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हरिपुर गढ़ी के अन्दर राजा करनसिंह अपने दीवानखाने में दो मुसाहबों के साथ बैठा कुछ बातें कर रहा है। सामने हाथ जोड़े हुए दो जासूस भी खड़े महाराज के चेहरे की तरफ देख रहे हैं। उन दोनों मुसाहबों में से एक का नाम शंभूदत और दूसरे का नाम सरूपसिंह है।

राजा : रामदास के गायब होने का तरद्दुद तो था ही मगर हरीसिंह का पता लगने से और भी जी बेचैन हो रहा है।।

शंभू० : रामदास तो भला एक काम के लिए भेजे गए थे, शायद वह काम अभी तक नहीं हुआ, इसलिए अटक गए होंगे। मगर हरीसिंह तो कहीं भेजे भी नहीं गए।

सरूप० : जितना बखेड़ा है, सब नाहरसिंह का किया हुआ है।

राजा : बेशक, ऐसा ही है, न-मालूम हमने उस कमबख़्त का क्या बिगाड़ा है, जो हमारे पीछे पड़ा है। वह ऐसा शैतान है कि हरदम उसका डर बना रहता है और वह हर जगह मौजूद मालूम होता है। बीरसिंह को कैदखाने से छुड़ा ले जाकर उसने हमारी महीनों की मेहनत पर मिट्टी डाल दी, और बच्चन के हाथ से मोहर छीन कर बनी-बनाई बात बिगाड़ दी, नहीं तो रिआया के सामने बीरसिंह को दोषी ठहराने का पूरा बन्दोबस्त हो चुका था, उस मुहर के जरिए बड़ा काम निकलता और बहुत सच्चा जाल तैयार होता।

सरूप० : सो सब तो ठीक है मगर कुंअर साहब को आप कब तक छिपाए रहेंगे, आखिर एक-न-एक दिन भेद खुल ही जायेगा।

राजा : तुम बेवकूफ हो, जिस दिन सूरजसिंह को जाहिर करेंगे, उस दिन अफसोस के साथ कह देंगे कि भूल हो गई और बीरसिंह को कत्ल करने का महीनों अफसोस कर देंगे, मगर वह किसी तरह हाथ लगे भी तो! अभी तो नाहरसिंह उसे छुड़ा ले गया।

सरूप० : यहाँ की रिआया बीरसिंह से बहुत ही मुहब्बत रखती है, उसे इस बात का विश्वास होना मुश्किल है कि बीरसिंह ने कुमार सूरजसिंह को मार डाला!

राजा : इसी विश्वास को दृढ़ करने के लिए तो मोहर चुराने का बन्दोबस्त किया गया था, मगर वह काम ही नहीं हुआ।

शंभू० : यहाँ की रिआया ने बड़ी धूम मचा रखी है, एक बेचारा हरिहरसिंह आपका पक्षपाती है, जो रिआया की कमेटी का हाल कहा करता है, अगर आप बड़े-बड़े सरदारों और जमींदारों का जो आपके खिलाफ कमेटी कर रहे हैं, बन्दोबस्त न करेंगे, तो जरूर एक दिन वे लोग बलवा मचा देंगे।

राजा : उनका क्या बन्दोबस्त हो सकता है? अगर उन लोगों पर बिना कुछ दोष लगाये जोर दिया जाए, तो भी तो गदर होने का डर है! हाय, यह सब खराबी नाहरसिंह की बदौलत है! अफसोस, अगर लड़कपन ही में हम बीरसिंह को खतम करा दिये होते तो काहे को यह नौबत आती! क्या जानते थे कि वह लोगों का इतना प्रेमपात्र बनेगा? उसने तो हमारी कुल रिआया को मुट्ठी में कर लिया है। अब नेपाल से खड़गसिंह तहकीकात करने आये हैं, देखें वे क्या करते हैं। हरिहर की जुबानी तो यही मालूम हुआ कि यहाँ के रईसों ने उन्हें अपनी तरफ मिला लिया।

सरूप० : आज की कमेटी से पूरा-पूरा हाल मालूम हो जायेगा।

राजा : बच्चनसिंह बीस-पचीस आदमियों को साथ लेकर उसी तरफ गया हुआ है, देखें वह क्या करता है।

सरूप० : खड़गसिंह तीन-चार सौ आदमियों के साथ हैं, अगर अकेले-दुकेले होते तो खपा दिये जाते।

राजा : (हँस कर) तो क्या अब हम उन्हें छोड़ देंगे? अजी महाराज नेपाल तो दूर हैं, खड़गसिंह के साथियों तक को तो पता लगेगा ही नहीं कि वह कहाँ गया या क्या हुआ। महाराज नेपाल को लिख देंगे कि हमारी रिआया को भड़का कर भाग गया। हाँ, सुजनसिंह के बारे में भी अब हमको पूरी तरह सोच-विचार कर लेना चाहिए।

सलाह-विचार करते-करते रात का ज्यादा हिस्सा बीत गया और केवल घण्टे-भर रात बाकी रह गई। महाराज की बातें खतम भी न हुई थीं कि सामने का दरवाजा खुला और एक लाश उठाए हुए चार आदमी कमरे के अन्दर आते हुए दिखाई पड़े।

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देवकी नंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी

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