, “हाय! हमें काहे को छोड़ दियौ! तुम्हारे सिवा हमारा लोक-परलोक और कौन है! अरे, हमरे मरै पर कौन चुल्लू भर पानी चढ़ायी।

सत्ती का चेहरा स्याह पड़ गया। उसने बड़ी हिकारत से गुलकी की ओर देखा और गुस्से में थूक निगलते हुए कहा, “कुतिया!”; और तेजी से चली गयी। निरमल की मां और बुआ गुलकी के सर पर हाथ फेर-फेरकर कह रही थीं, “मत रो बिटिया! मत रो! सीता मैया भी तो बनवास भोगिन रहा। उठो गुलकी बेटा! धोती बदल लेव कंघी चोटी करो। पति के सामने ऐसे आना असगुन होता है। चलो!”;

गुलकी आँसू पोंछती-पोंछती निरमल की माँ के घर चली। बच्चे पीछे-पीछे चले तो बुआ ने डाँटा, “ऐ चलो एहर, हुँआ लड्डू बँट रहा है का?”;

दूसरे दिन निरमल के बाबू (ड्राइवर साहब), गुलकी और जीजाजी दिन-भर कचहरी में रहे। शाम को लौटे तो निरमल की माँ ने पूछा, “पक्का कागज लिख गया?” “हाँ-हाँ रे, हाकिम, के सामने लिख गया।” फिर जरा निकट आकर फुसफुसाकर बोले, “मट्टी के मोल मकान मिला है। अब कल दोनों को बिदा करो।” “अरे, पहले सौ रुपये लाओ! बुआ का हिस्सा भी तो देना है?” निरमल की माँ उदास स्वर में बोली, “बड़ी चंट है बुढ़िया। गाड़-गाड़ के रख रही है, मर के साँप होयगी।”;

सुबह निरमल की माँ के यहाँ मकान खरीदने की कथा थी। शंख, घण्टा-घड़ियाली, केले का पत्ता, पंजीरी, पंचामृत का आयोजन देखकर मुन्ना के अलावा सब बच्चे इकट्ठा थे। निरमल की माँ और निरमल के बाबू पीढ़े पर बैठे थे; गुलकी एक पीली धोती पहने माथे तक घूँघट काढ़े सुपारी काट रही थी और बच्चे झाँक-झाँककर देख रहे थे। मेवा ने पहुँचकर कहा, “ए गुलकी, ए गुलकी, जीजाजी के साथ जाओगी क्या?”; कुबड़ी ने झेंपकर कहा, “धत्त रे! ठिठोली करता है”; और लज्जा-भरी जो मुसकान किसी भी तरुणी के चेहरे पर मनमोहक लाली बनकर फैल जाती, उसके झुर्रियोंदार, बेडौल, नीरस चेहरे पर विचित्र रूप से बीभत्स लगने लगी। उसके काले पपड़ीदार होठ सिकुड़ गये, आँखों के कोने मिचमिचा उठे और अत्यन्त कुरुचिपूर्ण ढंग से उसने अपने पल्ले से सर ढाँक लिया और पीठ सीधी कर जैसे कूबड़ छिपाने का प्रयास करने लगी। मेवा पास ही बैठ गया। कुबड़ी ने पहले इधर-उधर देखा, फिर फुसफुसाकर मेवा से कहा, “क्यों रे! जीजाजी कैसे लगे तुझे?” मेवा ने असमंजस में या संकोच में पड़कर कोई जवाब नहीं दिया तो जैसे अपने को समझाते हुए गुलकी बोली, “कुछ भी होय। है तो अपना आदमी! हारे-गाढ़े कोई और काम आयेगा? औरत को दबाय के रखना ही चाहिए।” फिर थोड़ी देर चुप रहकर बोली, “मेवा भैया, सत्ती हमसे नाराज है। अपनी सगी बहन क्या करेगी जो सत्ती ने किया हमारे लिए। ये चाची और बुआ तो सब मतलब के साथी हैं हम क्या जानते नहीं? पर भैया अब जो कहो कि हम सत्ती के कहने से अपने मरद को छोड़ दें, सो नहीं हो सकता।” इतने में किसी का छोटा-सा बच्चा घुटनों के बल चलते-चलते मेवा के पास आकर बैठ गया। गुलकी क्षण-भर उसे देखती रही फिर बोली, “पति से हमने अपराध किया तो भगवान् ने बच्चा छीन लिया, अब भगवान् हमें छमा कर देंगे।” फिर कुछ क्षण के लिए चुप हो गयी। “क्षमा करेंगे तो दूसरी सन्तान देंगे?” “क्यों नहीं देंगे? तुम्हारे जीजाजी को भगवान् बनाये रखे। खोट तो हमी में है। फिर सन्तान होगी तब तो सौत का राज नहीं चलेगा।”;

इतने में गुलकी ने देखा कि दरवाजे पर उसका आदमी खड़ा बुआ से कुछ बातें कर रहा है। गुलकी ने तुरत पल्ले से सर ढंका और लजाकर उधर पीठ कर ली। बोली, “राम! राम! कितने दुबरा गये हैं। हमारे बिना खाने-पीने का कौन ध्यान रखता! अरे, सौत तो अपने मतलब की होगी। ले भैया मेवा, जा दो बीड़ा पान दे आ जीजा को?” फिर उसके मुँह पर वही लाज की बीभत्स मुद्रा आयी- “तुझे कसम है, बताना मत किसने दिया है।”

मेवा पान लेकर गया पर वहाँ किसी ने उसपर ध्यान ही नहीं दिया। वह आदमी बुआ से कह रहा था, “इसे ले तो जा रहे हैं, पर इतना कहे देते हैं, आप भी समझा दें उसे- कि रहना हो तो दासी बनकर रहे। न दूध की न पूत की, हमारे कौन काम की; पर हाँ औरतिया की सेवा करे, उसका बच्चा खिलावे, झाड़ू-बुहारू करे तो दो रोटी खाय पड़ी रहे। पर कभी उससे जबान लड़ाई तो खैर नहीं । हमारा हाथ बड़ा जालिम है। एक बार कूबड़ निकला, अगली बार परान निकलेगा।”

“क्यों नहीं बेटा! क्यों नहीं?” बुआ बोलीं और उन्होंने मेवा के हाथ से पान लेकर अपने मुँह में दबा लिये।

करीब तीन बजे इक्का लाने के लिए निरमल की माँ ने मेवा को भेजा। कथा की भीड़-भाड़ से उनका मूड़ पिराने लगा था, अतः अकेली गुलकी सारी तैयारी कर रही थी। मटकी कोने में खड़ी थी। मिरवा और झबरी बाहर गुमसुम बैठे थे। निरमल की माँ ने बुआ को बुलवाकर पूछा कि बिदा-बिदाई में क्या करना होगा, तो बुआ मुँह बिगाड़कर बोलीं, “अरे कोई जात-बिरादरी की है का? एक लोटा में पानी भर के इकन्नी-दुअन्नी उतार के परजा-पजारू को दे दियो बस?” और फिर बुआ शाम को बियारी में लग गयीं।

इक्का आते ही जैसे झबरी पागल-सी इधर-उधर दौड़ने लगी। उसे जाने कैसे आभास हो गया कि गुलकी जा रही है, सदा के लिए। मेवा ने अपने छोटे-छोटे हाथों से बड़ी-बड़ी गठरियाँ रखीं, मटकी और मिरवा चुपचाप आकर इक्के के पास खड़े हो गये। सर झुकाये पत्थर-सी चुप गुलकी निकली। आगे-आगे हाथ में पानी का भरा लोटा लिये निरमल थी। वह आदमी जाकर इक्के पर बैठ गया। “अब जल्दी करो!”; उसने भारी गले से कहा। गुलकी आगे बढ़ी, फिर रुकी और टेंट से दो अधन्नी निकाले- “ले मिरवा, ले मटकी?” मटकी जो हमेशा हाथ फैलाये रहती थी, इस समय जाने कैसा संकोच उसे आ गया कि वह हाथ नीचे कर दीवार से सट कर खड़ी हो गयी और सर हिलाकर बोली, “नहीं ?”–“नहीं बेटा! ले लो!” गुलकी ने पुचकारकर कहा। मिरवा-मटकी ने पैसे ले लिये और मिरवा बोला, “छलाम गुलकी! ए आदमी छलाम?”;

