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यह किसी कुंवारी लड़की का नाम नहीं है पर लगता है जैसे किसी फिरंगी मेम का नाम हो। मोबाईल जगत में यह बहुत ही चालू एवं प्रचलित नाम है जो जन-जन की जुबान पर है। यह वास्तव में ‘‘मिस्ड कॉल‘‘ है परंतु इसका बिगड़ा रूप ‘‘मिस कॉल‘‘ ही चलन में है। आज मोबाईल हर घर में लगभग जितने सदस्य हैं उतनी ही संख्या में पाए जा सकते हैं क्या ग्रामीण क्या शहरी सब ‘‘मिस कॉल‘‘ को जानते हैं। इस मोबाईल ने सारी दुनिया को मुट्ठी में समेट लिया है। सूचना एवं संचार जगत में इसने एक जबरदस्त क्रांति ला दी है। इस छोटी सी मशीन में इतनी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं कि घर बैठे अधिकांश काम निबटाए जा सकते हैं बस उसे आपरेट करने का थोड़ा ज्ञान होना चाहिए। बैंक का काम, बिल के भुगतान का काम, टिकिट बुक करने संबंधी अनेक अन्य काम बड़ी आसानी से हो जाते हैं। मोबाईल कंपनियां तरह-तरह की सुविधाजनक आकर्षक मोबाईल बाजार में लांच कर रही हैं। स्क्रीन स्पर्श करते ही सारे विकल्प खुल जाते हैं, आप जो चाहो देख लो, पढ़ लो, सुन लो।

      मैं मोबाईल का बखान नहीं कर रहा हूं बस इससे जुड़ी एक दुर्घटना का जिक्र करना चाहता हूं। हां, तो मैं, मिस कॉल के बारे में कह रहा था। यह शब्द इतना कायम हो गया है कि क्या शिक्षित क्या अशिक्षित सब इसका आसानी से इस्तेमाल करते हैं। मोबाईल ने ग्रामीण क्षेत्र के उपभोक्ताओं को कई अंग्रेजी शब्दों का ज्ञान भी दे दिया है जैसे नेटवर्क, इंटरनेट, इनकमिंग, आऊट-गोइंग, टावर, व्हायब्रेशन, यू ट्यूब आदि। ‘‘मिस्ड‘‘ शब्द अंग्रेजी शब्द ‘‘मिस्स‘‘ का भूतकालिक रूप है जिसका अर्थ है चूक जाना, न मिलना आदि; अर्थात् मिस्ड कॉल का अर्थ चूका हुआ या छूटा हुआ कॉल।

      मोबाईल ने एक ओर जीवन को आसान कर दिया है तो वहीं दूसरी ओर बुराईयां भी भरपूर मात्रा में भर दी हैं। बुराई का आकर्षण अच्छाई से अधिक होता है। आदमी का स्वभाव बुराई की ओर झुकाव वाला होता है और मोबाईल कंपनियां इसे जानती हैं। आज का युवा वर्ग, बच्चे या सयाने सब उसमें निहित बुराईयां से अछूते नहीं हैं। किशोर वय के बच्चे इससे बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। जब से मोबाईल का चलन हुआ है किशोरों, युवाओं या कहें हर वर्ग के लोगों में पाप की स्पीड बढ़  गई है; नैतिकता के पतन का ग्राफ तेजी से गिरता जा रहा है। हमें आए दिन अखबारों में, खबरी चैनलों में यौन अथवा अन्य जघन्य अपराधों के नए-नए कारनामें पढ़ते-सुनते हैं। इन तमाम घटनाओं के पीछे मोबाईल का बड़ा योगदान रहता है। कोई वारदात होने पर पुलिस आरोपियों या संबंधितों की मोबाईल ही खंगालती है। समाज के दरम्यान अश्लीलता घनघोर रूप से बढ़ती जा रही है। जिसका श्रेय टी. वी. या मोबाईल जैसे संचार माध्यमों को बहुत हद तक दिया जा सकता है। ग्रामीण अंचल में भी इसका दुष्प्रभाव दिखाई देता है।

