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अंग्रेजी सभ्यता और संस्कृति की खूबियाँ कहाँ तक गिनवायी जायें। उसने हम असभ्य हिन्दुस्तानियों को क्या कुछ नहीं दिया? हमारी गँवार औरतों को अपने शरीर की रेखाओं की नुमाइश के नित नये तरीके बताये। शारीरिक सुन्दरता का प्रदर्शन करने के लिए बिना आस्तीनों के ब्लाऊज पहनने सिखाये। मिस्सी-काजल छीन कर उनके सिंगारदानों में लिपिस्टिक, रूज, पौडर और सिंगार की दूसरी चीजें भर दीं। पहले हमारे यहाँ मोचने सिर्फ नाक या मूँछों के बाल चुनने के काम आते थे, पर अंग्रेजी सभ्यता ने हमारी औरतों को उनसे अपनी भवों के बाल चुनना सिखाया।

यह सभ्यता की ही देन है कि अब जो औरत चाहे, लायसेन्स ले कर खुल्लम-खुल्ला अपने शरीर का व्यापार कर सकती है। प्रगतिशील मर्दों-औरतों के लिए सिविल मैरेज का कानून मौजूद है। जब चाहिए शादी कर लीजिए और जब चाहिए तलाक ले लीजिए। हींग लगती है न फिटकरी, मगर रंग चोखा अता है। नाच घर मौजूद हैं, जहाँ आप औरतों के साथ सीने-से-सीना मिला कर कई किस्म के नाचों में शरीक हो सकते हैं।

“क्लब-घर मौजूद हैं, जहाँ आप बड़े सभ्य ढंग से सारी सम्पत्ति जुए में हार सकते हैं। मजाल है कि आप कभी कानून की पकड़ में आयें। शराब-खाने मौजूद हैं, जहाँ आप अपना गम गलत कर सकते हैं।

अंग्रेजी सभ्यता और संस्कृति ने हमारे देश को अत्यन्त प्रगतिशील बना दिया है। अब हमारी औरतें पतलूनें पहन कर बाजारों में चलती फिरती हैं। कुछ ऐसी भी हैं, जो करीब-करीब कुछ भी नहीं पहनतीं, लेकिन फिर भी आजादी से घूम-फिर सकती हैं। हमारा देश बहुत उन्नतिशील हो गया है, क्योंकि यहाँ ‘नंगा क्लब’ खोलने की भी योजना बन रही है।

वो लोग सिरफिरे हैं, जो इतने एहसान करने वाले इन अंग्रेजों से कहते हैं कि भारत छोड़ कर चले जायें। अगर ये हिन्दुस्तान छोड़ कर चले गये तो हमारे यहाँ ‘नंगा क्लब’ कौन खोलेगा? ये जो नाच घर हैं, इनकी देख-भाल कौन करेगा? हम औरतों के साथ सीने-से-सीना मिला कर कैसे नाच सकेंगे? हमारे चकले क्या वीरान नहीं हो जायेंगे? हमें एक-दूसरे से लड़ना कौन सिखायेगा? अगर हम पर उपकार करने वाले ये अंग्रेज चले गये तो मुस्लिम लीगें और हिन्दू महासभाएँ कैसे कायम होंगी? मैनचेस्टर से जो कपड़े अब हमारी कपास से तैयार हो कर आते हैं, फिर कौन तैयार करेगा? ये अच्छे-अच्छे स्वादिष्ट बिस्कुट, जो हम खाते हैं, फिर हमें कौन देगा?

जो उन्नति हमें और हमारे हिन्दुस्तान की अंग्रेजों के वक्त में हुई, और किसी के शासन-काल में नहीं हो सकती। अगर हम आजाद भी हो जायें तो हमें हुकूमत करने को वो चाले नहीं आ सकतीं, जो हमारे इन हाकिमों को आती हैं। उन हाकिमों को, जिनके शासन-काल में न सिर्फ हमारे होटलों, क्लबों, नाच घरों और सिनेमाओं की बल्कि कब्रिस्तानों की भी काफी तरक्की हुई है।

अप्रगतिशील कब्रिस्तानों में मुर्दे उठा कर गाड़ दिये जाते हैं, जैसे वो कोई कद्रो-कीमत ही नहीं रखते। लेकिन प्रगतिशील कब्रिस्तानों में ऐसा नहीं होता। मुझे इस तरक्की का एहसास उस समय हुआ, जब बम्बई में मेरी माँ का देहान्त हो गया। मैं छोटे-छोटे, अपेक्षाकृत असभ्य शहरों में रहने का अभ्यस्त था। मुझे क्या मालूम कि बडे शहरों में मुर्दों पर भी सरकारी प्रतिबन्ध लगे हैं।