“अब क्या गाड़ी छोड़नी है?” वह फिर भारी गले से बोला।

“ठहरो बेटा, कहीं ऐसे दामाद की बिदाई होती है?” सहसा एक बिलकुल अजनबी किन्तु अत्यन्त मोटा स्वर सुनायी पड़ा। बच्चों ने अचरज से देखा, मुन्ना की माँ चली आ रही हैं। “हम तो मुन्ना का आसरा देख रहे थे कि स्कूल से आ जाये, उसे नाश्ता करा लें तो आयें, पर इक्का आ गया तो हमने समझा अब तू चली। अरे! निरमल की माँ, कहीं ऐसे बेटी की बिदाई होती है! लाओ जरा रोली घोलो जल्दी से, चावल लाओ, और सेन्दुर भी ले आना निरमल बेटा! तुम बेटा उतर आओ इक्के से!”;

निरमल की माँ का चेहरा स्याह पड़ गया था। बोलीं, “जितना हमसे बन पड़ा किया। किसी को दौलत का घमण्ड थोड़े ही दिखाना था?” “नहीं बहन! तुमने तो किया पर मुहल्ले की बिटिया तो सारे मुहल्ले की बिटिया होती है। हमारा भी तो फर्ज था। अरे माँ-बाप नहीं हैं तो मुहल्ला तो है। आओ बेटा?” और उन्होंने टीका करके आँचल के नीचे छिपाये हुए कुछ कपड़े और एक नारियल उसकी गोद में डालकर उसे चिपका लिया। गुलकी जो अभी तक पत्थर-सी चुप थी सहसा फूट पड़ी। उसे पहली बार लगा जैसे वह मायके से जा रही है। मायके से अपनी माँ को छोड़कर छोटे-छोटे भाई-बहनों को छोड़कर और वह अपने कर्कश फटे हुए गले से विचित्र स्वर से रो पड़ी।

“ले अब चुप हो जा! तेरा भाई भी आ गया?” वे बोलीं। मुन्ना बस्ता लटकाये स्कूल से चला आ रहा था। कुबड़ी को अपनी माँ के कन्धे पर सर रखकर रोते देखकर वह बिल्कुल हतप्रभ-सा खड़ा हो गया- “आ बेटा, गुलकी जा रही है न आज! दीदी है न! बड़ी बहन है। चल पाँव छू ले! आ इधर?” माँ ने फिर कहा। मुन्ना और कुबड़ी के पाँव छुए? क्यों? क्यों? पर माँ की बात! एक क्षण में उसके मन में जैसे एक पूरा पहिया घूम गया और वह गुलकी की ओर बढ़ा। गुलकी ने दौड़कर उसे चिपका लिया और फूट पड़ी- “हाय मेरे भैया! अब हम जा रहे हैं! अब किससे लड़ोगे मुन्ना भैया? अरे मेरे वीरन, अब किससे लड़ोगे?” मुन्ना को लगा जैसे उसकी छोटी-छोटी पसलियों में एक बहुत बड़ा-सा आँसू जमा हो गया जो अब छलकने ही वाला है। इतने में उस आदमी ने फिर आवाज दी और गुलकी कराहकर मुन्ना की माँ का सहारा लेकर इक्के पर बैठ गयी। इक्का खड़-खड़ कर चल पड़ा। मुन्ना की माँ मुड़ी कि बुआ ने व्यंग्य किया, “एक आध गाना भी बिदाई का गाये जाओ बहन! गुलकी बन्नो ससुराल जा रही है!” मुन्ना की माँ ने कुछ जवाब नहीं दिया, मुन्ना से बोली, “जल्दी घर आना बेटा, नाश्ता रखा है?”

पर पागल मिरवा ने, जो बम्बे पर पाँव लटकाये बैठा था, जाने क्या सोचा कि वह सचमुच गला फाड़कर गाने लगा, “बन्नो डाले दुपट्टे का पल्ला, मुहल्ले से चली गयी राम?” यह उस मुहल्ले में हर लड़की की बिदा पर गाया जाता था। बुआ ने घुड़का तब भी वह चुप नहीं हुआ, उलटे मटकी बोली, “काहे न गावें, गुलकी नै पैसा दिया है?” और उसने भी सुर मिलाया, “बन्नो तली गयी लाम! बन्नो तली गयी लाम! बन्नो तली गयी लाम!”

मुन्ना चुपचाप खड़ा रहा। मटकी डरते-डरते आयी- “मुन्ना बाबू! कुबड़ी ने अधन्ना दिया है, ले लें?”

“ले ले” बड़ी मुश्किल से मुन्ना ने कहा और उसकी आँख में दो बड़े-बड़े आँसू डबडबा आये। उन्हीं आँसुओं की झिलमिल में कोशिश करके मुन्ना ने जाते हुए इक्के की ओर देखा। गुलकी आँसू पोंछते हुए परदा उठाकर मुड़-मुड़कर देख रही थी। मोड़ पर एक धचके से इक्का मुड़ा और फिर अदृश्य हो गया।

सिर्फ झबरी सड़क तक इक्के के साथ गयी और फिर लौट गयी।

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नारी-हृदय

अनुमानित समय : 6 मिनट-

शहर में प्लेग था। लोग धड़ाधड़ मर रहे थे। बीमारी भी ऐसी थी–बीमार पड़ते ही लाश निकलते देर न लगती। सब लोग शहर छोड़-छोड़कर बाहर जंगलों में या झोपड़े बनाकर रहने के लिए भागने लगे। न चाहते हुए भी मुझे शहर छोड़ना पड़ा। मुझे यहाँ से भागना अच्छा न लगता था। घर में मैंने सब को प्लेग का टीका लगवा दिया था और शाम को पाँच-पाँच बूँद प्लेगक्योर भी पिला दिया करता था। इच्छा थी कि शहर में ही बना रहूँ। कौन यहाँ से वहाँ भागने का झंझट करे।

वैसे ही खर्च के मारे हैरान था। फिर और लोगों की तरह मैं झोपड़ा बनाकर भी तो न रह सकता था ? वकालत की शान में फरक न पड़ जाता ? रहना तो मुझे बँगले पर ही पड़ेगा, और इन दिनों बँगले के मालिकों का दिमाग तो सातवें आसमान पर ही रहता है, सौ, पचहत्तर और पचास से नीचे तो वह बात ही नहीं करते। फिर आजकल की आमदनी में किराए का कम-से-कम पचास रुपए माहवारी ही रख लो तो चार महीने में दो सौ हो जाते हैं; मुश्किल ही समझो, पर करता क्या ? अपने प्रयत्न भर तो मैंने शहर में ही रहे आने की कोशिश की पर मेरी स्त्री ने न माना। उसने, जब तक मैं मकान बदल कर बँगले पर रहने न चला गया, मेरा खाना-पीना और सोना हराम कर दिया। उसकी जरा-सी बच्ची थी, जिसके लिए वह इतनी व्याकुल रहती जैसे सारे शहर भर का प्लेग उसी पर फट पड़ेगा।

कचहरी की छुट्टी थी। मैं अपने ऑफिस वाले कमरे में एक नौकर की सहायता से अपनी कानून की किताबें जमा रहा था। कमरे में कई अलमारियाँ थीं। मैं उन्हें साफ करवा के वहाँ अपनी पुस्तकें और अन्य वस्तुएँ तरतीबवार रखवा रहा था। उन अलमारियों से रद्दी कागजों के साथ एक लिफाफा भी वजन से जरा भारी होने के कारण खट-से नीचे गिर पड़ा। मैंने उसे गिरते देखा, किंतु उदासीन भाव से फिर अपने काम में लग गया। मैं कमरे से बाहर जाने लगा, लिफाफा फिर पैरों से टकराया। इस बार मैंने उसे उठा लिया, उठाकर देखा तो उस पर किसी का पता तो न था, पर वह मजबूत डोर से कसकर बाँधा गया था, और मैंने जेब में रख लिया। दिन-भर कार्य की अधिकता के कारण मुझे उसकी याद ही नहीं रही।

शाम को जब मैं भोजन करके लेटा तो क्रम-क्रम से दिन भर की घटनाओं पर विचार करने लगा। एकाएक मुझे उस लिफाफे की याद आ गई। मैंने बिस्तर से उठकर कोट की जेब से लिफाफा निकाला और कैंची से धागे को काट कर सावधानी से खोला, देखा तो उसमें किसी स्त्री के लिखे हुए कुछ पत्र थे। उत्सुकता और बढ़ी, मैंने पत्रों को तारीख वार पढ़ना प्रारंभ किया। पहला पत्र इस प्रकार था।

पत्र-1

शांति-सरोवर

01-09-1931

मेरे देवता !