      आज सामान्य जनमानस में भी एक मोबाईल क्रय करने की इच्छा होती है। आम आदमी भी यदि मोबाईल क्रय खरीदता है तो वह कम से कम एक-डेढ़ हजार रू. का खरीदता है, जो सक्षम है वह महंगा मोबाईल खरीदता है। उससे जो फायदा होता है वह तो होता ही है पर नुकसान भी उससे अधिक ही होता है। उधर मोबाईल कंपनियां इस तरह करोड़ों मोबाईल विक्रय कर अरबों-खरबों रूपए कमा रही हैं। हममें तो बहुतों को यह ज्ञात नहीं है कि जहां हम अपनी मजदूरी में से अपनी अन्य जरूरतों की पूर्ति न कर एक अदद मोबाईल क्रय करने का खतरा मोलते हैं वहीं हम मोबाईल कंपनी की आमदनी में इजाफा करते हैं। मजदूर एक मोबाईल खरीद कर कुछ समय के लिए खुश हो जाता है पर शनैः शनैः वह उस छोटी मशीन के अंदर छुपी बुराई अर्थात् नकारात्मकता के भंडार से परिचित होकर उसमें बहने लगता है जो विनाशकारी होता है। लोग सुविधा के लिए उस मशीन का उपयोग करते हैं परंतु मनोरंजन के नाम पर इसमें निहित बुराईयों से अछूते नहीं रह सकते। ऐसा कहा जाता है कि मोबाईल कंपनी के मालिक की पत्नी जिसके नाम का डंका बजता है, करोड़ों रूपए की रत्नजड़ित मोबाईल का इस्तेमाल करती है। हजार-डेढ़ हजार या क्षमता अनुसार अधिक मूल्य की मोबाईल क्रय कर प्रसन्न होने वाला मजदूर 5 रूपए वाली चाय और कुछ नमकीन खा कर खुश होता है जबकि मोबाईल कंपनी के मालिक की पत्नी एक बार में एक लाख रूपए वाली चाय पीती है। मोबाईल कंपनी का मालिक हर पल करोड़ों रूपए कमाता है और मजदूर उपभोक्ता मोबाईल बार-बार रिचार्ज कराता और अनैतिकता के गिरफ्त में फंसता जाता है।

      कम्प्यूटर और मोबाईल की मेहरबानी से अश्लीलता की आंधी सी आ गई है जिसके बहाव में युवा पीढ़ी बहती चली जा रही है जिसके फलस्वरूप हम आए दिन घटित घटनाओं का विवरण पढ़ते-सुनते हैं। गांव-गिरांव भी ऐसी दुखद घटनाओं से त्रस्त है। इन सब को देख प्रबुद्ध वर्ग के अंतर्मन में एक प्रश्न उपजता है कि इन परिस्थितियों में आने वाले समाज का स्वरूप कैसा होगा?

      हां तो मैं मिस कॉल के विषय में कह रहा था। बात एक छोटे से गांव की एक किशोरी की है। परिवार में सबसे छोटी और लाड़ली थी। जब वह मिडिल पास हो गई तभी उसकी माँ की मृत्यु हो गई थी। घर की माली हालत ऐसी न थी कि उसे आगे पढ़ाया जा सके। वह पढ़ना चाहती थी। उसकी बुआ के लड़के ने जो एक शिक्षक था किसी प्रकार उसे हाई स्कूल तक पढ़ा दिया, पर बाद में वह भी सहयोग करने से पीछे हट गया। निराश होकर वह घर पर ही रहने लगी। आगे पढ़ने के सारे रास्ते बंद हो गए। वह अक्सर अकेली रहती और बहुत कम बात करती थी। घर में सब अपने-अपने कामों में व्यस्त रहते थे, किसी को उसकी अंतर्व्यथा से कोई मतलब नहीं था। माँ के मरने के बाद बूढ़ा बाप भी उदास रहता था। भैया-भाभी अपनी दुनिया में उलझे रहते थे, बहनें भी अपने कामों में व्यस्त थीं। कुल मिलाकर उसकी कोई खबर लेने वाला कोई नहीं था। गांव में एक दो ही सहेलियां थीं, जिनसे वह बातें करती थी, अब वे भी अपने-अपने काम में लग गईं तो वह बिल्कुल तन्हा रह गई। घर में काम करने के बाद वह घर में ही रहती थी।