माँ की लाश दूसरे कमरे में पड़ी थी। मैं गम का मारा सिर निहुराये एक सोफे पर बैठा सोच रहा था कि इतने में एक साहब ने, जो अर्से से बम्बई में रहते थे, मुझसे कहा, “भई अब तुम लोगों को कुछ कफन-दफन की फिक्र होनी चाहिए।”

मैंने कहा, “सो यह आप ही करेंगे, क्योंकि मैं यहाँ नया-नया आया हूँ।”

उन्होंने जवाब दिया, ”मैं सब कुछ कर दूँगा; मगर पहले तुम्हें किसी के हाथ इत्तला भिजवा देनी चाहिए कि तुम्हारी माँ का इन्तकाल हो गया है।”

“किसको?”

“यहाँ पास ही म्युनिसिपेल्टी का दफ्तर है। उसको इत्तला देनी बहुत जरूरी है। क्योंकि जब तक वहाँ से सर्टिफिकेट नहीं मिलेगा, कब्रिस्तान में दफनाने की इजाजत नहीं मिलेगी।”

उस दफ्तर को सूचना भेज दी गयी। वहाँ से एक आया, जिसने तरह-तरह के सवाल करने शुरू किये, “क्या बीमारी थी, कितने अर्से से मरने वाली बीमार थी, किस डॉक्टर का इलाज हो रहा था?”

हकीकत यह थी कि मेरी गैरमौजूदगी में हार्ट फेल हो जाने के कारण मेरी माँ का देहान्त हुआ था। प्रकट है कि वे किसी से इलाज नहीं करा रही थीं और न पहले से बीमार ही थीं। चुनांचे मैंने उस आदमी से जो सच्ची बात थी, कह दी। उसको इत्मीनान न हुआ और कहने लगा, “आप को डॉक्टरी सर्टिफिकेट दिखाना पड़ेगा कि मौत सचमुच हार्ट-फेल हो जाने से हुई है।”

मैं सिटपिटा गया। डॉक्टरी सर्टिफिकेट कहाँ से हासिल करूँ। चुनांचे कुछ सख्त कलमे मेरी जबान से निकल गये। लेकिन मेरे वो दोस्त, जो एक अर्से से बम्बई में रहते थे, उठे और उस आदमी को एक तरफ ले गये। कुछ देर उससे बातें करते रहे, फिर आये और मेरी तरफ इशारा करके कहने लगे—“यह तो बिलकुल बेवकूफ है। इसको यहाँ की बातों का इल्म नहीं।”

फिर उन्होंने मेरी जेब से दो रुपये निकाल कर उस को दिये, जो एकदम ठीक हो गया और कहने लगा, ”अब आप ऐसा कीजिए कि दवाओं की चन्द खाली बोतलें मुझे दे दीजिए ताकि बीमारी का कुछ तो सबूत हो जाये। पुराने नुस्खे वगैरह पड़े हो तो वो भी मुझे दे दीजिए।”

उसने इस किस्म की और बातें कीं, जिनको सुन कर मुझे थोड़ी देर के लिए ऐसा लगा कि मैं अपनी माँ का कातिल हूँ और यह आदमी जो मेरे सामने बैठा है, मुझ पर तरस खा कर इस भेद को अपने तक ही रखना चाहता है और मुझे ऐसी तरकीबें बता रहा है, जिससे कत्ल के निशान मिट जायें।

उस वक्त जी में आयी थी कि धक्के दे कर उसे बाहर निकाल दूँ और घर में जितनी खाली बोतलें पड़ी हूँ, उन सब को एक-एक करके उसके बिना भेजे के सिर पर फोड़ता चला जाऊँ। लेकिन इस सभ्यता और संस्कृति का भला हो कि मैं खामोश रहा और अन्दर से कुछ बोतलें निकलवा कर उसको दे दीं।