मुझे मालूम है कि आप मुझसे नाराज हैं। थोड़ा भी नहीं, बहुत अधिक। यहाँ तक कि आप दो अक्षर लिखकर अपना कुशल-समाचार देना भी उचित नहीं समझते। आपकी इस नाराजगी का कारण भी मुझसे छिपा नहीं है।

मैं ही जानती हूँ कि किन परिस्थितियों में पड़कर मैं आपकी आज्ञा का उल्लंघन कर रही हूँ। यदि आप मेरे स्थान पर होते तो आप भी वही करते, जो मैं करती हूँ।

अंत में मैं आप से यही निवेदन करती हूं कि आप मुझसे नाराज न हों। अपने कुशल-समाचार का पत्र भेजकर अनुगृहीत करें।

आपकी ही

प्रमिला

पत्र-2

शांति-सरोवर

10-09-1931

मेरे सर्वस्व !

उस दिन पत्र भेजकर कई दिनों तक उत्तर की प्रतीक्षा करती रही, किंतु आज तक आपका एक भी पत्र नहीं मिला। उत्सुक नेत्रों से रोज पोस्टमैन की राह देखती हूँ। वह आता है और मेरे दरवाजे की तरफ बिना मुड़े हुए ही चला जाता है। सब के पास चिट्ठियाँ आती हैं, परंतु मेरे पत्थर के देवता ! आप न पसीजे, आपके पत्र एक भी न आए। न जाने कितने तरह के विचार आपके दिमाग में आते और जाते होंगे, और आप न जाने क्या-क्या सोच रहे होंगे। कदाचित् आप सोचते हों कि मैं बड़ी अकृतज्ञ, मूर्खा और अभिमानिनी हूँ। जिन लोगों ने मेरे साथ इतनी भलाई की, मुझे सर आँखों पर रखा उन्हीं के साथ कृतघ्नता कर रही हूँ। यही है न ? किंतु मैं क्या करूँ ? मैं परवश हूँ, पत्र में कुछ लिख नहीं सकती। यदि आप कभी मुझसे मिलने का कष्ट करेंगे, अपने चरणों के दर्शन का सौभाग्य देंगे, तब मैं आपके चरणों पर सर रखकर आपको समझा दूँगी–आपको बतला दूँगी कि मैं अपराधिनी नहीं हूँ, तब आप जान सकेंगे कि मैं कितनी विवश और कितनी निरुपाय हूँ। नाराज तो उसी से हुआ जाता है जो नाराजी सह सके। किंतु आप नाराज हैं, मुझसे ! जो न जाने कितने मील की दूरी पर है। जो हर प्रकार से विवश है। जिसे आपको छूने तक का अधिकार नहीं, जो केवल आपकी कृपादृष्टि की भिखारिन है। आह ! यदि आप मेरी विवशता का कुछ भी अनुभव करते!….

आप मुझसे हँसकर बात करते हैं, मैं हँस देती हूँ, अपने को धन्य समझती हूँ। कल से आप मुझसे बात ही न करना चाहें तो मैं आपका क्या कर सकती हूँ ? मुझे क्या अधिकार है सिवा इसके कि कलेजे पर पत्थर रखकर, सब चुपचाप सह लूँ। मैं खुलकर रो भी तो नहीं सकती, मुझे इतना भी तो अधिकार नहीं है। आपने नाराज होकर पत्र लिखना बंद कर दिया है, कल यदि आपको मेरी शक्ल से भी नफरत हो जाए, तो भला सिवा रोने के मेरे पास और क्या बच रहेगा। मुझ सरीखी तो आपके घर चार दासियाँ होंगी। किंतु मेरा दुनिया में कौन है। मैं तो घर-बाहर की ठुकराई हुई अभागिन अबला हूँ। आपने दया करके मुझे सम्मान, आदर और अपने हृदय में आश्रय दिया है। उसे इस निर्दयता से न छोड़िए। एक बार मुझसे मिल लीजिए। इसके बाद जैसी आपकी धारणा हो वैसा कीजिए। आप मुझे जिस दंड की अधिकारिणी समझेंगे, मैं उसे सहने के लिए तैयार हूँ। आप मुझे अपने चरणों से दूर कर देंगे, तो भी मैं आपकी ही रहूँगी। समाज की आँखों में नहीं, अपनी और परमात्मा की आँखों में ! आप मुझे भले ही अपनी न समझें, परंतु मैं तो आजीवन आपको देवता की तरह पूजती रहूँगी। मेरा अटल विश्वास है कि आप सबके होने के बाद, थोड़े से मेरे भी हैं। कभी साल-छह महीने में मिनट-दो-मिनट के लिए सही; मुझे भी आपके चरणों की सेवा करने का अधिकार है।

उत्तर की प्रतीक्षा में

अभागिन प्रमिला

पत्र-3

शांति-सरोवर

30-09-1931

मेरे स्वामी !

यह तो हो ही नहीं सकता कि मेरे पत्र आपको मिलते ही न हों। क्षण भर के लिए यह मान लिया कि मेरे पत्र आपको मिले ही नहीं। फिर भी क्या एक कार्ड पर दो शब्द लिखकर आप मेरे पत्र न भेजने का कारण न पूछ सकते थे, खैर, आप अपनी मनमानी कर लीजिए। मैं हूँ भी इसी योग्य, कहा भी गया है–जैसा देव वैसी पूजा। आपने मुझे ठुकराकर; मेरी अवहेलना करके उचित ही किया है। इसमें मैं आपको दोष कैसे दूँ ? जिसका जन्म ही अपमान, अवहेलना और अनादर सहने के लिए हुआ हो, वह उससे अधिक अच्छी वस्तु की आशा ही क्यों करे? अपने आपको भूल गई थी। आज मेरी आँखें खुल गईं। मुझे अपनी थाह मिल गई। मेरी समझ में आ गया कि मैं कहाँ हूँ।

परमात्मा ने स्त्री-जाति के हृदय में इतना विश्वास, इतनी कोमलता और इतना प्रेम शायद इसीलिए भर दिया है कि वह पग-पग पर ठुकराई जावे। जिस देवता के चरणों पर हम अपना सर्वस्व चढ़ाकर, केवल उसकी कृपा-दृष्टि की भिखारिन बनती है, वही हमारी तरफ आँखें उठाकर देखने में अपना अपमान समझता है। माना कि मैं समाज की आँखों में आपकी कोई नहीं। किंतु एक बार अपना हृदय तो टटोलिए, और सच बतलाइए क्या मैं आपकी कोई नहीं हूँ। समाज के सामने अग्नि की साक्षी देकर हम विवाह-सूत्र में अवश्य नहीं बँधे, किंतु शिवजी की मूर्ति के सामने भगवान् शंकर को साक्षी बनाकर क्या आपने मुझे नहीं अपनाया था? यह बात गलत तो नहीं है। मैं जानती हूँ कि आप यदि मुझसे बिलकुल न बोलना चाहें, तब भी मैं आपकी कुछ नहीं कर सकती। यदि किसी से कुछ कहने भी जाऊँ तो सिवा अपमान और तिरस्कार के मुझे क्या मिलेगा ? आपको तो कोई कुछ भी न कहेगा, आप फिर भी समाज में सिर ऊँचा करके बैठ सकेंगे। किंतु मेरे लिए कौन-सा स्थान रहेगा ? अभी रूखा-सूखा टुकड़ा खाकर, जहाँ रात को सो रहती हूँ, फिर वहाँ से भी ठोकर मारकर निकाल दी जाऊँगी, और उसके बाद गली-गली की भिखारिन बन जाने के अतिरिक्त मेरे पास दूसरा क्या साधन बच रहेगा ? संभव है आप मुझे दुराचारिणी या पापिन समझते हों; और इसीलिए बहुत सोच-विचार के बाद आपने मुझसे संबंध-त्याग में ही कुशलता समझी हो, और पत्र लिखना बंद कर दिया हो।

खैर, आप मुझे कुछ भी समझें, परमात्मा ऊपर से देखता है कि मैं क्या हूँ, दुराचारिणी हूँ या नहीं, पापिन हूँ या क्या? इसका साक्षी तो ईश्वर ही है, मैं अपने मुँह से अपनी सफाई क्या दूँ ? अब केवल यही प्रार्थना है कि मुझे क्षमा करें, मेरी त्रुटियों पर ध्यान न दें; और कृपा कर मेरे पत्र का उत्तर भी न दें। क्योंकि अब आपका पत्र पढ़ने के लिए, शायद मैं संसार में भी न रहूँ।

अभागिनी

प्रमिला

पत्र पढ़कर मैंने एक ठंडी साँस ली और करवट बदली, देखा, न जाने कब से मेरी स्त्री सुशीला मेरे सिरहाने खड़ी है। मुझे देखते ही वह भागी, मैंने दौड़कर उसकी धोती पकड़ ली और उसे पलंग तक खींच लाया। उसे जबरन पलंग पर बैठाकर मैंने पूछा–तुम भागी क्यों जा रही थी ?