      अब ऐसा हुआ कि उसके घर के सामने ही गांव के बड़े किसान का पक्का मकान बनना शुरू हुआ। घर-निर्माण हेतु ईंट, रेती, गिट्टी आदि जमा किए जाने लगे; मजदूर मिस्त्री काम में जुट गए। वह घर के दरवाजे पर खड़ी यह सब देखा करती थी। एक दिन किसान नें उससे कहा-‘‘तुम घर में यों ही पड़ी रहती हो, हमारे यहां मजदूरों की जरूरत है तुम भी काम पर आ जाओ जो निर्धारित मजदूरी है वह तुम्हें मिल जाएगी।‘‘ यह सुनकर लड़की कुछ सोचती रही फिर उसने हां कर दिया। वह खुश भी थी इस बहाने वह बोरियत से बच गई और निजी खर्च की व्यवस्था भी हो गई थी।

      वह घर के काम निपटा कर काम पर हाजिर हो जाती। उसे मिस्त्रियों के पास मसाला अथवा उनके द्वारा आदेशित सामान प्रस्तुत करने का काम करना था। मिस्त्रियों में एक दबंग मिस्त्री था; वह जवान और चालू किस्म का व्यक्ति था। उसने देखा कि लड़की कमसिन और देखने में भी ठीक-ठाक थी उसे अपनी सहायिका के रूप में रख लिया। वह उसके आदेशों के अनुसार काम करने लगी। अपने बात व्यवहार से उसने उसे प्रभावित करना शुरू कर दिया। वह बड़ा धूर्त और घाट-घाट का पानी पिया हुआ व्यक्ति था। चूंकि वह अपने काम में कुशल था अतः उसकी मांग पास-पड़ोस के गांवों में होती रहती थी और हर जगह उसने ऐसी लड़कियों को अपने जाल में फंसा रखा था। इस बेचारी को भी अपने घिनौने जाल में उलझाने में उसने कोई विलम्ब नहीं किया। वह यही प्रयास करता कि वह उसके इर्द-गिर्द ही रहे। काम के दौरान हंसी-मजाक भी चलता रहता जिसमें द्विअर्थी शब्दों का भरपूर प्रयोग होता था और उसमें अश्लीलता का पुट रहता था। शुरू-शुरू में ऐसी बातें सुनकर उसे शर्म आती थी पर धीरे-धीरे ऐसी हंसी-मजाक की वह अभ्यस्त हो गई और उसे भी इसमें आनंद आने लगा मिस्त्री ने उसके घर-परिवार की स्थिति के बारे में पूरी जानकारी हासिल कर ली थी और उसे यह समझते देर न लगी कि चिड़िया आसानी से उसके प्रेम जाल में आ जाएगी। वह उसे प्यार से काम समझाता, उसका नाम लेकर बुलाता और मद भरी आँखों से उसे देखता था। घर निर्माण कार्य बढ़ता गया और वह मिस्त्री उस लड़की के दिल में समाता गया। वह खुश थी-प्यार की गुलाबी लहरें हिलोरे ले रही थी पर जिसे वह प्यार समझ रही थी वह केवल वासना का प्रपंच था। इन दोनों के बीच क्या खिचड़ी पक रही थी उस ओर किसी का ध्यान नहीं था। सब इसे सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा समझकर अनदेखा करते थे।

      मिस्त्री बड़ा धूर्त आदमी था। वह अपनी चाल बड़ी सतर्कता से चल रहा था। यदि वह किसी के माध्यम से अपने दिल की बात लड़की तक पहुंचाता तो भेद खुलने की पूरी संभावना थी, अतः उसने एक चाल चली। साप्ताहिक भुगतान के बाद उसने हजार-ड़ेढ़ हजार वाला मोबाईल उस लड़की को गिफ्ट कर दिया। लड़की अत्यंत प्रसन्न हो गई। उसने मोबाईल आपरेट करने संबंधी मूल बातें जैसे मोबाईल चालू-बंद करना, फोन रिसीव करना, फोन करना आदि समझा दीं। वैसे इस मामले में बच्चे (युवा) बड़े स्मार्ट होते हैं। वह लड़की भी कॉल करने, व्हायब्रेशन, मिस कॉल आदि के बारे में समझ गई। जब काम चलता रहता तो इस सेट की जरूरत नहीं पड़ती पर जब दोनों एक दूसरे से दूर और अलग रहते तब उसकी जरूरत पड़ती थी।