दो रुपये रिश्वत के तौर पर अदा करने के बाद म्युनिसिपेल्टी का सर्टिफिकेट हासिल कर लिया गया था। अब कब्रिस्तान का दरवाजा हम पर खुला था। लोहे के बहुत बडे दरवाजे के पास छोटा-सा कमरा था, जैसा कि सिनेमा के साथ बुकिंग ऑफिस होता है। उसकी खिड़की में से एक आदमी ने झाँक कर अन्दर जाते हुए जनाजे को देखा और कुछ कहने ही को था कि मेरे दोस्त ने वह पर्ची, जो म्युनिसिपेल्टी के दफ्तर से मिली थी, उसके हाथ में दे दी। कब्रिस्तान के मैनेजर को इत्मीनान हो गया कि जनाजा बिना टिकट के अन्दर दाखिल नहीं हुआ।

बड़ा खूबसूरत कब्रिस्तान था। एक जगह दरख्तों का झुण्ड था, जिसके साये में कई पक्की कब्रें लेटी हुई थीं। उन कब्रों के आसपास मोतिया, चमेली और गुलाब की झाड़ियाँ उग रही थीं। पूछने पर मालूम हुआ कि यह कब्रिस्तान का सबसे ऊँचा दरजा है, जहाँ हाई क्लास आदमी अजीजों को दफन करते हैं। एक कब्र के दाम तीन सौ रुपये अदा करने पड़ते हैं।

यह रकम देने के बाद कब्रिस्तान की इस ठण्डी और हवादार जगह में आप अपनी या अपने किसी अजीज की पक्की कब्र बनवा सकते हैं। उसकी देख-भाल करना हो तो आपको छ: रुपये सालाना और देने पड़ेंगे। यह रकम ले कर मैनेजर साहब इस बात का खयाल रखेंगे कि कब्र ठीक हालत में रहे।

वो लोग, जो तीन सौ रुपये देने की हैसियत नहीं रखते, उनकी कब्रें तीन या चार साल के वाद खोद-खाद कर मिटा दी जाती हैं और उनकी जगह दूसरे मुर्दे गाड़ दिये जाते है। उन कब्रों को दरख्तों की छाँव और मोतिया-चमेली की खुशबू नसीब नहीं होती। यहाँ दफनाते वक्त मिट्टी के साथ एक खास किस्म का मसाला मिला दिया जाता है ताकि लाश और उसकी हड्डियाँ जल्दी गल-सड़ जायें।

चूँकि एक ही शक्ल सूरत की कब्रों की कतार-की-कतार चली गयी है, इसलिए हर कब्र पर नम्बर लगा दिया गया है ताकि पहचानने में आसानी हो। यह नम्बर चार आने में मिलता है। आजकल अच्छे सिनेमाओं में भी ऐसा ही किया जाता है। नम्बर लगे टिकट दे दिये जाते हैं, ताकि हाल में गड़बड़ न हो और आदमी उस नम्बर की सीट पर बैठे, जिस नम्बर का उसके पास टिकट है। जब मुर्दा दफन कर दिया जाता है तो कब्रिस्तान का मैनेजर एक खास नम्बर, जो लोहे की तख्ती पर लिखा होता है, कब्र के पहलू में गाड़ देता है। यह उस वक्त तक गड़ा रहता है, जब तक कब्र किसी दूसरे मुर्दे के लिए खाली नहीं की जाती।

नम्बर मिलने से कितनी आसानी हो जाती है। यानी आप अपनी नोट- बुक में अपने अजीजों की कब्रों का नम्बर भी लिख सकते हैं।

जूते का नम्बर 5

मोजे का नम्बर साढ़े 9

टेलीफोन का नम्बर 44457

बीमा की पालिसी का नं० 225689

माँ की कब्र का नम्बर 4817

और अगर जमाना ज्यादा तरक्की कर गया तो पैदा होते ही आपको अपनी कब्र का नम्बर मिल जाया करेगा।

कब्रिस्तान में दाखिल होते ही एक खूबसूरत मस्जिद दिखायी दी, जिसके बाहर एक बहुत बड़े बोर्ड पर “जरूरी इत्तिला’ शीर्षक के अन्तर्गत यह सूचना लिखी थी—