‘तुम बड़े कठोर हो,’ उसने मुँह फेरे-फेरे उत्तर दिया।

‘क्यों?’ मैंने उसका मुँह अपनी तरफ फेरते हुए पूछा, ‘मैं कठोर कैसे हूँ ?’

अपनी आँखों के आँसू पोंछती हुई वह बोली, यदि तुम निभा नहीं सकते थे, तो उस बेचारी को इस रास्ते पर घसीटा ही क्यों ?

मुझे हँसी आ गई, हालाँकि प्रमिला के पत्रों को पढ़ने के बाद, मेरे हृदय में भी एक प्रकार का दर्द-सा हो रहा था। मुझे स्त्रियों की असहायता, उनकी विवशता और उनके कष्टों से बड़ी तीव्र मार्मिक पीड़ा हो रही थी।

मैंने किंचित् मुस्कराकर कहा, पगली ! यह पत्र मेरे लिए नहीं लिखे गए।

उसकी भवें तन गईं, बोली, तो भला छिपाते क्यों हो ? मैं क्या बुरा मानती हूँ ? बुरा मानती जरूर, यदि मैं प्रमिला के पत्र न पढ़ चुकी होती। पत्र पढ़ने के बाद तो मुझे उस पर क्रोध के बदले दया ही आती है। यदि तुम मुझे उसका पता बता दो तो मैं स्वयं उसे यहाँ लिवा लाऊँ। बेचारी का जीवन कितना दुखी है।

मैंने कहा, भला मैं कभी तुमसे झूठ बोला है? यह पत्र मुझे आज इसी कोठरी में रद्दी कागजों में मिले हैं। जिस लिफाफे में ये बंद थे वह भी यह है, देखो ! कहते हुए मैंने लिफाफा उठाकर सुशीला के सामने रख दिया।

सुशीला ने एक बार लिफाफे की ओर, और फिर मेरी ओर देखे हुए कहा, तुम्हीं क्या, पुरुष मात्र ही कठोर होते हैं।

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कहानियाँ

गुरु-मंत्र

अनुमानित समय : 15 मिनट-

1
आधी रात के समय नवयुवक एकनाथ ने बहुत धीरे से अपने मकान का दरवाजा खोला और बाहर निकल आया। गली, बाजार, गाँव – सब सुनसान और अंधकारमय थे। एकनाथ ने एक क्षण के लिए ठहरकर अपने घर की तरफ देखा, अपने बूढ़े बाबा और निर्बल दादी का खयाल किया, अपने मित्र – बन्‍धुओं के विषय में सोचा और उसकी आँखों में पानी आ गया। मगर यह निर्बलता कुछ ही क्षणों के लिए थी, जैसे कभी-कभी पंछी पर खोलते समय रुक जाता है। एकाएक उसने आँसू पोंछ डाले और जल्‍दी-जल्‍दी पाँव उठाता हुआ गाँव से बाहर चला गया। पिंजरे में दाना-पानी सब कुछ था, परन्‍तु पंछी ने किसी की भी परवाह न की और उड़ गया। चारों ओर अँधेरा था। दूर काले वृक्षों की काली छाया तले कुत्‍तों और गीदड़ों के रोने की आवाजें सुनाई दे रही थीं। घर में बूढ़े बाबा और दादी का वात्‍सल्‍य बेसुध पड़ा था, मगर एकनाथ सम्‍पूर्ण दृढ़ता से झाड़ियों में उछलता हुआ, गड्ढों में गिरता हुआ, पत्‍थरों से ठोकरें खाता हुआ आगे चला जाता था और उसे इस बात की जरा भी चिन्‍ता न थी कि मार्ग भयानक है और रात के अँधेरे में कई बलाएँ छिपी हो सकती हैं।
प्रात:काल जब दो बूढ़ों के हृदय-विदारक आर्तनाद से पैठन गाँव में कुहराम मचा हुआ था, वह कई कोस की यात्रा समाप्‍त कर चुका और एक नदी के किनारे बैठा अपने पाँव धो रहा था, जिन्‍हें जंगल के काँटों ने लहूलुहान कर दिया था। उसकी देह रतजगी यात्रा से थककर चूर-चूर हो रही थी। परन्‍तु उसके विचार आशा के आकाश में उड़े चले जाते थे और उन्‍हें रोकने की शक्ति पृथ्‍वी की किसी भी वस्‍तु में न थी। थोड़ी देर बाद वह उठा और अपने गाँव की तरफ मुँह करके खड़ा हो गया। इस समय वह अपने घर की दशा पर चिन्‍तन कर रहा था और अपनी आन्‍तरिक आँखों से वहाँ के दृश्‍य देख रहा था। हम अपना घर छोड़ सकते हैं, परन्‍तु उसकी स्‍मृति को भूलना आसान नहीं।
इतने में एक मुसाफिर घोड़े पर सवार उधर से गुजरा और एकनाथ के पास पहुँचकर रुक गया। एकनाथ ने दोनों हाथ बाँधकर अभिवादन किया। मुसाफिर ने आशीर्वाद दिया और पूछा – “कहाँ जाओगे, भैया?”
एकनाथ ने अपने गाँव की ओर पीठ मोड़ ली और अपने सम्‍मुख फैले हुए विस्‍तृत जंगल की तरफ उँगली उठाकर उत्‍तर दिया – “बड़ी दूर!”
मुसाफिर – “मगर फिर भी कहाँ?”
एकनाथ – “श्रीगुरुजी के चरणों में।”
मुसाफिर घोड़े से उतर आया और एकनाथ के कंधे पर स्‍नेह से अपना हाथ रखकर बोला – “तुम्‍हारा गुरु कौन है?”
एकनाथ – “पण्डित जनार्दन पन्‍त।”
यह कहकर एकनाथ ने दोनों हाथ बाँधकर नम्रता से सिर झुका लिया जैसे वह इस समय भी गुरु के सामने खड़ा था।
मुसाफिर को नवयुवक की श्रद्धा पर आश्‍चर्य हुआ – “कौन जनार्दन पन्‍त? क्‍या वही तो नहीं जो देवगढ़ के दीवान हैं?”
एकनाथ – “जी हाँ, वही महात्‍मा जिनके सदृश दूसरा आत्‍मसंयमी आज सारे भारतवर्ष में नहीं है। क्‍या आपने उनके दर्शन किए हैं?”
यह कहकर उसने मुसाफिर की ओर बड़ी उत्‍सुकता से देखा।
मुसाफिर – “हाँ, कई बार दर्शन किए हैं, परंतु वे तो किसी को गुरु-मंत्र नहीं देते, न मैंने उनके यहाँ कोई शिष्‍य देखा है। मुझे आश्‍चर्य है कि उन्‍होंने तुम्‍हें कैसे चेला बना लिया।”
एकनाथ – (उदास होकर) “उन्‍होंने मुझे चेला नहीं बनाया।”
मुसाफिर – “अरे!”
एकनाथ – “मगर मैंने उनको गुरु बना लिया। अब जाकर श्रीचरणों में लेट जाता हूँ। देखूँगा कैसे कृपा नहीं करते?”
मुसाफिर – “तुम्‍हारी आयु थोड़ी है अभी।”
एकनाथ – “समझदार के लिए थोड़ी भी बहुत है।”
मुसाफिर – ” क्‍या तुम्‍हें संसार का अनुभव है?”
एकनाथ – “गुरुजी की कृपादृष्टि से अनुभव भी हो जाएगा।”
मुसाफिर – “यह मार्ग बड़ा विकट है।”
एकनाथ – “साहस हो तो सारे काम बन जाते हैं।”
मुसाफिर ने हँसकर कहा – “मगर बेटा! देवगढ़ तक कैसे पहुँचोगे? बड़ी दूर है यहाँ से।”
एकनाथ – “जिनके दिल को लगी हो, उनके लिए दूरी कोई चीज नहीं है।”
मुसाफिर – “कोई घोड़ा क्‍यों नहीं ले लेते?”
एकनाथ – “गुरुजी के पास नंगे पाँव ही जाना ठीक है।”
मुसाफिर ने यह बातें सुनीं तो बड़ा खुश हुआ। उसने दुनिया देखी थी, मगर ऐसा नवयुवक उसकी आँखों से आज तक न गुजरा था। यह नवयुवक न था, श्रद्धा और पुरुषार्थ की जीती-जागती मूर्ति था। उसने एकनाथ को प्रेम से देखा और घोड़े पर सवार होकर चल दिया।

