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सुनेली का कुआँ -एक राजस्थानी लोककथा

राजस्थान और गुजरात की सीमा पर बसा एक छोटा-सा गाँव था 'नरसी की ढाणी'।राजस्थान के और गाँवों की तरह यहाँ भी पानी की बहुत कमी थी।गाँव की बहू-बेटियाँ सिर पर घड़े रखकर दूर-दूर से पानी लाती थीं।इसी गाँव की एक बींदणी थी-सुनेली।घर का सारा काम-काज और दूर से पानी भरकर लाना, शाम तक सुनेली थककर चूर हो जाती थी।पानी लाने की परेशानी से बचने के लिए गाँव का एक परिवार 'बंजारे के कुएँ' पर जाकर रहने लगा।सुनेली चाहती थी कि उसका परिवार भी किसी कुएँ के पास जाकर डेरा जमाए।परिवार के लोग अपने पुरखों की ढाणी छोड़कर कहीं जाना नहीं चाहते थे।बेचारी सुनेली मन मारकर रह जाती थी। एक दिन की बात है,सिर पर पानी का घड़ा उठाये मन में कुछ गुनती-विचारती अनमनी-सी सुनेली ढाणी को लौट रही थी।खेजड़े के पेड़ के नीचे साँस लेने रुकी तो उसकी नजर जड़ पर पड़ी।वहाँ उसे गीली-मिट्टी दिखाई दी। 'ऊँह, ये उँदरे भी सब जगह

दो वृद्ध व्यक्ति – प्रेमचंद (तोल्स्तोय की Two Old Men का भावानुवाद)

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प्रेमचंद ने तोल्स्तोय की कई कहानियों का भारतीयकरण किया है. इन्हें अनुवाद कहने की जगह भावानुवाद कहना ज्यादा सही होगा. प्रस्तुत है ऐसी ही एक कहानी Two Old Men का भावानुवाद एक गांव में अर्जुन और मोहन नाम के दो किसान रहते थे. अर्जुन धनी था, मोहन साधारण पुरुष था. उन्होंने चिरकाल से बद्रीनारायण की यात्रा का इरादा कर रखा था. अर्जुन बड़ा सुशील, साहसी और दृढ था. दो बार गांव का चौधरी रहकर उसने बड़ा अच्छा काम किया था. उसके दो लड़के तथा एक पोता था. उसकी साठ वर्ष की अवस्था थी, परन्तु दाढ़ी अभी तक नहीं पकी थी. मोहन प्रसन्न बदन, दयालु और मिलनसार था. उसके दो पुत्र थे, एक घर में था, दूसरा बाहर नौकरी पर गया हुआ था. वह खुद घर में बैठाबैठा बढई का काम करता था. बद्रीनारायण की यात्रा का संकल्प किए उन्हें बहुत दिन हो चुके थे. अर्जुन को छुट्टी ही नहीं मिलती थी. एक काम समाप्त

कामचोर- इस्मत चुगताई

बड़ी देर के वाद - विवाद के बाद यह तय हुआ कि सचमुच नौकरों को निकाल दिया जाए. आखिर, ये मोटे-मोटे किस काम के हैं! हिलकर पानी नहीं पीते. इन्हें अपना काम खुद करने की आदत होनी चाहिए. कामचोर कहीं के.      "तुम लोग कुछ नहीं! इतने सारे हो और सारा दिन ऊधम मचाने के सिवा कुछ नहीं करते." और सचमुच हमें खयाल आया कि हम आखिर काम क्यों नहीं करते? हिलकर पानी पीने में अपना क्या खर्च होता है? इसलिए हमने तुरंत हिल-हिलाकर पानी पीना शुरु किया. हिलाने में धक्के भी लग जाते हैं और हम किसी के दबैल तो थे नहीं कि कोई धक्का दे, तो सह जाएँ. लीजिए, पानी के मटकों के पास ही घमासान युद्ध हो गया. सुराहियाँ उधर लुढ़कीं. मटके इधर गये. कपड़े भीगे, सो अलग. 'यह भला काम करेंगे.' अम्मा ने निश्चय किया. "करेंगे कैसे नहीं! देखो जी! जो काम नहीं करेगा, उसे रात का खाना