अगर कोई शख्स अपने वारिस का कच्चा ओटा बनाना चाहे तो वह गोर खोदू बनावेंगे, और कोई नहीं बना सकता। बड़ी कब्र बनाने के दो रुपये चार आने, जिसमें सवा रुपया गोर खोदू की मजदूरी और एक रुपया कब्रिस्तान का हक। छोटी कब्र का सवा रुपया, जिसमें गोर खोदू की मजदूरी बारह आने और कब्रिस्तान का हक आठ आने। अगर न देंगे तो उनका ओटा निकाल दिया जायेगा। कब्रिस्तान में किसी को रहने की इजाजत नहीं। हाँ मय्यत के साथ आवें और अपना तोशा ले कर बाहर चले जावें, ख्वाह मर्द हो या औरत। अगर कोई मय्यत बाहर से बगैर गुसल के आवे और उसके साथ गुसल देने वाला भी हो तो उससे कब्रिस्तान का हक चार आने लिया जायेगा। जिस मय्यत को गुसल रात को दिया जायेगा उससे दो आना रोशनी का अलग लिया जायेगा। कोई शख्स कब्रिस्तान में दंगा-फसाद न करे। अगर करेगा तो उसको पुलिस के हवाले कर दिया जायेगा। कब्र के वारिस अपने ओटे पर पानी डालने और दरख्त लगाने का काम गोर खोदू को सौंप दें तो उनको चार आने माहवार देना होगा। जो साहब न देंगे, उनकी कब्र पर न गोर खोदू पानी डालेंगे और न दरख्त उगायेंगे।”

मैनेजिंग ट्रस्टी…

सिनेमाओं के विज्ञापनों और कब्रिस्तान के इस एलान में एक हद तक काफी समानता है। क्योंकि वहाँ भी लिखा होता है—”शराब पी कर आने वालों और दंगा फसाद करने वालों को पुलिस के हवाले कर दिया जायेगा।”

बहुत मुमकिन है कि जमाने की तरक्की के साथ इस एलान में सुधार भी होते जायें और कभी ऐसे शब्द भी बढ़ा दिये जाये-

“भूचाल आने और बम-वर्षा की हालत में मैनेजर कब्रों के दाम वापस नहीं करेगा। जो साहब अपने अजीजों-रिश्तेदारों की कब्र पर एयररेड शेल्टर बनवाना चाहें उन्हें ढाई सौ रुपया और देना होगा। लेकिन उस हालत में भी कब्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी मैनेजर पर न होगी। कब्र को एयर कण्डीशन्ड बनाने के लिए छोटे-छोटे प्लाण्ट मिल सकते हैं। हर महीने जितनी बिजली खर्च होगी उसका बिल कब्र के वारिस को अदा करना होगा वगैरह वगैरह….”

एक बोर्ड और दिखायी दिया, जिस पर मुर्दों के नहलाने वगैरह के रेट लिखे थे। मुलाहिजा हो-

जनाजे की नमाज और तल्कीन पढ़ायी …. 0-6-0

गुसल बड़ी मय्यत … 1-4-0

गुसल छोटी मय्यत … 0-14-0

मय्यत के लिए पानी गर्म करने की लकड़ी …. 0-4-0

पानी भरने और गर्म करने की मजदूरी …. 0-2-0

बड़ी मय्यत के बरगे, फी बरगा …. 0-2-6

छोटी मय्यत के बरगे, फी बरगा …. 0-1-9

नोट—बरगे लकड़ी के उन तख्तों को कहते हैं जो कब्र के गड्ढे में मय्यत के ऊपर रखे जाते हैं, ताकि मिट्टी से लाश दब न जाये।

किसी अच्छे सैलून में जाइए तो वहाँ भी ग्राहकों की सुविधा के लिए इस किस्म के बोर्ड पर आप को अलग-अलग चीजों के रेट नजर आयेंगे–

मर्दों की बाल कटवायी … 0-8-0

बच्चों की बाल कटवायी … 0-4-0

औरतों की बाल कटवायी … 1-0-0

बच्चियों की बाल कटवायी …. 0-8-0

दाढ़ी मुण्डवायी … 0-2-0

बाल कटवायी और दाढ़ी मुण्डवायी …. 0-9-0

शैम्पू …. 1-0-0

बाल कटवायी, दाढ़ी मुण्डवायी

और शेम्पू …. 1-0-0

अगर बाल कटवाये जायें और साथ-ही-साथ दाढ़ी भी मुण्डवायी जाये तो एक-दो आने की रिआयत हो जाती है। बहुत मुमकिन है आगे चलकर कब्रिस्तान वाले भी कुछ रिआयत अपने ग्राहकों को दे दिया करें। कुछ इस किस्म का एलान कर दिया जाये—