      उन दोनों के गांवों के बीच एक छोटी झरिया (छोटी नदी) बहती थी। यह क्षेत्र सुनसान इलाका था जो मिलन हेतु उपयुक्त जगह और वातावरण उपलब्ध करता था। दिन भर के काम के बाद सब अपने-अपने घर चले जाते और नहा-धोकर संध्या भोजन करने अपने-अपने घरों में दुबक जाते थे। दिन भर के काम के बाद थके मांदे होने से गांव वाले कुछ जल्दी ही सो जाते हैं और पूरे गांव में सन्नाटा छा जाता है। गांव में आम तौर पर दूसरों के मामलों में अनावश्यक दखलंदाजी नहीं होती है। वह मिस्त्री अपने मोटर साइकिल से घर से निकलता और झरिया पहुंचकर लड़की को मिस्स कॉल मारता। घर में उसको रोकने-टोकने वाला भी कोई नहीं था। बाप था नहीं, माँ को यों ही बहला देता था। घर खर्च वही चलाता था अतः उससे अधिक सवाल जवाब करने की जरूरत नहीं पड़ती थी। लड़की मोबाईल सेट को ऐसी जगह रखती थी कि उसे पता चल जाता था कि मिस्स कॉल आया मतलब उसे निर्धारित जगह पर मिलने हेतु पहुंचना है। बात उस समय की है जब ‘‘स्वच्छ भारत मिशन‘‘ चालू नहीं हुआ था। वह चुपके से अपने कमरे से निकलती और बेधड़क चली जाती थी। बूढ़ा बाप अपने कमरे में और भैया-भाभी अपने कमरे में बंद रहते थे। यदि रास्ते में कोई गांव वाला मिल भी जाता और सवाल करता है कि रात में कहां जा रही हो तो उसका जवाब ऐसा होता कि उसमें बहस की जरूरत ही नहीं पड़ती। रात में भी वह निडरता पूर्वक अपने यार से मिलने चली जाती। नियत जगह पहुंच कर वे मोटर साइकिल से किसी सुरक्षित स्थान की ओर चल देते और देर रात तक निर्विघ्न मस्ती करते और घर लौटते थे। किसी को इन सब हरकतों की भनक तक नहीं लगती। यहां तक कि रात में उसके घर वापस जाने पर कुत्ते भी भौंकते नहीं थे।

      काम के दौरान उन दोनों के हाव-भाव से यह लगता था कि उन दोनों के बीच कुछ तो पक रहा था क्योंकि इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुप सकते। कुछ कहने पर वह कह देती कि ऐसा कुछ भी नहीं है। उधर उस मिस्त्री ने उससे शादी का झांसा देकर मिस कॉल करने और मनमानी करने का क्रम जारी रखा था। उसके झांसे में आकर वह उसके इशारे पर नाचने लगी थी।

      ऐसे मामलों में गांव वाले बड़े पारखी होते हैं। धीरे-धीरे गांव भर में उनकी चर्चा होने लगी पर उसने इसे बकवास कहकर टाल दिया। बूढ़े बाप ने भी सुना पर उसने सोचा कि जवान बेटी यदि घर में हो तो ऐसी बातें होती ही हैं और उसने भी इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। किसान के घर-निर्माण का काम पूरा हो चुका था। मिस्त्री को अन्य गांव में काम मिल गया था। दूरी के कारण वह लड़की उस जगह काम पर नहीं जा सकी। अब वह खाली और तन्हा रहती और समय-समय पर उसे फोन करती। वह फोन पर बात करती हुई दिखाई देती थी परन्तु इतने धीमें स्वर में बात करती कि किसी को कुछ स्पष्ट सुनाई नहीं पड़ता था। शाम को काम समाप्त करके निर्धारित समय पर मिस कॉल का इंतजार करती और घर से निकल पड़ती।

      उसके व्यवहार में आए परिवर्तन को देख एवं गांव वालों की टिप्पणियों को ध्यान में रखकर उसके भैया-भाभी ने उसे समझाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि गांव में उल्टी-सीधी बातें हो रही हैं अतः वह अपने काम को सुधार ले लेकिन उसने उनके मुंह पर कह दिया कि जब उनका समय था तो उन्होंने भी तो घर की मर्यादा को ताक पर रखकर मस्ती की थी अब उसे समझाने चले हैं? यह सुनकर भैया-भाभी ने भी उससे कुछ बोलना ही बंद कर दिया और उसे अपने हाल पर छोड़ दिया।