अमीर खुसरो

अमीर खुसरो को खड़ी बोली हिन्‍दी का पहला कवि माना जाता है. इस भाषा का हिन्‍दवी नाम से उल्‍लेख सबसे पहले उन्‍हीं की रचनाओं में मिलता है. हालांकि वे फारसी के भी अपने समय के सबसे बड़े भारतीय कवि थे, लेकिन उनकी लोकप्रियता का मूल आधार उनकी हिन्‍दी रचनाएं ही हैं. अबुल हसन यमीनुद्दीन मुहम्मद का उपनाम खुसरो था, जिसे दिल्ली के सुलतान ज़लालुद्दीन खिलज़ी ने अमीर की उपाधि दी. उन्होंने स्वयं कहा है- ‘’मैं तूती-ए-हिन्‍द हूं. अगर तुम वास्तव में मुझसे जानना चाहते हो तो हिन्दवी में पूछो. मैं तुम्हें अनुपम बातें बता सकूंगा.’’ एक अन्‍य स्थान पर उन्होंने लिखा है, ‘’तुर्क हिन्दुस्तानियम मन हिंदवी गोयम जवाब (अर्थात् मैं हिन्दुस्तानी तुर्क हूं, हिन्दवी में जवाब देता हूं.)’’  अमीर खुसरो को दिल्‍ली सल्‍तनत का राज्‍याश्रय हासिल था. अपनी दीर्घ जीवन-अवधि में उन्‍होंने गुलाम वंश, खिलजी वंश से लेकर तुगलक वंश तक 11 सुल्‍तानों का सत्ता-संघर्ष देखा था,लेकिन राजनीति का हिस्‍सा बनने

हिन्दी साहित्य का आदिकाल -नामकरण की समस्या

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के आदिकाल को वीरगाथा काल नाम दिया है. इसके लिए तर्क देते हुए वो कहते हैं- “ राजाश्रित कवि और चारण जिस प्रकार नीति, श्रृंगार आदि के फुटकल दोहे राजसभाओं में सुनाया करते थे, उसी प्रकार अपने आश्रयदाता राजाओं के पराक्रमपूर्ण चरितों या गाथाओं का वर्णन भी किया करते थे। यही प्रबंध परंपरा 'रासो' के नाम से पाई जाती है, जिसे लक्ष्य करके इस काल को हमने, 'वीरगाथाकाल' कहा है।             प्रवृत्ति के निर्धारण के लिए भी आचार्य शुक्ल ने दो कसौटियां निर्धारित की हैं: (क)   विशेष ढंग की रचना की प्रचुरता (ख)   विशेष  ढंग की रचना की लोक प्रसिद्धि            आदिकाल की समयसीमा में शुक्लजी ने हिन्दी भाषा की 12 रचनाएँ ढूंढ कर सामने रखी हैं- 1)      खुमाण रासो 2)      विजयपाल रासो 3)      हम्मीर रासो 4)      परमाल रासो (आल्हा) 5)      बीसलदेव रासो 6)      पृथ्वीराज रासो 7)      जयचंद्र प्रकाश 8)      जयमयङ्क जसचन्द्रिका 9)      कीर्तिलता 10)   कीर्तिपताका 11)   विद्यापति की पदावली 12)   अमीर खुसरो की पहेलियाँ शुक्लजी के अनुसार ,

हिन्दी साहित्य का इतिहास -प्रारम्भ

राहुल सांकृत्यायन ने अपनी पुस्तक ‘काव्यधारा’ में 7वीं सदी के अपभ्रंश के कवि सरहपा को हिन्दी का पहला कवि माना है. डॉ रामकुमार वर्मा हिन्दी साहित्य का प्रारम्भ संवत् 750 से मानते हैं. जॉर्ज ग्रियर्सन के अनुसार, हिन्दी साहित्य की शुरुआत संवत् 700 (643 ई) से होती है. स्पष्टतया, अधिकांश विद्वान अपभ्रंश के उस दौर से प्रारम्भिक हिन्दी की शुरुआत मानते हैं, जहाँ सहायक क्रियाओं और परसर्गों का विकास साफ़ परिलक्षित होने लगता है. हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने की पहली कोशिश फ्रांस के गार्सा द तासी ने की. तासी रचित ‘इस्त्वार द ल लितरेत्यूर ऐन्दूई ऐन्दूस्तानी’ का प्रथम भाग 1839 में और द्वितीय भाग 1847 में प्रकाशित हुआ. 1883 ई में शिवसिंह सेंगर का शिवसिंह सरोज प्रकाशित हुआ. इसमें लगभग एक हज़ार कवियों की रचनाओं और उनके जीवन का संक्षिप्त परिचय मिलता है. इस लिहाज़ से यह पुस्तक साहित्येतिहास से ज्यादा कविवृत्तसंग्रह है. इसी पुस्तक को आधार बनाकर जॉर्ज ग्रियर्सन

