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हिंदी के विकास में अवधी का योगदान

अवधी भक्ति काल में और उसके बाद भी हिंदी प्रदेश की एक प्रमुख साहित्यिक भाषा रही है. इसमें प्रेमाख्यानक काव्य और रामभक्ति काव्य खासतौर पर लिखे गए. उसके ये रामभक्ति काव्य और प्रेमाख्यानक काव्य हिंदी को उसकी देन हैं. रामचरित मानस तो लगभग समस्त उत्तर भारत में धर्मग्रंथ की तरह महत्व पाता रहा. तुलसी ने मानस में अवधी को विभिन्न जनपदीय भाषाई तत्वों से लैस कर एक बहुसामुदायिक भाषा के रूप में विकसित किया है. अवधी की ध्वनियां भी उच्चारण की दृष्टि से बहुत सहज हैं, इसलिए अवध क्षेत्र के बाहर भी इनके उच्चारण में वक्ताओं को कठिनाई नहीं होती. जब अवधी साहित्यिक भाषा थी, तो गैर अवधी क्षेत्र के रचनाकार भी अवधी में साहित्य रचते थे और अपने क्षेत्रीय भाषाओं को उसमें उडेलते थे. इससे विभिन्न क्षेत्रीय बोलियों के भाषायी तत्व तद्भव के रूप में एक खास कालखंड की अवधी में जमा हो गए. अवधी से जब ब्रजभाषा ने

अवधी : साहित्यिक भाषा के रूप में विकास

डा. भोलानाथ तिवारी के अनुसार, अवधी के भाषायी अभिलक्षण पहली शताब्दी में ही मिलने लगे थे. वे तो सोहगौरा, रुम्मिन्देई एवं खैरागढ़ के अभिलेखों में भी अवधी में लक्षण ढूढ निकालते हैं. ये अभिलेख पहली शताब्दी के ही आसपास के हैं. बाबूराम सक्सेना भी अवधी को अर्धभागधी की तुलना में पालि के अधिक करीब मानते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि पालि अवधी में एकाएक छलांग लगा गई, बल्कि यह है कि एक लंबे अंतराल के बाद भी पालि के कतिपय अभिलक्षण अवशिष्ट रह गए हैं. अवधी‘ कुवलय माला' की कोसली से निकली हैं, इसलिए उससे तो उसका साम्य है ही, उस दौर की अन्य रचनाओं जैसे कुमारपाल प्रतिबोध, प्रबंध चिंतामणि, प्राकृत पैंगलम आदि की भाषा से भी वह बहुत मिलती- जुलती है. इन पुस्तकों की भाषाओं में अवधी के पूर्व रूप को देखा जा सकता हैः कसुकरू रे पुत्र, कलत, घी - कसुकर रे करसण बारी. (प्रबंध चिंतामणि)जणणि वियं भी चितवइ, कवणु पियावउँ खीर.दिन्न हत्यु.भुवणि वसंत पयट्ठ.उपर्युक्त उदाहरणों

वापसी -उषा प्रियंवदा

गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नज़र दौड़ाई - दो बक्स, डोलची, बाल्टी। ''यह डिब्बा कैसा है, गनेशी?'' उन्होंने पूछा। गनेशी बिस्तर बाँधता हुआ, कुछ गर्व, कुछ दु:ख, कुछ लज्जा से बोला, ''घरवाली ने साथ में कुछ बेसन के लड्डू रख दिए हैं। कहा, बाबूजी को पसन्द थे, अब कहाँ हम गरीब लोग आपकी कुछ खातिर कर पाएँगे।'' घर जाने की खुशी में भी गजाधर बाबू ने एक विषाद का अनुभव किया जैसे एक परिचित, स्नेह, आदरमय, सहज संसार से उनका नाता टूट रहा था। ''कभी-कभी हम लोगों की भी खबर लेते रहिएगा।'' गनेशी बिस्तर में रस्सी बाँधता हुआ बोला।''कभी कुछ ज़रूरत हो तो लिखना गनेशी, इस अगहन तक बिटिया की शादी कर दो।''गनेशी ने अंगोछे के छोर से आँखे पोछी, ''अब आप लोग सहारा न देंगे, तो कौन देगा। आप यहाँ रहते तो शादी में कुछ हौसला रहता।''गजाधर बाबू चलने को तैयार बैठे थे। रेलवे क्वार्टर का

ब्रजभाषा : साहित्यिक भाषा के रूप में विकास

साहित्यिक ब्रजभाषा दसवीं- ग्यारहवीं शताब्दी के आस पास ही शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित हुई। डा. भंडारकर के इस कथन से भी इस बात की पुष्टि होती है कि जिस क्षेत्र में6वीं- 7वीं शताब्दी में अपभ्रंश का जन्म हुआ, उसी क्षेत्र में आज ब्रजभाषा बोली जाती है। ब्रजभाषा के विकास को तीन चरणों में बाटा जा सकता है-प्रथम चरण- प्रारंभ से लेकर1525 ई. तक ; द्वितीय चरण- 1525 से 1800 तक और तीसरा चरण-1800 ई. से अब तक। प्रथम चरण की ब्रजभषा में अपभ्रंशत्व कुछ अधिक ही है। उस समय की ब्रजभाषा अपभ्रंश से निकलने के लिए संघर्ष कर रही थी। हेमचंद्र के व्याकरण में उद्धृत दोहों तथा देशीनाममाला में संग्रहित शब्दों से ब्रजभाषा के शब्दों का विस्मयकारी साम्य है,उग्गाहिअ - उगाहनाफग्गु - फागचोट्टी - चोटीअच्छ - आछैचुक्कइ - चुक्योविसूरइ - विसूरनोब्रजभाषा का पूर्वरूप प्राकृत पैंगलम, षडावश्यक बालावबोध (तरूणप्रभ सूरि) , रणमल्ल छंद (श्रीधर व्यास) आदि में तो सुराक्षित है ही,

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