आप यहाँ हैं
होम > 2012 > December

सरोज स्मृति —– सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

ऊनविंश पर जो प्रथम चरणतेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण;तनये, ली कर दृक्पात तरुणजनक से जन्म की विदा अरुण!गीते मेरी, तज रूप-नामवर लिया अमर शाश्वत विरामपूरे कर शुचितर सपर्यायजीवन के अष्टादशाध्याय,चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरणकह - "पित:, पूर्ण आलोक-वरणकरती हूँ मैं, यह नहीं मरण,'सरोज' का ज्योति:शरण - तरण!"  अशब्द अधरों का सुना भाष,मैं कवि हूँ, पाया है प्रकाशमैंने कुछ, अहरह रह निर्भरज्योतिस्तरणा के चरणों पर।जीवित-कविते, शत-शर-जर्जरछोड़ कर पिता को पृथ्वी परतू गई स्वर्ग, क्या यह विचार --"जब पिता करेंगे मार्ग पारयह, अक्षम अति, तब मैं सक्षम,तारूँगी कर गह दुस्तर तम?" --कहता तेरा प्रयाण सविनय, --कोई न था अन्य भावोदय।श्रावण-नभ का स्तब्धान्धकारशुक्ला प्रथमा, कर गई पार!धन्ये, मैं पिता निरर्थक था,कुछ भी तेरे हित न कर सका!जाना तो अर्थागमोपाय,पर रहा सदा संकुचित-कायलखकर अनर्थ आर्थिक पथ परहारता रहा मैं स्वार्थ-समर।शुचिते, पहनाकर चीनांशुकरख सका न तुझे अत: दधिमुख।क्षीण का न छीना कभी अन्न,मैं लख न सका वे दृग विपन्न;अपने आँसुओं अत: बिम्बितदेखे हैं अपने ही मुख-चित।सोचा है नत हो बार बार --"यह हिन्दी का स्नेहोपहार,यह नहीं हार मेरी, भास्वरयह रत्नहार-लोकोत्तर वर!" --अन्यथा, जहाँ है

असाध्य वीणा – अज्ञेय

आ गए प्रियंवद! केशकंबली! गुफा-गेह!राजा ने आसन दिया। कहा :'कृतकृत्य हुआ मैं तात! पधारे आप।भरोसा है अब मुझ कोसाध आज मेरे जीवन की पूरी होगी!'लघु संकेत समझ राजा कागण दौड़े। लाये असाध्य वीणा,साधक के आगे रख उस को, हट गए।सभी की उत्सुक आँखेंएक बार वीणा को लख, टिक गईंप्रियंवद के चेहरे पर।'यह वीणा उत्तराखंड के गिरि-प्रांतर से-घने वनों में जहाँ तपस्या करते हैं व्रतचारी-बहुत समय पहले आयी थी।पूरा तो इतिहास न जान सके हम :किंतु सुना हैवज्रकीर्ति ने मंत्रपूत जिसअति प्राचीन किरीटी-तरु से इसे गढ़ा था-उस के कानों में हिम-शिखर रहस्य कहा करते थे अपने,कंधों पर बादल सोते थे,उस की करि-शुंडों-सी डालेंहिम-वर्षा से पूरे वन-यूथों का कर लेती थीं परित्राण,कोटर में भालू बसते थे,केहरि उस के वल्कल से कंधे खुजलाने आते थे।और-सुना है-जड़ उस की जा पहुँची थी पाताल-लोक,उस की ग्रंथ-प्रवण शीतलता से फण टिका नाग वासुकि सोता था।उसी किरीटी-तरु से वज्रकीर्ति नेसारा जीवन इसे गढ़ा :हठ-साधना यही थी उस

प्रेमचंद का गोदान: यदि मैं लिखता—-जैनेन्द्र कुमार

अगर मैं गोदान लिखता? लेकिन निश्चय है मैं नहीं लिख सकता था, लिखने की सोच भी नहीं सकता था। पहला कारण कि मैं प्रेमचंद नहीं हूँ, और अंतिम कारण भी यही कि प्रेमचंद मैं नहीं हूँ। वह साहस नहीं, वह विस्तार नहीं। गोदान आसपास ५०० पृष्ठों का उपन्यास है। उसके लिए धारणा में ज्यादा क्षमता चाहिए, और कल्पना में ज्यादा सूझबूझ। वह न होने से मेरा कोई उपन्यास ढाई सौ पन्नों से ज्यादा नहीं गया। मैं लिखता ही तो गोदान करीब दो सौ पन्नों का हो जाता। गोदान का एक संक्षिप्त संस्करण भी निकला है और मानने की इच्छा होती है कि उसमें मूल का सार सुरक्षित रह गया है। यानी दो सौ-ढाई सौ में भी गोदान आ सकता था। और क्या विस्मय, मोटापा कम होने से उसका प्रभाव कम के बजाय और बढ़ जाता, अब यदि फैला है तो तब तीखा हो जाता।पुस्तक जब शुरु में निकली थी तभी