2
कितने कष्‍ट सहकर, कितने संकट झेलकर एकनाथ देवगढ़ पहुँचा, इसका अनुमान करना आसान नहीं। परन्‍तु देवगढ़ पहुँचकर उसको वह सारे कष्‍ट भूल गए। प्‍यासा हरिण जल की खोज में कितना भागता है, कैसे घबराता है, उसका शरीर थककर पसीना-पसीना हो जाता है, परन्‍तु जल के समीप पहुँचकर उसकी सारी थकान जाती रहती है, वहाँ जाकर उसका कुम्‍हलाया हुआ हृदय-कमल देखते-देखते खिल उठता है। एकनाथ की भी यही दशा थी। वह अब गुरुजी की नगरी में आ पहुँचा था। वह स्‍वर्गीय स्‍वप्‍नों की पुण्‍यभूमि में आ गया था, जिसके लिए उसकी आँखें तरसती थीं।
तीसरे पहर का समय था, एकनाथ पण्डित जनार्दन पन्‍त की सेवा में उपस्थित हुआ। उस समय पण्डितजी सरकारी कागज देखने में तन्‍मय हो रहे थे। एकनाथ चुपचाप एक कोने में खड़ा हो गया और भक्त-भाव से उनकी ओर देखने लगा। यही वह व्‍यक्ति है जो संसार और संसार के व्‍यवहार में रहते हुए भी संसार से बाहर है, जो गृहस्‍थ होते हुए भी अपने युग का सबसे बड़ा भक्‍त है, जो देवगढ़ का दीवान भी है, सूरमा सिपाही भी है, सेनापति भी है और पण्डित भी है। यही वह राजभक्‍त है, जिसका हिन्‍दू-मुसलमान दोनों सम्‍मान करते हैं, जिसके सामने सिर उठाने की बादशाह को भी मजाल नहीं। एकनाथ गदगद हो गया। उसकी आँखों में पानी भर आया।
सहसा पण्डितजी ने सिर उठाया और एकनाथ की तरफ देखा। एकनाथ के शरीर में बिजली की लहर-सी दौड़ गई। यह तो वही मुसाफिर थे जो उसे अपने गाँव के पास मिले थे, जो हँस-हँसकर बातें कर रहे थे, जिनकी आँखों में मन को मोहने वाली शक्ति भरी थी। एकनाथ दौड़कर आगे बढ़ा और पण्डितजी के चरणों से लिपट गया। इस समय उसके आँसू पण्डितजी के पाँव पर गिर रहे थे। मगर यह आँसू साधारण आँसू न थे। एकनाथ का प्रेम था, जो अपने गुरु के श्रीचरणों पर निछावर हो रहा था। यह उसकी श्रद्धा थी जो अपने देवता को रिझाने के लिए हृदय-गृह से चली थी।
पण्डितजी ने उसे पाँव से उठाया और उद्दण्‍ड से उद्दण्‍ड पुरुष को भी बस में कर लेने वाले ढंग से मुस्‍कराकर कहा – “आखिर तुम यहाँ आ गए? मगर बहुत कष्‍ट हुआ होगा?”
एकनाथ ने उनके पाँव की तरफ देखते हुए उत्‍तर दिया – “श्रीचरणों के दर्शन करके सारा कष्‍ट भूल गया।”
पण्डितजी – “तो अब क्‍या इच्‍छा है?”
एकनाथ – “भगवान् सब कुछ जानते हैं, अपने मुँह से क्‍या कहूँ?”
पण्डितजी – “गुरु-मंत्र चाहते हो क्‍या?”
एकनाथ – “यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा स्‍वप्‍न है।”
पण्डितजी – “मैं साधारण गृहस्‍थी हूँ, मुझसे तुम्‍हारा कल्‍याण क्‍या होगा? किसी परमहंस के पाँव क्‍यों नही पकड़ते? बेड़ा पार हो जाए।”
एकनाथ – “मैंने इस युग का सबसे बड़ा परमहंस पा लिया, अब और कहाँ जाऊँ? आप गृहस्‍थी हैं, परंतु आपकी पदवी साधु-संन्‍यासियों से भी ऊँची है।”
पण्डितजी – “यह तुम्‍हारी श्रद्धा है। मैं तो राजा का एक मामूली नौकर हूँ।” एकनाथ – ” मगर मेरे लिए तो आप राजाओं के भी राजा हैं।”
यह कहकर एकनाथ फिर झुका और पण्डितजी के पाँव में लेट गया। पण्डितजी निरुत्‍तर हो गए। विनय और श्रद्धा के सामने तर्क की बोली पेश नहीं जाती। देवगढ़ के दीवान साहब एक साधारण ग्रामीण नवयुवक के सामने चुप थे और न जानते थे कि उसे कैसे समझाएँ। कुछ सोचकर उन्‍होंने उसे उठाया और गंभीरता से कहा – “हमें गुरु-मंत्र देने में आपत्ति नहीं, परन्‍तु पहले तुम्‍हें सिद्ध करना होगा कि तुम इसके अधिकारी हो। कहो, परीक्षा के लिए तैयार हो?”
एकनाथ ने सिर झुकाकर उत्‍तर दिया – “जी हाँ! बड़ी खुशी से।”
यह कहकर उसने गुरु के पाँव तले से मिट्टी उठाई और माथे पर मल ली, मानो यह मिट्टी न थी, चंदन का बुरादा था।

