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जीवन नहीं मरा करता है.. – आनंद कुमार शुक्ल

बचपन में जो मेलोडीज़ गुनगुनाते थे, साहित्यिक अभिरुचि जागने के बाद पता चला किन्हीं गोपाल दास 'नीरज' नाम के कवि ने उन्हें रचा है। साहित्य का विद्यार्थी होने पर तो नीरज जैसे मन में समा गए। लोकप्रिय साहित्य बनाम गंभीर साहित्य के विमर्श को आधुनिक कवियों में नीरज से ही सबसे ज्यादा चुनौती मिली। न तो उनकी लोकप्रियता कभी कमजोर पड़ी और न उनकी साहित्यिकता। रुपहले परदे के कन्धों पर साहित्य की स्नेहिल बाहें पसार कर ही उन्होंने अपना जीवन जिया। किसी ने क्या खूब कहा कि बाज़ार के बेतरतीब दबाव के बावजूद नीरज जी ने कभी अपने फ़िल्मी गीतों का स्तर नहीं गिराया। बच्चन के हालावाद से नाक-भौं सिकोड़ते आलोचकों ने नीरज जी को बच्चन से कहीं ज्यादा उपेक्षित किया। हिंदी आलोचना के कुछ खेमों से बच्चन ने दोस्ती गाँठ रखी थी, लिहाजा इक्का दुक्का आलोचक कभी कभार बच्चन को याद भी कर लिया करते थे। लेकिन मजाल कि किसी

किस्सा सिंदबाद जहाज़ी की छठी यात्रा का (अलिफलैला से )

सिंदबाद ने हिंदबाद और बाकी लोगों से कि आप लोग स्वयं ही सोच सकते हैं कि मुझ पर कैसी मुसीबतें पड़ीं और साथ ही मुझे कितना धन प्राप्त हुआ। मुझे स्वयं इस पर आश्चर्य होता था। एक वर्ष बाद मुझ पर फिर यात्रा का उन्माद चढ़ा। मेरे सगे-संबंधियों ने मुझे बहुत रोका किंतु मैं न माना। आरंभ में मैंने बहुत-सी यात्रा थल मार्ग से की और फारस के कई नगरों में जाकर व्यापार किया। फिर एक बंदरगाह पर एक जहाज पर बैठा और नई समुद्र यात्रा शुरू की। कप्तान की योजना तो लंबी यात्रा पर जाने की थी किंतु वह कुछ समय बाद रास्ता भूल गया। वह बराबर अपनी यात्रा पुस्तकों और नक्शों को देखा करता था ताकि उसे यह पता चले कि कहाँ है। एक दिन वह पुस्तक पढ़ कर रोने-चिल्लाने लगा। उसने पगड़ी फेंक दी और बाल नोचने लगा। हमने पूछा कि तुम्हें यह क्या हो गया है, तो

किस्सा सिंदबाद जहाज़ी की पांचवी यात्रा का (अलिफलैला से )

अगले दिन सब लोग फिर एकत्र हुए और भोजन के बाद सिंदबाद ने अपनी पाँचवीं यात्रा का वर्णन शुरू किया। सिंदबाद ने कहा कि मेरी विचित्र दशा थी। चाहे जितनी मुसीबत पड़े मैं कुछ दिनों के आनंद के बाद उसे भूल जाता था और नई यात्रा के लिए मेरे तलवे खुजाने लगते थे। इस बार भी यही हुआ। इस बार मैंने अपनी इच्छानुसार यात्रा करनी चाही। चूँकि कोई कप्तान मेरी निर्धारित यात्रा पर जाने को राजी नहीं हुआ इसलिए मैंने खुद ही एक जहाज बनवाया। जहाज भरने के लिए सिर्फ मेरा माल काफी न था इसीलिए मैंने अन्य व्यापारियों को भी उस पर चढ़ा लिया और हम अपनी यात्रा के लिए गहरे समुद्र में आ गए। कुछ दिनों में हमारा जहाज एक निर्जन टापू पर लगा। वहाँ रुख पक्षी का एक अंडा रखा था जैसा कि एक पहले की यात्रा में मैंने देखा था। मैंने अन्य व्यापारियों को उसके बारे में बताया।

किस्सा सिंदबाद जहाज़ी की चौथी यात्रा का (अलिफलैला से )

अगले दिन निश्चित समय पर सब लोग आए और भोजन के बाद सिंदबाद ने कहना शुरू किया. सिंदबाद ने कहा, कुछ दिन आराम से रहने के बाद मैं पिछले कष्ट और दुख भूल गया था और फिर यह सूझी कि और धन कमाया जाए तथा संसार की विचित्रताएँ और देखी जाएँ. मैंने चौथी यात्रा की तैयारी की और अपने देश की वे वस्तुएँ जिनकी विदेशों में माँग है प्रचुर मात्रा में खरीदीं. फिर मैं माल लेकर फारस की ओर चला. वहाँ के कई नगरों में व्यापार करता हुआ मैं एक बंदरगाह पर पहुँचा और व्यापार किया. एक दिन हमारा जहाज तूफान में फँस गया. कप्तान ने जहाज को सँभालने का बहुत प्रयत्न किया किंतु सँभाल न सका. जहाज समुद्र की तह से ऊपर उठी पानी में डूबी एक चट्टान से टकरा कर चूर-चूर हो गया. कई लोग तो वहीं डूब गए किंतु मैं और कुछ अन्य व्यापारी टूटे तख्तों के सहारे

रावायण : मिथकों के पुनर्मूल्यांकन की अनोखी दास्तान

हर इंसान के अंदर भगवान और शैतान, दोनों, किसी न किसी रूप में मौजूद होते हैं। जब हम कोई सत्कार्य कर रहे हों तो उसे अपने अंदर मौजूद ईश्वरीय अंश का कृत्य मानते हैं, जबकि हर दुष्कृत्य के लिए अपने अंदर मौजूद शैतानीय अंश को उत्तरदायी मानते हैं। हमारे अंदर मौजूद ये दोनो ही अंश एक दूसरे को रोकने और आगे बढ़ कर मनुष्य के निर्णय लेने तक को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में इंसान के नाम, जाति, धर्म, क्षेत्र आदि मायने नहीं रखते, लेकिन फिर भी हम पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर एक सोच विकसित कर लेते हैं। कहा जाता है कि रावण ने अपनी अंतिम सांस लेने से पूर्व राम का नाम लिया था। उसके अंदर के ईश्वरीय अंश ने अंतिम समय में उसके अंदर के बुरे तत्वों पर विजय पा लिया था। ऐसे में किसी इंसान का नाम महत्व नहीं रखता कि क्या है। वर्तमान परिवेश

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