“जो साहब साल में दो बड़ी कब्रें खुदवायेंगे, उनको एक छोटी कब्र मुफ्त खोद कर दी जायेगी।” या “जो साहब एक वक्त में दो कब्रें खुदवायेंगे, उनको गुलाब की दो कलमें मुफ्त दी जायेंगी।” या “जो लोग कफन-दफन का सब सामान हमारे यहाँ से खरीदेंगे उनको कब्र का नम्बर एक खूबसूरत बिल्ले पर तिल्ले से कढ़ा हुआ मुफ्त मिलेगा।”

यह भी सम्भव है कि आने वाले जमाने में, जब कि हमारे कब्रिस्तान और ज्यादा तरक्की कर जायेंगे, कब्रों की एडवांस बुकिंग हुआ करेगी। यानी हम लोग अपने बूढ़े रिश्तेदारों के लिए दो-दो तीन-तीन बरस पहले ही किसी अच्छे और फैशनेबुल कब्रिस्तान में सीट बुक कर लिया करेंगे ताकि वक्त पर कठिनाई का सामना न करना पड़े। उस वक्त मुर्दों का कफनाने दफनाने का इन्तजाम भी नये तरीकों पर होगा। चुनांचे बहुत मुमकिन है कि कब्र खोदने वालों की तरफ से इस किस्म के विज्ञापन छपा करें-

ईसा जी मूसा जी एण्ड सन्ज कफन-दफन के माहिर

मय्यतों को नये यंत्रों की मदद से बिना हाथ लगाये नहलाया जाता है और बिना हाथ लगाये कफन पहनाया जाता है!

कब्रिस्तानों की तरफ से भी ऐसे ही विज्ञापन छपें तो कोई ताज्जुब न होगा-

शहर का सबसे जदीद (आधुनिक) कब्रिस्तान

जहाँ मुर्दे उसी तरह कब्रों में सोते हैं, जिस तरह आप अपने नर्म-गर्म बिस्तरों में।

बम्बई शहर में इस वक्त कई ऐसी संस्थाएँ मौजूद हैं, जो मय्यतों के कफन-दफन का प्रबन्ध करती हैं। आपको तकलीफ करने की कोई जरूरत नहीं। इन संस्थाओं में से किसी एक को खबर भेज दीजिए। मय्यत को नहला- धुsला कर और कफन वगैरह पहना कर उस संस्था के आदमी आपके घर से जनाजे को उठा कर कब्रिस्तान ले जायेंगे और वहाँ दफन कर देंगे। कानों- कान खबर न होगी। जब सारा काम आपके इत्मीनान के मुताबिक हो जाये तो यह संस्था अपना बिल पेश कर देगी।

आप बहुत व्यस्त आदमी हैं। संयोग से आपके नौकर को मौत आ दबोचती है। आपको उसकी मौत का बहुत अफसोस है। पर आपका सागर तट पर अपने चन्द ऐसे दोस्तों के साथ पिकनिक पर जाना है, जिनसे आप के कारोबारी सम्बन्ध हैं। इसलिए आप तुरन्त किसी संस्था के मैनेजर को बुलायेंगे। जनाजे के साथ संस्था के पेशेवर कन्धा देने वाले होंगे, जो आपके मकान से कब्रिस्तान तक ऊँची आवाज में कुरान शरीफ की आयतें पढ़ते हुए जायेंगे। वहाँ जनाजे की नमाज पढ़ी जायेगी, जिसकी पढ़वायी बिल में शामिल होगी। और एक बड़ी कब्र में, जिसकी कीमत दो रुपये चार आने होती है, आपका वफादार नौकर दफन कर दिया जायेगा। सागर तट पर आप बड़े इत्मीनान से अपने दोस्तों के साथ हँसते-खेलते रहेंगे और यहाँ भी हँसते-खेलते आपके नौकर की कब्र तैयार हो जायेगी और अगर आपने इनाम देने का वादा किया होगा तो उस पर संस्था के आदमी फूलों की एक चादर भी चढ़ा देंगे।

चन्द रोज हुए, मुझे फिर उसी कब्रिस्तान में जाने का संयोग हुआ। नोटिस बोर्ड पर एक आम एलान लिखा था :

”तारीख 8 जून सन् 1942 ई० से महँगाई की वजह से कब्र की खुदवायी की मजदूरी बढ़ा दी गयी है। बड़ी कब्र की खुदवायी 3 रुपया 4 आने, छोटी कब्र की खुदवायी 14 आने।”

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manto

सआदत हसन मंटो

जन्म: 11 मई 1912, मृत्यु: 18 जनवरी 1955 कहानियाँ: खोल दो, टोबा टेक सिंह, काली सलवार, ठंडा गोश्त

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