3
तीन वर्ष बीत गए। एकनाथ ने गुरुजी की सेवा में दिन-रात एक कर दिया। ऐसी लगन से किसी बिके हुए दास ने भी अपने स्‍वामी की सेवा न की होगी। वह उनके कपड़े धोता था, उनके लिए धान कूटता था, पानी भरता था, बाल-बच्‍चों को खिलाता था और इतना ही नहीं उनके दफ्तर का सारा काम अपने हाथ से करता था। दीवान साहब अब हिसाब आदि बहुत कम देखते थे, सारा स्‍याह-सफ़ेद एकनाथ के हाथ में था। रियासत के लोग इसकी ईश्‍वरदत्‍त योग्‍यता और कार्यपटुता देखकर वाह-वाह करते थे, यहाँ तक कि राजा भी उसकी प्रशंसा करता था। मगर एकनाथ को इस पर तनिक भी अभिमान न था। वह समझता था, गुरुजी परीक्षा ले रहे हैं। पास हो गया तो जन्‍म-मरण के फंदे से मुक्‍त जा जाऊँगा।
प्रात:काल था, पण्डितजी अपने मंदिर में बैठे ईश्‍वर का भजन कर रहे थे और एकनाथ बाहर खड़ा था कि कोई विघ्‍न न डाल दे। इतने में घोड़ों की टापों का शब्‍द सुनाई दिया। एकनाथ डर गया। उसे भय हुआ कि कहीं इससे गुरुजी की समाधि न खुल जाए। उनका ध्‍यान टूट गया तो क्‍या जवाब दूँगा। वह जल्‍दी से बाहर निकला कि सवार को रोक दे। पर वह सवार कोई साधारण सवार न था। वह शाही सवार था, जो राजा का खास परवाना लेकर आया था। एकनाथ ने आगे बढ़कर कहा – “गुरुजी ईश्‍वर का भजन कर रहे हैं। नीचे उतर आओ।”
सवार घोड़े से नीचे उतर आया और जेब से एक मुहर वाला लिफ़ाफ़ा निकालकर बोला – “यह शाही परवाना है। अभी दीवान साहब के पास पहुँचा दो।” एकनाथ ने लिफ़ाफ़ा ले लिया और उत्‍तर दिया – “वह तो समाधि में हैं।”
सवार – “कोई बात नहीं। जाकर समाधि से उठा दो।”
एकनाथ – “यह असम्‍भव है। (थोड़ी देर बाद) क्‍या बहुत जरूरी काम है?”
सवार – “अब मैं तुमसे क्‍या कहूँ? जरूरी है या नहीं। राजा साहब का हुक्‍म है। इसी समय पहुँचाओ। मैं पागल न था जो तुम पर ज़ोर देता।”
एकनाथ ने लिफाफे को उलट-पलटकर देखा और कहा – “मगर ऐसी कौन-सी बात है, जो जरा भी प्रतीक्षा नहीं कर सकते?”
सवार – “भैया! मेरा कर्तव्‍य आज्ञा पालन करना है। तुम जाकर सूचना देते हो या मैं खुद जाऊँ? हर हालत में यह परवाना अभी उनके पास पहुँच जाना चाहिए। जरा-सी देर भी रियासत को बर्बाद कर देगी।”
एकनाथ – “मगर इस समय तो उनके पास कोई भी नहीं जा सकता, यहाँ तक कि स्‍वयं राजा साहब आ जाएँ तो उनको भी आगे न बढ़ने दूँ। गुरुजी ईश्‍वर के ध्‍यान में है।”
सवार ने कुछ सोचकर धीरे से कहा – “तो तुम्‍हें साफ ही कहना पड़ेगा। शहर पर किसी दुश्‍मन ने हमला किया है। राजा साहब यह परवाना भेजकर अपने कर्त्‍तव्‍य से निवृत्‍त हो गए। शहर बचे या बरबाद हो, उनकी बला से और किसी को इसकी फिक्र ही नहीं। ले-देकर एक दीवान साहब हैं, जिनको शहर की हिफाजत का खयाल है और जिनके इशारे पर सिपाही मर-मिटने को तैयार हैं। अब यह तुम खुद ही सोच लो कि उनको इस वक्‍त सूचना देना मुनासिब है या नहीं। मगर मैं इतना कहे देता हूँ कि उनको सूचना न हुई तो दुश्‍मन किले की ईंट से ईंट बजा देंगे।”
यह कहकर सवार चला गया, मगर उसके शब्‍द एकनाथ के कानों में उसी तरह गूँज रहे थे। उसने परवाना गुरुजी के कागज़ों पर रख दिया और घुटनों पर सिर रखकर सोचने लगा कि क्‍या करना चाहिए? उठाऊँ या न उठाऊँ? ध्‍यान में हैं। जो राजाओं का भी राजा है, उसके दरबार में हैं। कहीं अप्रसन्‍न न हो जाएँ, क्रोध में न आ जाएँ। सब किए-कराए पर पानी फिर जाएगा। एक दिन कहते थे, भगवान् अपने भक्‍तों का काम स्‍वयं कर देते हैं। कहेंगे, यह बात तुझे कैसे भूल गई? लज्जित हो जाऊँगा, उत्‍तर न दे सकूँगा, उनके सामने सिर उठाने के योग्‍य न रहूँगा। तो ठीक है, मुझे चुप रहना चाहिए, देखूँ परमात्‍मा क्‍या करता है।
एकनाथ निश्चित हो गया और इधर-उधर टहलने लगा। मगर चिन्‍ता शहद की मक्‍खी के समान है। इसे जितना हटाओ उतना ही और चिमटती है। एकनाथ को फिर इसी चिन्‍ता ने आ घेरा। कहीं वैरी निकट न आ पहुँचा हो, राजा ने जब ही जरूरी परवाना भेजा है। ऐसा न हो, मैं यहाँ मंदिर के द्वार पर बैठा रहूँ और गढ़ पर दुश्‍मन का अधिकार हो जाए। उस समय गुरुजी के मन की क्‍या अवस्‍था होगी? बहुत नाराज होंगे। कहेंगे, तुझे इतना भी विवेक नहीं कि समय-कुसमय ही पहचान सके। हम समाधि में बैठे रहे, उधर शहर की सफाई हो गई। इसका उत्‍तरदाता केवल तू है, जिसने ऐसी मूर्खता की। एकनाथ असमंजस में पड़ गया। कभी सोचता उठा देना चाहिए, इस समय यही धर्म है। कभी सोचता, नहीं उठाना चाहिए, समाधि में हैं। वह दोनों तरफ देखता था, परन्‍तु उसे दोनों तरफ अंधकार दिखाई देता था। प्रकाश कहीं भी न था। वह घबराहट की दशा में इधर-उधर फिर रहा था। ऐसी दशा उसकी आज तक कभी न हुई थी। अपने चारों तरफ काले नागों को फुंकारें मारते देखकर भी उसका विवेक नष्‍ट न होता। मगर इस समय…।
वह बहुत व्‍याकुल था। उसके मस्तिष्‍क से पसीने की बूँदें टपक रही थीं। उसके मुँह का रंग एक-एक क्षण में बदलता था, जैसे वह उसके जीवन-मरण का प्रश्‍न हो। इस समय उसे कौन बचा सकता है? इस निराशा के भार से उसे कौन निकाल सकता है? सिवाय गुरुजी के और कोई नहीं। और गुरुजी… उसने उनकी ओर देखा। वह अभी तक आँखें बंद किए ध्‍यान में बैठे थे। एकनाथ भूमि पर गिर पड़ा और फूट-फूटकर रोया, मगर इससे क्‍या होता था? समय बहुत तेज़ी से बढ़ा चला जाता था।
इतने में दुर्ग के बाहर दुश्‍मन की तोपें गर्जने लगीं। एकनाथ का पीला मुँह और भी पीला हो गया। अब सोचने का अवसर न था, काम करने का समय था। एक क्षण में इधर या उधर। एकनाथ ने अपने धड़कते हुए दिल पर हाथ रखा, अपनी तर्कशक्ति को एकत्रित किया, एक मिनट के लिए सिर झुकाया और निश्‍चय कर लिया।
थोड़ी देर के बाद वह गुरुजी की जंगी पोशाक पहने उनके जंगी घोड़े पर सवार था और देवगढ़ की वीर सेना उसके पीछे “हर-हर महादेव” करती हुई दुर्ग से निकल रही थी। एकनाथ लड़ा और विजयी हुआ और दुश्‍मन को भगाकर वापस आ गया। परन्‍तु, उस समय यह किसी को भी पता न था कि यह एकनाथ है, पन्‍तजी नहीं है। एकनाथ ने घोड़ा अश्‍वशाला में बाँध दिया और कवच उतारकर दीवार के साथ लटका दिया और अपने वासंती रंग के वस्‍त्र पहनकर चुपचाप अपने स्‍थान पर बैठ गया, जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