      बात बहुत बढ़ गई थी। वह किसी की परवाह नहीं करती और अपनी मनमानी करती थीं। इतना कुछ होने पर भी वह किस्मत की धनी थी। उसके लिए एक रिश्ता आया। लड़का शिक्षाकर्मी था। घर में उसकी बूढ़ी माँ और एक बहन थी। पिताजी नहीं थे। थोड़ी जमीन थी उसे अधिया में देकर साल भर के खाने लायक आनाज प्राप्त हो जाता था और उसे इतना वेतन मिल जाया करता था कि उसका और एक घर का खर्च आराम से चल जाता और कुछ बचत भी कर लेता था। वह सीधा और सरल व्यक्ति था। उसके दिल में कोई कपट नहीं था। उसने लड़की का मोबाईल नंबर प्राप्त कर लिया था और समय निकालकर उससे बात भी कर लेता था।

      इधर वह लड़की दुविधा में थी कि किसको प्यार करे किसे ठुकराए। एक अंतर्द्वन्द्व छिड़ा हुआ था। मिस्त्री ने उसे हर प्रकार से अपने कब्जे में ले लिया था और उसका मिस कॉल करने वाला फार्मूला चालू ही था। वह उसके चंगुल में इतनी फंस चुकी थी कि वह शिक्षाकर्मी की उपेक्षा करने लगी। अब वह उस गरीब के फोन का जवाब तक नहीं देती थी। इतने पर भी वह बेचारा बुरा नहीं मानता था। कभी-कभी वह उससे मिलने आता था पर वह उससे इतनी चालाकी से बात करती कि उसे कोई शक नहीं होता था। बेचारा शिक्षाकर्मी मन ही मन प्रसन्न होता और भावी योजनाएं बनाता था।

      लड़की की दुविधा बढ़ती जा रही थी। एक ओर शिक्षाकर्मी का सौम्य चेहरा मन में उभरता फिर पल भर में अपने मिस्त्री यार का चालू चेहरा उभर जाता। वह शिक्षाकर्मी को दुखी करना नहीं चाहती थी पर अपने मिस्त्री यार के संग गुजारे वक्त की याद कर उसे भुला नहीं पाती थी; भूलती भी कैसे, मिस कॉल तो बराबर आते थे।

      इधर गांव में अब उसकी हरकतों की चर्चा खुले-आम हो रही थी पर रंगे हाथ न पकड़े जाने से उसका हौसला बुलंद था। गांव वाले भी कौन इस पचड़े में पड़े यही सोचकर कुछ कदम नहीं उठाते थे। सब अपने में व्यस्त थे। उन्हें उस शिक्षाकर्मी पर दया आ रही थी जो बिना वजह झंझट में पड़ रहा था। वे इस बात को समझ रहे थे कि यदि रिश्ता हो भी गया तो बेचारा घाटे में रहेगा।

      लड़की उस मिस्त्री पर शादी के लिए दबाव बनाने लगी। इस पर वह कभी गर्मी में तो कभी कटनी के बाद ठंड में शादी करने की बात कहकर टालता जा रहा था। वह शादी के बारे में कुछ भी गंभीर नहीं था और अपना बिंदास जीवन उसी रफ्तार से जी रहा था। सबको मालूम था कि वह एक नंबर का छटा बदमाश था। उसने उस लड़की को इस तरह फंसा कर रखा हुआ था कि वह उसके चंगुल से छूटने की सोच भी नहीं सकती थी। उसने उसके कुछ आपत्तिजनक फोटो भी ले लिए थे जिसके द्वारा वह उसे ब्लैकमेल करता रहता था।

      अब वह गुमसुम रहने लगी थी। उसका भविष्य अंधकारमय लगने लगा था। उस मिस्त्री का झूठा आश्वासन आशा की एक पतली किरण के समान था पर उसके भरोसे रहना अब सुरक्षित नहीं लग रहा था, पर वह विवश थी। उस मिस्त्री के बारे में उड़ते चरचों के बारे में सुनकर वह ब्याकुल हो जाती थी। अब वह चाह कर भी कुछ कर नहीं पाती थी। वह पुलिस कार्यवाही से डरती थी जबकि मिस्त्री की दोस्ती पुलिस वालों से भी थी अतः वह किसी से डरता नहीं था।