कालिदास का संक्षिप्त इतिहास [लोक-कथाओं के आधार पर]—–श्रीलाल शुक्ल

कालिदास का जन्म एक गड़रिए के घर में हुआ था। उनके पिता मूर्ख थे। उपन्यासकार नागार्जुन ने जिस वीरता से अपने पिता के विषय में ऐसा ही तथ्य स्वीकार किया है, वह वीरता कालिदास में न थी। अत: उन्होंने इस विषय में कुछ नहीं बताया। फिर भी सभी जानते है कि कालिदास के पिता मूर्ख थे। वे भेड़ चराते थे। फलत: कालिदास भी मूर्ख हुए और भेड़ चराने लगे। कभी-कभी गायें भी चराते थे। पर वे बाँसुरी नहीं बजाते थे। उनमें ईश्वरदत्त मौलिकता की कमी न थी। उसका उपयोग उन्होंने अपनी उपमाओं में किया है। यह सभी जानते हैं। जब वे मूर्ख थे, तब वे मौलिकता के सहारे एक पेड़ की डाल पर बैठ गए और उसे उल्टी ओर से काटने लगे। इस प्रतिभा के चमत्कार को वररुचि पंडित ने देखा। वे प्रभावित हुए। उनके राजा विक्रम की लड़की विद्या परम विदुषी थी। विद्या का संपर्क इस मौलिक प्रतिभा से

अमृतसर आ गया है ——भीष्म साहनी

  गाड़ी के डिब्बे में बहुत मुसाफिर नहीं थे। मेरे सामनेवाली सीट पर बैठे सरदार जी देर से मुझे लाम के किस्से सुनाते रहे थे। वह लाम के दिनों में बर्मा की लड़ाई में भाग ले चुके थे और बात-बात पर खी-खी करके हँसते और गोरे फौजियों की खिल्ली उड़ाते रहे थे। डिब्बे में तीन पठान व्यापारी भी थे, उनमें से एक हरे रंग की पोशाक पहने ऊपरवाली बर्थ पर लेटा हुआ था। वह आदमी बड़ा हँसमुख था और बड़ी देर से मेरे साथवाली सीट पर बैठे एक दुबले-से बाबू के साथ उसका मजाक चल रहा था। वह दुबला बाबू पेशावर का रहनेवाला जान पड़ता था क्योंकि किसी-किसी वक्त वे आपस में पश्तो में बातें करने लगते थे। मेरे सामने दाईं ओर कोने में, एक बुढ़िया मुँह-सिर ढाँपे बैठा थी और देर से माला जप रही थी। यही कुछ लोग रहे होंगे। संभव है दो-एक और मुसाफिर भी रहे हों, पर

दस दिन का अनशन—- हरिशंकर परसाई

आज मैंने बन्नू से कहा, " देख बन्नू, दौर ऐसा आ गया है की संसद, क़ानून, संविधान, न्यायालय सब बेकार हो गए हैं. बड़ी-बड़ी मांगें अनशन और आत्मदाह की धमकी से पूरी हो रही हैं. २० साल का प्रजातंत्र ऐसा पक गया है कि एक आदमी के मर जाने या भूखा रह जाने की धमकी से ५० करोड़ आदमियों के भाग्य का फैसला हो रहा है. इस वक़्त तू भी उस औरत के लिए अनशन कर डाल."बन्नू सोचने लगा. वह राधिका बाबू की बीवी सावित्री के पीछे सालों से पड़ा है. भगाने की कोशिश में एक बार पिट भी चुका है. तलाक दिलवाकर उसे घर में डाल नहीं सकता, क्योंकि सावित्री बन्नू से नफरत करती है.सोचकर बोला, " मगर इसके लिए अनशन हो भी सकता है? "मैंने कहा, " इस वक़्त हर बात के लिए हो सकता है. अभी बाबा सनकीदास ने अनशन करके क़ानून बनवा दिया है कि हर

राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत भाग्य विधाता है- रघुवीर सहाय

राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत-भाग्य-विधाता है फटा सुथन्ना पहने जिसका गुन हरचरना गाता है। मखमल टमटम बल्लम तुरही पगड़ी छत्र चँवर के साथ तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर जय-जय कौन कराता है। पूरब-पच्छिम से आते हैं नंगे-बूचे नरकंकाल सिंहासन पर बैठा, उनके तमगे कौन लगाता है। कौन-कौन है वह जन-गण-मन- अधिनायक वह महाबली डरा हुआ मन बेमन जिसका बाजा रोज़ बजाता है।

विश्व का प्रथम साम्यवादी —— हरिशंकर परसाई

जिस दिन राम रावण को परास्त करके अयोध्या आए , सारा नगर दीपों से जगमगा उठा . यह दीपावली पर्व अनंत काल तक मनाया जाएगा . पर इसी पर्व पर व्यापारी खाता -बही बदलते हैं और खाता-बही लाल कपडे में बाँधी जाती है . प्रश्न है - राम के अयोध्या आगमन से खाता -बही बदलने का क्या संबंध ? और खाता -बही लाल कपडे में ही क्यों बाँधी जाती है ? बात यह हुई कि जब राम के आने का समाचार आया तो व्यापारी वर्ग में खलबली मच गयी .  वे कहने लगे - सेठजी , अब बड़ी आफत है .शत्रुघ्न के राज में तो पोल चल गयी . पर राम मर्यादा-पुरुषोत्तम हैं . वे सेल्स टैक्स और इनकम टैक्स की चोरी बर्दाश्त नहीं करेंगे .वे अपने खाता-बही की जाँच कराएंगे और अपने को सजा होगी . एक व्यापारी ने कहा - भैया , तब तो अपना नंबर दो का मामला भी पकड़ लिया

यू पी एस सी - हिन्दी साहित्य कोचिंग के लिए संपर्क करें - 8800695993-94-95 या और जानकारी प्राप्त करें 

Top