4
थोड़ी देर बाद गुरुजी की समाधि खुली और वह बाहर निकले। वहाँ हर एक के मुँह पर इसी घटना का बखान था। लोग कहते थे, आज दीवान साहब ने कमाल किया, उनकी तलवार ऐसी चलती थी जैसे कैंची कपड़े पर चलती है। दुश्‍मन कैसे घमण्‍ड से आया था, मानो देवगढ़ में सिपाही नहीं रहते, पशु-पक्षी रहते हैं। मगर दीवान साहब ने उसके दाँत खट्टे कर दिए।
दीवान साहब को आश्‍चर्य हो रहा था कि यह कहते क्‍या हैं? कौन आया? किसने आक्रमण किया? किसने दाँत खट्टे किए? इनको किसी भी बात का ज्ञान न था। आश्‍चर्यचकित हो आगे बढ़ रहे थे कि एक स्‍थान पर कुछ आदमी बातें करते दिखाई दिए। दीवान साहब उनके पीछे खड़े हो गए और सुनने लगे।
एक आदमी कह रहा था – “आज तो दीवान साहब की चुस्‍ती-चालाकी देखने योग्‍य थी।”
दूसरा – “हम उनसे छोटे हैं, परन्‍तु हममें वह जोश नाम को नहीं। अद्भुत आदमी हैं।”
तीसरा – “आदमीᢽ! वाह भाई वाह!! उन्‍हें आदमी कौन कहता है। वह तो कोई ऋषि हैं। पापी प्राणियों में यह शक्ति कहाँ! जवानी, बुढ़ापा सब उनके वश में हैं। चाहे बूढ़े बन जाएँ, चाहे जवान बन जाएँ।”
चौथा मुसलमान था, वह गंभीरता से बोला – “जरूर-जरूर, बड़े बहादुर हैं। आज तो बिलकुल नौजवान मालूम होते थे, वह बुढ़ापा कहीं नजर न आता था।”
तीसरा – “और भैया! हम तो देख रहे थे। दुश्‍मन उनको देखते ही किंकर्तव्‍यविमूढ़ ही जाते थे, जैसे किसी ने मंत्र पढ़कर उनकी संज्ञा छीन ली हो।”
चौथा – “आँखों से आग बरसती थी। सिद्ध पुरुष महात्‍माओं के यही लक्षण हैं। जिसकी तरफ देख लें वही वश में हो जाता है। कुछ करना चाहे तब भी नहीं कर सकता।”
दूसरा – “और उनका घोड़ा कैसा उड़ता चला जाता था, यह शायद आपने नहीं देखा।”
तीसरा – “खूब देखा, दो ही घण्‍टे में दुश्‍मन मैदान छोड़ भागा। किस घमण्‍ड से आया था, मानो विजय निश्चित है।”
चौथा – “अब कभी इस तरफ देखने का भी साहस न करेगा।”
पहला – “समझता होगा, बादशाह विलासप्रिय है, जाते ही विजय हो जाएगी, यह पता न था कि पन्‍तजी का सामना है। कैसा भागा!”
दूसरा – “अच्‍छी शिक्षा मिली। आजीवन स्‍मरण रखेगा।”
पाँचवाँ – “परन्‍तु एक और बात सुनी है, सुनकर बुद्धि चकराती है। बड़ी अद्भुत बात है।”
पहला – “वह क्‍या?”
पाँचवाँ – “कुछ लोगों का कहना है, जब वह दुश्‍मन से लड़ रहे थे, उसी समय वह अपने मंदिर में भी बैठे थे।”
दूसरा – “हाँ-हाँ! सुना तो हमने भी है।”
तीसरा – “परन्‍तु एक ही समय में दो स्‍थानों पर! यहाँ भी, वहाँ भी! अचरज होता है।”
चौथा – “भाई, जिसकी पीठ पर परमेश्‍वर का हाथ हो, उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं। भगवान जो चाहे कर दे, उसका हाथ कौन पकड़ सकता है? वह चाहे तो तुम अभी आकाश में भी उड़ने लगो, हम मुँह देखते रह जाएँगे। प्रभु की लीला है।”
पाँचवाँ – “और क्‍या?”
पहला – “यह दीवान साहब नहीं, नगर-रक्षक देवता है।” सहसा एक आदमी ने पीछे मुड़कर देखा और दूसरे को दिखाया। सब दंग रह गए। यह क्‍या? दीवान साहब चले जा रहे हैं। एक बोला – “लो यह भी लो। हममें से किसी का रूप धारण करके खड़े थे, अब अपने रूप में जा रहे हैं। हमने तो पहले ही कह दिया था कि यह महात्‍मा जो चाहें सो कर सकते हैं।”
अब दीवान साहब सब कुछ समझ गए। यह काम एकनाथ ही का है, किसी दूसरे का नहीं। उसी ने हमारे वस्‍त्र पहने और दुश्‍मन को हराकर लौट आया। यह बालक कितना वीर है! कितना समझदार!! राजा का परवाना आया होगा, हम समाधि में थे, हमें नहीं उठाया, स्‍वयं लड़ने चला गया। कोई मूर्ख होता तो कहता, शहर लुटता है तो लुटे, हमें क्‍या? बैठे गुरु की आज्ञा का पालन कर रहे हैं। उन्‍होंने मंदिर में पहुँचते ही एकनाथ को गले से लगा लिया और कहा – “तूने मेरी लाज रख ली।”
एकनाथ बार-बार उनके चरणों में गिरता था, कहता था – “आप मुझे लज्जित कर रहे हैं। मैंने तो कुछ भी नहीं किया।”
पण्डितजी ने उसे स्‍नेहपूर्ण दृष्टि से देखा और कहा – “तुम्‍हारी वीरता की लोग भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं, मुझे यह पता न था कि तुम तलवार के भी धनी हो।”
एकनाथ – “यह सब आपकी कृपा है, वरना मेरी भुजाओं में ऐसा बल कभी न था।”
पण्डितजी – “लोगों को संदेह भी न हुआ कि यह तुम हो, मैं नहीं हूँ।”
एकनाथ – “और वास्‍तव में यह आप ही का प्रताप है, नहीं तो मैं किस योग्‍य था? मुझे केवल इतना स्‍मरण है कि मैंने आपके वस्‍त्र पहने और घोड़े पर सवार हुआ। इसके बाद क्‍या हुआ, इसका मुझे जरा भी ज्ञान नहीं। मुझे ऐसा मालूम होता था जैसे कोई दैवी शक्ति मुझे उड़ाए लिए जाती है, जैसे मैं अपने आपे में न था। अवश्‍यमेव आप ही की सत्‍ता मेरे हाथ में आ गई थी। अन्‍यथा यह विजय असम्‍भव थी। शरीर मेरा था, चेतना आपकी थी।”
पण्डितजी – “लोग अब तक यही समझते हैं कि यह मैं ही था।”
एकनाथ – “स्‍वयं मेरी भी यही धारणा है। आपने मुझे एकमात्र अपना साधन बनाया था।”
इस श्रद्धा को देखकर पण्डितजी की आँखें सजल हो गईं। थोड़ी देर बाद बोले – “वत्‍स! अब मैं बूढ़ा हो गया। इस पन में यह राज्‍य कार्य करना बड़ा कठिन है। मैं चाहता हूँ, अब चार दिन विश्राम करूँ। दीवान की पदवी तुम सँभालो तो मुझे छुट्टी मिले। आज की घटना ने मेरी आँखें खोल दी हैं। मुझे विश्‍वास हो गया है कि यह काम तुम खूब सँभालोगे। राजा साहब को भी आपत्ति न होगी। मेरा जाकर दो शब्‍द कह देना ही काफ़ी है, वे स्‍वीकार कर लेंगे। कहो तो अभी जाऊँ”
एकनाथ की आँखों में आँसू आ गए। उसने दोनों हाथ बाँध लिए, जैसे कोई भूल हो गई हो। वह भूमि पर मुँह के बल गिर पड़ा और नम्रता से बोला – “मुझे कुछ नहीं चाहिए। केवल आपके चरणों में पड़ा रहूँ, मेरे लिए यही सब कुछ है।”
पण्डितजी एकनाथ का अभीष्‍ट समझ गए, परन्‍तु चुप रहे।
अभी एक परीक्षा बाकी थी।

