आप यहाँ हैं
होम > 2011 > October

कफ़न——प्रेमचंद

1झोपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के पास और अन्दर बेटे कि जवान बीवी बुधिया प्रसव-वेदना से पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़े की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अन्धकार में लय हो गया था। घीसू ने कहा - मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते ही गया, ज़रा देख तो आ। माधव चिढ़कर बोला - मरना ही है तो जल्दी मर क्यों नही जाती ? देखकर क्या करूं? 'तू बड़ा बेदर्द है बे ! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफाई!' 'तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।' चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव इतना कामचोर

प्रेमचंद का गोदान -संक्रमण पर खड़े समाज की त्रासदी

गोदान को प्रेमचन्द का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास माना जाता है। तमाम त्रुटियों की ओर इशारा करने के बावजूद आलोचक इस विचार पर एक मत हैं कि गोदान प्रेमचन्द का चरम बिन्दु है। गोदान के साथ प्रेमचन्द की लेखन कला अपनी पूर्णता को प्राप्त करती है, साथ ही उनकी जीवन यात्रा भी। गोदान को आमतौर पर ‘किसान’ जीवन की त्रासदी या ‘कृषक जीवन का महाकाव्य’ के रूप में देखे जाने की प्रवृत्ति रही है, लेकिन गोदान को सिर्फ किसानों के शोषण की कथा के रूप में देखना उसे बहुत ही सीमित संदर्भो में देखना है। कृषक प्रेमचन्द की चिन्ता के मूल में रहा है। पहले उपन्यास सेवासदन में ही ‘चैतू प्रसंग’ के द्वारा प्रेमचन्द यह सूचना दे देते हैं कि उनकी यात्रा की दिशा क्या होगी। प्रेमाश्रम और कर्मभूमि तो मूलरूप से कृषक समस्याओं को आधार बनाकर ही लिखे गये हैं। गोदान में वस्तुतः प्रेमचन्द की

यू पी एस सी - हिन्दी साहित्य कोचिंग के लिए संपर्क करें - 8800695993-94-95 या और जानकारी प्राप्त करें 

Top