      उधर शिक्षाकर्मी की माँ अपने बेटे को शादी करने के बारे में जोर देने लगी। वह कहती थी कि या तो वह अपनी पसंद की लड़की बता दे ताकि उसके माँ-बाप से बात कर बात पक्की कर लेगी अथवा वह कहे तो स्वयं कोई लड़की देखेगी। इस पर लड़के ने कहा कि वह दो चार दिनों में सोचकर उसे बता देगा ताकि शादी की अगली कार्यवाही की जा सके।

      लड़के की छुट्टियाँ चल रही थीं। वह उस लड़की से मिलकर, बात कर अंतिम निर्णय लेना चाहता था अतः वह उससे मिलने उसके गांव गया। उसके गांव के करीब पहुंचकर वह एक आम के पेड़ के नीचे रूक गया। उसने लड़की से फोन कर उसका पता लगाना चाहा कि वह घर पर है या नहीं। गांव-देहात का मामला होने से नेटवर्क की समस्या थी। दो-तीन बार नंबर मिलाने पर कभी संदेश आता-‘‘जिस नंबर से आप बात करना चाहते हैं उसके द्वारा कोई जवाब नहीं मिल रहा है।‘‘ कभी यह संदेश आता-‘‘जो नंबर आपने लगाया है वह अभी व्यस्त है।‘‘ कभी यह संदेश आता-‘‘जिस नंबर से आप बात करना चाहते हैं वह अभी पहुंच के बाहर है।‘‘

      शिक्षाकर्मी इसी उधेड़बुन में था कि वह सीधे उस लड़की के घर जाए या अपने घर लौट जाए। वह उसी विचार में खोया था कि उस गांव का एक बुजुर्ग व्यक्ति खेत से लौटते हुए उसे देखकर रूक गया। वह शिक्षाकर्मी को पहचानता था। उसने उसका अभिवादन किया और उससे बातें करने लगा। बात-बात में लड़के ने उससे अपने मन की बात कही। सारी बात सुनकर बुजुर्ग व्यक्ति ने कहा ‘‘देखो बेटा! जो तुम कह रहे हो वह तुम्हारी जिंदगी का सवाल है। तुम सरल और भले व्यक्ति हो अपनी जिंदगी क्यों खराब करना चाहते हो?‘‘ शिक्षाकर्मी उसकी बात सुनता रहा। उसे एक झटका सा महसूस हुआ। उस बुजुर्ग ने फिर कहा-‘‘फोन पर बात हुई?‘‘ उसने कहा-‘‘फोन नहीं लग रहा है, फोन पर यही संदेश मिल रहा है कि वह पहुंच के बाहर है। बुजुर्ग ने कहा-‘‘फोन ठीक कह रहा है। वह अब पहुंच के बाहर हो चुकी है। असल में जिस लड़के से उसका चक्कर चल रहा था उसने कोई दूसरी लड़की रख ली है। यह पता लगने पर यह लड़की भी कहीं चली गई है। गांव में चर्चा है कि अंतिम बार उसे बाहर के बस स्टैंड पर दो अन्य लड़कियों के साथ देखा गया था। तुम्हारी खुश-किस्मती है कि ईश्वर ने तुम्हें बचा लिया। जाओ कोई अपनी पसंद की कन्या चुनो-इसे भूल जाओ।‘‘ शिक्षाकर्मी ने बुजुर्ग को धन्यवाद दिया और अपने घर लौट गया। उधर वह लड़की मिस कॉल के चक्कर में मौका चूक (मिस्स) गई थी और उसका सब कुछ छूट (मिस्ड) गया था।

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अथनास किसपोट्टा

अथनास किसपोट्टा

श्री अथनास किसपोट्टा छोटानागपुर परिवार से ताल्लुक रखते हैं। वे सेवानिवृत्त वरिष्ठ शासकीय अधिकारी रहे हैं।श्री किसपोट्टा पिछले 40 वर्षों से लेखन कार्य करते आ रहे हैं, लेखन कार्य के साथ साथ उन्होंने कई पुस्तकों का हिंदी अनुवाद भी किया है। उनके लेखन में छोटानागपुर क्षेत्र के इर्दगिर्द जीवंत घटनाओं की झलक दिखलाई पड़ती है।

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