5
और कुछ दिनों बाद उसका समय भी आ गया।
प्रात:काल था, एकनाथ पण्डितजी के स्‍नान के लिए पानी भर रहा था। इतने में पण्डित जी खड़ाऊँ पहने हुए आए और मुसकराकर बोले – “बेटा एकनाथ! कल नववर्षारम्‍भ है। इस वर्ष का हिसाब-किताब तैयार कर लो। समय थोड़ा है, केवल आज का दिन और आज की रात। परन्‍तु तुम्‍हारे जैसे योग्‍य आदमी के लिए यह कठिन नहीं।”
एकनाथ ने पानी का घड़ा हाथ से रख दिया।
पण्डितजी – “राजा साहब कल हिसाब देखेंगे। तैयार हो जाएगा या नहीं? यदि न हो सके तो मैं कर लूँ।”
एकनाथ – (धीरे से) “मैं कर लूँगा।”
पण्डितजी – “तो जाओ, आरम्‍भ कर दो। समय बहुत कम है।”
एकनाथ दफ्तर में पहुँचा और हिसाब-किताब देखने लगा। काम साधारण न था, सारे वर्ष का हिसाब था। और वह भी किसी साहूकार का नहीं, एक रियासत का। परन्‍तु एकनाथ के दिल में जरा भी घबराहट न थी, न मुँह पर चिन्‍ता के चिह्न थे। उसने किताबों के ढेर सामने रख लिए और पालथी मारकर बैठ गया। सूरज आकाश में धीरे-धीरे ऊँचा उठा और सिर पर पहुँच गया। मगर एकनाथ उसी तरह बैठा हिसाब देखता रहा। संध्‍या हो गई, पर एकनाथ को पता भी न था। नौकर आकर शमादान जला गया, एकनाथ काम में लगा रहा। उसे खाने-पीने की सुध न थी, न सोने की इच्‍छा थी। खयाल यह था, किसी प्रकार काम समाप्‍त हो जाए।
आधी रात बीत गई, एकनाथ ने सारा काम समाप्‍त कर लिया। सब कुछ ठीक था, केवल एक पैसे का फर्क था। एकनाथ के तेवर बदल गए। सोचने लगा, जरा-सी भूल ने सारा काम चौपट कर दिया। उसने रकमों को दूसरी बार जमा किया। फिर वही फर्क। फिर हिसाब किया। पर फर्क फिर भी न निकला। एक पैसे का अन्‍तर ज्‍यों-का-त्‍यों था। एकनाथ घबरा गया। रात आधी से भी अधिक जा चुकी थी। चारों ओर सन्‍नाटा था। लोग अपने-अपने घरों में सुख-चैन की नींद सो रहे थे, मगर एकनाथ शमादान के सामने बैठा था और सोचता था कि पैसे का फर्क कहाँ है?
पिछले पहर पण्डित जनार्दन की आँख खुली। खिड़की से देखा, दफ्तर में अभी तक प्रकाश है। समझ गए, एकनाथ जाग रहा है। वह धीरे से उठे और बाहर चले आए। दफ्तर के बाहर चौकीदार भी ऊँघ रहा था, केवल एकनाथ जागता था। पण्डितजी ने धीरे से कहा – “एकनाथ?”
मगर एकनाथ ने कोई उत्‍तर न दिया, अपना हिसाब करता रहा।
पण्डितजी ने फिर पुकारकर कहा – “एकनाथ!”
एकनाथ ने कुछ नहीं सुना।
पण्डितजी और आगे बढ़े और जरा ऊँची आवाज से बोले – “एकनाथ!”
मगर फिर जवाब में वही सन्‍नाटा था, जैसे एकनाथ जागता न था, सोता था।
पण्डितजी को अचरज हुआ। वह और आगे बढ़े और शमादान के सामने इस प्रकार खड़े हो गए कि उनके शरीर की छाया पुस्‍तक पर पड़ती थी। मगर एकनाथ को अब भी मालूम न हुआ। उसके लिए पुस्‍तक के अक्षर उसी तरह साफ और रोशन थे। वह हिसाब में तन्‍मय हो रहा था। उसे दीन-दुनिया की सुध न थी। इसी तरह आधा घण्‍टा बीत गया।
सहसा एकनाथ को अपनी भूल का पता लगा। उसने खुशी से सिर हिलाया और हिसाब ठीक करके पुस्तकें बन्‍द कर दीं। इसके बाद उसने दोनों हाथ मिलाकर सिर से ऊपर उठाए और जँभाई लेने लगा। इतने में उसने चकित होकर देखा, पण्डितजी सामने खड़े हैं। वह घबराकर आगे बढ़ा और उनके पाँव में झुक गया।
पण्डितजी ने पूछा – “हिसाब-किताब हो गया?”
एकनाथ – “जी हाँ, हो गया। आप कैसे आए?”
पण्डितजी – “हम यहाँ बड़ी देर से खड़े हैं।”
एकनाथ चौंक पड़ा।
पण्डितजी – “हमने तुम्‍हें कई बार बुलाया, मगर क्‍या जानें तुम कहाँ थे?”
एकनाथ – “मैंने एक भी आवाज नहीं सुनी।”
पण्डितजी – “हमारी छाया से पुस्‍तक पर अँधेरा हो गया, तुम्‍हें इसका ज्ञान न हुआ?”
एकनाथ – (हाथ बाँधकर) “अब क्‍या कहूँ, मुझे सन्‍देह तक न हुआ कि कोई इस कमरे में खड़ा है। इस समय मेरी दुनिया केवल यह पुस्‍तक थी।”
पण्डितजी खड़े थे, बैठ गए और एकनाथ के मुँह की ओर देखकर बोले – “प्रात:काल से इसी भाँति बैठे थे क्‍या?”
एकनाथ – “जी हाँ, इसी भाँति।”
पण्डितजी – “कुछ खाया-पिया भी नहीं?”
एकनाथ – “जी नहीं।”
पण्डितजी – “नींद भी नहीं आई?”
एकनाथ – “जरा भी नहीं।”
पण्डितजी – “इस समय क्‍या कर रहे हो?”
एकनाथ – “एक पैसे का फर्क पड़ता था, उसे निकाल रहा था। बड़ी कठिनाई से पता चला।”
पण्डितजी – “एक पैसे के लिए इतना परिश्रम क्‍यों किया? मामूली बात थी।”
एकनाथ – “मैंने सोचा, आखिर भूल है। चाहे एक पैसे की हो, चाहे एक लाख की।”
पण्डितजी का चेहरा चमकने लगा। वह गम्‍भीरता से बोले – “वत्‍स! तुने मुझे प्रसन्‍न कर दिया। मेरी परीक्षा बड़ी कठिन थी। बड़े- बड़े साधु-सन्‍त भी कदाचित् इसमें सफल न होते, परन्‍तु तू सबमें उत्‍तीर्ण हो गया। तूने काले कोसों की यात्रा की और सिद्ध कर दिया कि तेरा हृदय श्रद्धा का सागर है। तूने सिद्ध कर दिया कि तुझमें सेवा-भाव है। तूने युद्ध-क्षेत्र में विजय प्राप्‍त की, जो इस बात का प्रमाण है कि तू वीरात्‍मा है और तुझे मृत्‍यु का भय नहीं। और फिर दीवान की पदवी को ठुकरा दिया। कोई लोभी ऐसे अवसर पर फूला न समाता। वह त्‍याग-भाव कितना पवित्र, कितना महान है। परन्‍तु मैंने तुझे उस समय भी गुरु-मंत्र न दिया, क्‍योंकि अभी एक परीक्षा बाकी थी। आज वह भी समाप्‍त हो गई। मैं देखना चाहता था कि तुझमें एकाग्रता है या नहीं, जिसके बिना ईश्‍वर भक्ति के मार्ग पर दो पग चलना भी असम्‍भव है। मैं आया, मैंने तुझे आवाजें दीं, मैंने तेरा प्रकाश रोक लिया, परन्‍तु तुझे मालूम भी न हुआ। यह थी एकाग्रता की पराकाष्‍ठा। अब मैं तुझे गुरु-मंत्र देने को तैयार हूँ। मुझे तेरे जैसे शिष्‍य पर गर्व है।”
इस समय एकनाथ के चेहरे पर ऐसा तेज था जो इस मृत्‍युलोक में कभी-कभी दिखाई देता है। आज उसका वर्षों का परिश्रम सफल हुआ है, आज वह परीक्षा में उत्‍तीर्ण हुआ है। उसने वहीं भूमि पर गिरकर घुटने टेक दिए।
पण्डितजी ने फिर कहा – “और मुझे यह भी आशा है कि जिस प्रकार तूने आज एक पैसे की भूल के लिए अपना इतना समय खर्च किया है, उसी प्रकार भक्ति मार्ग पर चलते हुए भी तू इस नियम को स्‍मरण रखेगा और छोटी-से-छोटी बुराई की भी अवहेलना न करेगा। अब जा, आराम कर। कल मैं तुझे प्रकाश, पवित्रता और अमर जीवन के सन्‍मार्ग पर चलने का उपदेश दूँगा।”
एकनाथ का चेहरा और भी चमकने लगा।