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जनकवि नागार्जुन

जिस तरह प्रसाद ,पंत,महादेवी और निराला छायावाद के चार स्तंभ थे उसी प्रकार केदार नाथ अग्रवाल,त्रिलोचन,शमशेर और नागार्जुन प्रगतिवादी कविता के चार स्तंभ माने जा सकते हैं। इनमें नागार्जुन की न सिर्फ काव्ययात्रा सबसे लंबी रही है,बल्कि उनका काव्य संसार भी काफी वैविध्यपूर्ण रहा है। जनता से जुड़े हर सवाल पर जनता का साथ देकर नागार्जुन ने जनकवि की उपाधि पाई। नागार्जुन की प्रतिबद्धता सदियों से दलित,शोषित और उत्पीड़ित रही जनता के साथ थी। इसकी स्पष्ट घोषणा करते हुए वे कहते हैं- “प्रतिबद्ध हूँ,जी हाँ,प्रतिबद्ध हूँ बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त” कवि अपने आप को शोषित-पीड़ित जनता से अलग करके नहीं देखता,बल्कि अपने को उन्हीं में से एक समझता है-“मैं दरिद्र हूँ पुश्त-पुश्त की यह दरिद्रता कटहल के छिलके जैसे खुरदरी जीभ से मेरा लहू चाटती आई मैं न अकेला मुझ जैसे तो लाख-लाख हैं कोटि-कोटि हैं ” शोषित जनता के साथ खड़ा कवि निश्चय ही व्यवस्था का अंध समर्थन नहीं कर सकता। धूमिल की पंक्तियाँ हैं- “वहाँ

रात आधी खींच कर… हरिवंश राय बच्चन

रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने। फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में और चारों ओर दुनिया सो रही थी। तारिकाऐं ही गगन की जानती हैं जो दशा दिल की हमारे हो रही थी। मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे अधजगा सा और अधसोया हुआ सा। रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने। एक बिजली छू गई सहसा जगा मैं कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में। प्रात ही की ओर को है रात चलती औ उजाले में अंधेरा डूब जाता। मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी खूबियों के साथ परदे को उठाता। एक चेहरा सा लगा तुमने लिया था और मैंने था उतारा एक चेहरा। वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने पर ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने। रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने। और उतने फ़ासले पर आज तक सौ यत्न करके भी न आये फिर कभी हम। फिर न आया वक्त वैसा फिर न मौका उस तरह का फिर न लौटा चाँद निर्मम। और

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