भाई-बहन -सत्यवती मल्लिक

"माँ जी!...हाय!माँ जी!...हाय!" एक बार,दो बार,पर तीसरी बार,"हाय हाय!" की करुण पुकार सावित्री सहन न कर सकी।कार्बन पेपर और डिजाइन की कॉपी वहीं कुर्सी पर पटककर शीघ्र ही उसने बाथरूम के दरवाजे से बाहर खड़े कमल को गोद में उठा लिया और पुचकारते हुए कहा,"बच्चे सवेरे-सवेरे नहीं रोते।" "तो निर्मला मेरा गाना क्यों गाती है,और उसने क्यों मेरी सारी कमीज छींटे डालकर गीली कर दी है?"         स्नानागार में अभी तक पतली आवाज में निर्मला गुनगुना रही थी,"एक...लड़का....था....वह...रोता..रहता।" "बड़ी दुष्ट लड़की है।नहाकर बाहर निकले तो सही,ऐसा पीटूँ कि वह भी जाने।"माँ से यह आश्वासन पाकर कमल कपड़े बदलने चला गया।      न जाने कितनी मंगल कामनाओं,भावनाओं और आशीर्वादों को लेकर सावित्री ने अपने भाई के जन्म दिन पर उपहार भेजने के लिए एक श्वेत रेशमी कपड़े पर तितली का सुन्दर डिज़ाइन सोचा है।हलके नीले,सुनहरे और गहरे लाल रंग के रेशम के तारों के साथ-ही-साथ जाने कितनी मीठी स्मृतियाँ भी उसके अंतस्तल

दावत की अदावत – अन्नपूर्णानंद वर्मा

यह मैंने आज ही जाना कि जिस सड़क पर एक फुट धूल की परत चढ़ी हो, वह फिर भी पक्की सड़क कहला सकती है. पर मेरे दोस्त झूठ तो बोलेंगे नहीं. उन्होंने कहा था कि पक्की सड़क है, साइकिल उठाना, आराम से चले आना.         धूल भी ऐसी-वैसी नहीं. मैदे की तरह बारीक होने के कारण उड़ने में हवा से बाजी मारती थी. मेरी नाक को तो उसने बाप का घर समझ लिया था. जितनी धूल इस समय मेरे बालों में और कपड़ों पर जमा हो गई थी, उतनी से ब्रह्मा नाम का कुम्हार मेरे ही जैसा एक और मिट्टी का पुतला गढ़ देता.पाँच मील का रास्ता मेरे लिए सहारा रेगिस्तान हो गया. मेरी साइकिल पग-पग पर धूल में फँसकर खुद भी धूल में मिल जाना चाहती थी. मैंने इतनी धूल फांक ली थी कि अपने फेफड़ों को इस समय बाहर निकालकर रख देता तो देखने वाले समझते कि सीमेंट के

हींगवाला- सुभद्राकुमारी चौहान

लगभग 35 साल का एक खान आंगन में आकर रुक गया । हमेशा की तरह उसकी आवाज सुनाई दी - ''अम्मा... हींग लोगी?''पीठ पर बँधे हुए पीपे को खोलकर उसने, नीचे रख दिया और मौलसिरी के नीचे बने हुए चबूतरे पर बैठ गया । भीतर बरामदे से नौ - दस वर्ष के एक बालक ने बाहर निकलकर उत्तर दिया - ''अभी कुछ नहीं लेना है, जाओ !"पर खान भला क्यों जाने लगा ? जरा आराम से बैठ गया और अपने साफे के छोर से हवा करता हुआ बोला- ''अम्मा, हींग ले लो, अम्मां ! हम अपने देश जाता हैं, बहुत दिनों में लौटेगा ।"  सावित्री रसोईघर से हाथ धोकर बाहर आई और बोली - ''हींग तो बहुत-सी ले रखी है खान ! अभी पंद्रह दिन हुए नहीं, तुमसे ही तो ली थी ।"वह उसी स्वर में फिर बोला-''हेरा हींग है मां, हमको तुम्हारे हाथ की बोहनी लगती है । एक ही

अलबम -सुदर्शन

पंडित शादीराम ने ठंडी साँस भरी और सोचने लगे-क्या यह ऋण कभी सिर से न उतरेगा? वे निर्धन थे,परंतु दिल के बुरे न थे।वे चाहते थे कि चाहे जिस भी प्रकार हो,अपने यजमान लाला सदानंद का रुपया अदा कर दें।उनके लिए एक-एक पैसा मोहर के बराबर था।अपना पेट काटकर बचाते थे,परंतु जब चार पैसे इकट्ठे हो जाते,तो कोई ऐसा खर्च निकल आता कि सारा रुपया उड़ जाता।शादीराम के हृदय पर बर्छियाँ चल जाती थीं।उनका हाल वही होता था,जो उस डूबते हुए मनुष्य का होता है,जो हाथ-पाँव मारकर किनारे तक पहुँचे और किनारा टूट जाए।उस समय उसकी दशा कैसी करुणा-जनक,कैसी हृदय-बेधक होती है।वह प्रारब्ध को गालियाँ देने लगता है।यही दशा शादीराम की थी।      इसी प्रकार कई वर्ष बीत गए,शादीराम ने पैसा बचा-बचाकर अस्सी रूपये जोड़ लिए।उन्हें लाला सदानंद को पांच सौ रूपये देने थे।इन अस्सी रूपये की रकम से ऋण उतारने का समय निकट प्रतीत हुआ।आशा धोखा दे रही थी।एकाएक उनका छोटा

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